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बोले भूपेश बघेल- प्रधानमंत्री ने किसी को भी विश्वास में नहीं लिया...इसलिए मची अफरा-तफरी

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र के अफसरों ने लॉकडाउन के पहले किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री से रायशुमारी नहीं की थीं जिसके चलते अफरा-तफरी की स्थिति कायम हुई. एक वेबसाइट को दिए गए इंटरव्यूह में बघेल ने बताया कि लॉकडाउन के बाद प्रधानमंत्री और केंद्र के अफसरों ने वीडियो कांफ्रेंसिग के जरिए दिशा- निर्देश अवश्य दिए मगर तब भी कुछ मुख्यमंत्री ही अपनी बात रख पाए. कान्फ्रेसिंग में अफसर और प्रधानमंत्री ही समझाइश देते रहे.

बघेल ने कहा कि संघीय ढांचे के तहत किसी भी तरह के बड़े निर्णय के लिए सबको विश्वास में लेकर चलना होता है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. अगर प्रधानमंत्री और केंद्र के अफसर पहले बता देते कि अमुक तारीख से लॉकडाउन करने जा रहे हैं तो स्थिति बेहतर होती. एक निश्चित तिथि पर लॉकडाउन कर देने की जानकारी मिल जाने से हर कोई इस बात के लिए तैयार हो जाता कि किन-किन बातों को अमल में लाने की आवश्यकता होगी. क्या समस्या होगी. सभी राज्यों के मुख्यमंत्री आपस में एक-दूसरे से चर्चा कर लेते और सबकी एक सूची बन जाती. बघेल ने कहा कि भारत सरकार भले ही आदेश जारी कर दें, लेकिन आदेश का क्रियान्वयन तो राज्य सरकार को ही करना होता है. अभी जितनी भी कार्रवाई हो रही है वह राज्य सरकारें ही कर रही है. चाहे वह लोगों के आने-जाने का मामला हो या भोजन के प्रबंध का. भारत सरकार तो केवल किट उपलब्ध करवा रही है.

 

प्रधानमंत्री की ताली-थाली बजाने वाली अपील तो सबने मानी थीं फिर स्थिति क्यों बिगड़ी... इस पर बघेल ने कहा कि ताली-थाली और घंटी की बात अलग है, लेकिन उसके बाद मामला तब उलटा पड़ गया जब लोग सड़कों पर निकल गए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को सभी राज्यों के मुख्यमंत्री से रायशुमारी करनी थीं और उन व्यवसायियों और उद्योगपतियों से विशेष तौर पर चर्चा करनी थी जिनके यहां बड़ी संख्या में लोग मेहनत-मजूरी करते हैं. व्यावसायियों और उद्योगपतियों से इस बात की गुजारिश करनी थीं कि वे कम से कम एक महीने तक अपने यहां कार्यरत मजदूरों के रहने खाने का प्रबंध करें. यह सब नहीं हो पाया जिसके चलते दिल्ली के  मजदूर सड़क पर आ गए. बघेल ने बताया कि हमने छत्तीसगढ़ के सभी उद्योगपतियों से अपनी की थीं जिसका सकारात्मक असर पड़ा और अफरा-तफरी का माहौल कायम नहीं हुआ.

बच सकते थे कोरोना से

बघेल ने कहा कि काफी पहले से कोरोना वायरस के फैल जाने की खबरें आ रही थीं. अगर केंद्र सरकार इंटरनेशनल फ्लाइट पर ही रोक लगा लेती तो स्थिति नहीं बिगड़ती. बघेल ने बताया कि छत्तीसगढ़ में कोरोना के दो मरीज ठीक हो गए हैं, लेकिन जो भी लोग भर्ती हैं वे सब विदेश यात्रा से लौटने वाले लोग हैं. मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश की आबादी दो करोड़ अस्सी लाख के आसपास है, लेकिन अब तक महज आठ सौ लोगों की ही जांच हो पाई है. देश में कोरोना जांच की किट का अभाव है. उन्होंने कहा कि अभी किसी प्राइवेट अस्पताल को सरकार ने अपने अधीन नहीं किया है, लेकिन निजी क्षेत्र के सभी अस्पताल वालों से सहयोग के लिए तैयार रहने को कहा है.

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क्या कोरोना के साये में निपट जाएंगे अखबार ?

कोलकाता में जनसत्ता के संपादक रहे शंभूनाथ शुक्ल की यह टिप्पणी बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करती है.

नई दिल्ली. कोरोना का भय अब मीडिया पर भी छाने लगा है. आज ही मेरे हाकर ने कहा है, कि बस अब कल से अखबार नहीं आएगा. जो दो अख़बार आज आए हैं, उनमें से अमर उजाला कुल दस पेज का है, और छह पेज का सिटी पूल आउट. इसी तरह हिंदुस्तान टाइम्स में मात्र 14 पेज हैं और चार पेज का सिटी. इन दोनों ही अखबारों में कोई कॉमर्शियल विज्ञापन नहीं है. यही हाल है टाइम्स ऑफ़ इंडिया का है. वह भी कुल 14+4 पेज का ही है. कोई विज्ञापन नहीं. अलबत्ता मथुरा की जीएलए यूनिवर्सिटी का एक विज्ञापन लगा है, वह शायद पहले से शेड्यूल होगा.

दैनिक जागरण भी पूल आउट समेत 18 पेज का है, और कोई भी कॉमर्शियल विज्ञापन नहीं है. इन्डियन एक्सप्रेस आज हाकर ने दिया नहीं. और वैसे भी उसकी हालत सदा पतली ही रही है. न तो वह सेल में कभी ऊपर गया, न विज्ञापन में और न ही एडिटोरियल मटीरियल में कभी वह हिंदू को पछाड़ पाया. अब देखिए ये वही अखबार हैं, जो अपनी सेल के लिए ज़मीन-आसमान एक करते थे, और विज्ञापन के लिए तीन-तीन, चार-चार पेज के कवर देते थे. नवरात्रि के बम्पर सेल के मौके पर अखबारों का यह रूप बता रहा है, कि कोरोना तो कल चला जाएगा, लेकिन शायद प्रिंट मीडिया को मिटा देगा.

यह कोई क़यास नहीं, वरन हकीकत है. भारत में भी प्रिंट मीडिया ने अमेरिकी अखबारों की तरह शोशेबाज़ी अधिक की, पा तो खूब बढ़ा दी, लेकिन अपने एडिटोरियल मटीरियल को सुधारने पर कभी जोर नहीं दिया. हिंदी अखबारों का तो खैर ख़ुदा मालिक है, दिल्ली और नॉर्थ में अंग्रेजी अखबारों ने कभी भी आरएंडडी विभाग बनाने की सोची नहीं. विभाग बनाने का मतलब कोई एक आर्काइव बनाना नहीं होता. बल्कि शोध के लिए बाकायदा एक संपादकीय टीम काम करती. एक संपादक होता और कुछ उसके सहयोगी. यह काम कुछ हद तक हिंदू ने शुरू किया था, पर उसकी हालत स्वयं खस्ता है. तब ऐसी स्थिति में अखबार अपरिहार्य क्यों?

लेकिन अखबार तो भारत में फिर भी 200 साल चल गए, इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने तो 20 साल में ही दम तोड़ दिया. क्योंकि सबको पता है, कि टीवी न्यूज़ चैनल किसी एक घटना, दुर्घटना और हादसे को भुनाने के प्रयास में रहते हैं. अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए वे अजीबो-गरीब करतब करते रहते हैं. फालतू की डिबेट कराते हैं. पत्रकार भी अक्सर वहां किसी न किसी दल के प्रवक्ता की तरह बैठते हैं. लेकिन अब कोरोना के भय से उनकी डिबेट्स ठंडी पड़ने लगी हैं. क्योंकि इन डिबेट्स के सहभागी लोग अब स्टूडियो जाते ही नहीं. साथ में यह भी कह दिया है, कि आप किसी को भी घर में रिकार्डिंग के लिए न भेजें. अब दिक्कत यह है, कि कोई दिखाने लायक मसाला उनके पास है नहीं और दर्शकों की रुचियाँ उन्होंने स्वयं नष्ट कर डाली हैं. क्या यह मजेदार नहीं, कि एबीपी और आज तक जैसे न्यूज़ चैनल सास, बहू और साज़िश टाइप मनोरंजन सीरियल्स दिखाते हैं अथवा डरावनी कहानियां. बिना एडिटोरियल मटीरियल को लाए यही हश्र होना था.

अब यह एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, कि क्या मेन स्ट्रीम मीडिया के दिन समाप्त हो गए? और बस सोशल मीडिया का ही भविष्य है. जिसमें जा रही सामग्री का कोई खेवनहार नहीं है. यह सामग्री सच है या झूठ, यह भी किसी को नहीं पता. लेकिन जो स्थितियां बन रही हैं, उनमें यही दीखता है. क्योंकि दस वर्ष पहले तक जो पाठक टॉयलेट जाते समय अखबार ले जाया करते थे, वे अब मोबाइल ले जाते हैं. वे अपने मोबाइल पर ही सोशल मीडिया में चल रही सामग्री देखा करते हैं. लेकिन न तो इसमें चल रही ख़बरों में सच्चाई होती है, न कोई तथ्य. भाषा और व्याकरण की गलतियां तो होती ही हैं, इन्हें आदमी अपनी सनक पर लिखता है. यह एक समाज के निरंतर गिरते जाने का संकेत है. इस मीडिया में भ्रामक ख़बरों को चला कर उन्हें उड़ा दिया जाता है, इसलिए ऐसी हरकत करने वाले पर भी कोई अंकुश नहीं लग पाता.

लेकिन एक उम्मीद की किरण है, वह है ई-पेपर और ऑन लाइन मीडिया यानी वेबसाइट्स. सारे बड़े अखबारों के पास अपने रिपोर्टरों और स्ट्रिंगरों का नेटवर्क है. दूर-दराज गाँवों, कस्बों और शहरों में फैले ये स्ट्रिंगर लोगों के साथ सीधे जुड़े हैं. इसलिए उनके पास पुख्ता स्रोत हैं. और अब लोगों के पास न अखबार बांचने की फुर्सत है, न टीवी पर रुक कर न्यूज़ देखने की. ऑन लाइन मीडिया यह सुविधा अपने पाठकों और दर्शकों को देती है, कि वह किसी भी वक़्त स्क्रोल करते हुए ख़बरों से रू-ब-रू रहे. सारे न्यूज़ पोर्टल के पास संपादक भी होता है और उस पर पीआरबी के अधिनियम भी लागू होते हैं. अर्थात गलत खबर देने पर वह फौजदारी क़ानून के दायरे में आ जाएगा. एक तरह से कहा जा सकता है, कि भविष्य अब ऑन लाइन मीडिया है. लेकिन सरकार को उसके रजिस्ट्रेशन और वहाँ के संपादकीय स्टाफ के लिए कुछ क़ानून बनाने होंगे. साथ-साथ उनके लिए रेवेन्यू का इंतजाम भी सरकार को करना होगा डीएवीपी के दायरे में उसे लाना होगा. तब ही भारत में मीडिया का भविष्य रहेगा. और भविष्य का मीडिया भी रहेगा.

 

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चंदूलाल चंद्राकर के पोते ने भगवा बिग्रेड पर साधा निशाना-जो कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ राज्य बने... वे ही कर रहे हैं विरोध

रायपुर. छत्तीसगढ़ में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को अब देश के मूर्धन्य पत्रकार रहे चंदूलाल चंद्राकर के नाम कर दिया गया है. इस नामकरण के बाद ऐसे लोग विरोध में उतर आए हैं जिन्होंने विश्वविद्यालय परिसर को बांटने, छांटने और काटने वाली वैचारिक दुकान में तब्दील कर रखा था. बताते हैं कि परिसर में ऐसे-ऐसे लोगों का जमावड़ा होता था ( शायद अब भी हो... क्योंकि वहां ऐसे लोग तैनात हैं.) जिनका एकमात्र लक्ष्य छात्र-छात्राओं के बीच वैमनस्य का बीज बांटना था. भाजपा शासनकाल के 15 सालों में यहां कई तरह के विचारक यहां अपना ज्ञान बघारने के लिए आते रहे. इन विचारकों में से अधिकतर का लक्ष्य अलगाव को बढ़ावा देना था. एक तरह से यह विश्वविद्यालय नफरत की राजनीति करने वालों का केंद्र बन गया था. इधर कतिपय लोगों के विरोध के बीच चंदूलाल चंद्राकर के पोते अमित चंद्राकर ने फेसबुक पर एक पोस्ट साक्षा की है. इस पोस्ट पर उन्होंने भगवा बिग्रेड पर निशाना साधते हुए कहा है कि जो लोग कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण हो... वे ही विरोध की राजनीति कर रहे हैं.

अमित चंद्राकर ने लिखा है- जो लोग विश्वविद्यालय के नए नामकरण का विरोध कर रहे हैं उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि घर के जिस पते पर वे छत्तीसगढ़ को लिखते हैं वह चंदूलाल चंद्राकर की ही देन है. वे पहले ऐसे भारतीय पत्रकार थे जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन का इंटरव्यूह लिया था. वर्ष 1946 से 47 तक उन्हें नई दिल्ली के बिरला हाउस में महात्मा गांधी के व्याख्यान को कव्हर करने की जिम्मेदारी दी गई थीं. आज से चालीस साल पहले ही उन्होंने लगभग 148 देशों की यात्राएं की थीं. उन्हें देश-दुनिया की गहन जानकारी थीं. वर्ष 1995 में जब उनका देहांत हुआ तब भाजपा के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी की आंखे नम थीं. वाजपेयी ने संसद में कहा था- देश ने ऐसा नेता खो दिया है जिसकी भरपाई शायद ही हो पाए. अमित चंद्राकर ने अपना मोर्चा डॉट कॉम से भी बातचीत में कहा कि चंदूलाल चंद्राकर के नाम के विरोध के पीछे नफरत की राजनीति को बढ़ावा देने वाले तत्व सक्रिय है. ऐसे तत्वों को बेनकाब करना बेहद जरूरी है.

कौन है कुशाभाऊ ठाकरे ?

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे कुशाभाऊ ठाकरे का जन्म मध्यप्रदेश के धार जिले में हुआ था. उनकी शिक्षा-दीक्षा भी छत्तीसगढ़ में नहीं हुई थीं. वे लंबे समय तक संघ के प्रचारक थे और फिर जब भाजपा के शीर्ष पद पर पहुंचे तो संगठन के काम को बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ आया करते थे. सोशल मीडिया में लोग कुशाभाऊ ठाकरे के पत्रकारिता में दिए गए योगदान को लेकर सवाल उठा रहे हैं. एक फेसबुक पोस्ट है जिसमें लिखा है- मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी हूं. मुझसे आज तक किसी भी प्राध्यापक ने नहीं कहा कि बेटा जीवन में अगर कभी कुछ बनना है तो कुशाभाऊ ठाकरे जैसा पत्रकार बनना.

क्या कुलपति को हटाया जाएगा ?

विश्वविद्यालय के नए कुलपति बलदेव शर्मा को एक खास तरह के विचारक भारतीयता के पोषक तत्व के रुप में प्रचारित करते हैं. श्री शर्मा संघ के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक रहे हैं. हालांकि अपनी तैनाती के बाद बलदेव शर्मा ने मीडिया से कहा है- कुलपति किसी पार्टी का नहीं होता. अब उनका एकमात्र लक्ष्य शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ावा देना है. अब यह कैसे और किस तरह से संभव हो पाएगा यह भविष्य की बात है, लेकिन इधर छत्तीसगढ़ सरकार ने विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्तियों को लेकर नया नियम-कानून बना लिया है इसलिए राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा चल पड़ी है कि जल्द ही कुलपति को हटा दिया जाएगा. इसके साथ ही विश्वविद्यालय में नफरत की विचारधारा को बढ़ावा देने वाले प्राध्यापकों पर भी गाज गिर सकती है. बताते हैं कि विश्वविद्यालय में एक ऐसा प्राध्यापक भी तैनात है जो एक संगठन का प्रमुख पदाधिकारी है. कुलपति के पदभार ग्रहण के दौरान विश्वविद्यालय में एक खास दल और उनसे जुड़े लोगों के शक्ति प्रदर्शन को लेकर भी कई तरह की बातें हो रही हैं. पदभार समारोह के दौरान कुछ खबरची लोग भी मौजूद थे. उनका कहना है- पदभार समारोह को देखकर लग रहा था जैसे नेताजी बारात लेकर आ गए हैं. जोरदार ढंग के तमाशे और नारों के बीच खबरची को फिल्म चाइना गेट के जगीरा का संवाद भी याद आ रहा था- हमसे न भिंडियो... मेरे मन को भाया... तो मैं कुत्ता काट के खाया. खबरची के कहने का पूरा भाव यहीं था कि कुछ लोग यह सोचकर धक्का-मुक्की और नारेबाजी कर रहे थे जैसे उन्होंने बहुत बड़ी जंग जीत ली है.

 

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जनता के साथ धोखा है भगत सिंह पर बनीं फिल्में

बरेली में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुधीर विद्यार्थी एक संस्कृतिकर्मी भी है. उन्हें क्रांतिकारियों के जीवन पर बेहद प्रमाणिक ढंग से काम करने वाला लेखक इसलिए भी माना जाता है क्योंकि वे भगत सिंह के साथ काम करने वाले सभी क्रांतिकारी साथियों ( जो स्वतंत्र भारत में जिंदा रहे ) के निकट रहे हैं. इस आलेख में उन्होंने शहीद-ए-आजम भगत सिंह पर बनी फिल्मों के जरिए बेहद अच्छे ढंग से यह समझाया है कि मौजूदा समय में सवालों से टकराने के लिए भगतसिंह और उनकी विचारधारा का होना क्यों जरूरी है.

 

- सुधीर विद्यार्थी 

बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों के मध्य भी चर्चा का विषय बनी रहीं. इसलिए कि स्वतंत्रता आंदोलन के उस कालखंड (1925-31) पर फिल्माया गया एक क्रांतिकारी का जिंदगीनामा उसके अभियान और विचारधारा के साथ कितना न्याय कर सका. ऐसा क्यों हुआ कि बॉलीवुड को एकाएक भगत सिंह तेजी से याद आ गए और उन पर एक साथ पाँच-पाँच फिल्में उतार दी गईं. आश्चर्य यह कि कहानी एक और फिल्में अनेक. सभी फिल्मों की जानकारी का स्रोत भगत सिंह पर उपलब्ध संस्मरण साहित्य और दस्तोवज ही हैं. उल्लेखनीय यह है कि उस आंदोलन का कोई साथी अब जीवित नहीं है. आजाद हिंदुस्तान में चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के जो साथी बचे भी थे वे बहुत उपेक्षित जिंदगी जीते हुए एक-एक कर मर-खप गए और उनका कोई पुरसाहाल नहीं हुआ.

भगत सिंह भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के ऐसे नायक थे जिनके पास विचार की अकूत पूँजी थी. अपने शुरुआती क्रांतिकारी सफर से लेकर फाँसी के फंदे तक लगभग छह वर्ष की अवधि में वे बड़ी क्रांतिकारी घटनाओं यथा सांडर्स-वध और दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट में शामिल होने के साथ-साथ निरंतर लिखते और बोलते रहे. यदि उनके एक हाथ में पिस्तौल थी तो दूसरे में कलम. अध्ययन उनका बहुत फैला हुआ था. ऐसा उनकी जेल नोट बुक देखने से भी प्रमाणित होता है. उनके पत्र, अदालती बयान और सयम-समय पर लिखे गए उनके निबंधों, टिप्पणियों से भी यह जाहिर होता है कि विचार की दुनिया को खंगालने के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया था. ऊपरी तौर पर देखने पर वे एक राजनीतिक व्यक्ति थे पर उनके भीतर गहन साहित्यिक और सांस्कृतिक समझ विद्यमान थी. उनके पास भारतीय राजनीति और अपने समय को देखने की एक गहरी दृष्टि थी. उन्होंने समाज और राजनीति का कोई विषय नहीं छोड़ा जिस पर कहा और लिखा न हो. चाहे वह भाषा और लिपि का जटिल सवाल हो या फिर सांप्रदायिक की समस्या, धर्म और ईश्वर, इंकलाब का अर्थ, मजदूर और किसानों के हित, सर्वहारा की सत्ता, अछूत का प्रश्न, शोषण पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था से मुक्ति अथवा मार्क्सवादी सिद्धांतों को सामने रखकर समाजवादी समाज के निर्माण का बड़ा उद्देश्य. यदि उनके राजनीतिक गुरु राधामोहन गोकुल थे तो उन्होंने मार्क्स और लेनिन से विचार की ऊर्जा ग्रहण की. उनके प्रेरणास्रोत करतार सिंह सराबा जैसे भारतीय क्रांतिकारी शहीद थे लेकिन दूसरी ओर उन्हें अत्यंत स्फूर्तिवान संग-साथ भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद जैसे मित्रों और क्रांतिकारी संगठनकर्ताओं का प्राप्त हुआ जो उन्हें बहुत ऊँचाईयों की ओर ले गया. वे साफ कहा करते थे कि क्रांति से उनका अर्थ अंततोगत्वा एक ऐसी समाज व्यवस्था की स्थापना से था जो हर प्रकार के संकटों से मुक्त होगी और जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य होगा. इसे गहराई से जानना चाहिए कि वे क्रांति को बम या पिस्तौल का संप्रदाय नहीं मानते थे. उनका अभिप्राय अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन था.

तो क्या भगत सिंह पर बनी मौजूदा फिल्में इस क्रांतिकारी नायक की इस तस्वीर को प्रस्तुत करने में कामयाब हो सकी हैं जिस भगत सिंह को हम उसकी विचारयात्रा को जानते-बूझते संपूर्ण भारतीय क्रांतिकारी संग्राम का सर्वाधिक विचारवान क्रांतिकर्मी और प्रवक्ता मान लेते रहे. हम पहले यह भी साफ कर दें कि क्रांति के उस कालखंड में भगत सिंह कोई व्यक्ति नहीं, अपितु अपने क्रांतिकारी दल ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ का बौद्धिक नेतृत्व करने वाले उसके एक सदस्य ही थे. सारे अभियानों के पीछे पूरी पार्टी की शक्ति और संयुक्त योजनाएँ थीं जिन्हें कार्यान्वित करने का दायित्व दल के सेनापति कभी भगत सिंह को सौंपते, तो कभी सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, भगवानदास माहौर, सदाशिवराव मलकापुरकर या फिर विश्वनाथ वैशम्पायन, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, गया प्रसाद, पं. किशोरीलाल, दुर्गा भाभी, सुशीला दीदी, सुखदेव राज, धनवंतरि अथवा विजयकुमार सिन्हा को. किसी भी ऐक्शन के पीछे पार्टी की एक सोची-समझी रणनीति और उसकी क्रियान्वयन पद्धति थी. भगत सिंह वहाँ अकेले नहीं होते थे. उनके क्रांतिकारी सफरनामे को सिर्फ एक रोमांटिक हीरो के रूप में इन मुंबईया फिल्मों की तरफ पेश करना उस संपूर्ण क्रांतिकारी चेतना का अपमान और नासमझी है जिसके लिए अपने समय में भारतीय क्रांतिकारी दल समर्पित रहा है. साहित्य और इतिहास में दक्षिणपंथी लोगों की घुसपैठ कम नहीं रही है जिसके चलते भगत सिंह जैसे प्रगतिशील क्रांतिकारी नायक को मात्र सांडर्स को मारने, बम फेंकने, इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फंदे में झूले जाने वाले जोशीले नौजवान के रूप में दिखाया जाता रहा. इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि मौजूदा दौर में राष्ट्रवादी उनकी जुनूनी छवि को देशभक्तिपूर्ण संवाद थमाकर अपने पक्ष में खड़ा करने की घिनौनी कोशिशें करते रहे. कहना न होगा कि भगत सिंह की इसी छवि की ओर हिंदी सिनेमा आकृष्ट हुआ और और उसने उसमें फिल्मी मिर्च-मसाला लगाकर अंततः दर्शकों के सम्मुख परोस दिया. भगत सिंह की बना दी गई रोमांटिक तस्वीर को अपने ढँग से इस्तेमाल करना जैसे बॉलीवुड का लक्ष्य बन गया. यह सही है कि फिल्मों के निर्माता करोड़ों रुपया लगाकर व्यवस्था परिवर्तन के लिए सचेत और समर्पित क्रांतिकारी भगत सिंह को पर्दे पर क्यों प्रस्तुत करना चाहेंगे. उनका उद्देश्य क्रांति नहीं है. उनका काम फिल्में बनाना और उनसे पैसा कमाना है. जाहिर है कि बाजार के इस समय में फिल्म वाले वह सब कुछ बेचना चाहते हैं जो उनके धंधे में गर्माहट ला सके. फिर चाहे वह सेक्स हो या भगत सिंह. भगत सिंह की चेतना का प्रचार-प्रसार फिल्मी दुनिया का मकसद हो भी नहीं सकता. इन फिल्मों को उस नजरिए से देखा भी नहीं जाना चाहिए कि उनमें उस संग्राम को आगे बढ़ाने का उद्देश्य निहित हो सकता है जिसे भगत सिंह अधूरा छोड़ गए थे और जिसे क्रांति-विरोधी शक्तियों के 1947 में सत्ता में आ जाने के चलते हासिल नहीं किया जा सका था. हुआ यह कि ‘लगान’ ओर ‘गदर’ जैसी पीरियड फिल्मों की कामयाबी के बाद फिल्म निर्माताओं को लगा कि भगत सिंह भी स्वतंत्रता संग्राम के दौर के ऐसे नायकों में हैं किनकी छवि को भुनाया और बेचा जा सकता है. पर इसके लिए उन्हें ‘मसाले’ की तलाश थी. यानी क्रांतिकारी हीरो ऐसा हो जिसकी जिंदगी में प्यार-व्यार भी हो. अब तक प्रदर्शित फिल्मों ‘शहीदः 23 मार्च 1931’ और ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ में भगत सिंह की मंगेतर/प्रेमिका को ईजाद कर लिया गया क्योंकि इसके बिना हिंदी सिनेमा की माँग पूरी नहीं होती. वे भूल गए कि ‘गांधी’ फिल्म भी सफल हुई थी जिसमें कोई प्यार का गाना या दृश्य नहीं थे.

भगत सिंह पर धर्मेंद्र की फिल्म में बॉबी द्ओल (भगत सिंह) और ऐश्वर्या राय (प्रेमिका) साथ-साथ गाना गाते हैं. कहा जाता है कि ऐश्वर्या राय को इस छोटी-सी भूमिका के लिए 30 लाख रुपए पारिश्रमिक दिया गया. दूसरी फिल्म के निर्माता राजकुमार संतोषी भी अजय देवगन (भगत सिंह) के साथ उनकी मंगेतर को फिल्मी लटके-झटके के साथ ‘तुडुक-तुडुक’ और ‘बल्ले-बल्ले’ करा देते हैं. भगत सिंह के जीवन में कोई ऐसा प्रेम-प्रसंग नहीं था, पर शायद इस नाच-गाने के बिना फिल्में पूरी नहीं हो सकती थीं. निर्माता इन दृश्यों को फिल्मों की माँग कहेंगे और यह भी बताएँ गे कि यह उनके व्यवसाय की मजबूरी है पर क्या व्यावसायिक मजबूरी के चलते एक क्रांतिकारी शहीद की छवि को जनता और नई पीढ़ी के सम्मुख गलत ढँग से प्रस्तुत करने की छूट किसी को दी जानी चाहिए यह हमारी इतिहास-चेतना की अनुपस्थिति का बड़ा उदाहरण है कि यह फिल्में सिनेमा हॉल में प्रदर्शित हो रही हैं और हम सवाल भी नहीं खड़े कर सकते. ‘माउंटवेटनः द लास्ट वायसराय’ जैसी फिल्में हमारे इतिहास को विकृत ढँग से प्रस्तुत करती हैं और हम चुप रहते हैं. मुझे याद है कि मनोज कुमार के धारावाहिक ‘भारत के शहीद’ में भी कई स्थानों पर क्रांतिकारियों की छवि को ध्वस्त किए जाने पर हमारे मध्य बहुत हलचल नहीं हुई थी. यद्यपि बाद को कुछेक सवालों पर उसका प्रसारण बाधित हुआ था. यह सही है फिल्में या धारावाहिक इतिहास नहीं होते और न ही उन्हें देखकर हमें कोई इतिहास संबंधी निष्कर्ष निकालने चाहिए. बावजूद इसके यदि पर्दे पर उतारी गई छवियाँ इतिहास अथवा उसके नायक के व्यक्तित्व और विचारधारा को इस हद तक नुकसान पहुँचाएं कि लोग उसे लेकर किसी बड़े भ्रम का शिकार होने लगें तो उन सभी को उस पर प्रश्नचिन्ह लगाना चाहिए जो उसकी वास्तविकता से गहराई तक परिचित हैं. आश्चर्य होता है कि भगत सिंह के परिवार के दो सदस्यों ने धर्मेंद्र और संतोषी की फिल्मों में सलाह-मशविरा भी दिया था. कुछ और भगत सिंह के रिश्तेदार जो इन फिल्मों का विरोध कर रहे हैं वे सिर्फ यह दिखाने के लिए ही कि वे भी उस शहीद के रक्त-संबंधी हैं और उनका भी भगत सिंह पर ‘अधिकार’ है. उनकी ओर से जो आपत्तियाँ अब तक तक दर्ज की गई हैं उनमें भगत सिंह की विचारधारा को दबाने या छिपाने को लेकर कहीं कोई चिंता नहीं है.

भगत सिंह पर बनी इन फिल्मों से यह तो लाभ होगा कि नई पीढ़ी उस क्रांतिकारी शहीद के नाम से बखूबी परिचित हो सकेगी. पर अच्छा यह होता कि यदि यह फिल्में भगत सिंह को संपूर्ण रूप से जानने-समझने का प्रस्थान बिंदु बन सकतीं. भगत सिंह से परिचित होने के लिए फिल्में नहीं, इतिहास और साहित्य ही माध्यम बनेगा. यह अच्छी बात है कि भगत सिंह के संपूर्ण दस्तावेज और उस आंदोलन की सारी चीजें आज हमारे बीच उपलब्ध हैं. हम उम्मीद करेंगे कि आने वाले समय में भगत सिंह की क्रांतिकारी चेतना को जानने के प्रयास तेज होंगे. यह देखा जाना जरूरी है कि देवदास और भगत सिंह पर बनी फिल्में तो किस तरह बेशर्म तरीके से मिथ को सच व सच को मिथ में तब्दील कर सकती हैं. ऐसा लगने लगा है कि पॉपुलर मीडिया भगत सिंह के चरित्र के साथ न्याय नहीं कर सकता. आखिर क्यों देवदास और भगत सिंह पर बनी फिल्में मिथ और सच, फिक्शन और फैक्ट में कोई अंतर नहीं रहने देतीं यह जानते हुए भी कि वे इतिहास के एक जरूरी कालखंड को पर्दें पर उतारने जा रहे हैं. उन्हें हर चीज को कमोडिटी (उत्पाद) में बदल देने में महारत हासिल है. ‘लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ में भगत सिंह से यदि अपने व्यावसायिक हितों के चलते भांगड़ा करवाया गया है तो कौन कह सकता है कि भविष्य में यदि गांधी पर कोई फिल्म बनती है तो उसमें गांधी को नहीं नचवाया जाएगा.

‘शहीद 23 मार्च 1931’ में भगत सिंह वैचारिक चेतना से लैस अपनी असली रूप में कहीं दिखाई नहीं देकर एक रूमानी, उन्मादी और कई जगह बदहवास युवक से दिखाई पड़ते हैं. इस फिल्म में इतिहास की अक्षम्य चूकें हैं. क्या फिल्म निर्माता इतना भी शोध नहीं करते कि वे सही ऐतिहासिक तथ्यों को दर्शकों तक पहुँचा सकें. फिल्म में लाला लाजपतराय को गदर पार्टी का नेता बताना पूर्णतया गलत है. क्रांतिकारी संग्राम की घटनाएँ भी बहुत क्रमबद्ध नहीं हैं. पूरी फिल्म में सिर्फ भगत सिंह ही हर क्षण केंद्रीय नायक बने रहते हैं. उनके नजदीकी साथियों की कोई हिस्सेदारी नजर नहीं आती. सुखदेव और राजगुरू का कद भी किसी तरह नहीं उभरता. बॉबी देओल के फिल्मी लटके-झटके उसे भगत सिंह के नजदीक नहीं पहुँचने देते. चंद्रशेखर आजाद की भूमिका में सन्नी देओल भी मसल-मैन ही बने रहे जो किसी तरह आजाद के चरित्र के अनुरूप नहीं है. इस फिल्म में भगत सिंह के विचार पक्ष के साथ बड़ा अन्याय किया गया है. उन्हें एक आस्तिक और एक हिंदू राष्ट्रवादी बनाकर दिखाने के पीछे क्या कोई षड्यंत्र तो नहीं है. यह उनके धर्मनिरपेक्ष और नास्तिक चिंतन के सर्वथा विपरीत है. भगत सिंह जब एक जगह देशभक्ति का गीत गाते हैं तो पीछे भारत माता की तस्वीर दिखाई गई है जिसमें केसरिया ध्वज भी है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इसी चित्र को अपने कार्यक्रमों में रखता और देश भर में प्रचारित करता है. यह सब अखंड हिंदू राष्ट्र की फासीवादी कल्पना पर आधारित है. ऐसा करके भगत सिंह के विचारों की हत्या की गई है जिस पर कड़ी आपत्ति की जानी चाहिए. देखकर कितना अजीब लगता है कि एक नास्तिक क्रांतिकारी जिसकी पुनर्जन्म के प्रति कोई आस्था नहीं है उसे फिल्म में अपनी माँ से यह संवाद करते हुए प्रदर्शित किया जाए कि माँ उसे दुःखी नहीं होना चाहिए. माँ सवाल करती है कि अगले जन्म में वह उसे पहचानेगी कैसे. इस पर भगत सिंह बने बॉबी जवाब देते हैं कि गर्दन पर फाँसी के फंदे के निशान से. यहाँ और भी दृश्य है जब जेल अधिकारी फाँसी से पहले भगत सिंह से कहते हैं कि वह भगवान को स्मरण कर ले. भगत सिंह सुनकर कहते हैं कि भगवान को याद करना तो बाहरी आचार है, उसका वास तो हम सबके भीतर है. क्या इस फिल्म के निर्माता भगत सिंह के उस आलेख को विस्मृत कर बैठे जिसे उस क्रांतिकारी चिंतक ने अंतिम दिनों में जेल के भीतर लिबिद्ध किया था – ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’. यह सर्वत्र उलब्ध है और इससे भगत सिंह की विचार की दुनिया पर गहराई से रोशनी पड़ती है. होना यह चाहिए था कि भगत सिंह के लिखे-बोले को ही नहीं, बल्कि उससे पूर्व से लेकर 1931 में लाहौर की फाँसी के समय तक के क्रांतिकारी संग्राम के दस्तावेजों की मदद से भारतीय क्रांतिकारियों की उस चिंतनधारा को जानने-समझने का प्रयास किया जाता जिसके चलते उन क्रांतिवीरों ने अपनी लड़ाई का लक्ष्य स्वतंत्रता से बढ़कर समाजवाद के अपने बड़े उद्देश्य को समर्पित कर दिया था. भगत सिंह के दल का गांधीवाद के बरक्स सर्वथा अलग क्रांतिकारी मार्ग था जिसमें आजादी के लिए विदेशी हुकूमत से किसी लुंज-पुंज समझौते की कोई गुँजाइश नहीं थी. उनका लक्ष्य मार्क्सवादी सिद्धांतों के आधार पर शोषणरहित समाजवादी समाज का निर्माण था. इसके लिए वे सर्वहारा की सत्ता कायम करना चाहते थे. उन्हें मजदूरों और किसानों की शक्ति पर भरपूर भरोसा था. यदि ये फिल्में इस भगत सिंह को पर्दे पर दिखातीं तो क्रांतिकारी संग्राम के प्रति वे न्याय कर पातीं. सवाल इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का है और इसलिए फिल्म के नाम पर ऐसी गलतियों ओर षड्यंत्रों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि मुख्य धारा का हिंदी सिनेमा अंततः सत्ता वर्ग की संस्कृति और विचारधारा का पोषक होता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले दिनों जनता के मध्य देश भर में भगत सिंह को तेजी से याद किए जाने की कवायदों के चलते उसकी विचार चेतना के जरिए मौजूदा शासन व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती सामने आने का खतरा दिखाई पड़ रहा हो. इस स्थिति में भगत सिंह के खलिस चिंतन-रूप को बिगाड़-मिटाकर आम लोगों के समक्ष एक राष्ट्रवादी, विचारविहीन और समाजवादी लक्ष्य से परे एक भगत सिंहीय छवि गढ़ने की साजिश चलाई जा रही हो. सांप्रदायिक ओर अंधराष्ट्रवादी घालमेल से लबरेज ये फिल्में भगत सिंह को क्रांतिकारी के बजाय एक ‘सुपरमैन’ की तरह नई पीढी को दिखाने की कोशिशें करती लगती हैं जबकि इस क्रांतिकारी का बड़ा लक्ष्य एक धर्मनिरपेक्ष, वर्गविहीन, जाति मुक्त और शोषणरहित समाज की संरचना था जिसमें सर्वहरा की सत्ता हो. वह सत्ता परिवर्तन का पक्षधर तो कतई नहीं था. उसके सपने में व्यवस्था के बदलाव का संपूर्ण लेखा-जोखा था.

संतोषी की फिल्म ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ कमोवेश भगत सिंह की असली छवि के थोड़ी निकट पहुँचती है जिस पर संतोष किया जा सकता है. यहाँ समाजवादी अवधारणाओं पर बहस है जिसके माध्यम से क्रांतिकारी लक्ष्य को जानने-समझने में दर्शकों को कुछ मदद मिल सकती है. दृश्य में मार्क्स और लेनिन के चित्र आशय को और भी स्पष्ट करते हैं. इसमें काकोरी की शहादतों के बाद फीरोजशाह कोटला के खंडहरों में क्रांतिकारियों की बैठक का भी नजारा है जिसमें दल के नाम के साथ ‘समाजवादी’ शब्द का समावेश करके एक बड़ी और दूरगामी लड़ाई की योजना को आकार देने की क्रांतिकारियों की कोशिशों की छवियों को विस्मृत नहीं किया गया है. यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह फिल्म भगत सिंह के ही इर्द-गिर्द न घूमती रहकर उनके साथी कामरेडों के कुछेक अक्स भी सामने लाती है जो प्रशंसनीय है. अच्छा होता कि भगत सिंह पर बनी ये फिल्में अपने कालखंड के इतिहास की उस वैचारिक जद्दोजहद का भी थोड़ा-बहुत प्रस्तुतीकरण करतीं जहाँ कांग्रेस के लुंज पुंज विचार और उनकी आधी-अधूरी आजादी के लक्ष्य से उनका कड़ा टकराव था. 1925 से कुछ समय पूर्व बना ‘हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ’ जिसने 1928 तक आते-आते अनेक क्रांतिकारी कार्यक्रम में समाजवाद को समाहित कर लिया था, और तब तक इस दल ने मार्क्स और लेनिन के सिद्धांतों के प्रति अपनी पूर्ण आस्था व्यक्त कर ली थी यह किसी से छिपा नहीं है. हिंदी सिनेमा भगत सिंह और उनके साथियों की इस विचार संपदा की रक्षा नहीं कर पाया, यह कहना किसी तरह से गलत नहीं होगा. आधे-अधूरे भगत सिंह को पर्दे पर दिखाने या विचारधारा को एक तरफ रखकर नख-शिख-दंत विहीन भगत सिंह का प्रदर्शन अंततः इतिहास के प्रति न्याय नहीं है. यह इतिहास के प्रति वैसा ही षड्यंत्र और धोखा है जैसा एक समय पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में भारत सरकार की ओर से स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास लेखन के लिए डॉ. रमेशचंद्र मजूमदार को हटाकर डॉ. ताराचंद्र को लाकर किया गया ओर अपने पक्ष में मनमर्जी से छद्म अतीत की इबारतें दर्ज कराई गईं, जिसमें क्रांतिकारी संग्राम को कमतर करने की नापाक कोशिशें साफ दिखाई पड़ती हैं. यदि ये हिंदी फिल्मकार सांप्रदायिकता या अछूत के सवाल पर ही नहीं, समाजवाद और नास्तिकता के मसले पर भगत सिंह के प्रश्नों और तर्कों से थोड़ा भी रूबरू हो गए होते तो फिल्मों की ऐसी छीछालेदर न होती. भगत सिंह तब पूरे कदम के साथ वहाँ तनकर खड़े होते और दर्शक उनके लक्ष्यों को जानकर लाभान्वित हो सकते थे. तब वे अनावश्यक ही पुनर्जन्म के बवंडर में भगत सिंह जैसे धर्मनिरपेक्ष चिंतक को ढकेलने की गलतियाँ न करते. मैं पहले ही कह चुका हूँ कि फिल्में इतिहास नहीं होतीं और न ही उन्हें किसी इतिहास का आइना मानने की निरर्थक कवायदें करनी चाहिए, पर यह भी उतना ही है कि उन्हें इतिहास को विकृत करने और उसके मनमाने प्रस्तुतीकरण का भी कोई अधिकार नहीं मिल जाना चाहिए. भगत सिंह को गुजरे अभी अधिक समय नहीं बीता, और लंबी सजा पाए उनके संगी-साथी क्रांतिकारी तो आजाद हिंदुस्तान में अब तक जिंदा बचे हुए थे. उनके रहते फिल्मकार इस काम को ज्यादा बेहतर ढँग से सच के निकट पहुँचकर अंजाम दे सकते थे जिसे नहीं किया गया. आखिर क्या जरूरत थी भगत सिंह पर एक साथ पाँच-पाँच फिल्मों की. कोई एक साफ-सुथरी ऐतिहासिक तथ्यों को ठीक-ठाक छानबीन करके बनी फिल्म ही दर्शकों को उस कालखंड से परिचित कराने के लिए पर्याप्त थी जिसके नतीजे देखने के लिए हम लालायित होते.

याद आता है कि बहुत पहले मनोज कुमार की ‘शहीद’ फिल्म आई जो कुछेक ऐतिहासिक घटनाओं की भूलों के चलते भी दर्शकों को ज्यादा बाँध पाई थी. उसमें बम परीक्षण में शहीद हुए भगवतीचरण वोहरा की लाश को रावी नदी में जल प्रवाह करना दिखाया गया था जो सच नहीं था. असलियत यह थी कि उनकी मृत देह को वहीं गड्ढा खोदकर दफना दिया गया. रावी की छांड में उतना पानी नहीं था कि उसे बहाया जा सकता. बाद को मुखबिरी के आधार पर पुलिस ने भगवतीचरण की अस्थियाँ खुदवाकर मुकदमे में भी पेश कीं. फिल्मकार से ऐसा इसलिए हुआ कि यशपाल ने निजी स्वार्थवश अपनी संस्मरण कृति ‘सिंहावलोकन में पूरी घटना को तोड़-मरोड़कर इसी ढँग से पेश किया है जिससे भविष्य के लेखकों और फिल्मकार से इस तरह की भूलें होती चली गई. यदि क्रांतिकारियों पर लिखा गया दूसरा साहित्य भी देख-जाँच लिया जाता तो इस तरह की चीजों से बचा जा सकता था. पर हमारे यहाँ फिल्मकार ही नहीं, इतिहास को दर्ज करने वाले भी घटनाओं की गहराई में उतरने की कोशिशें नहीं करते. सब नकल करते हैं और वे अपने-अपने पूर्वाग्रहों से भी मुक्त नहीं हो पाते. इतिहास लेखन के लिए जिस निष्पक्षता और साहस की आवश्यकता होती है उसे प्रायः हम अनुपस्थित पाते हैं. क्रांतिकारी आंदोलन की गुप्त कार्यवाहियों के चलते संस्मरण लेखकों ने भी अपनी-अपनी तरह घटनाओं का प्रस्तुतीकरण करके स्थितियों को बहुत हद तक जटिल बनाया है. इसके लिए हम किसे दोष दें. संघ परिवार के लेखक यह जानने की कोशिश क्यों करेंगे कि भगत सिंह की जेल नोट बुक में सिर्फ मार्क्स और ऐंगल्स नहीं, वहाँ रूसों, देकार्त, स्पिनोजा, मार्क ट्वेन, दोस्तोयवस्की और अरस्तू की कृतियों से गुजरते हुए भगत सिंह ने अनेक विचारों और जीवन-पद्धति का निर्धारण किया था. भगत सिंह पर फिल्में बनाते हुए निर्माता अपनी दृष्टि को वहाँ तक फैलाकर ले जा सकते थे कि आजाद भारत में भगत सिंह जैसे नौजवान आज भी प्रताड़ित किए जा रहे हैं और ऐसा स्वतंत्र देश में शुरुआती समय से लेकर अब तक निरंतर होता चला आ रहा है. यह पूँजीवादी सत्ता और व्यवस्था का चरित्र है कि वह आज के भगत सिंह को अपने लिए खतरा ही नहीं मानता बल्कि उन्हें दंड भी देता है. भगत सिंह की विरासत आज भी जिंदा है पर वह दमन के लिए अभिशप्त है. शंकर शैलेंद्र (गीतकार शैलेंद्र) ने 1948 में ही अपनी प्रसिद्ध कविता में इसीलिए दर्ज कर दिया था –

भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की
यदि जनता की बात करोगे तुम गद्दार कहाओगे,
बंब-संब की छोड़ो भाषण दिया कि पकड़े जाओगे
न्याय अदालत की मत पूछो सीधे मुक्ती पाओगे
कांग्रेस का हुक्म जरूरत क्या वारंट तलाशी की

भगत सिंह का रास्ता संसदवाद की तरफ नहीं जाता. वह एक विद्रोही नायक है जिसके सपने में उस समाज की संरचना का आकार-प्रकार है जहाँ जाति-धर्म का बोलवाला नहीं होगा, जो पूँजी के खौफनाक खेल से मुक्त होती, जिसमें शोषण नहीं रहेगा और सत्ता सर्वहारा मजदूर-किसानों के हाथों की शक्ति बनेगी. आओ, इतिहास से लेकर फिल्मों, नाटकों और जमीन पर उसी भगत सिंह को उतारने की कोशिशों में हम सब बेधड़क होकर शामिल हों. संसदमुखी राजनीतिक दल, पेशेवर फिल्मकार और बिके हुए इतिहास लेखक इस काम को अंजाम नहीं दे सकते. हमें उनसे सावधान ही नहीं रहना है बल्कि उनके कुचक्रों का पर्दाफाश आगे बढ़कर करने का साहस दिखाना होगा. भगत सिंह पर बनी फिल्में जनता के साथ धोखा है. क्या कुछेक फिल्मकारों की इस बात पर हम भरोसा करें कि उनकी चित्रावली से भगत सिंह के वे दृश्य काट दिए गए जिनमें उनके भाषणों में मार्क्स का उल्लेख किया गया है. तो क्या फिल्म सेंसर बोर्ड पर सत्ता का शिकंजा है या वह संघ परिवार के चिंतन-मनन का प्रतिनिधित्व करता है. अतीत को तोड़ने-मरोड़ने की यह कोशिशें राजनीतिक या आर्थिक लाभ के लिए होती हैं तब फिर यह मसला और अधिक गंभीर बन जाता है जिसके लिए किसी को माफ नहीं किया जा सकता.

मुझे स्मरण है कि इन फिल्मों को भगत सिंह के भाई कुलतार सिंह के साथ देखने के बाद सहारनपुर में आयोजित एक समारोह में मेरे व्याख्यान से पूर्व एक नौजवान ने मुझसे खड़े होकर कहा – ‘आप असली भगत सिंह को जरूर सामने रखिए ताकि हम उनकी क्रांतिकारी छवि से परिचित हो सकें नहीं तो आज के युवक पूछने पर कहेंगे कि भगत सिंह का असली नाम अजय देवगन था.’ मैं उस नौजवान का आभारी हूँ कि इतिहास और अपने समय पर आने वाले खतरे की वह ठीक-ठाक शिनाख्त कर पा रहा था. छात्र – से लग रहे उस युवक का नाम मुझे याद नहीं रहा पर उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने आज भी घूम जाता है. उसके तेज और पनीले दृगों को मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा.

 

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क्या ताली बजाने से गरीबों की थाली में भोजन आ जाएगा ?

रायपुर. कोरोना वायरस से निपटने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाने के साथ-साथ घर के बाहर या छत पर ताली और थाली बजाने को कहा है. मोदी की हां में हां मिलाने वाली एक बड़ी आबादी ऐसा करने को तत्पर है. यह आबादी बड़ी बेसब्री से 22 तारीख का इंतजार कर रही है. जैसे ही यह तारीख आएगी...जोर-शोर से ताली-थाली बजाई जाएगी और उसका वीडियो वायरल कर दिया जाएगा. देश को ऐसे वीडियो से समर्थन मिलेगा. कोरोना भी सोच में पड़ जाएगा... यार कमाल के लोग हैं...थाली और ताली बजाकर ही खदेड़ने में सफल हो गए. इस आबादी में कुछ ऐसे लोग भी शामिल हैं जो शंख फूंकने की सलाह दे रहे हैं. ऐसे लोगों का मानना है कि कोरोना के खिलाफ युद्ध लड़ना है तो सुबह-शाम शंख फूंको. युद्ध में शंख ही फूंका जाता है. जबकि फेसबुक पर जीवन का सार उतारने वाले कुछ फेसबुकियों ने लिखा है- जब बजाना ही है तो क्यों न ढ़ोलक-तबला, हारमोनियम और गिटार बजाया जाय. इटली में भी लोग यही कर रहे हैं. उनका अच्छा टाइम पास हो रहा है. बहरहाल जो भी हो. मिले सुर मेरा-तुम्हारा गाने को ही जीवन का सब कुछ मानने वाली आबादी यह मानकर चल रही है कि  मोदी ने जो कुछ कहा है वह ठीक है. उनकी बात मानने में कोई बुराई नहीं है. दूसरी ओर सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में तर्क के साथ बात करने वाले यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या ताली बजाने से गरीबों की थाली में भोजन आ जाएगा ?

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते ने कोरोना से लड़ने के लिए मोदी के राजनीतिक संदेश को दिवालिएपन की निशानी बताया है. उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने जनता को संकल्प और संयम का नारा देकर उनके भरोसे छोड़ दिया है. थाली और ताली पिटवाने का काम पूरी तरह से गैर- वैज्ञानिक है. यह वही सरकार है जिसने स्वास्थ्य बजट में बड़ी कटौती की है जिसमें एम्स के आवंटन में इस वर्ष 100 करोड़ की कटौती भी शामिल है. जब देश में कोरोना की महामारी कम्युनिटी ट्रांसमिशन के तीसरे चरण में पहुंचने जा रही है और पूरी दुनिया इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं में इजाफा और प्रभावित लोगों को आर्थिक पैकेज देने की घोषणा कर रही है तब मोदी जुमलेबाजी कर रहे हैं. संजय पराते का कहना है कि महामारी का सबसे बड़ा हमला आम जनता की रोजी-रोटी पर होने जा रहा है. रोज कमाने-खाने वाले लोगों की आय में कमी आएगी तो भूखमरी बढ़ेगी. केरल ने अपने राज्य में कोरोना से निपटने के लिए जबरदस्त तैयारी की है इसलिए सभी सरकारों को केरल की तर्ज पर ही ज्यादा से ज्यादा पैकेज देने की घोषणा करनी चाहिए ताकि गरीब लोग अपनी प्रतिरोधक क्षमता को कायम रखते हुए कोरोना का मुकाबला कर सकें.

लोग-बाग 22 मार्च को जनता कर्फ्यू  लागू करने को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं. लोगों का कहना है कि इस दिन रविवार है. क्या कोरोना का वायरस भंयकर तरीके से रविवार के दिन ही फैलेगा? बाकी दिन क्या कोरोना आराम करेगा? एक लेखक ने लिखा है- प्रधान जी के भाषण से जनता का खूब मनोरंजन हुआ. कोरोना जैसे गम्भीर मसले पर इतनी हल्की बातों की उम्मीद नहीं थी.  एक दिन के लिए जनता खुद पर कर्फ्यू लगा लेगी तो क्या हो जाएगा ? बाकी दिन? कोई दीर्घकालिक योजना तो सामने आनी थी. शाम को 5 बजे से ताली और थाली बजाकर क्या हासिल हो जाएगा. भाषण में यह तो बताया ही नहीं गया कि जनता को मास्क और सैनिटाइजर देने के लिए सरकार क्या जुगत कर रही है. देश के बाहर लोग मास्क और सैनिटाइजर निर्माण के लिए उद्योगपतियों से मदद ले रहे हैं. भारत में कितने उद्योगपतियों से मास्क और सैनिटाइजर बनाने को कहा गया है.

एक खबर में कहा गया है- मोदी की सारी अपील का निचोड़ एक इवेंट जैसा होकर रह गया है. मोदी ने कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जंग को अपनी नाटकीय शैली में एक आयोजन में तब्दील कर दिया है. भारत में ख़स्ताहाल सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को देखते हुए यह उम्मीद की जा रही थी कि वे अमेरिका, ब्रिटेन और स्पेन की तर्ज पर वे कुछ फंड का ऐलान करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. देश के गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति और भी खराब है. सोचिए... अगर गांवों तक वायरस फैला तब क्या होगा?

इधर केरल में जैसे ही कोरोना वायरस से पीड़ितों की संख्या 25 पहुंची वहां वामदलों की सरकार ने फौरन 20 हज़ार करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान कर दिया है. लोगों के घरों से बाहर नहीं निकलने की वजह से होने वाली किसी भी दिक्कतों को दूर करने के लिए जानदार रोडमैप सामने रखा गया है. इस 20 हज़ार के पैकेज में  दो महीनों के लिए दी जाने वाली पेंशन के अग्रिम भुगतान सहित जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त अनाज देने की योजना भी शामिल की गई है. जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने स्वास्थ्य सुविधाओं का दायरा बढ़ाने और इसके लिए फंड आवंटित करने के बजाय साफ-साफ कहा है- रूटीन चेकअप के लिए अस्पताल जाने की आदत से बचना चाहिए. अगर बहुत ज़रूरी लग रहा हो तो अपने जान-पहचान वाले डॉक्टर, फैमिली डॉक्टर या रिश्तेदारी वाली डॉक्टरों से फोन पर ही सलाह ले लें. अगर आपने ऐसे किसी सर्जरी की डेट ले रखी हो जो तत्काल जरूरी न हो तो इसे भी आगे बढ़वा दें. एक महीने बाद की तारीख़ ले लें.

इधर कुछ लोग  जनता कर्फ्यू को सोशल मीडिया में साइंटिफक भी बता रहे हैं. ऐसे लोगों का मानना है कि इस बार जिसने भी मोदी जी को सलाह दी है वह बेहद जानदार है. ऐसे लोगों का कहना है कि जनता कर्फ्यू रविवार के बजाय शनिवार से लागू हो जाएगा. शनिवार की रात को लोग अपने-अपने घर में पहुंच जाएंगे तो रविवार को छुट्टी के मूड़ में आ जाएंगे. इस तरह लोग सोमवार की सुबह तक छुट्टी के मूड़ में रहेंगे. इस प्रकार 37 घंटे के कर्फ्यू में जो लोग अपने शरीर पर वायरस कैरी कर रहे हैं और संक्रमित नहीं हुए हैं, उनके वायरस की चेन टूट जाएगी. ( अगर कोई वायरस नया शरीर नहीं पाएगा तो वह 24 घंटे में मर जाएगा. ) इस प्रकार करोड़ों लोगों की वह चेन टूट जाएगी जो वायरस को लेकर सड़कों पर घूम रहे थे. इस क्रम से वे लोग बच जाएंगे जो सोमवार को संक्रमित होने जा रहे थे. जनता कर्फ्यू से भले ही सौ फीसदी सुरक्षित नहीं हुआ जा सकता, लेकिन संक्रमण की दर को काफी हद तक कम तो किया ही जा सकता है.


 

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बिल्डर सुभाष कुशवाहा पर 62 लाख का जुर्माना...इधर यूनिहोम्स रेंसीडेंसियल सोसासटी का मामला रेरा पहुंचा

रायपुर. छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण ( रेरा ) के पास गत दो सालों में प्रदेश के कई नामचीन बिल्डरों और कंस्ट्रक्शन कंपनियों के खिलाफ सैकड़ों शिकायतें पहुंची है, लेकिन ज्यादातर मामलों में नोटिस देकर जवाब मांगने का खेल चलता रहा है. रेरा में पदस्थ अफसरों की कार्य पद्धति को लेकर भी कई तरह की बातें सामने आ रही है. बिल्डरों और कंस्ट्रक्शन कंपनियों की धोखाधड़ी से परेशान नागरिकों का कहना है कि रेरा ने एकाध को छोड़कर कभी भी किसी बिल्डर पर ऐसी ठोस कार्रवाई नहीं की है जिससे गैर कानूनी ढंग से निर्माण करने वालों को सबक मिल सकें. रेरा से नोटिस मिलने के बाद ज्यादातर बिल्डर हाईकोर्ट की शरण ले-लेते हैं और वहां से स्टे ले आते हैं. इस तरह से पीड़ित उपभोक्ता का मामला हाईकोर्ट और रेरा के बीच झूलते रहता है. इधर एक मामले में ( रेरा नहीं )  उपभोक्ता फोरम ने मेसर्स लैंडमार्क एसोसिएट से जुड़े बिल्डर सुभाष कुशवाहा पर 62 लाख 31 हजार का जुर्माना ठोंका है. आनंद विहार अपार्टमेंट के फ्लैट में रहने वाले 31 लोगों ने बिल्डर के खिलाफ गुणवत्ताविहीन फ्लैट बनाकर देने की शिकायत की थी जिसके बाद उपभोक्ता फोरम ने यह आदेश पारित किया है.  

आनंद विहार अपार्टमेंट में रहने वाले प्रिंस देवांगन, स्वाति पांडे, रेखा चंद्रा, ज्योति संजय द्विवेदी, दिलीप देवांगन, देवी प्रसाद मिश्रा, नवनीत कुमार शुक्ला, अखिलेश कुमार वैष्णव, ज्योति साहू, सुनीता प्रकाशचंद जैन सहित कुल 31 परिवादियों ने उपभोक्ता फोरम में शिकायत देकर यह कहा था कि उनके फ्लैट का निर्माण कार्य बेहद घटिया है. फ्लैट में वेक्ट्रीफाइड टाइल्स की जगह सिरेमिक टाइल्स लगाई गई है. मॉड्यूलर स्ट्रक्चर नहीं बनाया गया है. सेरेमिक टाइल्स 4 फीट की जगह कम ऊंचाई की लगाई गई है. सेनेटरी सामान की क्वालिटी खराब है. प्रवेश द्वार में मार्टिस लॉक नहीं है. इलेक्ट्रिक वायरिंग सही नहीं की गई है.मीटर रूम खुला हुआ है तो बिजली के वायर खुली हालत में है.सीसीटीवी और अग्निशमन यंत्र की व्यवस्था नहीं की गई है. पार्किंग और सिक्योरिटी प्रबंध नहीं है. सम्पवेल का निर्माण अधूरा है. टंकियों में प्लास्टर नहीं किया गया है. लिफ्ट बंद है, बाउंड्री वॉल में प्लास्टर नहीं है. सीढ़ियां अधूरी एवं जर्जर है तथा कार्य पूर्ण कर नगर निगम को कालोनी का हस्तांतरण नहीं किया गया है.नागरिकों की शिकायत के बाद जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने बिल्डर संस्थान के पार्टनर भिलाई के सुभाष कुशवाहा के खिलाफ आदेश पारित करते हुए 62 लाख 31 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है. इसके अलावा बिल्डर को अपार्टमेंट और फ्लैट में हुए दोषपूर्ण कार्य को ठीककरने के लिए 6 माह का समय भी दिया है.

यूनिहोम्स रेसीडेंसियल कॉपरेटिव सोसायटी के खिलाफ शिकायत

इधर भाठागांव स्थित यूनिहोम्स रेसीडेंसियल कॉपरेटिव्ह सोसायटी का मामला रेरा जा पहुंचा है. ( अब पता नहीं इस सोसायटी में रहने वाले लोगों को भी रेरा से न्याय मिल पाएगा या नहीं ? ) सोसायटी के रहवासियों का आरोप है कि बिल्डर ने मकान बेचने के दौरान चमकदार ब्रोशर-पंपलेट में जिस ढंग का वादा किया था उसमें एक भी पूरा नहीं किया गया. इतना ही नहीं परिसर के अंदर एक और कालोनी विकसित करने की कवायद चल रही है और काम्पलेक्स के लिए आरक्षित की गई जमीन पर भी प्लाट काटकर बेचा जा रहा है. अगर इस कालोनी के भीतर ही एक दूसरी कालोनी विकसित हो जाती है यूनिहोम्स सोसायटी का मुख्य मार्ग बाधित हो जाएगा.

 

 

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छत्तीसगढ़ में निजी कंस्ट्रक्शन कंपनी और बिल्डरों से सावधान... संजय श्रीश्रीमाल के ग्रीन अर्थ इन्फ्रावेंचर्स का मामला भी थाने और रेरा पहुंचा

रायपुर. अगर आप छत्तीसगढ़ में रहते हैं और किसी निजी बिल्डर / प्रमोटर या कंस्ट्रक्शन कंपनी से मकान-दुकान और प्लाट खरीदने की सोच रहे हैं तो आपको पूरी तरह से सावधान रहने के जरूरत है. हालांकि कुछ कंस्ट्रक्शन कंपनियां अपने ग्राहकों की सुविधाओं का ध्यान भी रख रही है, लेकिन ज्यादातर कंपनियां धोखाधड़ी पर उतर आई है.अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन और आकर्षक पोस्टरबाजी के जरिए ग्राहकों को फंसाने का खेल जबरदस्त ढंग से चल रहा है. अगर आप किसी विज्ञापन के झांसे में नहीं आए तब खूबसूरत और मखमली आवाज वाली लड़कियों का फोन आपको साइट ( जहां फ्लैट निर्मित हो रहा होता है ) देखने के लिए मजबूर कर सकता है और आप तब भी धोखाधड़ी का शिकार हो सकते हैं. छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण ( रेरा ) के पास हर रोज किसी न किसी निजी बिल्डर की शिकायत पहुंच रही है. ज्यादातर शिकायतों में ग्राहकों का यहीं कहना है कि बिल्डर ने ठग लिया है. इधर प्रदेश के एक बड़े बिल्डर संजय श्री श्रीमाल के मेसर्स ग्रीन अर्थ इन्फ्रावेन्चर्स का मामला भी रेरा पहुंच गया है.

पार्किंग को बेच देने का आरोप

अमलेश्वर के पास ग्रीन अर्थ इन्फ्रावेंचर्स ने वर्ष 2011 में 42 एकड़ भूमि पर ग्रीन अर्थ कालोनी बसाई है. इस कालोनी में कई तरह के फ्लैट है, लेकिन जल्द ही इस फ्लैट में रहने वाले लोगों को अहसास हो गया कि पोस्टर-बैनर और अखबार में छपे विज्ञापन को देखकर जो फ्लैट उन्होंने खरीदा था वह न केवल गुणवत्ताविहीन है बल्कि सुविधाओं से महरूम भी है. कालोनी में रहने वाले रहने लोगों का कहना है कि बिल्डर ने अपने ब्रोशर में कई तरह के चमकदार सपने दिखाए थे लेकिन वह सपने केवल सपने साबित हुए. बिल्डर ने सही ढंग से न तो क्लब हाऊस बनाया है और न ही गार्डन. इतना ही नहीं  स्विमिंग पूल, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पोस्ट ऑफिस, बॉलीवाल कोर्ट, बैडमिंटन कोर्ट, बास्केटबॉल कोर्ट, योगा और मेडिटेशन सेंटर, बाउंड्रीवाल, 24 घण्टे सिक्योरिटी, स्ट्रीट लाइट, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट, लिफ्ट की सुविधा भी आधी-अधूरी और अधकचरी है. बिल्डर ने ओपन पार्किंग को भी 30-30 हजार रुपए में बेच दिया है और पार्किंग का अलॉटमेंट पत्र भी नहीं दिया. जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार कोई भी बिल्डर ओपन पार्किंग नहीं बेच सकता है.

इस मामले में जब ग्रीन अर्थ सिटी वेलफेयर सोसायटी के पदाधिकारी अध्यक्ष, नारायण लाल शर्मा, पूर्व अध्यक्ष धीरपाल वर्मा, उपाध्यक्ष अनिल कुमार, सचिव रमेश चंद्र गुप्ता और कोषाध्यक्ष केतन मेहता ने बिल्डर से संपर्क साधा तो उन्होंने साफ-साफ कहा कि हम किसी भी सूरत में अधूरे काम को पूरा नहीं कर सकते. कालोनी वासियों से बिल्डर से लिखित में जवाब मांगा तो बिल्डर ने कहा- हम लिखित में कुछ भी नहीं दे सकते. जहां शिकायत करना हो कर दीजिए. बिल्डर की बेरूखी के बाद अध्यक्ष नारायण लाल शर्मा मामले को थाने और रेरा ले गए हैं.

इधर रेरा ने संजय श्रीश्रीमाल को एक नोटिस भेजकर शिकायतकर्ता को जवाब देने को कहा है. रेरा ने अपनी नोटिस में साफ-साफ कहा है कि आपको हर हाल में शिकायतकर्ता को एग्रीमेंट की प्रति, समय-समय पर ली गई धनराशि. शिकायतकर्ता को आधिपत्य सौंपे जाने के संबंध में दस्तावेज, अब तक आधिपत्य नहीं सौंपे जाने का कारण, नगर निवेश निर्माण की अनुमति, विकास अनुज्ञा, भूमि डायवर्सन संबंधी दस्तावेज, रेरा के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन की स्थिति सहित अन्य सभी आवश्यक जानकारी देनी होगी.

नोटिस मिलेगी तो जवाब देंगे

मेरे खिलाफ थाने में झूठी शिकायत की गई है कि मैंने नारायण लाल शर्मा को जान से मारने की धमकी दी है. मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है. थाने वालों ने पक्ष जानना चाहा तो मैंने उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया है. जहां तक रेरा में शिकायत का संबंध है तो अभी मुझे किसी भी तरह की नोटिस नहीं मिली है. अगर नोटिस मिलती है तो वहां भी जवाब प्रस्तुत कर देंगे.

संजय श्रीश्रीमाल ( डायरेक्टर मेसर्स ग्रीन अर्थ इन्फ्रावेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड )

 

 

 

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पार्थिवी, वाल्फोर्ट, वात्सल्य, गोल्ड ब्रिक्स, गणपति, गोयल सहित कई नामी कंस्ट्रक्शन कंपनियों की शिकायत रेरा में

रायपुर. अगर आप किसी निजी कंस्ट्रक्शन कंपनी से भवन खरीदने की सोच रहे हैं तो कई तरह की पूछ-परख और जांच-पड़ताल के बाद ही अपनी सौदाबाजी को अंजाम दें. कहीं ऐसा न हो कि जीवन भर की जमापूंजी खर्च करने के बाद आपको पछतावा हो. दरअसल भवनों का  निर्माण करने वाली कंस्ट्रक्शन कंपनियां अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन और आकर्षक पोस्टरबाजी से ग्राहकों को लुभा तो रही है, लेकिन वे वह सुविधांए नहीं दे पा रही है जिस पर ग्राहकों का हक है. छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण ( रेरा ) के पास गत दो सालों में कई नामचीन कंस्ट्रक्शन कंपनियों के खिलाफ सैकड़ों शिकायतें पहुंची है. अकेले रायपुर जिले में ही 109 बिल्डर और प्रमोटरों के खिलाफ 318 शिकायतें दर्ज की गई जबकि बिलासपुर में 14 बिल्डरों के खिलाफ 30 शिकायतें सामने आई है. हालांकि यह दावा भी सामने आया है कि अधिकांश हितग्राहियों की शिकायतों का निराकरण कर लिया गया है, लेकिन हितग्राहियों का कहना है कि प्रमोटर और बिल्डरों ने एक तरह से उनके साथ धोखा ही किया है. किसी ने अनुबंध के अनुसार  आधिपत्य नहीं सौंपा तो किसी ने ब्रोशर के मुताबिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई. कुछ बिल्डरों और प्रमोटरों का निर्माण कार्य ही गुणवत्ता विहीन था.

ये हैं छत्तीसगढ़ की नामचीन कंस्ट्रक्शन कंपनियां

कंस्ट्रक्शन कंपनी पार्थिवी के खिलाफ सुनीता बसाक, सुनीता मुदलियार, श्रीमती निधि साव, पीतेश जोशी, मोहम्मद अनवर खान, रचित अग्रवाल, मुबारक खान, श्रीमती ईला तिवारी, श्री योगी राज पाण्डेय, इंद्रानिल चट्टोपाध्याय, श्रीमती रुपाली श्रीवास्तव सहित कुल 11 लोगों ने शिकायत दर्ज करवाई है. वात्सल्य बिल्डर्स एंड डेव्हलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर पुरुषोत्तम राव गडगे के खिलाफ आजीम खान, श्रीमती शारदा पटेल, सुनीता पटेल, संदीप सिंह चौहान, श्रीमती सरस्वती वर्मा, एमआर सिद्दकी, ब्रम्हादेव चौधरी, विशाल सिंह, अभिषेक राजपूत, श्रीमती इंद्रावती द्विवेदी ने शिकायत दर्ज की है. वालफोर्ट प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर पंकज लाहोटी के खिलाफ अमितेश साहू, श्रीमती ब्लेस्सी मैथ्य, बैजनाथ पांडे, कुमुद अग्रवाल, वैशाली कुंभाकर, अनंत प्रकाश सिंह, प्रीति कुमारी, नीता पटले, श्रीमती नवदीप कौर ढिल्लन की शिकायत रेरा पहुंची है. मेसर्स गोल्डब्रिक्स इन्फास्ट्राक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड ( जेसीसी ग्रुप ) के डायरेक्टर के खिलाफ अतुल अग्रवाल, सुमीत अग्रवाल,  अतीत कुमार अग्रवाल, सत्यनारायण अग्रवाल,  आशीष कुमार अग्रवाल, श्रीमती शारदा देवी अग्रवाल, श्रीमत अनिता सिन्हा, सुजीत कुमार दास, अभिताभ सिन्हा, नहर सिंह यादव, अशोक कुमार सिंह, श्रीमती सरिता श्रीवास्तव, अनुपम पांडेय, सुरेश कुमार पटनायक, श्रीमती श्वेता श्रीवास्तव, योगेंद्र सिंह, अपर्णा पनवार, अमित शर्मा, श्रीमती डी लक्ष्मी, कमलेश कुमार जैन ने शिकायत दर्ज करवाई है. सांई कृष्णा बिल्डर्स एण्ड प्रमोटर्स के खिलाफ अमर कुलकर्णी, लिखेश्वर साहू, मनोज जैन की शिकायत शामिल की गई है. मेसर्स अबीर बिल्डकान प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर अफताब सिद्दकी के खिलाफ संदीप राठौर, राहुल जैन, कमलेश दास, श्रीमती कविता श्रीमाली, आशीष कुमार भदराजा, गौरव टंडन, सचिन कुमार गुप्ता की शिकायत रेरा पहुंची है. रायपुर में गणपति हाइटस बनाने वाले गणपति डेव्हलपर्स के खिलाफ सुंदर दास खत्री, अनीता बाई, श्रीमती नीतू  कुकरेजा ने शिकायत दर्ज करवाई है. इंद्रपस्थ प्रोजेक्ट के कर्ताधर्ता मेसर्स पंचामृत इंटरटेनमेट प्राइवेट लिमिटेड के गौतमचंद जैन की दो शिकायतें दर्ज है. इम्प्रेशिया इलाइट का निर्माण करने वाले मेसर्स आरएस ड्रीम लैंड प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ गिरधारी लाल पंजवानी की शिकायत रेरा पहुंची है. इसी तरह केएससी इंटरप्राइजेस प्राइवेट लिमिटेड और डीएमबी इन्फ्राटेक के डायरेक्टर सुनील साहू के खिलाफ ग्यासुद्दीन, मनोज ठाकुर ने शिकायत की है. डालफीन प्रमोटर्स एण्ड बिल्डर्स और ब्रांड क्रियेशन के हरमीत सिंह होरा के खिलाफ मधु बलानी की शिकायत रेरा पहुंची है. रायपुर हाउसिंग  एण्ड डेव्हलपर्स के किशोर नायक और कौस्तुभ मिश्रा के खिलाफ विपिन श्रीवास, त्रिलोकीनाथ शर्मा, पन्नालाल चौधरी, नरेश देवीदास, उत्तम कुमार सोनी, पीतेश चार्वे ने शिकायत की है. लोट्स टॉवर बनाने वाले ए. ढेबर के खिलाफ श्रीमती सुप्रिया मजूमदार की शिकायत है. रेरा में अन्य जिन कंस्ट्रक्शन कंपनियों के खिलाफ शिकायत हुई है उनमें मेसर्स एम आहूजा, ओम सांई डेव्हलपर्स, अनुराधा कंस्ट्रक्शन, मेसर्स अभिलाषा बिल्डर्स ( पार्टनर अमरजीत सिंह दत्ता, विरेंद्र सिंह दत्ता ), नवभारत डवेलिंग प्राइवेट लिमिटेड डायरेक्टर रोहित श्रीवास्तव, नेक्सस देवकॉन प्राइवेट लिमिटेड के तरुण मरवाहा, मेसर्स ग्रीनअर्थ इन्फ्रावेन्चर्स, महालक्ष्मी सिटी होम्स के डायरेक्टर श्याम सुंदर अग्रवाल, पुरन्दर प्रमोटर्स डेव्हलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर ऋषि सिंह वाधवा, आरए रियल स्टेट के डायरेक्टर राकेश अग्रवाल का नाम शामिल है. बिलासपुर में मेसर्स सुपरटेक प्रोजेक्ट एंड कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर आशीष जयवाल, प्रधुमन साहू, अनता इन्फ्रामार्ट, रविशंकर सोनी, श्रीमती सुधा गुप्ता, प्रमोद सिंह ठाकुर के खिलाफ शिकायत हुई है.

यह है रेरा एक्ट

बिल्डरों और प्रॉपर्टी डीलरों द्वारा एक लंबे समय से गैर-कानूनी ढंग से कस्टमर से पैसे लिए जा रहे थे. इतना ही नहीं उन्हें घटिया क्वालिटी का कंस्ट्रक्शन दिया जा रहा था. इस तरह की लंबी शिकायतों के बाद भारत सरकार नें वर्ष 2017 में रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट लागू किया था. इसके तहत रियल एस्टेट अर्थात जमीन अथवा प्रॉपर्टी से सम्बंधित सभी गैर-कानूनी कामों को प्रतिबंधित जाना है. छत्तीसगढ़ में भी लोग शिकायतें दर्ज कर रहे हैं. हालांकि अभी भी दबाव के चलते बड़े बिल्डरों के खिलाफ सही शिकायतें सामने नहीं आ पा रही है. कुछ लोगों ने छत्तीसगढ़ हाउसिंग और रायपुर विकास प्राधिकरण के खिलाफ भी शिकायत दर्ज करवाई है.

 

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जब सारकेगुड़ा में मारे जा रहे थे बेकसूर आदिवासी तब क्या कर रहे थे खुफिया चीफ मुकेश गुप्ता, आईजी लांगकुमेर और एसपी प्रशांत अग्रवाल ?

रायपुर. सारकेगुड़ा न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट के सामने आने के साथ ही यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि 28-29 जून 2012 की दरम्यानी रात जब सीआपीएफ और सुरक्षाबलों की टीम बेकसूर आदिवासियों को मौत के घाट उतार रही थीं तब खुफिया महकमे के प्रमुख मुकेश गुप्ता, बस्तर आईजी की कमान टीजे लांग कुमेर और पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल क्या कर रहे थे ?

पूरे देश में हलचल मचा देने वाली यह घटना तब हुई थीं तब सत्ता में डाक्टर रमन सिंह की सरकार काबिज थीं, लेकिन तब नक्सल मामलों की पूरी कमान स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो मुकेश गुप्ता के हाथ में थीं. इसके अलावा बस्तर आईजी टीजे लांग कुमेर और बीजापुर एसपी प्रशांत अग्रवाल को भी नक्सल मामलों को एक्सपर्ट माना जाता था. इधर न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट के आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता, आईजी टीजे लांग कुमेर, प्रशांत अग्रवाल और घटना के दिन सुरक्षाबलों का नेतृत्व कर रहे डीआईजी एस इंलगो, डिप्टी कमांडर मनीष बरमोला निर्दोष आदिवासियों की मौत के लिए जिम्मेदार नहीं है ? अगर है तो... क्या इन अफसरों पर कोई कार्रवाई सुनिश्चित हो पाएगी ?

पहले ही साफ हो गया था मुठभेड़ फर्जी है

देश को दहला देने वाली घटना के बाद जब राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ फैक्ट फाइडिंग टीम के सदस्यों ने सारकेगुड़ा का दौरा करना चाहा तब काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था. सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को माओवादी ठहराकर गोलियों से भून देने की धमकी-चमकी दी गई थी. देश के कई बड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता आंध्र प्रदेश के रास्ते भोपालपट्टनम होकर गांव में दस्तक दे पाए थे. छत्तीसगढ़ के कुछ चुनिंदा अखबार और चैनल के संवाददाताओं ने गांव जाकर हकीकत जानने की कोशिश तो की थी, लेकिन स्थानीय मीडिया के लोग पूरी तरह से दहशत में थे न जाने कब उन्हें भी माओवादी ठहराकर मौत के घाट उतार दिया जाएगा. जैसे-तैसे देश के कुछ चैनल और मैग्जीन के संवाददाता अपनी जान हथेली पर लेकर वहां पहुंच सकें थे. प्रशासन का पूरा अमला उनकी भी बोलती बंद कर देने के फिराक में जुटा हुआ था. एक पाक्षिक मैग्जीन के संवाददाता को अज्ञात फोन के जरिए धमकी दी गई थी कि अगर माओवादी बनकर मरना नहीं चाहते हो वापस लौट जाओ. पत्रकारों का दल घटना स्थल पर न पहुंच पाए इसके लिए हर नाके पर पुलिस कम गुंडों की फौज तैनात की गई थीं. कुछ पत्रकार ग्रामीणों की वेशभूषा पहनकर गांव तक पहुंचने में कामयाब तो हुए लेकिन उन्हें भी जान बचाने के लिए आंध्र के रास्ते से भागना पड़ा था.

चलती रही लीपा-पोती

जो सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार इस घटना को कव्हरेज करने गए थे वे प्रथम दृष्टया ही यह जान गए थे कि सुरक्षा बल ने बेकसूर लोगों को मौत के घाट उतार दिया है और सरकार मामले की लीपा-पोती में लग गई है. हकीकत यह थी कि सारकेगुड़ा के दो टोलों राजपेटा और कोत्तागुड़ा के ग्रामीण बीज-पंडूम का त्योहार कैसे मनाया जाय... इसके लिए बैठक कर रहे थे. घटना के दिन रात दस बजे तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन जब ग्रामीणों ने संगीत में रुचि रखने वाले एक युवक नागेश से मांदर बजाने का आग्रह किया तभी सूखे पत्तों पर लय-ताल के साथ बूटों की आवाज सुनाई दी. इससे पहले गांववाले कुछ भांप पाते... फायरिंग शुरू हो गई थीं. घटना में कुल 17 लोग मारे गए थे जिसमें मड़काम दिलीप, मड़काम रामविलास, अपका मिठू, काका सरस्वती, कुंजाम मल्ला, कोरसा बिचम, इरपा सुरेश और काका राहुल सहित कुल नौ नाबालिग थे. घटना के दौरान केंद्र में केंद्रीय गृहमंत्री पी चिंदम्बरम थे. पहले तो उन्होंने इसे एक बड़ी कामयाबी निरूपित किया, मगर जब उन्हें पता चला कि पूरा मामला फर्जी है तो उन्होंने माफी मांग ली थी. चिदम्बरम की माफी के बाद भी प्रदेश की पुलिस लीपा-पोती के खेल में जुटी रही. पुलिस की ओर से यह प्रचारित किया जाता रहा कि जो मारे गए थे वे पूरी तरह से नक्सली थे. ग्रामीणों को नक्सली बताकर क्लीन चिट लेने की यह कवायद ज्यादा दिन नहीं चल पाई. थोड़े ही दिनों बाद प्रशासन के लोग साड़ी, कपड़ा, गहना, कंबल, अनाज और नोटों से भरा बोरा लेकर गांव पहुंच गए. गांव में मौजूद कमला काका नाम की एक युवती ने तब सवाल उठाया कि अगर  गांव के लोग और उनके परिजन नक्सली है तो फिर सरकार उनको अनाज, कपड़ा और मुआवजा क्यों दे रही है ? क्या सरकार नक्सलियों को भी पैसा बांटती है ?  इधर आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब सबकी निगाहें इस बात को लेकर टिक गई है कि पूरे मामले में जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और अफसरों के खिलाफ क्या कोई एफआईआर दर्ज हो पाएगी ? क्या बेकसूर आदिवासियों के हत्यारे जेल के शिंकजों के पीछे पहुंच पाएंगे ? भूपेश सरकार को यह तो पता लगाना ही चाहिए कि आखिर किसके इम्पुट और निर्देश के बाद सुरक्षा बलों ने बेगुनाह आदिवासियों को मौत के घाट.उतार दिया था.

 

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रमन ने एक बार भी नहीं कहा- मारे गए हैं 17 बेकसूर आदिवासी तो हत्यारों पर जुर्म दर्ज होना चाहिए

रायपुर. विधानसभा में सोमवार को पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह ने सारकेगुड़ा  न्यायिक जांच रिपोर्ट के मीडिया में लीक होने का मामला तो उठाया, लेकिन एक बार भी यह नहीं कहा कि 17 बेकसूर आदिवासी मारे गए हैं तो हत्यारों पर जुर्म दर्ज होना चाहिए. रमन सिंह की तरह ही भाजपा के अन्य सदस्यों ने भी इस बात के लिए खूब हो-हल्ला मचाया कि सारकेगुड़ा न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में पेश होने के पहले मीडिया में कैसे लीक हो गई. सदस्यों ने विधानसभा अध्यक्ष को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की सूचना देते हुए चर्चा की मांग की. जनता कांग्रेस के धर्मजीत सिंह ने कहा कि जो न्यायिक रिपोर्ट पेश हुई है उस पर चर्चा करने में कहीं कोई दिक्कत पेश नहीं आनी चाहिए. यह प्रकरण तब का है जब रमन सरकार काबिज थीं. कांग्रेस के सदस्य मोहन मरकाम ने कहा कि पिछली सरकार में निर्दोष ग्रामीणों की हत्या की गई थी. अब यह रिपोर्ट पेश हो गई है तो इस पर चर्चा आवश्यक है. सदन के बाहर विधानसभा परिसर में आदिवासी मंत्री कवासी लखमा ने कहा कि जब यह घटना हुई तब प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह थे. उन्होंने रमन सिंह के अलावा उस समय के गृहमंत्री और  अफसरों पर जुर्म दर्ज होना चाहिए.

अड़े रहे सदस्य

विपक्ष के सदस्य रिपोर्ट पर चर्चा के बजाय इस बात पर अड़े रहे कि रिपोर्ट मीडिया में कैसे लीक हुई. भाजपा के वरिष्ठ सदस्य नारायण चंदेल ने कहा कि विधानसभा में रिपोर्ट के पेश होने के पहले उसका लीक हो जाना गंभीर मामला है. अजय चंद्राकर ने कहा कि सदन में रिपोर्ट पेश हुई है, लेकिन कार्यसूची में उसका जिक्र नहीं है. आसंदी पर सभापति सत्यनायारण शर्मा मौजूद थे, उन्होंने टोकते हुए कहा कि पूरक कार्यसूची में रिपोर्ट पेश होने की जानकारी दी गई है. विपक्ष के सदस्य काफी देर तक इस बात के लिए शोर-शराबा करते रहे कि रिपोर्ट के लीक हो जाने से विधानसभा की अवमानना हो गई है. शोर-शराबे के बीच ही सदन की कार्रवाई पहले पांच मिनट के लिए स्थगित की गई. जब दोबारा कार्रवाई प्रारंभ की गई तो विपक्ष के सदस्य गर्भगृह चले गए और सदन की कार्रवाई से निलंबित हो गए.

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रमन सिंह के शासनकाल में मारे गए थे 17 बेगुनाह आदिवासी... अब जाकर आयोग ने माना कि एक भी नहीं था माओवादी

रायपुर. बस्तर के सारकेगुड़ा गांव में मुठभेड़ की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग ने 78 पेज की अपनी रिपोर्ट में यह मान लिया है कि कोत्तागुड़ा और राजपेटा में 28-29 जून 2012 की दरम्यानी रात सीआरपीएफ और सुरक्षाबलों की संयुक्त टीम ने जिन 17 लोगों को माओवादी बताकर मार गिराने का दावा किया था उनमें से एक भी माओवादी नहीं था.

पूरे देश में हलचल मचा देने वाली यह घटना तब हुई थीं तब छत्तीसगढ़ में डाक्टर रमन सिंह की सरकार काबिज थीं. घटना के बाद सरकार और उसके नुमाइंदे लगातार यह झूठ बोलते रहे कि मुठभेड़ में माओवादियों को ही मौत के घाट उतारा गया है, लेकिन इलाके के मुआयने में गए पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय इस घटना को लेकर बिल्कुल अलग थी. जब इस मामले में सरकार की खूब फजीहत हुई तब सरकार ने 14 दिसम्बर 2012 को जबलपुर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश वीके अग्रवाल की अध्यक्षता में आयोग का गठन कर दिया था. इधर सात सालों की मशक्कत के बाद एक सदस्यीय आयोग ने भूपेश सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. हालांकि सूत्र बताते हैं कि आयोग ने अपनी रिपोर्ट इसी महीने के प्रारंभ में ही सौंप दी थी, लेकिन सार्वजनिक नहीं की गई. जानकार बताते हैं  कि यह रिपोर्ट सोमवार को विधानसभा पेश की जाएगी.

यह कहती है रिपोर्ट

1-रिपोर्ट में यह साफ तौर पर कहा गया है कि 28-29 जून की दरम्यानी रात ग्रामीण गांव में बैठक कर रहे थे तभी सुरक्षाबलों ने फायरिंग कर दी और आदिवासी मारे गए थे.

2- जिन ग्रामीणों से सुरक्षाबलों का टकराव हुआ उनके बारे  में कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं मिला जिससे साबित होता हो कि ग्रामीणों में से कोई नक्सली था. जो व्यक्ति मारे गए उन्हें लेकर भी यह सबूत नहीं मिल पाया कि वे माओवादी थे . मारे लोगों में कुछ नाबालिग भी थे.

3-जब सारकेगुड़ा में घटना हुई तब सुरक्षाबलों का नेतृत्व डीआईजी एस इंलगो और डिप्टी कमांडर मनीष बरमोला कर रहे थे. इन दोनों ने यह स्वीकारा कि उनके द्वारा कोई गोली नहीं चलाई है. दोनों का बयान यह साबित करने के लिए काफी है कि बैठक करने वाले सदस्यों की तरफ से किसी तरह की गोलीबारी नहीं की गई. अगर वे गोली चलाते तो दोनों अधिकारी हथियारबंद थे वे भी जवाब देते.

4-रिपोर्ट कहती है कि गाइड ने कुछ "दूरी पर एक संदिग्ध ध्वनि" की सूचना दी थी जिसके चलते सर्चिंग पर निकले सुरक्षाबल के जवान दहशत में थे. इस दहशत की वज से उन्हें यह भ्रम पैदा हो गया था कि आसपास भारी संख्या में नक्सली मौजूद है. सुरक्षाबलों ने दहशत में गोलीबारी प्रारंभ कर दी जिससे कई लोगों को चोट आई और कई ग्रामीण मौत के मुंह में समा गए.

5-सीआरपीएफ और राज्य पुलिस का प्रतिनिधित्व करने वाले बचाव पक्ष के वकील ने बताया कि मुठभेड़ में छह सुरक्षाकर्मी भी घायल हुए थे. हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि घायल सुरक्षाकर्मियों को लगी चोटें दूर से फायरिंग के कारण नहीं हो सकती थीं, जैसे कि दाहिनी तरफ की चोट पैर की अंगुली या टखने के पास की चोट. दूसरी बात, गोली लगने की घटनाएं केवल क्रॉस-फायरिंग के कारण हो सकती हैं , चूंकि यह घटना की जगह के चारों ओर गहन अंधेरा था तो इस संभावना को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि सुरक्षा बलों के सदस्यों द्वारा दागी गई गोलियों से ही टीम के अन्य सदस्यों को गोली लगी थीं.

6-ग्रामीणों के वकील ने कहा था कि 17 में से कम से कम 10 पीड़ित ऐसे थे जिनके पीठ में गोली मारी गई थी और कहा गया था कि जब वे भाग रहे थे तब गोली चलाई गई. जांच पैनल ने कहा कि कुछ मृतको के सिर के ऊपर से निकली गयी गोलियों से पता चलता है कि उन्हें बेहद करीब गोली दागी गई थी.

7-ग्रामीणों का आरोप है कि पीड़ितों में से एक को उसके घर से 29 जून की सुबह, कथित मुठभेड़ के 10 घंटे बाद उठाया गया था. एक आदिवासी महिला का बयान है कि उसके भाई इरपा रमेश को सुबह पीटा गया था. उनके बयान का समर्थन मुता काका ने किया है. बयान में कहा है कि इरपा रमेश सुबह अपने घर में थे और बाहर झांककर यह देख रहे थे कि गोलीबारी बंद हो गई या नहीं तभी पुलिस कर्मियों ने उन्हें पकड़ लिया. पहले उनकी पिटाई की और फिर गोली मारकर उनकी हत्या कर दी.

8-पोस्टमार्टम वीडियो से लिए गए चित्र से भी पता चलता है कि 15 शवों को एक साथ रखा गया था जिनकी मौत रात में ही हो गई थी. जबकि इरपा रमेश का शव अलग- थलग पड़ा था. यह बात का भी द्योतक है कि इरपा रमेश रात की घटना में नहीं मारा गया था.

9-न्यायमूर्ति अग्रवाल ने अपनी रिपोर्ट में जांच में स्पष्ट हेरफेर की बात कही है ,और कहा कि यह ध्यान रखना उचित है कि कई अन्य दस्तावेज जैसे कि जब्ती- ज्ञापन आदि भी कथित रूप से सुबह में मौके पर तैयार किए गए थे.

 

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छत्तीसगढ़ के घटिया फिल्मकारों के मुंह पर एक तमाचा है- प्रेम चंद्राकर की लोरिक चंदा.

राजकुमार सोनी 

मुंबई-मद्रास की कहानी और टोटके के तौर पर नींबू-मिर्च लटकाकर फिल्म का निर्माण करने वाले घटिया फिल्मकारों के मुंह पर एक तमाचा है- प्रेम चंद्राकर की लोरिक चंदा.

निश्चित रुप  से लोरिक-चंदा एक उम्दा फिल्म है, लेकिन छत्तीसगढ़ के नकल चोर निर्माता और निर्देशक ऐसी फिल्म बनाने की हिमाकत कभी नहीं करेंगे. वजह साफ है लोरिक-चंदा शायद वैसी कमाई नहीं कर पाएगी जैसी कमाई हंस झन पगली फंस जबै जैसी दोयम दर्जे की एक बंडल फिल्म से हो जाती है.

विवेक सार्वा की मंदराजी के बाद छत्तीसगढ़ की अमर लोक-गाथा लोरिक-चंदा पर प्रेम चंद्राकर ने बेहद खूबसूरत फिल्म बनाई है, किंतु यह फिल्म ठीक-ठाक बिजनेस कर पाएगी इसे लेकर थोड़ा सशंय है ? (अगर यह फिल्म व्यावसायिक रुप से सफल होती है तो इसे प्रेम चंद्राकर और इसमें काम करने वालों कलाकारों का भाग्य ही माना जाना चाहिए.)

दरअसल इस सशंय की एक बड़ी वजह यह है कि अब छत्तीसगढ़ में भी फिल्म को सफल बनाने के लिए पैतरों और हथकंड़ों का उपयोग होने लगा है. कई बार पैतरों और हथकंड़ों की आजमाइश सफल हो जाती है, मगर कई बार दर्शक झांसे में नहीं आता और फिल्म धूल चाटने लगती है.

दर्शकों को शायद याद हो कि जब हंस झन पगली थियेटर में रिलीज हुई तब मल्टीफ्लेक्स में छत्तीसगढ़ी सिनेमा लगाए जाने को लेकर एक जबरदस्त आंदोलन हुआ था. फिल्म के जानकार मानते हैं कि अगर यह आंदोलन नहीं होता तो फिल्म को उतना लाभ नहीं मिलता जितना मिला. छत्तीसगढ़ में कुछ फिल्में सिर्फ इसलिए सफल रही क्योंकि वह तीज-त्योहार और और सरकारी अवकाश के दिनों में रिलीज हुई. कई फिल्मों की डूबती नैय्या भी इसलिए पार लग पाई क्योंकि उनका प्रमोशन जरूरत से ज्यादा था. जबकि कुछ फिल्में सलमान जैसी बॉड़ी दिखाने और हिरोइनों पर ज्वलनशील पदार्थ फेंकने की घटना के बाद भी सफल नहीं हो पाई. कुछ फिल्मों को लोगों ने इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि उनका पोस्टर ही अपसंस्कृति का परिचायक था. पोस्टर में सुपर स्टार लिखा हुआ देखकर दर्शक थियेटर के भीतर गए मगर पर्दे पर कुमार गौरव को नाचता हुआ देखकर बाहर भी निकल आए.

अब थोड़ी सी बात लोरिक चंदा को लेकर कर लेते हैं अन्यथा खुद को लीजेंड और सुपर स्टार के तौर पर प्रचारित करने वाले आत्ममुग्ध कलाकार शराब पीकर उल्टी करने लगेंगे.

... तो भइया ऐसा है कि लोरिक-चंदा को थोड़ा धैर्य और प्रेम से देखने की जरूरत है. अगर इस फिल्म को देखने के पहले प्रेम साइमन के नाटक से गुजर जाए तो और भी अच्छा होगा. प्रेम चंद्राकर की इस फिल्म में नाटक और फिल्म दोनों का स्वाद मिलता है. अब से कुछ अर्सा पहले छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक निर्देशक रामहृदय तिवारी ने लोरिक-चंदा के नाम से नाटक खेला था. तब यह नाटक बेहद मकबूल हुआ था. नाटक में लोरिक की भूमिका दीपक चंद्राकर और चंदा की भूमिका शैलजा क्षीरसागर ने निभाई थीं. तब यह नाटक इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि दूरदर्शन वालों ने जस का तस इसका प्रसारण कर दिया था. बाद में सुंदरानी बंधुओं ने भी लोरिक चंदा को लेकर एक वीडियो बनाया, मगर वीडियो ठीक-ठाक प्रभाव नहीं छोड़ पाया.

सच तो यह है कि लोक जीवन में रचने-बसने वाली गाथाएं सिर्फ इसलिए जिंदा नहीं रहती कि वे आश्चर्य लोक का निर्माण करती है बल्कि वह लोगों के दिलों में इसलिए भी धड़कती है क्योंकि उनमें प्रेरणा देने वाले अनिवार्य तत्व के तौर पर प्रेम मौजूद रहता है. छत्तीसगढ़ की चर्चित लोकगाथा लोरिक को हम मैथिल, मिर्जापुरी, भोजपुरी और हैदराबादी में भी देख सकते हैं. हर जगह कहानी थोड़ी-थोड़ी अलग हो जाती है. कहानी के अलग हो जाने के बावजूद नायक लोरिक प्रेम की जिजीविषा और खूबसूरती को बचाए रखने के लिए संघर्ष करता है.

लोक गाथाओं में कोई एक लेखक मूल नहीं होता है इसलिए पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि लोरिक-चंदा का मूल लेखक कौन है. चूंकि छत्तीसगढ़ में इसे सबसे पहले नाटककार प्रेम साइमन ने करीने से लिखा और खेला है तो उनके महत्वपूर्ण काम को स्वीकार करने में कोई गुरेज भी नहीं होना चाहिए. छत्तीसगढ़ में कंचादूर के रामाधुर साहू अब भी चनैनी के नाम से लोरिक-चंदा को खेलते हैं. उनके नाटक की कहानी फिल्म की कहानी से अलग है. मुख्य रुप से लोरिक-चंदा की कहानी मानवीय प्राणों की प्यास, प्यार की तलाश और अतृप्त आकांक्षा की कहानी है. इस कहानी में मेल-मिलाप और विछोह बेहद सात्विक रुप में मौजूद है. ( टुरी आइसक्रीम खाकर फरार हो गई जैसे गाने पर कूल्हे मटकाने वाली पीढ़ी शायद ही कभी जान पाए कि सात्विकता क्या होती है ? ) प्रेम... का ब्रेकअप मोबाइल पर हट... तेरी ऐसी की तैसी लिख देने भर से नहीं होता है. प्रेम सशंय और कुंहासों से भरा होता है. अक्सर प्रेम में वह सब भी सुन लिया जाता है जो कभी कहा नहीं जाता. लोरिक और चंदा मिलते तो हैं, लेकिन वे मिलकर भी नहीं मिलते. कहानी के अंत में वे डूबकर अपनी जान दे देते हैं, लेकिन दूसरों की जान का हिस्सा बन जाते हैं.लोरिक और चंदा की कहानी से छत्तीसगढ़ का हर मर्मज्ञ वाकिफ है. जगह- जगह किसी न किसी रुप में यह गाथा सुनने को मिल जाती है. आरंग के एक गांव रीवा के पास तो बकायदा लोरिक गढ़ भी बना हुआ है.

प्रेम चंद्राकर की लोरिक-चंदा पूरे प्रभावी ढंग से इन्हीं सब बातों को कहती है, लेकिन यह सब आपको तब अच्छा लग पाएगा जब आप दो-ढ़ाई घंटे के लिए अपने मोबाइल से तलाक ले पाएंगे. मतलब मोबाइल बंद करके फिल्म का आनंद उठाए. यह फिल्म दर्शकों से थोड़ा धैर्य और इत्मीनान की अपेक्षा करती है. लोरिक की भूमिका में अभिनेता गुलशन साहू और चंदा की भूमिका में कुंती मढ़रिया का काम बेहतर है. आकाश सोनी के हिस्से में बेहद छोटी सी भूमिका आई है, लेकिन सर्वाधिक तालियां इस कलाकार के हिस्से चली जाती है. उसने दिल जीत लिया. राजा के रुप संजय बतरा की केवल आवाज प्रभावी है. उनके अभिनय में टीवी सीरियलों की छाप साफ तौर पर दिखाई देती है. इसके बावजूद वे फिल्म की गति को कमजोर नहीं होने देते. फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसका गीत और संगीत है. आप इस फिल्म के संगीत में गुंदम बाजा भी सुन सकते हैं. मांदर, ढोलक- तबला, खंजेरी और चटका भी. संगीत आपको बांधे रखता है. लोक संगीत दूसरी दुनिया में ले जाता है.फिल्म का हर गीत मधुर और जानदार है. फिल्म की अधिकांश शूटिंग गरियाबंद के पास बारूका और पांडुका इलाके के पठार में हुई है. कैमरामैन ने इस इलाके के कई खूबसूरत दृश्यों को कैद करके शानदार वातावरण रचा है. फिल्म को देखते हुए राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले बनने वाली कई साफ-सुथरी फिल्मों की याद भी आती है. 

अगर आप राजा- फाजा भइया, लव दीवाना, सॉरी लवयू-फव यू, तोर-मोर लव जैसी बेमतलब की फिल्म से उब गए हैं तो आपको लोरिक-चंदा जैसी क्लासिक मूवी अवश्य देखनी चाहिए.अगर आप शुद्ध छत्तीसगढ़ी भाषा का आंनद हासिल करना चाहते हैं तो भी इस फिल्म को देख सकते हैं.

 

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कुरुद में आखिर किसका संरक्षण हासिल है रेत का अवैध कारोबार करने वाले नवीन और नागू चंद्राकर को ?

रायपुर.भाजपा के पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर को धमकी देने के मामले में पुलिस ने रेत कारोबारी जसपाल सिंह रंधावा को गिरफ्तार तो कर लिया है, लेकिन इस गिरफ्तारी के साथ ही राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि कुरुद इलाके में दबंगई के साथ रेत का कारोबार करने वाले नवीन और नागू चंद्राकर का उत्पात आखिर कब रुकेगा ? इन्हें किसका संरक्षण हासिल है?

सूत्रों के मुताबिक नवीन और नागू को लेकर भी नामजद उच्चस्तरीय शिकायत हुई है. इस शिकायत में यह कहा गया है कि गत पंद्रह साल से नवीन और नागू ही कुरुद इलाके में रेत का कारोबार कर रहे हैं.अगर कोई व्यक्ति कानूनी ढंग से भी रेत का कारोबार करना चाहता है तो दोनों उसे कारोबार नहीं करने देते हैं. जो कोई भी नियम-कानून बताता है तो उसे बम-बारूद और गोली से उड़ा देने की धमकी दी जाती है.

बताते हैं कि नवीन एक राजनीतिक दल का कार्यकर्ता है और उसे उसी इलाके के एक बड़े राजनीतिज्ञ ने पांच हाइवा और दो जेसीबी गाड़ी सौंप रखी है. नवीन का दूसरा साथी नागू खुद को एक बड़े नेता के काका की लड़की का बेटा बताता है और रेत साथ-साथ अवैध शराब के कारोबार में भी लिप्त है. बताया जाता है कि अवैध शराब. बेचने के आरोप में नागू को वर्ष 2003 में भखारा की पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था. बहरहाल दोनों के उत्पात से कुरुद और आसपास के लोग दहशत में जी रहे हैं.

इधर मंत्री अजय चंद्राकर के द्वारा जान से मारने की धमकी देने वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से इंकार करने पर कांग्रेस ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर का कहना है कि अजय चंद्राकर के जिस रिश्तेदार के मोबाइल पर धमकी-चमकी दी गई है उनका रेत खदान से क्या संबंध है यह साफ होना चाहिए ? अगर अजय चंद्राकर को सीधे तौर पर धमकी मिली थी तो उन्होंने धमकी देने वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज क्यों नहीं करवाई?  सबको पता है कि जब प्रदेश में डाक्टर रमन सिंह की सरकार थीं तब अवैध रेत खदान संचालित करने वालों को भाजपा ने पूरा संरक्षण दे रखा था. पूर्व सरकार के मंत्रियों के रिश्तेदार ही रेत के बड़े खिलाड़ी थे. पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के ऊपर पद का दुरुपयोग कर अपने रिश्तेदारों को रेत खदान दिलाने के गंभीर आरोप भी लगे थे जिसकी शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक हुई थीं. प्रवक्ता धनजंय सिंह ठाकुर ने कहा कि प्रदेश सरकार अंतिम व्यक्ति की सुरक्षा को लेकर कटिबद्ध है इसलिए मामले में त्वरित कार्रवाई की गई, लेकिन पूर्व मंत्री के द्वारा मामले में कार्रवाई की मांग न करना यह साबित करता है कि दाल में कुछ काला जरूर है... बल्कि पूरी दाल ही काली है.  

 

 

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केदार कश्यप की पत्नी की जगह परीक्षा देने वाली महिला को अब तक पकड़ नहीं पाई पुलिस... जमीन खा गई या निगल गया आसमान ?

रायपुर. वर्ष 2015 में जब छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थीं तब बस्तर के लोहण्डीगुड़ा इलाके के परीक्षा केंद्र में एक घटना के चलते प्रदेश की राजनीति में तूफान मच गया था. पूर्व शिक्षा मंत्री केदार कश्यप की पत्नी शांति कश्यप जगह कोई दूसरी महिला एम अंग्रेजी ( अंतिम )  की परीक्षा देने बैठ गई थीं. जब इस मामले में बवाल मचा तब अखबारों में प्रकाशित एक तस्वीर के आधार पर यह तथ्य सामने आया कि परीक्षा देने वाली भानपुरी के सिविल अस्पताल में काम करने वाली किरण मौर्य है. मामले में कांग्रेस के सदस्यों ने धरना- प्रदर्शन करते हुए यह आरोप भी लगाया था कि किरण मौर्य कोई और नहीं बल्कि मंत्री की सगी साली है. कांग्रेस के आरोप के बाद पुलिस ने पंडित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय के प्रभारी कुल सचिव की शिकायत पर एक अज्ञात महिला के खिलाफ भारतीय दंड़ विधान की धारा 419 और छत्तीसगढ़ सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2008 की धारा 9 के तहत अपराध पंजीबद्ध तो कर लिया था, लेकिन इस महिला को पुलिस अब तक खोज नहीं पाई है. महिला अब भी गिरफ्त से बाहर है.

इस मामले में तब कांग्रेस के एक विधायक लखेश्वर बघेल ( वे अब भी विधायक है ) ने विधानसभा में सवाल पूछकर यह जानना चाहा था किस महिला के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई है और पुलिस ने क्या कार्रवाई की है. तब गृहमंत्री रामसेवक पैकरा ने सदन में बताया था कि 4 अगस्त, 2015 को उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में संचालित परीक्षा एमए अंतिम की परीक्षा में शांति कश्यप की जगह एक अज्ञात महिला परीक्षा देने आई थीं. जो महिला परीक्षा देने आई थी उसके खिलाफ मामला पंजीबद्ध कर लिया गया है, लेकिन वह कौन है... क्या है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है सो उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सका है.

जमीन खा गई या आसमान निगल गया ?

मामले में पांच साल बीत जाने के बाद भी पुलिस अब तक अज्ञात महिला को खोज नहीं पाई है. इस मामले में एक बार फिर बुधवार को विधानसभा में सवाल पूछा गया है. नारायणपुर के विधायक चंदन कश्यप ने एक लिखित प्रश्न के जरिए यह जानना चाहा कि पंड़ित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय के परीक्षा केंद्र में फर्जी परीक्षार्थी के संबंध में पुलिस ने क्या कार्रवाई की है. उन्हें जवाब मिला है- अज्ञात महिला के खिलाफ अपराध क्रमांक 26 / 2015 के तहत मामला पंजीबद्ध किया गया है. विवेचना जारी है. कब तक विवेचना चलेगी इसकी समय-सीमा बताना संभव नहीं है.

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बेटा... टकला हो जाने से कोई चाणक्य नहीं बन जाता !

तत्पुरुष

दिल्ली. पिछले पन्द्रह दिनों से महाराष्ट्र की राजनीति में जो कुछ घटा और घट रहा है उससे जनता की व्यंग्य करने की क्षमता में काफी इजाफा हो गया है. एनसीपी नेता अजित पवार के पाला बदलने और फ्लोर टेस्ट से पहले ही देवेंद्र फड़णवीस के इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया में भाजपा और उसके कथित चाणक्य की जमकर थू-थू हो रही है.

छत्तीसगढ़ की विधानसभा में मंगलवार को संविधान दिवस के मौके पर संविधान की रक्षा को लेकर पक्ष-विपक्ष के सभी सदस्यों ने हिस्सेदारी दर्ज की. सदन में अपने भाषण के कुछ देर बाद ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ट्विवटर में लिखा- चाणक्य ने नंदवंश का नाश करके चंद्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया था न कि चंद्रगुप्त मौर्य को राजा बनाने के लिए नंदवंश का नाश किया. जो चाणक्य... जासूसी, खरीद-फरोख्त और डराने-धमकाने से नहीं बल्कि राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति से बना करते हैं. अब असली चाणक्य देश की जनता है. मुख्यमंत्री के इस ट्विवट के बाद लोगों को यह समझते देर नहीं लगी कि उनका इशारा किस तरफ है. एक ट्विटर यूजर राकेश पवंदा ने चाणक्य की तस्वीर को चस्पा करते हुए लिखा है- बेटे... सिर्फ टकला हो जाने से कोई चाणक्य नहीं बन जाता है.

सौ सुनार की एक पवार की

कांग्रेस नेता आरपी सिंह ने फेसबुक पर लिखा है- अजीत पवार ने इस्तीफा दिया तो चाणक्य तेल लेने चला गया. भाजपा के पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के करीबी देवेंद्र गुप्ता ने लिखा- तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे थे पर मामला बिल्कुल सीधा निकला. एक बड़ी सीख है- जल्दबाजी में लिया गया कोई भी निर्णय आपको देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार बना सकता है. किसान नेता राजकुमार गुप्ता की टिप्पणी हैं- अलोकतांत्रिक ढंग से सत्ता हड़पने के षड़यंत्र को ध्वस्त करके महाराष्ट्र ने बता दिया है वह सचमुच महाराष्ट्र है. गजालक्ष्मी नारायणी ने फेसबुक पर एक तस्वीर पोस्ट की है जिसमें लिखा है- सौ सुनार की होती है तो एक पवार की होती है. एमडी अली चिश्ती लिखते हैं- चोर-उच्चके-तड़ीपार को लोगों ने चाणक्य-चाणक्य कहके चढ़ा दिया था. असली चाणक्य तो कोई और ही निकला. उन्होंने शरद पवार की अभिताभ शैली वाली तस्वीर पोस्ट की है जिसमें लिखा है- जहां सबकी खत्म होती है वहां हमारी शुरू होती है... क्यों हिला डाला न? अपनी टिप्पणियों से चर्चा में रहने वाले अनिल पांडे लिखते हैं- भाजपा की गंगा में डुबकी लगाकर अब अजित पवार पवित्र होकर निकल गए हैं. आरपी सिंह की एक और मजेदार पोस्ट है. इसमें लिखा है- फडणवीस सही कहते थे- अजीत पवार भ्रष्ट है. चार विधायक दिखाकर 40 का पैसा ले गया. ट्विवटर यूजर राम पटेल ने लिखा है- चाणक्य-चाणक्य की रट और तुलना से असली चाणक्य परेशान हो गया है. भाजपा समर्थित मीडियाकर्मियों को लेकर भी सोशल मीडिया में तल्ख टिप्पणी देखने को मिली है. नहरहू ने अर्णब गोस्वामी, अंजना ओम कश्यप सहित दो अन्य एंकरों की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है- छन्न से टूटे कोई सपना... जग सूना-सूना लागे. धमेंद्र यादव दस रुपए के नोट पर लिखा है- पहले सोनम गुप्ता बेवफा थी... अब अजित पवार बेवफा हो गए  हैं.

उठो चाणक्य की मां सब कबाडा हो गया है.

छत्तीसगढ़ के एक पत्रकार देवेश तिवारी अमोरा की भी टिप्पणी मजेदार है- उन्होंने लिखा है- सबके चाणक्य तो फूफा अजित पवार है. जो शख्स जेल भिजवाना चाहता था उसी से क्लीन चिट ले आया. दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है- समस्या चैनल वालों की भी है जो धोबिया पछाड़, मास्टर स्ट्रोक और चाणक्य बनाए हुए थे. मणि वैष्णव लिखते हैं- फ्लोर टेस्ट से पहले ही देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. संविधान दिवस के दिन संविधान विरोधियों की हार हो गई है. एक टिप्पणी है- मोटा भाई गोटा पकड़ लो और पतली गली से निकल जाओ. नितिन भंसाली ने लिखा है- जब नहीं था पास में नंबर तो क्यों बनने चले थे सिकन्दर. सोशल मीडिया पर अल्ताफ ने लिखा है- अजित पवार ने कथित चाणक्य को अच्छा बेवकूफ बनाया. पहले 54 विधायकों का झूठा समर्थन दिखाया... तड़ीपार से दो हजार करोड़ का भुगतान लिया. अपने ऊपर लगे नौ केस हटवा लिए और चाणक्य को बिना कपड़ों का कर दिया. सबसे मजेदार पोस्ट मनीष सिंह की है. उन्होंने के आसिफ की पुरानी फिल्म मुगले आजम की एक फोटो डाली है. इस फोटो में दिलीप कुमार की गोद के पास जमीन पर मधुबाला आंख बंदकर लेटी हुई है. मनीष ने फोटो को देखकर लिखा है- उठो चाणक्य की मां... सब कबाड़ा हो गया है.  उनकी इस पोस्ट पर निशंत इमरान की टिप्पणी है- अब उठकर क्या करूंगी जहांपनाह....

 

 

 

 

 

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छत्तीसगढ़ः मीटर की शिफ्टिंग में पांच करोड़ से अधिक का घोटाला

रायपुर. प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थी तब मीटर शिफ्टिंग में घोटाले की बात सामने आई थीं, लेकिन पुरानी सरकार ने मामले को उजागर नहीं होने दिया. इधर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोमवार को विधानसभा में जानकारी दी कि वर्ष 2014 तक मीटिर शिफ्टिंग के मामले में कुल पांच करोड़ 64 लाख 42 हजार 513 हजार रुपए की अनियमितता पकड़ में आई है और अब तक 64 कर्मचारियों को नोटिस भी जारी किया गया है.

कांग्रेस विधायक सत्यनारायण शर्मा ने यह जानना चाहा था कि मीटर शिफ्टिंग और उच्च दरों पर कचरा बिजली खरीदी पर कितनी वित्तीय अनियमियतता हुई है और इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की गई है. प्रश्न के जवाब में मुख्यमंत्री  जो ऊर्जा विभाग के मंत्री भी है ने बताया कि छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी में मीटर शिफ्टिंग की प्रारंभिक जांच केवल आठ जिलों में ही पांच करोड़ 64 लाख 42 हजार 513 रुपए की अनियमितता संज्ञान में आई है. उन्होंने बताया कि ठेकेदारों ने फर्जी कार्यादेश और देयक प्रस्तुत कर भुगतान प्राप्त कर लिया था जिसके चलते अब तक 65 अधिकारियों और कर्मचारियों पर विभागीय जांच चल रही है. मुख्यमंत्री ने बताया कि जो कार्यादेश जारी किया उसमें कई तरह की कमियां उजागर हुई, इस वजह से 83 अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी आरोप पत्र जारी किया गया है.

कई ठेकेदारों का नाम आया सामने

जब भाजपा सत्ता में थीं तब भी यह मामला जोर-शोर से उछला था. तब मुख्यमंत्री रमन सिंह ने सभी दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई करने की बात कही थीं, लेकिन कुछ नहीं हुआ. इस बीच एक-दो ठेकेदारों ने अदालत की शरण लेकर राहत पाने की कवायद की. इस मामले में  तुलसी नगर कोरबा के मेसर्स विधवानी इन्फ्राटेक, बिलासपुर सरकंडा के विजय कुमार अचवानी कटघोरा के पंकज केला, पाली के राघवेन्द्र जायसवाल, कटघोरा के संजय नायडू, अमित कुमार जायसवाल, जगदलपुर के सहारा दास, सुनील कड़से, पिंटू ठाकुर का नाम प्रमुख रुप से  उभरा था. तब इन ठेकेदारों को महज काली सूची में डाला गया था. शासन को करोड़ों रुपए की चपत लगाने वाले ठेकेदार बच निकले थे.

इस तरह हुआ था घोटाला

अप्रैल 2012 से लेकर नवंबर 2014 के बीच बिजली कंपनी ने ठेकेदारों को घरों और उद्योगों में कमरों के भीतर लगे मीटरों को उखाड़कर बाहर लगाने का वर्कऑर्डर दिया था. इसमें हर काम के लिए राशि तय की गई थी। मसलन, केबल लगाने, मीटर का बोर्ड पुराने के बजाय नया लगाने के लिए रुपए ठेकेदार को दिए जाने थे. मीटर बाहर लगाने, कनेक्शन करने और केबल लगाने के लिए एक कनेक्शन पर 405 रुपए खर्च करने थे. दो साल में करीब एक लाख कनेक्शन के लिए 4.05 करोड़ रुपए का भुगतान ठेकेदारों को किया गया, लेकिन हकीकत यह थी कि कहीं कम केबल लगाकर रुपए बचाए गए और कहीं केबल ही नहीं लगाए गए. अधिकांश स्थानों पर केबल की राशि कंज्यूमर से ही वसूल की गई. मीटर बोर्ड भी नया लगाने के बजाय अंदर का ही उखाड़कर बाहर लगा दिया गया. यानि बड़ी होशियारी से सरकारी रकम की चपत लगाई गई. इस खेल में ठेकेदार व अधिकारी दोनों शामिल थे.

 

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