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एक उसूल पसंद योद्धा

23 अगस्त को जन्मदिन पर विशेष

राजकुमार सोनी

मुझे उसूलों के साथ उसूलों के लिए लड़ने वाले लोग खूब पसन्द आते हैं. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को मैं एक उसूल पसन्द योद्धा के तौर पर ही देखता हूं. निजी तौर पर मेरा मानना है कि जो व्यक्ति भीतर से साहसी होता है वहीं उसूलों का पक्षधर भी होता है. वैसे साहस की कोई एक किस्म तो पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के भीतर भी विद्यमान थीं, लेकिन इस किस्म की दशा और दिशा विध्वंश को बढ़ावा देने वाली ज्यादा थीं. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि अगर जोगी अपने ही लोगों के हौसले और घुटनों को तोड़ देने के खेल में माहिर नहीं रहते तो शायद प्रदेश में पंद्रह साल तक भाजपा के बजाय कांग्रेस की सरकार काबिज रहती. जोगी प्रखर राजनीतिज्ञ थे, लेकिन कई बार ( बल्कि अक्सर ) उनकी राजनीति का हिसाब-किताब अपने ही पैर में ही कुल्हाड़ी मारने वाले मुहावरे को चरितार्थ करने लगता था.

भूपेश बघेल के पास भी चमकदार और धारदार कुल्हाड़ी है...लेकिन उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी का इस्तेमाल कांग्रेस की डंगाल को काटने के लिए कभी नहीं किया. उनकी कुल्हाड़ी सांप्रदायिक ताकतों पर चोट करने का हुनर जानती है. वे अच्छी तरह से जानते हैं कि कब... कहां और कैसे भाजपा को मात देना है.

झीरम के माओवादी हमले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नंद कुमार पटेल और अन्य दिग्गज नेताओं के शहीद हो जाने के बाद जब प्रदेश की बड़ी आबादी यह मानकर चल  रही थीं कि रमन सरकार से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा तब भाजपा ने जीत का परचम फहराकर कांग्रेस को गहन चिकित्सा कक्ष में भेज दिया था. अब भी जब कभी राजनीति की समझ रखने वाले लोग चर्चा करते हैं तो यह सवाल जरूर करते हैं कि झीरम जैसी बड़ी घटना के बाद भी कांग्रेस क्यों हारी ? बघेल के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने से कुछ पहले सब कुछ बरबाद हो चुका था. बड़ी लीडरशिप खत्म हो गई थीं. खेमे में बंटे हुए नेता टूट चुके थे और संगठन लगभग बिखर गया था. बघेल ने राजधानी के वातानुकूलित कमरे में बैठकर राजनीति करने के बजाय गांव-गांव की खाक छानी. जमीन का रास्ता नापा और धुंआधार दौरों को अंजाम दिया. थोड़े ही दिनों में उनकी सांगठनिक क्षमता, कार्यकर्ताओं को साधकर चलने वाले दिमाग और आक्रामक तेवर से यह साफ हो गया कि चाहे जो हो कम से कम वे भाजपा के हाथों बिकने वाले नहीं है. बघेल के अध्यक्ष बनने के पहले कांग्रेस के एक नेता को भाजपा का 13-14 वां मंत्री कहा जाता था तो कुछ ऐसे थे जो रमन सरकार से छोटी-मोटी सुविधाएं हासिल करने के लिए जी-हजूरी करते नजर आते थे. 

टीएस सिंहदेव के साथ उनकी जुगलबंदी यह भरोसा पैदा करने में कामयाब रही कि सबको साथ लेकर चलने से हारी हुई बाजी को पलटा जा सकता है. धनबल के आगे जनबल तभी टिकता है जब लक्ष्य को पाने का इरादा मजबूत होता है. अन्यथा जुलूस तो हर दूसरी सड़क पर निकलता है और अमूमन हर रोज निकलता है. यकीनन जुलूस में सबसे मजबूत इरादा होता है और कोई मजबूत इरादा ही जुलूस का नेतृत्व करता है.

एनसीपी नेता रामवतार जग्गी की हत्या और झीरम हमले के बाद भले ही अजीत जोगी अपनी साख को बचाने की जुगत में लगे हुए थे, लेकिन अंतागढ़ टेपकांड में उनकी और अमित जोगी की संलिप्तता सामने आने के बाद एक आम राय यह कायम हुई कि वे भाजपा के लिए कार्यरत थे. जब कांग्रेस के तमाम बड़े दिग्गज उन पर कार्रवाई करने से घबरा रहे थे तब बघेल आलाकमान को यह विश्वास दिलाने में कामयाब रहे कि जोगी परिवार के बगैर भी कांग्रेस की नैय्या पार लग सकती है. पिता-पुत्र के पार्टी से बाहर होने के बाद यह कयास लगाए जा रहे थे कि विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को जबरदस्त नुकसान होगा, लेकिन इसके उलट बघेल यह साबित करने में कामयाब रहे कि जोगी  बीता हुआ कल थे. अगर पार्टी में रहते तो कांग्रेस ज्यादा नुकसान में रहती.

अपने इरादों और कामकाज के तौर-तरीकों में मजबूती के चलते भूपेश बघेल ने देश के बड़े राजनीतिज्ञों के बीच अपना एक खास मुकाम बनाया है. देश के बहुत से लेखक मित्र जब कभी भी फोन करते हैं तो बगैर किसी लंबी-चौड़ी भूमिका के कहते हैं-यार आपके यहां के मुख्यमंत्री तो जबरदस्त काम कर रहे हैं. एक बार मिलकर इस बात के लिए बधाई देनी है कि उन्होंने आदिवासियों की जमीन लौटाकर अच्छा काम किया है. संस्कृतिकर्मी मानते हैं कि वे करीना कपूर के साथ सेल्फी लेकर छत्तीसगढ़ के स्थानीय कलाकारों को अपमानित करने वाले सीएम नहीं है. उनका ठेठ देसी अंदाज छत्तीसगढ़ की संस्कृति-परम्परा और यहां के तीज-त्योहार को मानने-जानने वाले लोगों को लुभाता है. ऐसे सैकड़ों काम है जिसका जिक्र यहां कर सकता हूं... लेकिन यह सूची थोड़ी लंबी हो जाएगी.

ऐसा भी नहीं है कि उनके आलोचक नहीं है. फिलहाल इस काम में वे ही लोग सक्रिय है जो पिछली सरकार में ठेकेदार-कांट्रेक्टर बनकर सरकारी खजाने को हड़पने के खेल में लगे थे. भाजपा से संबंद्ध बहुत से उद्योगपति, ठेकेदार और धंधेबाज अपनी पूरी ताकत के साथ इस प्रचार में जुटे हुए हैं कि भूपेश सरकार महज चंद दिनों की मेहमान है. टीएस बाबा के साथ उनकी पटरी नहीं बैठ रही है. कोई ढ़ाई साल का फार्मूला है जो छत्तीसगढ़ में लागू हो जाएगा. आदि-आदि. दुष्प्रचार के इस उपक्रम में जनवाद का छेद वाला कंबल ओढ़कर जिंदाबाद-जिंदाबाद करने वाले लोग भी शामिल है. इसके अलावा कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़े लोग, पूर्ववर्ती सरकार के प्रति वफादार रहने वाले अफसर और हर महीने वजीफा पाने वाले पत्रकारों की जमात भी इन दिनों सक्रिय है. ऐसे तमाम शेयर होल्डर जो सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में नकारात्मक माहौल बनाते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि अभी सांप्रदायिक ताकतों से बड़ी और असली लड़ाई होनी बाकी है.

इससे इतर गांव और परिवार के एक मुखिया जैसी उनकी छवि को पसन्द करने वालों का बड़ा वर्ग भी मौजूद है. किसी गांव वाले से पूछकर देखिएगा तो कहेगा- अब लाल भाजी खाने का मजा आ रहा है. कहना न होगा कि छत्तीसगढ़ बेहद खूबसूरत है. यह राज्य अपने खांटी देसी स्वाद की वजह से भी जाना जाता है. जब कभी आप बाहर जाएंगे तो लोग आपसे तीजन बाई के बारे में पूछेंगे. सुरूजबाई खांडे, हबीब तनवीर के बारे में पूछेंगे. यहां के धान और उगने वाली साग-सब्जियों की जानकारी पाकर भी लोग आश्चर्य से भर जाते हैं. दुर्भाग्य से पंद्रह साल तक छत्तीसगढ़ का देसी स्वाद गायब कर दिया गया था. यहां के छत्तीसगढ़ियों को ही नहीं लग रहा था कि कोई उनके अपने बीच का है. भूपेश बघेल ठेठ छत्तीसगढ़िया है तो उन्हें गांव में रहने वाली बड़ी आबादी का दिल जीतने में देरी नहीं लगी. जहां तक भाजपा और उनके नेताओं की बात है तो ज्यादातर अब भी छत्तीसगढ़ की बोली-बानी और यहां के रहन-सहन को हिकारत के भाव से देखते है. भाजपा का कोई भी नेता ( एक-दो को छोड़कर ) अगर छत्तीसगढ़ी में बोलता और बतियाता है तो उसका व्यापारिक और बनावटी अंदाज साफ नजर आता है. 

मेरा किसी जाति विशेष से कोई विरोध नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि गत पंद्रह सालों से प्रदेश में ठकुराई हावी थीं. प्रदेश के ज्यादातर भाजपा नेताओं और अफसरों का तौर-तरीका सामंती हो गया था. दूर-दराज गांवों में बसने वाले लोगों को लगता था कि पता नहीं कब जमींदार कोड़े लेकर आ जाएंगे और खेत-खार से बेदखल कर देंगे. फूल जैसी बिटिया को उठाकर ले जाएंगे. होता भी यहीं था. बस्तर में पदस्थ रहा एक पुलिस अफसर पुरानी सरकार के इशारों पर कुछ इसी तरह के कृत्य में संलिप्त भी रहता था. आतंक का पर्याय बन चुके पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता पर कार्रवाई भी आसान नहीं थीं. सब जानते हैं कि पिछली सरकार में वे किस तरह के पॉवरफुल थे. जानकार कहते हैं कि पिछली सरकार में मंत्रिमंडल के प्रत्येक सदस्य की कुंडली उनके पास थी और इसी आधार पर वे समय-असमय सबको यह कहकर धौंस देते थे कि ज्यादा उलझोगे तो नाप दिए जाओगे. लेकिन बघेल ने हत्या, साजिश सहित कई तरह के गंभीर आरोपों से घिरे इस खतरनाक अफसर को भी इधर-उधर भागने और छिपकर जीने के लिए मजबूर कर दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह, उनके दामाद पुनीत गुप्ता तथा अन्य कई रसूखदार नेताओं पर उनकी कार्रवाई को भले ही विपक्ष बदलापुर की कार्रवाई मानता है, लेकिन निजी तौर पर मैं इसे साहस का काम मानता हूं. पंद्रह साल के खौफ को भूपेश बघेल अपने देशज अंदाज से धीरे-धीरे खत्म करने का काम किया है. इस खौफ को कम करने के लिए उन्हें न तो लाठी भांजने की जरूरत पड़ी है और न ही अजीत जोगी वाले हथकंड़े को अपनाने की.

अब कोई कह सकता है कि जब आदमी सत्ता में होता है तो साहसी बन ही जाता है, लेकिन शायद यह सही नहीं है. भूपेश बघेल जब विपक्ष का हिस्सा थे तब भी बगैर किसी भय और दबाव के अपनी बात दमदारी के साथ रखते थे. बहुत से लोग बस्तर के माओवाद को लेकर डराने-धमकाने का काम करते हैं. मुझे याद है एक रोज वे खुली जीप में सवार होकर माओवादियों के सैन्य इलाके जगरगुड़ा जा धमके थे. इस खौफनाक इलाके में पुरानी सरकार के किसी भी मंत्री और नेता ने कभी दस्तक नहीं दी थी. कभी-कभार कुछ अफसर हेलिकाफ्टर से वहां जाने की हिम्मत दिखाते थे तो नक्सली हेलिकाफ्टर पर फायरिंग कर देते थे. यह सब लिखते हुए एक और बात याद आ रही है जो उनके बचपन से जुड़ी हुई है. एक बार उनके पैतृक गांव के मित्रों के बीच इस बात की शर्त लगी कि कौन बिच्छू का डंक तोड़ सकता है. भूपेश बघेल ने गांव के बाहर और भीतर पत्थरों के नीचे और पोखर के आसपास छिपे हुए सैकड़ों बिच्छुओं के डंक तोड़कर अपनी जेब के हवाले कर दिया था. 

बहरहाल छत्तीसगढ़ियों के भीतर साहस और सम्मान का भाव भरने वाले भूपेश बघेल नए ढंग से छत्तीसगढ़ को गढ़ने में लगे हुए हैं. प्रदेश की एक बड़ी आबादी उनके कामकाज और तौर-तरीकों पर भरोसा करती है. राजनीति के धुंरधर मानते हैं कि छत्तीसगढ़ में उनकी पारी बेहद लंबी रहने वाली है. छत्तीसगढ़िया भी अपनी उम्मीद को बरकरार रखना चाहते हैं. उम्मीद है तो सब कुछ है. उम्मीद पर दुनिया टिकी है.

उन्हें जन्मदिन की खूब सारी बधाई. 

 

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अमित जोगी की नैय्या भंवर में ?

राजकुमार सोनी

रायपुर. छत्तीसगढ़ में मरवाही विधानसभा उपचुनाव को लेकर उठा-पटक का दौर प्रारंभ हो गया है. फिलहाल चुनावी तैयारी के मामले में कांग्रेस की बढ़त दिखाई देती है. कोरबा के विधायक एवं राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल अपना मोर्चा डॉट कॉम से चर्चा में कहते हैं- आज किसी डायरी में लिखकर रख लीजिए. मरवाही से कांग्रेस ही जीत का परचम फहराएगी. जीत की वजह क्या होगी...पूछने पर जयसिंह कहते हैं- मैं इलाके के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हूं. क्षेत्र की जनता अमित जोगी को पसंद नहीं करती.

जयसिंह अग्रवाल की बातों में कितनी सच्चाई है इसका पता तो तब चलेगा जब चुनाव का परिणाम आएगा, लेकिन राजनीतिक प्रेक्षक भी मानते हैं कि जो इमेज पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की थीं वह अमित जोगी की नहीं है. नाम न छापने की शर्त पर कांग्रेस के एक वरिष्ठ सदस्य कहते हैं- जब अजीत जोगी चुनाव लड़ते थे तब भी इलाके के अधिकांश कार्यकर्ता अमित जोगी के खराब व्यवहार को लेकर शिकायत किया करते थे. वे तो अजीत जोगी थे जो सबको संभालकर चलने का हुनर जानते थे. अमित जोगी अपने पिता की इस कला से वाकिफ नहीं है. अब भी उनका व्यवहार वैसा ही है जैसा पहले था. कार्यकर्ताओं को झिड़क देना... उन पर क्रोधित हो जाना उनका शगल बन चुका है. कार्यकर्ता का मानना है कि अगर अमित जोगी अपनी अतिरिक्त बुद्धि का परिचय नहीं देते तो छत्तीसगढ़ में भाजपा के बजाय कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रहती. कार्यकर्ता का कहना है कि अजीत जोगी के देहांत के बाद अमित जोगी को सहानुभूति के थोड़े-बहुत वोट तो मिल सकते हैं, लेकिन यह वोट इतने ज्यादा भी नहीं होंगे कि  कांग्रेस को नुकसान हों. कांग्रेस के मीडिया प्रभारी शैलेश नितिन त्रिवेदी कहते हैं-पेंड्रा-गौरेला-मरवाही के जिला बन जाने के बाद क्षेत्र के लोगों को उनकी समस्याओं का समाधान मिल गया है. इसके अलावा क्षेत्र की पब्लिक कांग्रेस के विकास कामों से भी खुश है. त्रिवेदी आगे कहते हैं- मरवाही कांग्रेस की परम्परागत सीट है. चाहे कोई सूरत हो इस सीट पर कांग्रेस ही जीत दर्ज करेगी.

अभी कई कार्यकर्ता आएंगे कांग्रेस में

हालांकि अभी चुनाव तिथि की घोषणा नहीं हुई है बावजूद इसके जनता कांग्रेस के कार्यकर्ता कांग्रेस में लौटकर आ रहे हैं. अजीत जोगी के चुनाव संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ज्ञानेंद्र उपाध्याय के कांग्रेस में लौटकर आने के बाद जनता कांग्रेस में भगदड़ जैसी स्थिति कायम है. माना जा रहा है कि चुनाव आते-आते तक जनता कांग्रेस लगभग खाली हो जाएगी. इधर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी हर रोज मरवाही चुनाव की तैयारियों से अपडेट हो रहे हैं. क्षेत्र की प्रत्येक गतिविधि पर उनकी पैनी नजर है. कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने अपने दौरे में बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को मजबूत करने पर जोर दिया है. उनका मानना है कि जब प्रत्याशी अच्छा होता है तो कार्यकर्ता भी जी-जान लगाकर काम करता है. मरकाम कहते हैं- इस बार मरवाही की जनता को कांग्रेस एक ऐसा प्रत्याशी देगी जो उनके सुख-दुख का साथी होगा.

चुनाव बेहद अहम

बहरहाल विधानसभा चुनाव के बाद दंतेवाड़ा और चित्रकोट के उपचुनाव में भी जीत का परचम फहरा चुकी कांग्रेस के लिए मरवाही का चुनाव बेहद मायने रखता है. पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखाने में तब के कांग्रेस अध्यक्ष एवं वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीं. उनसे पहले कांग्रेस के जितने भी अध्यक्ष थे वे सब अजीत जोगी के सामने भींगी बिल्ली बने रहते थे, लेकिन भूपेश बघेल ने बेहद दमदार ढंग से उनके खिलाफ मोर्चा खोला और साबित किया कि जोगी के नाम का तिलिस्म एक भ्रम के अलावा और कुछ नहीं है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि यदि कांग्रेस मरवाही में जीत दर्ज कर लेती है तो भूपेश बघेल के कामकाज और उनकी राजनीतिक क्षमता पर न केवल मुहर लग जाएगी बल्कि सरकार के लंबे समय तक टिके रहने का संदेश भी दूर तक जाएगा. प्रेक्षकों का मानना है कि मरवाही चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और जोगी कांग्रेस के प्रत्याशी के बीच ही होगा. प्रदेश में अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत भाजपा भी चुनाव समर में उतरेगी, लेकिन वह तीसरे क्रम में होगी. पिछले चुनाव में भाजपा दूसरे क्रम में थीं.

 

 

 

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बेगुनाह आदिवासियों को मौत के घाट उतारने वाले कल्लूरी की जेब से पैसा निकालो और मुकदमा दर्ज करो !

रायपुर. बस्तर में अपनी पदस्थापना के दौरान फर्जी मुठभेड़ के जरिए आतंक का पर्याय रहे एसआरपी कल्लूरी एक बार फिर सुर्खियों में है. अभी हाल के दिनों में उनके नाम की चर्चा इस बात को लेकर है कि भाजपा के शासनकाल उन्होंने जिन सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हत्या का फर्जी मुकदमा दर्ज करवाया था उन सभी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने निर्दोष मानते हुए कांग्रेस की मौजूदा सरकार को मुआवजा देने को कहा है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के इस निर्देश के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्यों न मुआवजे की रकम कल्लूरी और उनके साथ अपराधिक कृत्य में लिप्त रहे अफसरों से वसूली जाय. सामान्य तौर पर किसी भी घटना के लिए सरकार ही सीधे तौर पर जवाबदेह होती है, लेकिन कई मामलों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल रहे अंग को भी जवाबदेह माना जाता है. अब से कुछ बरस पहले जब नर्मदा बचाओ आंदोलन में शामिल रहे ग्रामीणों को फर्जी मुकदमों के तहत जेल में ठूंसा गया था तब मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के जस्टिस श्री पटनायक ने उस समय के एसडीएम और लाठी चार्ज में शामिल रहे अफसरों से जुर्माना वसूलने का ऐतिहासिक निर्णय दिया था. कांग्रेस की मौजूदा सरकार भी चाहे तो कल्लूरी और उनके सहयोगी अफसरों की तनख्वाह से कटौती कर पीड़ितों को मुआवजे की राशि प्रदान कर सकती है. अगर ऐसा होता है तो यह उदाहरण झूठे मामले गढ़ने और बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतारने वाले अफसरों के लिए एक सबक होगा.

गौरतलब है कि वर्ष 2016 में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद, माकपा के राज्य सचिव संजय पराते, सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी, मंजू कोवासी और मंगल कर्मा आदिवासियों के मौलिक अधिकारों पर हनन और ज्यादतियों की शिकायतों का जायजा लेने के लिए बस्तर दौरे पर थे. दौरे के दौरान पहले तो उन्हें डराया-धमकाया गया, लेकिन जब सामाजिक कार्यकर्ता गांव-गांव घूमकर तथ्य एकत्रित करने लगे तब कुछ ग्रामीणों के जरिए दरभा थाने में इस बात की शिकायत दर्ज करवाई गई कि दिल्ली से आए हुए लोग ग्रामीणों को शासन के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि जिन दिनों कार्यकर्ताओं का बस्तर दौरा चल रहा था तब यह चर्चा भी कायम थीं कि कल्लूरी और अग्नि संस्था से जुड़े हुए लोग हत्या जैसी घटना को भी अंजाम दे सकते हैं. यही एक वजह थीं कि टीम के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर को अपनी पहचान और नाम बदलकर रहना पड़ा था. सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ ऐसा कोई वाक्या तो नहीं हुआ, लेकिन पांच नवम्बर 2016 को सभी के खिलाफ सुकमा जिले के नामा गांव के आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई. हालांकि यह एफआईआर शामनाथ की विधवा विमला बघेल की शिकायत पर दर्ज की गई थीं, लेकिन मामले की हकीकत यह थीं कि विमला ने अपनी रिपोर्ट में किसी भी शख्स का नाम नहीं लिया था.

इस घटना के बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने बचाव के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण ली. पूरे प्रकरण में जब छत्तीसगढ़ की पुलिस ने भी नए सिरे से पड़ताल की तो यह पाया कि सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हत्या का झूठा मामला दर्ज किया गया है. यही एक वजह थीं कि फरवरी 2019 में सभी के आरोप वापस लेते हुए एफआईआर से नाम हटा लिया गया. इधर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को मानसिक प्रताड़ना दिए जाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार को मुआवजा देने को कहा है. आयोग ने यह निर्देश तेलंगाना के अधिवक्ताओं और उस तथ्यान्वेषी दल के लिए भी दिया है जिन्हें माओवादियों की मदद करने के आरोप में सुकमा की जेल में बंद कर दिया गया था. मानवाधिकार आयोग के इस फैसले माकपा सहित अन्य कई संगठनों ने स्वागत किया है. माकपा के सचिव संजय पराते का कहना है कि भाजपा के शासनकाल में आदिवासियों के हितों के लिए काम करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बर्बर तरीके से कुचला गया था. जो कोई भी बस्तर की हकीकत को सामने लाने का प्रयास करता था उसे संघी गिरोह के लोग अपने राजनीतिक निशाने पर रखते थे और देशद्रोही होने का ठप्पा लगा देते थे. सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी कहते हैं- मानवाधिकार आयोग का फैसला साबित करता है कि सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा देने वाली भाजपा सरकार पूरी तरह से गलत थीं. उनका कहना है कि वरवर राव, सुधा भारद्वाज जैसे प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी निशाना बनाया गया है. विनीत तिवारी कहते हैं- कल्लूरी के साथ वे सभी अफसर जो फर्जी रिपोर्ट के खेल में शामिल थे उनसे मुआवजा तो वसूलना ही चाहिए...सभी पर मुकदमा भी दर्ज होना चाहिए.

 

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अगर वे ईसाई है तो क्या जीना हराम कर देंगे उनका ?

कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम का संज्ञान लेना बेहद जरूरी

रायपुर. छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल जिले कोण्डागांव के माकड़ी थाने के अधीन एक गांव है मोहन बेड़ा. इस गांव में गत चार महीनों से ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों पर प्रताड़ना का दौर चल रहा है. जाहिर सी बात है कि जब भी इस तरह की स्थिति पैदा होती है तो सबसे पहले अतिवादी संगठन से जुड़े लोग सक्रिय होते हैं. इस गांव में भी वही लोग सक्रिय हुए और उनका साथ दिया ग्राम पंचायत ने.

देश का संविधान इस बात की इजाजत देता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी निजी स्वतंत्रता के तहत किसी भी धर्म को स्वीकार कर सकता है. संविधान का सम्मान करते हुए ही इस गांव के राम वट्टी, लक्ष्मण वट्टी, पगनी वट्टी, तिहारिन वट्टी, लक्ष्मी वट्टी और चमारिन बाई वट्टी ने लगभग छह साल पहले ईसाई धर्म को अंगीकार कर लिया था. गांव के उक्त लोगों ने जब ईसाई धर्म स्वीकार किया तब किसी ने किसी भी तरह की आपत्ति नहीं जताई, लेकिन अचानक एक दिन उक्त सभी लोगों को पंचायत ने बुलाकर इस बात की धमकी दी कि यदि उन्होंने ईसाई धर्म को नहीं छोड़ा तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा. पंचायत का साफ-साफ कहना था कि या तो धर्म को छोड़ना होगा या फिर गांव ?

सामाजिक बहिष्कार

जब गांव उक्त लोगों ने पंचायत का फरमान मानने से इंकार कर दिया तो पंचायत ने सामाजिक बहिष्कार का फरमान सुना दिया. उन्हें गांव के हैडपंप से पानी लेने से रोक दिया गया. किराना दुकान वालों ने राशन व अन्य सामाग्री को बेचने से मना कर दिया. यहां तक जो किसान अपनी खेती पर अनाज उगाना चाहते थे उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया. प्रताड़ना से परेशान उक्त लोगों ने कई मर्तबा कलक्टर, पुलिस अधीक्षक व तहसीलदार को लिखित में शिकायत भेजी... लेकिन इस शिकायत का कोई असर नहीं हुआ. अभी हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ क्रिश्चयन फोरम की फैक्ट फाइडिंग टीम ने गांव का दौरा किया तब पता चला कि अधिकारी भी प्रताड़ित लोगों को ही ईसाई धर्म छोड़ने की धमकी-चमकी देते रहे हैं.

भाजपा शासनकाल से चल रहा है प्रताड़ना का दौर

कोण्डागांव में जो कुछ हुआ वह केवल एक बानगी है. मसीही समाज के साथ प्रताड़ना का यह दौर तब से चल रहा है जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थीं. कांग्रेस की सरकार बनने के बाद यह उम्मीद थी कि प्रदेश में रहने वाले सभी लोगों को अपने-अपने हिसाब से धर्म को चुनने और उसे मानने की आजादी रहेगी, लेकिन लगता तो यही है कि सरकार को बदनाम करने के लिए अफसर अतिवादी संगठनों की ही मदद कर रहे हैं. कोण्डागांव से मोहन मरकाम प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और विधायक भी है. उनकी छवि एक निर्विवाद और जुझारू नेता के तौर पर बनी हुई है. कोण्डागांव के ग्राम मोहन बेड़ा की घटना से जाहिर होता है कि कतिपय अतिवादी संगठन अफसरों के साथ मिली-भगत कर छवि को बट्टा लगाने के फेर में हैं. गांव में प्रताड़ित लोग अब भी अपनी खेती-बाड़ी करना चाहते हैं, लेकिन अतिवादी लोग घातक हथियारों से लैस होकर उन्हें रोकते हैं. पीड़ित लोगों ने थोड़ा प्रयास भी किया तो उनके साथ मारपीट की गई. उनका घर तोड़ दिया गया. यहां तक घर की महिला सदस्यों के साथ अभद्रता की गई. फैक्ट फाइड़िंग टीम ने सारे तथ्यों को एकत्र कर पीड़ित लोगों के साथ थाने जाकर रिपोर्ट करनी चाही तो वहां मौजूद थानेदार ने कह दिया- गांव का मामला है. गांव वाले आपस में निपट लेगें. आप लोग काहे नेतागिरी करते हो. जब टीम के सदस्यों ने रिपोर्ट के लिए जोर दिया तब भी कोई बात नहीं बनी. फोरम के सदस्यों की शिकायत एक सादे कागज में ले ली गई और कह दिया गया कि जांच करके बताएंगे. इस गांव में इसी महीने एक जुलाई को पीड़ित लोगों पर जयलाल,जगत,कौशल, जगदेव, मधली सहित कुछ और लोगों ने हमला किया था. पीड़ित पक्ष और फोरम की शिकायत के बाद भी पुलिस ने अब किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की है.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ क्रिश्चन फोरम ने प्रदेश के बस्तर सहित अन्य इलाकों के 17 से ज्यादा मामलों में उच्च न्यायालय में याचिका लगाई थीं. फोरम की याचिका के बाद उच्च न्यायालय ने मसीही समाज के अधिकार को सुनिश्चित करने का आदेश दिया था. फोरम ने इस आदेश की प्रति प्रदेश के सभी थानों और पुलिस विभाग के प्रमुख अफसरों को भेजी है, बावजूद इसके ईसाई समुदाय पर प्रताड़ना का दौर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. अभी कुछ समय पहले ही कोण्डागांव में ईसाई धर्म को मानने वाली एक महिला के साथ दुष्कर्म की घटना सामने आई थीं. पुलिस ने इसे जंगली जानवरों का हमला बताकर रफा-दफा कर दिया. ग्राम सोनाबेड़ा में भी कुछ लोगों को इसलिए प्रताड़ित किया गया क्योंकि वे ईसाई धर्म को मानने वाले है.छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल का आरोप है कि शासन के अधिकारी जान-बूझकर प्रताड़ना के मामलों में गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं. उनका कहना है जो भी अधिकारी इस तरह के कृत्य में लिप्त हैं उन्हें अदालत का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.

 

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नामचीन साहित्यकारों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अर्णब पर एफआईआर को जायज ठहराया

रायपुर. सांप्रदायिक उन्माद और वैमनस्यता फैलाने में जुटे एक टीवी चैनल के संपादक अर्णब गोस्वामी पर विभिन्न राज्यों में की गई एफआईआर को नामचीन साहित्यकारों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जायज ठहराया है. ज्यादातर लोगों का मानना है कि अर्णब को केंद्र की सत्ता का संरक्षण हासिल है इसलिए वे देश की गंगा-जमुनी तहजीब को नष्ट करने में लगे हुए हैं.

प्रख्यात पत्रकार पकंज चतुर्वेदी का कहना है- अर्णब और उनकी तरह के अन्य लोग जो पत्रकारिता का मुखौटा लगाकर नफरत और सांप्रदायिकता फैलाने के खेल में लगे हुए हैं उन पर नियंत्रण बेहद जरूरी है. ऐसे लोग देश और समाज का नुकसान कर रहे हैं. भले ही सुप्रीम कोर्ट ने अर्णब गोस्वामी को सोनिया गांधी के बारे में की गई टिप्पणी के लिए तीन हफ्ते की मोहलत दे दी है, लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि छत्तीसगढ़ में उनके खिलाफ एक मुकदमा राहुल गांधी के बयान को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने का भी है. यह बिल्कुल सटीक समय कि उस प्रकरण में अर्णब पर ठोस कार्रवाई कर दी जाय. उसे कम से कम तीन दिन जेल में रहने का अवसर मिलेगा तो दिमाग ठीक हो जाएगा.

रायगढ़ में रहने वाले साहित्यकार रमेश शर्मा का कहना है कि अगर अर्णब गोस्वामी पालघर घटना पर कुछ पूछना या बहस करवाना चाहते थे तो उन्हें महाराष्ट्र सरकार से या केंद्र सरकार से सवाल करना चाहिए था क्योंकि किसी भी अप्रिय घटना के लिए शासन-प्रशासन ही जिम्मेदार हो सकते हैं, पर पत्रकार अर्नब गोस्वामी ने ऐसा न करके इस बहस में देश की एक सम्मानित महिला सोनिया गांधी को बेवजह लपेट लिया. यहां तक कि इस घटना को इटली से जोड़ देना और इसे सांप्रदायिक रूप देना अत्यंत आपत्तिजनक मामला है. सोनिया गांधी न केवल एक सम्मानित परिवार से हैं जिनका कि देश के लिए बलिदान का इतिहास रहा है, साथ साथ वे एक महिला भी हैं और यह देश महिलाओं के सम्मान के लिए जाना भी जाता है. समूची बहस में अर्णब गोस्वामी की भाषा शैली भी अमर्यादित और अशोभनीय रही जिसके कारण एक महिला का सार्वजनिक रूप से सरासर अपमान भी हुआ,इससे लोग भी भीतर से आहत हुए। इस लिहाज से देखा जाए तो यह एफआईआर उचित है, क्योंकि अगर समय रहते ऐसी अमर्यादित बहसों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो इसके दुष्परिणाम भी देश और समाज को आगे भुगतने होंगे. 

देश के चर्चित कवि आलोक वर्मा का कहना है कि अर्णव जैसे लोग एक रात में नहीं बनते. इन पर मिलकर सामूहिक शांतिपूर्ण असहमति और विरोध धर्मनिरपेक्ष दलों और लोगों को बहुत पहले ही दर्ज करना था. आज हमारी बहुआयामी बहुधर्मी सांस्कृतिक विरासत को आघात पहुंचाने वाले ऐसे लोग भारतीय समाज में फैल गए हैं. योजनाबद्ध तरीकों से  इन्हें बनाया और फैलाया भी गया है. इन पर  सारी जनता की मिलकर शांतिपूर्ण सामूहिक कार्यवाहियां हमारे देश को बचाने के लिए हर हाल में जरूरी हैं. हर शहर मे"सर्वधर्म सेना "या संगठन बनाने की जरूरत है जो पूर्णतया अराजनीतिक और शांतिपूर्ण होने के साथ सारे धार्मिक समुदायों के लोगों को साथ ले उनमे आपसी संवाद बढ़ा सके  औऱ आपसी भ्रम दूर कर सके. सब सबके त्योहारों,दुखों में शामिल हों ताकि साम्प्रदायिक शक्तियां कामयाब न हो सकें. यह संगठन पीड़ित जन के साथ होकर उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कानूनी,आर्थिक  सहयोग भी दे ताकि ऐसे लोग न डरें ,न अकेले पड़ें. आज यदि सब साथ न होंगे तो आगे खतरा सारी सीमाएं लांघ जाएगा,,,।

देश के एक प्रमुख कथाकार मनोज रुपड़ा का कहना है कि अर्नब गोस्वामी बहुत पहले से अनर्गल गोस्वामी बन गए थे, लेकिन उनकी अनर्गल बातों पर आपत्ति उठाने की बात सिर्फ सोशल मीडिया में ही होती रही. किसी तरह की ठोस जमीनी कार्रवाही किसी ने नहीं की. अब बात सिर्फ़ अर्णब गोस्वामी तक बात सीमित न रह जाए बल्कि पूरे मीडिया की भाषा उनके भड़काऊ तेवरों और गैर जिम्मेदार और लोकतंत्र विरोधी रवैए की भी सभी स्तर पर ख़बर लेने की जरूरत है .पहले भड़काऊ बयानबाजी सिर्फ़ नेता करते थे अब नेताओं ने चुप्पी ओढ ली है और कुछ एंकरों को ये जिम्मेदारी दी दी है. अर्नब और उनके जैसे अन्य एंकरो को पत्रकार मानना पत्रकारिता की तौहीन है .

देश के नामचीन कथाकार कैलाश बनवासी कहते हैं- जैसी स्तरहीन,मूल्यहीन और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर चरित्र हनन या सांप्रदायीकरण की घटिया पत्रकारिता गोस्वामी अर्णब या अन्य नामधारी पत्रकार  बेखौफ होकर कर रहे हैं,वह आज और भविष्य की बेहद डराने वाली वर्चस्ववादी, अहमंन्यतावादी और अलोकतांत्रिक पत्रकारिता का नमूना है.असहमति और विरोध को इस निम्नस्तर पर लाकर की जाने वाली पत्रकारिता इन दिनों 'जहरबाद'--परजीवी बेल--की तरह सत्ता-वृक्ष के सहारे फल-फूल रही है. यह लोकतंत्र के लिए  बहुत घातक है. प्रश्न यह है कि इनकी ऐसी तथाकथित अभिव्यक्ति पर लगाम कैसे लगे ? किसी राजनैतिक दल के द्वारा किया गया ऐसा प्रयास-एफआईआर 'राजनैतिक दुर्भावनावश' की भेंट चढ़ जाता है. इसके बावजूद ऐसा समाज-देश के हित चिंता में लगे लोगों या संस्थाओं द्वारा किया जाना बेहद जरूरी है ताकि इनके काम-काज के तौर-तरीकों को जनता के सामने चर्चा में लाया जा सके. यह जनता के चिंतन का विषय बने और इससे समाज की बेहतरी के नतीजे सामने आए. मैं अर्नब पर हमले का समर्थन नहीं करता वह हर हाल में निंदनीय है. जरुरत इस बात की ज्यादा हो गई है कि लोगों की विज्ञान सम्मत तर्कशीलता,विवेक, सामाजिकता और न्याय चेतना अधिकाधिक उन्नत और मुखर हो. जो किसी भी मीडिया के गोदी मीडिया बन जाने का प्रबल विरोध करें. मुझे लगता है गोस्वामी पर की गई एफआईआर को राजनैतिक विद्वेष के चश्मे से नहीं बल्कि सुदृढ़ लोकतंत्र और स्वस्थ पत्रकारिता के बचाव के एक उपक्रम के रुप में देखा जाना चाहिए. इसके दायरे में सिर्फ वही नहीं उस जैसे तमाम लोग आने चाहिए. 

युवा कवि, कथाकार और आलोचक बसन्त त्रिपाठी कहते हैं- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लेखक, कलाकार या पत्रकार का ही नहीं बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है. लेकिन इसमें अन्य नागरिक या समुदाय की गरिमा का सम्मान भी अंतर्निहित है. भारत के कई मीडिया घरानों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर घृणा-वमन का जो रूप विकसित किया है उसका ताज़ा उदाहरण है अर्नव गोस्वामी का संतों की लिंचिंग से संबंधित रपट. कहा जाता है कि राजा से अधिक निष्ठावान उसके वफादार होते हैं. अर्नव गोस्वामी जैसे लोग पत्रकार के भेस में ऐसे ही वफादार लोग हैं. पत्रकार का काम खबर देना होता है लेकिन अर्नव जैसे लोग खबर देने की बजाय खबर बनाने की राजनीतिक योजना में आकंठ डूबे हुए हैं. इन लोगों ने अपनी रिपोर्ट को नस्ली और सामुदायिक हिंसा के प्रचार का परचम बना रखा है और उदासीन और असावधान लोगों को नफरत के अग्नि-कुंड में ढकेल रहे हैं. यदि जनता चैनल बदलने का अपना विवेक खो चुकी है तो बहुत आसानी से इनके जाल में फँस सकती है, फँसती है. और फिर उनका राजनीतिक इस्तेमाल करने के लिए सत्ताएँ तो खड़ी ही हैं ! ये लोग पत्रकार नहीं हैं भाड़े के टट्टू हैं. ये उन शैतानों की तरह हैं जो लोगों को डसकर उनके खून में अपनी शैतानियत रोप कर, उन्हें भी अपने जैसा बना देते हैं. ऐसे तमाम लोगों को, जो किसी भी धर्म अथवा समुदाय के प्रति विष उगलते हैं, कोर्ट के कटघरे में खींच लाना ज़रूरी है. इन पर नकेल कसना ज़रूरी है. अन्यथा आने वाले दिनों में 'अन्यों' के खून के प्यासे दरिंदे हर जगह घूमते हुए दिखाई पड़ेंगे.

समकालीन जनमत के संपादक केके पांडेय का कहना है- अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले होना दुर्भाग्यपूर्ण है और किसी ख़बरनवीस को  सही खबर लिखने या दिखाने के लिए प्रताड़ित किया जाना जिसमें मानसिक उत्पीड़न से लेकर हत्या तक शामिल है, गलत है. लेकिन जब ख़बरनवीसी या पत्रकारिता खबर को खबर की तरह नहीं बल्कि इस या उस पक्ष का पक्षकार दिखने की कोशिश में लग जाए तो उस पर प्रतिक्रिया भी जरूरी है. फिलहाल जो मामला रिपब्लिक टीवी और उससे जुड़े अर्णव गोस्वामी का है, वह इस दायरे से भी बाहर का है. यहां मामला खबरनवीसी का है ही नहीं. यहां तो एक मीडिया समूह और उसका पत्रकार, पत्रकारिता की जगह अपनी स्थिति का फायदा उठाकर न सिर्फ गलत बयानी बल्कि समाज के भीतर घृणा फैलाने और तमाम  व्यक्तियों और समुदायों को नफ़रत जनित हिंसा में धकेल देने की साजिशाना हरकत करते हुए दिखाई देता है और यह लगातार हो रही प्रक्रिया है. ऐसे में न सिर्फ ख़बरनवीसी की साख को धक्का लगता है बल्कि यह आपराधिक कृत्य की तरह सामने आता है. खबरनवीसी का यह चेहरा तमाम पत्रकारों और पत्रकारिता के पेशे पर खतरा बन कर आया है। हमें इसका मुकाबला करना ही होगा।

क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के महासचिव तुहिन देब कहते हैं- अर्णब गोस्वामी  सत्ताधारी संघी कॉर्पोरेट फॉसिस्टों का गोएबल्स की तरह का भोम्पू प्रचारक है. अर्नब ,सुधीर और दीपक चौरसिया जैसे शर्मनाक गोदी मीडिया के कारण ही आज जारी प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत का स्थान दो पायदान नीचे चले गया है. अर्णब  जैसे तथाकथित पत्रकार जो आरएसएस और बीजेपी का तलवा चाटते हैं उनपर अंकुश लगाना जरूरी है. लेकिन उनके खिलाफ एफआईआर या जनमत तैयार करने का काम तो बहुत पहले हो जाना चाहिए था. सिर्फ सोनिया ग़ांधी के खिलाफ विषवमन करने पर ही क्यों ये किया गया? मुसलमानों और प्रगतिशील लोगों  के खिलाफ नफरत पैदा करने का अपराध तो ये सत्ता के दलाल पिछले छह सालों से कर रहे हैं.

प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े कवि संजय शाम कहते हैं- अर्णब गोस्वामी पर देश भर में हो रहे एफआईआर को समझने के लिए यह समझना भी जरूरी है कि किसी लोकतांत्रिक देश में कोई  पत्रकार बेमतलब के राग द्वेष के साथ पत्रकारिता कैसे कर सकता है ? एक पत्रकार काम समाचार देना उसका विश्लेषण करना और जनता तक खबर की पूरी सच्चाई को पहुंचाना होता है. शायद इसी जिम्मेदारी के कारण पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. किसी भी अधिकार के साथ उसका दायित्व बराबर जुड़ा होता है और अगर किसी पत्रकार को सूचना प्रदान करने का अधिकार है तो जाहिर है उसका दायित्व भी है कि वह सच बताएं ना कि एक राजनीतिक पार्टी के अंध भक्तों की तरह दूसरी विचारधारा के लोगों दलों और नेताओं पर  भाषा की सारी तमीज को दरकिनार कर अमर्यादित अनर्गल आरोप लगाएं. दुर्भाग्य से आज ज्यादातर मीडिया सत्ता और सत्ता प्रतिष्ठानों के मोहपाश या किसी भय के अधीन पत्रकारिता की मर्यादाओं को तक में रखकर  अपने आकाओं  को खुश करने के लिए दूसरे पर कुछ भी भद्दे असंसदीय आरोप लगाने के खेल में लगे हुए हैं.आज की मीडिया का यह आम चरित्र हो गया है जिसे किसी भी न्यूज को देखते- सुनते हुए सहज ही महसूस किया जा सकता है. ऐसे में जब दूसरा वर्ग लोकतांत्रिक रूप से अपने सम्मान को चोट पहुंचाने वाले के विरुद्ध कानून का सहारा लेकर न्याय संगत ,विधि सम्मत विरोध दर्ज करता है तो यह एक वाजिब रास्ता है. लोकतंत्र में विरोध का सम्मान अति आवश्यक है लेकिन इसकी एक सीमा है जाहिर है अर्णब जैसे लोगों की वजह से सब्र का बांध टूट गया है.

प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता संकेत ठाकुर अर्णब गोस्वामी के न्यूज पढ़ने पर ही प्रतिबंध लगाने की मांग करते हैं. वे कहते हैं- अर्णब की आक्रामक और अपमानजनक शैली ने पत्रकारिता के मापदंडों को निम्नतम स्तर पर उतार दिया है. एक न्यूज एंकर जब स्वयं ही अदालत लगाकर फैसला सुनाने लगता है तो यह प्रश्न स्वाभाविक ढंग से कौंधता है कि फैसला सुनाने वाला अदालत में वकील क्यों नहीं बन जाता? यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के बड़े राजनीतिज्ञों पर ओछी टिप्पणी करके सस्ती लोकप्रियता और टीआरपी बढ़ाने का  शर्मनाक तरीका अर्नब गोस्वामी  ने टीवी पत्रकारिता में स्थापित कर दिया है. आज जबकि उच्च मापदंडों को पत्रकारिता के क्षेत्र में स्थापित करने की आवश्यकता है तो ऐसा पत्रकार, पत्रकार ही बना रहे चाटुकार नहीं. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर निजी टिप्पणी व बाद में निम्नस्तरीय बातें करना सामाजिक-राजनैतिक मर्यादा के प्रतिकूल है.अर्णब गोस्वामी जैसे पत्रकारों को तत्काल पत्रकार जगत से विदा करने की आवश्यकता है. बेहतर होता कि माननीय न्यायालय  कोई ऐसा फैसला सुनाती  जिसमें अर्नब जैसे लोगों पर न्यूज़ पढ़ने का प्रतिबंध लगता.

युवा कवि अंजन कुमार कहते हैं- किसी भी लोकतांत्रिक देश का मुख्य आधार उसकी जनता होती है. लोकतंत्र को बनाए और बचाए  रखने के लिए जनता को उसके के प्रति जागरूक और सचेत बनाये रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मीडिया और उससे जुड़े पत्रकारों की होती है. लेकिन इधर पिछले कई वर्षों से हुए तमाम घटनाओं और उस पर मीडिया के नजरिए से ये साफ देखा जा रहा है कि मीडिया अपने  सामाजिक सरोकारों को भूलकर जनता के हित में कार्य करने की जगह झूठे खबरों और उत्तेजक बयानबाजी में लगी हुई है. जिसके कारण जनता ग़ुमराह होकर उन्मादी भीड़ में तब्दील होती जा रही है। झूठे और फर्जी खबरे इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि  आज पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया  है. अब लोगों का भरोसा पूरी तरह से मीडिया से उठ चुका है. उसकी निष्पक्षता अब बची नहीं रह गई. मीडिया की यह खराब स्थिति धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लोकतांत्रिक व्यवस्था लिए सबसे अधिक घातक है. जिसे बचाये रखने के लिए अर्नब गोस्वामी जैसे तमाम पत्रकारों पर अंकुश लगाने की बेहद जरूरत है. ताकि पत्रकार अपनी मर्यादा में रहकर संयमित और निष्पक्ष पत्रकारिता करे.

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आखिरकार नफरत फैलाने के आरोप में अर्णब गोस्वामी पर मामला पंजीबद्ध

स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव और कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने दर्ज करवाई एफआईआर

रायपुर. अपनी भड़काऊ और नफरत फैलाने वाली खबरों के लिए मशहूर रिपब्लिक टीवी और उसके प्रमुख एकंर ( एडिटर ) अर्णब गोस्वामी पर छत्तीसगढ़ पुलिस ने बुधवार को भारतीय दंड संहिता की धारा 153- ए, 295 ए और 505 ( 2 ) के तहत मामला पंजीबद्ध कर लिया है. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष मोहन मरकाम की शिकायत के बाद पुलिस ने देर शाम यह एफआईआर दर्ज की है.

स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव और अध्यक्ष मोहन मरकाम ने सिविल लाइन थाने में शिकायत करते हुए कहा कि अर्णब गोस्वामी ने अपने टीवी चैनल रिपब्लिक भारत में पूछता भारत शीर्षक से एक कार्यक्रम चलाया था. इस कार्यक्रम के बहाने उन्होंने पालघर में घटित हुई घटना का जिक्र करते हुए कहा कि इस घटना के बाद सोनिया गांधी खामोश क्यों है. अर्णब ने अपने इस कार्यक्रम में समुदाय विशेष के बीच नफरत फैलाने के लिहाज से कई ऐसी बातों का जिक्र किया जिसका उल्लेख इस समाचार में नहीं किया जा सकता है. ( यह लिखा जाना भी एक तरह से सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने जैसा है. )

शिकायतकर्ताओं ने कहा कि ऐसे समय जबकि पूरा देश कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है तब अर्णब गोस्वामी ने पूरे देश को धर्म के आधार पर दंगा करने के लिए उकसाया और उन्माद पैदा किया. शिकायतकर्ताओं ने बतौर सबूत रिपब्लिक भारत टीवी का वीडियो भी सौंपा है.

मुख्यमंत्री ने कहा- फर्जी रिपल्बिक को सबक सिखाने में सक्षम है

इधर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक टिव्हट में कहा है- रिपल्बिक और भारत टीवी के संपादक अर्णब गोस्वामी के इस अनर्गल बकवास को क्या पत्रकारिता कह सकते हैं. यह तो सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का कुत्सित प्रयास है. न भाषा की मर्यादा और न ही किसी मान मर्यादा का ध्यान. यह तो अपराध है. संज्ञेय और दंडनीय अपराध. भूपेश बघेल ने आगे लिखा है- हमारे रिपब्लिक का कानून फर्जी रिपल्बिक को सबक सिखाने में सक्षम है.

वायरस का इलाज जरूरी

मंगलवार को भी कांग्रेसजनों रायपुर के सिविल लाइन में अर्णब गोस्वामी के खिलाफ एफआईआर करने के लिए शिकायत सौंपी थीं. यह शिकायत इस बात पर आधारित है कि अर्नब गोस्वामी ने राहुल गांधी की पत्रकार वार्ता को गलत ढंग से प्रस्तुत किया जिसकी वजह से लोग गुमराह हुए. खबर है कि पुलिस ने चंद्रशेखर शुक्ला और गिरीश दुबे की शिकायत पर इस मामले में भी अपराध पंजीबद्ध कर लिया है. 

छत्तीसगढ़ में इन दिनों अफवाह आधारित खबरों से लोगों को गुमराह करने और भ्रम फैलाने वालों की शामत आई हुई है. महाराष्ट्र में एक चैनल के संवाददाता की गिरफ्तारी के बाद छत्तीसगढ़ में भाजपा से जुड़ी विश्वनंदिनी पांडेय और फेसबुक पर निशा जिंदल बनकर सांप्रदायिक पोस्ट करने वाले रवि पुजार पर अपराध पंजीबद्ध किया गया है. इधर कोरोना काल में एक पोर्टल और एक अन्य टीवी चैनल के खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया गया है. छत्तीसगढ़ सरकार की ताबड़तोड़ कार्रवाई को देखते हुए लगता तो यही है कि खबरों के जरिए नफरत का जहर फैलाने और जनसामान्य को गुमराह करने वाले बहुत से अखबार और टीवी चैनलों के मालिक- संवाददाताओं पर गाज गिर सकती है. छत्तीसगढ़ सरकार की इस तरह की कार्रवाई को देश की एक बड़ी आबादी बेहद अच्छे ढंग से देख रही है और उनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया भी मिल रही है. सोशल मीडिया में सरकार के साहस भरे कदम की सराहना हो रही है. जबकि मुख्यधारा का कथित मीडिया इस तरह की खबरों को छापने से डर रहा है कि न जाने कल क्या हो? समुदाय विशेष के बीच नफरत का जहर बोने वाले कतिपय मीडियाकर्मी और राजनेता बुरी तरह से बिलबिला भी रहे हैं. वे दूरभाष के जरिए इस चर्चा में भी तल्लीन है कि सरकार मीडियाकर्मियों पर शिकंजा कस रही है. जबकि बहुत से लोगों का मानना है कि मीडिया में कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक वायरस मौजूद है. ऐसे सभी वायरस का इलाज अब जरूरी हो चला है. छत्तीसगढ़ ने ऐसे वायरसों से निपटने में एक नई राह दिखाई है.

 

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अर्नब गोस्वामी के खिलाफ थाने में शिकायत... गिरफ्तारी के लिए टीम जल्द रवाना होगी दिल्ली

रायपुर. अफवाह आधारित खबरों से सांप्रदायिकता फैलाने और लोगों को गुमराह करने वाले अखबार तथा टीवी चैनलों के मालिक- संवाददाताओं के बुरे दिन आ गए हैं. देश की एक बड़ी आबादी का भी मानना है कि देश की गोदी मीडिया गंगा-जमुनी तहजीब से खिलवाड़ करने में जुटी है, इसलिए नफरत का जहर उगलने वाले हर उस शख्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई बेहद जरूरी है जो भाई-चारे का खात्मा करने में लगी हुई है. महाराष्ट्र में एक चैनल के संवाददाता की गिरफ्तारी के बाद हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ पुलिस ने भी भाजपा से जुड़ी विश्वनंदिनी पांडेय और फेसबुक पर निशा जिंदल बनकर सांप्रदायिक पोस्ट करने के आरोप में रवि पुजार पर मामला दर्ज किया है. इधर मंगलवार को छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने रिपल्बिक भारत टीवी के प्रमुख एंकर अर्नब गोस्वामी के खिलाफ सिविल लाइन थाने में एक शिकायत दी है. हालांकि यह शिकायत इस बात पर आधारित है कि अर्नब गोस्वामी ने राहुल गांधी की पत्रकार वार्ता को गलत ढंग से प्रस्तुत किया. कांग्रेस का आरोप है कि अर्नब गोस्वामी ने करोना महामारी के दौरान देश के लोगों को गुमराह किया है फलस्वरूप उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 153 बी 188 290 500 504 और 505 के साथ-साथ डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत मामला दर्ज किया जाय. पुलिस सूत्रों का कहना है कि शिकायत की पड़ताल के बाद गोस्वामी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की जा सकती है. सूत्र बताते कि रिपोर्ट दर्ज होने के बाद ही पुलिस टीम अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी के लिए दिल्ली रवाना होगी.

उल्लेखनीय है कि 16 अप्रैल को राहुल गांधी ने कोरोना बीमारी पर पत्रकारों के सवालों का जवाब देने के लिए एक वीडिया वार्ता आयोजित की थी.इस पत्रकार वार्ता की पूरी रिकॉर्डिंग यूट्यूब पर उपलब्ध है. उन्होंने इस पत्रकार वार्ता में कहा था कि टेस्टिंग को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन का अनुसरण किया जाना चाहिए और सरकार को टेस्टिंग बढ़ाना चाहिए ताकि कोरोना के फैलाव का सही आकलन कर उसे रोका जा सके. उन्होंने यह भी कहा था कि टेस्टिंग बढ़ाए बिना किसी के लिए भी यह संभव नहीं होगा कि फैलाव किस तरह से हो रहा है कहां हो रहा है और लॉक डाउन हटने के बाद यह महामारी फिर से फैलना शुरु कर देगी. उन्होंने दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे देशों के मुकाबले भारत में टेस्टिंग सुविधा और टेस्टिंग करने वाले लोग बढ़ाए जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया था.

राहुल गांधी के द्वारा कोरोना से लड़ने को लेकर जो तथ्य बताए गए थे उनकी पुष्टि प्रोफेसर स्टीव हैंग जॉन हापकिंस यूनिवर्सिटी जैसे अन्य विशेषज्ञों के द्वारा भी पूरे विश्व में की गई जो कि करोना महामारी को फैलने से रोकने के काम में लगे हुए हैं. उनकी यह राय भी थी कि बिना समुचित टेस्टिंग सुविधाओं के केवल देश को लॉक डाउन करना करोना  महामारी से उत्पन्न समस्या का समाधान नहीं हो सकता. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गरीबों के खाते में सीधे धन जमा किए जाने की जरूरत पर भी बल दिया था ताकि महामारी के कारण आ रही आर्थिक कठिनाइयों से गरीब वर्ग निपट सकें.

कांग्रेस का कहना है कि राहुल गांधी की इस खबर को सही ढंग से प्रस्तुत करने के बजाए अर्णव गोस्वामी ने जानबूझकर पूरी पत्रकार वार्ता को गलत प्रस्तुत किया और कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में देश के लोगों को गुमराह किया. अर्णव गोस्वामी ने अपने एक कार्यक्रम में यह बताया कि राहुल गांधी का टेस्ट बढ़ाने का सुझाव पूरी तरीके से गलत है. कांग्रेसजनों ने यह माना कि यदि लोग अर्नब गोस्वामी और उनके टीवी चैनलों पर भरोसा करके  टेस्टिंग को अनावश्यक समझ लेंगे तो इससे देश के करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ेगा.

कांग्रेस का यह भी मानना है कि पूरे देश में अपनी जान जोखिम में डालकर करोना की टेस्टिंग में लगे चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मचारियों पर लगातार हमले की घटनाएं घटित हो रही है. यह अर्नब गोस्वामी और उनके टीवी चैनल के गलत प्रचार की वजह से भी हो सकता है.

कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी का कहना है कि अपने राजनैतिक स्वामियों के हित साधन और निर्देशों के पालन में अर्नब गोस्वामी ने जानबूझकर महामारी की टेस्टिंग के मामले में गलत रिपोर्टिंग की जिसके कारण भारत की करोना महामारी के खिलाफ लड़ाई पर दुष्प्रभाव पड़ा है. त्रिवेदी का कहना है कि गोस्वामी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया कि राहुल गांधी लॉकडाउन के खिलाफ हैं जो पूरी तरीके से आधारहीन और असत्य है. बहराल कांग्रेस के प्रभारी महामंत्री चंद्रशेखर शुक्ला, शहर जिला अध्यक्ष गिरीश दुबे और वरिष्ठ कांग्रेस नेत्री अधिवक्ता किरणमयी नायक ने सिविल लाइन थाने में शिकायत देकर कार्रवाई की मांग की है.

 

 

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कोरोना से युद्ध में इस्लामोफोबिया ने भारत के वार को बनाया भोथरा

- राणा अयूब

कोरोनावाइरस के खिलाफ़ युद्ध में भारत के वार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रवादी शासन के लक्षण- भेदभाव और इस्लामोफाबिया- की भेंट चढ़ते देर नहीं लगी। ट्विटर पर कोरोनाजिहाद और बायोजिहाद की बाढ़ आ गयी है। मुसलमानों के एक समारोह में कोविद-19 के मामलों से इसकी शुरुआत हुयी है।

रविवार को भारत सरकार ने एक हजार से अधिक मामले एक मुस्लिम मिशनरी समूह तबलीगी जमात से जोड़ दिये। भारत सरकार द्वारा स्वास्थ्य आपातकाल और उसके बाद राष्ट्रव्यापी लाॅक डाउन घोषित किये जाने के कई दिन पहले, 8 से 10 मार्च तक इस समूह ने निजामुद्दीन के एक सामुदायिक भवन में अपना वार्षिक सम्मेलन किया था। हाँलाकि मुसलमानों समेत अधिकतर लोग इस बात से सहमत हैं कि वार्षिक सम्मेलन आयोजित करना गैर-जिम्मेदाराना और अनेकों के जीवन को खतरे में डालना था, पर इसकी आलोचना में इतना ज़हर उँडेला गया कि उस सम्मेलन के प्रति ज्यादती हो गयी। सच पूछें तो मुसलमान रातोंरात भारत में कोरोनावइरस फैलाने के गुनाहगार बन गये।

इस बात पर कोई तवज्जुह नहीं दिया जा रहा है कि इसी दौरान कई ज़िन्दगियों को ज़ोखिम में डालते हुये पूरे भारत में विभिन्न धार्मिक समूहों ने मन्दिरों में भी भीड़ इकट्ठा की थी। मध्यप्रदेश में दुबई से आये हुये एक युवक ने 20 मार्च को 1200 लोगों के साथ हिन्दू कर्मकांड किये थे जिसके चलते 25,000 लोगों को क्वारैंटाइन करना पड़ा। टाइम पत्रिका के अनुसार कोरोनाजिहाद का हैशटैग लगभग 3,00,000 बार देखा गया और इसे 16.5 करोड़ लोगों ने देखा। इसके अलावा रबायो जिहाद जैसे हैशटैग भी चले हैं।
इसके बाद जब मोदी-मंत्रिमंडल के केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने तबलीगी जमात को ‘‘तालीबानी अपराध’’ घोषित कर दिया तो इस नफ़रत को आधिकारिक समर्थन मिल गया।

अनेकों समाचार चैनलों के लिये हमले वाली खबर के रूप में पर्याप्त मसाला मिल गया। फ़र्ज़ी कहानियां चलने लगीं कि वाइरस को फैलाने के लिये मुसलमान, लोगों के ऊपर थूक रहे हैं। बताया गया कि अस्पतालों में महिला कर्मचारियों के सामने मुसलमान अपना नंगा बदन दिखा रहे हैं। जबतक इन कहानियों का पर्दाफ़ाश किया जाता, उससे पहले ही ये लाखों लोगों में फैल गयीं।

मेरी अपनी बिल्डिंग में ही एक पड़ोसी ने एक सामुदायिक व्हाट्सऐप समूह में लिख दिया कि पूरे दिन के कर्फ्यू  के बाद अपनी बालकनी में थालियां बजाने के मोदी के आह्वान का मतलब है कि हिन्दू मस्जिदों के अजान के शोर को अब और अधिक बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।

भारत के एक बड़े समाचार चैनल, इंडिया टुडे ने एक ग्राफिक चलाया जिसमें एक गोल टोपी और मास्क पर लाल रंग में बड़ा सा वाइरस बना था और दावा किया गया था कि भारत में कोरोनावाइरस मुसलमानों के द्वारा ही फैलाया गया है। न्यूज़लाॅन्ड्री वेबसाइट के मालिक मशहूर सम्पादक मधु त्रेहन ने भी फ़र्ज़ी दावा किया है कि देश के 60 प्रतिशत कोरोनावाइरस के मामलों के लिये मुसलमानों की जमात ही जिम्मेदार है और मुसलमानों का यह कहते हुये मजाक उड़ाया है कि ‘‘आप तो मस्त रहिये।’’ (यू कैन हैव योर वर्जिन्स)।

इस्लामोफोबिया के ज़हरीले प्रदर्शन को शीघ्र ही न्यायालयों के आदेशों में भी जगह मिल गयी। गुजरात उच्च न्यायालय के 3 अप्रैल के आदेश में कहा गया कि इस महामारी को देश में फैलाने के लिये मुसलमानों की जमात ही जिम्मेदार है।

समाचार चैनलों और सोशल मीडिया में चल रहे नफ़रतों के दौर के वास्तविक परिणाम भी रहे। बताया जाता है कि एक नवजात की मृत्यु एम्बुलेंस में ही इसलिये हो गयी कि उसके परिवार के मुसलमान होने के कारण अस्पताल ने उसे भर्ती करने से मना कर दिया था। उसके पति इरफान खान ने अखबार को बताया कि ‘‘मेरी गर्भवती पत्नी पूरे दिन से थी। उसे सीकरी से जिला मुख्यालय के जनाना अस्पताल के लिये रिफर कर दिया गया था, लेकिन यहाँ डाॅक्टरों ने कहा कि हम लोग मुसलमान हैं इसलिये हमें जयपुर जाना होगा।’’

3 अप्रैल को एक मुसलमान ने इसलिये आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके गाँव के लोगों ने उसका यह कहते हुये सामाजिक बहिष्कार कर दिया था कि उसके सम्पर्क दिल्ली में मुस्लिम जमात के उन सदस्यों के साथ थे जिनको बाद में टेस्ट में पाॅजिटिव पाया गया था।

सच तो यह है कि इस्लामोफोबिया कोई नयी चीज नहीं है। अभी फरवरी में ही नयी दिल्ली में मुस्लिम विरोधी दंगे भड़क उठे थे जिसमें 50से अधिक लोगों की मृत्यु हो गयी थी। जिस समय हमारा पड़ोसी चीन इस महामारी से दो-दो हाथ कर रहा था, उस समय भारत मोदी की सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों के नफ़रती भाषणों की आग में जलता हुआ अन्तर्राष्ट्रीय सुर्खियों में था। एक भी अपराधी पकड़ा नहीं गया। लेकिन मुस्लिम जमात के सदस्यों पर क्रूर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून थोप देने में भारतीय पुलिस को केवल एक दिन लगा।

15 मार्च को मैंने ट्विटर पर लिखा थाः ‘‘नैतिक रूप से भ्रष्ट देश में वाइरस के लिये किसी को मार डालने लायक बचा ही क्या है।’’ मैं सत्तारूढ़ पार्टी के उन सदस्यों द्वारा फैलायी गयी नफ़रत पर अपनी हताशा और अवसाद का इज़हार कर रही थी जिन्होंने सारे गुनाह माफ की व्यापक अवधारणा के साथ दिल्ली में दंगे भड़काये थे। मेरी इस नाराजगी का फौरी असर यह हुआ कि एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के साथ न्याय का गर्भपात हो गया। मेरी नाराजगी का निशाना वे लोग थे जो सत्ता में थे, जिनकी जनता में कोई आवाज़ थी लेकिन इस नाइन्साफी के सामने उन्होंने खामोशी ओढ़ ली। दिल्ली दंगों को मुस्लिम विरोधी नरसंहार कहे जाने पर सभी मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ गये थे, चाहे वे उदारवादी हों या दक्षिणपंथी। एक टेलीविज़न एंकर ने मेरे ऊपर तंज किया किः ‘‘एक बार तो मुसलमान की तरह नहीं, भारतीय की तरह व्यवहार करो।’’

मेरा डर सभी नागरिकों के प्रति है, लेकिन मुझे पता है कि बहुत से लोग मेरे बारे में और मेरे समुदाय के बारे में ऐसा नहीं सोचते।

पिछले 10 दिनों में मैंने भारत की झुग्गी बस्तियों से समाचार दिये हैं जहाँ सोशल डिस्टेंसिंग एक विशेषाधिकार है, यह बहुत सारे लोेगों की क्षमता से बाहर है। इस महामारी के दौर में भुखमरी, यंत्रणा, गरीबों के खिलाफ संरचनात्मक भेदभाव ही समसामयिक मुद्दे हैं। भारत और पूरी दुनिया इसी के बारे में सुनना चाहती है और इसी पर काम करना चाहती है।

लेकिन इस समय, जबकि लाॅकडाउन के लगभग दो हफ्ते हो चुके हैं, आस्था, वर्ग, लिंग से परे हर भारतीय का जीवन खतरे में है, तो मुझे मजबूरन पूर्वाग्रह और बहुसंख्यकवाद पर, जिसपर मैं इस स्तम्भ में लगातार लिखती आ रही हूँ, एकबार फिर लिखना है। यह दुर्भाग्य ही है कि इस वैश्विक संकट के दौरान, जब हमें नफरतों को ताक पर रख देना चाहिये, मेरा देश और उसके नेता मुझे मजबूर कर रहे हैं कि एक बार फिर पूर्वाग्रह पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करूँ और नैतिकता के एक तीव्र और बेचैनी भरे संकट का पर्दाफ़ाश करूँ।

 

- यह लेख वाशिंगटन पोस्ट में 7 अप्रैल को प्रकाशित हुआ है. इसका हिंदी अनुवाद किया है दिनेश अस्थाना ने.

- समकालीन जनमत से साभार

 

 

 

 

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गिरोह का खेल...कुशाभाऊ ठाकरे की प्रतिमा बनाने वाले मूर्तिकार से मांगी गई थी एक लाख की रिश्वत

राजकुमार सोनी

रायपुर. छत्तीसगढ़ के काठाडीह में स्थापित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम अब चंदूलाल चंद्राकर पत्रकारिता विश्वविद्यालय कर दिया गया है. यह अलग बात है कि विश्वविद्यालय के परिसर में अब भी संघ की पृष्ठभूमि से जुड़े ठाकरे की प्रतिमा स्थापित है. पिछले दिनों एक गिरोह विशेष के सदस्यों ने यह कहते हुए हो-हल्ला मचाया था कि जिस जगह पर प्रतिमा स्थापित है भला उस जगह का नाम कैसे और किस आधार पर बदला जा सकता है?  इधर ठाकरे की प्रतिमा का निर्माण करने वाले मूर्तिकार नेलसन ने अपना मोर्चा डॉट कॉम को बताया कि विश्वविद्यालय के तात्कालिक रजिस्ट्रार ने प्रतिमा बनाने के एवज में एक लाख रुपए की रिश्वत मांगी थीं. यह चढ़ावा उन्हें इसलिए भी देना पड़ा क्योंकि पांच लाख का भुगतान तो अग्रिम मिल गया था, लेकिन चार लाख रुपए अटके पड़े थे. 

रजिस्ट्रार खुद आए थे पैसा लेने

पद्मश्री मूर्तिकार नेलसन का नाम देश में अंजाना नहीं है. उनके हाथों से निर्मित अनेक प्रतिमाएं छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में स्थापित है. वर्ष 2010 से कुछ पहले उन्हें कुशाभाऊ ठाकरे की प्रतिमा बनाने का काम सौंपा गया था. इस काम के लिए उन्होंने कुल नौ लाख रुपए का व्यय बताया था. विश्वविद्यालय प्रबंधन इसके लिए तैयार भी हो गया था, लेकिन जब भुगतान की बारी आई तब विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने साफ शब्दों में कहा कि भुगतान तो हो जाएगा... लेकिन कुलपति महोदय को एक लाख रुपए का चढ़ावा देना होगा. नेलसन ने बताया कि रजिस्ट्रार चढ़ावे को लेकर इतनी हड़बड़ी में थे कि वे खुद ही उनसे मिलने के लिए उस जगह ( भिलाई ) चले आए जहां प्रतिमा का निर्माण हो रहा था. मूर्तिकार ने बताया कि रजिस्ट्रार साहब अपने साथ शेष बाकी रकम ( चार लाख ) का चेक लेकर आए थे और भुगतान हासिल करने के लिए उनके साथ स्टेट बैंक तक गए थे. उन्होंने एक लाख रुपए नगद उनके हाथों में थमाया था. इस तरह प्रतिमा को बनाने के एवज में मात्र आठ लाख का भुगतान ही मिल पाया.नेलसन ने बताया कि 28 जून 2010 को प्रतिमा का काम पूरा हो गया था. अब विश्वविद्यालय परिसर में यह प्रतिमा किस तिथि को स्थापित हुई और किसने अनावरण किया इसकी जानकारी उनके पास नहीं है.

स्व. शुक्ल के कार्यकाल को भी किया याद

मूर्तिकार ने छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष स्व. राजेंद्र प्रसाद शुक्ल और सचिव भगवान देव इसरानी के कार्यकाल को भी याद किया. नेलसन ने बताया कि भगवान देव इसरानी तो सचमुच भगवान ही थे. जब यह तय हुआ विधानसभा में महात्मा गांधी की प्रतिमा लगायी जानी है तब उनके द्वारा काम हासिल करने के लिए महज सात लाख रुपए में कोटेशन भर दिया गया था. बाद में स्व. शुक्ल यानी बाबूजी ने बुलाकर कहा कि इतनी कम धनराशि में भला प्रतिमा कैसे बन पाएगी. नेलशन बताया कि निश्चिच रुप से सात लाख में प्रतिमा का निर्माण करना कठिन होता. तब इस दुविधा को भांपकर स्व. शुक्ल ने 12 लाख रुपए स्वीकृत किए. इस काम में विधानसभा के सचिव भगवान देव इसरानी ने भी खूब मदद की. बाद में भी उनका व्यवहार सहयोगात्मक रहा. नेलशन ने बताया कि उनके हाथों ने विधानसभा के दो मोनो, अशोक स्तंभ और विवेकानंद की प्रतिमा का निर्माण भी किया है. अशोक स्तंभ के लिए उन्हें 13 लाख और विवेकानंद की प्रतिमा के लिए 16 लाख रुपए का भुगतान किया गया. इसके एवज में किसी भी शख्स ने उनसे कोई चढ़ावा नहीं मांगा.

( नेलशन से की गई बातचीत का रिकार्ड उपलब्ध है. ) 

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जिसको कहना है मुझे राष्ट्र विरोधी कह लें... कमल हासन

ऐसे समय जबकि झंडुबाम से लेकर च्यवनप्राश तक बेचने वाले अभिनेता काला चश्मा गुम जाने के बहाने असल मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने में लगे हैं तब प्रख्यात अभिनेता कमल हासन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत लिखकर अपनी नाराजगी जताई है. उनका लिखा खत सोशल मीडिया में जमकर वायरल हो रहा है. यहां भी उनके खत को वे लोग बांच सकते हैं जो मानते हैं कि कोरोना जैसी महामारी से ताली-थाली बजाकार और दीया-बाती जलाकर खत्म नहीं किया जा सकता है.

 

सेवा में,

माननीय प्रधानमंत्री,

भारतीय गणराज्य.

 

आदरणीय महोदय,

 

मैं यह पत्र देश के एक जिम्मेदार किन्तु निराश नागरिक के तौर पर आपको लिख रहा हूं. 23 मार्च को आपको लिखे अपने पहले पत्र में, मैंने सरकार से आग्रह किया था कि इस मुश्किल घड़ी में वह उन असहाय, कमजोर और आश्रित लोगों को अपनी नज़रों से ओझल न होने दे, जो हमारे समाज के अनाम नायक रहे हैं. अगले ही दिन, राष्ट्र ने एक सख्त और तत्काल लॉकडाउन की आपकी घोषणा सुनी, जो लगभग नोटबंदी की शैली में थी. मैं हतप्रभ ज़रूर हुआ, लेकिन मैंने आप पर, अपने चुने हुए नेता पर भरोसा करना चुना, जिसके प्रति हम यह विश्वास रखना चाहते थे, कि वह हमसे अधिक जानकार है. पिछली बार जब आपने नोटबंदी की घोषणा की थी, तब भी मैंने आप पर भरोसा करना चुना था, लेकिन समय ने साबित कर दिया कि मैं गलत था. समय ने साबित कर दिया कि आप एकदम ग़लत थे महोदय.

 

सबसे पहले, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि आप अभी भी देश के चुने हुए नेता हैं, और आपके अलावा सभी 140 करोड़ भारतीय भी इस संकट के दौरान हर हाल में आपके हरेक दिशानिर्देश का पालन करेंगे. आज, शायद विश्व का कोई दूसरा ऐसा नेता नहीं है, जिसके पास इस तरह का जनसमर्थन हो. आप जो बोलते हैं, जनता अनुसरण करती है. आज पूरा देश इस अवसर पर एकजुट है और उसने आपके कार्यालय पर अपना विश्वास बनाए रखा है. आपने देखा होगा, कि जब आपने स्वास्थ्य के लिए नि:स्वार्थ भाव से और अथक परिश्रम करने वाले अनगिनत स्वास्थ्यकर्मियों की सराहना करने के लिएक देशवासियों का आह्वान किया, तो सबने उनके लिये ताली बजाई और जयजयकार की. हम आपकी इच्छाओं और आदेशों का पालन आगे भी करेंगे, लेकिन हमारे इस अनुपालन को हमारी अधीनता के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए. अपने लोगों के नेता के रूप में मेरी खुद की भूमिका मुझे अपने मन की बात कहने और आपके तरीकों पर सवाल उठाने के लिए मजबूर करती है. अगर मेरी बातों में शिष्टाचार की कोई कमी महसूस हो, तो कृपया क्षमा करें.

मेरा सबसे बड़ा डर यह है, कि नोटबंदी की वही गलती फिर से बड़े पैमाने पर दोहराई जा रही है. जबकि नोटबंदी ने गरीबों की बचत और आजीविका को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया. आपका यह अ-नियोजित लॉकडाउन भी हमारे जीवन और आजीविका दोनों के ऊपर एक घातक प्रभाव डालने जा रहा है. गरीबों के पास उनका ख़याल रखने के लिए आज सिवाय आपके कोई भी नहीं है महोदय.

एक तरफ आप अधिक विशेषाधिकार प्राप्त लोगों से रोशनी का तमाशा आयोजित करने के लिए कह रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ गरीब आदमी की दुर्दशा खुद एक शर्मनाक तमाशा बन रही है. जिस समय आपकी दुनिया के लोगों ने अपनी बालकनियों में तेल के दीये जलाए हैं, गरीब अपनी अगली रोटी सेंकने के लिए काम भर तेल इकट्ठा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. राष्ट्र के नाम अपने अंतिम दो संबोधनों से आप उन लोगों को शांत करने की कोशिश कर रहे थे, जो इन हालात में आवश्यक भी है, लेकिन इसके अलावा भी बहुत कुछ ऐसा है, जिसे किया जाना निहायत जरूरी है. मनोचिकित्सा की यह तकनीक उस विशेषाधिकार सम्पन्न वर्ग की चिंताओं का समाधान कर सकती है, जिसके पास खुशी ज़ाहिर करने के लिए अपनी बालकनी है.  लेकिन उन लोगों के बारे में क्या, जिनके सिर पर छत भी नहीं है? मुझे यकीन है कि आप केवल बालकनी वाले लोगों के लिए एक बालकनी सरकार नहीं चलाना चाहते होंगे, और न ही पूरी तरह से उन गरीबों की अनदेखी करना चाहते होंगे, जो हमारे समाज, हमारी समर्थन प्रणाली की सबसे बड़ी आधार संरचना तैयार करते हैं, जिस पर हमारा मध्य-वर्ग और सम्पन्न वर्ग अपने जीवन का निर्माण करता है. यह सही है कि गरीब आदमी कभी भी फ्रंट पेज की खबर नहीं बन पाता, लेकिन प्राणशक्ति और जीडीपी- राष्ट्र निर्माण के दोनों पक्षों में उसके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. राष्ट्र में उसकी बहुमत हिस्सेदारी है. इतिहास ने साबित कर दिया है, कि तल को नष्ट करने के किसी भी प्रयास से अन्तत: शीर्ष ही कमज़ोर होता है. यहां तक ​​कि विज्ञान भी इससे सहमति ही जताएगा.

यह पहला संकट है, पहली महामारी जो समाज के शीर्ष तल पर प्रस्फुटित हुई है, और उसका प्रसार सबसे ऊपर से नीचे की तरफ़ हुआ है. लेकिन आपको देख कर ऐसा लगता है महोदय कि आप सबसे नीचे की आबादी को छोड़ कर ऊपर वालों को ही राहत देने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं.  लाखों-लाख दिहाड़ी मजदूर, घरेलू कामगार, रेहड़ी-पटरी विक्रेता, ऑटो-रिक्शा तथा टैक्सी चालक और असहाय प्रवासी कामगार इस उम्मीद में सारी तक़लीफ़ें सहन कर रहे हैं कि इस लंबी सुरंग के दूसरे छोर पर प्रकाश की कोई किरण ज़रूर होगी. पर हम केवल एक पहले से ही सुसंगठित मध्य-वर्गीय क़िले को और अधिक सुरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं.

महोदय मुझे गलत मत समझिए, मैं यह सुझाव नहीं दे रहा हूं कि हम मध्यम वर्ग या किसी एक वर्ग की उपेक्षा करें. वास्तव में, मैं इसके ठीक विपरीत सुझाव दे रहा हूं. मैं चाहता हूं कि आपको हर एक किले को सुरक्षित करने के लिए और अधिक प्रयास करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी भूखा न सोए. COVID-19 को और अधिक शिकारों की तलाश रहेगी, लेकिन हम उसके लिये गरीबों की भूख (एच), थकावट (ई) और अभाव (डी) से एक उपजाऊ खेल का मैदान बना रहे हैं. HED- 20 एक ऐसी बीमारी है जो दिखने में छोटी लगती है, लेकिन COVID-19 की तुलना में वह कहीं अधिक घातक है. COVID-19 के जाने के बाद भी इसका प्रभाव लंबे समय तक महसूस किया जाएगा.

जब कभी ऐसा महसूस होता है कि हमारे पास इस फिसलन की रफ़्तार को थाम लेने का मौका है, हर बार  आप अपने आपको एक सुरक्षित ढलान पर फिसलने देते हैं, और उस मौके को एक उत्साही चुनावी-शैली के अभियान में बदल देते हैं. हर बार यही प्रतीत होता है कि आप अपनी सुविधा से जिम्मेदारीपूर्ण व्यवहार को जनसामान्य के ऊपर और पारदर्शिता को राज्य सरकारों के ऊपर टाल रहे हैं. आपके बारे में ऐसी धारणा का निर्माण आप स्वयं कर रहे हैं, ख़ासकर उन लोगों के बीच जो भारत के वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने के लिए अपनी बुद्धिजीविता का सर्वोत्तम उपयोग करते हुए काम करने में समय बिताते हैं. मुझे खेद है यदि मैंने यहां बुद्धिजीवी शब्द के इस्तेमाल से आपको नाराज़ किया हो, क्योंकि मुझे पता है कि आप और आपकी सरकार को यह शब्द कतई पसंद नहीं है. लेकिन मैं पेरियार और गांधी का अनुयायी हूं, और मुझे पता है कि वे पहले बुद्धिजीवी थे. यह वह बुद्धि है, जो सभी के लिए धार्मिकता, समानता और समृद्धि का मार्ग चुनने में मार्गदर्शन करती है.

केवल उत्तेजक और फ़र्जी प्रचार के माध्यम से येन केन प्रकारेण लोगों के उत्साह को जीवित रखने के आपके रुझानों की वजह से ही शायद उन ज़रूरी कार्रवाइयों की अनदेखी करने की आपकी मंशा दृढ़ हुई है, जिनसे वास्तव में बहुत-सी जानें बचाई जा सकती थीं. महामारी के इस लंबे दौर में, जब पूरे देश में कानून और व्यवस्था को दुरुस्त रखना बेहद अहम कार्यभार था, आपका तंत्र देश के विभिन्न हिस्सों में अज्ञानी और मूर्ख लोगों की सभाओं और जमावड़ों को रोकने में विफल रहा. आज वे भारत में महामारी के प्रसार के सबसे बड़े केंद्र बन गए हैं. इस लापरवाही के कारण जितने लोग जान गंवाने वाले हैं, उन सभी लोगों के लिए कौन जिम्मेदार होगा?

डब्ल्यूएचओ को दिये गये चीनी सरकार के आधिकारिक बयान के अनुसार, 8 दिसंबर को कोरोना के संक्रमण का पहला मामला दर्ज़ किया गया था. भले ही आपने इस तथ्य को स्वीकार किया हो, कि दुनिया को स्थिति की गंभीरता को समझने में बहुत समय लगा, फरवरी की शुरुआत तक, पूरी दुनिया को पता चल चुका था कि यह वायरस एक अभूतपूर्व कहर बरपाने ​​वाला है. भारत का पहला मामला 30 जनवरी को दर्ज़ किया गया था. हमने देखा था कि इटली में क्या हुआ था. फिर भी, हमने समय रहते अपने लिये कोई सबक नहीं सीखा. जब हम अंततः अपनी नींद से जागे, तो आपने 4 घंटे के भीतर 140 करोड़ लोगों के पूरे देश को लॉकडाउन करने का फ़रमान सुना दिया.  आपके पास पूरे 4 महीने की नोटिस अवधि थी, जबकि देश की इतनी विशाल आबादी के लिए मात्र 4 घंटे की नोटिस अवधि! दूरदर्शी नेता वे होते हैं, जो समस्याओं के गंभीर होने से बहुत पहले उसके समाधान पर काम करते हैं.

मुझे यह कहते हुए खेद है महोदय, कि इस बार आपकी दृष्टि विफल रही. इसके अलावा, आपकी सरकार और उसके सहयोगियों की सारी शक्ति किसी भी प्रतिक्रिया या रचनात्मक आलोचना का मुंहतोड़ जवाब देने में ख़र्च हो रही है. राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखने वाली और देश की बेहतरी चाहने वाली जो भी आवाजें कहीं से उठती हैं, उन्हें फ़ौरन कुचलने और बदनाम कर देने के लिये आपकी ट्रोल आर्मी पिल पड़ती है, और ऐसी आवाज़ों को राष्ट्र-विरोधी करार दे दिया जाता है.

आज मैंने यह हिम्मत कर ली है कि जिसको कहना हो मुझे राष्ट्र-विरोधी कह ले. परिमाणात्मक रूप से इस तरह के विशाल संकट के लिये अगर आम आबादी तैयार नहीं है, तो इसके लिये उसको दोषी नहीं ठहराया जा सकता.  इसके लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ आपको दोषी ठहराया जा सकता है. लोग अपने लिए सरकार चुनते और उसका ख़र्च उठाते ही इसीलिए हैं कि वह उनके जीवन को सुरक्षित और सामान्य बनाये रखे.

इस परिमाण की घटनाओं को दो कारणों से इतिहास में दर्ज़ किया जायेगा, पहला कारण वह तबाही (बीमारी और मृत्यु) है, जो वे अपने मूल स्वभाव के कारण पैदा करती हैं. दूसरा कारण यह है कि वे मनुष्यों की प्राथमिकताओं पर कैसा दीर्घकालिक प्रभाव डालती हैं, और किस तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव लाती हैं. मैं अपने समाज को एक ऐसे प्रकोप से त्रस्त होते देख कर बहुत दुखी हूं, जो प्रकृति द्वारा हमारी तरफ़ उछाले गये किसी भी दूसरे वायरस के प्रकोप से बहुत अधिक खतरनाक और दीर्घजीवी है.

महोदय, यह समय उन आवाजों को सुनने का है, जो वास्तव में सरोकार रखती हैं. मुझे उनकी परवाह है. यह सभी सीमाओं को तोड़ देने और हर एक से यह स्पष्ट आह्वान करने का समय है कि वे आपके साथ आयें और मदद का हाथ बढ़ाएं। भारत की सबसे बड़ी क्षमता इसकी मानवीय क्षमता है, और हमने अतीत में बड़े-बड़े संकटों को पार किया है. हम इसे भी पार कर लेंगे, लेकिन इसे इस तरह से पार किया जाना चाहिए ताकि सभी एक साथ आएं और इसमें पक्षपात के लिये कोई जगह न हो.

हम नाराज अवश्य हैं, लेकिन हम अब भी आपके साथ हैं।

जय हिन्द।

कमल हासन

अध्यक्ष,

मक्कल नीधि माईयम।

 

साभार- द हिन्दू, अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र

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बोले भूपेश बघेल- प्रधानमंत्री ने किसी को भी विश्वास में नहीं लिया...इसलिए मची अफरा-तफरी

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र के अफसरों ने लॉकडाउन के पहले किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री से रायशुमारी नहीं की थीं जिसके चलते अफरा-तफरी की स्थिति कायम हुई. एक वेबसाइट को दिए गए इंटरव्यूह में बघेल ने बताया कि लॉकडाउन के बाद प्रधानमंत्री और केंद्र के अफसरों ने वीडियो कांफ्रेंसिग के जरिए दिशा- निर्देश अवश्य दिए मगर तब भी कुछ मुख्यमंत्री ही अपनी बात रख पाए. कान्फ्रेसिंग में अफसर और प्रधानमंत्री ही समझाइश देते रहे.

बघेल ने कहा कि संघीय ढांचे के तहत किसी भी तरह के बड़े निर्णय के लिए सबको विश्वास में लेकर चलना होता है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. अगर प्रधानमंत्री और केंद्र के अफसर पहले बता देते कि अमुक तारीख से लॉकडाउन करने जा रहे हैं तो स्थिति बेहतर होती. एक निश्चित तिथि पर लॉकडाउन कर देने की जानकारी मिल जाने से हर कोई इस बात के लिए तैयार हो जाता कि किन-किन बातों को अमल में लाने की आवश्यकता होगी. क्या समस्या होगी. सभी राज्यों के मुख्यमंत्री आपस में एक-दूसरे से चर्चा कर लेते और सबकी एक सूची बन जाती. बघेल ने कहा कि भारत सरकार भले ही आदेश जारी कर दें, लेकिन आदेश का क्रियान्वयन तो राज्य सरकार को ही करना होता है. अभी जितनी भी कार्रवाई हो रही है वह राज्य सरकारें ही कर रही है. चाहे वह लोगों के आने-जाने का मामला हो या भोजन के प्रबंध का. भारत सरकार तो केवल किट उपलब्ध करवा रही है.

 

प्रधानमंत्री की ताली-थाली बजाने वाली अपील तो सबने मानी थीं फिर स्थिति क्यों बिगड़ी... इस पर बघेल ने कहा कि ताली-थाली और घंटी की बात अलग है, लेकिन उसके बाद मामला तब उलटा पड़ गया जब लोग सड़कों पर निकल गए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को सभी राज्यों के मुख्यमंत्री से रायशुमारी करनी थीं और उन व्यवसायियों और उद्योगपतियों से विशेष तौर पर चर्चा करनी थी जिनके यहां बड़ी संख्या में लोग मेहनत-मजूरी करते हैं. व्यावसायियों और उद्योगपतियों से इस बात की गुजारिश करनी थीं कि वे कम से कम एक महीने तक अपने यहां कार्यरत मजदूरों के रहने खाने का प्रबंध करें. यह सब नहीं हो पाया जिसके चलते दिल्ली के  मजदूर सड़क पर आ गए. बघेल ने बताया कि हमने छत्तीसगढ़ के सभी उद्योगपतियों से अपनी की थीं जिसका सकारात्मक असर पड़ा और अफरा-तफरी का माहौल कायम नहीं हुआ.

बच सकते थे कोरोना से

बघेल ने कहा कि काफी पहले से कोरोना वायरस के फैल जाने की खबरें आ रही थीं. अगर केंद्र सरकार इंटरनेशनल फ्लाइट पर ही रोक लगा लेती तो स्थिति नहीं बिगड़ती. बघेल ने बताया कि छत्तीसगढ़ में कोरोना के दो मरीज ठीक हो गए हैं, लेकिन जो भी लोग भर्ती हैं वे सब विदेश यात्रा से लौटने वाले लोग हैं. मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश की आबादी दो करोड़ अस्सी लाख के आसपास है, लेकिन अब तक महज आठ सौ लोगों की ही जांच हो पाई है. देश में कोरोना जांच की किट का अभाव है. उन्होंने कहा कि अभी किसी प्राइवेट अस्पताल को सरकार ने अपने अधीन नहीं किया है, लेकिन निजी क्षेत्र के सभी अस्पताल वालों से सहयोग के लिए तैयार रहने को कहा है.

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क्या कोरोना के साये में निपट जाएंगे अखबार ?

कोलकाता में जनसत्ता के संपादक रहे शंभूनाथ शुक्ल की यह टिप्पणी बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करती है.

नई दिल्ली. कोरोना का भय अब मीडिया पर भी छाने लगा है. आज ही मेरे हाकर ने कहा है, कि बस अब कल से अखबार नहीं आएगा. जो दो अख़बार आज आए हैं, उनमें से अमर उजाला कुल दस पेज का है, और छह पेज का सिटी पूल आउट. इसी तरह हिंदुस्तान टाइम्स में मात्र 14 पेज हैं और चार पेज का सिटी. इन दोनों ही अखबारों में कोई कॉमर्शियल विज्ञापन नहीं है. यही हाल है टाइम्स ऑफ़ इंडिया का है. वह भी कुल 14+4 पेज का ही है. कोई विज्ञापन नहीं. अलबत्ता मथुरा की जीएलए यूनिवर्सिटी का एक विज्ञापन लगा है, वह शायद पहले से शेड्यूल होगा.

दैनिक जागरण भी पूल आउट समेत 18 पेज का है, और कोई भी कॉमर्शियल विज्ञापन नहीं है. इन्डियन एक्सप्रेस आज हाकर ने दिया नहीं. और वैसे भी उसकी हालत सदा पतली ही रही है. न तो वह सेल में कभी ऊपर गया, न विज्ञापन में और न ही एडिटोरियल मटीरियल में कभी वह हिंदू को पछाड़ पाया. अब देखिए ये वही अखबार हैं, जो अपनी सेल के लिए ज़मीन-आसमान एक करते थे, और विज्ञापन के लिए तीन-तीन, चार-चार पेज के कवर देते थे. नवरात्रि के बम्पर सेल के मौके पर अखबारों का यह रूप बता रहा है, कि कोरोना तो कल चला जाएगा, लेकिन शायद प्रिंट मीडिया को मिटा देगा.

यह कोई क़यास नहीं, वरन हकीकत है. भारत में भी प्रिंट मीडिया ने अमेरिकी अखबारों की तरह शोशेबाज़ी अधिक की, पा तो खूब बढ़ा दी, लेकिन अपने एडिटोरियल मटीरियल को सुधारने पर कभी जोर नहीं दिया. हिंदी अखबारों का तो खैर ख़ुदा मालिक है, दिल्ली और नॉर्थ में अंग्रेजी अखबारों ने कभी भी आरएंडडी विभाग बनाने की सोची नहीं. विभाग बनाने का मतलब कोई एक आर्काइव बनाना नहीं होता. बल्कि शोध के लिए बाकायदा एक संपादकीय टीम काम करती. एक संपादक होता और कुछ उसके सहयोगी. यह काम कुछ हद तक हिंदू ने शुरू किया था, पर उसकी हालत स्वयं खस्ता है. तब ऐसी स्थिति में अखबार अपरिहार्य क्यों?

लेकिन अखबार तो भारत में फिर भी 200 साल चल गए, इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने तो 20 साल में ही दम तोड़ दिया. क्योंकि सबको पता है, कि टीवी न्यूज़ चैनल किसी एक घटना, दुर्घटना और हादसे को भुनाने के प्रयास में रहते हैं. अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए वे अजीबो-गरीब करतब करते रहते हैं. फालतू की डिबेट कराते हैं. पत्रकार भी अक्सर वहां किसी न किसी दल के प्रवक्ता की तरह बैठते हैं. लेकिन अब कोरोना के भय से उनकी डिबेट्स ठंडी पड़ने लगी हैं. क्योंकि इन डिबेट्स के सहभागी लोग अब स्टूडियो जाते ही नहीं. साथ में यह भी कह दिया है, कि आप किसी को भी घर में रिकार्डिंग के लिए न भेजें. अब दिक्कत यह है, कि कोई दिखाने लायक मसाला उनके पास है नहीं और दर्शकों की रुचियाँ उन्होंने स्वयं नष्ट कर डाली हैं. क्या यह मजेदार नहीं, कि एबीपी और आज तक जैसे न्यूज़ चैनल सास, बहू और साज़िश टाइप मनोरंजन सीरियल्स दिखाते हैं अथवा डरावनी कहानियां. बिना एडिटोरियल मटीरियल को लाए यही हश्र होना था.

अब यह एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, कि क्या मेन स्ट्रीम मीडिया के दिन समाप्त हो गए? और बस सोशल मीडिया का ही भविष्य है. जिसमें जा रही सामग्री का कोई खेवनहार नहीं है. यह सामग्री सच है या झूठ, यह भी किसी को नहीं पता. लेकिन जो स्थितियां बन रही हैं, उनमें यही दीखता है. क्योंकि दस वर्ष पहले तक जो पाठक टॉयलेट जाते समय अखबार ले जाया करते थे, वे अब मोबाइल ले जाते हैं. वे अपने मोबाइल पर ही सोशल मीडिया में चल रही सामग्री देखा करते हैं. लेकिन न तो इसमें चल रही ख़बरों में सच्चाई होती है, न कोई तथ्य. भाषा और व्याकरण की गलतियां तो होती ही हैं, इन्हें आदमी अपनी सनक पर लिखता है. यह एक समाज के निरंतर गिरते जाने का संकेत है. इस मीडिया में भ्रामक ख़बरों को चला कर उन्हें उड़ा दिया जाता है, इसलिए ऐसी हरकत करने वाले पर भी कोई अंकुश नहीं लग पाता.

लेकिन एक उम्मीद की किरण है, वह है ई-पेपर और ऑन लाइन मीडिया यानी वेबसाइट्स. सारे बड़े अखबारों के पास अपने रिपोर्टरों और स्ट्रिंगरों का नेटवर्क है. दूर-दराज गाँवों, कस्बों और शहरों में फैले ये स्ट्रिंगर लोगों के साथ सीधे जुड़े हैं. इसलिए उनके पास पुख्ता स्रोत हैं. और अब लोगों के पास न अखबार बांचने की फुर्सत है, न टीवी पर रुक कर न्यूज़ देखने की. ऑन लाइन मीडिया यह सुविधा अपने पाठकों और दर्शकों को देती है, कि वह किसी भी वक़्त स्क्रोल करते हुए ख़बरों से रू-ब-रू रहे. सारे न्यूज़ पोर्टल के पास संपादक भी होता है और उस पर पीआरबी के अधिनियम भी लागू होते हैं. अर्थात गलत खबर देने पर वह फौजदारी क़ानून के दायरे में आ जाएगा. एक तरह से कहा जा सकता है, कि भविष्य अब ऑन लाइन मीडिया है. लेकिन सरकार को उसके रजिस्ट्रेशन और वहाँ के संपादकीय स्टाफ के लिए कुछ क़ानून बनाने होंगे. साथ-साथ उनके लिए रेवेन्यू का इंतजाम भी सरकार को करना होगा डीएवीपी के दायरे में उसे लाना होगा. तब ही भारत में मीडिया का भविष्य रहेगा. और भविष्य का मीडिया भी रहेगा.

 

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चंदूलाल चंद्राकर के पोते ने भगवा बिग्रेड पर साधा निशाना-जो कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ राज्य बने... वे ही कर रहे हैं विरोध

रायपुर. छत्तीसगढ़ में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को अब देश के मूर्धन्य पत्रकार रहे चंदूलाल चंद्राकर के नाम कर दिया गया है. इस नामकरण के बाद ऐसे लोग विरोध में उतर आए हैं जिन्होंने विश्वविद्यालय परिसर को बांटने, छांटने और काटने वाली वैचारिक दुकान में तब्दील कर रखा था. बताते हैं कि परिसर में ऐसे-ऐसे लोगों का जमावड़ा होता था ( शायद अब भी हो... क्योंकि वहां ऐसे लोग तैनात हैं.) जिनका एकमात्र लक्ष्य छात्र-छात्राओं के बीच वैमनस्य का बीज बांटना था. भाजपा शासनकाल के 15 सालों में यहां कई तरह के विचारक यहां अपना ज्ञान बघारने के लिए आते रहे. इन विचारकों में से अधिकतर का लक्ष्य अलगाव को बढ़ावा देना था. एक तरह से यह विश्वविद्यालय नफरत की राजनीति करने वालों का केंद्र बन गया था. इधर कतिपय लोगों के विरोध के बीच चंदूलाल चंद्राकर के पोते अमित चंद्राकर ने फेसबुक पर एक पोस्ट साक्षा की है. इस पोस्ट पर उन्होंने भगवा बिग्रेड पर निशाना साधते हुए कहा है कि जो लोग कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण हो... वे ही विरोध की राजनीति कर रहे हैं.

अमित चंद्राकर ने लिखा है- जो लोग विश्वविद्यालय के नए नामकरण का विरोध कर रहे हैं उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि घर के जिस पते पर वे छत्तीसगढ़ को लिखते हैं वह चंदूलाल चंद्राकर की ही देन है. वे पहले ऐसे भारतीय पत्रकार थे जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन का इंटरव्यूह लिया था. वर्ष 1946 से 47 तक उन्हें नई दिल्ली के बिरला हाउस में महात्मा गांधी के व्याख्यान को कव्हर करने की जिम्मेदारी दी गई थीं. आज से चालीस साल पहले ही उन्होंने लगभग 148 देशों की यात्राएं की थीं. उन्हें देश-दुनिया की गहन जानकारी थीं. वर्ष 1995 में जब उनका देहांत हुआ तब भाजपा के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी की आंखे नम थीं. वाजपेयी ने संसद में कहा था- देश ने ऐसा नेता खो दिया है जिसकी भरपाई शायद ही हो पाए. अमित चंद्राकर ने अपना मोर्चा डॉट कॉम से भी बातचीत में कहा कि चंदूलाल चंद्राकर के नाम के विरोध के पीछे नफरत की राजनीति को बढ़ावा देने वाले तत्व सक्रिय है. ऐसे तत्वों को बेनकाब करना बेहद जरूरी है.

कौन है कुशाभाऊ ठाकरे ?

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे कुशाभाऊ ठाकरे का जन्म मध्यप्रदेश के धार जिले में हुआ था. उनकी शिक्षा-दीक्षा भी छत्तीसगढ़ में नहीं हुई थीं. वे लंबे समय तक संघ के प्रचारक थे और फिर जब भाजपा के शीर्ष पद पर पहुंचे तो संगठन के काम को बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ आया करते थे. सोशल मीडिया में लोग कुशाभाऊ ठाकरे के पत्रकारिता में दिए गए योगदान को लेकर सवाल उठा रहे हैं. एक फेसबुक पोस्ट है जिसमें लिखा है- मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी हूं. मुझसे आज तक किसी भी प्राध्यापक ने नहीं कहा कि बेटा जीवन में अगर कभी कुछ बनना है तो कुशाभाऊ ठाकरे जैसा पत्रकार बनना.

क्या कुलपति को हटाया जाएगा ?

विश्वविद्यालय के नए कुलपति बलदेव शर्मा को एक खास तरह के विचारक भारतीयता के पोषक तत्व के रुप में प्रचारित करते हैं. श्री शर्मा संघ के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक रहे हैं. हालांकि अपनी तैनाती के बाद बलदेव शर्मा ने मीडिया से कहा है- कुलपति किसी पार्टी का नहीं होता. अब उनका एकमात्र लक्ष्य शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ावा देना है. अब यह कैसे और किस तरह से संभव हो पाएगा यह भविष्य की बात है, लेकिन इधर छत्तीसगढ़ सरकार ने विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्तियों को लेकर नया नियम-कानून बना लिया है इसलिए राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा चल पड़ी है कि जल्द ही कुलपति को हटा दिया जाएगा. इसके साथ ही विश्वविद्यालय में नफरत की विचारधारा को बढ़ावा देने वाले प्राध्यापकों पर भी गाज गिर सकती है. बताते हैं कि विश्वविद्यालय में एक ऐसा प्राध्यापक भी तैनात है जो एक संगठन का प्रमुख पदाधिकारी है. कुलपति के पदभार ग्रहण के दौरान विश्वविद्यालय में एक खास दल और उनसे जुड़े लोगों के शक्ति प्रदर्शन को लेकर भी कई तरह की बातें हो रही हैं. पदभार समारोह के दौरान कुछ खबरची लोग भी मौजूद थे. उनका कहना है- पदभार समारोह को देखकर लग रहा था जैसे नेताजी बारात लेकर आ गए हैं. जोरदार ढंग के तमाशे और नारों के बीच खबरची को फिल्म चाइना गेट के जगीरा का संवाद भी याद आ रहा था- हमसे न भिंडियो... मेरे मन को भाया... तो मैं कुत्ता काट के खाया. खबरची के कहने का पूरा भाव यहीं था कि कुछ लोग यह सोचकर धक्का-मुक्की और नारेबाजी कर रहे थे जैसे उन्होंने बहुत बड़ी जंग जीत ली है.

 

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जनता के साथ धोखा है भगत सिंह पर बनीं फिल्में

बरेली में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुधीर विद्यार्थी एक संस्कृतिकर्मी भी है. उन्हें क्रांतिकारियों के जीवन पर बेहद प्रमाणिक ढंग से काम करने वाला लेखक इसलिए भी माना जाता है क्योंकि वे भगत सिंह के साथ काम करने वाले सभी क्रांतिकारी साथियों ( जो स्वतंत्र भारत में जिंदा रहे ) के निकट रहे हैं. इस आलेख में उन्होंने शहीद-ए-आजम भगत सिंह पर बनी फिल्मों के जरिए बेहद अच्छे ढंग से यह समझाया है कि मौजूदा समय में सवालों से टकराने के लिए भगतसिंह और उनकी विचारधारा का होना क्यों जरूरी है.

 

- सुधीर विद्यार्थी 

बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों के मध्य भी चर्चा का विषय बनी रहीं. इसलिए कि स्वतंत्रता आंदोलन के उस कालखंड (1925-31) पर फिल्माया गया एक क्रांतिकारी का जिंदगीनामा उसके अभियान और विचारधारा के साथ कितना न्याय कर सका. ऐसा क्यों हुआ कि बॉलीवुड को एकाएक भगत सिंह तेजी से याद आ गए और उन पर एक साथ पाँच-पाँच फिल्में उतार दी गईं. आश्चर्य यह कि कहानी एक और फिल्में अनेक. सभी फिल्मों की जानकारी का स्रोत भगत सिंह पर उपलब्ध संस्मरण साहित्य और दस्तोवज ही हैं. उल्लेखनीय यह है कि उस आंदोलन का कोई साथी अब जीवित नहीं है. आजाद हिंदुस्तान में चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के जो साथी बचे भी थे वे बहुत उपेक्षित जिंदगी जीते हुए एक-एक कर मर-खप गए और उनका कोई पुरसाहाल नहीं हुआ.

भगत सिंह भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के ऐसे नायक थे जिनके पास विचार की अकूत पूँजी थी. अपने शुरुआती क्रांतिकारी सफर से लेकर फाँसी के फंदे तक लगभग छह वर्ष की अवधि में वे बड़ी क्रांतिकारी घटनाओं यथा सांडर्स-वध और दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट में शामिल होने के साथ-साथ निरंतर लिखते और बोलते रहे. यदि उनके एक हाथ में पिस्तौल थी तो दूसरे में कलम. अध्ययन उनका बहुत फैला हुआ था. ऐसा उनकी जेल नोट बुक देखने से भी प्रमाणित होता है. उनके पत्र, अदालती बयान और सयम-समय पर लिखे गए उनके निबंधों, टिप्पणियों से भी यह जाहिर होता है कि विचार की दुनिया को खंगालने के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया था. ऊपरी तौर पर देखने पर वे एक राजनीतिक व्यक्ति थे पर उनके भीतर गहन साहित्यिक और सांस्कृतिक समझ विद्यमान थी. उनके पास भारतीय राजनीति और अपने समय को देखने की एक गहरी दृष्टि थी. उन्होंने समाज और राजनीति का कोई विषय नहीं छोड़ा जिस पर कहा और लिखा न हो. चाहे वह भाषा और लिपि का जटिल सवाल हो या फिर सांप्रदायिक की समस्या, धर्म और ईश्वर, इंकलाब का अर्थ, मजदूर और किसानों के हित, सर्वहारा की सत्ता, अछूत का प्रश्न, शोषण पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था से मुक्ति अथवा मार्क्सवादी सिद्धांतों को सामने रखकर समाजवादी समाज के निर्माण का बड़ा उद्देश्य. यदि उनके राजनीतिक गुरु राधामोहन गोकुल थे तो उन्होंने मार्क्स और लेनिन से विचार की ऊर्जा ग्रहण की. उनके प्रेरणास्रोत करतार सिंह सराबा जैसे भारतीय क्रांतिकारी शहीद थे लेकिन दूसरी ओर उन्हें अत्यंत स्फूर्तिवान संग-साथ भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद जैसे मित्रों और क्रांतिकारी संगठनकर्ताओं का प्राप्त हुआ जो उन्हें बहुत ऊँचाईयों की ओर ले गया. वे साफ कहा करते थे कि क्रांति से उनका अर्थ अंततोगत्वा एक ऐसी समाज व्यवस्था की स्थापना से था जो हर प्रकार के संकटों से मुक्त होगी और जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य होगा. इसे गहराई से जानना चाहिए कि वे क्रांति को बम या पिस्तौल का संप्रदाय नहीं मानते थे. उनका अभिप्राय अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन था.

तो क्या भगत सिंह पर बनी मौजूदा फिल्में इस क्रांतिकारी नायक की इस तस्वीर को प्रस्तुत करने में कामयाब हो सकी हैं जिस भगत सिंह को हम उसकी विचारयात्रा को जानते-बूझते संपूर्ण भारतीय क्रांतिकारी संग्राम का सर्वाधिक विचारवान क्रांतिकर्मी और प्रवक्ता मान लेते रहे. हम पहले यह भी साफ कर दें कि क्रांति के उस कालखंड में भगत सिंह कोई व्यक्ति नहीं, अपितु अपने क्रांतिकारी दल ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ का बौद्धिक नेतृत्व करने वाले उसके एक सदस्य ही थे. सारे अभियानों के पीछे पूरी पार्टी की शक्ति और संयुक्त योजनाएँ थीं जिन्हें कार्यान्वित करने का दायित्व दल के सेनापति कभी भगत सिंह को सौंपते, तो कभी सुखदेव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, भगवानदास माहौर, सदाशिवराव मलकापुरकर या फिर विश्वनाथ वैशम्पायन, शिव वर्मा, जयदेव कपूर, गया प्रसाद, पं. किशोरीलाल, दुर्गा भाभी, सुशीला दीदी, सुखदेव राज, धनवंतरि अथवा विजयकुमार सिन्हा को. किसी भी ऐक्शन के पीछे पार्टी की एक सोची-समझी रणनीति और उसकी क्रियान्वयन पद्धति थी. भगत सिंह वहाँ अकेले नहीं होते थे. उनके क्रांतिकारी सफरनामे को सिर्फ एक रोमांटिक हीरो के रूप में इन मुंबईया फिल्मों की तरफ पेश करना उस संपूर्ण क्रांतिकारी चेतना का अपमान और नासमझी है जिसके लिए अपने समय में भारतीय क्रांतिकारी दल समर्पित रहा है. साहित्य और इतिहास में दक्षिणपंथी लोगों की घुसपैठ कम नहीं रही है जिसके चलते भगत सिंह जैसे प्रगतिशील क्रांतिकारी नायक को मात्र सांडर्स को मारने, बम फेंकने, इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फंदे में झूले जाने वाले जोशीले नौजवान के रूप में दिखाया जाता रहा. इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि मौजूदा दौर में राष्ट्रवादी उनकी जुनूनी छवि को देशभक्तिपूर्ण संवाद थमाकर अपने पक्ष में खड़ा करने की घिनौनी कोशिशें करते रहे. कहना न होगा कि भगत सिंह की इसी छवि की ओर हिंदी सिनेमा आकृष्ट हुआ और और उसने उसमें फिल्मी मिर्च-मसाला लगाकर अंततः दर्शकों के सम्मुख परोस दिया. भगत सिंह की बना दी गई रोमांटिक तस्वीर को अपने ढँग से इस्तेमाल करना जैसे बॉलीवुड का लक्ष्य बन गया. यह सही है कि फिल्मों के निर्माता करोड़ों रुपया लगाकर व्यवस्था परिवर्तन के लिए सचेत और समर्पित क्रांतिकारी भगत सिंह को पर्दे पर क्यों प्रस्तुत करना चाहेंगे. उनका उद्देश्य क्रांति नहीं है. उनका काम फिल्में बनाना और उनसे पैसा कमाना है. जाहिर है कि बाजार के इस समय में फिल्म वाले वह सब कुछ बेचना चाहते हैं जो उनके धंधे में गर्माहट ला सके. फिर चाहे वह सेक्स हो या भगत सिंह. भगत सिंह की चेतना का प्रचार-प्रसार फिल्मी दुनिया का मकसद हो भी नहीं सकता. इन फिल्मों को उस नजरिए से देखा भी नहीं जाना चाहिए कि उनमें उस संग्राम को आगे बढ़ाने का उद्देश्य निहित हो सकता है जिसे भगत सिंह अधूरा छोड़ गए थे और जिसे क्रांति-विरोधी शक्तियों के 1947 में सत्ता में आ जाने के चलते हासिल नहीं किया जा सका था. हुआ यह कि ‘लगान’ ओर ‘गदर’ जैसी पीरियड फिल्मों की कामयाबी के बाद फिल्म निर्माताओं को लगा कि भगत सिंह भी स्वतंत्रता संग्राम के दौर के ऐसे नायकों में हैं किनकी छवि को भुनाया और बेचा जा सकता है. पर इसके लिए उन्हें ‘मसाले’ की तलाश थी. यानी क्रांतिकारी हीरो ऐसा हो जिसकी जिंदगी में प्यार-व्यार भी हो. अब तक प्रदर्शित फिल्मों ‘शहीदः 23 मार्च 1931’ और ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ में भगत सिंह की मंगेतर/प्रेमिका को ईजाद कर लिया गया क्योंकि इसके बिना हिंदी सिनेमा की माँग पूरी नहीं होती. वे भूल गए कि ‘गांधी’ फिल्म भी सफल हुई थी जिसमें कोई प्यार का गाना या दृश्य नहीं थे.

भगत सिंह पर धर्मेंद्र की फिल्म में बॉबी द्ओल (भगत सिंह) और ऐश्वर्या राय (प्रेमिका) साथ-साथ गाना गाते हैं. कहा जाता है कि ऐश्वर्या राय को इस छोटी-सी भूमिका के लिए 30 लाख रुपए पारिश्रमिक दिया गया. दूसरी फिल्म के निर्माता राजकुमार संतोषी भी अजय देवगन (भगत सिंह) के साथ उनकी मंगेतर को फिल्मी लटके-झटके के साथ ‘तुडुक-तुडुक’ और ‘बल्ले-बल्ले’ करा देते हैं. भगत सिंह के जीवन में कोई ऐसा प्रेम-प्रसंग नहीं था, पर शायद इस नाच-गाने के बिना फिल्में पूरी नहीं हो सकती थीं. निर्माता इन दृश्यों को फिल्मों की माँग कहेंगे और यह भी बताएँ गे कि यह उनके व्यवसाय की मजबूरी है पर क्या व्यावसायिक मजबूरी के चलते एक क्रांतिकारी शहीद की छवि को जनता और नई पीढ़ी के सम्मुख गलत ढँग से प्रस्तुत करने की छूट किसी को दी जानी चाहिए यह हमारी इतिहास-चेतना की अनुपस्थिति का बड़ा उदाहरण है कि यह फिल्में सिनेमा हॉल में प्रदर्शित हो रही हैं और हम सवाल भी नहीं खड़े कर सकते. ‘माउंटवेटनः द लास्ट वायसराय’ जैसी फिल्में हमारे इतिहास को विकृत ढँग से प्रस्तुत करती हैं और हम चुप रहते हैं. मुझे याद है कि मनोज कुमार के धारावाहिक ‘भारत के शहीद’ में भी कई स्थानों पर क्रांतिकारियों की छवि को ध्वस्त किए जाने पर हमारे मध्य बहुत हलचल नहीं हुई थी. यद्यपि बाद को कुछेक सवालों पर उसका प्रसारण बाधित हुआ था. यह सही है फिल्में या धारावाहिक इतिहास नहीं होते और न ही उन्हें देखकर हमें कोई इतिहास संबंधी निष्कर्ष निकालने चाहिए. बावजूद इसके यदि पर्दे पर उतारी गई छवियाँ इतिहास अथवा उसके नायक के व्यक्तित्व और विचारधारा को इस हद तक नुकसान पहुँचाएं कि लोग उसे लेकर किसी बड़े भ्रम का शिकार होने लगें तो उन सभी को उस पर प्रश्नचिन्ह लगाना चाहिए जो उसकी वास्तविकता से गहराई तक परिचित हैं. आश्चर्य होता है कि भगत सिंह के परिवार के दो सदस्यों ने धर्मेंद्र और संतोषी की फिल्मों में सलाह-मशविरा भी दिया था. कुछ और भगत सिंह के रिश्तेदार जो इन फिल्मों का विरोध कर रहे हैं वे सिर्फ यह दिखाने के लिए ही कि वे भी उस शहीद के रक्त-संबंधी हैं और उनका भी भगत सिंह पर ‘अधिकार’ है. उनकी ओर से जो आपत्तियाँ अब तक तक दर्ज की गई हैं उनमें भगत सिंह की विचारधारा को दबाने या छिपाने को लेकर कहीं कोई चिंता नहीं है.

भगत सिंह पर बनी इन फिल्मों से यह तो लाभ होगा कि नई पीढ़ी उस क्रांतिकारी शहीद के नाम से बखूबी परिचित हो सकेगी. पर अच्छा यह होता कि यदि यह फिल्में भगत सिंह को संपूर्ण रूप से जानने-समझने का प्रस्थान बिंदु बन सकतीं. भगत सिंह से परिचित होने के लिए फिल्में नहीं, इतिहास और साहित्य ही माध्यम बनेगा. यह अच्छी बात है कि भगत सिंह के संपूर्ण दस्तावेज और उस आंदोलन की सारी चीजें आज हमारे बीच उपलब्ध हैं. हम उम्मीद करेंगे कि आने वाले समय में भगत सिंह की क्रांतिकारी चेतना को जानने के प्रयास तेज होंगे. यह देखा जाना जरूरी है कि देवदास और भगत सिंह पर बनी फिल्में तो किस तरह बेशर्म तरीके से मिथ को सच व सच को मिथ में तब्दील कर सकती हैं. ऐसा लगने लगा है कि पॉपुलर मीडिया भगत सिंह के चरित्र के साथ न्याय नहीं कर सकता. आखिर क्यों देवदास और भगत सिंह पर बनी फिल्में मिथ और सच, फिक्शन और फैक्ट में कोई अंतर नहीं रहने देतीं यह जानते हुए भी कि वे इतिहास के एक जरूरी कालखंड को पर्दें पर उतारने जा रहे हैं. उन्हें हर चीज को कमोडिटी (उत्पाद) में बदल देने में महारत हासिल है. ‘लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ में भगत सिंह से यदि अपने व्यावसायिक हितों के चलते भांगड़ा करवाया गया है तो कौन कह सकता है कि भविष्य में यदि गांधी पर कोई फिल्म बनती है तो उसमें गांधी को नहीं नचवाया जाएगा.

‘शहीद 23 मार्च 1931’ में भगत सिंह वैचारिक चेतना से लैस अपनी असली रूप में कहीं दिखाई नहीं देकर एक रूमानी, उन्मादी और कई जगह बदहवास युवक से दिखाई पड़ते हैं. इस फिल्म में इतिहास की अक्षम्य चूकें हैं. क्या फिल्म निर्माता इतना भी शोध नहीं करते कि वे सही ऐतिहासिक तथ्यों को दर्शकों तक पहुँचा सकें. फिल्म में लाला लाजपतराय को गदर पार्टी का नेता बताना पूर्णतया गलत है. क्रांतिकारी संग्राम की घटनाएँ भी बहुत क्रमबद्ध नहीं हैं. पूरी फिल्म में सिर्फ भगत सिंह ही हर क्षण केंद्रीय नायक बने रहते हैं. उनके नजदीकी साथियों की कोई हिस्सेदारी नजर नहीं आती. सुखदेव और राजगुरू का कद भी किसी तरह नहीं उभरता. बॉबी देओल के फिल्मी लटके-झटके उसे भगत सिंह के नजदीक नहीं पहुँचने देते. चंद्रशेखर आजाद की भूमिका में सन्नी देओल भी मसल-मैन ही बने रहे जो किसी तरह आजाद के चरित्र के अनुरूप नहीं है. इस फिल्म में भगत सिंह के विचार पक्ष के साथ बड़ा अन्याय किया गया है. उन्हें एक आस्तिक और एक हिंदू राष्ट्रवादी बनाकर दिखाने के पीछे क्या कोई षड्यंत्र तो नहीं है. यह उनके धर्मनिरपेक्ष और नास्तिक चिंतन के सर्वथा विपरीत है. भगत सिंह जब एक जगह देशभक्ति का गीत गाते हैं तो पीछे भारत माता की तस्वीर दिखाई गई है जिसमें केसरिया ध्वज भी है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इसी चित्र को अपने कार्यक्रमों में रखता और देश भर में प्रचारित करता है. यह सब अखंड हिंदू राष्ट्र की फासीवादी कल्पना पर आधारित है. ऐसा करके भगत सिंह के विचारों की हत्या की गई है जिस पर कड़ी आपत्ति की जानी चाहिए. देखकर कितना अजीब लगता है कि एक नास्तिक क्रांतिकारी जिसकी पुनर्जन्म के प्रति कोई आस्था नहीं है उसे फिल्म में अपनी माँ से यह संवाद करते हुए प्रदर्शित किया जाए कि माँ उसे दुःखी नहीं होना चाहिए. माँ सवाल करती है कि अगले जन्म में वह उसे पहचानेगी कैसे. इस पर भगत सिंह बने बॉबी जवाब देते हैं कि गर्दन पर फाँसी के फंदे के निशान से. यहाँ और भी दृश्य है जब जेल अधिकारी फाँसी से पहले भगत सिंह से कहते हैं कि वह भगवान को स्मरण कर ले. भगत सिंह सुनकर कहते हैं कि भगवान को याद करना तो बाहरी आचार है, उसका वास तो हम सबके भीतर है. क्या इस फिल्म के निर्माता भगत सिंह के उस आलेख को विस्मृत कर बैठे जिसे उस क्रांतिकारी चिंतक ने अंतिम दिनों में जेल के भीतर लिबिद्ध किया था – ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’. यह सर्वत्र उलब्ध है और इससे भगत सिंह की विचार की दुनिया पर गहराई से रोशनी पड़ती है. होना यह चाहिए था कि भगत सिंह के लिखे-बोले को ही नहीं, बल्कि उससे पूर्व से लेकर 1931 में लाहौर की फाँसी के समय तक के क्रांतिकारी संग्राम के दस्तावेजों की मदद से भारतीय क्रांतिकारियों की उस चिंतनधारा को जानने-समझने का प्रयास किया जाता जिसके चलते उन क्रांतिवीरों ने अपनी लड़ाई का लक्ष्य स्वतंत्रता से बढ़कर समाजवाद के अपने बड़े उद्देश्य को समर्पित कर दिया था. भगत सिंह के दल का गांधीवाद के बरक्स सर्वथा अलग क्रांतिकारी मार्ग था जिसमें आजादी के लिए विदेशी हुकूमत से किसी लुंज-पुंज समझौते की कोई गुँजाइश नहीं थी. उनका लक्ष्य मार्क्सवादी सिद्धांतों के आधार पर शोषणरहित समाजवादी समाज का निर्माण था. इसके लिए वे सर्वहारा की सत्ता कायम करना चाहते थे. उन्हें मजदूरों और किसानों की शक्ति पर भरपूर भरोसा था. यदि ये फिल्में इस भगत सिंह को पर्दे पर दिखातीं तो क्रांतिकारी संग्राम के प्रति वे न्याय कर पातीं. सवाल इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का है और इसलिए फिल्म के नाम पर ऐसी गलतियों ओर षड्यंत्रों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि मुख्य धारा का हिंदी सिनेमा अंततः सत्ता वर्ग की संस्कृति और विचारधारा का पोषक होता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले दिनों जनता के मध्य देश भर में भगत सिंह को तेजी से याद किए जाने की कवायदों के चलते उसकी विचार चेतना के जरिए मौजूदा शासन व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती सामने आने का खतरा दिखाई पड़ रहा हो. इस स्थिति में भगत सिंह के खलिस चिंतन-रूप को बिगाड़-मिटाकर आम लोगों के समक्ष एक राष्ट्रवादी, विचारविहीन और समाजवादी लक्ष्य से परे एक भगत सिंहीय छवि गढ़ने की साजिश चलाई जा रही हो. सांप्रदायिक ओर अंधराष्ट्रवादी घालमेल से लबरेज ये फिल्में भगत सिंह को क्रांतिकारी के बजाय एक ‘सुपरमैन’ की तरह नई पीढी को दिखाने की कोशिशें करती लगती हैं जबकि इस क्रांतिकारी का बड़ा लक्ष्य एक धर्मनिरपेक्ष, वर्गविहीन, जाति मुक्त और शोषणरहित समाज की संरचना था जिसमें सर्वहरा की सत्ता हो. वह सत्ता परिवर्तन का पक्षधर तो कतई नहीं था. उसके सपने में व्यवस्था के बदलाव का संपूर्ण लेखा-जोखा था.

संतोषी की फिल्म ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ कमोवेश भगत सिंह की असली छवि के थोड़ी निकट पहुँचती है जिस पर संतोष किया जा सकता है. यहाँ समाजवादी अवधारणाओं पर बहस है जिसके माध्यम से क्रांतिकारी लक्ष्य को जानने-समझने में दर्शकों को कुछ मदद मिल सकती है. दृश्य में मार्क्स और लेनिन के चित्र आशय को और भी स्पष्ट करते हैं. इसमें काकोरी की शहादतों के बाद फीरोजशाह कोटला के खंडहरों में क्रांतिकारियों की बैठक का भी नजारा है जिसमें दल के नाम के साथ ‘समाजवादी’ शब्द का समावेश करके एक बड़ी और दूरगामी लड़ाई की योजना को आकार देने की क्रांतिकारियों की कोशिशों की छवियों को विस्मृत नहीं किया गया है. यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह फिल्म भगत सिंह के ही इर्द-गिर्द न घूमती रहकर उनके साथी कामरेडों के कुछेक अक्स भी सामने लाती है जो प्रशंसनीय है. अच्छा होता कि भगत सिंह पर बनी ये फिल्में अपने कालखंड के इतिहास की उस वैचारिक जद्दोजहद का भी थोड़ा-बहुत प्रस्तुतीकरण करतीं जहाँ कांग्रेस के लुंज पुंज विचार और उनकी आधी-अधूरी आजादी के लक्ष्य से उनका कड़ा टकराव था. 1925 से कुछ समय पूर्व बना ‘हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ’ जिसने 1928 तक आते-आते अनेक क्रांतिकारी कार्यक्रम में समाजवाद को समाहित कर लिया था, और तब तक इस दल ने मार्क्स और लेनिन के सिद्धांतों के प्रति अपनी पूर्ण आस्था व्यक्त कर ली थी यह किसी से छिपा नहीं है. हिंदी सिनेमा भगत सिंह और उनके साथियों की इस विचार संपदा की रक्षा नहीं कर पाया, यह कहना किसी तरह से गलत नहीं होगा. आधे-अधूरे भगत सिंह को पर्दे पर दिखाने या विचारधारा को एक तरफ रखकर नख-शिख-दंत विहीन भगत सिंह का प्रदर्शन अंततः इतिहास के प्रति न्याय नहीं है. यह इतिहास के प्रति वैसा ही षड्यंत्र और धोखा है जैसा एक समय पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में भारत सरकार की ओर से स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास लेखन के लिए डॉ. रमेशचंद्र मजूमदार को हटाकर डॉ. ताराचंद्र को लाकर किया गया ओर अपने पक्ष में मनमर्जी से छद्म अतीत की इबारतें दर्ज कराई गईं, जिसमें क्रांतिकारी संग्राम को कमतर करने की नापाक कोशिशें साफ दिखाई पड़ती हैं. यदि ये हिंदी फिल्मकार सांप्रदायिकता या अछूत के सवाल पर ही नहीं, समाजवाद और नास्तिकता के मसले पर भगत सिंह के प्रश्नों और तर्कों से थोड़ा भी रूबरू हो गए होते तो फिल्मों की ऐसी छीछालेदर न होती. भगत सिंह तब पूरे कदम के साथ वहाँ तनकर खड़े होते और दर्शक उनके लक्ष्यों को जानकर लाभान्वित हो सकते थे. तब वे अनावश्यक ही पुनर्जन्म के बवंडर में भगत सिंह जैसे धर्मनिरपेक्ष चिंतक को ढकेलने की गलतियाँ न करते. मैं पहले ही कह चुका हूँ कि फिल्में इतिहास नहीं होतीं और न ही उन्हें किसी इतिहास का आइना मानने की निरर्थक कवायदें करनी चाहिए, पर यह भी उतना ही है कि उन्हें इतिहास को विकृत करने और उसके मनमाने प्रस्तुतीकरण का भी कोई अधिकार नहीं मिल जाना चाहिए. भगत सिंह को गुजरे अभी अधिक समय नहीं बीता, और लंबी सजा पाए उनके संगी-साथी क्रांतिकारी तो आजाद हिंदुस्तान में अब तक जिंदा बचे हुए थे. उनके रहते फिल्मकार इस काम को ज्यादा बेहतर ढँग से सच के निकट पहुँचकर अंजाम दे सकते थे जिसे नहीं किया गया. आखिर क्या जरूरत थी भगत सिंह पर एक साथ पाँच-पाँच फिल्मों की. कोई एक साफ-सुथरी ऐतिहासिक तथ्यों को ठीक-ठाक छानबीन करके बनी फिल्म ही दर्शकों को उस कालखंड से परिचित कराने के लिए पर्याप्त थी जिसके नतीजे देखने के लिए हम लालायित होते.

याद आता है कि बहुत पहले मनोज कुमार की ‘शहीद’ फिल्म आई जो कुछेक ऐतिहासिक घटनाओं की भूलों के चलते भी दर्शकों को ज्यादा बाँध पाई थी. उसमें बम परीक्षण में शहीद हुए भगवतीचरण वोहरा की लाश को रावी नदी में जल प्रवाह करना दिखाया गया था जो सच नहीं था. असलियत यह थी कि उनकी मृत देह को वहीं गड्ढा खोदकर दफना दिया गया. रावी की छांड में उतना पानी नहीं था कि उसे बहाया जा सकता. बाद को मुखबिरी के आधार पर पुलिस ने भगवतीचरण की अस्थियाँ खुदवाकर मुकदमे में भी पेश कीं. फिल्मकार से ऐसा इसलिए हुआ कि यशपाल ने निजी स्वार्थवश अपनी संस्मरण कृति ‘सिंहावलोकन में पूरी घटना को तोड़-मरोड़कर इसी ढँग से पेश किया है जिससे भविष्य के लेखकों और फिल्मकार से इस तरह की भूलें होती चली गई. यदि क्रांतिकारियों पर लिखा गया दूसरा साहित्य भी देख-जाँच लिया जाता तो इस तरह की चीजों से बचा जा सकता था. पर हमारे यहाँ फिल्मकार ही नहीं, इतिहास को दर्ज करने वाले भी घटनाओं की गहराई में उतरने की कोशिशें नहीं करते. सब नकल करते हैं और वे अपने-अपने पूर्वाग्रहों से भी मुक्त नहीं हो पाते. इतिहास लेखन के लिए जिस निष्पक्षता और साहस की आवश्यकता होती है उसे प्रायः हम अनुपस्थित पाते हैं. क्रांतिकारी आंदोलन की गुप्त कार्यवाहियों के चलते संस्मरण लेखकों ने भी अपनी-अपनी तरह घटनाओं का प्रस्तुतीकरण करके स्थितियों को बहुत हद तक जटिल बनाया है. इसके लिए हम किसे दोष दें. संघ परिवार के लेखक यह जानने की कोशिश क्यों करेंगे कि भगत सिंह की जेल नोट बुक में सिर्फ मार्क्स और ऐंगल्स नहीं, वहाँ रूसों, देकार्त, स्पिनोजा, मार्क ट्वेन, दोस्तोयवस्की और अरस्तू की कृतियों से गुजरते हुए भगत सिंह ने अनेक विचारों और जीवन-पद्धति का निर्धारण किया था. भगत सिंह पर फिल्में बनाते हुए निर्माता अपनी दृष्टि को वहाँ तक फैलाकर ले जा सकते थे कि आजाद भारत में भगत सिंह जैसे नौजवान आज भी प्रताड़ित किए जा रहे हैं और ऐसा स्वतंत्र देश में शुरुआती समय से लेकर अब तक निरंतर होता चला आ रहा है. यह पूँजीवादी सत्ता और व्यवस्था का चरित्र है कि वह आज के भगत सिंह को अपने लिए खतरा ही नहीं मानता बल्कि उन्हें दंड भी देता है. भगत सिंह की विरासत आज भी जिंदा है पर वह दमन के लिए अभिशप्त है. शंकर शैलेंद्र (गीतकार शैलेंद्र) ने 1948 में ही अपनी प्रसिद्ध कविता में इसीलिए दर्ज कर दिया था –

भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की
यदि जनता की बात करोगे तुम गद्दार कहाओगे,
बंब-संब की छोड़ो भाषण दिया कि पकड़े जाओगे
न्याय अदालत की मत पूछो सीधे मुक्ती पाओगे
कांग्रेस का हुक्म जरूरत क्या वारंट तलाशी की

भगत सिंह का रास्ता संसदवाद की तरफ नहीं जाता. वह एक विद्रोही नायक है जिसके सपने में उस समाज की संरचना का आकार-प्रकार है जहाँ जाति-धर्म का बोलवाला नहीं होगा, जो पूँजी के खौफनाक खेल से मुक्त होती, जिसमें शोषण नहीं रहेगा और सत्ता सर्वहारा मजदूर-किसानों के हाथों की शक्ति बनेगी. आओ, इतिहास से लेकर फिल्मों, नाटकों और जमीन पर उसी भगत सिंह को उतारने की कोशिशों में हम सब बेधड़क होकर शामिल हों. संसदमुखी राजनीतिक दल, पेशेवर फिल्मकार और बिके हुए इतिहास लेखक इस काम को अंजाम नहीं दे सकते. हमें उनसे सावधान ही नहीं रहना है बल्कि उनके कुचक्रों का पर्दाफाश आगे बढ़कर करने का साहस दिखाना होगा. भगत सिंह पर बनी फिल्में जनता के साथ धोखा है. क्या कुछेक फिल्मकारों की इस बात पर हम भरोसा करें कि उनकी चित्रावली से भगत सिंह के वे दृश्य काट दिए गए जिनमें उनके भाषणों में मार्क्स का उल्लेख किया गया है. तो क्या फिल्म सेंसर बोर्ड पर सत्ता का शिकंजा है या वह संघ परिवार के चिंतन-मनन का प्रतिनिधित्व करता है. अतीत को तोड़ने-मरोड़ने की यह कोशिशें राजनीतिक या आर्थिक लाभ के लिए होती हैं तब फिर यह मसला और अधिक गंभीर बन जाता है जिसके लिए किसी को माफ नहीं किया जा सकता.

मुझे स्मरण है कि इन फिल्मों को भगत सिंह के भाई कुलतार सिंह के साथ देखने के बाद सहारनपुर में आयोजित एक समारोह में मेरे व्याख्यान से पूर्व एक नौजवान ने मुझसे खड़े होकर कहा – ‘आप असली भगत सिंह को जरूर सामने रखिए ताकि हम उनकी क्रांतिकारी छवि से परिचित हो सकें नहीं तो आज के युवक पूछने पर कहेंगे कि भगत सिंह का असली नाम अजय देवगन था.’ मैं उस नौजवान का आभारी हूँ कि इतिहास और अपने समय पर आने वाले खतरे की वह ठीक-ठाक शिनाख्त कर पा रहा था. छात्र – से लग रहे उस युवक का नाम मुझे याद नहीं रहा पर उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने आज भी घूम जाता है. उसके तेज और पनीले दृगों को मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा.

 

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क्या ताली बजाने से गरीबों की थाली में भोजन आ जाएगा ?

रायपुर. कोरोना वायरस से निपटने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाने के साथ-साथ घर के बाहर या छत पर ताली और थाली बजाने को कहा है. मोदी की हां में हां मिलाने वाली एक बड़ी आबादी ऐसा करने को तत्पर है. यह आबादी बड़ी बेसब्री से 22 तारीख का इंतजार कर रही है. जैसे ही यह तारीख आएगी...जोर-शोर से ताली-थाली बजाई जाएगी और उसका वीडियो वायरल कर दिया जाएगा. देश को ऐसे वीडियो से समर्थन मिलेगा. कोरोना भी सोच में पड़ जाएगा... यार कमाल के लोग हैं...थाली और ताली बजाकर ही खदेड़ने में सफल हो गए. इस आबादी में कुछ ऐसे लोग भी शामिल हैं जो शंख फूंकने की सलाह दे रहे हैं. ऐसे लोगों का मानना है कि कोरोना के खिलाफ युद्ध लड़ना है तो सुबह-शाम शंख फूंको. युद्ध में शंख ही फूंका जाता है. जबकि फेसबुक पर जीवन का सार उतारने वाले कुछ फेसबुकियों ने लिखा है- जब बजाना ही है तो क्यों न ढ़ोलक-तबला, हारमोनियम और गिटार बजाया जाय. इटली में भी लोग यही कर रहे हैं. उनका अच्छा टाइम पास हो रहा है. बहरहाल जो भी हो. मिले सुर मेरा-तुम्हारा गाने को ही जीवन का सब कुछ मानने वाली आबादी यह मानकर चल रही है कि  मोदी ने जो कुछ कहा है वह ठीक है. उनकी बात मानने में कोई बुराई नहीं है. दूसरी ओर सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में तर्क के साथ बात करने वाले यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या ताली बजाने से गरीबों की थाली में भोजन आ जाएगा ?

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते ने कोरोना से लड़ने के लिए मोदी के राजनीतिक संदेश को दिवालिएपन की निशानी बताया है. उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने जनता को संकल्प और संयम का नारा देकर उनके भरोसे छोड़ दिया है. थाली और ताली पिटवाने का काम पूरी तरह से गैर- वैज्ञानिक है. यह वही सरकार है जिसने स्वास्थ्य बजट में बड़ी कटौती की है जिसमें एम्स के आवंटन में इस वर्ष 100 करोड़ की कटौती भी शामिल है. जब देश में कोरोना की महामारी कम्युनिटी ट्रांसमिशन के तीसरे चरण में पहुंचने जा रही है और पूरी दुनिया इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं में इजाफा और प्रभावित लोगों को आर्थिक पैकेज देने की घोषणा कर रही है तब मोदी जुमलेबाजी कर रहे हैं. संजय पराते का कहना है कि महामारी का सबसे बड़ा हमला आम जनता की रोजी-रोटी पर होने जा रहा है. रोज कमाने-खाने वाले लोगों की आय में कमी आएगी तो भूखमरी बढ़ेगी. केरल ने अपने राज्य में कोरोना से निपटने के लिए जबरदस्त तैयारी की है इसलिए सभी सरकारों को केरल की तर्ज पर ही ज्यादा से ज्यादा पैकेज देने की घोषणा करनी चाहिए ताकि गरीब लोग अपनी प्रतिरोधक क्षमता को कायम रखते हुए कोरोना का मुकाबला कर सकें.

लोग-बाग 22 मार्च को जनता कर्फ्यू  लागू करने को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं. लोगों का कहना है कि इस दिन रविवार है. क्या कोरोना का वायरस भंयकर तरीके से रविवार के दिन ही फैलेगा? बाकी दिन क्या कोरोना आराम करेगा? एक लेखक ने लिखा है- प्रधान जी के भाषण से जनता का खूब मनोरंजन हुआ. कोरोना जैसे गम्भीर मसले पर इतनी हल्की बातों की उम्मीद नहीं थी.  एक दिन के लिए जनता खुद पर कर्फ्यू लगा लेगी तो क्या हो जाएगा ? बाकी दिन? कोई दीर्घकालिक योजना तो सामने आनी थी. शाम को 5 बजे से ताली और थाली बजाकर क्या हासिल हो जाएगा. भाषण में यह तो बताया ही नहीं गया कि जनता को मास्क और सैनिटाइजर देने के लिए सरकार क्या जुगत कर रही है. देश के बाहर लोग मास्क और सैनिटाइजर निर्माण के लिए उद्योगपतियों से मदद ले रहे हैं. भारत में कितने उद्योगपतियों से मास्क और सैनिटाइजर बनाने को कहा गया है.

एक खबर में कहा गया है- मोदी की सारी अपील का निचोड़ एक इवेंट जैसा होकर रह गया है. मोदी ने कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जंग को अपनी नाटकीय शैली में एक आयोजन में तब्दील कर दिया है. भारत में ख़स्ताहाल सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को देखते हुए यह उम्मीद की जा रही थी कि वे अमेरिका, ब्रिटेन और स्पेन की तर्ज पर वे कुछ फंड का ऐलान करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. देश के गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति और भी खराब है. सोचिए... अगर गांवों तक वायरस फैला तब क्या होगा?

इधर केरल में जैसे ही कोरोना वायरस से पीड़ितों की संख्या 25 पहुंची वहां वामदलों की सरकार ने फौरन 20 हज़ार करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान कर दिया है. लोगों के घरों से बाहर नहीं निकलने की वजह से होने वाली किसी भी दिक्कतों को दूर करने के लिए जानदार रोडमैप सामने रखा गया है. इस 20 हज़ार के पैकेज में  दो महीनों के लिए दी जाने वाली पेंशन के अग्रिम भुगतान सहित जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त अनाज देने की योजना भी शामिल की गई है. जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने स्वास्थ्य सुविधाओं का दायरा बढ़ाने और इसके लिए फंड आवंटित करने के बजाय साफ-साफ कहा है- रूटीन चेकअप के लिए अस्पताल जाने की आदत से बचना चाहिए. अगर बहुत ज़रूरी लग रहा हो तो अपने जान-पहचान वाले डॉक्टर, फैमिली डॉक्टर या रिश्तेदारी वाली डॉक्टरों से फोन पर ही सलाह ले लें. अगर आपने ऐसे किसी सर्जरी की डेट ले रखी हो जो तत्काल जरूरी न हो तो इसे भी आगे बढ़वा दें. एक महीने बाद की तारीख़ ले लें.

इधर कुछ लोग  जनता कर्फ्यू को सोशल मीडिया में साइंटिफक भी बता रहे हैं. ऐसे लोगों का मानना है कि इस बार जिसने भी मोदी जी को सलाह दी है वह बेहद जानदार है. ऐसे लोगों का कहना है कि जनता कर्फ्यू रविवार के बजाय शनिवार से लागू हो जाएगा. शनिवार की रात को लोग अपने-अपने घर में पहुंच जाएंगे तो रविवार को छुट्टी के मूड़ में आ जाएंगे. इस तरह लोग सोमवार की सुबह तक छुट्टी के मूड़ में रहेंगे. इस प्रकार 37 घंटे के कर्फ्यू में जो लोग अपने शरीर पर वायरस कैरी कर रहे हैं और संक्रमित नहीं हुए हैं, उनके वायरस की चेन टूट जाएगी. ( अगर कोई वायरस नया शरीर नहीं पाएगा तो वह 24 घंटे में मर जाएगा. ) इस प्रकार करोड़ों लोगों की वह चेन टूट जाएगी जो वायरस को लेकर सड़कों पर घूम रहे थे. इस क्रम से वे लोग बच जाएंगे जो सोमवार को संक्रमित होने जा रहे थे. जनता कर्फ्यू से भले ही सौ फीसदी सुरक्षित नहीं हुआ जा सकता, लेकिन संक्रमण की दर को काफी हद तक कम तो किया ही जा सकता है.


 

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बिल्डर सुभाष कुशवाहा पर 62 लाख का जुर्माना...इधर यूनिहोम्स रेंसीडेंसियल सोसासटी का मामला रेरा पहुंचा

रायपुर. छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण ( रेरा ) के पास गत दो सालों में प्रदेश के कई नामचीन बिल्डरों और कंस्ट्रक्शन कंपनियों के खिलाफ सैकड़ों शिकायतें पहुंची है, लेकिन ज्यादातर मामलों में नोटिस देकर जवाब मांगने का खेल चलता रहा है. रेरा में पदस्थ अफसरों की कार्य पद्धति को लेकर भी कई तरह की बातें सामने आ रही है. बिल्डरों और कंस्ट्रक्शन कंपनियों की धोखाधड़ी से परेशान नागरिकों का कहना है कि रेरा ने एकाध को छोड़कर कभी भी किसी बिल्डर पर ऐसी ठोस कार्रवाई नहीं की है जिससे गैर कानूनी ढंग से निर्माण करने वालों को सबक मिल सकें. रेरा से नोटिस मिलने के बाद ज्यादातर बिल्डर हाईकोर्ट की शरण ले-लेते हैं और वहां से स्टे ले आते हैं. इस तरह से पीड़ित उपभोक्ता का मामला हाईकोर्ट और रेरा के बीच झूलते रहता है. इधर एक मामले में ( रेरा नहीं )  उपभोक्ता फोरम ने मेसर्स लैंडमार्क एसोसिएट से जुड़े बिल्डर सुभाष कुशवाहा पर 62 लाख 31 हजार का जुर्माना ठोंका है. आनंद विहार अपार्टमेंट के फ्लैट में रहने वाले 31 लोगों ने बिल्डर के खिलाफ गुणवत्ताविहीन फ्लैट बनाकर देने की शिकायत की थी जिसके बाद उपभोक्ता फोरम ने यह आदेश पारित किया है.  

आनंद विहार अपार्टमेंट में रहने वाले प्रिंस देवांगन, स्वाति पांडे, रेखा चंद्रा, ज्योति संजय द्विवेदी, दिलीप देवांगन, देवी प्रसाद मिश्रा, नवनीत कुमार शुक्ला, अखिलेश कुमार वैष्णव, ज्योति साहू, सुनीता प्रकाशचंद जैन सहित कुल 31 परिवादियों ने उपभोक्ता फोरम में शिकायत देकर यह कहा था कि उनके फ्लैट का निर्माण कार्य बेहद घटिया है. फ्लैट में वेक्ट्रीफाइड टाइल्स की जगह सिरेमिक टाइल्स लगाई गई है. मॉड्यूलर स्ट्रक्चर नहीं बनाया गया है. सेरेमिक टाइल्स 4 फीट की जगह कम ऊंचाई की लगाई गई है. सेनेटरी सामान की क्वालिटी खराब है. प्रवेश द्वार में मार्टिस लॉक नहीं है. इलेक्ट्रिक वायरिंग सही नहीं की गई है.मीटर रूम खुला हुआ है तो बिजली के वायर खुली हालत में है.सीसीटीवी और अग्निशमन यंत्र की व्यवस्था नहीं की गई है. पार्किंग और सिक्योरिटी प्रबंध नहीं है. सम्पवेल का निर्माण अधूरा है. टंकियों में प्लास्टर नहीं किया गया है. लिफ्ट बंद है, बाउंड्री वॉल में प्लास्टर नहीं है. सीढ़ियां अधूरी एवं जर्जर है तथा कार्य पूर्ण कर नगर निगम को कालोनी का हस्तांतरण नहीं किया गया है.नागरिकों की शिकायत के बाद जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने बिल्डर संस्थान के पार्टनर भिलाई के सुभाष कुशवाहा के खिलाफ आदेश पारित करते हुए 62 लाख 31 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है. इसके अलावा बिल्डर को अपार्टमेंट और फ्लैट में हुए दोषपूर्ण कार्य को ठीककरने के लिए 6 माह का समय भी दिया है.

यूनिहोम्स रेसीडेंसियल कॉपरेटिव सोसायटी के खिलाफ शिकायत

इधर भाठागांव स्थित यूनिहोम्स रेसीडेंसियल कॉपरेटिव्ह सोसायटी का मामला रेरा जा पहुंचा है. ( अब पता नहीं इस सोसायटी में रहने वाले लोगों को भी रेरा से न्याय मिल पाएगा या नहीं ? ) सोसायटी के रहवासियों का आरोप है कि बिल्डर ने मकान बेचने के दौरान चमकदार ब्रोशर-पंपलेट में जिस ढंग का वादा किया था उसमें एक भी पूरा नहीं किया गया. इतना ही नहीं परिसर के अंदर एक और कालोनी विकसित करने की कवायद चल रही है और काम्पलेक्स के लिए आरक्षित की गई जमीन पर भी प्लाट काटकर बेचा जा रहा है. अगर इस कालोनी के भीतर ही एक दूसरी कालोनी विकसित हो जाती है यूनिहोम्स सोसायटी का मुख्य मार्ग बाधित हो जाएगा.

 

 

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