पहला पन्ना

Previous12345Next

बिल्डर सुभाष कुशवाहा पर 62 लाख का जुर्माना...इधर यूनिहोम्स रेंसीडेंसियल सोसासटी का मामला रेरा पहुंचा

रायपुर. छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण ( रेरा ) के पास गत दो सालों में प्रदेश के कई नामचीन बिल्डरों और कंस्ट्रक्शन कंपनियों के खिलाफ सैकड़ों शिकायतें पहुंची है, लेकिन ज्यादातर मामलों में नोटिस देकर जवाब मांगने का खेल चलता रहा है. रेरा में पदस्थ अफसरों की कार्य पद्धति को लेकर भी कई तरह की बातें सामने आ रही है. बिल्डरों और कंस्ट्रक्शन कंपनियों की धोखाधड़ी से परेशान नागरिकों का कहना है कि रेरा ने एकाध को छोड़कर कभी भी किसी बिल्डर पर ऐसी ठोस कार्रवाई नहीं की है जिससे गैर कानूनी ढंग से निर्माण करने वालों को सबक मिल सकें. रेरा से नोटिस मिलने के बाद ज्यादातर बिल्डर हाईकोर्ट की शरण ले-लेते हैं और वहां से स्टे ले आते हैं. इस तरह से पीड़ित उपभोक्ता का मामला हाईकोर्ट और रेरा के बीच झूलते रहता है. इधर एक मामले में ( रेरा नहीं )  उपभोक्ता फोरम ने मेसर्स लैंडमार्क एसोसिएट से जुड़े बिल्डर सुभाष कुशवाहा पर 62 लाख 31 हजार का जुर्माना ठोंका है. आनंद विहार अपार्टमेंट के फ्लैट में रहने वाले 31 लोगों ने बिल्डर के खिलाफ गुणवत्ताविहीन फ्लैट बनाकर देने की शिकायत की थी जिसके बाद उपभोक्ता फोरम ने यह आदेश पारित किया है.  

आनंद विहार अपार्टमेंट में रहने वाले प्रिंस देवांगन, स्वाति पांडे, रेखा चंद्रा, ज्योति संजय द्विवेदी, दिलीप देवांगन, देवी प्रसाद मिश्रा, नवनीत कुमार शुक्ला, अखिलेश कुमार वैष्णव, ज्योति साहू, सुनीता प्रकाशचंद जैन सहित कुल 31 परिवादियों ने उपभोक्ता फोरम में शिकायत देकर यह कहा था कि उनके फ्लैट का निर्माण कार्य बेहद घटिया है. फ्लैट में वेक्ट्रीफाइड टाइल्स की जगह सिरेमिक टाइल्स लगाई गई है. मॉड्यूलर स्ट्रक्चर नहीं बनाया गया है. सेरेमिक टाइल्स 4 फीट की जगह कम ऊंचाई की लगाई गई है. सेनेटरी सामान की क्वालिटी खराब है. प्रवेश द्वार में मार्टिस लॉक नहीं है. इलेक्ट्रिक वायरिंग सही नहीं की गई है.मीटर रूम खुला हुआ है तो बिजली के वायर खुली हालत में है.सीसीटीवी और अग्निशमन यंत्र की व्यवस्था नहीं की गई है. पार्किंग और सिक्योरिटी प्रबंध नहीं है. सम्पवेल का निर्माण अधूरा है. टंकियों में प्लास्टर नहीं किया गया है. लिफ्ट बंद है, बाउंड्री वॉल में प्लास्टर नहीं है. सीढ़ियां अधूरी एवं जर्जर है तथा कार्य पूर्ण कर नगर निगम को कालोनी का हस्तांतरण नहीं किया गया है.नागरिकों की शिकायत के बाद जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने बिल्डर संस्थान के पार्टनर भिलाई के सुभाष कुशवाहा के खिलाफ आदेश पारित करते हुए 62 लाख 31 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है. इसके अलावा बिल्डर को अपार्टमेंट और फ्लैट में हुए दोषपूर्ण कार्य को ठीककरने के लिए 6 माह का समय भी दिया है.

यूनिहोम्स रेसीडेंसियल कॉपरेटिव सोसायटी के खिलाफ शिकायत

इधर भाठागांव स्थित यूनिहोम्स रेसीडेंसियल कॉपरेटिव्ह सोसायटी का मामला रेरा जा पहुंचा है. ( अब पता नहीं इस सोसायटी में रहने वाले लोगों को भी रेरा से न्याय मिल पाएगा या नहीं ? ) सोसायटी के रहवासियों का आरोप है कि बिल्डर ने मकान बेचने के दौरान चमकदार ब्रोशर-पंपलेट में जिस ढंग का वादा किया था उसमें एक भी पूरा नहीं किया गया. इतना ही नहीं परिसर के अंदर एक और कालोनी विकसित करने की कवायद चल रही है और काम्पलेक्स के लिए आरक्षित की गई जमीन पर भी प्लाट काटकर बेचा जा रहा है. अगर इस कालोनी के भीतर ही एक दूसरी कालोनी विकसित हो जाती है यूनिहोम्स सोसायटी का मुख्य मार्ग बाधित हो जाएगा.

 

 

और पढ़ें ...

छत्तीसगढ़ में निजी कंस्ट्रक्शन कंपनी और बिल्डरों से सावधान... संजय श्रीश्रीमाल के ग्रीन अर्थ इन्फ्रावेंचर्स का मामला भी थाने और रेरा पहुंचा

रायपुर. अगर आप छत्तीसगढ़ में रहते हैं और किसी निजी बिल्डर / प्रमोटर या कंस्ट्रक्शन कंपनी से मकान-दुकान और प्लाट खरीदने की सोच रहे हैं तो आपको पूरी तरह से सावधान रहने के जरूरत है. हालांकि कुछ कंस्ट्रक्शन कंपनियां अपने ग्राहकों की सुविधाओं का ध्यान भी रख रही है, लेकिन ज्यादातर कंपनियां धोखाधड़ी पर उतर आई है.अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन और आकर्षक पोस्टरबाजी के जरिए ग्राहकों को फंसाने का खेल जबरदस्त ढंग से चल रहा है. अगर आप किसी विज्ञापन के झांसे में नहीं आए तब खूबसूरत और मखमली आवाज वाली लड़कियों का फोन आपको साइट ( जहां फ्लैट निर्मित हो रहा होता है ) देखने के लिए मजबूर कर सकता है और आप तब भी धोखाधड़ी का शिकार हो सकते हैं. छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण ( रेरा ) के पास हर रोज किसी न किसी निजी बिल्डर की शिकायत पहुंच रही है. ज्यादातर शिकायतों में ग्राहकों का यहीं कहना है कि बिल्डर ने ठग लिया है. इधर प्रदेश के एक बड़े बिल्डर संजय श्री श्रीमाल के मेसर्स ग्रीन अर्थ इन्फ्रावेन्चर्स का मामला भी रेरा पहुंच गया है.

पार्किंग को बेच देने का आरोप

अमलेश्वर के पास ग्रीन अर्थ इन्फ्रावेंचर्स ने वर्ष 2011 में 42 एकड़ भूमि पर ग्रीन अर्थ कालोनी बसाई है. इस कालोनी में कई तरह के फ्लैट है, लेकिन जल्द ही इस फ्लैट में रहने वाले लोगों को अहसास हो गया कि पोस्टर-बैनर और अखबार में छपे विज्ञापन को देखकर जो फ्लैट उन्होंने खरीदा था वह न केवल गुणवत्ताविहीन है बल्कि सुविधाओं से महरूम भी है. कालोनी में रहने वाले रहने लोगों का कहना है कि बिल्डर ने अपने ब्रोशर में कई तरह के चमकदार सपने दिखाए थे लेकिन वह सपने केवल सपने साबित हुए. बिल्डर ने सही ढंग से न तो क्लब हाऊस बनाया है और न ही गार्डन. इतना ही नहीं  स्विमिंग पूल, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पोस्ट ऑफिस, बॉलीवाल कोर्ट, बैडमिंटन कोर्ट, बास्केटबॉल कोर्ट, योगा और मेडिटेशन सेंटर, बाउंड्रीवाल, 24 घण्टे सिक्योरिटी, स्ट्रीट लाइट, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट, लिफ्ट की सुविधा भी आधी-अधूरी और अधकचरी है. बिल्डर ने ओपन पार्किंग को भी 30-30 हजार रुपए में बेच दिया है और पार्किंग का अलॉटमेंट पत्र भी नहीं दिया. जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार कोई भी बिल्डर ओपन पार्किंग नहीं बेच सकता है.

इस मामले में जब ग्रीन अर्थ सिटी वेलफेयर सोसायटी के पदाधिकारी अध्यक्ष, नारायण लाल शर्मा, पूर्व अध्यक्ष धीरपाल वर्मा, उपाध्यक्ष अनिल कुमार, सचिव रमेश चंद्र गुप्ता और कोषाध्यक्ष केतन मेहता ने बिल्डर से संपर्क साधा तो उन्होंने साफ-साफ कहा कि हम किसी भी सूरत में अधूरे काम को पूरा नहीं कर सकते. कालोनी वासियों से बिल्डर से लिखित में जवाब मांगा तो बिल्डर ने कहा- हम लिखित में कुछ भी नहीं दे सकते. जहां शिकायत करना हो कर दीजिए. बिल्डर की बेरूखी के बाद अध्यक्ष नारायण लाल शर्मा मामले को थाने और रेरा ले गए हैं.

इधर रेरा ने संजय श्रीश्रीमाल को एक नोटिस भेजकर शिकायतकर्ता को जवाब देने को कहा है. रेरा ने अपनी नोटिस में साफ-साफ कहा है कि आपको हर हाल में शिकायतकर्ता को एग्रीमेंट की प्रति, समय-समय पर ली गई धनराशि. शिकायतकर्ता को आधिपत्य सौंपे जाने के संबंध में दस्तावेज, अब तक आधिपत्य नहीं सौंपे जाने का कारण, नगर निवेश निर्माण की अनुमति, विकास अनुज्ञा, भूमि डायवर्सन संबंधी दस्तावेज, रेरा के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन की स्थिति सहित अन्य सभी आवश्यक जानकारी देनी होगी.

नोटिस मिलेगी तो जवाब देंगे

मेरे खिलाफ थाने में झूठी शिकायत की गई है कि मैंने नारायण लाल शर्मा को जान से मारने की धमकी दी है. मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है. थाने वालों ने पक्ष जानना चाहा तो मैंने उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया है. जहां तक रेरा में शिकायत का संबंध है तो अभी मुझे किसी भी तरह की नोटिस नहीं मिली है. अगर नोटिस मिलती है तो वहां भी जवाब प्रस्तुत कर देंगे.

संजय श्रीश्रीमाल ( डायरेक्टर मेसर्स ग्रीन अर्थ इन्फ्रावेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड )

 

 

 

और पढ़ें ...

पार्थिवी, वाल्फोर्ट, वात्सल्य, गोल्ड ब्रिक्स, गणपति, गोयल सहित कई नामी कंस्ट्रक्शन कंपनियों की शिकायत रेरा में

रायपुर. अगर आप किसी निजी कंस्ट्रक्शन कंपनी से भवन खरीदने की सोच रहे हैं तो कई तरह की पूछ-परख और जांच-पड़ताल के बाद ही अपनी सौदाबाजी को अंजाम दें. कहीं ऐसा न हो कि जीवन भर की जमापूंजी खर्च करने के बाद आपको पछतावा हो. दरअसल भवनों का  निर्माण करने वाली कंस्ट्रक्शन कंपनियां अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन और आकर्षक पोस्टरबाजी से ग्राहकों को लुभा तो रही है, लेकिन वे वह सुविधांए नहीं दे पा रही है जिस पर ग्राहकों का हक है. छत्तीसगढ़ भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण ( रेरा ) के पास गत दो सालों में कई नामचीन कंस्ट्रक्शन कंपनियों के खिलाफ सैकड़ों शिकायतें पहुंची है. अकेले रायपुर जिले में ही 109 बिल्डर और प्रमोटरों के खिलाफ 318 शिकायतें दर्ज की गई जबकि बिलासपुर में 14 बिल्डरों के खिलाफ 30 शिकायतें सामने आई है. हालांकि यह दावा भी सामने आया है कि अधिकांश हितग्राहियों की शिकायतों का निराकरण कर लिया गया है, लेकिन हितग्राहियों का कहना है कि प्रमोटर और बिल्डरों ने एक तरह से उनके साथ धोखा ही किया है. किसी ने अनुबंध के अनुसार  आधिपत्य नहीं सौंपा तो किसी ने ब्रोशर के मुताबिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई. कुछ बिल्डरों और प्रमोटरों का निर्माण कार्य ही गुणवत्ता विहीन था.

ये हैं छत्तीसगढ़ की नामचीन कंस्ट्रक्शन कंपनियां

कंस्ट्रक्शन कंपनी पार्थिवी के खिलाफ सुनीता बसाक, सुनीता मुदलियार, श्रीमती निधि साव, पीतेश जोशी, मोहम्मद अनवर खान, रचित अग्रवाल, मुबारक खान, श्रीमती ईला तिवारी, श्री योगी राज पाण्डेय, इंद्रानिल चट्टोपाध्याय, श्रीमती रुपाली श्रीवास्तव सहित कुल 11 लोगों ने शिकायत दर्ज करवाई है. वात्सल्य बिल्डर्स एंड डेव्हलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर पुरुषोत्तम राव गडगे के खिलाफ आजीम खान, श्रीमती शारदा पटेल, सुनीता पटेल, संदीप सिंह चौहान, श्रीमती सरस्वती वर्मा, एमआर सिद्दकी, ब्रम्हादेव चौधरी, विशाल सिंह, अभिषेक राजपूत, श्रीमती इंद्रावती द्विवेदी ने शिकायत दर्ज की है. वालफोर्ट प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर पंकज लाहोटी के खिलाफ अमितेश साहू, श्रीमती ब्लेस्सी मैथ्य, बैजनाथ पांडे, कुमुद अग्रवाल, वैशाली कुंभाकर, अनंत प्रकाश सिंह, प्रीति कुमारी, नीता पटले, श्रीमती नवदीप कौर ढिल्लन की शिकायत रेरा पहुंची है. मेसर्स गोल्डब्रिक्स इन्फास्ट्राक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड ( जेसीसी ग्रुप ) के डायरेक्टर के खिलाफ अतुल अग्रवाल, सुमीत अग्रवाल,  अतीत कुमार अग्रवाल, सत्यनारायण अग्रवाल,  आशीष कुमार अग्रवाल, श्रीमती शारदा देवी अग्रवाल, श्रीमत अनिता सिन्हा, सुजीत कुमार दास, अभिताभ सिन्हा, नहर सिंह यादव, अशोक कुमार सिंह, श्रीमती सरिता श्रीवास्तव, अनुपम पांडेय, सुरेश कुमार पटनायक, श्रीमती श्वेता श्रीवास्तव, योगेंद्र सिंह, अपर्णा पनवार, अमित शर्मा, श्रीमती डी लक्ष्मी, कमलेश कुमार जैन ने शिकायत दर्ज करवाई है. सांई कृष्णा बिल्डर्स एण्ड प्रमोटर्स के खिलाफ अमर कुलकर्णी, लिखेश्वर साहू, मनोज जैन की शिकायत शामिल की गई है. मेसर्स अबीर बिल्डकान प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर अफताब सिद्दकी के खिलाफ संदीप राठौर, राहुल जैन, कमलेश दास, श्रीमती कविता श्रीमाली, आशीष कुमार भदराजा, गौरव टंडन, सचिन कुमार गुप्ता की शिकायत रेरा पहुंची है. रायपुर में गणपति हाइटस बनाने वाले गणपति डेव्हलपर्स के खिलाफ सुंदर दास खत्री, अनीता बाई, श्रीमती नीतू  कुकरेजा ने शिकायत दर्ज करवाई है. इंद्रपस्थ प्रोजेक्ट के कर्ताधर्ता मेसर्स पंचामृत इंटरटेनमेट प्राइवेट लिमिटेड के गौतमचंद जैन की दो शिकायतें दर्ज है. इम्प्रेशिया इलाइट का निर्माण करने वाले मेसर्स आरएस ड्रीम लैंड प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ गिरधारी लाल पंजवानी की शिकायत रेरा पहुंची है. इसी तरह केएससी इंटरप्राइजेस प्राइवेट लिमिटेड और डीएमबी इन्फ्राटेक के डायरेक्टर सुनील साहू के खिलाफ ग्यासुद्दीन, मनोज ठाकुर ने शिकायत की है. डालफीन प्रमोटर्स एण्ड बिल्डर्स और ब्रांड क्रियेशन के हरमीत सिंह होरा के खिलाफ मधु बलानी की शिकायत रेरा पहुंची है. रायपुर हाउसिंग  एण्ड डेव्हलपर्स के किशोर नायक और कौस्तुभ मिश्रा के खिलाफ विपिन श्रीवास, त्रिलोकीनाथ शर्मा, पन्नालाल चौधरी, नरेश देवीदास, उत्तम कुमार सोनी, पीतेश चार्वे ने शिकायत की है. लोट्स टॉवर बनाने वाले ए. ढेबर के खिलाफ श्रीमती सुप्रिया मजूमदार की शिकायत है. रेरा में अन्य जिन कंस्ट्रक्शन कंपनियों के खिलाफ शिकायत हुई है उनमें मेसर्स एम आहूजा, ओम सांई डेव्हलपर्स, अनुराधा कंस्ट्रक्शन, मेसर्स अभिलाषा बिल्डर्स ( पार्टनर अमरजीत सिंह दत्ता, विरेंद्र सिंह दत्ता ), नवभारत डवेलिंग प्राइवेट लिमिटेड डायरेक्टर रोहित श्रीवास्तव, नेक्सस देवकॉन प्राइवेट लिमिटेड के तरुण मरवाहा, मेसर्स ग्रीनअर्थ इन्फ्रावेन्चर्स, महालक्ष्मी सिटी होम्स के डायरेक्टर श्याम सुंदर अग्रवाल, पुरन्दर प्रमोटर्स डेव्हलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर ऋषि सिंह वाधवा, आरए रियल स्टेट के डायरेक्टर राकेश अग्रवाल का नाम शामिल है. बिलासपुर में मेसर्स सुपरटेक प्रोजेक्ट एंड कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर आशीष जयवाल, प्रधुमन साहू, अनता इन्फ्रामार्ट, रविशंकर सोनी, श्रीमती सुधा गुप्ता, प्रमोद सिंह ठाकुर के खिलाफ शिकायत हुई है.

यह है रेरा एक्ट

बिल्डरों और प्रॉपर्टी डीलरों द्वारा एक लंबे समय से गैर-कानूनी ढंग से कस्टमर से पैसे लिए जा रहे थे. इतना ही नहीं उन्हें घटिया क्वालिटी का कंस्ट्रक्शन दिया जा रहा था. इस तरह की लंबी शिकायतों के बाद भारत सरकार नें वर्ष 2017 में रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट लागू किया था. इसके तहत रियल एस्टेट अर्थात जमीन अथवा प्रॉपर्टी से सम्बंधित सभी गैर-कानूनी कामों को प्रतिबंधित जाना है. छत्तीसगढ़ में भी लोग शिकायतें दर्ज कर रहे हैं. हालांकि अभी भी दबाव के चलते बड़े बिल्डरों के खिलाफ सही शिकायतें सामने नहीं आ पा रही है. कुछ लोगों ने छत्तीसगढ़ हाउसिंग और रायपुर विकास प्राधिकरण के खिलाफ भी शिकायत दर्ज करवाई है.

 

और पढ़ें ...

जब सारकेगुड़ा में मारे जा रहे थे बेकसूर आदिवासी तब क्या कर रहे थे खुफिया चीफ मुकेश गुप्ता, आईजी लांगकुमेर और एसपी प्रशांत अग्रवाल ?

रायपुर. सारकेगुड़ा न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट के सामने आने के साथ ही यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि 28-29 जून 2012 की दरम्यानी रात जब सीआपीएफ और सुरक्षाबलों की टीम बेकसूर आदिवासियों को मौत के घाट उतार रही थीं तब खुफिया महकमे के प्रमुख मुकेश गुप्ता, बस्तर आईजी की कमान टीजे लांग कुमेर और पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल क्या कर रहे थे ?

पूरे देश में हलचल मचा देने वाली यह घटना तब हुई थीं तब सत्ता में डाक्टर रमन सिंह की सरकार काबिज थीं, लेकिन तब नक्सल मामलों की पूरी कमान स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो मुकेश गुप्ता के हाथ में थीं. इसके अलावा बस्तर आईजी टीजे लांग कुमेर और बीजापुर एसपी प्रशांत अग्रवाल को भी नक्सल मामलों को एक्सपर्ट माना जाता था. इधर न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट के आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता, आईजी टीजे लांग कुमेर, प्रशांत अग्रवाल और घटना के दिन सुरक्षाबलों का नेतृत्व कर रहे डीआईजी एस इंलगो, डिप्टी कमांडर मनीष बरमोला निर्दोष आदिवासियों की मौत के लिए जिम्मेदार नहीं है ? अगर है तो... क्या इन अफसरों पर कोई कार्रवाई सुनिश्चित हो पाएगी ?

पहले ही साफ हो गया था मुठभेड़ फर्जी है

देश को दहला देने वाली घटना के बाद जब राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ फैक्ट फाइडिंग टीम के सदस्यों ने सारकेगुड़ा का दौरा करना चाहा तब काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था. सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को माओवादी ठहराकर गोलियों से भून देने की धमकी-चमकी दी गई थी. देश के कई बड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता आंध्र प्रदेश के रास्ते भोपालपट्टनम होकर गांव में दस्तक दे पाए थे. छत्तीसगढ़ के कुछ चुनिंदा अखबार और चैनल के संवाददाताओं ने गांव जाकर हकीकत जानने की कोशिश तो की थी, लेकिन स्थानीय मीडिया के लोग पूरी तरह से दहशत में थे न जाने कब उन्हें भी माओवादी ठहराकर मौत के घाट उतार दिया जाएगा. जैसे-तैसे देश के कुछ चैनल और मैग्जीन के संवाददाता अपनी जान हथेली पर लेकर वहां पहुंच सकें थे. प्रशासन का पूरा अमला उनकी भी बोलती बंद कर देने के फिराक में जुटा हुआ था. एक पाक्षिक मैग्जीन के संवाददाता को अज्ञात फोन के जरिए धमकी दी गई थी कि अगर माओवादी बनकर मरना नहीं चाहते हो वापस लौट जाओ. पत्रकारों का दल घटना स्थल पर न पहुंच पाए इसके लिए हर नाके पर पुलिस कम गुंडों की फौज तैनात की गई थीं. कुछ पत्रकार ग्रामीणों की वेशभूषा पहनकर गांव तक पहुंचने में कामयाब तो हुए लेकिन उन्हें भी जान बचाने के लिए आंध्र के रास्ते से भागना पड़ा था.

चलती रही लीपा-पोती

जो सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार इस घटना को कव्हरेज करने गए थे वे प्रथम दृष्टया ही यह जान गए थे कि सुरक्षा बल ने बेकसूर लोगों को मौत के घाट उतार दिया है और सरकार मामले की लीपा-पोती में लग गई है. हकीकत यह थी कि सारकेगुड़ा के दो टोलों राजपेटा और कोत्तागुड़ा के ग्रामीण बीज-पंडूम का त्योहार कैसे मनाया जाय... इसके लिए बैठक कर रहे थे. घटना के दिन रात दस बजे तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन जब ग्रामीणों ने संगीत में रुचि रखने वाले एक युवक नागेश से मांदर बजाने का आग्रह किया तभी सूखे पत्तों पर लय-ताल के साथ बूटों की आवाज सुनाई दी. इससे पहले गांववाले कुछ भांप पाते... फायरिंग शुरू हो गई थीं. घटना में कुल 17 लोग मारे गए थे जिसमें मड़काम दिलीप, मड़काम रामविलास, अपका मिठू, काका सरस्वती, कुंजाम मल्ला, कोरसा बिचम, इरपा सुरेश और काका राहुल सहित कुल नौ नाबालिग थे. घटना के दौरान केंद्र में केंद्रीय गृहमंत्री पी चिंदम्बरम थे. पहले तो उन्होंने इसे एक बड़ी कामयाबी निरूपित किया, मगर जब उन्हें पता चला कि पूरा मामला फर्जी है तो उन्होंने माफी मांग ली थी. चिदम्बरम की माफी के बाद भी प्रदेश की पुलिस लीपा-पोती के खेल में जुटी रही. पुलिस की ओर से यह प्रचारित किया जाता रहा कि जो मारे गए थे वे पूरी तरह से नक्सली थे. ग्रामीणों को नक्सली बताकर क्लीन चिट लेने की यह कवायद ज्यादा दिन नहीं चल पाई. थोड़े ही दिनों बाद प्रशासन के लोग साड़ी, कपड़ा, गहना, कंबल, अनाज और नोटों से भरा बोरा लेकर गांव पहुंच गए. गांव में मौजूद कमला काका नाम की एक युवती ने तब सवाल उठाया कि अगर  गांव के लोग और उनके परिजन नक्सली है तो फिर सरकार उनको अनाज, कपड़ा और मुआवजा क्यों दे रही है ? क्या सरकार नक्सलियों को भी पैसा बांटती है ?  इधर आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब सबकी निगाहें इस बात को लेकर टिक गई है कि पूरे मामले में जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और अफसरों के खिलाफ क्या कोई एफआईआर दर्ज हो पाएगी ? क्या बेकसूर आदिवासियों के हत्यारे जेल के शिंकजों के पीछे पहुंच पाएंगे ? भूपेश सरकार को यह तो पता लगाना ही चाहिए कि आखिर किसके इम्पुट और निर्देश के बाद सुरक्षा बलों ने बेगुनाह आदिवासियों को मौत के घाट.उतार दिया था.

 

और पढ़ें ...

रमन ने एक बार भी नहीं कहा- मारे गए हैं 17 बेकसूर आदिवासी तो हत्यारों पर जुर्म दर्ज होना चाहिए

रायपुर. विधानसभा में सोमवार को पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह ने सारकेगुड़ा  न्यायिक जांच रिपोर्ट के मीडिया में लीक होने का मामला तो उठाया, लेकिन एक बार भी यह नहीं कहा कि 17 बेकसूर आदिवासी मारे गए हैं तो हत्यारों पर जुर्म दर्ज होना चाहिए. रमन सिंह की तरह ही भाजपा के अन्य सदस्यों ने भी इस बात के लिए खूब हो-हल्ला मचाया कि सारकेगुड़ा न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट विधानसभा में पेश होने के पहले मीडिया में कैसे लीक हो गई. सदस्यों ने विधानसभा अध्यक्ष को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की सूचना देते हुए चर्चा की मांग की. जनता कांग्रेस के धर्मजीत सिंह ने कहा कि जो न्यायिक रिपोर्ट पेश हुई है उस पर चर्चा करने में कहीं कोई दिक्कत पेश नहीं आनी चाहिए. यह प्रकरण तब का है जब रमन सरकार काबिज थीं. कांग्रेस के सदस्य मोहन मरकाम ने कहा कि पिछली सरकार में निर्दोष ग्रामीणों की हत्या की गई थी. अब यह रिपोर्ट पेश हो गई है तो इस पर चर्चा आवश्यक है. सदन के बाहर विधानसभा परिसर में आदिवासी मंत्री कवासी लखमा ने कहा कि जब यह घटना हुई तब प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह थे. उन्होंने रमन सिंह के अलावा उस समय के गृहमंत्री और  अफसरों पर जुर्म दर्ज होना चाहिए.

अड़े रहे सदस्य

विपक्ष के सदस्य रिपोर्ट पर चर्चा के बजाय इस बात पर अड़े रहे कि रिपोर्ट मीडिया में कैसे लीक हुई. भाजपा के वरिष्ठ सदस्य नारायण चंदेल ने कहा कि विधानसभा में रिपोर्ट के पेश होने के पहले उसका लीक हो जाना गंभीर मामला है. अजय चंद्राकर ने कहा कि सदन में रिपोर्ट पेश हुई है, लेकिन कार्यसूची में उसका जिक्र नहीं है. आसंदी पर सभापति सत्यनायारण शर्मा मौजूद थे, उन्होंने टोकते हुए कहा कि पूरक कार्यसूची में रिपोर्ट पेश होने की जानकारी दी गई है. विपक्ष के सदस्य काफी देर तक इस बात के लिए शोर-शराबा करते रहे कि रिपोर्ट के लीक हो जाने से विधानसभा की अवमानना हो गई है. शोर-शराबे के बीच ही सदन की कार्रवाई पहले पांच मिनट के लिए स्थगित की गई. जब दोबारा कार्रवाई प्रारंभ की गई तो विपक्ष के सदस्य गर्भगृह चले गए और सदन की कार्रवाई से निलंबित हो गए.

और पढ़ें ...

रमन सिंह के शासनकाल में मारे गए थे 17 बेगुनाह आदिवासी... अब जाकर आयोग ने माना कि एक भी नहीं था माओवादी

रायपुर. बस्तर के सारकेगुड़ा गांव में मुठभेड़ की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग ने 78 पेज की अपनी रिपोर्ट में यह मान लिया है कि कोत्तागुड़ा और राजपेटा में 28-29 जून 2012 की दरम्यानी रात सीआरपीएफ और सुरक्षाबलों की संयुक्त टीम ने जिन 17 लोगों को माओवादी बताकर मार गिराने का दावा किया था उनमें से एक भी माओवादी नहीं था.

पूरे देश में हलचल मचा देने वाली यह घटना तब हुई थीं तब छत्तीसगढ़ में डाक्टर रमन सिंह की सरकार काबिज थीं. घटना के बाद सरकार और उसके नुमाइंदे लगातार यह झूठ बोलते रहे कि मुठभेड़ में माओवादियों को ही मौत के घाट उतारा गया है, लेकिन इलाके के मुआयने में गए पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय इस घटना को लेकर बिल्कुल अलग थी. जब इस मामले में सरकार की खूब फजीहत हुई तब सरकार ने 14 दिसम्बर 2012 को जबलपुर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश वीके अग्रवाल की अध्यक्षता में आयोग का गठन कर दिया था. इधर सात सालों की मशक्कत के बाद एक सदस्यीय आयोग ने भूपेश सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. हालांकि सूत्र बताते हैं कि आयोग ने अपनी रिपोर्ट इसी महीने के प्रारंभ में ही सौंप दी थी, लेकिन सार्वजनिक नहीं की गई. जानकार बताते हैं  कि यह रिपोर्ट सोमवार को विधानसभा पेश की जाएगी.

यह कहती है रिपोर्ट

1-रिपोर्ट में यह साफ तौर पर कहा गया है कि 28-29 जून की दरम्यानी रात ग्रामीण गांव में बैठक कर रहे थे तभी सुरक्षाबलों ने फायरिंग कर दी और आदिवासी मारे गए थे.

2- जिन ग्रामीणों से सुरक्षाबलों का टकराव हुआ उनके बारे  में कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं मिला जिससे साबित होता हो कि ग्रामीणों में से कोई नक्सली था. जो व्यक्ति मारे गए उन्हें लेकर भी यह सबूत नहीं मिल पाया कि वे माओवादी थे . मारे लोगों में कुछ नाबालिग भी थे.

3-जब सारकेगुड़ा में घटना हुई तब सुरक्षाबलों का नेतृत्व डीआईजी एस इंलगो और डिप्टी कमांडर मनीष बरमोला कर रहे थे. इन दोनों ने यह स्वीकारा कि उनके द्वारा कोई गोली नहीं चलाई है. दोनों का बयान यह साबित करने के लिए काफी है कि बैठक करने वाले सदस्यों की तरफ से किसी तरह की गोलीबारी नहीं की गई. अगर वे गोली चलाते तो दोनों अधिकारी हथियारबंद थे वे भी जवाब देते.

4-रिपोर्ट कहती है कि गाइड ने कुछ "दूरी पर एक संदिग्ध ध्वनि" की सूचना दी थी जिसके चलते सर्चिंग पर निकले सुरक्षाबल के जवान दहशत में थे. इस दहशत की वज से उन्हें यह भ्रम पैदा हो गया था कि आसपास भारी संख्या में नक्सली मौजूद है. सुरक्षाबलों ने दहशत में गोलीबारी प्रारंभ कर दी जिससे कई लोगों को चोट आई और कई ग्रामीण मौत के मुंह में समा गए.

5-सीआरपीएफ और राज्य पुलिस का प्रतिनिधित्व करने वाले बचाव पक्ष के वकील ने बताया कि मुठभेड़ में छह सुरक्षाकर्मी भी घायल हुए थे. हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि घायल सुरक्षाकर्मियों को लगी चोटें दूर से फायरिंग के कारण नहीं हो सकती थीं, जैसे कि दाहिनी तरफ की चोट पैर की अंगुली या टखने के पास की चोट. दूसरी बात, गोली लगने की घटनाएं केवल क्रॉस-फायरिंग के कारण हो सकती हैं , चूंकि यह घटना की जगह के चारों ओर गहन अंधेरा था तो इस संभावना को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि सुरक्षा बलों के सदस्यों द्वारा दागी गई गोलियों से ही टीम के अन्य सदस्यों को गोली लगी थीं.

6-ग्रामीणों के वकील ने कहा था कि 17 में से कम से कम 10 पीड़ित ऐसे थे जिनके पीठ में गोली मारी गई थी और कहा गया था कि जब वे भाग रहे थे तब गोली चलाई गई. जांच पैनल ने कहा कि कुछ मृतको के सिर के ऊपर से निकली गयी गोलियों से पता चलता है कि उन्हें बेहद करीब गोली दागी गई थी.

7-ग्रामीणों का आरोप है कि पीड़ितों में से एक को उसके घर से 29 जून की सुबह, कथित मुठभेड़ के 10 घंटे बाद उठाया गया था. एक आदिवासी महिला का बयान है कि उसके भाई इरपा रमेश को सुबह पीटा गया था. उनके बयान का समर्थन मुता काका ने किया है. बयान में कहा है कि इरपा रमेश सुबह अपने घर में थे और बाहर झांककर यह देख रहे थे कि गोलीबारी बंद हो गई या नहीं तभी पुलिस कर्मियों ने उन्हें पकड़ लिया. पहले उनकी पिटाई की और फिर गोली मारकर उनकी हत्या कर दी.

8-पोस्टमार्टम वीडियो से लिए गए चित्र से भी पता चलता है कि 15 शवों को एक साथ रखा गया था जिनकी मौत रात में ही हो गई थी. जबकि इरपा रमेश का शव अलग- थलग पड़ा था. यह बात का भी द्योतक है कि इरपा रमेश रात की घटना में नहीं मारा गया था.

9-न्यायमूर्ति अग्रवाल ने अपनी रिपोर्ट में जांच में स्पष्ट हेरफेर की बात कही है ,और कहा कि यह ध्यान रखना उचित है कि कई अन्य दस्तावेज जैसे कि जब्ती- ज्ञापन आदि भी कथित रूप से सुबह में मौके पर तैयार किए गए थे.

 

और पढ़ें ...

छत्तीसगढ़ के घटिया फिल्मकारों के मुंह पर एक तमाचा है- प्रेम चंद्राकर की लोरिक चंदा.

राजकुमार सोनी 

मुंबई-मद्रास की कहानी और टोटके के तौर पर नींबू-मिर्च लटकाकर फिल्म का निर्माण करने वाले घटिया फिल्मकारों के मुंह पर एक तमाचा है- प्रेम चंद्राकर की लोरिक चंदा.

निश्चित रुप  से लोरिक-चंदा एक उम्दा फिल्म है, लेकिन छत्तीसगढ़ के नकल चोर निर्माता और निर्देशक ऐसी फिल्म बनाने की हिमाकत कभी नहीं करेंगे. वजह साफ है लोरिक-चंदा शायद वैसी कमाई नहीं कर पाएगी जैसी कमाई हंस झन पगली फंस जबै जैसी दोयम दर्जे की एक बंडल फिल्म से हो जाती है.

विवेक सार्वा की मंदराजी के बाद छत्तीसगढ़ की अमर लोक-गाथा लोरिक-चंदा पर प्रेम चंद्राकर ने बेहद खूबसूरत फिल्म बनाई है, किंतु यह फिल्म ठीक-ठाक बिजनेस कर पाएगी इसे लेकर थोड़ा सशंय है ? (अगर यह फिल्म व्यावसायिक रुप से सफल होती है तो इसे प्रेम चंद्राकर और इसमें काम करने वालों कलाकारों का भाग्य ही माना जाना चाहिए.)

दरअसल इस सशंय की एक बड़ी वजह यह है कि अब छत्तीसगढ़ में भी फिल्म को सफल बनाने के लिए पैतरों और हथकंड़ों का उपयोग होने लगा है. कई बार पैतरों और हथकंड़ों की आजमाइश सफल हो जाती है, मगर कई बार दर्शक झांसे में नहीं आता और फिल्म धूल चाटने लगती है.

दर्शकों को शायद याद हो कि जब हंस झन पगली थियेटर में रिलीज हुई तब मल्टीफ्लेक्स में छत्तीसगढ़ी सिनेमा लगाए जाने को लेकर एक जबरदस्त आंदोलन हुआ था. फिल्म के जानकार मानते हैं कि अगर यह आंदोलन नहीं होता तो फिल्म को उतना लाभ नहीं मिलता जितना मिला. छत्तीसगढ़ में कुछ फिल्में सिर्फ इसलिए सफल रही क्योंकि वह तीज-त्योहार और और सरकारी अवकाश के दिनों में रिलीज हुई. कई फिल्मों की डूबती नैय्या भी इसलिए पार लग पाई क्योंकि उनका प्रमोशन जरूरत से ज्यादा था. जबकि कुछ फिल्में सलमान जैसी बॉड़ी दिखाने और हिरोइनों पर ज्वलनशील पदार्थ फेंकने की घटना के बाद भी सफल नहीं हो पाई. कुछ फिल्मों को लोगों ने इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि उनका पोस्टर ही अपसंस्कृति का परिचायक था. पोस्टर में सुपर स्टार लिखा हुआ देखकर दर्शक थियेटर के भीतर गए मगर पर्दे पर कुमार गौरव को नाचता हुआ देखकर बाहर भी निकल आए.

अब थोड़ी सी बात लोरिक चंदा को लेकर कर लेते हैं अन्यथा खुद को लीजेंड और सुपर स्टार के तौर पर प्रचारित करने वाले आत्ममुग्ध कलाकार शराब पीकर उल्टी करने लगेंगे.

... तो भइया ऐसा है कि लोरिक-चंदा को थोड़ा धैर्य और प्रेम से देखने की जरूरत है. अगर इस फिल्म को देखने के पहले प्रेम साइमन के नाटक से गुजर जाए तो और भी अच्छा होगा. प्रेम चंद्राकर की इस फिल्म में नाटक और फिल्म दोनों का स्वाद मिलता है. अब से कुछ अर्सा पहले छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक निर्देशक रामहृदय तिवारी ने लोरिक-चंदा के नाम से नाटक खेला था. तब यह नाटक बेहद मकबूल हुआ था. नाटक में लोरिक की भूमिका दीपक चंद्राकर और चंदा की भूमिका शैलजा क्षीरसागर ने निभाई थीं. तब यह नाटक इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि दूरदर्शन वालों ने जस का तस इसका प्रसारण कर दिया था. बाद में सुंदरानी बंधुओं ने भी लोरिक चंदा को लेकर एक वीडियो बनाया, मगर वीडियो ठीक-ठाक प्रभाव नहीं छोड़ पाया.

सच तो यह है कि लोक जीवन में रचने-बसने वाली गाथाएं सिर्फ इसलिए जिंदा नहीं रहती कि वे आश्चर्य लोक का निर्माण करती है बल्कि वह लोगों के दिलों में इसलिए भी धड़कती है क्योंकि उनमें प्रेरणा देने वाले अनिवार्य तत्व के तौर पर प्रेम मौजूद रहता है. छत्तीसगढ़ की चर्चित लोकगाथा लोरिक को हम मैथिल, मिर्जापुरी, भोजपुरी और हैदराबादी में भी देख सकते हैं. हर जगह कहानी थोड़ी-थोड़ी अलग हो जाती है. कहानी के अलग हो जाने के बावजूद नायक लोरिक प्रेम की जिजीविषा और खूबसूरती को बचाए रखने के लिए संघर्ष करता है.

लोक गाथाओं में कोई एक लेखक मूल नहीं होता है इसलिए पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि लोरिक-चंदा का मूल लेखक कौन है. चूंकि छत्तीसगढ़ में इसे सबसे पहले नाटककार प्रेम साइमन ने करीने से लिखा और खेला है तो उनके महत्वपूर्ण काम को स्वीकार करने में कोई गुरेज भी नहीं होना चाहिए. छत्तीसगढ़ में कंचादूर के रामाधुर साहू अब भी चनैनी के नाम से लोरिक-चंदा को खेलते हैं. उनके नाटक की कहानी फिल्म की कहानी से अलग है. मुख्य रुप से लोरिक-चंदा की कहानी मानवीय प्राणों की प्यास, प्यार की तलाश और अतृप्त आकांक्षा की कहानी है. इस कहानी में मेल-मिलाप और विछोह बेहद सात्विक रुप में मौजूद है. ( टुरी आइसक्रीम खाकर फरार हो गई जैसे गाने पर कूल्हे मटकाने वाली पीढ़ी शायद ही कभी जान पाए कि सात्विकता क्या होती है ? ) प्रेम... का ब्रेकअप मोबाइल पर हट... तेरी ऐसी की तैसी लिख देने भर से नहीं होता है. प्रेम सशंय और कुंहासों से भरा होता है. अक्सर प्रेम में वह सब भी सुन लिया जाता है जो कभी कहा नहीं जाता. लोरिक और चंदा मिलते तो हैं, लेकिन वे मिलकर भी नहीं मिलते. कहानी के अंत में वे डूबकर अपनी जान दे देते हैं, लेकिन दूसरों की जान का हिस्सा बन जाते हैं.लोरिक और चंदा की कहानी से छत्तीसगढ़ का हर मर्मज्ञ वाकिफ है. जगह- जगह किसी न किसी रुप में यह गाथा सुनने को मिल जाती है. आरंग के एक गांव रीवा के पास तो बकायदा लोरिक गढ़ भी बना हुआ है.

प्रेम चंद्राकर की लोरिक-चंदा पूरे प्रभावी ढंग से इन्हीं सब बातों को कहती है, लेकिन यह सब आपको तब अच्छा लग पाएगा जब आप दो-ढ़ाई घंटे के लिए अपने मोबाइल से तलाक ले पाएंगे. मतलब मोबाइल बंद करके फिल्म का आनंद उठाए. यह फिल्म दर्शकों से थोड़ा धैर्य और इत्मीनान की अपेक्षा करती है. लोरिक की भूमिका में अभिनेता गुलशन साहू और चंदा की भूमिका में कुंती मढ़रिया का काम बेहतर है. आकाश सोनी के हिस्से में बेहद छोटी सी भूमिका आई है, लेकिन सर्वाधिक तालियां इस कलाकार के हिस्से चली जाती है. उसने दिल जीत लिया. राजा के रुप संजय बतरा की केवल आवाज प्रभावी है. उनके अभिनय में टीवी सीरियलों की छाप साफ तौर पर दिखाई देती है. इसके बावजूद वे फिल्म की गति को कमजोर नहीं होने देते. फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसका गीत और संगीत है. आप इस फिल्म के संगीत में गुंदम बाजा भी सुन सकते हैं. मांदर, ढोलक- तबला, खंजेरी और चटका भी. संगीत आपको बांधे रखता है. लोक संगीत दूसरी दुनिया में ले जाता है.फिल्म का हर गीत मधुर और जानदार है. फिल्म की अधिकांश शूटिंग गरियाबंद के पास बारूका और पांडुका इलाके के पठार में हुई है. कैमरामैन ने इस इलाके के कई खूबसूरत दृश्यों को कैद करके शानदार वातावरण रचा है. फिल्म को देखते हुए राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले बनने वाली कई साफ-सुथरी फिल्मों की याद भी आती है. 

अगर आप राजा- फाजा भइया, लव दीवाना, सॉरी लवयू-फव यू, तोर-मोर लव जैसी बेमतलब की फिल्म से उब गए हैं तो आपको लोरिक-चंदा जैसी क्लासिक मूवी अवश्य देखनी चाहिए.अगर आप शुद्ध छत्तीसगढ़ी भाषा का आंनद हासिल करना चाहते हैं तो भी इस फिल्म को देख सकते हैं.

 

और पढ़ें ...

कुरुद में आखिर किसका संरक्षण हासिल है रेत का अवैध कारोबार करने वाले नवीन और नागू चंद्राकर को ?

रायपुर.भाजपा के पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर को धमकी देने के मामले में पुलिस ने रेत कारोबारी जसपाल सिंह रंधावा को गिरफ्तार तो कर लिया है, लेकिन इस गिरफ्तारी के साथ ही राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि कुरुद इलाके में दबंगई के साथ रेत का कारोबार करने वाले नवीन और नागू चंद्राकर का उत्पात आखिर कब रुकेगा ? इन्हें किसका संरक्षण हासिल है?

सूत्रों के मुताबिक नवीन और नागू को लेकर भी नामजद उच्चस्तरीय शिकायत हुई है. इस शिकायत में यह कहा गया है कि गत पंद्रह साल से नवीन और नागू ही कुरुद इलाके में रेत का कारोबार कर रहे हैं.अगर कोई व्यक्ति कानूनी ढंग से भी रेत का कारोबार करना चाहता है तो दोनों उसे कारोबार नहीं करने देते हैं. जो कोई भी नियम-कानून बताता है तो उसे बम-बारूद और गोली से उड़ा देने की धमकी दी जाती है.

बताते हैं कि नवीन एक राजनीतिक दल का कार्यकर्ता है और उसे उसी इलाके के एक बड़े राजनीतिज्ञ ने पांच हाइवा और दो जेसीबी गाड़ी सौंप रखी है. नवीन का दूसरा साथी नागू खुद को एक बड़े नेता के काका की लड़की का बेटा बताता है और रेत साथ-साथ अवैध शराब के कारोबार में भी लिप्त है. बताया जाता है कि अवैध शराब. बेचने के आरोप में नागू को वर्ष 2003 में भखारा की पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था. बहरहाल दोनों के उत्पात से कुरुद और आसपास के लोग दहशत में जी रहे हैं.

इधर मंत्री अजय चंद्राकर के द्वारा जान से मारने की धमकी देने वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से इंकार करने पर कांग्रेस ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर का कहना है कि अजय चंद्राकर के जिस रिश्तेदार के मोबाइल पर धमकी-चमकी दी गई है उनका रेत खदान से क्या संबंध है यह साफ होना चाहिए ? अगर अजय चंद्राकर को सीधे तौर पर धमकी मिली थी तो उन्होंने धमकी देने वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज क्यों नहीं करवाई?  सबको पता है कि जब प्रदेश में डाक्टर रमन सिंह की सरकार थीं तब अवैध रेत खदान संचालित करने वालों को भाजपा ने पूरा संरक्षण दे रखा था. पूर्व सरकार के मंत्रियों के रिश्तेदार ही रेत के बड़े खिलाड़ी थे. पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के ऊपर पद का दुरुपयोग कर अपने रिश्तेदारों को रेत खदान दिलाने के गंभीर आरोप भी लगे थे जिसकी शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक हुई थीं. प्रवक्ता धनजंय सिंह ठाकुर ने कहा कि प्रदेश सरकार अंतिम व्यक्ति की सुरक्षा को लेकर कटिबद्ध है इसलिए मामले में त्वरित कार्रवाई की गई, लेकिन पूर्व मंत्री के द्वारा मामले में कार्रवाई की मांग न करना यह साबित करता है कि दाल में कुछ काला जरूर है... बल्कि पूरी दाल ही काली है.  

 

 

और पढ़ें ...

केदार कश्यप की पत्नी की जगह परीक्षा देने वाली महिला को अब तक पकड़ नहीं पाई पुलिस... जमीन खा गई या निगल गया आसमान ?

रायपुर. वर्ष 2015 में जब छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थीं तब बस्तर के लोहण्डीगुड़ा इलाके के परीक्षा केंद्र में एक घटना के चलते प्रदेश की राजनीति में तूफान मच गया था. पूर्व शिक्षा मंत्री केदार कश्यप की पत्नी शांति कश्यप जगह कोई दूसरी महिला एम अंग्रेजी ( अंतिम )  की परीक्षा देने बैठ गई थीं. जब इस मामले में बवाल मचा तब अखबारों में प्रकाशित एक तस्वीर के आधार पर यह तथ्य सामने आया कि परीक्षा देने वाली भानपुरी के सिविल अस्पताल में काम करने वाली किरण मौर्य है. मामले में कांग्रेस के सदस्यों ने धरना- प्रदर्शन करते हुए यह आरोप भी लगाया था कि किरण मौर्य कोई और नहीं बल्कि मंत्री की सगी साली है. कांग्रेस के आरोप के बाद पुलिस ने पंडित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय के प्रभारी कुल सचिव की शिकायत पर एक अज्ञात महिला के खिलाफ भारतीय दंड़ विधान की धारा 419 और छत्तीसगढ़ सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2008 की धारा 9 के तहत अपराध पंजीबद्ध तो कर लिया था, लेकिन इस महिला को पुलिस अब तक खोज नहीं पाई है. महिला अब भी गिरफ्त से बाहर है.

इस मामले में तब कांग्रेस के एक विधायक लखेश्वर बघेल ( वे अब भी विधायक है ) ने विधानसभा में सवाल पूछकर यह जानना चाहा था किस महिला के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई है और पुलिस ने क्या कार्रवाई की है. तब गृहमंत्री रामसेवक पैकरा ने सदन में बताया था कि 4 अगस्त, 2015 को उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में संचालित परीक्षा एमए अंतिम की परीक्षा में शांति कश्यप की जगह एक अज्ञात महिला परीक्षा देने आई थीं. जो महिला परीक्षा देने आई थी उसके खिलाफ मामला पंजीबद्ध कर लिया गया है, लेकिन वह कौन है... क्या है इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है सो उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सका है.

जमीन खा गई या आसमान निगल गया ?

मामले में पांच साल बीत जाने के बाद भी पुलिस अब तक अज्ञात महिला को खोज नहीं पाई है. इस मामले में एक बार फिर बुधवार को विधानसभा में सवाल पूछा गया है. नारायणपुर के विधायक चंदन कश्यप ने एक लिखित प्रश्न के जरिए यह जानना चाहा कि पंड़ित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय के परीक्षा केंद्र में फर्जी परीक्षार्थी के संबंध में पुलिस ने क्या कार्रवाई की है. उन्हें जवाब मिला है- अज्ञात महिला के खिलाफ अपराध क्रमांक 26 / 2015 के तहत मामला पंजीबद्ध किया गया है. विवेचना जारी है. कब तक विवेचना चलेगी इसकी समय-सीमा बताना संभव नहीं है.

और पढ़ें ...

बेटा... टकला हो जाने से कोई चाणक्य नहीं बन जाता !

तत्पुरुष

दिल्ली. पिछले पन्द्रह दिनों से महाराष्ट्र की राजनीति में जो कुछ घटा और घट रहा है उससे जनता की व्यंग्य करने की क्षमता में काफी इजाफा हो गया है. एनसीपी नेता अजित पवार के पाला बदलने और फ्लोर टेस्ट से पहले ही देवेंद्र फड़णवीस के इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया में भाजपा और उसके कथित चाणक्य की जमकर थू-थू हो रही है.

छत्तीसगढ़ की विधानसभा में मंगलवार को संविधान दिवस के मौके पर संविधान की रक्षा को लेकर पक्ष-विपक्ष के सभी सदस्यों ने हिस्सेदारी दर्ज की. सदन में अपने भाषण के कुछ देर बाद ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ट्विवटर में लिखा- चाणक्य ने नंदवंश का नाश करके चंद्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया था न कि चंद्रगुप्त मौर्य को राजा बनाने के लिए नंदवंश का नाश किया. जो चाणक्य... जासूसी, खरीद-फरोख्त और डराने-धमकाने से नहीं बल्कि राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति से बना करते हैं. अब असली चाणक्य देश की जनता है. मुख्यमंत्री के इस ट्विवट के बाद लोगों को यह समझते देर नहीं लगी कि उनका इशारा किस तरफ है. एक ट्विटर यूजर राकेश पवंदा ने चाणक्य की तस्वीर को चस्पा करते हुए लिखा है- बेटे... सिर्फ टकला हो जाने से कोई चाणक्य नहीं बन जाता है.

सौ सुनार की एक पवार की

कांग्रेस नेता आरपी सिंह ने फेसबुक पर लिखा है- अजीत पवार ने इस्तीफा दिया तो चाणक्य तेल लेने चला गया. भाजपा के पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के करीबी देवेंद्र गुप्ता ने लिखा- तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे थे पर मामला बिल्कुल सीधा निकला. एक बड़ी सीख है- जल्दबाजी में लिया गया कोई भी निर्णय आपको देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार बना सकता है. किसान नेता राजकुमार गुप्ता की टिप्पणी हैं- अलोकतांत्रिक ढंग से सत्ता हड़पने के षड़यंत्र को ध्वस्त करके महाराष्ट्र ने बता दिया है वह सचमुच महाराष्ट्र है. गजालक्ष्मी नारायणी ने फेसबुक पर एक तस्वीर पोस्ट की है जिसमें लिखा है- सौ सुनार की होती है तो एक पवार की होती है. एमडी अली चिश्ती लिखते हैं- चोर-उच्चके-तड़ीपार को लोगों ने चाणक्य-चाणक्य कहके चढ़ा दिया था. असली चाणक्य तो कोई और ही निकला. उन्होंने शरद पवार की अभिताभ शैली वाली तस्वीर पोस्ट की है जिसमें लिखा है- जहां सबकी खत्म होती है वहां हमारी शुरू होती है... क्यों हिला डाला न? अपनी टिप्पणियों से चर्चा में रहने वाले अनिल पांडे लिखते हैं- भाजपा की गंगा में डुबकी लगाकर अब अजित पवार पवित्र होकर निकल गए हैं. आरपी सिंह की एक और मजेदार पोस्ट है. इसमें लिखा है- फडणवीस सही कहते थे- अजीत पवार भ्रष्ट है. चार विधायक दिखाकर 40 का पैसा ले गया. ट्विवटर यूजर राम पटेल ने लिखा है- चाणक्य-चाणक्य की रट और तुलना से असली चाणक्य परेशान हो गया है. भाजपा समर्थित मीडियाकर्मियों को लेकर भी सोशल मीडिया में तल्ख टिप्पणी देखने को मिली है. नहरहू ने अर्णब गोस्वामी, अंजना ओम कश्यप सहित दो अन्य एंकरों की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है- छन्न से टूटे कोई सपना... जग सूना-सूना लागे. धमेंद्र यादव दस रुपए के नोट पर लिखा है- पहले सोनम गुप्ता बेवफा थी... अब अजित पवार बेवफा हो गए  हैं.

उठो चाणक्य की मां सब कबाडा हो गया है.

छत्तीसगढ़ के एक पत्रकार देवेश तिवारी अमोरा की भी टिप्पणी मजेदार है- उन्होंने लिखा है- सबके चाणक्य तो फूफा अजित पवार है. जो शख्स जेल भिजवाना चाहता था उसी से क्लीन चिट ले आया. दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है- समस्या चैनल वालों की भी है जो धोबिया पछाड़, मास्टर स्ट्रोक और चाणक्य बनाए हुए थे. मणि वैष्णव लिखते हैं- फ्लोर टेस्ट से पहले ही देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. संविधान दिवस के दिन संविधान विरोधियों की हार हो गई है. एक टिप्पणी है- मोटा भाई गोटा पकड़ लो और पतली गली से निकल जाओ. नितिन भंसाली ने लिखा है- जब नहीं था पास में नंबर तो क्यों बनने चले थे सिकन्दर. सोशल मीडिया पर अल्ताफ ने लिखा है- अजित पवार ने कथित चाणक्य को अच्छा बेवकूफ बनाया. पहले 54 विधायकों का झूठा समर्थन दिखाया... तड़ीपार से दो हजार करोड़ का भुगतान लिया. अपने ऊपर लगे नौ केस हटवा लिए और चाणक्य को बिना कपड़ों का कर दिया. सबसे मजेदार पोस्ट मनीष सिंह की है. उन्होंने के आसिफ की पुरानी फिल्म मुगले आजम की एक फोटो डाली है. इस फोटो में दिलीप कुमार की गोद के पास जमीन पर मधुबाला आंख बंदकर लेटी हुई है. मनीष ने फोटो को देखकर लिखा है- उठो चाणक्य की मां... सब कबाड़ा हो गया है.  उनकी इस पोस्ट पर निशंत इमरान की टिप्पणी है- अब उठकर क्या करूंगी जहांपनाह....

 

 

 

 

 

और पढ़ें ...

छत्तीसगढ़ः मीटर की शिफ्टिंग में पांच करोड़ से अधिक का घोटाला

रायपुर. प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थी तब मीटर शिफ्टिंग में घोटाले की बात सामने आई थीं, लेकिन पुरानी सरकार ने मामले को उजागर नहीं होने दिया. इधर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोमवार को विधानसभा में जानकारी दी कि वर्ष 2014 तक मीटिर शिफ्टिंग के मामले में कुल पांच करोड़ 64 लाख 42 हजार 513 हजार रुपए की अनियमितता पकड़ में आई है और अब तक 64 कर्मचारियों को नोटिस भी जारी किया गया है.

कांग्रेस विधायक सत्यनारायण शर्मा ने यह जानना चाहा था कि मीटर शिफ्टिंग और उच्च दरों पर कचरा बिजली खरीदी पर कितनी वित्तीय अनियमियतता हुई है और इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की गई है. प्रश्न के जवाब में मुख्यमंत्री  जो ऊर्जा विभाग के मंत्री भी है ने बताया कि छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी में मीटर शिफ्टिंग की प्रारंभिक जांच केवल आठ जिलों में ही पांच करोड़ 64 लाख 42 हजार 513 रुपए की अनियमितता संज्ञान में आई है. उन्होंने बताया कि ठेकेदारों ने फर्जी कार्यादेश और देयक प्रस्तुत कर भुगतान प्राप्त कर लिया था जिसके चलते अब तक 65 अधिकारियों और कर्मचारियों पर विभागीय जांच चल रही है. मुख्यमंत्री ने बताया कि जो कार्यादेश जारी किया उसमें कई तरह की कमियां उजागर हुई, इस वजह से 83 अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी आरोप पत्र जारी किया गया है.

कई ठेकेदारों का नाम आया सामने

जब भाजपा सत्ता में थीं तब भी यह मामला जोर-शोर से उछला था. तब मुख्यमंत्री रमन सिंह ने सभी दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई करने की बात कही थीं, लेकिन कुछ नहीं हुआ. इस बीच एक-दो ठेकेदारों ने अदालत की शरण लेकर राहत पाने की कवायद की. इस मामले में  तुलसी नगर कोरबा के मेसर्स विधवानी इन्फ्राटेक, बिलासपुर सरकंडा के विजय कुमार अचवानी कटघोरा के पंकज केला, पाली के राघवेन्द्र जायसवाल, कटघोरा के संजय नायडू, अमित कुमार जायसवाल, जगदलपुर के सहारा दास, सुनील कड़से, पिंटू ठाकुर का नाम प्रमुख रुप से  उभरा था. तब इन ठेकेदारों को महज काली सूची में डाला गया था. शासन को करोड़ों रुपए की चपत लगाने वाले ठेकेदार बच निकले थे.

इस तरह हुआ था घोटाला

अप्रैल 2012 से लेकर नवंबर 2014 के बीच बिजली कंपनी ने ठेकेदारों को घरों और उद्योगों में कमरों के भीतर लगे मीटरों को उखाड़कर बाहर लगाने का वर्कऑर्डर दिया था. इसमें हर काम के लिए राशि तय की गई थी। मसलन, केबल लगाने, मीटर का बोर्ड पुराने के बजाय नया लगाने के लिए रुपए ठेकेदार को दिए जाने थे. मीटर बाहर लगाने, कनेक्शन करने और केबल लगाने के लिए एक कनेक्शन पर 405 रुपए खर्च करने थे. दो साल में करीब एक लाख कनेक्शन के लिए 4.05 करोड़ रुपए का भुगतान ठेकेदारों को किया गया, लेकिन हकीकत यह थी कि कहीं कम केबल लगाकर रुपए बचाए गए और कहीं केबल ही नहीं लगाए गए. अधिकांश स्थानों पर केबल की राशि कंज्यूमर से ही वसूल की गई. मीटर बोर्ड भी नया लगाने के बजाय अंदर का ही उखाड़कर बाहर लगा दिया गया. यानि बड़ी होशियारी से सरकारी रकम की चपत लगाई गई. इस खेल में ठेकेदार व अधिकारी दोनों शामिल थे.

 

और पढ़ें ...

क्या छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर कंपनी को दीमक बनकर चाट रहे हैं अफसर ?

रायपुर. कई बार हैंग ओवर नींबू-पानी या महज एक डिसप्रिस की गोली से ठीक हो जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर कंपनी में ऐसा नहीं है. यहां पुरानी सरकार के दिनों से काबिज अफसरों का बोलबाला है और हैंग ओवर उतरने का नाम नहीं ले रहा है. कंपनी में पदस्थ एक बड़े अफसर का भी मानना है कि कंपनी में ज्यादातर वहीं लोग तैनात हैं जो सुपर सीएम के बेहद निकटतम थे. ( बताना लाजिमी होगा कि भाजपा के शासनकाल में संविदा में पदस्थ एक अफसर ने खुद को देश का सबसे पॉवरफुल नौकरशाह और सुपर सीएम घोषित कर रखा था. बताते हैं कि यह अफसर ट्रांसफार्मर के अलावा बिजली खरीदने- बेचने के खेल में बेहद रुचि लेता था. सूत्र कहते हैं कि अपनी इसी रुचि के चलते इस कथित सुपर सीएम ने छत्तीसगढ़ से बाहर स्वयं का एक बिजली घर स्थापित कर लिया है. )

बहरहाल स्टेट पॉवर कंपनी में रहकर छत्तीसगढ़ के बजाय व्यक्तिगत निष्ठा और पूजा को महत्व देने वाले ऐसे बहुत सारे लोगों के बारे में रेशम जांगड़े नाम के एक शख्स ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से नामजद शिकायत की है. पॉवर कंपनी में पदस्थ एक वरिष्ठ अफसर ( नाम न छापने की शर्त पर ) का कहना है कि वे किसी रेशम जांगड़े को नहीं जानते,लेकिन जो भी शिकायत हुई है उसके कटेंट बहुत हद तक परफेक्ट है. अफसर का यह भी कहना है कि कंपनी को बहुत से लोग दीमक की तरह चाट रहे हैं. अब दीमक पर दवा का छिड़काव जरूरी हो गया है.

कई अफसर निशाने पर

रेशम जांगड़े ने अपनी शिकायत में जिनको निशाना बनाया है उनमें हाल के दिनों में सेवानिवृत हुए अफसर एमएस रत्नम भी शामिल है. जांगड़े का आरोप है कि क्या कभी इस बात की कोई जांच भी करेगा कि बिजली बोर्ड का एक अफसर लगभग 19 सालों तक मंत्रालय पर कैसे काबिज रहा. इस अफसर को मंत्रालय के किस वरिष्ठ अफसर ने संरक्षण दे रखा था. यह अफसर कभी विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी तो कभी विशेष सचिव बनकर कैसे काम करता रहा है. जांगड़े का आरोप है कि कांग्रेस ने अपने उपभोक्ताओं का बिजली बिल आधा करने की घोषणा की थी. जब भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने तब रत्नम ने इस योजना को क्रियान्व्यित करने में जानबूझकर विलंब किया. योजना में कुछ ऐसी आपत्तियां और शर्तें लागू लागू की गई जिससे लोगों के बीच भ्रम फैला. ऊर्जा प्रभार, नियत प्रभार और वीसीए पर छूट का प्रावधान नहीं किए जाने से आम आदमी आक्रोशित हुआ. मार्च-अप्रैल 2019 में लगभग पचास लाख उपभोक्ताओं को लाभ मिलना था, लेकिन महज 20 लाख उपभोक्ता ही लाभान्वित हो पाए. अब जाकर 35 लाख उपभोक्ताओं को लाभ मिल रहा है. जांगड़े का आरोप है कि रत्नम ने छत्तीसगढ़ राज्य बिजली कंपनी की अलग-अलग ईकाईयों में निदेशक जीसी मुखर्जी, ओसी कपिला और हेमराज नरवरे को अवैध ढंग से नियुक्ति दिलवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आरोप है कि ये सभी लोग संविदा में पदस्थ सुपर सीएम के बेहद करीबी है और उन्हीं के इशारों पर काम करते हैं. इधर नरवरे और मुखर्जी ने जांगड़े के इन आरोपों को बेबुनियाद बताया. उन्होंने अपना मोर्चा से बातचीत में कहा कि सारी नियुक्तियां नियम-कानून के दायरे में हुई है. जबकि एक निदेशक ओसी कपिला ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया.

प्रबंध संचालक मूर्ति ने किया उत्पादन को प्रभावित

जांगड़े का आरोप है कि फरवरी से अप्रैल 2019 के बीच कई बार शटडाउन की स्थिति बनी. दरअसल यह सब इसलिए हुआ रख-रखाव का दबाव बनाकर बिजली कटौती करवाई जा सकें. बिजली उत्पादन कंपनी में उत्पादन को प्रभावित करने में प्रबंध संचालक राममूर्ति ने अपनी अहम भूमिका का निर्वहन किया. जांगड़े का कहना है कि राममूर्ति की पदस्थापना भाजपा के शासनकाल में की गई थी. इस पदस्थापना के पीछे भी रत्नम का रोल था. ( इस  आरोप के बारे में राममूर्ति से उनका पक्ष जानने के लिए फोन लगाया गया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया. )

मड़वा प्रोजेक्ट अब 9900 करोड़

शिकायतकर्ता का आरोप है कि रत्नम ने बिजली का निर्माण करने वाले निजी उत्पादकों को जमीन देने, बिजली के करार करने और उनके संयंत्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार को अंजाम दिया है. उन्हीं के समय मड़वा प्रोजेक्ट का ठेका हैदराबाद की वीजीआर नाम की कंपनी को दिया गया. रत्नम अब भी इस कंपनी के अधिकृत एजेंट के रुप में कार्य कर रहे हैं. दोगने दर से प्रोजेक्ट बनाने की वजह से अब मड़वा प्रोजेक्ट की लागत 9900 करोड़ रुपए हो गई है. कभी वीजीआर कंपनी का कन्वयेर बेल्ट जल गया था तो कंपनी के पूर्व प्रबंध संचालक एसबी अग्रवाल ने कंपनी का बचाव किया और पुर्नस्थापना के लिए अतिरिक्त देयक पास करवाया. शिकायत में यह भी उल्लेखित है कि एसबी अग्रवाल हर महीने प्रबंध संचालक उत्पादन की हैसियत से साढ़े पांच लाख रुपए का वेतन आहरित करते थे जबकि कंपनी के एमडी पद पर कार्यपालक निदेशक से अधिक वेतन पर संविदा नियुक्ति का प्रावधान ही नहीं है.

अब तक रुकी है जिंदल से वसूली

शिकायतकर्ता का कहना है कि प्रदेश में सौर ऊर्जा गैर परम्परागत ऊर्जा स्त्रोत योजना का गलत ढंग से प्रभावशील है. जो बिजली कोयले की खपत से उत्पादित होती है उसे गैर परम्परा स्त्रोत से खपत होना बताया जाता है और फिर बिजली खरीदी जाती है. भूसे की आड़ में बड़ा खिलवाड़ किया जाता है. इस खेल में नियायक आयोग की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए. शिकायत में उल्लेखित है कि गत पंद्रह सालों से विधानसभा में गोल-मोल जानकारी प्रस्तुत की जा रही है. जिंदल बिजली खरीद में एपीलेट ट्रिब्युनल द्वारा 156 करोड़ रुपए की वसूली का आदेश दिया गया, लेकिन यह आदेश अब तक रुका है. जो निजी बिजली कंपनी है उनके पारेषण लाइन का परमीशन देने में ही करोड़ों रुपए का वारा-न्यारा हो जाता है. आलम यह है कि सेवानिवृत हुए एक अफसर ने रायपुर, हैदराबाद और बैंगलोर में कई मकान बना लिए हैं और अमलतास बिल्डर्स में पार्टनर बन बैठा है. एक पूर्व अफसर कचना में करोड़ों रुपए का मकान बनवा रहा है जिसके लिए धन की व्यवस्था मुख्य बिजली निरीक्षक और बिजली कंपनी के अधिकारी कर रहे हैं.

 

 

और पढ़ें ...

बड़का साहेब ने चंद रोज में ही समझा दिया कि भइया काम तो करना पड़ेगा

राजकुमार सोनी

देश में इन दिनों रानू मंडल की सर्वाधिक चर्चा कायम है तो इधर छत्तीसगढ़ में आरपी मंडल के कामकाज का अंदाज छाया हुआ है. रानू मंडल और आरपी मंडल की पृष्ठभूमि बिल्कुल अलग-अलग है, लेकिन कुछ बातें ऐसी है जिनमें थोड़ा सा साम्य नजर आता है. रानू ने अपनी किस्मत से मुफलिसी को चुनौती देकर खुद को एक सितारा बनाया है तो इधर छत्तीसगढ़ में मंडल का काम खुरदरी जमीन पर खनक और चमक पैदा कर रहा है.

भारतीय प्रशासनिक सेवा 1987 बैच के अफसर आरपी मंडल इन दिनों छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव है, लेकिन दूर-दराज के लोग जब राजनीति और प्रशासनिक कामकाज को लेकर जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं तो यह कहना नहीं चूकते- यार... पता चला है आपके यहां के सीएम जितने लो-प्रोफाइल है उतने ही बड़का साहेब भी है. चलो अब जाकर सोने पर सुहागा हो गया.

बड़का साहेब से मतलब... चीफ सेक्रेटरी से है. छत्तीसगढ़ में अगर किसी के आगे-पीछे बड़का- छुटका... जैसा शब्द चस्पा हो गया तो समझिए कि लोग उसे प्यार करते हैं.आदर देते हैं. भरोसा करते हैं. प्रशासनिक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष बीके एस रे कहते हैं- मंडल पर लोग इसलिए भरोसा नहीं करते कि वे कि वे बिलासपुर और रायपुर के कलक्टर रहे हैं. या कई बड़े पदों को सुशोभित करते रहे हैं बल्कि उन पर भरोसे की एक बड़ी वजह यह भी है कि वे जिस काम को अपने हाथ में लेते हैं उसे पूरा करके छोड़ते हैं. वे परिणाम देने वाले हार्ड वर्कर है.

पिछले कुछ समय से छत्तीसगढ़ के मंत्रालय में मुर्दनी छाई रहती थीं. अफसरों और कर्मचारियों में कोई मुस्तैदी तभी दिखाई देती थीं जब मुख्यमंत्री मंत्रालय पहुंचते थे, लेकिन अब जाकर मंत्रालय का सन्नाटा टूटा है. नाम न छापने की शर्त पर एक अफसर कहते हैं- जिस दिन यह तय हो गया था कि प्रदेश के नए चीफ सेक्रेटरी आरपी मंडल होंगे उसी दिन यह भी साफ हो गया था कि अब कुछ नया होगा. अगर कोई क्रियेटिव है तो जाहिर सी बात है कि क्रियेशन का प्रभाव सब पर पड़ेगा. मंडल जिस फुर्ती से काम करते हैं उन्हें देखकर भला कोई कब तक फाइलों को लाल बस्ते में बांधकर आलमारी के हवाले कर सकता है. अफसर ने कहा- प्रदेश में अब तक जितने भी चीफ सेक्रेटरी बने हैं उनके पीछे किसी न किसी कद्दावर नेता या अफसर का ठप्पा हुआ था. प्रदेश के एक चीफ सेक्रेटरी के बारे में यह बात विख्यात थीं वे संविदा में पदस्थ सुपर सीएम के रिश्तेदार थे तो दो अफसर सिर्फ इसलिए चीफ सेक्रेटरी बनाए गए थे कि उनके जरिए सारे गलत-सलत कामों पर चिड़िया बिठवाई जाती थीं.

प्रदेश के एक अन्य अफसर का कहना है- पहले जितने भी नामों के आगे या पीछे सिंह लगा हुआ था वे सभी पूर्व मुख्यमंत्री के रिश्तेदार बन गए थे. कुछ तो वास्तव में थे भी, लेकिन कुछ ने दूर-दराज इलाके में घुसपैठ करके खुद को चाचा-मामा, ताऊ साबित कर लिया था. एक चीफ सेक्रेटरी जिसके नाम के पीछे सिंह लगा हुआ था, वे भूपेश सरकार में भी कुछ दिनों सीएस के पद पर काबिज थे, लेकिन उन्होंने कभी भी आगे होकर राज्य के अधिकारियों और कर्मचारियों को यह नहीं बताया कि सरकार क्या चाहती है ? सरकार का विजन क्या है? शायद पुरानी सरकार का हैंगओवर उतरा नहीं होगा इसलिए उन्होंने मुख्यमंत्री को भी यह नहीं बताया होगा कि योजनाओं को धरातल में उतारने के लिए प्रशासन क्या-क्या काम करता है. कैसे काम करता है ?

इधर अब जाकर प्रशासनिक गलियारे में यह मैसेज गया है कि भइया... जिसे चीफ सेक्रेटरी बनाया गया है वह काम करने वाला है. काम करोगे तो ही पीठ थपथपाई जाएगी. शाबाशी मिलेगी... लल्लो-चप्पो करने से काम नहीं चलेगा.

मंडल ने दो-दिन बैठकों में ही अपने तेवरों से छोटे-बड़े सभी तरह के अफसरों को यह समझा दिया है कि वे काम का परिणाम चाहते हैं. आज भी जब कभी लोग रायपुर और बिलासपुर के कलक्टर कार्यालय कायाकल्प देखते हैं तो जेहन में पहला नाम आरपी मंडल का ही आता है. रायपुर में कई जगह की चौड़ी सड़कों से गुजरते हैं तो उन्हें धन्यवाद नहीं भूलते. उनके नाम के साथ एक बात तो जुड़ी हुई है कि वे जब भी कुछ करेंगे तो नया और बेहतर करेंगे. यह मामला किस्मत से ज्यादा लोगों से हासिल हुए भरोसे का है. बहुत कम अफसरों को ऐसा भरोसा हासिल हो पाता है. इधर हाल के दिनों में जब वे स्कूटी लेकर शहर का मुआयना करने निकले तो शहर के लोगों को यकीन हुआ कि चलो अब शहर वास्तव में थोड़ा साफ-सुथरा दिखाई देगा. अन्यथा हर सुबह गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल... गाना सुन-सुनकर कान पक गया था. मंडल के मुआयने से यह भी लगा कि अब महापौर प्रमोद दुबे की मुश्किल भी थोड़ी आसान हो जाएगी. अब तक शहर के लोगों ने कलक्टर-एसपी और नेताओं का मुआयना देखा था. पहली बार एक चीफ सेक्रेटरी सूट-बूट और टाई के बजाय हैलमेट पहनकर उनके सामने था तो लोग खुश हुए. शहर के एक नागरिक मनीष शर्मा कहते हैं- मंडल साहब जब अल-सुबह मुआयना कर रहे थे तब मैं भी घूमने निकला था. वे जिस ढंग से लोगों से मिल-जुल रहे थे तो मुझे लगा ही नहीं कि वे चीफ सेक्रेटरी है. उनका व्यवहार बेहद सामान्य था. उनकी बातों को सुनकर ही इस बात का यकीन हो गया कि बंदे में दम है. इस शख्स की बात को कोई भी नहीं टालेगा. मुझे वे लो-प्रोफाइल होते हुए भी बेहद पावरफुल लगे.

यह सही है कि मनीष की तरह ही प्रदेश के ज्यादातर लोग बड़का साहेब को लो-प्रोफाइल मानते हैं. वे छोटे-बड़े सबसे एक सामान भाव से मिलते हैं. जो कोई भी  उनसे पहली बार मिलता है उनका अपना होकर रह जाता है. इधर मंत्रालय में पदस्थ कुछ अफसर उनके लो-प्रोफाइल वाले अंदाज की दबे-दबे ढंग से आलोचना भी करते हैं.आलोचना का मुख्य स्वर यहीं है कि एक आईएएस को बाबू और चपरासी से गले नहीं मिलना चाहिए. हाथ नहीं मिलाना चाहिए.

आर्थिक रुप से कमजोर और गरीबों को हिकारत की नजर से देखने वाले अफसर ऐसा कहते हुए यह भूल जाते हैं कि हर आदमी अपनी जगह खड़े रहकर देश के लिए ही काम कर रहा होता है. हर आदमी के भीतर एक मकसूद बैठा रहता है जो मात्र एक जादू की झप्पी से पिघल जाता है. अगर आपने मुन्ना भाई एमबीबीएस देखी हो तो उसमें एक पात्र है मकसूद. यह पात्र झाडू-पोंछा लगाने का काम करता है. मकसूद दुखी होकर इसलिए चिल्लाते रहता है कि कोई भी उसकी नहीं सुनता. दिनभर खटने के बाद भी सब उसे गाली ही देते हैं. एक दिन मुरली प्रसाद यानि संजय दत्त आकर उसे जादू की झप्पी देता है और कहता है- मकसूद भाई...  अपुन तुमको थैक्स बोलना चाहता है... तुम मस्त काम करता है. मकसूद कहता है- बस... कर पगले रुलाएगा क्या ?

प्रशासन का काम डांट-डपट और कड़ी फटकार से रेंगता भर है, दौड़ता तो वह तभी है जब उसमें जादू की झप्पी का घोल शामिल कर लिया जाता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि मंडल के तेवर में जादू की झप्पी का जो घोल है उससे न केवल राजनीति बल्कि आम आदमी को सबसे पहले और भरपूर लाभ मिलेगा.

और पढ़ें ...

2020 के महागंथ्र के लिए जनसंपर्क विभाग ने जारी किया 2018 से विज्ञापन... शायद टोप्पो को भरोसा था कि बन जाएगी रमन सरकार

रायपुर. छत्तीसगढ़ में डाक्टर रमन सिंह के मुख्यमंत्री मंत्री रहने के दौरान जनसंपर्क विभाग में एक से बढ़कर कारनामों को अंजाम दिया गया था. इसी साल 20 सितंबर को प्रकाशित एक खबर में हमने बताया था कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर राजेश सुकुमार टोप्पो जब जनसंपर्क विभाग में पदस्थ थे तब उन्होंने कहानी की एक सदी नाम के ( 14 सौ 29 पेज ) एक महागंथ्र को प्रकाशित करने में विशेष दिलचस्पी दिखाई थी. कथा- कहानी और उपन्यास से कोसो दूर रहने वाले राजेश टोप्पो इस महागंथ्र के प्रधान संपादक भी बन बैठे थे. इधर इस महागंथ्र को टटोलने में कुछ और नई बातें सामने आई है. यह महागंथ्र जनवरी 2020 में निकलना था, लेकिन 2020 के पहले छप गया और जनसंपर्क विभाग के मालखाने में जमा भी हो गया. इतना ही नहीं जनसंपर्क विभाग ने इस महागंथ्र के लिए वर्ष 2018 को ही विज्ञापन भी जारी कर दिया था. ऐसा शायद इसलिए हो पाया... क्योकि पूर्व सीएम एवं सुपर सीएम की नाक के बाल समझे जाने वाले राजेश टोप्पो को भरोसा था कि चौथीं बार भी भाजपा की सरकार बनने जा रही है. इस महाग्रंथ में जनसंपर्क विभाग के फुल पेज के कुल 12 विज्ञापन शामिल है. बहरहाल यहां चित्र में एक विज्ञापन देखिए...। यह विज्ञापन वर्ष 2025 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया था. इस विज्ञापन में यह उल्लेखित है कि विकास का इतिहास है. रमन पर विश्वास है और स्वर्णिम भविष्य की आस है. कई तरह के चमकीले नारों के बीच एक विज्ञापन अन्नदाताओं को दिए जाने वाले सौगात से भी संबंधित है. बहरहाल राजेश टोप्पो ने अपनी निगरानी में जिस महाग्रंथ का प्रकाशन करवाया उसमें मानव जीवन की कहानी शीर्षक से उनकी दो पेज की भावुक संपादकीय भी शामिल है. महाग्रंथ में नाटककार-कहानीकार भारतेन्दु हरिशचंद्र से लेकर कमल चमोला तक शामिल किए गए हैं,  लेकिन छत्तीसगढ़ में रहकर शानदार और जानदार ढंग से कहानी लिखने वाले कहानीकारों को छोड़ दिया गया है. भाजपा के शासनकाल में केले, पपीते और अमरूद की खेती पर भी फिल्में बनी है. लोग दो-चार पत्रिका छापकर भी लाखों का विज्ञापन हासिल करते रहे हैं.

स्टिंग आपरेशन होने के बाद फूटा भांडा

जनसंपर्क विभाग में पदस्थापना के दौरान राजेश टोप्पो जरूरत से ज्यादा दुस्साहसी हो गए थे. वे भाजपा की नीतियों के खिलाफ कलम चलाने वाले पत्रकारों की सेक्स सीडी बनवाना चाहते थे. हालांकि खबर है कि इस भयानक किस्म के गंदे काम का निर्देश उन्हें संविदा में पदस्थ सुपर सीएम की तरफ से दिया गया था, लेकिन जिस शख्स को उन्होंने इस काम का जिम्मा सौंपा था एक दिन उसी शख्स ने उनका स्टिंग आपरेशन कर दिया और भांडा फूट गया. ( हालांकि तब-तक बैकाक-पटाया गए कुछ पत्रकारों की सीडी बन गई थी. वैसे बैकांक-पटाया जाने वाले अधिकांश पत्रकार वे थे जो पद्रंह सालों तक डाक्टर रमन सिंह की जय-जयकार में लगे हुए थे.) बहरहाल संवाद और कंसोल इंडिया के जरिए राजनेताओं के रिश्तेदारों और भाजपाई मीडिया को लाभ पहुंचाने की जो साजिश टोप्पो ने रची उसकी जांच चल रही है. यह जांच कब तक पूरी होगी अभी साफ नहीं है. इतना ही नहीं राजेश टोप्पो तब के कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ( अब मुख्यमंत्री ) और प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया की भी सीडी  बनवाना चाहते थे. इस काम की जिम्मेदारी भी उन्होंने उसी शख्स को दे रखी थीं जो कुछ पत्रकारों को सरकारी खर्च पर बैकांक-पटाया की रंगीन यात्रा पर ले गया था. इस बीच जमीन घोटाले के एक पुराने मामले में टोप्पो पर अपराध पंजीबद्ध कर लिया गया है, लेकिन उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई है.

 

और पढ़ें ...

बघेल ने खाया सोटा...कांपा विरोधियों का पोटा

राजकुमार सोनी

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़ी दीवाली के ठीक दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के मौके पर एक बैगा से चाबुक ( सोटा ) खाकर देशव्यापी वाह-वाही लूट ली है. ग्राम जंजगिरी में सोटा खाने का वीडियो जिस तेजी से वायरल हुआ उसके बाद भाजपाइयों के साथ-साथ उनके ही अपनी पार्टी में जलन रखने वालों का पोटा ( पेट ) कांप गया है. आपको बता दें कि दिल धड़कता है. दिल में धुकधुकी होती है. मन में डर लगता है... जैसे मुहावरे यूं ही नहीं बने हैं. छत्तीसगढ़ में जब कुछ अजीब और अनोखा सा घट जाता है तो लोगों के मुंह से बरबस निकल पड़ता है- ये ले साले... तोर तो पोटा कांप गे हे बे...

मुख्यमंत्री बघेल ग्राम जंजगिरी में गौरा-गौरी पूजा के एक आयोजन में शरीक हुए थे. ऐसी मान्यता है कि पूजा के दरम्यान कुछ अदृश्य शक्तियों का धावा होता है तो उत्पात मचता है. आसपास खड़े लोगों पर देवता चढ़ जाते हैं. गांव का बैगा सोटा मारकर कंट्रोल करता है. यह भी मान्यता है कि जो व्यक्ति सोटा खाता है वह सभी तरह की परेशानियों को अपने ऊपर ले लेता है और अपने साथ-साथ आसपास के लोगों के कष्टों का निवारण कर देता है. तर्क और विज्ञान इस युग में कोई भी सोच सकता है कि यह सोटा-फोटा की परम्परा एक तमाशे के अलावा कुछ भी नहीं है, लेकिन यह शायद ठीक नहीं है. परम्पराएं बनती इसलिए ताकि उसका निर्वहन किया जाय और परम्पराएं होती भी इसलिए है कि उसे तोड़ दिया जाय. मुख्यमंत्री बघेल ने पूजा के मौके पर परम्परा का निर्वाह भी किया और बड़ी ही शालीनता से उसे तोड़ा भी.

जनता के कोड़े का ख्याल

मुख्यमंत्री जब सोटा के वार सह रहे थे तब उनके चेहरे पर एक खास तरह की मुस्कान थीं. एक तरफ तो वे वर्षों पुरानी सोटा परम्परा का निर्वाह कर रहे थे तो दूसरी तरफ यह संदेश भी दे रहे थे कि चाहे कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो जाय...उसे जनता के कोड़े का ख्याल रखना चाहिए. जो लोग शिकवा-शिकायत और जनता के कोड़े का ख्याल रखते हैं वे लंबे समय तक दिलों में राज करते हैं. डाक्टर रमन सिंह की सरकार यहीं बात समझ नहीं आ पाई थीं.उस सरकार में बैठे लोग जनता पर कोड़े बरसा रहे थे. लाठियां भांज रहे थे. शिक्षाकर्मियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा जा रहा था. खुद को तुर्रमखां बताने वाले दो अफसरों की वजह से रमन सिंह की तुलना हिटलर से की जाने लगी थीं. पाठकों को शायद याद हो कि चुनाव के अंतिम दिनों में रमन सिंह को साइलेंट किलर ( खामोश हत्यारा ) और हिटलर बताती हुई तस्वीरें सोशल मीडिया में  वायरल हुई थीं. यह सब स्वस्फूर्त था.. इसके लिए किसी को कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ी थीं.

बहरहाल कल मुख्यमंत्री के सोटा खाने लेने वाले प्रकरण के बाद अब विरोधी इस चर्चा में तल्लीन है कि आखिर करें तो क्या करें. ये आदमी कभी भौरा चलाता है. तो कभी गेंड़ी में चढ़कर नाचता है. कभी मांदर बजाता है तो कभी एक हाथ से बच्चे को उठा लेता है. काजू-कतली खाकर नेतागिरी करने वाले लोगों को यह समझ नहीं आ रहा है कि चौलाई और लालभाजी का मुकाबला कैसे किया जाय ?  सत्ता के अपने प्रारंभिक दिनों में अजीत जोगी ने राह चलते मुनगा भांजी और चनाबूट खाकर खुद को ठेठ छत्तीसगढ़िया बताने की कवायद की थीं, लेकिन जल्द ही वे विवादों से घिर गए और एक बड़े वर्ग ने उन्हें अस्वीकार कर दिया.बघेल को अपनी स्वीकार्यता के लिए गैर-स्वाभाविक ढंग कुछ भी नहीं करना पड़ रहा है. उन्होंने बचपन में पत्थरों के पीछे बिच्छुओं का डंक तोड़कर प्रतियोगिता जीती है तो बैल के साथ खुद को लहुलूहान भी किया है. वे यह सारी चीजें स्वाभाविक ढंग से इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि उनकी पृष्ठभूमि खेती-किसानी की है. वे बेशकीमती हीरे को हड़पने के लिए ( देवभोग ) और उसके आसपास जमीन खरीदकर खुद को किसान बताने वाले सिंघानिया सेठ नहीं है. बघेल के देशी अंदाज का फिलहाल तो कोई तोड़ नहीं दिख रहा है.

देसी गिफ्ट ने भी लुभाया

हर दीवाली पर मुख्यमंत्री निवास से प्रदेश के पत्रकारों को तोहफा दिए जाने की एक परम्परा चली आ रही है. पूर्व के दो मुख्यमंत्रियों के तोहफों में कभी टीवी शामिल रहता था, कभी फ्रिज... कभी लैपटाप तो कभी फटने वाला मोबाइल. लेकिन पहली बार इस दीवाली पर मुख्यमंत्री निवास से पत्रकारों को जो तोहफा मिला है उसकी तारीफ हर कोई कर रहा है.

इस बार सीएम हाउस से खादी एवं ग्रामोद्योग की ओर से उत्पादित सामग्री वितरित की गई है. माटी कला बोर्ड की ओर से चाय के बर्तन, लघु वनोपज सहकारी संघ का शहद, महिला स्वसहायता समूह द्वारा निर्मित साबुन, दुग्ध महासंघ की ओर से बनाया गया देसी घी, गोबर से निर्मित दीये और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के अंतर्गत वित्तपोषित अगरबत्ती का वितरण किया गया है. इस देसी तोहफे में एक संदेश यह छिपा है कि अगर अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है ग्रामीण हाथों को रोजगार देने की जरूरत है. अब यह देसी गिफ्ट पत्रकारों के अलावा प्रदेश के अफसरों और प्रमुखजनों को भी वितरित किए गए होंगे. जो भी हो... इनकी खरीददारी तो हुई. कुछ घरों का अंधेरा दूर हुआ. वहां दीवाली तो मनी.

 

 

और पढ़ें ...

शर्मनाक और केवल शर्मनाकः दिव्यांगों के लिए उपकरण खरीदी में समाज कल्याण विभाग ने किया घोटाला

रायपुर. प्रदेश के समाज कल्याण विभाग में भ्रष्ट अफसरों का जबरदस्त बोलबाला है. केवल नई राजधानी के मंत्रालय और संचालनालय में ही नहीं अपितु  एय्याश और कमीशनखोर अफसर प्रदेश के हर जिले में काबिज है. अभी हाल के दिनों में रायपुर की सामाजिक संस्था समर्पण सेवा के प्रमुख रामचंद्र मजूमदार ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को चौकाने वाली जानकारी भेजी है. सूचना के अधिकार के तहत हासिल किए दस्तावेजों के आधार पर यह दावा किया गया है कि वर्ष 2016 से लेकर 18 तक जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थीं तब अफसरों ने दिव्यांगों के कृत्रिम अंग उपकरण की खरीदी में करोड़ों का घोटाला किया.

शिकायत में यह जानकारी दी गई है कि वर्ष 2016-17-18 में समाज कल्याण विभाग रायपुर के संयुक्त संचालक ने बगैर निविदा के कुल 1.58 करोड़ रुपए के उपकरण खरीद लिए थे. नियमानुसार इतनी बड़ी धनराशि की खरीदी के लिए निविदा बुलाई जानी थीं, भंडार क्रय नियम 2002 का पालन किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. इन वर्षों में धमतरी के उपसंचालक ने भी बगैर निविदा के कुल 5 लाख 80 हजार रुपए के उपकरणों की खरीदी की. इनकी देखा-देखी बिलासपुर के संयुक्त संचालक 16 करोड़, जांजगीर-चांपा के उप संचालक ने 3 करोड़, राजनांदगांव के उपसंचालक ने 2.50 करोड़, बेमेतरा में 1.50 करोड़, रायगढ़ में  एक करोड़ और सरगुजा में डेढ़ करोड़ के उपकरण क्रय किए.

कानपुर की कंपनी से सीधे खरीदी

समाज कल्याण विभाग ने उपकरणों की खरीदी के लिए कानपुर में साइकिल निर्माता कंपनी ऐलिंको को ही महत्वपूर्ण माना, जबकि जिन वर्षों में खरीदी की जा रही थीं उस समय कंपनी का बीआईएस ( ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैडर्ड ) का लायसेंस निरस्त था. यानी कंपनी इस लायक नहीं थी कि वह उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों की आपूर्ति कर सकें. कई जिलों में बैटरी से चलने वाली ट्रायसाइकिल की खरीदी हुई. इन साइकिलों की खरीदी में थर्ड पार्टी से जांच नहीं करवाई गई. यहां तक सप्लायर ने किसी तरह की गारंटी-वारंटी भी प्रदान नहीं की. इस कंपनी को भुगतान देने के लिए समाज कल्याण विभाग के अफसर इतने ज्यादा उतावले थे कि कंपनी को उपकरणों की सप्लाई के पहले ही सौ फीसदी अग्रिम भुगतान भुगतान कर दिया गया.

अफसरों पर नहीं हुई कार्रवाई

इस मामले का भांडा तब फूटा जब जांजगीर-चांपा में दिव्यांगो ने कलक्टर को बड़ी संख्या में ट्राइसाइकिल लौटाई. दिव्यांगों का कहना था कि उन्हें खराब साइकिल दे गई है. दिव्यांगों की शिकायत के बाद ऐलिंको कंपनी के इंजीनियरों ने कुछ सायकिलें सुधारी, लेकिन साइकिल फिर खराब हो गई. दिव्यांगों की शिकायत और उनके साथ हुए मजाक के बाद समाज कल्याण विभाग की प्रभारी बीना दीक्षित हटा दी गई. यह एक छोटी सी कार्रवाई मात्र जांजगीर-चांपा जिले में हो पाई है. घटिया उपकरणों की मंहगे दर पर खरीदी के मामले में अब भी बड़े अफसरों पर गाज नहीं गिरी है. इन अफसरों के बचे रहने की एक बड़ी वजह यह भी है कि इन्हें मंत्रालय में पदस्थ भारतीय प्रशासनिक सेवा के नामचीन अफसरों का संरक्षण प्राप्त है. पाठकों को याद होगा कि भाजपा के शासनकाल में समाज कल्याण विभाग में रहते हुए करोड़ों रुपए का घोटाला करने वाले एक अफसर के घर और ठिकानों पर ईओडब्लू ने छापामार कार्रवाई की थी. यह अफसर अब सेवानिवृत हो गया है लेकिन ईओडब्लू अब तक चालान पेश नहीं कर पाई है. इन दिनों यह अफसर समाज कल्याण विभाग की मंत्री का सबसे करीबी माना जाता है.

और पढ़ें ...
Previous12345Next