पहला पन्ना

Previous12345Next

बड़का साहेब ने चंद रोज में ही समझा दिया कि भइया काम तो करना पड़ेगा

राजकुमार सोनी

देश में इन दिनों रानू मंडल की सर्वाधिक चर्चा कायम है तो इधर छत्तीसगढ़ में आरपी मंडल के कामकाज का अंदाज छाया हुआ है. रानू मंडल और आरपी मंडल की पृष्ठभूमि बिल्कुल अलग-अलग है, लेकिन कुछ बातें ऐसी है जिनमें थोड़ा सा साम्य नजर आता है. रानू ने अपनी किस्मत से मुफलिसी को चुनौती देकर खुद को एक सितारा बनाया है तो इधर छत्तीसगढ़ में मंडल का काम खुरदरी जमीन पर खनक और चमक पैदा कर रहा है.

भारतीय प्रशासनिक सेवा 1987 बैच के अफसर आरपी मंडल इन दिनों छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव है, लेकिन दूर-दराज के लोग जब राजनीति और प्रशासनिक कामकाज को लेकर जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं तो यह कहना नहीं चूकते- यार... पता चला है आपके यहां के सीएम जितने लो-प्रोफाइल है उतने ही बड़का साहेब भी है. चलो अब जाकर सोने पर सुहागा हो गया.

बड़का साहेब से मतलब... चीफ सेक्रेटरी से है. छत्तीसगढ़ में अगर किसी के आगे-पीछे बड़का- छुटका... जैसा शब्द चस्पा हो गया तो समझिए कि लोग उसे प्यार करते हैं.आदर देते हैं. भरोसा करते हैं. प्रशासनिक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष बीके एस रे कहते हैं- मंडल पर लोग इसलिए भरोसा नहीं करते कि वे कि वे बिलासपुर और रायपुर के कलक्टर रहे हैं. या कई बड़े पदों को सुशोभित करते रहे हैं बल्कि उन पर भरोसे की एक बड़ी वजह यह भी है कि वे जिस काम को अपने हाथ में लेते हैं उसे पूरा करके छोड़ते हैं. वे परिणाम देने वाले हार्ड वर्कर है.

पिछले कुछ समय से छत्तीसगढ़ के मंत्रालय में मुर्दनी छाई रहती थीं. अफसरों और कर्मचारियों में कोई मुस्तैदी तभी दिखाई देती थीं जब मुख्यमंत्री मंत्रालय पहुंचते थे, लेकिन अब जाकर मंत्रालय का सन्नाटा टूटा है. नाम न छापने की शर्त पर एक अफसर कहते हैं- जिस दिन यह तय हो गया था कि प्रदेश के नए चीफ सेक्रेटरी आरपी मंडल होंगे उसी दिन यह भी साफ हो गया था कि अब कुछ नया होगा. अगर कोई क्रियेटिव है तो जाहिर सी बात है कि क्रियेशन का प्रभाव सब पर पड़ेगा. मंडल जिस फुर्ती से काम करते हैं उन्हें देखकर भला कोई कब तक फाइलों को लाल बस्ते में बांधकर आलमारी के हवाले कर सकता है. अफसर ने कहा- प्रदेश में अब तक जितने भी चीफ सेक्रेटरी बने हैं उनके पीछे किसी न किसी कद्दावर नेता या अफसर का ठप्पा हुआ था. प्रदेश के एक चीफ सेक्रेटरी के बारे में यह बात विख्यात थीं वे संविदा में पदस्थ सुपर सीएम के रिश्तेदार थे तो दो अफसर सिर्फ इसलिए चीफ सेक्रेटरी बनाए गए थे कि उनके जरिए सारे गलत-सलत कामों पर चिड़िया बिठवाई जाती थीं.

प्रदेश के एक अन्य अफसर का कहना है- पहले जितने भी नामों के आगे या पीछे सिंह लगा हुआ था वे सभी पूर्व मुख्यमंत्री के रिश्तेदार बन गए थे. कुछ तो वास्तव में थे भी, लेकिन कुछ ने दूर-दराज इलाके में घुसपैठ करके खुद को चाचा-मामा, ताऊ साबित कर लिया था. एक चीफ सेक्रेटरी जिसके नाम के पीछे सिंह लगा हुआ था, वे भूपेश सरकार में भी कुछ दिनों सीएस के पद पर काबिज थे, लेकिन उन्होंने कभी भी आगे होकर राज्य के अधिकारियों और कर्मचारियों को यह नहीं बताया कि सरकार क्या चाहती है ? सरकार का विजन क्या है? शायद पुरानी सरकार का हैंगओवर उतरा नहीं होगा इसलिए उन्होंने मुख्यमंत्री को भी यह नहीं बताया होगा कि योजनाओं को धरातल में उतारने के लिए प्रशासन क्या-क्या काम करता है. कैसे काम करता है ?

इधर अब जाकर प्रशासनिक गलियारे में यह मैसेज गया है कि भइया... जिसे चीफ सेक्रेटरी बनाया गया है वह काम करने वाला है. काम करोगे तो ही पीठ थपथपाई जाएगी. शाबाशी मिलेगी... लल्लो-चप्पो करने से काम नहीं चलेगा.

मंडल ने दो-दिन बैठकों में ही अपने तेवरों से छोटे-बड़े सभी तरह के अफसरों को यह समझा दिया है कि वे काम का परिणाम चाहते हैं. आज भी जब कभी लोग रायपुर और बिलासपुर के कलक्टर कार्यालय कायाकल्प देखते हैं तो जेहन में पहला नाम आरपी मंडल का ही आता है. रायपुर में कई जगह की चौड़ी सड़कों से गुजरते हैं तो उन्हें धन्यवाद नहीं भूलते. उनके नाम के साथ एक बात तो जुड़ी हुई है कि वे जब भी कुछ करेंगे तो नया और बेहतर करेंगे. यह मामला किस्मत से ज्यादा लोगों से हासिल हुए भरोसे का है. बहुत कम अफसरों को ऐसा भरोसा हासिल हो पाता है. इधर हाल के दिनों में जब वे स्कूटी लेकर शहर का मुआयना करने निकले तो शहर के लोगों को यकीन हुआ कि चलो अब शहर वास्तव में थोड़ा साफ-सुथरा दिखाई देगा. अन्यथा हर सुबह गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल... गाना सुन-सुनकर कान पक गया था. मंडल के मुआयने से यह भी लगा कि अब महापौर प्रमोद दुबे की मुश्किल भी थोड़ी आसान हो जाएगी. अब तक शहर के लोगों ने कलक्टर-एसपी और नेताओं का मुआयना देखा था. पहली बार एक चीफ सेक्रेटरी सूट-बूट और टाई के बजाय हैलमेट पहनकर उनके सामने था तो लोग खुश हुए. शहर के एक नागरिक मनीष शर्मा कहते हैं- मंडल साहब जब अल-सुबह मुआयना कर रहे थे तब मैं भी घूमने निकला था. वे जिस ढंग से लोगों से मिल-जुल रहे थे तो मुझे लगा ही नहीं कि वे चीफ सेक्रेटरी है. उनका व्यवहार बेहद सामान्य था. उनकी बातों को सुनकर ही इस बात का यकीन हो गया कि बंदे में दम है. इस शख्स की बात को कोई भी नहीं टालेगा. मुझे वे लो-प्रोफाइल होते हुए भी बेहद पावरफुल लगे.

यह सही है कि मनीष की तरह ही प्रदेश के ज्यादातर लोग बड़का साहेब को लो-प्रोफाइल मानते हैं. वे छोटे-बड़े सबसे एक सामान भाव से मिलते हैं. जो कोई भी  उनसे पहली बार मिलता है उनका अपना होकर रह जाता है. इधर मंत्रालय में पदस्थ कुछ अफसर उनके लो-प्रोफाइल वाले अंदाज की दबे-दबे ढंग से आलोचना भी करते हैं.आलोचना का मुख्य स्वर यहीं है कि एक आईएएस को बाबू और चपरासी से गले नहीं मिलना चाहिए. हाथ नहीं मिलाना चाहिए.

आर्थिक रुप से कमजोर और गरीबों को हिकारत की नजर से देखने वाले अफसर ऐसा कहते हुए यह भूल जाते हैं कि हर आदमी अपनी जगह खड़े रहकर देश के लिए ही काम कर रहा होता है. हर आदमी के भीतर एक मकसूद बैठा रहता है जो मात्र एक जादू की झप्पी से पिघल जाता है. अगर आपने मुन्ना भाई एमबीबीएस देखी हो तो उसमें एक पात्र है मकसूद. यह पात्र झाडू-पोंछा लगाने का काम करता है. मकसूद दुखी होकर इसलिए चिल्लाते रहता है कि कोई भी उसकी नहीं सुनता. दिनभर खटने के बाद भी सब उसे गाली ही देते हैं. एक दिन मुरली प्रसाद यानि संजय दत्त आकर उसे जादू की झप्पी देता है और कहता है- मकसूद भाई...  अपुन तुमको थैक्स बोलना चाहता है... तुम मस्त काम करता है. मकसूद कहता है- बस... कर पगले रुलाएगा क्या ?

प्रशासन का काम डांट-डपट और कड़ी फटकार से रेंगता भर है, दौड़ता तो वह तभी है जब उसमें जादू की झप्पी का घोल शामिल कर लिया जाता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि मंडल के तेवर में जादू की झप्पी का जो घोल है उससे न केवल राजनीति बल्कि आम आदमी को सबसे पहले और भरपूर लाभ मिलेगा.

और पढ़ें ...

2020 के महागंथ्र के लिए जनसंपर्क विभाग ने जारी किया 2018 से विज्ञापन... शायद टोप्पो को भरोसा था कि बन जाएगी रमन सरकार

रायपुर. छत्तीसगढ़ में डाक्टर रमन सिंह के मुख्यमंत्री मंत्री रहने के दौरान जनसंपर्क विभाग में एक से बढ़कर कारनामों को अंजाम दिया गया था. इसी साल 20 सितंबर को प्रकाशित एक खबर में हमने बताया था कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर राजेश सुकुमार टोप्पो जब जनसंपर्क विभाग में पदस्थ थे तब उन्होंने कहानी की एक सदी नाम के ( 14 सौ 29 पेज ) एक महागंथ्र को प्रकाशित करने में विशेष दिलचस्पी दिखाई थी. कथा- कहानी और उपन्यास से कोसो दूर रहने वाले राजेश टोप्पो इस महागंथ्र के प्रधान संपादक भी बन बैठे थे. इधर इस महागंथ्र को टटोलने में कुछ और नई बातें सामने आई है. यह महागंथ्र जनवरी 2020 में निकलना था, लेकिन 2020 के पहले छप गया और जनसंपर्क विभाग के मालखाने में जमा भी हो गया. इतना ही नहीं जनसंपर्क विभाग ने इस महागंथ्र के लिए वर्ष 2018 को ही विज्ञापन भी जारी कर दिया था. ऐसा शायद इसलिए हो पाया... क्योकि पूर्व सीएम एवं सुपर सीएम की नाक के बाल समझे जाने वाले राजेश टोप्पो को भरोसा था कि चौथीं बार भी भाजपा की सरकार बनने जा रही है. इस महाग्रंथ में जनसंपर्क विभाग के फुल पेज के कुल 12 विज्ञापन शामिल है. बहरहाल यहां चित्र में एक विज्ञापन देखिए...। यह विज्ञापन वर्ष 2025 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया था. इस विज्ञापन में यह उल्लेखित है कि विकास का इतिहास है. रमन पर विश्वास है और स्वर्णिम भविष्य की आस है. कई तरह के चमकीले नारों के बीच एक विज्ञापन अन्नदाताओं को दिए जाने वाले सौगात से भी संबंधित है. बहरहाल राजेश टोप्पो ने अपनी निगरानी में जिस महाग्रंथ का प्रकाशन करवाया उसमें मानव जीवन की कहानी शीर्षक से उनकी दो पेज की भावुक संपादकीय भी शामिल है. महाग्रंथ में नाटककार-कहानीकार भारतेन्दु हरिशचंद्र से लेकर कमल चमोला तक शामिल किए गए हैं,  लेकिन छत्तीसगढ़ में रहकर शानदार और जानदार ढंग से कहानी लिखने वाले कहानीकारों को छोड़ दिया गया है. भाजपा के शासनकाल में केले, पपीते और अमरूद की खेती पर भी फिल्में बनी है. लोग दो-चार पत्रिका छापकर भी लाखों का विज्ञापन हासिल करते रहे हैं.

स्टिंग आपरेशन होने के बाद फूटा भांडा

जनसंपर्क विभाग में पदस्थापना के दौरान राजेश टोप्पो जरूरत से ज्यादा दुस्साहसी हो गए थे. वे भाजपा की नीतियों के खिलाफ कलम चलाने वाले पत्रकारों की सेक्स सीडी बनवाना चाहते थे. हालांकि खबर है कि इस भयानक किस्म के गंदे काम का निर्देश उन्हें संविदा में पदस्थ सुपर सीएम की तरफ से दिया गया था, लेकिन जिस शख्स को उन्होंने इस काम का जिम्मा सौंपा था एक दिन उसी शख्स ने उनका स्टिंग आपरेशन कर दिया और भांडा फूट गया. ( हालांकि तब-तक बैकाक-पटाया गए कुछ पत्रकारों की सीडी बन गई थी. वैसे बैकांक-पटाया जाने वाले अधिकांश पत्रकार वे थे जो पद्रंह सालों तक डाक्टर रमन सिंह की जय-जयकार में लगे हुए थे.) बहरहाल संवाद और कंसोल इंडिया के जरिए राजनेताओं के रिश्तेदारों और भाजपाई मीडिया को लाभ पहुंचाने की जो साजिश टोप्पो ने रची उसकी जांच चल रही है. यह जांच कब तक पूरी होगी अभी साफ नहीं है. इतना ही नहीं राजेश टोप्पो तब के कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ( अब मुख्यमंत्री ) और प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया की भी सीडी  बनवाना चाहते थे. इस काम की जिम्मेदारी भी उन्होंने उसी शख्स को दे रखी थीं जो कुछ पत्रकारों को सरकारी खर्च पर बैकांक-पटाया की रंगीन यात्रा पर ले गया था. इस बीच जमीन घोटाले के एक पुराने मामले में टोप्पो पर अपराध पंजीबद्ध कर लिया गया है, लेकिन उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई है.

 

और पढ़ें ...

बघेल ने खाया सोटा...कांपा विरोधियों का पोटा

राजकुमार सोनी

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़ी दीवाली के ठीक दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के मौके पर एक बैगा से चाबुक ( सोटा ) खाकर देशव्यापी वाह-वाही लूट ली है. ग्राम जंजगिरी में सोटा खाने का वीडियो जिस तेजी से वायरल हुआ उसके बाद भाजपाइयों के साथ-साथ उनके ही अपनी पार्टी में जलन रखने वालों का पोटा ( पेट ) कांप गया है. आपको बता दें कि दिल धड़कता है. दिल में धुकधुकी होती है. मन में डर लगता है... जैसे मुहावरे यूं ही नहीं बने हैं. छत्तीसगढ़ में जब कुछ अजीब और अनोखा सा घट जाता है तो लोगों के मुंह से बरबस निकल पड़ता है- ये ले साले... तोर तो पोटा कांप गे हे बे...

मुख्यमंत्री बघेल ग्राम जंजगिरी में गौरा-गौरी पूजा के एक आयोजन में शरीक हुए थे. ऐसी मान्यता है कि पूजा के दरम्यान कुछ अदृश्य शक्तियों का धावा होता है तो उत्पात मचता है. आसपास खड़े लोगों पर देवता चढ़ जाते हैं. गांव का बैगा सोटा मारकर कंट्रोल करता है. यह भी मान्यता है कि जो व्यक्ति सोटा खाता है वह सभी तरह की परेशानियों को अपने ऊपर ले लेता है और अपने साथ-साथ आसपास के लोगों के कष्टों का निवारण कर देता है. तर्क और विज्ञान इस युग में कोई भी सोच सकता है कि यह सोटा-फोटा की परम्परा एक तमाशे के अलावा कुछ भी नहीं है, लेकिन यह शायद ठीक नहीं है. परम्पराएं बनती इसलिए ताकि उसका निर्वहन किया जाय और परम्पराएं होती भी इसलिए है कि उसे तोड़ दिया जाय. मुख्यमंत्री बघेल ने पूजा के मौके पर परम्परा का निर्वाह भी किया और बड़ी ही शालीनता से उसे तोड़ा भी.

जनता के कोड़े का ख्याल

मुख्यमंत्री जब सोटा के वार सह रहे थे तब उनके चेहरे पर एक खास तरह की मुस्कान थीं. एक तरफ तो वे वर्षों पुरानी सोटा परम्परा का निर्वाह कर रहे थे तो दूसरी तरफ यह संदेश भी दे रहे थे कि चाहे कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो जाय...उसे जनता के कोड़े का ख्याल रखना चाहिए. जो लोग शिकवा-शिकायत और जनता के कोड़े का ख्याल रखते हैं वे लंबे समय तक दिलों में राज करते हैं. डाक्टर रमन सिंह की सरकार यहीं बात समझ नहीं आ पाई थीं.उस सरकार में बैठे लोग जनता पर कोड़े बरसा रहे थे. लाठियां भांज रहे थे. शिक्षाकर्मियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा जा रहा था. खुद को तुर्रमखां बताने वाले दो अफसरों की वजह से रमन सिंह की तुलना हिटलर से की जाने लगी थीं. पाठकों को शायद याद हो कि चुनाव के अंतिम दिनों में रमन सिंह को साइलेंट किलर ( खामोश हत्यारा ) और हिटलर बताती हुई तस्वीरें सोशल मीडिया में  वायरल हुई थीं. यह सब स्वस्फूर्त था.. इसके लिए किसी को कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ी थीं.

बहरहाल कल मुख्यमंत्री के सोटा खाने लेने वाले प्रकरण के बाद अब विरोधी इस चर्चा में तल्लीन है कि आखिर करें तो क्या करें. ये आदमी कभी भौरा चलाता है. तो कभी गेंड़ी में चढ़कर नाचता है. कभी मांदर बजाता है तो कभी एक हाथ से बच्चे को उठा लेता है. काजू-कतली खाकर नेतागिरी करने वाले लोगों को यह समझ नहीं आ रहा है कि चौलाई और लालभाजी का मुकाबला कैसे किया जाय ?  सत्ता के अपने प्रारंभिक दिनों में अजीत जोगी ने राह चलते मुनगा भांजी और चनाबूट खाकर खुद को ठेठ छत्तीसगढ़िया बताने की कवायद की थीं, लेकिन जल्द ही वे विवादों से घिर गए और एक बड़े वर्ग ने उन्हें अस्वीकार कर दिया.बघेल को अपनी स्वीकार्यता के लिए गैर-स्वाभाविक ढंग कुछ भी नहीं करना पड़ रहा है. उन्होंने बचपन में पत्थरों के पीछे बिच्छुओं का डंक तोड़कर प्रतियोगिता जीती है तो बैल के साथ खुद को लहुलूहान भी किया है. वे यह सारी चीजें स्वाभाविक ढंग से इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि उनकी पृष्ठभूमि खेती-किसानी की है. वे बेशकीमती हीरे को हड़पने के लिए ( देवभोग ) और उसके आसपास जमीन खरीदकर खुद को किसान बताने वाले सिंघानिया सेठ नहीं है. बघेल के देशी अंदाज का फिलहाल तो कोई तोड़ नहीं दिख रहा है.

देसी गिफ्ट ने भी लुभाया

हर दीवाली पर मुख्यमंत्री निवास से प्रदेश के पत्रकारों को तोहफा दिए जाने की एक परम्परा चली आ रही है. पूर्व के दो मुख्यमंत्रियों के तोहफों में कभी टीवी शामिल रहता था, कभी फ्रिज... कभी लैपटाप तो कभी फटने वाला मोबाइल. लेकिन पहली बार इस दीवाली पर मुख्यमंत्री निवास से पत्रकारों को जो तोहफा मिला है उसकी तारीफ हर कोई कर रहा है.

इस बार सीएम हाउस से खादी एवं ग्रामोद्योग की ओर से उत्पादित सामग्री वितरित की गई है. माटी कला बोर्ड की ओर से चाय के बर्तन, लघु वनोपज सहकारी संघ का शहद, महिला स्वसहायता समूह द्वारा निर्मित साबुन, दुग्ध महासंघ की ओर से बनाया गया देसी घी, गोबर से निर्मित दीये और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के अंतर्गत वित्तपोषित अगरबत्ती का वितरण किया गया है. इस देसी तोहफे में एक संदेश यह छिपा है कि अगर अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है ग्रामीण हाथों को रोजगार देने की जरूरत है. अब यह देसी गिफ्ट पत्रकारों के अलावा प्रदेश के अफसरों और प्रमुखजनों को भी वितरित किए गए होंगे. जो भी हो... इनकी खरीददारी तो हुई. कुछ घरों का अंधेरा दूर हुआ. वहां दीवाली तो मनी.

 

 

और पढ़ें ...

शर्मनाक और केवल शर्मनाकः दिव्यांगों के लिए उपकरण खरीदी में समाज कल्याण विभाग ने किया घोटाला

रायपुर. प्रदेश के समाज कल्याण विभाग में भ्रष्ट अफसरों का जबरदस्त बोलबाला है. केवल नई राजधानी के मंत्रालय और संचालनालय में ही नहीं अपितु  एय्याश और कमीशनखोर अफसर प्रदेश के हर जिले में काबिज है. अभी हाल के दिनों में रायपुर की सामाजिक संस्था समर्पण सेवा के प्रमुख रामचंद्र मजूमदार ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को चौकाने वाली जानकारी भेजी है. सूचना के अधिकार के तहत हासिल किए दस्तावेजों के आधार पर यह दावा किया गया है कि वर्ष 2016 से लेकर 18 तक जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थीं तब अफसरों ने दिव्यांगों के कृत्रिम अंग उपकरण की खरीदी में करोड़ों का घोटाला किया.

शिकायत में यह जानकारी दी गई है कि वर्ष 2016-17-18 में समाज कल्याण विभाग रायपुर के संयुक्त संचालक ने बगैर निविदा के कुल 1.58 करोड़ रुपए के उपकरण खरीद लिए थे. नियमानुसार इतनी बड़ी धनराशि की खरीदी के लिए निविदा बुलाई जानी थीं, भंडार क्रय नियम 2002 का पालन किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. इन वर्षों में धमतरी के उपसंचालक ने भी बगैर निविदा के कुल 5 लाख 80 हजार रुपए के उपकरणों की खरीदी की. इनकी देखा-देखी बिलासपुर के संयुक्त संचालक 16 करोड़, जांजगीर-चांपा के उप संचालक ने 3 करोड़, राजनांदगांव के उपसंचालक ने 2.50 करोड़, बेमेतरा में 1.50 करोड़, रायगढ़ में  एक करोड़ और सरगुजा में डेढ़ करोड़ के उपकरण क्रय किए.

कानपुर की कंपनी से सीधे खरीदी

समाज कल्याण विभाग ने उपकरणों की खरीदी के लिए कानपुर में साइकिल निर्माता कंपनी ऐलिंको को ही महत्वपूर्ण माना, जबकि जिन वर्षों में खरीदी की जा रही थीं उस समय कंपनी का बीआईएस ( ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैडर्ड ) का लायसेंस निरस्त था. यानी कंपनी इस लायक नहीं थी कि वह उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों की आपूर्ति कर सकें. कई जिलों में बैटरी से चलने वाली ट्रायसाइकिल की खरीदी हुई. इन साइकिलों की खरीदी में थर्ड पार्टी से जांच नहीं करवाई गई. यहां तक सप्लायर ने किसी तरह की गारंटी-वारंटी भी प्रदान नहीं की. इस कंपनी को भुगतान देने के लिए समाज कल्याण विभाग के अफसर इतने ज्यादा उतावले थे कि कंपनी को उपकरणों की सप्लाई के पहले ही सौ फीसदी अग्रिम भुगतान भुगतान कर दिया गया.

अफसरों पर नहीं हुई कार्रवाई

इस मामले का भांडा तब फूटा जब जांजगीर-चांपा में दिव्यांगो ने कलक्टर को बड़ी संख्या में ट्राइसाइकिल लौटाई. दिव्यांगों का कहना था कि उन्हें खराब साइकिल दे गई है. दिव्यांगों की शिकायत के बाद ऐलिंको कंपनी के इंजीनियरों ने कुछ सायकिलें सुधारी, लेकिन साइकिल फिर खराब हो गई. दिव्यांगों की शिकायत और उनके साथ हुए मजाक के बाद समाज कल्याण विभाग की प्रभारी बीना दीक्षित हटा दी गई. यह एक छोटी सी कार्रवाई मात्र जांजगीर-चांपा जिले में हो पाई है. घटिया उपकरणों की मंहगे दर पर खरीदी के मामले में अब भी बड़े अफसरों पर गाज नहीं गिरी है. इन अफसरों के बचे रहने की एक बड़ी वजह यह भी है कि इन्हें मंत्रालय में पदस्थ भारतीय प्रशासनिक सेवा के नामचीन अफसरों का संरक्षण प्राप्त है. पाठकों को याद होगा कि भाजपा के शासनकाल में समाज कल्याण विभाग में रहते हुए करोड़ों रुपए का घोटाला करने वाले एक अफसर के घर और ठिकानों पर ईओडब्लू ने छापामार कार्रवाई की थी. यह अफसर अब सेवानिवृत हो गया है लेकिन ईओडब्लू अब तक चालान पेश नहीं कर पाई है. इन दिनों यह अफसर समाज कल्याण विभाग की मंत्री का सबसे करीबी माना जाता है.

और पढ़ें ...

भाजपा के शासनकाल में राजेश सुकुमार टोप्पो प्रधान संपादक भी थे… और उनके डायरेक्शन में छपी थी रामायण और महाभारत से भी ज्यादा मोटी किताब

रायपुर. डाक्टर रमन सिंह के मुख्यमंत्री और जनसंपर्क मंत्री रहते हुए छत्तीसगढ़ के जनसंपर्क विभाग में एक से बढ़कर कारनामों को अंजाम दिया गया है. कोई केले, पपीते और अमरूद पर फिल्म बनाकर करोड़ों रुपए की उगाही करता रहा है तो कोई दो-चार पत्रिका छापकर लाखों का विज्ञापन हासिल करता रहा है. इधर अब जाकर रामायण और महाभारत से भी वजनी एक महाग्रंथ हाथ लगा है. ( इस किताब को पांच मिनट तक उठाकर रखने में हाथ की नसों में दर्द का उठना तय है. अगर आप युवा है तो इस वजनी ग्रंथ को उठाकर अपनी मसल बना सकते हैं.) आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कहानी की एक सदी के नाम से प्रकाशित यह महाग्रंथ लगभग 14 सौ 29 पेज का है और इसके प्रधान संपादक है भारतीय प्रशाससिक सेवा के अफसर राजेश सुकुमार टोप्पो.

राजेश कुमार टोप्पो के बारे में यह सर्वविदित है कि भाजपा के शासनकाल में वे पूर्व सीएम एवं सुपर सीएम की नाक के बाल थे. जनसंपर्क विभाग में रहने के दौरान वे इतने ज्यादा दुस्साहसी हो गए थे कि भाजपा की नीतियों के खिलाफ कलम चलाने वाले पत्रकारों की सेक्स सीडी बनवाना चाहते थे. इस भयानक किस्म के गंदे काम की जवाबदारी उन्होंने जिस शख्स को दे रखी थीं एक दिन उस शख्स ने ही एक दिन उनका स्टिंग आपरेशन कर दिया और भांडा फूट गया. ( हालांकि बैकाक-पटाया ले जाए गए कई पत्रकारों की सीडी तब भी बन ही गई. मजे की बात यह है कि ये पत्रकार वे हैं जो पद्रंह सालों तक डाक्टर रमन सिंह की जय-जयकार में लगे हुए थे.) संवाद और कंसोल इंडिया के जरिए राजनेताओं के रिश्तेदारों और भाजपाई मीडिया को लाभ पहुंचाने की जो साजिश टोप्पो ने रची उसकी जांच चल रही है. इस बीच जमीन घोटाले के एक पुराने मामले में टोप्पो पर अपराध पंजीबद्ध कर लिया गया है.

इधर अब जाकर पता चला कि टोप्पो साहब प्रधान संपादक भी थे और उन्होंने अपनी निगरानी में महाग्रंथ का प्रकाशन करवाया था. इस महाग्रंथ में उन्होंने मानव जीवन की कहानी शीर्षक से दो पेज की भावुक किस्म की. संपादकीय भी लिखी है. महाग्रंथ में छत्तीसगढ़ के जनसंपर्क विभाग के फुल पेज के कुल 12 विज्ञापन शामिल है. चमकीले और महंगे विज्ञापनों को देखते हुए कथाकारों की कहानियों से गुजरना एक अलग तरह की खींझ पैदा करता है. महाग्रंथ में नाटककार-कहानीकार भारतेन्दु हरिशचंद्र से लेकर कमल चमोला तक शामिल है, लेकिन छत्तीसगढ़ में रहकर शानदार और जानदार कहानी लिखने वाले कहानीकारों को छोड़ दिया गया है.

और पढ़ें ...

शिवशंकर भट्ट ने नान घोटाले में कौशलेंद्र सिंह को बताया रमन गैंग का खास सदस्य

रायपुर. नान घोटाले के एक आरोपी शिवशंकर भट्ट ने नीरज श्रीवास्तव की अदालत में शपथपूर्वक दिए गए एक बयान में पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह, पूर्व खाद्य मंत्री पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता के साथ-साथ वन अफसर रहे कौशलेंद्र सिंह को नान घोटाले का प्रमुख आरोपी बताया है. अपने बयान में शिवशंकर भट्ट ने कई मर्तबा कौशलेंद्र सिंह का नाम लिया है.

कौशलेंद्र ने दिए थे रेणु सिंह को पैसे

भट्ट ने न्यायालय में बताया कि फरवरी 2014 में कौशलेंद्र सिंह मुझे एश्वर्या रेंसीडेंसी में रहने वाली रेणु सिंह के निवास पर ले गए थे. वहां उन्होंने मेरे सामने पांच लाख रुपए रेणु सिंह को दिए. यह पैसे किस मद से दिए गए मुझे इसकी जानकारी नहीं थी और मैं जानना भी नहीं चाहता था. भट्ट ने शपथपत्र में कहा कि 12 फरवरी 2015 को ईओडब्लू ने छापा मारकर एक करोड़ 62 लाख रुपए की फर्जी ढंग से जप्ती बनाई थी. मेरे हाथों से कोई रकम प्राप्त नहीं हुई थी. मेरे पास कोई ऐसी शक्ति नहीं थीं कि मैं इतनी बड़ी रकम कार्यालय में रखता. भट्ट ने कहा कि कौशलेंद्र सिंह और नागरिक आपूर्ति निगम में कार्यरत गिरीश शर्मा, चिंतामणि चंद्राकर आपस में मिलकर लेन-देन और बंदरबांट करते थे. उनके पैसों को मेरे नाम डालकर फर्जी जप्ती बनाई गई थीं. भट्ट ने न्यायालय के समक्ष बताया कि कौशलेंद्र सिंह पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के काफी निकट थे. उनके पारिवारिक रिश्ते थे. नान का पूरा संचालन कौशलेंद्र सिंह, डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी और राधाकृष्ण गुप्ता एक गैंग बनाकर करते थे.

गाली-गलौच करते थे कौशलेंद्र

भट्ट ने कहा कि नागरिक आपूर्ति निगम में किसी भी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह विरोध अथवा आपत्ति दर्ज करें. अगर कोई कौशलेंद्र सिंह के काम पर आपत्ति दर्ज करता तो वे सीधे डाक्टर रमन सिंह और चारों व्यक्तियों का नाम लेकर गाली-गलौच करते थे. कौशलेंद्र सिंह, चिंतामणि और गिरीश शर्मा सभी सप्लायर्स और राइस मिलरों से लगातार लेन-देन करते थे. यह सब देखकर ऐसा प्रतीत ही नहीं होता था कि कोई शासकीय कार्यालय चल रहा है.कौशलेंद्र सिंह मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के प्रियपात्र थे इसलिए वर्ष 2011 और 2014 के बीच उनका केवल दो बार ही तबादला हुआ. वे हर बार मुख्यमंत्री को बोलकर अपना तबादला रूकवा लेते थे. कृतिकांत बारिक के कम्प्यूटर से बरामद पन्ने कौशलेंद्र सिंह के निर्देश पर गिरीश शर्मा ने ही लिखवाए है.

हत्या पर उठाए सवाल

भट्ट ने नागरिक आपूर्ति निगम के एक कर्मचारी त्रिनाथ रेड्डी की वाइफ की हत्या पर भी सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि इस हत्या को आत्महत्या बताने का प्रयास किया गया था. इस हत्या के जरिए यह मैसेज देने की कोशिश की गई थी कि जो कोई भी मुंह खोलेगा उसके साथ अनहोनी हो सकती है. यह हत्या किसने करवाई  इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिए.

शिवशंकर भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ के धान उपार्जन के लिए लगभग 550 करोड़ और फिर 500 करोड़ की अग्रिम सब्सिडी जारी की गई थी. हैरत की बात यह है कि वर्ष 2003-04 से लेकर वर्ष 2014-15 तक लगभग दस हजार करोड़ रुपए की अग्रिम सब्सिडी स्वीकृत की गई. यह सब्सिडी बगैर किसी वैधानिक ऑडिट के केवल प्रस्तुत किए गए बिल के आधार पर की गई थीं. जो भी अधिकारी इसके खिलाफ मुंह खोलता उसे परिणाम भुगतना पड़ता. इस खेल में विपणन संघ के तत्कालीन अध्यक्ष राधाकृष्ण गुप्ता खास पर शामिल थे. डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता ने आपस में सांठगांठ कर हाईप्रोफाइल रैकेट तैयार कर लिया था. इस रैकेट ने शासन को करोड़ों रुपए की क्षति पहुंचाई.

भट्ट ने कहा कि वर्ष 2014 के अगस्त माह में नागरिक आपूर्ति निगम के पास 9 लाख मैट्रिक टन चावल का स्टाक था. इसके बावजूद मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह जो वित्त मंत्री भी थे ने विभाग के अधिकारियों पर दबाव देकर 10 लाख टन मीट्रिक टन चावल का अतिरिक्त उपार्जन करने का आदेश दिया था. इतना ही नहीं अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए 236 करोड़ की क्षतिपूर्ति की गारंटी बिना कैबिनेट की अनुमोदन के पास कर दिया था. जबकि शासन के हित में ऐसा नहीं किया जाना था. इस मामले में विभाग के अधिकारियों ने आपत्ति जताई तो उन्होंने अधिकारियों से कहा कि आपत्ति की आवश्यकता नहीं है. इस संदर्भ में हमें और पार्टी को लंबी-चौड़ी रकम मिलनी है और अगर आप लोग चाहे तो यह रकम आपको भी प्रदान की जाएगी.

भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में 21 लाख फर्जी राशनकार्ड बनवाए गए थे. इस काम को खाद्य विभाग का कोई भी अधिकारी स्वेच्छा से करना नहीं चाहता था, लेकिन डाक्टर रमन सिंह, लीलाराम भोजवानी और पून्नूलाल मोहिले ने अधिकारियों को डराया-धमकाया और परिणाम भुगतने को तैयार रहने को कहा.

इधर शिवशंकर भट्ट के द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि हाईकोर्ट से जमानत पर चल रहे शिवशंकर भट्ट से बयान दिलाकर भाजपा की छवि खराब करने की कोशिश की गई है. कांग्रेस नान घोटाले के आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है. अपराधियों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की कोशिश की जा रही है. पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कभी सीएम हाउस में न तो पैसों को लेकर किसी के जाने जैसी कोई बात हुई है और न ही ऐसा करना संभव है. वहां आने-जाने वाले हर व्यक्ति के संबंध में इंट्री होती है. उन्होंने कहा कि वे इस मामले को लेकर कानूनी सलाह लेकर आगे की कार्रवाई करेंगे. 

और पढ़ें ...

किसने करवाई थी त्रिनाथ रेड्डी की वाइफ की हत्या... नान घोटाले के एक प्रमुख आरोपी भट्ट ने उठाया सवाल ?

रायपुर. नान घोटाले के एक प्रमुख आरोपी शिवशंकर भट्ट ने नीरज श्रीवास्तव की अदालत में शपथपूर्वक दिए गए एक बयान में साफ तौर पर कहा है कि नागरिक आपूर्ति निगम के एक कर्मचारी त्रिनाथ रेड्डी की वाइफ की हत्या की गई है, लेकिन इस हत्या को आत्महत्या बताने का प्रयास किया गया था. इस हत्या के जरिए यह मैसेज देने की कोशिश की गई थी कि जो कोई भी मुंह खोलेगा उसके साथ अनहोनी हो सकती है. यह हत्या किसने करवाई  इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिए.

शिवशंकर भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ के धान उपार्जन के लिए लगभग 550 करोड़ और फिर 500 करोड़ की अग्रिम सब्सिडी जारी की गई थी. हैरत की बात यह है कि वर्ष 2003-04 से लेकर वर्ष 2014-15 तक लगभग दस हजार करोड़ रुपए की अग्रिम सब्सिडी स्वीकृत की गई. यह सब्सिडी बगैर किसी वैधानिक ऑडिट के केवल प्रस्तुत किए गए बिल के आधार पर की गई थीं. जो भी अधिकारी इसके खिलाफ मुंह खोलता उसे परिणाम भुगतना पड़ता. इस खेल में विपणन संघ के तत्कालीन अध्यक्ष राधाकृष्ण गुप्ता खास पर शामिल थे. डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता ने आपस में सांठगांठ कर हाईप्रोफाइल रैकेट तैयार कर लिया था. इस रैकेट ने शासन को करोड़ों रुपए की क्षति पहुंचाई.

भट्ट ने यह माना कि नान घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, वन अफसर कौशलेंद्र सिंह, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता सहित अन्य कई लोग शामिल थे. भट्ट ने कहा कि वर्ष 2014 के अगस्त माह में नागरिक आपूर्ति निगम के पास 9 लाख मैट्रिक टन चावल का स्टाक था. इसके बावजूद मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह जो वित्त मंत्री भी थे ने विभाग के अधिकारियों पर दबाव देकर 10 लाख टन मीट्रिक टन चावल का अतिरिक्त उपार्जन करने का आदेश दिया था. इतना ही नहीं अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए 236 करोड़ की क्षतिपूर्ति की गारंटी बिना कैबिनेट की अनुमोदन के पास कर दिया था. जबकि शासन के हित में ऐसा नहीं किया जाना था. इस मामले में विभाग के अधिकारियों ने आपत्ति जताई तो उन्होंने अधिकारियों से कहा कि आपत्ति की आवश्यकता नहीं है. इस संदर्भ में हमें और पार्टी को लंबी-चौड़ी रकम मिलनी है और अगर आप लोग चाहे तो यह रकम आपको भी प्रदान की जाएगी.

भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में 21 लाख फर्जी राशनकार्ड बनवाए गए थे. इस काम को खाद्य विभाग का कोई भी अधिकारी स्वेच्छा से करना नहीं चाहता था, लेकिन डाक्टर रमन सिंह, लीलाराम भोजवानी और पून्नूलाल मोहिले ने अधिकारियों को डराया-धमकाया और परिणाम भुगतने को तैयार रहने को कहा.

इधर शिवशंकर भट्ट के द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि हाईकोर्ट से जमानत पर चल रहे शिवशंकर भट्ट से बयान दिलाकर भाजपा की छवि खराब करने की कोशिश की गई है. कांग्रेस नान घोटाले के आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है. अपराधियों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की कोशिश की जा रही है. पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कभी सीएम हाउस में न तो पैसों को लेकर किसी के जाने जैसी कोई बात हुई है और न ही ऐसा करना संभव है. वहां आने-जाने वाले हर व्यक्ति के संबंध में इंट्री होती है. उन्होंने कहा कि वे इस मामले को लेकर कानूनी सलाह लेकर आगे की कार्रवाई करेंगे. 

और पढ़ें ...

क्या भारतीय प्रशानिक सेवा के अफसर जगदीश सोनकर सुसाइड कर सकते है ?

रायपुर. बलरामपुर जिले के रामानुजगंज इलाके में अपनी पदस्थापना के दौरान एक मरीज के बिस्तर पर बूट रखकर बूट बाबू के नाम से विख्यात हुए भारतीय प्रशासनिक सेवा 2013 बैच के अफसर जगदीश सोनकर एक बार फिर चर्चा में हैं. सोनकर इन दिनों बस्तर जगदलपुर में अपर कलक्टर की हैसियत से कार्यरत है. यहां के कलक्टर कार्यालय में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को एक पत्र भेजकर सोनकर को हटाने की मांग की है. पत्र में सोनकर की कार्यप्रणाली और गतिविधियों और लेकर गंभीर शिकायत की गई है. पत्र में कहा गया है कि सोनकर सप्ताह में मात्र दो या तीन दिन आधे घंटे के लिए दफ्तर आते हैं. बाकी दिन वे कहां रहते हैं? क्या करते हैं... इसकी जानकारी किसी को नहीं होती. जगदलपुर के प्रशासनिक गलियारों में किस तरह की उथल-पुथल चल रही है इसकी ठीक-ठाक जानकारी फिलहाल हासिल नहीं हैं, लेकिन पत्र में गंभीर तौर पर यह बात भी उल्लेखित है कि सोनकर को ठीक करना किसी कलक्टर और कमिश्नर के बस की बात नहीं है. उनके ( सोनकर )  के सामने अपर कलक्टर और डिप्टी कलक्टर उपस्थित होने से इसलिए डरते कि कहीं वे उनका नाम लिखकर आत्महत्या न कर लें. ( हालांकि इस खबर के रिपोर्टर का मानना है कि शिकायतें अपनी जगह है. शिकायतें होती रहती है, लेकिन किसी दबाव में कोई अप्रिय स्थिति उत्पन्न नहीं होनी चाहिए. इस मामले में शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को भी संज्ञान लेकर कोई उचित समाधान अवश्य ढूंढना चाहिए. ) 

चाय पीने के लिए चले जाते हैं कोण्डागांव

पत्र में कहा गया है कि अव्वल तो सोनकर किसी भी बैठक में हिस्सेदारी दर्ज नहीं करते और अगर कभी भूले-भटके बैठक में आ भी गए तो एक मूर्ति की तरह चुपचाप बैठे रहते हैं. जैसे ही कलक्टर कोई जिम्मेदारी देते हैं वे कार्यालय आना बंद कर देते हैं और अजीब-अजीब सी हरकत करने लगते हैं. पत्र में कहा गया है कि जब भी सोनकर की वीआईपी डयूटी लगाई जाती है तो उनका दिमाग आपे से बाहर हो जाता है. पत्र में एक खास बात यह भी उल्लेखित है कि सोनकर को चाय पीने का जबरदस्त शौक है और इस शौक को पूरा करने के लिए वे सरकारी वाहन से जगदलपुर से कोण्डागांव और नारायणपुर चले जाते हैं. अगर आवंटित सरकारी वाहन के लॉगबुक की जांच करवाई जाएगी तो यह तथ्य भी उजागर हो जाएगा.

लोकसभा चुनाव में नहीं किया काम  

शिकायती पत्र में यह भी कहा गया है कि सोनकर पहले दंतेवाड़ा के जिला पंचायत में कार्यपालन अधिकारी थे, लेकिन उन्हें संदिग्ध गतिविधियों के चलते अल्प अवधि में ही जगदलपुर स्थानांतरित कर दिया गया था. यहां आकर भी उन्होंने अपना ढुलमुल रवैया बरकरार रखा और कलक्टर के द्वारा जिम्मेदारी दिए जाने के बाद भी उनके द्वारा लोकसभा चुनाव में किसी तरह का कोई कार्य नहीं किया गया. वे आईएएस है इसलिए अब तक सुरक्षित हैं अगर किसी अन्य श्रेणी के कर्मचारी होते तो निलंबित हो गए होते. पत्र में बीजापुर के एक आईएएस अधिकारी द्वारा पत्रकारों के साथ किए गए दुर्व्यहार का भी उल्लेख है. बताया गया है कि बस्तर संभाग के कमिश्नर ने इस मामले की जांच का जिम्मा सोनकर और अन्य दो पत्रकारों को दिया था, लेकिन जांच के दौरान सोनकर के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला. पत्र में यह भी लिखा गया है कर्तव्य के प्रति लापरवाही, अकर्मण्यता के चलते जगदलपुर कलक्टर कार्यालय के अन्य कर्मचारियों पर विपरीत असर पड़ रहा है. इस बारे में सच्चाई जानने के लिए जगदलपुर कलक्टर एयाज तंबोली को फोन लगाया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया. भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर जगदीश सोनकर के मोबाइल पर भी उनका पक्ष जानने की कवायद की गई, लेकिन उन्होंने भी फोन नहीं उठाया.

 

 

 

और पढ़ें ...

... तो क्या झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं को मौत के घाट उतारने में पुलिस अफसर आरएन दास शामिल थे ?

रायपुर.  छत्तीसगढ़ के लोग मंतूराम पवार के नाम से भली-भांति वाकिफ है. मंतूराम वही है जो कभी कांग्रेस से जुड़े थे ( अब भाजपा में हैं. ) और जिन्होंने धुर माओवाद प्रभावित अंतागढ़ में होने वाले उपचुनाव के दौरान एकायक अपना नाम वापस लेकर सबको चौका दिया था. तब कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल थे. वे इस मामले को लेकर आरोप लगाते रहे कि मंतूराम की खरीद-फरोख्त हुई है, लेकिन तमाम तरह के दस्तावेजी सबूतों के बावजूद कहीं सुनवाई नहीं हुई. यहां तक चुनाव आयोग के सामने धरना-प्रदर्शन हुआ मगर आयोग हाथ में हाथ धरे बैठा रहा. मंतूराम जब भाजपा में चले गए तब भी किसी ने नहीं माना कि खरीद-फरोख्त का खेल हुआ है. शनिवार को मंतूराम ने अदालत के सामने यह मान लिया है कि उन्हें खरीदने के लिए कुल साढ़े सात करोड़ की डील हुई थी. मंतूराम की बात पर यकीने करें तो यह डील मंत्री राजेश मूणत के बंगले पर हुई थीं और खुद मूणत ने अपने हाथ से फिरोज सिद्दिकी और अमीन मेनन को सात करोड़ दिए थे. ( छत्तीसगढ़ के स्थानीय बाशिंदों को यह अवश्य सोचना चाहिए कि जब भाजपा की सरकार थी तब एक-एक मंत्री करोड़ों रुपए अपने बंगले में क्यों रखता था. ) बहरहाल एक ताजा घटनाक्रम में मंतूराम ने धारा 164 के तहत बयान देकर पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, उनके दामाद पुनीत गुप्ता, अजीत जोगी, उनके पुत्र अमित जोगी को आरोपों के कटघरे में खड़ा कर दिया है. मंतू ने अपने बयान में  जो सबसे चौकाने वाली बात कहीं है वह यह है कि नाम वापसी के खेल में कांकेर के एसपी की भी भूमिका थी. मंतूराम की नाम वापसी का घटनाक्रम वर्ष 2014 से जुड़ा है, तब कांकेर एसपी आरएन दास थे. मंतूराम का कहना है- मुझे कांकेर के पुलिस अधीक्षक का फोन आया था. पुलिस अधीक्षक ने कहा- मंतूराम जो कहा जा रहा है वह करो... नहीं तो तुम्हे झीरम घाटी का परिणाम भुगतना होगा. उल्लेखनीय है कि 25 मई 2013 को बस्तर के झीरमघाट में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया था. मंतूराम ने जो कुछ अपने बयान में कहा है अगर उस पर यकीन करें तो यह सवाल स्वाभाविक तौर पर उठता है कि क्या कांग्रेस नेताओं की मौत भाजपा के नेताओं के द्वारा रची गई एक गहरी साजिश थी और उसमें पुलिस अफसर आरएन दास भी शामिल थे?

विवादों से नाता रहा है दास का

आरएन दास इन दिनों पुलिस मुख्यालय में पदस्थ है,लेकिन उनकी गिनती कभी भी संवेदनशील और काबिल पुलिस अफसर के तौर पर नहीं होती रही. उनका नाम हमेशा विवादों से जुड़ा रहा और उनकी पहचान विवादों से नाता रखने वाले पुलिस अफसर शिवराम कल्लूरी के शार्गिद के तौर पर ही बनी रही. यहां यह बताना लाजिमी है कि फरवरी 2017 में आरएन दास ने अधिवक्ता शालिनी गेरा को अपने मोबाइल की बजाय एक संदिग्ध के नंबर से फोन करके धमकाया था. दास ने शालिनी को माओवादियों के साथ संबंध रखने का आरोप लगाते हुए थाने बुलाया. जब शालिनी और उनके साथियों ने जब नंबर की पड़ताल की तो वह अग्नि संस्था के एक सदस्य फारूख़ अली का निकला था. शालिनी गेरा ने इस बात की शिकायत मानवाधिकार में भी की थी. इसके अलावा बस्तर में निर्दोष आदिवासियों और बच्चों को मौत के घाट उतारने के मामले में भी आरएन दास की भूमिका को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं.

 

पहली बार आया डाक्टर रमन सिंह का नाम

अंतागढ़ टेपकांड में खरीद-फरोख्त किए जाने को लेकर अब तक पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी,अमित जोगी, पुनीत गुप्ता का नाम ही सामने आता रहा है, लेकिन पहली बार मंतूराम ने पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह को भी निशाना बनाया है. धारा 164 के तहत दिए गए अपने बयान में मंतूराम ने कहा है कि जब मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था तब फिरोज सिद्दिकी और अमीन मेनन ने कहा था कि अगर तुम यह काम नहीं करोगे तो रमन सिंह तुम्हारे पूरे खानदान को नहीं छोडेंगे. झीरमघाटी की तरह ही तुम्हें पूरे परिवार के साथ मसलकर फेंक दिया जाएगा. मैं जिस क्षेत्र से आता हूं वहां यह बात चर्चित एवं स्पष्ट थीं कि झीरम घाटी हत्याकांड में बड़े नेताओं का हाथ है. मंतूराम ने अपने बयान में यह भी कहा है कि जब रमन सिंह अपनी पत्नी के इलाज के लिए विदेश गए थे तब फिरोज सिद्दिकी ( फिरोज इन दिनों जेल में हैं. )  ने किसी के फोन से उनसे बात करवाई थीं. फोन पर बातचीत के दौरान रमन सिंह ने कहा था वे लोग जो कह रहे हैं वो तुमको करना है और मैं तुमको आर्शीवाद दूंगा. मंतूराम ने बयान में साफ किया कि पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, अजीत जोगी और अमित जोगी मिलकर काम करते थे. यह बात उन्हें फिरोज सिद्दिकी और अमीन मेनन ने बताई थी. मंतूराम ने शपथपूर्वक दिए गए अपने बयान में यह भी कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने उसका राजनीतिक भविष्य बनाने और लालबत्ती दिलाने का आश्वासन दिया था. अंतागढ़ चुनाव को प्रभावित करने में रमन सिंह, अजीत जोगी, अमित जोगी शामिल थे. जबरन ही उनका नाम ( मंतूराम ) खराब किया गया.

 

और पढ़ें ...

सीएम हाउस में नजर आएगी छायाकार गोकुल सोनी की तस्वीर

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के जन्मदिन के अवसर पर छायाकार गोकुल सोनी द्वारा ली गई वह तस्वीर जो खूब वायरल हुई थी, अब सीएम हाउस में नजर आएगी. शनिवार को वरिष्ठ पत्रकार मोहन राव के साथ छायाकार गोकुल सोनी और नरेंद्र बंगाले ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की और उन्हें एक सुसज्जित फ्रेम में बच्चे को एक हाथ से उठाने वाली तस्वीर भेंट की. इस मौके पर मुख्यमंत्री ने बताया कि गांवों में अब भी उन बच्चों को लाड़ और दुलार के साथ उठाया जाता है जो चलने-फिरने में झिझक महसूस करते हैं. बच्चे के दोनों पैरों को मजबूती से पकड़कर उठाने से उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा होता है. यह एक तरह की देशज, लेकिन वैज्ञानिक तकनीक है. मुख्यमंत्री ने बताया कि ग्रामीण जन-जीवन से जुड़े लोग अब भी एक हाथ से कुर्सी के एक हत्थे को पकड़कर उठा लेते हैं. मुख्यमंत्री ने अपने निवास में यह कर भी  दिखाया. ( कुर्सी पर संतुलन कायम करने वाली यह तस्वीर नहीं मिल पाई है अन्यथा राजनीतिक दृष्टि से इस तस्वीर का भी महत्व होता. )

छायाकार गोकुल सोनी ने जो तस्वीर ली है सरकार ने उसे अपने विज्ञापन में भी जगह दी है. सोशल मीडिया में जब यह तस्वीर वायरल हुई तो टिप्पणियों की बाढ़ आ गई. एक पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ता की टिप्पणी थी- काश... हमारे रमन सिंह भी ऐसा संतुलन कायम कर पाते? कार्यकर्ता ने यह भी लिखा- मात्र एक तस्वीर ने रमन सिंह की पन्द्रह साल की लोकप्रियता को धोकर रख दिया है. टिप्पणियां और भी है जिसे फेसबुक, ट्विटर, वाट्सअप पर देखा जा सकता है.

और पढ़ें ...

छत्तीसगढ़ के नकलचोर फिल्मकारों के मुंह पर करारा तमाचा है मंदराजी

राजकुमार सोनी

आज हरेली तिहार है...और अभी थोड़ी देर पहले ही नाचा के जनक दाऊ मंदराजी के जीवन पर बनी एक बेहतर फिल्म देखकर लौटा हूं. हालांकि यह फिल्म मुझे उसी रोज देख लेनी चाहिए थीं जिस रोज प्रदर्शित हुई थीं, लेकिन तब एक इमरजेंसी ने ऐसा होने नहीं दिया. इस बीच कई पाठकों ने फोन और मैसेज के जरिए यह जानना चाहा कि फिल्म मंदराजी पर समीक्षा कब पढ़ने को मिलेगी ? अपने पाठकों की इस जिज्ञासा के लिए उनका शुक्रिया अदा करता हूं. मेरे पाठक सीमित अवश्य है, लेकिन समझदार है. मैं अपने समझदार पाठकों को भीड़तंत्र का हिस्सा नहीं मानता हूं इसलिए फिल्म के बारे में राय व्यक्त करने में जो देरी हुई है उसके लिए क्षमा मांगता हूं. पाठकों और दर्शकों से एक आग्रह यह भी करना चाहता हूं कि चाहे जो स्थिति बने... यह फिल्म अवश्य देखी जानी चाहिए. एक निवेदन छत्तीसगढ़ की संवेदनशील भूपेश सरकार से भी है. जैसे भी हो... इस फिल्म को टैक्स फ्री कर देना चाहिए क्योंकि यह फिल्म नाचा के पुरोधा और हमारे पुरखा दाऊ मंदराजी को सच्ची श्रद्धाजंलि तो देती ही है, फिल्म छत्तीसगढ़ की माटी और उसकी महक को जिंदा रखने का काम भी करती है. यह छत्तीसगढ़ की पहली बायोपिक फिल्म ही नहीं बल्कि यह छत्तीसगढ़ की पहली असली फिल्म भी है.

मंदराजी... रवेली नाचा पार्टी के संचालक दाऊ मंदराजी के जीवन से प्रेरणा लेकर बनाई गई फिल्म है. छत्तीसगढ़ के नकलचोर फिल्मकार अब तक यह समझ ही नहीं पाए हैं कि प्रेरणा और नकल में फर्क होता है. प्रेरणा आपको देर-सबेर ही सही... इतिहास में आपकी जगह तय करती है. जबकि नकलचोरी केवल आपके मुनाफे में इजाफा करती है और आपको कूड़ेदान का हिस्सा बनाकर छोड़ देती है. यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि छत्तीसगढ़ के सिने इतिहास में जब कभी भी जिन दो-चार फिल्मों का जिक्र होगा उनमें कहि देबें संदेश के बाद मंदराजी का उल्लेख भी अवश्य होगा.

यह सही है कि अभी मंदराजी को वैसा दर्शक वर्ग नहीं मिल पाया है जैसा दर्शक वर्ग एक लंपट फिल्मकार की लंपट फिल्म को मिला है और लगातार मिल रहा है. ( लंपटाई एक प्रवृति भी है जो अंधभक्तों और चमचों में हावी रहती है. ) बावजूद इसके मेरा मानना है कि मंदराजी धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ेंगी. यह फिल्म अपनी बेहतर मौलिक पटकथा ( मुंबईयां चोरी नहीं ) चुस्त संपादन, बेहतर निर्देशन, उत्तम प्रकाश व्यवस्था, लोकधुनों की महक और कलाकारों के सधे हुए अभिनय के लिए हमेशा याद रखी जाएगी.

जब फिल्म देख रहा था तो यह सोचकर ही बैठा था बस पन्द्रह-बीस मिनट में हिंदी की किसी चालू फिल्म का मसाला सामने आ जाएगा और मैं अपना सिर फोड़ने के लिए किसी दीवार की तरफ देखूंगा, लेकिन इस फिल्म में सड़क छाप कोई मसाला देखने को नहीं मिला. न खुली जीप में घूमते हुए गुंडे मिले, न ही गुलाबी टावेल लपेटकर नहाती हुई हिरोइन मिली और न ही छत्तीसगढ़ के सलमान खान-अरबाज खान के दर्शन हुए.यह जानकार भी आश्चर्य हुआ कि फिल्म का निर्माण एवं निर्देशन 27 साल के एक युवक विवेक सार्वा ने किया है. विवेक के बारे में यह जानकारी भी मिली कि उसने फिल्म बनाने के पहले बकायदा मंदराजी के जीवन को लेकर अध्ययन किया और कई-कई रातें रवेली गांव और ग्रामीणों के बीच गुजारी. फिल्म का छायांकन विवेक के दोनों भाई नागेश और रमाकांत सारवा का है. दोनों भाइयों ने खेत- खलिहान के साथ-साथ ग्रामीण जन-जीवन को अपने कैमरे में इतनी खूबसूरती से कैद किया है कि बस...हर दृश्य आंखों में समा जाता है और दिल बाग-बाग हो जाता है.

फिल्म में टाइटल के प्रारंभ होने के थोड़ी देर बाद से ही सुधि दर्शक इस अहसास से गुजरने लगता है कि वह एक क्लासिक फिल्म का हिस्सा बन गया है. छत्तीसगढ़ के नकलचोर फिल्मकारों ने अपनी फिल्म से जिस गांव को गायब किया है वह गायब गांव इस फिल्म में दिखाई देता है और पूरी शिद्दत के साथ दिखाई देता है. फिल्म में दो-चार मंजे हुए कलाकारों के साथ ग्रामीण चेहरों को देखना सुखद लगता है. फिल्म मंदराजी के बचपन से लेकर जवानी और बुढ़ापे की कथा कहती है. यह बात हम सब जानते हैं कि मंदराजी ने नाचा के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया था. फिल्म में मंदराजी के बच्चे की मौत का दृश्य जितना दर्दनाक है उतना ही मंदराजी का इस दुनिया से कूच कर जाना भी आंखों को नम कर देता है. फिल्म में अभिनेता करण खान का अभिनय बेहद उम्दा है. कई बार वे मार्मिक संवाद के जरिए दर्शकों की आंखों को नम कर जाते हैं तो कई बार सिर्फ हाव और भाव से. फिल्म में मंदराजी की पत्नी रमहिन की भूमिका ज्योति पटेल ने भी बड़ी शिद्दत के साथ निभाई है. ज्योति पटेल लोककला मंच से जुड़ी हुई एक बेजोड़ कलाकार भी है. फिल्म में मंदराजी के पिता की भूमिका में अमर सिंह लहरे है. अमर सिंह वही कलाकार है जो लंबे समय तक हबीब तनवीर के नया थियेटर से जुड़े हुए थे. उनका सधा हुआ अभिनय फिल्म को एक ऊंचाई पर ले जाता है. फिल्म में लालूराम की भूमिका में हेमलाल कौशल का अभिनय भी बेजोड़ है. फिल्म में यह दिखाया गया है कि कैसे नाचा पार्टी खड़ी होती है और जब गांव-गांव में पार्टी धूम मचाने लगती है तब अचानक कला के बड़े ठेकेदार पैदा हो जाते हैं और कलाकारों की तोड़फोड़ में लग जाते हैं. पार्टी के बिखरने के साथ ही पार्टी को खड़ा करने वाला दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाता है. फिल्म में जब दाऊ रामचंद्र देशमुख और हबीब तनवीर का जिक्र आता है तो यह जानने का मौका मिलता है कि चमक-दमक और पैसों की भूख कैसे गांव के भोले-भाले और कला के प्रति समर्पित कलाकारों का अपहरण कर लेती है.

कुल मिलाकर फिल्म में वह सब कुछ है जो एक अच्छी, उम्दा और प्रेरणादायक फिल्म में होना चाहिए. बस... फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि इसमें लंफगई और टुच्चई नहीं है. फिल्म की इसी कमी को सड़कछाप निर्माता और निर्देशक मनोरंजन कहते हैं. फैमली ड्रामा कहते हैं और जनता के लिए फिल्म बनाना भी कहते हैं.

 

विवेक सार्वा ने भी जनता के लिए ही फिल्म बनाई है, मगर वे जनता की सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करने में ज्यादा प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं. छत्तीसगढ़ में मंदराजी जैसी और भी कई फिल्में बननी चाहिए. छत्तीसगढ़ को ऐसी सशक्त और साफ-सुथरी फिल्म की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि यहां पर आंय-बांय-शांय पैसा लगाकर केवल मुनाफे पर जोर देने वाले कुकुरमुत्ते फिल्मकारों की बाढ़ आई हुई है. कुकुरमुत्तों ने इतना ज्यादा कचरा परोस दिया है कि जनता का स्वाद बिगड़ गया है. अब सबले बढ़िया छत्तीसगढ़ियां को भी कटीली कमर का लटका- झटका, गुलाबी टॉवेल, बात-बात पर खून-खच्चर, नंगापन, दादा कोड़के का संवाद और चोरी-चकारी का सामान पसन्द आने लगा है.

बहरहाल विवेक सार्वा और उसकी पूरी टीम को मैं इसलिए बधाई देता हूं क्योंकि उन्होंने अपने मौलिक और साहसिक काम के जरिए नकलचोर फिल्मकारों के मुंह पर जोरदार तमाचा मारा है. फिल्म चलती है या नहीं चलती है... यह उनके लिए महत्वपूर्ण है जो मुनाफे के खेल में लगे हुए हैं, मेरे लिए महत्वपूर्ण यह है कि विवेक ने भीड़तंत्र में शामिल होना जरूरी नहीं समझा. वैसे भी अगर किसी के पास विवेक है तो वह भीड़तंत्र का हिस्सा कभी नहीं बनता है? फिर से बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएं......

 

 

और पढ़ें ...

बताइए...रमन सिंह के ओएसडी की बीवी भी उठा रही थी एक लाख रुपए महीने की पगार

रायपुर. भाजपा के शासनकाल में लूट मची थी लूट. जिसे देखो वही लूट-खसोट में शामिल था. छत्तीसगढ़ के बेरोजगार भूखे-प्यासे नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे थे तो इधर अफसरों की बीवियां अयोग्यता के बावजूद टाइम पास करने के लिए नौकरियां कर रही थी. प्रदेश में भूपेश बघेल की सरकार बनने के बाद अफसरों के कारनामों की जांच प्रारंभ हुई तो एक से बढ़कर एक कई तरह के खुलासे हुए. पता चला कि रमन सिंह के चहेते अफसरों ने अपने लिए नहीं ब्लकि सात पीढ़ियों के लिए एशोआराम का पक्का बंदोबस्त कर रखा है.

कांग्रेस के फायर ब्रांड नेता विकास तिवारी ने कुछ समय पहले पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के ओएसडी ( विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी ) की पत्नी जागेश्वरी बिसेन की नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए थे. उनका आरोप था कि जागेश्वरी बिसेन आईटी विशेषज्ञ के तौर पर किसी भी तरह की योग्यता नहीं रखती थीं बावजूद इसके उन्हें न्यू रायपुर डेव्हलपमेंट अथारिटी में नियुक्त कर दिया गया था. विकास तिवारी की शिकायत के बाद जांच प्रारंभ हुई तो पता चला कि जागेश्वरी बिसेन पूरी तरह से अयोग्य थी और उनकी नियुक्ति किसी प्रभाव में की गई थीं. ( ऐसी चर्चा है कि जागेश्वरी बिसेन के पति अरूण बिसने भाजपा के पूर्व सांसद और रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह के करीबी थे. )

बताया जाता है कि जब जागेश्वरी बिसेन की नियुक्ति हुई थी तब भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर रजत कुमार न्यू रायपुर डेव्हलपमेंट अथारिटी में सीईओ थे. खबर है कि अब सीईओ और जागेश्वरी बिसेन के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी चल रही है.

पूर्व मुख्यमंत्री के करीबी रहे रजत कुमार और ओएसडी रहे अरूण बिसेन कई तरह के विवादित मामलों से घिरे हुए हैं. बताते है कि न्यू रायपुर डेव्हलपमेट अथारिटी के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टस सपोर्ट सर्विसेस के लिए अनुबंधित सलाहकार संस्था के साथ संपादित अनुबंध के अनुसार स्मार्ट सिटी परियोजना के कार्यों के संचालन के लिए आईटी कंसलटेंट की जरूरत थी. इसके लिए सलाहकार संस्था मेसर्स ली एसोसिएट से एमसीए या फिर बीई व बीटेक के साथ-साथ पांच से सात साल का अनुभव रखने वाले योग्य उम्मीद्वारों का बायोडाटा मांगा गया था. सलाहकार संस्था ने इसके लिए ओएसडी अरूण बिसेन की पत्नी जागेश्वरी बिसेन का अनुभव प्रमाण पत्र भेजा और उनकी नियुक्ति आईटी विशेषज्ञ के पद पर कर दी गई.

 
फिलहाल जो जांच रिपोर्ट सामने आई है उसमें पता चला है कि बॉयोडाटा मिलने के बाद प्रस्तावित उम्मीदवार का साक्षात्कार भी नहीं लिया गया.इस सिलसिले में कोई नस्ती उपलब्ध नहीं है.  यही नहीं, प्रोफेशनल इंस्टीटयूट ऑफ इंजीयरिंग और टेक्नालॉजी में कुल तीन वर्ष सात माह में प्रोफेसर कम्प्यूटर साइंस और कंसोल इंडिया कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड में कुल एक वर्ष तीन माह का अनुभव होना बताया गया है.इस तरह जागेश्वरी बिसेन द्वारा 4 वर्ष 10 माह 18 दिन का अनुभव प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया है. जबकि प्राधिकरण द्वारा उपरोक्त पद के लिए पांच से सात वर्ष का अनुभव चाहा गया था. इतना ही नहीं जागेश्वरी बिसेन ने कंसोल इंडिया जैसी विवादित कंपनी में खुद को कार्य करना भी बताया था. बता दें कि यह कंपनी पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह का चेहरा चमकाने के खेल में लगी थी. इस कंपनी ने विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य के पत्रकारों और संपादकों को खुलेआम धन बांटा था और उनका वीडियो भी बनाया था. बहरहाल कंसोल इंडिया में काम करने वाली जागेश्वरी जब न्यू रायपुर डेव्हलमेंट अथारिटी में नौकरी पा गई तो उन्हें एक लाख रुपए महीने का पगार दिया जाने लगा.

छत्तीसगढ़ के बेरोजगारों... क्या आपको किसी ने एक लाख रुपए की पगार पर नौकरी देने के बारे में सोचा है? अगर किसी ने सोचा है तो क्या आप एक लाख रुपए की पगार वाली नौकरी छोड़कर चले जाएंगे? मगर... सरकार बदलते ही जागेश्वरी ने एक लाख रुपए की पगार देने वाली नौकरी को लात मार दिया. ठीक यही काम संविदा में पदस्थ और सुपर सीएम के नाम से विख्यात एक दूसरे अफसर की पत्नी ने भी किया है. पहले अफसर की पत्नी की जांच रिपोर्ट आ गई है. दूसरे अफसर की पत्नी की रिपोर्ट आनी बाकी है. इस अफसर पत्नी की नियुक्ति को लेकर भी सरकार जांच करवा रही है.

और पढ़ें ...

सोया मिल्क, बिस्किट और केटलफिड की खरीदी में करोड़ों का वारा-न्यारा

नियंत्रक महालेखा परीक्षक की आपत्तियों को दरकिनार कर बीज निगम ने की करोड़ों की खरीदी

रायपुर. भाजपा के शासनकाल में एक से बढ़कर एक कारनामे होते रहे हैं और इन कारनामों को अंजाम देने वाले लोग अब भी खामोश नहीं बैठे हैं. पिछले शासनकाल में सोया मिल्क, बिस्कुट और केटलफिड की बिक्री के नाम पर करोड़ों की चपत लगाने वाले मनीष शाह को लोग भूले नहीं है. मनीष शाह वहीं है जिन्होंने पिछली सरकार में बच्चों के कुपोषण को दूर करने के लिए सरकार को सोया मिल्क बांटने का प्रस्ताव दिया था. सरकार की रजामंदी के बाद शाह ने केंद्रीय और राज्य स्तरीय प्रयोगशाला से जांच करवाए बगैर बच्चों को दूध का पैकेट वितरित कर दिया था. कई स्कूलों में जब बच्चे बीमार पड़ने लगे तब थोड़े समय के लिए पैकेट के वितरण में रोक लगाई गई. शाह इन दिनों फिर से सक्रिय है.मंत्रालय के कई आला-अफसरों के कक्ष में उनकी आमद देखी जा सकती है.

रमन सिंह की सरकार में बीज निगम ने जन निजी भागीदारी ( पीपीपी मोड ) के तहत सोया बिस्कुट, सोया मिल्क और केटलफिड की खरीदी की थी. इसके लिए शाह की कंपनियों से अनुबंध किया गया था. इन चीजों की खरीदी के लिए सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य शर्त यह थीं कि कंपनी को अपनी  ईकाई छत्तीसगढ़ में स्थापित करनी होगी और प्रदेश के किसानों या बाजार से कच्चे माल की खरीददारी करनी होगी. अनुबंध में इस शर्त को रखे जाने के पीछे का मकसद यह था कि स्थानीय बाजार और किसान दोनों को मजबूती मिलेगी.

नहीं स्थापित हुई ईकाई

बीज निगम के अधिकारियों ने यह जांचे-परखे कि किसी तरह की कोई ईकाई स्थापित की है या नहीं...शाह को करोड़ों का काम सौंप दिया.जाहिर सी बात है कि जब ईकाई स्थापित नहीं हुई हो तो स्थानीय बाजार और किसानों से खरीददारी भी नहीं हुई होगी. ऐसा ही हुआ. शाह ने सोया मिल्क के लिए कच्चा सामान पड़ोसी राज्यों से खरीदा और स्कूल शिक्षा विभाग तथा महिला बाल विकास विभाग की ओर से संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों में इसकी जमकर सप्लाई की. शाह ने पशु आहार के लिए भी किसी तरह की कोई ईकाई स्थापित नहीं की और गौशालाओं में पशु आहार पहुंचाया जाता रहा. बिस्कुट की ट्रेडिंग नागपुर के सुंदर इंडस्ट्रीज से की गई और स्कूल तथा आंगनबाड़ी केंद्रों में वितरण होता रहा.

महालेखाकार ने जताई आपत्ति

एक शिकायत के बाद महालेखाकार ( कैग ) ने 31 मई 2015 को आपत्ति जताते हुए बीज निगम को नियमों के खिलाफ की जा रही खरीदी और भुगतान पर रोक लगाने को कहा. निगम ने कैग की तमाम आपत्तियों को उस दौरान रद्दी की टोकरी में डाल दिया और बड़े पैमाने पर खरीदी और भुगतान का खेल जारी रखा. वर्ष 2015 से वर्ष 2018 तक यह क्रम जारी रहा. वर्ष 2018 में कैग ने एक बार फिर बीज निगम को खरीदी और पर रोक लगाने को कहा तब बीज निगम ने 11 जनवरी 2019 को खानापूर्ति करते मनीष शाह को एक पत्र लिखा और कहा कि वे जल्द से जल्द प्लांट स्थापित कर लें. अब तक न तो प्लांट लगा है और न ही स्थानीय स्तर पर कच्चे माल की खरीदी होती है. सारा कुछ बाहर से नियंत्रित होता है. अधिकारियों की सांठगांठ से शासन को चूना लगाने का खेल अब भी निर्बाध गति से चल रहा है. नियमानुसार स्कूलों में सोया मिल्क और बिस्कुट की सप्लाई के लिए विधि विभाग से अनुमति ली जानी थीं. खबर है कि मनीष शाह को उपकृत करने के लिए विधि विभाग से अनुमति लेना भी अनिवार्य नहीं समझा गया.

अब राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में काम हथियाने की जुगत

खबर है कि प्रदेश के एक प्रमुख अफसर से सांठगांठ होने की वजह से मनीष शाह ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में भी काम हथियाने की जुगड़ बिठा ली है. मंत्रालय में पदस्थ एक अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सामान्य तौर पर किसी भी निजी व्यक्ति को सरकारी बैठकों में उपस्थित रहने की अनुमति नहीं रहती, लेकिन मनीष शाह प्रमुख अफसर से करीबी होने  का रौब दिखाते हुए हर बैठक में मौजूद रहता है. सूत्र बताते हैं कि शाह के करीबी अफसर ने पिछले दिनों राष्ट्रीय विकास योजना भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा है. मनीष शाह को कौन सा काम दिया जाना उचित होगा इसका खाका भी अफसर ने अपने कमरे में बनाया है. खबर है कि शाह... भारत सरकार और राज्य सरकार के अंश से फूड प्रोसेसिंग का कोई प्रोजेक्ट लांच करना चाहता हैं. शाह को यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि नई सरकार का जोर खेती-किसानी पर केंद्रित है सो प्रोजेक्ट भी कुछ उसी ढंग का तैयार किया गया है. एक और प्रोजेक्ट यूनिर्विसटी से संबंधित है. 

 

 

 

 

 

और पढ़ें ...

अकेले राजनांदगांव जिले की विकास यात्रा में फूंके गए 12 करोड़

रायपुर. छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार रहने के दौरान कभी सुराज यात्रा निकाली जाती थीं तो कभी विकास यात्रा. पिछले साल वर्ष 2018 में ठीक चुनाव से पहले डाक्टर रमन सिंह की सरकार ने कामकाज को प्रदर्शित करने के लिए विकास यात्रा निकाली थीं. अलग-अलग जिलों में निकाली इस यात्रा में अरबों रुपए फूंके जाने का अनुमान है.अकेले राजनांदगांव जिले में जो यात्रा निकाली गई उस पर सरकार के विभिन्न विभागों ने 12 करोड़ पांच लाख, दो हजार तीन सौ बत्तीस रुपए का व्यय दर्शाया है.

डोंगरगांव के विधायक दलेश्वर सिंह ने इस बार मानसून सत्र में एक प्रश्न के जरिए यह जानना चाहा था कि राजनांदगांव जिले में वर्ष 2018-19 में जो विकास यात्रा निकाली गई थीं उस पर कुल कितना खर्च हुआ है. जवाब में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बताया है कि कुल 12 करोड़ पांच लाख दो हजार तीन सौ बत्तीस रुपए जनरेटर एवं फ्लैक्स, प्रमाण पत्र वितरण, पाम्पलेट सहित अन्य मद में खर्च किए गए . विकास यात्रा में इस राशि का व्यय जिला पंचायत कार्यालय, अंत्यावसायी सहकारी विकास समिति, श्रम पदाधिकारी, खैरागढ़- डोंगरगढ़- राजनांदगांव के कार्यपालन अभियंता, लोक निर्माण विभाग और जनपद पंचायत के नाम पर दर्शाया गया है.

और पढ़ें ...

जो अंडा खाना चाहता है उसे खाने दो... अंडे के समर्थन में उतरे जनसंगठन

रायपुर. छत्तीसगढ़ के स्कूलों में अंडा वितरण किए जाने को लेकर जबरदस्त नौटंकी चल रही है. धर्म-कर्म और आस्था का हवाला देकर कतिपय संगठन विरोध जता रहे हैं तो एक बड़ी आबादी बच्चों को अंडा दिए जाने के पक्ष में है. अब तक अंडा वितरण के खिलाफ ही ज्ञापन दिए जाने का समाचार देखने- सुनने को मिल रहा था, लेकिन इधर पहली बार गुरुवार को  प्रगतिशील जनसंगठनों ने कलक्टर को ज्ञापन सौंपकर सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में अंडा देने की मांग मुख्यमंत्री से की है.

क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के महासचिव् तुहिन,अखिल भारतीय क्रांतिकारी विद्यार्थी संगठन के अध्यक्ष विनय, दलित मुक्ति मोर्चा छत्तीसगढ़ के सलाहकार गोल्डी जार्ज, भोजन का अधिकार अभियान से जुड़ी संगीता, गुरु घासीदास सेवादार संघ के रायपुर जिला संयोजक केशव सतनाम, एससीएसटीओबीसी अल्पसंख्यक संयुक्त मोर्चा छत्तीसगढ़ के संयोजक अधिवक्ता रामकृष्ण जांगड़े, अधिवक्ता शिवप्रसाद डहरिया, क्रांतिकारी नौजवान भारत सभा के गौतम गणपत तथा लोक समता समिति के सुरेश कुमार ने गुरुवार को रायपुर के कलक्टर एस भारतीदासन को ज्ञापन सौंपकर सरकारी स्कूलों एवं आंगनबाड़ी केंद्रों में हफ्ते में पांच दिन अंडा देने की मांग की.

ज्ञापन सौंपने के बाद इन सदस्यों ने मीडिया से चर्चा में कहा कि छत्तीसगढ़ में बच्चों में कुपोषण की स्थिति बेहद  गंभीर है. यहां 38 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार है. अनुसूचित जाति- जनजाति वर्ग के बच्चों में कुपोषण की दर लगभग 44 फीसदी है. एक सरकारी सर्वे भी कहता है कि छत्तीसगढ़ में 83 फीसदी लोग अंडा सेवन करते हैं. सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ियों में जाने वाले बच्चों में मांसाहार का प्रतिशत और भी अधिक है. अंडा उच्च कोटि का प्रोटीन है और एक सर्वोत्तम विकल्प है. जो लोग अंडे का सेवन नहीं करना चाहते उनके लिए सरकार ने अतिरिक्त शाकाहारी विकल्प का प्रावधान भी तय कर रखा है. सरकार अगर अंडे का वितरण करना चाहती है तो यह एक अच्छा कदम है. अंडा देकर बच्चों में कुपोषण की समस्या को कम किया जा सकता है.

जनसंगठनों से जुड़े लोगों ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि अंडे का विरोध करने वाले लोग बच्चों के कुपोषण को दूर किए जाने के बारे में चितिंत नहीं है. वे इसे धर्म-कर्म से जोड़कर देख रहे हैं. प्रगतिशील जनसंगठनों के सदस्यों ने कहा कि भोजन में शाकाहार और मांसाहार दोनों अनिवार्य है. आस्था या धार्मिकता के नाम पर लोगों के खानपान पर पाबंदी लगाने की मांग किसी भी स्तर पर जायज और प्रजातांत्रिक नहीं मानी जा सकती है. जनसंगठनों ने कहा कि अभी केवल ज्ञापन देकर बात समझाने की कवायद की जा रही है. अगर गरीब और कुपोषित बच्चों को अंडा देने की जबरिया खिलाफत की गई तो फिर सड़क की लड़ाई भी लड़ी जाएगी. 

क्यों दिया मछली और मुर्गीपालन को बढ़ावा ?

गुरुवार को विधानसभा में अंडा वितरण किए जाने को लेकर एक बार फिर विपक्ष ने हंगामा मचाया. विपक्ष के सदस्य बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि कई लोग अंडा वितरण का विरोध कर रहे हैं. सरकार को अपना फैसला वापस लेना चाहिए. उन्होंने सदन में इस विषय पर स्थगन प्रस्ताव के जरिए चर्चा करने की मांग की जिस पर सत्तापक्ष सहमत नहीं हुआ. सदन में सत्तापक्ष के सदस्यों ने कहा कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहां की सरकार भी स्कूलों में बच्चों को अंडा उपलब्ध करवा रही है तो फिर यहां क्या दिक्कत है. मंत्री कवासी लखमा ने कहा कि जब बृजमोहन अग्रवाल पशुधन मंत्री थे तब मछली पालन और मुर्गी पालन को बढ़ावा देने की बात करते थे, लेकिन अब विरोध कर रहे हैं. इस बीच विधायक बृहस्पति सिंह ने सदन में वर्ष 2014 के आदेश की प्रतियां लहराई. उन्होंने कहा कि जब भाजपा की सरकार थीं तब अंडा देने पर विचार किया गया था.

 

 

और पढ़ें ...

सुधा भारद्वाज की रिहाई के लिए छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रदर्शन

रायपुर. देश की वरिष्ठ अधिवक्ता सुधा भारद्वाज की रिहाई के लिए सोमवार को छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन की अगुवाई में विभिन्न जनसंगठनों ने राजधानी रायपुर में एक दिवसीय धरना दिया. धरने में शामिल बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनकी निःशर्त रिहाई की मांग करते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम एक ज्ञापन सौंपा और हस्तक्षेप करने की मांग की.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि अधिवक्ता सुधा भारद्वाज गत चार दशकों से छत्तीसगढ़ के आदिवासी, मजदूर, किसान,  दलित, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं  के पक्ष में उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्षरत रही हैं. दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविधालय की प्रोफ़ेसर कृष्णा भारद्वाज की पुत्री सुधा भारद्वाज अपनी आईआईटी की पढ़ाई के बाद उच्च संस्थानों में कार्य कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने दल्लीराजहरा में मजदूरों के अधिकारों के लिए काम करने का निर्णय लिया और शंकर गुहा नियोगी के आदर्शों से प्रेरणा से लेकर मजदूर बस्ती में जीवन यापन करती रही.

छत्तीसगढ़ में  पिछले 15 सालों में जब अंधा-धुंध खनन व औद्योगिकरण के नाम पर किसानों से उनकी जमीनों को छीना गया. कार्पोरेट लूट को सरल बनाने  तमाम संवैधानिक अधिकारों, कानूनों और नियमों को दरकिनार किया गया तब एक सुधा भारद्वाज ही थी जिन्होंने कार्पोरेट लूट के खिलाफ आदिवासियों और किसानों के हित में उच्च न्यायालय में सैकड़ों मामलों में पैरवी की. बस्तर में माओवादी हिंसा के नाम पर राज्य प्रायोजित मुठभेड़ एवं महिलाओं पर लैंगिक हिंसा के मामलों को भी उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायलय के समक्ष पूरी शिद्दत के साथ उठाया. कई मामलों में वे स्वयं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ओर से गठित जांच टीम का हिस्सा भी रही. प्रदेश में अल्पसंख्यकों और दलितों पर हुए हमलो के मामलो को भी उन्होंने प्रमुखता से उठाया और उन्हें न्यायालय तक ले गई. 

निश्चित तौर पर सुधा भारद्वाज जिस तरह से वंचित वर्ग की आवाज रही और विशेष रूप से कार्पोरेट लूट, दमन और सांप्रदायिक हमलों के खिलाफ संवैधानिक दायरों में रहकर लोकतांत्रिक तरीकों से न्याय व्यवस्था के माध्यम से लड़ रही थी वह भाजपा की केंद्र और राज्य सरकार के लिए चुनौती बन गईं थी. मोदी सरकार अपने खिलाफ उठने वाली प्रत्येक लोकतांत्रिक  आवाजों को कुचल देना चाहती हैं. वह हर उस आवाज को देशद्रोही करार देना चाहती हैं जो न्याय, अधिकार और शांति के पक्ष में खड़ी हैं. सरकार की यह मंशा साफ तौर पर भीमा कोरेगांव के केस में नज़र आती हैं और इसी कारण फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सुधा भारद्वाज को आरोपी बनाकर जेल भेज दिया गया.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि सुधा भारद्वाज ने छत्तीसगढ़ में जन अधिकारों के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया था. उनकी रिहाई के लिए भूपेश सरकार को सभी जरूरी हस्तक्षेप करते हुए न्यायोचित कदम उठाना चाहिए. यह रिहाई सिर्फ एक इंसान की रिहाई की मांग नहीं, बल्कि हम सब के मूल लोकतांत्रिक अधिकारों की रिहाई की मांग भी है.

 

और पढ़ें ...
Previous12345Next