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शिवशंकर भट्ट ने नान घोटाले में कौशलेंद्र सिंह को बताया रमन गैंग का खास सदस्य

रायपुर. नान घोटाले के एक आरोपी शिवशंकर भट्ट ने नीरज श्रीवास्तव की अदालत में शपथपूर्वक दिए गए एक बयान में पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह, पूर्व खाद्य मंत्री पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता के साथ-साथ वन अफसर रहे कौशलेंद्र सिंह को नान घोटाले का प्रमुख आरोपी बताया है. अपने बयान में शिवशंकर भट्ट ने कई मर्तबा कौशलेंद्र सिंह का नाम लिया है.

कौशलेंद्र ने दिए थे रेणु सिंह को पैसे

भट्ट ने न्यायालय में बताया कि फरवरी 2014 में कौशलेंद्र सिंह मुझे एश्वर्या रेंसीडेंसी में रहने वाली रेणु सिंह के निवास पर ले गए थे. वहां उन्होंने मेरे सामने पांच लाख रुपए रेणु सिंह को दिए. यह पैसे किस मद से दिए गए मुझे इसकी जानकारी नहीं थी और मैं जानना भी नहीं चाहता था. भट्ट ने शपथपत्र में कहा कि 12 फरवरी 2015 को ईओडब्लू ने छापा मारकर एक करोड़ 62 लाख रुपए की फर्जी ढंग से जप्ती बनाई थी. मेरे हाथों से कोई रकम प्राप्त नहीं हुई थी. मेरे पास कोई ऐसी शक्ति नहीं थीं कि मैं इतनी बड़ी रकम कार्यालय में रखता. भट्ट ने कहा कि कौशलेंद्र सिंह और नागरिक आपूर्ति निगम में कार्यरत गिरीश शर्मा, चिंतामणि चंद्राकर आपस में मिलकर लेन-देन और बंदरबांट करते थे. उनके पैसों को मेरे नाम डालकर फर्जी जप्ती बनाई गई थीं. भट्ट ने न्यायालय के समक्ष बताया कि कौशलेंद्र सिंह पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के काफी निकट थे. उनके पारिवारिक रिश्ते थे. नान का पूरा संचालन कौशलेंद्र सिंह, डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी और राधाकृष्ण गुप्ता एक गैंग बनाकर करते थे.

गाली-गलौच करते थे कौशलेंद्र

भट्ट ने कहा कि नागरिक आपूर्ति निगम में किसी भी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह विरोध अथवा आपत्ति दर्ज करें. अगर कोई कौशलेंद्र सिंह के काम पर आपत्ति दर्ज करता तो वे सीधे डाक्टर रमन सिंह और चारों व्यक्तियों का नाम लेकर गाली-गलौच करते थे. कौशलेंद्र सिंह, चिंतामणि और गिरीश शर्मा सभी सप्लायर्स और राइस मिलरों से लगातार लेन-देन करते थे. यह सब देखकर ऐसा प्रतीत ही नहीं होता था कि कोई शासकीय कार्यालय चल रहा है.कौशलेंद्र सिंह मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के प्रियपात्र थे इसलिए वर्ष 2011 और 2014 के बीच उनका केवल दो बार ही तबादला हुआ. वे हर बार मुख्यमंत्री को बोलकर अपना तबादला रूकवा लेते थे. कृतिकांत बारिक के कम्प्यूटर से बरामद पन्ने कौशलेंद्र सिंह के निर्देश पर गिरीश शर्मा ने ही लिखवाए है.

हत्या पर उठाए सवाल

भट्ट ने नागरिक आपूर्ति निगम के एक कर्मचारी त्रिनाथ रेड्डी की वाइफ की हत्या पर भी सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि इस हत्या को आत्महत्या बताने का प्रयास किया गया था. इस हत्या के जरिए यह मैसेज देने की कोशिश की गई थी कि जो कोई भी मुंह खोलेगा उसके साथ अनहोनी हो सकती है. यह हत्या किसने करवाई  इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिए.

शिवशंकर भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ के धान उपार्जन के लिए लगभग 550 करोड़ और फिर 500 करोड़ की अग्रिम सब्सिडी जारी की गई थी. हैरत की बात यह है कि वर्ष 2003-04 से लेकर वर्ष 2014-15 तक लगभग दस हजार करोड़ रुपए की अग्रिम सब्सिडी स्वीकृत की गई. यह सब्सिडी बगैर किसी वैधानिक ऑडिट के केवल प्रस्तुत किए गए बिल के आधार पर की गई थीं. जो भी अधिकारी इसके खिलाफ मुंह खोलता उसे परिणाम भुगतना पड़ता. इस खेल में विपणन संघ के तत्कालीन अध्यक्ष राधाकृष्ण गुप्ता खास पर शामिल थे. डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता ने आपस में सांठगांठ कर हाईप्रोफाइल रैकेट तैयार कर लिया था. इस रैकेट ने शासन को करोड़ों रुपए की क्षति पहुंचाई.

भट्ट ने कहा कि वर्ष 2014 के अगस्त माह में नागरिक आपूर्ति निगम के पास 9 लाख मैट्रिक टन चावल का स्टाक था. इसके बावजूद मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह जो वित्त मंत्री भी थे ने विभाग के अधिकारियों पर दबाव देकर 10 लाख टन मीट्रिक टन चावल का अतिरिक्त उपार्जन करने का आदेश दिया था. इतना ही नहीं अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए 236 करोड़ की क्षतिपूर्ति की गारंटी बिना कैबिनेट की अनुमोदन के पास कर दिया था. जबकि शासन के हित में ऐसा नहीं किया जाना था. इस मामले में विभाग के अधिकारियों ने आपत्ति जताई तो उन्होंने अधिकारियों से कहा कि आपत्ति की आवश्यकता नहीं है. इस संदर्भ में हमें और पार्टी को लंबी-चौड़ी रकम मिलनी है और अगर आप लोग चाहे तो यह रकम आपको भी प्रदान की जाएगी.

भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में 21 लाख फर्जी राशनकार्ड बनवाए गए थे. इस काम को खाद्य विभाग का कोई भी अधिकारी स्वेच्छा से करना नहीं चाहता था, लेकिन डाक्टर रमन सिंह, लीलाराम भोजवानी और पून्नूलाल मोहिले ने अधिकारियों को डराया-धमकाया और परिणाम भुगतने को तैयार रहने को कहा.

इधर शिवशंकर भट्ट के द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि हाईकोर्ट से जमानत पर चल रहे शिवशंकर भट्ट से बयान दिलाकर भाजपा की छवि खराब करने की कोशिश की गई है. कांग्रेस नान घोटाले के आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है. अपराधियों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की कोशिश की जा रही है. पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कभी सीएम हाउस में न तो पैसों को लेकर किसी के जाने जैसी कोई बात हुई है और न ही ऐसा करना संभव है. वहां आने-जाने वाले हर व्यक्ति के संबंध में इंट्री होती है. उन्होंने कहा कि वे इस मामले को लेकर कानूनी सलाह लेकर आगे की कार्रवाई करेंगे. 

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किसने करवाई थी त्रिनाथ रेड्डी की वाइफ की हत्या... नान घोटाले के एक प्रमुख आरोपी भट्ट ने उठाया सवाल ?

रायपुर. नान घोटाले के एक प्रमुख आरोपी शिवशंकर भट्ट ने नीरज श्रीवास्तव की अदालत में शपथपूर्वक दिए गए एक बयान में साफ तौर पर कहा है कि नागरिक आपूर्ति निगम के एक कर्मचारी त्रिनाथ रेड्डी की वाइफ की हत्या की गई है, लेकिन इस हत्या को आत्महत्या बताने का प्रयास किया गया था. इस हत्या के जरिए यह मैसेज देने की कोशिश की गई थी कि जो कोई भी मुंह खोलेगा उसके साथ अनहोनी हो सकती है. यह हत्या किसने करवाई  इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिए.

शिवशंकर भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ के धान उपार्जन के लिए लगभग 550 करोड़ और फिर 500 करोड़ की अग्रिम सब्सिडी जारी की गई थी. हैरत की बात यह है कि वर्ष 2003-04 से लेकर वर्ष 2014-15 तक लगभग दस हजार करोड़ रुपए की अग्रिम सब्सिडी स्वीकृत की गई. यह सब्सिडी बगैर किसी वैधानिक ऑडिट के केवल प्रस्तुत किए गए बिल के आधार पर की गई थीं. जो भी अधिकारी इसके खिलाफ मुंह खोलता उसे परिणाम भुगतना पड़ता. इस खेल में विपणन संघ के तत्कालीन अध्यक्ष राधाकृष्ण गुप्ता खास पर शामिल थे. डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता ने आपस में सांठगांठ कर हाईप्रोफाइल रैकेट तैयार कर लिया था. इस रैकेट ने शासन को करोड़ों रुपए की क्षति पहुंचाई.

भट्ट ने यह माना कि नान घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, वन अफसर कौशलेंद्र सिंह, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता सहित अन्य कई लोग शामिल थे. भट्ट ने कहा कि वर्ष 2014 के अगस्त माह में नागरिक आपूर्ति निगम के पास 9 लाख मैट्रिक टन चावल का स्टाक था. इसके बावजूद मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह जो वित्त मंत्री भी थे ने विभाग के अधिकारियों पर दबाव देकर 10 लाख टन मीट्रिक टन चावल का अतिरिक्त उपार्जन करने का आदेश दिया था. इतना ही नहीं अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए 236 करोड़ की क्षतिपूर्ति की गारंटी बिना कैबिनेट की अनुमोदन के पास कर दिया था. जबकि शासन के हित में ऐसा नहीं किया जाना था. इस मामले में विभाग के अधिकारियों ने आपत्ति जताई तो उन्होंने अधिकारियों से कहा कि आपत्ति की आवश्यकता नहीं है. इस संदर्भ में हमें और पार्टी को लंबी-चौड़ी रकम मिलनी है और अगर आप लोग चाहे तो यह रकम आपको भी प्रदान की जाएगी.

भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में 21 लाख फर्जी राशनकार्ड बनवाए गए थे. इस काम को खाद्य विभाग का कोई भी अधिकारी स्वेच्छा से करना नहीं चाहता था, लेकिन डाक्टर रमन सिंह, लीलाराम भोजवानी और पून्नूलाल मोहिले ने अधिकारियों को डराया-धमकाया और परिणाम भुगतने को तैयार रहने को कहा.

इधर शिवशंकर भट्ट के द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि हाईकोर्ट से जमानत पर चल रहे शिवशंकर भट्ट से बयान दिलाकर भाजपा की छवि खराब करने की कोशिश की गई है. कांग्रेस नान घोटाले के आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है. अपराधियों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की कोशिश की जा रही है. पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कभी सीएम हाउस में न तो पैसों को लेकर किसी के जाने जैसी कोई बात हुई है और न ही ऐसा करना संभव है. वहां आने-जाने वाले हर व्यक्ति के संबंध में इंट्री होती है. उन्होंने कहा कि वे इस मामले को लेकर कानूनी सलाह लेकर आगे की कार्रवाई करेंगे. 

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क्या भारतीय प्रशानिक सेवा के अफसर जगदीश सोनकर सुसाइड कर सकते है ?

रायपुर. बलरामपुर जिले के रामानुजगंज इलाके में अपनी पदस्थापना के दौरान एक मरीज के बिस्तर पर बूट रखकर बूट बाबू के नाम से विख्यात हुए भारतीय प्रशासनिक सेवा 2013 बैच के अफसर जगदीश सोनकर एक बार फिर चर्चा में हैं. सोनकर इन दिनों बस्तर जगदलपुर में अपर कलक्टर की हैसियत से कार्यरत है. यहां के कलक्टर कार्यालय में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को एक पत्र भेजकर सोनकर को हटाने की मांग की है. पत्र में सोनकर की कार्यप्रणाली और गतिविधियों और लेकर गंभीर शिकायत की गई है. पत्र में कहा गया है कि सोनकर सप्ताह में मात्र दो या तीन दिन आधे घंटे के लिए दफ्तर आते हैं. बाकी दिन वे कहां रहते हैं? क्या करते हैं... इसकी जानकारी किसी को नहीं होती. जगदलपुर के प्रशासनिक गलियारों में किस तरह की उथल-पुथल चल रही है इसकी ठीक-ठाक जानकारी फिलहाल हासिल नहीं हैं, लेकिन पत्र में गंभीर तौर पर यह बात भी उल्लेखित है कि सोनकर को ठीक करना किसी कलक्टर और कमिश्नर के बस की बात नहीं है. उनके ( सोनकर )  के सामने अपर कलक्टर और डिप्टी कलक्टर उपस्थित होने से इसलिए डरते कि कहीं वे उनका नाम लिखकर आत्महत्या न कर लें. ( हालांकि इस खबर के रिपोर्टर का मानना है कि शिकायतें अपनी जगह है. शिकायतें होती रहती है, लेकिन किसी दबाव में कोई अप्रिय स्थिति उत्पन्न नहीं होनी चाहिए. इस मामले में शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को भी संज्ञान लेकर कोई उचित समाधान अवश्य ढूंढना चाहिए. ) 

चाय पीने के लिए चले जाते हैं कोण्डागांव

पत्र में कहा गया है कि अव्वल तो सोनकर किसी भी बैठक में हिस्सेदारी दर्ज नहीं करते और अगर कभी भूले-भटके बैठक में आ भी गए तो एक मूर्ति की तरह चुपचाप बैठे रहते हैं. जैसे ही कलक्टर कोई जिम्मेदारी देते हैं वे कार्यालय आना बंद कर देते हैं और अजीब-अजीब सी हरकत करने लगते हैं. पत्र में कहा गया है कि जब भी सोनकर की वीआईपी डयूटी लगाई जाती है तो उनका दिमाग आपे से बाहर हो जाता है. पत्र में एक खास बात यह भी उल्लेखित है कि सोनकर को चाय पीने का जबरदस्त शौक है और इस शौक को पूरा करने के लिए वे सरकारी वाहन से जगदलपुर से कोण्डागांव और नारायणपुर चले जाते हैं. अगर आवंटित सरकारी वाहन के लॉगबुक की जांच करवाई जाएगी तो यह तथ्य भी उजागर हो जाएगा.

लोकसभा चुनाव में नहीं किया काम  

शिकायती पत्र में यह भी कहा गया है कि सोनकर पहले दंतेवाड़ा के जिला पंचायत में कार्यपालन अधिकारी थे, लेकिन उन्हें संदिग्ध गतिविधियों के चलते अल्प अवधि में ही जगदलपुर स्थानांतरित कर दिया गया था. यहां आकर भी उन्होंने अपना ढुलमुल रवैया बरकरार रखा और कलक्टर के द्वारा जिम्मेदारी दिए जाने के बाद भी उनके द्वारा लोकसभा चुनाव में किसी तरह का कोई कार्य नहीं किया गया. वे आईएएस है इसलिए अब तक सुरक्षित हैं अगर किसी अन्य श्रेणी के कर्मचारी होते तो निलंबित हो गए होते. पत्र में बीजापुर के एक आईएएस अधिकारी द्वारा पत्रकारों के साथ किए गए दुर्व्यहार का भी उल्लेख है. बताया गया है कि बस्तर संभाग के कमिश्नर ने इस मामले की जांच का जिम्मा सोनकर और अन्य दो पत्रकारों को दिया था, लेकिन जांच के दौरान सोनकर के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला. पत्र में यह भी लिखा गया है कर्तव्य के प्रति लापरवाही, अकर्मण्यता के चलते जगदलपुर कलक्टर कार्यालय के अन्य कर्मचारियों पर विपरीत असर पड़ रहा है. इस बारे में सच्चाई जानने के लिए जगदलपुर कलक्टर एयाज तंबोली को फोन लगाया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया. भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर जगदीश सोनकर के मोबाइल पर भी उनका पक्ष जानने की कवायद की गई, लेकिन उन्होंने भी फोन नहीं उठाया.

 

 

 

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... तो क्या झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं को मौत के घाट उतारने में पुलिस अफसर आरएन दास शामिल थे ?

रायपुर.  छत्तीसगढ़ के लोग मंतूराम पवार के नाम से भली-भांति वाकिफ है. मंतूराम वही है जो कभी कांग्रेस से जुड़े थे ( अब भाजपा में हैं. ) और जिन्होंने धुर माओवाद प्रभावित अंतागढ़ में होने वाले उपचुनाव के दौरान एकायक अपना नाम वापस लेकर सबको चौका दिया था. तब कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल थे. वे इस मामले को लेकर आरोप लगाते रहे कि मंतूराम की खरीद-फरोख्त हुई है, लेकिन तमाम तरह के दस्तावेजी सबूतों के बावजूद कहीं सुनवाई नहीं हुई. यहां तक चुनाव आयोग के सामने धरना-प्रदर्शन हुआ मगर आयोग हाथ में हाथ धरे बैठा रहा. मंतूराम जब भाजपा में चले गए तब भी किसी ने नहीं माना कि खरीद-फरोख्त का खेल हुआ है. शनिवार को मंतूराम ने अदालत के सामने यह मान लिया है कि उन्हें खरीदने के लिए कुल साढ़े सात करोड़ की डील हुई थी. मंतूराम की बात पर यकीने करें तो यह डील मंत्री राजेश मूणत के बंगले पर हुई थीं और खुद मूणत ने अपने हाथ से फिरोज सिद्दिकी और अमीन मेनन को सात करोड़ दिए थे. ( छत्तीसगढ़ के स्थानीय बाशिंदों को यह अवश्य सोचना चाहिए कि जब भाजपा की सरकार थी तब एक-एक मंत्री करोड़ों रुपए अपने बंगले में क्यों रखता था. ) बहरहाल एक ताजा घटनाक्रम में मंतूराम ने धारा 164 के तहत बयान देकर पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, उनके दामाद पुनीत गुप्ता, अजीत जोगी, उनके पुत्र अमित जोगी को आरोपों के कटघरे में खड़ा कर दिया है. मंतू ने अपने बयान में  जो सबसे चौकाने वाली बात कहीं है वह यह है कि नाम वापसी के खेल में कांकेर के एसपी की भी भूमिका थी. मंतूराम की नाम वापसी का घटनाक्रम वर्ष 2014 से जुड़ा है, तब कांकेर एसपी आरएन दास थे. मंतूराम का कहना है- मुझे कांकेर के पुलिस अधीक्षक का फोन आया था. पुलिस अधीक्षक ने कहा- मंतूराम जो कहा जा रहा है वह करो... नहीं तो तुम्हे झीरम घाटी का परिणाम भुगतना होगा. उल्लेखनीय है कि 25 मई 2013 को बस्तर के झीरमघाट में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया था. मंतूराम ने जो कुछ अपने बयान में कहा है अगर उस पर यकीन करें तो यह सवाल स्वाभाविक तौर पर उठता है कि क्या कांग्रेस नेताओं की मौत भाजपा के नेताओं के द्वारा रची गई एक गहरी साजिश थी और उसमें पुलिस अफसर आरएन दास भी शामिल थे?

विवादों से नाता रहा है दास का

आरएन दास इन दिनों पुलिस मुख्यालय में पदस्थ है,लेकिन उनकी गिनती कभी भी संवेदनशील और काबिल पुलिस अफसर के तौर पर नहीं होती रही. उनका नाम हमेशा विवादों से जुड़ा रहा और उनकी पहचान विवादों से नाता रखने वाले पुलिस अफसर शिवराम कल्लूरी के शार्गिद के तौर पर ही बनी रही. यहां यह बताना लाजिमी है कि फरवरी 2017 में आरएन दास ने अधिवक्ता शालिनी गेरा को अपने मोबाइल की बजाय एक संदिग्ध के नंबर से फोन करके धमकाया था. दास ने शालिनी को माओवादियों के साथ संबंध रखने का आरोप लगाते हुए थाने बुलाया. जब शालिनी और उनके साथियों ने जब नंबर की पड़ताल की तो वह अग्नि संस्था के एक सदस्य फारूख़ अली का निकला था. शालिनी गेरा ने इस बात की शिकायत मानवाधिकार में भी की थी. इसके अलावा बस्तर में निर्दोष आदिवासियों और बच्चों को मौत के घाट उतारने के मामले में भी आरएन दास की भूमिका को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं.

 

पहली बार आया डाक्टर रमन सिंह का नाम

अंतागढ़ टेपकांड में खरीद-फरोख्त किए जाने को लेकर अब तक पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी,अमित जोगी, पुनीत गुप्ता का नाम ही सामने आता रहा है, लेकिन पहली बार मंतूराम ने पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह को भी निशाना बनाया है. धारा 164 के तहत दिए गए अपने बयान में मंतूराम ने कहा है कि जब मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था तब फिरोज सिद्दिकी और अमीन मेनन ने कहा था कि अगर तुम यह काम नहीं करोगे तो रमन सिंह तुम्हारे पूरे खानदान को नहीं छोडेंगे. झीरमघाटी की तरह ही तुम्हें पूरे परिवार के साथ मसलकर फेंक दिया जाएगा. मैं जिस क्षेत्र से आता हूं वहां यह बात चर्चित एवं स्पष्ट थीं कि झीरम घाटी हत्याकांड में बड़े नेताओं का हाथ है. मंतूराम ने अपने बयान में यह भी कहा है कि जब रमन सिंह अपनी पत्नी के इलाज के लिए विदेश गए थे तब फिरोज सिद्दिकी ( फिरोज इन दिनों जेल में हैं. )  ने किसी के फोन से उनसे बात करवाई थीं. फोन पर बातचीत के दौरान रमन सिंह ने कहा था वे लोग जो कह रहे हैं वो तुमको करना है और मैं तुमको आर्शीवाद दूंगा. मंतूराम ने बयान में साफ किया कि पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, अजीत जोगी और अमित जोगी मिलकर काम करते थे. यह बात उन्हें फिरोज सिद्दिकी और अमीन मेनन ने बताई थी. मंतूराम ने शपथपूर्वक दिए गए अपने बयान में यह भी कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने उसका राजनीतिक भविष्य बनाने और लालबत्ती दिलाने का आश्वासन दिया था. अंतागढ़ चुनाव को प्रभावित करने में रमन सिंह, अजीत जोगी, अमित जोगी शामिल थे. जबरन ही उनका नाम ( मंतूराम ) खराब किया गया.

 

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सीएम हाउस में नजर आएगी छायाकार गोकुल सोनी की तस्वीर

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के जन्मदिन के अवसर पर छायाकार गोकुल सोनी द्वारा ली गई वह तस्वीर जो खूब वायरल हुई थी, अब सीएम हाउस में नजर आएगी. शनिवार को वरिष्ठ पत्रकार मोहन राव के साथ छायाकार गोकुल सोनी और नरेंद्र बंगाले ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की और उन्हें एक सुसज्जित फ्रेम में बच्चे को एक हाथ से उठाने वाली तस्वीर भेंट की. इस मौके पर मुख्यमंत्री ने बताया कि गांवों में अब भी उन बच्चों को लाड़ और दुलार के साथ उठाया जाता है जो चलने-फिरने में झिझक महसूस करते हैं. बच्चे के दोनों पैरों को मजबूती से पकड़कर उठाने से उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा होता है. यह एक तरह की देशज, लेकिन वैज्ञानिक तकनीक है. मुख्यमंत्री ने बताया कि ग्रामीण जन-जीवन से जुड़े लोग अब भी एक हाथ से कुर्सी के एक हत्थे को पकड़कर उठा लेते हैं. मुख्यमंत्री ने अपने निवास में यह कर भी  दिखाया. ( कुर्सी पर संतुलन कायम करने वाली यह तस्वीर नहीं मिल पाई है अन्यथा राजनीतिक दृष्टि से इस तस्वीर का भी महत्व होता. )

छायाकार गोकुल सोनी ने जो तस्वीर ली है सरकार ने उसे अपने विज्ञापन में भी जगह दी है. सोशल मीडिया में जब यह तस्वीर वायरल हुई तो टिप्पणियों की बाढ़ आ गई. एक पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ता की टिप्पणी थी- काश... हमारे रमन सिंह भी ऐसा संतुलन कायम कर पाते? कार्यकर्ता ने यह भी लिखा- मात्र एक तस्वीर ने रमन सिंह की पन्द्रह साल की लोकप्रियता को धोकर रख दिया है. टिप्पणियां और भी है जिसे फेसबुक, ट्विटर, वाट्सअप पर देखा जा सकता है.

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छत्तीसगढ़ के नकलचोर फिल्मकारों के मुंह पर करारा तमाचा है मंदराजी

राजकुमार सोनी

आज हरेली तिहार है...और अभी थोड़ी देर पहले ही नाचा के जनक दाऊ मंदराजी के जीवन पर बनी एक बेहतर फिल्म देखकर लौटा हूं. हालांकि यह फिल्म मुझे उसी रोज देख लेनी चाहिए थीं जिस रोज प्रदर्शित हुई थीं, लेकिन तब एक इमरजेंसी ने ऐसा होने नहीं दिया. इस बीच कई पाठकों ने फोन और मैसेज के जरिए यह जानना चाहा कि फिल्म मंदराजी पर समीक्षा कब पढ़ने को मिलेगी ? अपने पाठकों की इस जिज्ञासा के लिए उनका शुक्रिया अदा करता हूं. मेरे पाठक सीमित अवश्य है, लेकिन समझदार है. मैं अपने समझदार पाठकों को भीड़तंत्र का हिस्सा नहीं मानता हूं इसलिए फिल्म के बारे में राय व्यक्त करने में जो देरी हुई है उसके लिए क्षमा मांगता हूं. पाठकों और दर्शकों से एक आग्रह यह भी करना चाहता हूं कि चाहे जो स्थिति बने... यह फिल्म अवश्य देखी जानी चाहिए. एक निवेदन छत्तीसगढ़ की संवेदनशील भूपेश सरकार से भी है. जैसे भी हो... इस फिल्म को टैक्स फ्री कर देना चाहिए क्योंकि यह फिल्म नाचा के पुरोधा और हमारे पुरखा दाऊ मंदराजी को सच्ची श्रद्धाजंलि तो देती ही है, फिल्म छत्तीसगढ़ की माटी और उसकी महक को जिंदा रखने का काम भी करती है. यह छत्तीसगढ़ की पहली बायोपिक फिल्म ही नहीं बल्कि यह छत्तीसगढ़ की पहली असली फिल्म भी है.

मंदराजी... रवेली नाचा पार्टी के संचालक दाऊ मंदराजी के जीवन से प्रेरणा लेकर बनाई गई फिल्म है. छत्तीसगढ़ के नकलचोर फिल्मकार अब तक यह समझ ही नहीं पाए हैं कि प्रेरणा और नकल में फर्क होता है. प्रेरणा आपको देर-सबेर ही सही... इतिहास में आपकी जगह तय करती है. जबकि नकलचोरी केवल आपके मुनाफे में इजाफा करती है और आपको कूड़ेदान का हिस्सा बनाकर छोड़ देती है. यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि छत्तीसगढ़ के सिने इतिहास में जब कभी भी जिन दो-चार फिल्मों का जिक्र होगा उनमें कहि देबें संदेश के बाद मंदराजी का उल्लेख भी अवश्य होगा.

यह सही है कि अभी मंदराजी को वैसा दर्शक वर्ग नहीं मिल पाया है जैसा दर्शक वर्ग एक लंपट फिल्मकार की लंपट फिल्म को मिला है और लगातार मिल रहा है. ( लंपटाई एक प्रवृति भी है जो अंधभक्तों और चमचों में हावी रहती है. ) बावजूद इसके मेरा मानना है कि मंदराजी धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ेंगी. यह फिल्म अपनी बेहतर मौलिक पटकथा ( मुंबईयां चोरी नहीं ) चुस्त संपादन, बेहतर निर्देशन, उत्तम प्रकाश व्यवस्था, लोकधुनों की महक और कलाकारों के सधे हुए अभिनय के लिए हमेशा याद रखी जाएगी.

जब फिल्म देख रहा था तो यह सोचकर ही बैठा था बस पन्द्रह-बीस मिनट में हिंदी की किसी चालू फिल्म का मसाला सामने आ जाएगा और मैं अपना सिर फोड़ने के लिए किसी दीवार की तरफ देखूंगा, लेकिन इस फिल्म में सड़क छाप कोई मसाला देखने को नहीं मिला. न खुली जीप में घूमते हुए गुंडे मिले, न ही गुलाबी टावेल लपेटकर नहाती हुई हिरोइन मिली और न ही छत्तीसगढ़ के सलमान खान-अरबाज खान के दर्शन हुए.यह जानकार भी आश्चर्य हुआ कि फिल्म का निर्माण एवं निर्देशन 27 साल के एक युवक विवेक सार्वा ने किया है. विवेक के बारे में यह जानकारी भी मिली कि उसने फिल्म बनाने के पहले बकायदा मंदराजी के जीवन को लेकर अध्ययन किया और कई-कई रातें रवेली गांव और ग्रामीणों के बीच गुजारी. फिल्म का छायांकन विवेक के दोनों भाई नागेश और रमाकांत सारवा का है. दोनों भाइयों ने खेत- खलिहान के साथ-साथ ग्रामीण जन-जीवन को अपने कैमरे में इतनी खूबसूरती से कैद किया है कि बस...हर दृश्य आंखों में समा जाता है और दिल बाग-बाग हो जाता है.

फिल्म में टाइटल के प्रारंभ होने के थोड़ी देर बाद से ही सुधि दर्शक इस अहसास से गुजरने लगता है कि वह एक क्लासिक फिल्म का हिस्सा बन गया है. छत्तीसगढ़ के नकलचोर फिल्मकारों ने अपनी फिल्म से जिस गांव को गायब किया है वह गायब गांव इस फिल्म में दिखाई देता है और पूरी शिद्दत के साथ दिखाई देता है. फिल्म में दो-चार मंजे हुए कलाकारों के साथ ग्रामीण चेहरों को देखना सुखद लगता है. फिल्म मंदराजी के बचपन से लेकर जवानी और बुढ़ापे की कथा कहती है. यह बात हम सब जानते हैं कि मंदराजी ने नाचा के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया था. फिल्म में मंदराजी के बच्चे की मौत का दृश्य जितना दर्दनाक है उतना ही मंदराजी का इस दुनिया से कूच कर जाना भी आंखों को नम कर देता है. फिल्म में अभिनेता करण खान का अभिनय बेहद उम्दा है. कई बार वे मार्मिक संवाद के जरिए दर्शकों की आंखों को नम कर जाते हैं तो कई बार सिर्फ हाव और भाव से. फिल्म में मंदराजी की पत्नी रमहिन की भूमिका ज्योति पटेल ने भी बड़ी शिद्दत के साथ निभाई है. ज्योति पटेल लोककला मंच से जुड़ी हुई एक बेजोड़ कलाकार भी है. फिल्म में मंदराजी के पिता की भूमिका में अमर सिंह लहरे है. अमर सिंह वही कलाकार है जो लंबे समय तक हबीब तनवीर के नया थियेटर से जुड़े हुए थे. उनका सधा हुआ अभिनय फिल्म को एक ऊंचाई पर ले जाता है. फिल्म में लालूराम की भूमिका में हेमलाल कौशल का अभिनय भी बेजोड़ है. फिल्म में यह दिखाया गया है कि कैसे नाचा पार्टी खड़ी होती है और जब गांव-गांव में पार्टी धूम मचाने लगती है तब अचानक कला के बड़े ठेकेदार पैदा हो जाते हैं और कलाकारों की तोड़फोड़ में लग जाते हैं. पार्टी के बिखरने के साथ ही पार्टी को खड़ा करने वाला दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाता है. फिल्म में जब दाऊ रामचंद्र देशमुख और हबीब तनवीर का जिक्र आता है तो यह जानने का मौका मिलता है कि चमक-दमक और पैसों की भूख कैसे गांव के भोले-भाले और कला के प्रति समर्पित कलाकारों का अपहरण कर लेती है.

कुल मिलाकर फिल्म में वह सब कुछ है जो एक अच्छी, उम्दा और प्रेरणादायक फिल्म में होना चाहिए. बस... फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि इसमें लंफगई और टुच्चई नहीं है. फिल्म की इसी कमी को सड़कछाप निर्माता और निर्देशक मनोरंजन कहते हैं. फैमली ड्रामा कहते हैं और जनता के लिए फिल्म बनाना भी कहते हैं.

 

विवेक सार्वा ने भी जनता के लिए ही फिल्म बनाई है, मगर वे जनता की सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करने में ज्यादा प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं. छत्तीसगढ़ में मंदराजी जैसी और भी कई फिल्में बननी चाहिए. छत्तीसगढ़ को ऐसी सशक्त और साफ-सुथरी फिल्म की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि यहां पर आंय-बांय-शांय पैसा लगाकर केवल मुनाफे पर जोर देने वाले कुकुरमुत्ते फिल्मकारों की बाढ़ आई हुई है. कुकुरमुत्तों ने इतना ज्यादा कचरा परोस दिया है कि जनता का स्वाद बिगड़ गया है. अब सबले बढ़िया छत्तीसगढ़ियां को भी कटीली कमर का लटका- झटका, गुलाबी टॉवेल, बात-बात पर खून-खच्चर, नंगापन, दादा कोड़के का संवाद और चोरी-चकारी का सामान पसन्द आने लगा है.

बहरहाल विवेक सार्वा और उसकी पूरी टीम को मैं इसलिए बधाई देता हूं क्योंकि उन्होंने अपने मौलिक और साहसिक काम के जरिए नकलचोर फिल्मकारों के मुंह पर जोरदार तमाचा मारा है. फिल्म चलती है या नहीं चलती है... यह उनके लिए महत्वपूर्ण है जो मुनाफे के खेल में लगे हुए हैं, मेरे लिए महत्वपूर्ण यह है कि विवेक ने भीड़तंत्र में शामिल होना जरूरी नहीं समझा. वैसे भी अगर किसी के पास विवेक है तो वह भीड़तंत्र का हिस्सा कभी नहीं बनता है? फिर से बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएं......

 

 

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बताइए...रमन सिंह के ओएसडी की बीवी भी उठा रही थी एक लाख रुपए महीने की पगार

रायपुर. भाजपा के शासनकाल में लूट मची थी लूट. जिसे देखो वही लूट-खसोट में शामिल था. छत्तीसगढ़ के बेरोजगार भूखे-प्यासे नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे थे तो इधर अफसरों की बीवियां अयोग्यता के बावजूद टाइम पास करने के लिए नौकरियां कर रही थी. प्रदेश में भूपेश बघेल की सरकार बनने के बाद अफसरों के कारनामों की जांच प्रारंभ हुई तो एक से बढ़कर एक कई तरह के खुलासे हुए. पता चला कि रमन सिंह के चहेते अफसरों ने अपने लिए नहीं ब्लकि सात पीढ़ियों के लिए एशोआराम का पक्का बंदोबस्त कर रखा है.

कांग्रेस के फायर ब्रांड नेता विकास तिवारी ने कुछ समय पहले पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के ओएसडी ( विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी ) की पत्नी जागेश्वरी बिसेन की नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए थे. उनका आरोप था कि जागेश्वरी बिसेन आईटी विशेषज्ञ के तौर पर किसी भी तरह की योग्यता नहीं रखती थीं बावजूद इसके उन्हें न्यू रायपुर डेव्हलपमेंट अथारिटी में नियुक्त कर दिया गया था. विकास तिवारी की शिकायत के बाद जांच प्रारंभ हुई तो पता चला कि जागेश्वरी बिसेन पूरी तरह से अयोग्य थी और उनकी नियुक्ति किसी प्रभाव में की गई थीं. ( ऐसी चर्चा है कि जागेश्वरी बिसेन के पति अरूण बिसने भाजपा के पूर्व सांसद और रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह के करीबी थे. )

बताया जाता है कि जब जागेश्वरी बिसेन की नियुक्ति हुई थी तब भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर रजत कुमार न्यू रायपुर डेव्हलपमेंट अथारिटी में सीईओ थे. खबर है कि अब सीईओ और जागेश्वरी बिसेन के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी चल रही है.

पूर्व मुख्यमंत्री के करीबी रहे रजत कुमार और ओएसडी रहे अरूण बिसेन कई तरह के विवादित मामलों से घिरे हुए हैं. बताते है कि न्यू रायपुर डेव्हलपमेट अथारिटी के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टस सपोर्ट सर्विसेस के लिए अनुबंधित सलाहकार संस्था के साथ संपादित अनुबंध के अनुसार स्मार्ट सिटी परियोजना के कार्यों के संचालन के लिए आईटी कंसलटेंट की जरूरत थी. इसके लिए सलाहकार संस्था मेसर्स ली एसोसिएट से एमसीए या फिर बीई व बीटेक के साथ-साथ पांच से सात साल का अनुभव रखने वाले योग्य उम्मीद्वारों का बायोडाटा मांगा गया था. सलाहकार संस्था ने इसके लिए ओएसडी अरूण बिसेन की पत्नी जागेश्वरी बिसेन का अनुभव प्रमाण पत्र भेजा और उनकी नियुक्ति आईटी विशेषज्ञ के पद पर कर दी गई.

 
फिलहाल जो जांच रिपोर्ट सामने आई है उसमें पता चला है कि बॉयोडाटा मिलने के बाद प्रस्तावित उम्मीदवार का साक्षात्कार भी नहीं लिया गया.इस सिलसिले में कोई नस्ती उपलब्ध नहीं है.  यही नहीं, प्रोफेशनल इंस्टीटयूट ऑफ इंजीयरिंग और टेक्नालॉजी में कुल तीन वर्ष सात माह में प्रोफेसर कम्प्यूटर साइंस और कंसोल इंडिया कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड में कुल एक वर्ष तीन माह का अनुभव होना बताया गया है.इस तरह जागेश्वरी बिसेन द्वारा 4 वर्ष 10 माह 18 दिन का अनुभव प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया है. जबकि प्राधिकरण द्वारा उपरोक्त पद के लिए पांच से सात वर्ष का अनुभव चाहा गया था. इतना ही नहीं जागेश्वरी बिसेन ने कंसोल इंडिया जैसी विवादित कंपनी में खुद को कार्य करना भी बताया था. बता दें कि यह कंपनी पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह का चेहरा चमकाने के खेल में लगी थी. इस कंपनी ने विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य के पत्रकारों और संपादकों को खुलेआम धन बांटा था और उनका वीडियो भी बनाया था. बहरहाल कंसोल इंडिया में काम करने वाली जागेश्वरी जब न्यू रायपुर डेव्हलमेंट अथारिटी में नौकरी पा गई तो उन्हें एक लाख रुपए महीने का पगार दिया जाने लगा.

छत्तीसगढ़ के बेरोजगारों... क्या आपको किसी ने एक लाख रुपए की पगार पर नौकरी देने के बारे में सोचा है? अगर किसी ने सोचा है तो क्या आप एक लाख रुपए की पगार वाली नौकरी छोड़कर चले जाएंगे? मगर... सरकार बदलते ही जागेश्वरी ने एक लाख रुपए की पगार देने वाली नौकरी को लात मार दिया. ठीक यही काम संविदा में पदस्थ और सुपर सीएम के नाम से विख्यात एक दूसरे अफसर की पत्नी ने भी किया है. पहले अफसर की पत्नी की जांच रिपोर्ट आ गई है. दूसरे अफसर की पत्नी की रिपोर्ट आनी बाकी है. इस अफसर पत्नी की नियुक्ति को लेकर भी सरकार जांच करवा रही है.

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सोया मिल्क, बिस्किट और केटलफिड की खरीदी में करोड़ों का वारा-न्यारा

नियंत्रक महालेखा परीक्षक की आपत्तियों को दरकिनार कर बीज निगम ने की करोड़ों की खरीदी

रायपुर. भाजपा के शासनकाल में एक से बढ़कर एक कारनामे होते रहे हैं और इन कारनामों को अंजाम देने वाले लोग अब भी खामोश नहीं बैठे हैं. पिछले शासनकाल में सोया मिल्क, बिस्कुट और केटलफिड की बिक्री के नाम पर करोड़ों की चपत लगाने वाले मनीष शाह को लोग भूले नहीं है. मनीष शाह वहीं है जिन्होंने पिछली सरकार में बच्चों के कुपोषण को दूर करने के लिए सरकार को सोया मिल्क बांटने का प्रस्ताव दिया था. सरकार की रजामंदी के बाद शाह ने केंद्रीय और राज्य स्तरीय प्रयोगशाला से जांच करवाए बगैर बच्चों को दूध का पैकेट वितरित कर दिया था. कई स्कूलों में जब बच्चे बीमार पड़ने लगे तब थोड़े समय के लिए पैकेट के वितरण में रोक लगाई गई. शाह इन दिनों फिर से सक्रिय है.मंत्रालय के कई आला-अफसरों के कक्ष में उनकी आमद देखी जा सकती है.

रमन सिंह की सरकार में बीज निगम ने जन निजी भागीदारी ( पीपीपी मोड ) के तहत सोया बिस्कुट, सोया मिल्क और केटलफिड की खरीदी की थी. इसके लिए शाह की कंपनियों से अनुबंध किया गया था. इन चीजों की खरीदी के लिए सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य शर्त यह थीं कि कंपनी को अपनी  ईकाई छत्तीसगढ़ में स्थापित करनी होगी और प्रदेश के किसानों या बाजार से कच्चे माल की खरीददारी करनी होगी. अनुबंध में इस शर्त को रखे जाने के पीछे का मकसद यह था कि स्थानीय बाजार और किसान दोनों को मजबूती मिलेगी.

नहीं स्थापित हुई ईकाई

बीज निगम के अधिकारियों ने यह जांचे-परखे कि किसी तरह की कोई ईकाई स्थापित की है या नहीं...शाह को करोड़ों का काम सौंप दिया.जाहिर सी बात है कि जब ईकाई स्थापित नहीं हुई हो तो स्थानीय बाजार और किसानों से खरीददारी भी नहीं हुई होगी. ऐसा ही हुआ. शाह ने सोया मिल्क के लिए कच्चा सामान पड़ोसी राज्यों से खरीदा और स्कूल शिक्षा विभाग तथा महिला बाल विकास विभाग की ओर से संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों में इसकी जमकर सप्लाई की. शाह ने पशु आहार के लिए भी किसी तरह की कोई ईकाई स्थापित नहीं की और गौशालाओं में पशु आहार पहुंचाया जाता रहा. बिस्कुट की ट्रेडिंग नागपुर के सुंदर इंडस्ट्रीज से की गई और स्कूल तथा आंगनबाड़ी केंद्रों में वितरण होता रहा.

महालेखाकार ने जताई आपत्ति

एक शिकायत के बाद महालेखाकार ( कैग ) ने 31 मई 2015 को आपत्ति जताते हुए बीज निगम को नियमों के खिलाफ की जा रही खरीदी और भुगतान पर रोक लगाने को कहा. निगम ने कैग की तमाम आपत्तियों को उस दौरान रद्दी की टोकरी में डाल दिया और बड़े पैमाने पर खरीदी और भुगतान का खेल जारी रखा. वर्ष 2015 से वर्ष 2018 तक यह क्रम जारी रहा. वर्ष 2018 में कैग ने एक बार फिर बीज निगम को खरीदी और पर रोक लगाने को कहा तब बीज निगम ने 11 जनवरी 2019 को खानापूर्ति करते मनीष शाह को एक पत्र लिखा और कहा कि वे जल्द से जल्द प्लांट स्थापित कर लें. अब तक न तो प्लांट लगा है और न ही स्थानीय स्तर पर कच्चे माल की खरीदी होती है. सारा कुछ बाहर से नियंत्रित होता है. अधिकारियों की सांठगांठ से शासन को चूना लगाने का खेल अब भी निर्बाध गति से चल रहा है. नियमानुसार स्कूलों में सोया मिल्क और बिस्कुट की सप्लाई के लिए विधि विभाग से अनुमति ली जानी थीं. खबर है कि मनीष शाह को उपकृत करने के लिए विधि विभाग से अनुमति लेना भी अनिवार्य नहीं समझा गया.

अब राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में काम हथियाने की जुगत

खबर है कि प्रदेश के एक प्रमुख अफसर से सांठगांठ होने की वजह से मनीष शाह ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में भी काम हथियाने की जुगड़ बिठा ली है. मंत्रालय में पदस्थ एक अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सामान्य तौर पर किसी भी निजी व्यक्ति को सरकारी बैठकों में उपस्थित रहने की अनुमति नहीं रहती, लेकिन मनीष शाह प्रमुख अफसर से करीबी होने  का रौब दिखाते हुए हर बैठक में मौजूद रहता है. सूत्र बताते हैं कि शाह के करीबी अफसर ने पिछले दिनों राष्ट्रीय विकास योजना भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा है. मनीष शाह को कौन सा काम दिया जाना उचित होगा इसका खाका भी अफसर ने अपने कमरे में बनाया है. खबर है कि शाह... भारत सरकार और राज्य सरकार के अंश से फूड प्रोसेसिंग का कोई प्रोजेक्ट लांच करना चाहता हैं. शाह को यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि नई सरकार का जोर खेती-किसानी पर केंद्रित है सो प्रोजेक्ट भी कुछ उसी ढंग का तैयार किया गया है. एक और प्रोजेक्ट यूनिर्विसटी से संबंधित है. 

 

 

 

 

 

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अकेले राजनांदगांव जिले की विकास यात्रा में फूंके गए 12 करोड़

रायपुर. छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार रहने के दौरान कभी सुराज यात्रा निकाली जाती थीं तो कभी विकास यात्रा. पिछले साल वर्ष 2018 में ठीक चुनाव से पहले डाक्टर रमन सिंह की सरकार ने कामकाज को प्रदर्शित करने के लिए विकास यात्रा निकाली थीं. अलग-अलग जिलों में निकाली इस यात्रा में अरबों रुपए फूंके जाने का अनुमान है.अकेले राजनांदगांव जिले में जो यात्रा निकाली गई उस पर सरकार के विभिन्न विभागों ने 12 करोड़ पांच लाख, दो हजार तीन सौ बत्तीस रुपए का व्यय दर्शाया है.

डोंगरगांव के विधायक दलेश्वर सिंह ने इस बार मानसून सत्र में एक प्रश्न के जरिए यह जानना चाहा था कि राजनांदगांव जिले में वर्ष 2018-19 में जो विकास यात्रा निकाली गई थीं उस पर कुल कितना खर्च हुआ है. जवाब में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बताया है कि कुल 12 करोड़ पांच लाख दो हजार तीन सौ बत्तीस रुपए जनरेटर एवं फ्लैक्स, प्रमाण पत्र वितरण, पाम्पलेट सहित अन्य मद में खर्च किए गए . विकास यात्रा में इस राशि का व्यय जिला पंचायत कार्यालय, अंत्यावसायी सहकारी विकास समिति, श्रम पदाधिकारी, खैरागढ़- डोंगरगढ़- राजनांदगांव के कार्यपालन अभियंता, लोक निर्माण विभाग और जनपद पंचायत के नाम पर दर्शाया गया है.

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जो अंडा खाना चाहता है उसे खाने दो... अंडे के समर्थन में उतरे जनसंगठन

रायपुर. छत्तीसगढ़ के स्कूलों में अंडा वितरण किए जाने को लेकर जबरदस्त नौटंकी चल रही है. धर्म-कर्म और आस्था का हवाला देकर कतिपय संगठन विरोध जता रहे हैं तो एक बड़ी आबादी बच्चों को अंडा दिए जाने के पक्ष में है. अब तक अंडा वितरण के खिलाफ ही ज्ञापन दिए जाने का समाचार देखने- सुनने को मिल रहा था, लेकिन इधर पहली बार गुरुवार को  प्रगतिशील जनसंगठनों ने कलक्टर को ज्ञापन सौंपकर सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में अंडा देने की मांग मुख्यमंत्री से की है.

क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के महासचिव् तुहिन,अखिल भारतीय क्रांतिकारी विद्यार्थी संगठन के अध्यक्ष विनय, दलित मुक्ति मोर्चा छत्तीसगढ़ के सलाहकार गोल्डी जार्ज, भोजन का अधिकार अभियान से जुड़ी संगीता, गुरु घासीदास सेवादार संघ के रायपुर जिला संयोजक केशव सतनाम, एससीएसटीओबीसी अल्पसंख्यक संयुक्त मोर्चा छत्तीसगढ़ के संयोजक अधिवक्ता रामकृष्ण जांगड़े, अधिवक्ता शिवप्रसाद डहरिया, क्रांतिकारी नौजवान भारत सभा के गौतम गणपत तथा लोक समता समिति के सुरेश कुमार ने गुरुवार को रायपुर के कलक्टर एस भारतीदासन को ज्ञापन सौंपकर सरकारी स्कूलों एवं आंगनबाड़ी केंद्रों में हफ्ते में पांच दिन अंडा देने की मांग की.

ज्ञापन सौंपने के बाद इन सदस्यों ने मीडिया से चर्चा में कहा कि छत्तीसगढ़ में बच्चों में कुपोषण की स्थिति बेहद  गंभीर है. यहां 38 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार है. अनुसूचित जाति- जनजाति वर्ग के बच्चों में कुपोषण की दर लगभग 44 फीसदी है. एक सरकारी सर्वे भी कहता है कि छत्तीसगढ़ में 83 फीसदी लोग अंडा सेवन करते हैं. सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ियों में जाने वाले बच्चों में मांसाहार का प्रतिशत और भी अधिक है. अंडा उच्च कोटि का प्रोटीन है और एक सर्वोत्तम विकल्प है. जो लोग अंडे का सेवन नहीं करना चाहते उनके लिए सरकार ने अतिरिक्त शाकाहारी विकल्प का प्रावधान भी तय कर रखा है. सरकार अगर अंडे का वितरण करना चाहती है तो यह एक अच्छा कदम है. अंडा देकर बच्चों में कुपोषण की समस्या को कम किया जा सकता है.

जनसंगठनों से जुड़े लोगों ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि अंडे का विरोध करने वाले लोग बच्चों के कुपोषण को दूर किए जाने के बारे में चितिंत नहीं है. वे इसे धर्म-कर्म से जोड़कर देख रहे हैं. प्रगतिशील जनसंगठनों के सदस्यों ने कहा कि भोजन में शाकाहार और मांसाहार दोनों अनिवार्य है. आस्था या धार्मिकता के नाम पर लोगों के खानपान पर पाबंदी लगाने की मांग किसी भी स्तर पर जायज और प्रजातांत्रिक नहीं मानी जा सकती है. जनसंगठनों ने कहा कि अभी केवल ज्ञापन देकर बात समझाने की कवायद की जा रही है. अगर गरीब और कुपोषित बच्चों को अंडा देने की जबरिया खिलाफत की गई तो फिर सड़क की लड़ाई भी लड़ी जाएगी. 

क्यों दिया मछली और मुर्गीपालन को बढ़ावा ?

गुरुवार को विधानसभा में अंडा वितरण किए जाने को लेकर एक बार फिर विपक्ष ने हंगामा मचाया. विपक्ष के सदस्य बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि कई लोग अंडा वितरण का विरोध कर रहे हैं. सरकार को अपना फैसला वापस लेना चाहिए. उन्होंने सदन में इस विषय पर स्थगन प्रस्ताव के जरिए चर्चा करने की मांग की जिस पर सत्तापक्ष सहमत नहीं हुआ. सदन में सत्तापक्ष के सदस्यों ने कहा कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहां की सरकार भी स्कूलों में बच्चों को अंडा उपलब्ध करवा रही है तो फिर यहां क्या दिक्कत है. मंत्री कवासी लखमा ने कहा कि जब बृजमोहन अग्रवाल पशुधन मंत्री थे तब मछली पालन और मुर्गी पालन को बढ़ावा देने की बात करते थे, लेकिन अब विरोध कर रहे हैं. इस बीच विधायक बृहस्पति सिंह ने सदन में वर्ष 2014 के आदेश की प्रतियां लहराई. उन्होंने कहा कि जब भाजपा की सरकार थीं तब अंडा देने पर विचार किया गया था.

 

 

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सुधा भारद्वाज की रिहाई के लिए छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रदर्शन

रायपुर. देश की वरिष्ठ अधिवक्ता सुधा भारद्वाज की रिहाई के लिए सोमवार को छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन की अगुवाई में विभिन्न जनसंगठनों ने राजधानी रायपुर में एक दिवसीय धरना दिया. धरने में शामिल बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनकी निःशर्त रिहाई की मांग करते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम एक ज्ञापन सौंपा और हस्तक्षेप करने की मांग की.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि अधिवक्ता सुधा भारद्वाज गत चार दशकों से छत्तीसगढ़ के आदिवासी, मजदूर, किसान,  दलित, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं  के पक्ष में उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्षरत रही हैं. दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविधालय की प्रोफ़ेसर कृष्णा भारद्वाज की पुत्री सुधा भारद्वाज अपनी आईआईटी की पढ़ाई के बाद उच्च संस्थानों में कार्य कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने दल्लीराजहरा में मजदूरों के अधिकारों के लिए काम करने का निर्णय लिया और शंकर गुहा नियोगी के आदर्शों से प्रेरणा से लेकर मजदूर बस्ती में जीवन यापन करती रही.

छत्तीसगढ़ में  पिछले 15 सालों में जब अंधा-धुंध खनन व औद्योगिकरण के नाम पर किसानों से उनकी जमीनों को छीना गया. कार्पोरेट लूट को सरल बनाने  तमाम संवैधानिक अधिकारों, कानूनों और नियमों को दरकिनार किया गया तब एक सुधा भारद्वाज ही थी जिन्होंने कार्पोरेट लूट के खिलाफ आदिवासियों और किसानों के हित में उच्च न्यायालय में सैकड़ों मामलों में पैरवी की. बस्तर में माओवादी हिंसा के नाम पर राज्य प्रायोजित मुठभेड़ एवं महिलाओं पर लैंगिक हिंसा के मामलों को भी उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायलय के समक्ष पूरी शिद्दत के साथ उठाया. कई मामलों में वे स्वयं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ओर से गठित जांच टीम का हिस्सा भी रही. प्रदेश में अल्पसंख्यकों और दलितों पर हुए हमलो के मामलो को भी उन्होंने प्रमुखता से उठाया और उन्हें न्यायालय तक ले गई. 

निश्चित तौर पर सुधा भारद्वाज जिस तरह से वंचित वर्ग की आवाज रही और विशेष रूप से कार्पोरेट लूट, दमन और सांप्रदायिक हमलों के खिलाफ संवैधानिक दायरों में रहकर लोकतांत्रिक तरीकों से न्याय व्यवस्था के माध्यम से लड़ रही थी वह भाजपा की केंद्र और राज्य सरकार के लिए चुनौती बन गईं थी. मोदी सरकार अपने खिलाफ उठने वाली प्रत्येक लोकतांत्रिक  आवाजों को कुचल देना चाहती हैं. वह हर उस आवाज को देशद्रोही करार देना चाहती हैं जो न्याय, अधिकार और शांति के पक्ष में खड़ी हैं. सरकार की यह मंशा साफ तौर पर भीमा कोरेगांव के केस में नज़र आती हैं और इसी कारण फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सुधा भारद्वाज को आरोपी बनाकर जेल भेज दिया गया.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि सुधा भारद्वाज ने छत्तीसगढ़ में जन अधिकारों के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया था. उनकी रिहाई के लिए भूपेश सरकार को सभी जरूरी हस्तक्षेप करते हुए न्यायोचित कदम उठाना चाहिए. यह रिहाई सिर्फ एक इंसान की रिहाई की मांग नहीं, बल्कि हम सब के मूल लोकतांत्रिक अधिकारों की रिहाई की मांग भी है.

 

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भाजपा सरकार ने कर्ज पर कर्ज लेकर बसाया अटल नगर

रायपुर. छत्तीसगढ़ में जब भाजपा की सरकार थीं तब हमर छत्तीसगढ़ नाम की एक योजना प्रारंभ की गई थी. इस योजना के तहत गांव के पंच-सरपंच और अन्य लोग नई राजधानी ( अब नया नाम अटल नगर )  को खास तौर पर देखने के लिए आया करते थे. तब सरकार के अफसर ग्रामीणों को जानकारी देते थे- देखिए... कांग्रेसी तो नई राजधानी बना नहीं पाए... मगर हमारे मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के साहस और पराक्रम से एक भव्य राजधानी आपके सामने है. अगर हिम्मत हो तो इंसान क्या नहीं कर सकता. अफसरों की बात सुनकर ग्रामीण ताली पीटते और फिर हमर छत्तीसगढ़ नामक योजना की टोपी पहनकर फोटो खिंचवाकर घर चले जाते थे. ( हालांकि इस फोटो सेशन का ठेका भी एक निजी फर्म को दिया गया था जिसका भुगतान करोड़ों में किया गया.)

नई राजधानी की चकाचौंध को देखकर लौटने वाले ग्रामीणों को शायद यह नहीं मालूम होगा कि यहां के भव्य इमारतों के निर्माण के लिए भाजपा सरकार के न्यू रायपुर डेव्हलपमेंट अथारिटी ( अब अटल नगर विकास प्राधिकरण ) ने ताबड़तोड़ कर्ज लिए थे. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के लिखित सवाल के जवाब में वन मंत्री मोहम्मद अकबर ने शुक्रवार को विधानसभा में यह जानकारी दी है कि प्राधिकरण ने किस-किस बैंक से कर्ज लिया था.

अटल नगर विकास प्राधिकरण ने भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2015-16 में 69.06, वर्ष 16-17 में 35.05, वर्ष 17-18 में 33.01 एवं 2018-19 के लिए 17.85 करोड़ का कर्ज लिया था. सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया वर्ष 2014-15 में 4.79, वर्ष 15-16 में 11.52, वर्ष 16-17 में 6.17, वर्ष 17-18 में 16.55 एवं 2018-19 के लिए 8.73 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था. प्राधिकरण ने यूनियन बैंक आफ इंडिया वर्ष 2016-17 में 116.07 एवं 2018-19 के लिए 26.13 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था. प्राधिकरण को कर्ज देने वालों बैंकों में यूनियन बैंक आफ इंडिया का नाम सबसे ऊपर है. इस बैंक ने कुल छह बार कर्ज दिया है जिसकी राशि करोड़ों में हैं. जबकि दूसरे क्रम में सेंट्रल बैंक आफ इंडिया है. इस बैंक ने प्राधिकरण को कुल पांच बार लोन दिया है. सेंट्रल बैंक ने 150 करोड़ रुपए की बड़ी रकम वर्ष 2013-14 में जारी की थी. लगभग पांच बार यूनियन बैंक आफ इंडिया ने भी कर्ज दिया है. इस बैंक ने वर्ष 2011-12 में 70 करोड़, वर्ष 12-13 के लिए 271.50 करोड़, वर्ष 2014-15 के लिए 235 करोड़ एवं वर्ष 2015-2016 के लिए 435 करोड़ रुपए की राशि जारी की थीं. प्राधिकरण को कर्ज देने वालों में पंजाब नेशनल बैंक, हुडको और इलाहाबाद बैंक का नाम भी शामिल है.

 

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सीएम भूपेश की माता बिंदेश्वरी बघेल का निधन, रामकृष्ण अस्पताल में ली अंतिम सांसें

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मां बिंदेश्वरी बघेल का रविवार की शाम निधन हो गया है. वे पिछले एक पखवाड़े रामकृष्ण अस्पताल में भर्ती थीं. ब्रेन के निचले हिस्से का संवेदना तंत्र प्रभावित होने की वजह से उन्हें अस्पताल में दाखिल किया था. हालांकि बीच में महज एक-दो बार चिकित्सकों ने उनके स्वास्थ्य में आंशिक सुधार होना बताया था, लेकिन उन्हें वेंटिलेटर में ही रखा गया था. दिल्ली से चिकित्सकों की विशेष टीम भी उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर रही थीं. अपनी मां के स्वास्थ्य को लेकर चितिंत भूपेश बघेल बगैर प्रायः हर रोज नियमित रुप से अस्पताल में मौजूद रहते थे. रविवार को भी जिस वक्त बिंदेश्वरी बघेल ने अंतिम सांसे ली उस वक्त बघेल अस्पताल में ही मौजूद थे. निधन की खबर सुनने के बाद सरकार के मंत्री, कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारियों और प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं के रायपुर पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है. कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख शैलेश नितिन त्रिवेदी ने बताया कि फिलहाल बिदेंश्वरी बघेल जी की पार्थिव देह को अस्पताल से भिलाई-3  निवास ले जाया गया है जहां उनके पार्थिव देह को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा. अंतिम यात्रा आठ अगस्त को सुबह 11 बजे निज निवास से भिलाई-3 मुक्तिधाम के लिए निकलेंगी. अंतिम संस्कार उम्दा रोड़ स्थित मुक्तिधाम में होगा.

श्रीमती बिंदेश्वरी  बघेल  के निधन  पर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, विधानसभा अध्यक्ष  डॉ चरण दास महंत सहित कई नेताओं ने गहन शोक जताया है. अपने शोक संदेश में डॉ. महंत ने ईश्वर से दिवंगत  आत्मा को शांति प्रदान करने और शोक संतप्त  परिवार को अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की है.उन्होंने कहा कि दुःख के इस समय में वे और उनका पूरा  परिवार शोक संतप्त परिवार के साथ है. कोरबा सांसद ज्योत्सना चरणदास मंहत ने श्रीमती बिंदेश्वरी देवी के निधन को अपनी निजी क्षति बताया. उन्होंने अपने शोक संदेश में कहा कि श्रीमती बिंदेश्वरी देवी साक्षात ममता की प्रतिमूर्ति थीं. आज छत्तीसगढ़ प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के पश्चात मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जिस तत्परता के साथ किसानों को उन्नत करने, कर्ज से मुक्ति दिलाने, गांवों में गौठान का निर्माण सहित विकास का जो काम कर रहे थे उसकी प्रेरणा निश्चित रुप से उन्हें अपनी मां से ही मिलती थीं.स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव, नगरीय निकाय मंत्री शिव डहरिया और राजस्व मंत्री जयसिंहअग्रवाल ने भी शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदना प्रकट की है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक शुक्ला, नंद कश्यप,रमा कांत बंजारे, डा.लाखन सिंह ने कहा है कि छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन सहित अन्य सामाजिक संगठन इस शोक में शरीक है.इधर श्रीमती बिंदेश्वरी बघेल का पार्थिव देह रामकृष्ण अस्पताल से भिलाई-3 ले जाया गया है. आठ जुलाई को मुक्ति धाम उम्दा रोड भिलाई तीन में दोपहर 12 बजे उनका अंतिम संस्कार होगा. मुख्यमंत्री को मातृशोक की वजह से 8 जुलाई को पूर्व से प्रस्तावित प्रदेश व्यापी आंदोलन स्थगित कर दिया गया है.

कई राष्ट्रीय नेताओं ने जताया शोक

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की माता जी के निधन पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह,  राहुल गांधी, मोतीलाल वोरा, मुकुल वासनिक, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ, राजबब्बर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मोहसिना किदवई, भाजपा के वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, प्रेमप्रकाश पांडे ने भी शोक जताया है. अंतिम संस्कार में कई राष्ट्रीय नेताओं के शामिल होने की भी खबर है. 

 

 

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महज एक तारीख 17 जनवरी 2012 को वॉलफोर्ट सिटी वालों ने खेला लंबा खेल

रायपुर. जमीन के नामांतरण का काम बेहद जटिल और कठिन होता है.अब भी हर रोज सैकड़ों लोग नामांतरण के लिए भटकते रहते हैं, लेकिन वॉलफोर्ट सिटी का निर्माण करने वाले रसूखदारों के लिए यह काम बेहद मामूली था. सूत्रों का कहना है कि वॉलफोर्ट सिटी से जुड़े एक शख्स ने खुद को भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा का रिश्तेदार बताकर लंबा खेल खेला है. बताते हैं इस शख्स ने अपने कामकाज को आसान बनाने के लिए डाक्टर रमन सिंह की सरकार के एक मंत्री को भी अपना राजदार बना रखा था. भाजपा के पूर्व गृहमंत्री और वरिष्ठ नेता ननकीराम कंवर ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जो शिकायत भेजी है उसमें उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि जिन किसानों को सरकार ने खेती-बाड़ी के लिए सरकारी जमीन आवंटित की थीं उनकी जमीन अवैध ढंग से हथिया ली गई है. अपनी शिकायत में कंवर ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि महज एक तारीख 17 जनवरी 2012 को कई हेक्टयर जमीन जो दूसरों के नाम थीं उसका नामांतरण वॉलफोर्ट के नाम कर दिया गया. ईश्वर रिजतेश नाम के शख्स से जैनम ने अलग-अलग खसरा नंबर की कई हेक्टयर जमीन खरीदी थी जो 17 जनवरी 2012 को वॉलफोर्ट के नाम चढ़ गई. जैनम ने कृषक मनीराम, मंशा, महेश, दसरू, आनंदराम, होरी, रामचंद, अलालू, सगुन, मोतीराम, ईशान और बिसेलाल से भी जमीन ली थीं जिसे उक्त तिथि को वॉलफोर्ट के नाम कर दिया गया.

कंवर का आरोप है कि रायपुर निवासी पंकज लाहोटी ने जमीन के खेल में गोपाल, रामचंद सोनकर, राजीव और शिवमूरत जैसे लोगों का सहयोग लिया. इस खेल में राजस्व अधिकारी घनश्याम शर्मा और पटवारी सनत पटेल मिले हुए थे. पाटन तहसील के अमलेश्वर के पास ग्राम महुदा के पटवारी हल्का नंबर 7 की जिस 38 एकड़ भूमि को हथियाया गया है उसका बाजार मूल्य ही एक अरब 14 करोड़ रुपए के आसपास है. अव्वल तो सरकारी पट्टे की जमीन की न तो बिक्री हो सकती थीं और न ही उसका हस्तांतरण हो सकता था. यहां तक भूमि के मूल स्वरुप में भी परिवर्तन नहीं किया जा सकता था. राजस्व प्रावधानों के अनुसार अगर पट्टे की भूमि पड़त हो भी वह शासन की मानी जाती है और इस तरह की किसी भी भूमि को लेने के लिए कलेक्टर की अनुज्ञा अनिवार्य होती है, लेकिन यहां किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया.

चौका सकती जांच

पूर्व गृहमंत्री की शिकायत के बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पूरे मामले में जांच के आदेश दे दिए हैं. कहा जा रहा है कि अगर सचमुच गंभीरता और सूक्ष्मता से जांच होगी तो कई चौकाने वाले तथ्य सामने आएंगे. जमीन के कारोबार से जुड़े लोगों शनिवार को अपना मोर्चा डॉट कॉम को चर्चा में बताया कि अगर सरकार ने इस जांच में रायपुर और अभनपुर तहसील में चल रहे वॉलफोर्ट के प्रोजेक्ट को भी शामिल कर लिया तो अरबों-खरबों का घोटाला उजागर होगा और कई सपेदपोश चेहरे बेनकाब हो जाएंगे. बताया जाता है कि इस खेल का मुख्य किरदार एक ऐसा व्यापारी है जो मध्य प्रदेश का निवासी है और सालों से छत्तीसगढ़ में काम कर रहा है. पहले यह व्यापारी शेयर का धंधा किया करता था. अब इसके पास स्पंज आयरन संयंत्र के अलावा कोलवाशरी भी है. इस व्यापारी ने ईओडब्लू के पूर्व चीफ के साथ अच्छी- खासी मित्रता कायम कर रखी थीं. सूत्रों का कहना है कि कई बार यह व्यापारी ईओडब्लू चीफ के लिए वसूली का काम भी करता था. व्यापारी के साथ सदर बाजार में सोने-चांदी का कारोबार करने वाले एक अन्य शख्स का नाम भी सामने आ रहा है. ननकीराम कंवर ने जिस पंकज लाहोटी का जिक्र किया है उसे महज मोहरा बताया जा रहा है. शिकायत में जिस गोपाल सोनकर का जिक्र हुआ है वह वॉलफोर्ट सिटी में ही निवास करता है. नब्बे फीसदी जमीनों का लेन-देन इसी शख्स ने किया है. व्यापारी का नाम विस्फोटक सप्लाई से भी जुड़ा हुआ है. सूत्रों का कहना है कि प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थी तब विस्फोटक से भरा एक ट्रक बस्तर में गायब हो गया था. बाद में ट्रक तो मिल गया, लेकिन विस्फोटक नहीं मिला. ट्रक से विस्फोटक पदार्थ के गायब होने का मामला अखबारों की सुर्खियां बना. मामले में एक छोटी सी जांच प्रारंभ हुई लेकिन फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में चला गया. आज तक यह पता नहीं चल पाया है कि आखिर विस्फोटक कहां गया.

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वॉलफोर्ट सिटी बनाने वालों ने किया अरबों का जमीन घोटाला ?

रायपुर. अगर कभी आप रायपुर आए तो रायपुर से भिलाई जाने वाले मार्ग पर आपको एक चमकदार कालोनी नजर आएगी. इस चमकदार कालोनी को देखकर आप चौंक सकते हैं और यह सोचने के लिए मजबूर हो सकते हैं कि जिस राज्य की एक बड़ी आबादी हर रोज अपनी रोजी-रोटी के लिए जद्दोजहद करती है वहां के बांशिदें तीन से चार करोड़ रुपए में एक बंगला खरीदने की हैसियत रखते हैं.

जी हां... हम बात कर रहे हैं वॉलफोर्ट सिटी की. बताते हैं कि इस सिटी में एक बंगले की कीमत तीन से चार करोड़ रुपए हैं. छत्तीसगढ़ के पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने इसी वॉलफोर्ट सिटी के कर्ताधर्ताओं के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है. हालांकि यह अभियान भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह को छेड़ना था, लेकिन उनके शासनकाल में यह कालोनी पल्लवित और पुष्पित हुई थीं तो उनके हिस्से का काम पूर्व गृहमंत्री कंवर ने कर दिया.

कंवर ने पांच जुलाई 2019 को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सौंपी गई एक शिकायत में कहा है कि रायपुर निवासी पंकज लाहोटी ने गोपाल, रामचंद सोनकर, राजीव और शिवमूरत जैसे लोगों के सहयोग से राजस्व अधिकारी रहे घनश्याम शर्मा, पटवारी सनत पटेल से सांठगांठ कर ग्राम महुदा के पटवारी हल्का नंबर 7 अम्लेश्वर तहसील पाटन जिला दुर्ग की करीब 38 एकड़ भूमि जिसका वर्तमान बाजार मूल्य एक अरब 14 करोड़ रुपए है की हेराफेरी कर ली है. कंवर का कहना है कि उक्त जमीन भूमिहीन कृषकों को खेती के जरिए जीवनयापन करने के लिए दी गई थीं, लेकिन कृषकों के साथ धोखाधड़ी कर उनकी जमीन हड़प ली गई है.

अपनी शिकायत के साथ कंवर ने सिलसिलेवार पूरा ब्यौरा दिया है. उन्होंने बताया कि जैनम एग्रो फायनेंस के गोपाल पिता रामचंद्र सोनकर के पास मोहन, रामसिंह की जमीन है. भूपेंद्र कुमार पिता शारदा प्रसाद सोनकर के पास जिन्नतबी छोटे मियां की जमीन है. महेश पिता सोनू राम सोनकर ने हेमंत पिता राजाराम, मनोहर पिता विरुमल, भारत, विष्णु, सरुप, रामाधार की जमीन को अपने नाम कर लिया है. अनिल पिता आरसी ने तुलसी, नंदकुमार और शिवकुमार की जमीन अपने नाम कर ली है. वसुंधरा आयुवैर्दिक अनुसंधान केंद्र प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक राजू पिता शिवमूरत ने मेहतरू, सुखचंद, गिरधर, सिलउ, गोवर्धन, जगतपाल, डेरहा, कन्हैया, दुखवा और सुखऊ की जमीन अपने नाम चढ़ा ली है.

कंवर का कहना है कि गोपाल सोनकर, भूपेंद्र सोनकर, महेंद्र सोनकर और अनिल सोनकर सभी पंकज लाहोटी के खास लोग है. कंवर का आरोप है कि ग्राम कोपेडीह की पटवारी हल्का नंबर सात की जमीन वॉलफोर्ट सिटी को कंपनी टू कंपनी ट्रांसफर की गई है. ऐसा कर शासन को राजस्व की क्षति पहुंचाई गई है. कंवर ने जमीन का जो-जो हिस्सा वॉलफोर्ट सिटी को स्थानांतरित किया गया है उसका ब्यौरा भी सौंपा है. कंवर का कहन है कि यह अरबों रुपए का जमीन घोटाला है. अगर सूक्ष्मता से जांच की जाएगी तो कई चेहरे बेनकाब होंगे. वैसे सूत्रों का कहना है कि वॉलफोर्ट सिटी के निर्माण में भारतीय पुलिस सेवा के एक विवादास्पद पुलिस अफसर की भी बड़ी भूमिका है. प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तब इस पुलिस अफसर ने अवैध धंधों में लिप्त कई लोगों को संरक्षण दे रखा था. सूत्रों का कहना है कि वॉलफोर्ट सिटी के  निर्माण में दूसरा महत्वपूर्ण शख्स वह है जो कई तरह के गोरखधंधों में लिप्त पुलिस अफसर के लिए वसूली का काम किया करता था. बताते हैं कि अफसर जिन लोगों को अपने जाल में फंसाता था उनसे अस्पताल के लिए अनुदान मांगता था. बेगुनाह और मजबूर लोगों से वसूली का काम वॉलफोर्ट सिटी से जुड़ा शख्स ही किया करता था. बहरहाल अरबों के इस जमीन घोटाले की शिकायत शुक्रवार को मुख्यमंत्री तक पहुंच गई है. इस मामले में अभी और कई सनसनीखेज खुलासे होने बाकी है.

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लोग पूछ रहे हैं सवाल... जबरदस्त ढंग से वायरल हो रही है रमन सिंह की दो तस्वीर

रायपुर. छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह की दो तस्वीर सोशल मीडिया में जमकर वायरल हो रही है. यह तस्वीर 22 जून को भाजपा की ओर से दिए गए धरने से संबंधित है. एक तस्वीर में भाजपा के दिग्गज नेता बृजमोहन अग्रवाल और अन्य नेताओं के साथ रमन सिंह बैठे हुए हैं.सोशल मीडिया में पूछा जा रहा है कि भाई आप लोग इतने उदास क्यों हो.क्या इसलिए उदास हो कि धरना-प्रदर्शन करने की आदत नहीं है. बूढ़ा तालाब स्थित धरना स्थल को लेकर एक टिप्पणीकार ने लिखा है- ये बूढ़ा तालाब भी गजब की जगह है. जो लोग कभी बूढ़ा तालाब के पास धरना देने वालों की नहीं सुनते थे वही बूढ़ा तालाब उन्हें अपनी ओर खींच लाया. इसे कहते हैं प्रकृति का न्याय.

दूसरी तस्वीर में रमन सिंह भाषण दे रहे हैं और ब्लैककेट कमांडों उनके आसपास खड़े हैं. अब धरने के दौरान उनका भाषण ओजस्वी था या नहीं यह तो नहीं मालूम... लेकिन इस तस्वीर को लेकर भी यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि ब्लैककेट कमांडों उनके साथ क्या कर रहे हैं. क्या ब्लैककेट कमांडो को धरना स्थल पर मौजूद रहना चाहिए. मजे की बात यह है कि धरना स्थल पर जनता को संबोधित करने गए रमन सिंह को ब्लैक कैट कमांडो ने भाषण के दौरान ऐसे घेर लिया था जैसे कोई सरकारी कार्यक्रम हो. लोग पूछ रहे हैं कि आखिरकार छत्तीसगढ़ की मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा रमन सिंह की सुरक्षा में जबरन बरबाद क्यों किया जा रहा है. गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री की एक तस्वीर तब भी वायरल हुई थी जब चुनाव हारने के बाद वे राजनांदगांव के एक पुल पर अकेले नजर आए थे. तब भी सोशल मीडिया में लोगों ने कहा था कि डाक्टर साहब... अगर सुपर सीएम और वर्दी वाले गुंडे से बचकर जनता की सेवा में लगे रहते तो सबके साथ... सबका विकास का नारा सार्थक हो जाता और अकेले घूमने की नौबत नहीं आती. एक पाठक ने धरने में जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की गैर-मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए हैं. पाठक का कहना है कि जिस धरने में पूर्व मुख्यमंत्री का बेटा जो पूर्व सांसद भी है जब वह ही उपस्थित नहीं था तो फिर जनता की बात छोड़िए.

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