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सोया मिल्क, बिस्किट और केटलफिड की खरीदी में करोड़ों का वारा-न्यारा

नियंत्रक महालेखा परीक्षक की आपत्तियों को दरकिनार कर बीज निगम ने की करोड़ों की खरीदी

रायपुर. भाजपा के शासनकाल में एक से बढ़कर एक कारनामे होते रहे हैं और इन कारनामों को अंजाम देने वाले लोग अब भी खामोश नहीं बैठे हैं. पिछले शासनकाल में सोया मिल्क, बिस्कुट और केटलफिड की बिक्री के नाम पर करोड़ों की चपत लगाने वाले मनीष शाह को लोग भूले नहीं है. मनीष शाह वहीं है जिन्होंने पिछली सरकार में बच्चों के कुपोषण को दूर करने के लिए सरकार को सोया मिल्क बांटने का प्रस्ताव दिया था. सरकार की रजामंदी के बाद शाह ने केंद्रीय और राज्य स्तरीय प्रयोगशाला से जांच करवाए बगैर बच्चों को दूध का पैकेट वितरित कर दिया था. कई स्कूलों में जब बच्चे बीमार पड़ने लगे तब थोड़े समय के लिए पैकेट के वितरण में रोक लगाई गई. शाह इन दिनों फिर से सक्रिय है.मंत्रालय के कई आला-अफसरों के कक्ष में उनकी आमद देखी जा सकती है.

रमन सिंह की सरकार में बीज निगम ने जन निजी भागीदारी ( पीपीपी मोड ) के तहत सोया बिस्कुट, सोया मिल्क और केटलफिड की खरीदी की थी. इसके लिए शाह की कंपनियों से अनुबंध किया गया था. इन चीजों की खरीदी के लिए सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य शर्त यह थीं कि कंपनी को अपनी  ईकाई छत्तीसगढ़ में स्थापित करनी होगी और प्रदेश के किसानों या बाजार से कच्चे माल की खरीददारी करनी होगी. अनुबंध में इस शर्त को रखे जाने के पीछे का मकसद यह था कि स्थानीय बाजार और किसान दोनों को मजबूती मिलेगी.

नहीं स्थापित हुई ईकाई

बीज निगम के अधिकारियों ने यह जांचे-परखे कि किसी तरह की कोई ईकाई स्थापित की है या नहीं...शाह को करोड़ों का काम सौंप दिया.जाहिर सी बात है कि जब ईकाई स्थापित नहीं हुई हो तो स्थानीय बाजार और किसानों से खरीददारी भी नहीं हुई होगी. ऐसा ही हुआ. शाह ने सोया मिल्क के लिए कच्चा सामान पड़ोसी राज्यों से खरीदा और स्कूल शिक्षा विभाग तथा महिला बाल विकास विभाग की ओर से संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों में इसकी जमकर सप्लाई की. शाह ने पशु आहार के लिए भी किसी तरह की कोई ईकाई स्थापित नहीं की और गौशालाओं में पशु आहार पहुंचाया जाता रहा. बिस्कुट की ट्रेडिंग नागपुर के सुंदर इंडस्ट्रीज से की गई और स्कूल तथा आंगनबाड़ी केंद्रों में वितरण होता रहा.

महालेखाकार ने जताई आपत्ति

एक शिकायत के बाद महालेखाकार ( कैग ) ने 31 मई 2015 को आपत्ति जताते हुए बीज निगम को नियमों के खिलाफ की जा रही खरीदी और भुगतान पर रोक लगाने को कहा. निगम ने कैग की तमाम आपत्तियों को उस दौरान रद्दी की टोकरी में डाल दिया और बड़े पैमाने पर खरीदी और भुगतान का खेल जारी रखा. वर्ष 2015 से वर्ष 2018 तक यह क्रम जारी रहा. वर्ष 2018 में कैग ने एक बार फिर बीज निगम को खरीदी और पर रोक लगाने को कहा तब बीज निगम ने 11 जनवरी 2019 को खानापूर्ति करते मनीष शाह को एक पत्र लिखा और कहा कि वे जल्द से जल्द प्लांट स्थापित कर लें. अब तक न तो प्लांट लगा है और न ही स्थानीय स्तर पर कच्चे माल की खरीदी होती है. सारा कुछ बाहर से नियंत्रित होता है. अधिकारियों की सांठगांठ से शासन को चूना लगाने का खेल अब भी निर्बाध गति से चल रहा है. नियमानुसार स्कूलों में सोया मिल्क और बिस्कुट की सप्लाई के लिए विधि विभाग से अनुमति ली जानी थीं. खबर है कि मनीष शाह को उपकृत करने के लिए विधि विभाग से अनुमति लेना भी अनिवार्य नहीं समझा गया.

अब राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में काम हथियाने की जुगत

खबर है कि प्रदेश के एक प्रमुख अफसर से सांठगांठ होने की वजह से मनीष शाह ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में भी काम हथियाने की जुगड़ बिठा ली है. मंत्रालय में पदस्थ एक अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सामान्य तौर पर किसी भी निजी व्यक्ति को सरकारी बैठकों में उपस्थित रहने की अनुमति नहीं रहती, लेकिन मनीष शाह प्रमुख अफसर से करीबी होने  का रौब दिखाते हुए हर बैठक में मौजूद रहता है. सूत्र बताते हैं कि शाह के करीबी अफसर ने पिछले दिनों राष्ट्रीय विकास योजना भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा है. मनीष शाह को कौन सा काम दिया जाना उचित होगा इसका खाका भी अफसर ने अपने कमरे में बनाया है. खबर है कि शाह... भारत सरकार और राज्य सरकार के अंश से फूड प्रोसेसिंग का कोई प्रोजेक्ट लांच करना चाहता हैं. शाह को यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि नई सरकार का जोर खेती-किसानी पर केंद्रित है सो प्रोजेक्ट भी कुछ उसी ढंग का तैयार किया गया है. एक और प्रोजेक्ट यूनिर्विसटी से संबंधित है. 

 

 

 

 

 

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अकेले राजनांदगांव जिले की विकास यात्रा में फूंके गए 12 करोड़

रायपुर. छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार रहने के दौरान कभी सुराज यात्रा निकाली जाती थीं तो कभी विकास यात्रा. पिछले साल वर्ष 2018 में ठीक चुनाव से पहले डाक्टर रमन सिंह की सरकार ने कामकाज को प्रदर्शित करने के लिए विकास यात्रा निकाली थीं. अलग-अलग जिलों में निकाली इस यात्रा में अरबों रुपए फूंके जाने का अनुमान है.अकेले राजनांदगांव जिले में जो यात्रा निकाली गई उस पर सरकार के विभिन्न विभागों ने 12 करोड़ पांच लाख, दो हजार तीन सौ बत्तीस रुपए का व्यय दर्शाया है.

डोंगरगांव के विधायक दलेश्वर सिंह ने इस बार मानसून सत्र में एक प्रश्न के जरिए यह जानना चाहा था कि राजनांदगांव जिले में वर्ष 2018-19 में जो विकास यात्रा निकाली गई थीं उस पर कुल कितना खर्च हुआ है. जवाब में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बताया है कि कुल 12 करोड़ पांच लाख दो हजार तीन सौ बत्तीस रुपए जनरेटर एवं फ्लैक्स, प्रमाण पत्र वितरण, पाम्पलेट सहित अन्य मद में खर्च किए गए . विकास यात्रा में इस राशि का व्यय जिला पंचायत कार्यालय, अंत्यावसायी सहकारी विकास समिति, श्रम पदाधिकारी, खैरागढ़- डोंगरगढ़- राजनांदगांव के कार्यपालन अभियंता, लोक निर्माण विभाग और जनपद पंचायत के नाम पर दर्शाया गया है.

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जो अंडा खाना चाहता है उसे खाने दो... अंडे के समर्थन में उतरे जनसंगठन

रायपुर. छत्तीसगढ़ के स्कूलों में अंडा वितरण किए जाने को लेकर जबरदस्त नौटंकी चल रही है. धर्म-कर्म और आस्था का हवाला देकर कतिपय संगठन विरोध जता रहे हैं तो एक बड़ी आबादी बच्चों को अंडा दिए जाने के पक्ष में है. अब तक अंडा वितरण के खिलाफ ही ज्ञापन दिए जाने का समाचार देखने- सुनने को मिल रहा था, लेकिन इधर पहली बार गुरुवार को  प्रगतिशील जनसंगठनों ने कलक्टर को ज्ञापन सौंपकर सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में अंडा देने की मांग मुख्यमंत्री से की है.

क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच के महासचिव् तुहिन,अखिल भारतीय क्रांतिकारी विद्यार्थी संगठन के अध्यक्ष विनय, दलित मुक्ति मोर्चा छत्तीसगढ़ के सलाहकार गोल्डी जार्ज, भोजन का अधिकार अभियान से जुड़ी संगीता, गुरु घासीदास सेवादार संघ के रायपुर जिला संयोजक केशव सतनाम, एससीएसटीओबीसी अल्पसंख्यक संयुक्त मोर्चा छत्तीसगढ़ के संयोजक अधिवक्ता रामकृष्ण जांगड़े, अधिवक्ता शिवप्रसाद डहरिया, क्रांतिकारी नौजवान भारत सभा के गौतम गणपत तथा लोक समता समिति के सुरेश कुमार ने गुरुवार को रायपुर के कलक्टर एस भारतीदासन को ज्ञापन सौंपकर सरकारी स्कूलों एवं आंगनबाड़ी केंद्रों में हफ्ते में पांच दिन अंडा देने की मांग की.

ज्ञापन सौंपने के बाद इन सदस्यों ने मीडिया से चर्चा में कहा कि छत्तीसगढ़ में बच्चों में कुपोषण की स्थिति बेहद  गंभीर है. यहां 38 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार है. अनुसूचित जाति- जनजाति वर्ग के बच्चों में कुपोषण की दर लगभग 44 फीसदी है. एक सरकारी सर्वे भी कहता है कि छत्तीसगढ़ में 83 फीसदी लोग अंडा सेवन करते हैं. सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ियों में जाने वाले बच्चों में मांसाहार का प्रतिशत और भी अधिक है. अंडा उच्च कोटि का प्रोटीन है और एक सर्वोत्तम विकल्प है. जो लोग अंडे का सेवन नहीं करना चाहते उनके लिए सरकार ने अतिरिक्त शाकाहारी विकल्प का प्रावधान भी तय कर रखा है. सरकार अगर अंडे का वितरण करना चाहती है तो यह एक अच्छा कदम है. अंडा देकर बच्चों में कुपोषण की समस्या को कम किया जा सकता है.

जनसंगठनों से जुड़े लोगों ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि अंडे का विरोध करने वाले लोग बच्चों के कुपोषण को दूर किए जाने के बारे में चितिंत नहीं है. वे इसे धर्म-कर्म से जोड़कर देख रहे हैं. प्रगतिशील जनसंगठनों के सदस्यों ने कहा कि भोजन में शाकाहार और मांसाहार दोनों अनिवार्य है. आस्था या धार्मिकता के नाम पर लोगों के खानपान पर पाबंदी लगाने की मांग किसी भी स्तर पर जायज और प्रजातांत्रिक नहीं मानी जा सकती है. जनसंगठनों ने कहा कि अभी केवल ज्ञापन देकर बात समझाने की कवायद की जा रही है. अगर गरीब और कुपोषित बच्चों को अंडा देने की जबरिया खिलाफत की गई तो फिर सड़क की लड़ाई भी लड़ी जाएगी. 

क्यों दिया मछली और मुर्गीपालन को बढ़ावा ?

गुरुवार को विधानसभा में अंडा वितरण किए जाने को लेकर एक बार फिर विपक्ष ने हंगामा मचाया. विपक्ष के सदस्य बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि कई लोग अंडा वितरण का विरोध कर रहे हैं. सरकार को अपना फैसला वापस लेना चाहिए. उन्होंने सदन में इस विषय पर स्थगन प्रस्ताव के जरिए चर्चा करने की मांग की जिस पर सत्तापक्ष सहमत नहीं हुआ. सदन में सत्तापक्ष के सदस्यों ने कहा कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहां की सरकार भी स्कूलों में बच्चों को अंडा उपलब्ध करवा रही है तो फिर यहां क्या दिक्कत है. मंत्री कवासी लखमा ने कहा कि जब बृजमोहन अग्रवाल पशुधन मंत्री थे तब मछली पालन और मुर्गी पालन को बढ़ावा देने की बात करते थे, लेकिन अब विरोध कर रहे हैं. इस बीच विधायक बृहस्पति सिंह ने सदन में वर्ष 2014 के आदेश की प्रतियां लहराई. उन्होंने कहा कि जब भाजपा की सरकार थीं तब अंडा देने पर विचार किया गया था.

 

 

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सुधा भारद्वाज की रिहाई के लिए छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रदर्शन

रायपुर. देश की वरिष्ठ अधिवक्ता सुधा भारद्वाज की रिहाई के लिए सोमवार को छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन की अगुवाई में विभिन्न जनसंगठनों ने राजधानी रायपुर में एक दिवसीय धरना दिया. धरने में शामिल बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनकी निःशर्त रिहाई की मांग करते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम एक ज्ञापन सौंपा और हस्तक्षेप करने की मांग की.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि अधिवक्ता सुधा भारद्वाज गत चार दशकों से छत्तीसगढ़ के आदिवासी, मजदूर, किसान,  दलित, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं  के पक्ष में उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्षरत रही हैं. दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविधालय की प्रोफ़ेसर कृष्णा भारद्वाज की पुत्री सुधा भारद्वाज अपनी आईआईटी की पढ़ाई के बाद उच्च संस्थानों में कार्य कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने दल्लीराजहरा में मजदूरों के अधिकारों के लिए काम करने का निर्णय लिया और शंकर गुहा नियोगी के आदर्शों से प्रेरणा से लेकर मजदूर बस्ती में जीवन यापन करती रही.

छत्तीसगढ़ में  पिछले 15 सालों में जब अंधा-धुंध खनन व औद्योगिकरण के नाम पर किसानों से उनकी जमीनों को छीना गया. कार्पोरेट लूट को सरल बनाने  तमाम संवैधानिक अधिकारों, कानूनों और नियमों को दरकिनार किया गया तब एक सुधा भारद्वाज ही थी जिन्होंने कार्पोरेट लूट के खिलाफ आदिवासियों और किसानों के हित में उच्च न्यायालय में सैकड़ों मामलों में पैरवी की. बस्तर में माओवादी हिंसा के नाम पर राज्य प्रायोजित मुठभेड़ एवं महिलाओं पर लैंगिक हिंसा के मामलों को भी उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न्यायलय के समक्ष पूरी शिद्दत के साथ उठाया. कई मामलों में वे स्वयं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ओर से गठित जांच टीम का हिस्सा भी रही. प्रदेश में अल्पसंख्यकों और दलितों पर हुए हमलो के मामलो को भी उन्होंने प्रमुखता से उठाया और उन्हें न्यायालय तक ले गई. 

निश्चित तौर पर सुधा भारद्वाज जिस तरह से वंचित वर्ग की आवाज रही और विशेष रूप से कार्पोरेट लूट, दमन और सांप्रदायिक हमलों के खिलाफ संवैधानिक दायरों में रहकर लोकतांत्रिक तरीकों से न्याय व्यवस्था के माध्यम से लड़ रही थी वह भाजपा की केंद्र और राज्य सरकार के लिए चुनौती बन गईं थी. मोदी सरकार अपने खिलाफ उठने वाली प्रत्येक लोकतांत्रिक  आवाजों को कुचल देना चाहती हैं. वह हर उस आवाज को देशद्रोही करार देना चाहती हैं जो न्याय, अधिकार और शांति के पक्ष में खड़ी हैं. सरकार की यह मंशा साफ तौर पर भीमा कोरेगांव के केस में नज़र आती हैं और इसी कारण फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सुधा भारद्वाज को आरोपी बनाकर जेल भेज दिया गया.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि सुधा भारद्वाज ने छत्तीसगढ़ में जन अधिकारों के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया था. उनकी रिहाई के लिए भूपेश सरकार को सभी जरूरी हस्तक्षेप करते हुए न्यायोचित कदम उठाना चाहिए. यह रिहाई सिर्फ एक इंसान की रिहाई की मांग नहीं, बल्कि हम सब के मूल लोकतांत्रिक अधिकारों की रिहाई की मांग भी है.

 

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भाजपा सरकार ने कर्ज पर कर्ज लेकर बसाया अटल नगर

रायपुर. छत्तीसगढ़ में जब भाजपा की सरकार थीं तब हमर छत्तीसगढ़ नाम की एक योजना प्रारंभ की गई थी. इस योजना के तहत गांव के पंच-सरपंच और अन्य लोग नई राजधानी ( अब नया नाम अटल नगर )  को खास तौर पर देखने के लिए आया करते थे. तब सरकार के अफसर ग्रामीणों को जानकारी देते थे- देखिए... कांग्रेसी तो नई राजधानी बना नहीं पाए... मगर हमारे मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के साहस और पराक्रम से एक भव्य राजधानी आपके सामने है. अगर हिम्मत हो तो इंसान क्या नहीं कर सकता. अफसरों की बात सुनकर ग्रामीण ताली पीटते और फिर हमर छत्तीसगढ़ नामक योजना की टोपी पहनकर फोटो खिंचवाकर घर चले जाते थे. ( हालांकि इस फोटो सेशन का ठेका भी एक निजी फर्म को दिया गया था जिसका भुगतान करोड़ों में किया गया.)

नई राजधानी की चकाचौंध को देखकर लौटने वाले ग्रामीणों को शायद यह नहीं मालूम होगा कि यहां के भव्य इमारतों के निर्माण के लिए भाजपा सरकार के न्यू रायपुर डेव्हलपमेंट अथारिटी ( अब अटल नगर विकास प्राधिकरण ) ने ताबड़तोड़ कर्ज लिए थे. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के लिखित सवाल के जवाब में वन मंत्री मोहम्मद अकबर ने शुक्रवार को विधानसभा में यह जानकारी दी है कि प्राधिकरण ने किस-किस बैंक से कर्ज लिया था.

अटल नगर विकास प्राधिकरण ने भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2015-16 में 69.06, वर्ष 16-17 में 35.05, वर्ष 17-18 में 33.01 एवं 2018-19 के लिए 17.85 करोड़ का कर्ज लिया था. सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया वर्ष 2014-15 में 4.79, वर्ष 15-16 में 11.52, वर्ष 16-17 में 6.17, वर्ष 17-18 में 16.55 एवं 2018-19 के लिए 8.73 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था. प्राधिकरण ने यूनियन बैंक आफ इंडिया वर्ष 2016-17 में 116.07 एवं 2018-19 के लिए 26.13 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था. प्राधिकरण को कर्ज देने वालों बैंकों में यूनियन बैंक आफ इंडिया का नाम सबसे ऊपर है. इस बैंक ने कुल छह बार कर्ज दिया है जिसकी राशि करोड़ों में हैं. जबकि दूसरे क्रम में सेंट्रल बैंक आफ इंडिया है. इस बैंक ने प्राधिकरण को कुल पांच बार लोन दिया है. सेंट्रल बैंक ने 150 करोड़ रुपए की बड़ी रकम वर्ष 2013-14 में जारी की थी. लगभग पांच बार यूनियन बैंक आफ इंडिया ने भी कर्ज दिया है. इस बैंक ने वर्ष 2011-12 में 70 करोड़, वर्ष 12-13 के लिए 271.50 करोड़, वर्ष 2014-15 के लिए 235 करोड़ एवं वर्ष 2015-2016 के लिए 435 करोड़ रुपए की राशि जारी की थीं. प्राधिकरण को कर्ज देने वालों में पंजाब नेशनल बैंक, हुडको और इलाहाबाद बैंक का नाम भी शामिल है.

 

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सीएम भूपेश की माता बिंदेश्वरी बघेल का निधन, रामकृष्ण अस्पताल में ली अंतिम सांसें

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मां बिंदेश्वरी बघेल का रविवार की शाम निधन हो गया है. वे पिछले एक पखवाड़े रामकृष्ण अस्पताल में भर्ती थीं. ब्रेन के निचले हिस्से का संवेदना तंत्र प्रभावित होने की वजह से उन्हें अस्पताल में दाखिल किया था. हालांकि बीच में महज एक-दो बार चिकित्सकों ने उनके स्वास्थ्य में आंशिक सुधार होना बताया था, लेकिन उन्हें वेंटिलेटर में ही रखा गया था. दिल्ली से चिकित्सकों की विशेष टीम भी उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर रही थीं. अपनी मां के स्वास्थ्य को लेकर चितिंत भूपेश बघेल बगैर प्रायः हर रोज नियमित रुप से अस्पताल में मौजूद रहते थे. रविवार को भी जिस वक्त बिंदेश्वरी बघेल ने अंतिम सांसे ली उस वक्त बघेल अस्पताल में ही मौजूद थे. निधन की खबर सुनने के बाद सरकार के मंत्री, कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारियों और प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं के रायपुर पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है. कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख शैलेश नितिन त्रिवेदी ने बताया कि फिलहाल बिदेंश्वरी बघेल जी की पार्थिव देह को अस्पताल से भिलाई-3  निवास ले जाया गया है जहां उनके पार्थिव देह को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा. अंतिम यात्रा आठ अगस्त को सुबह 11 बजे निज निवास से भिलाई-3 मुक्तिधाम के लिए निकलेंगी. अंतिम संस्कार उम्दा रोड़ स्थित मुक्तिधाम में होगा.

श्रीमती बिंदेश्वरी  बघेल  के निधन  पर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, विधानसभा अध्यक्ष  डॉ चरण दास महंत सहित कई नेताओं ने गहन शोक जताया है. अपने शोक संदेश में डॉ. महंत ने ईश्वर से दिवंगत  आत्मा को शांति प्रदान करने और शोक संतप्त  परिवार को अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की है.उन्होंने कहा कि दुःख के इस समय में वे और उनका पूरा  परिवार शोक संतप्त परिवार के साथ है. कोरबा सांसद ज्योत्सना चरणदास मंहत ने श्रीमती बिंदेश्वरी देवी के निधन को अपनी निजी क्षति बताया. उन्होंने अपने शोक संदेश में कहा कि श्रीमती बिंदेश्वरी देवी साक्षात ममता की प्रतिमूर्ति थीं. आज छत्तीसगढ़ प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के पश्चात मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जिस तत्परता के साथ किसानों को उन्नत करने, कर्ज से मुक्ति दिलाने, गांवों में गौठान का निर्माण सहित विकास का जो काम कर रहे थे उसकी प्रेरणा निश्चित रुप से उन्हें अपनी मां से ही मिलती थीं.स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव, नगरीय निकाय मंत्री शिव डहरिया और राजस्व मंत्री जयसिंहअग्रवाल ने भी शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदना प्रकट की है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक शुक्ला, नंद कश्यप,रमा कांत बंजारे, डा.लाखन सिंह ने कहा है कि छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन सहित अन्य सामाजिक संगठन इस शोक में शरीक है.इधर श्रीमती बिंदेश्वरी बघेल का पार्थिव देह रामकृष्ण अस्पताल से भिलाई-3 ले जाया गया है. आठ जुलाई को मुक्ति धाम उम्दा रोड भिलाई तीन में दोपहर 12 बजे उनका अंतिम संस्कार होगा. मुख्यमंत्री को मातृशोक की वजह से 8 जुलाई को पूर्व से प्रस्तावित प्रदेश व्यापी आंदोलन स्थगित कर दिया गया है.

कई राष्ट्रीय नेताओं ने जताया शोक

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की माता जी के निधन पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह,  राहुल गांधी, मोतीलाल वोरा, मुकुल वासनिक, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ, राजबब्बर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मोहसिना किदवई, भाजपा के वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, प्रेमप्रकाश पांडे ने भी शोक जताया है. अंतिम संस्कार में कई राष्ट्रीय नेताओं के शामिल होने की भी खबर है. 

 

 

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महज एक तारीख 17 जनवरी 2012 को वॉलफोर्ट सिटी वालों ने खेला लंबा खेल

रायपुर. जमीन के नामांतरण का काम बेहद जटिल और कठिन होता है.अब भी हर रोज सैकड़ों लोग नामांतरण के लिए भटकते रहते हैं, लेकिन वॉलफोर्ट सिटी का निर्माण करने वाले रसूखदारों के लिए यह काम बेहद मामूली था. सूत्रों का कहना है कि वॉलफोर्ट सिटी से जुड़े एक शख्स ने खुद को भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा का रिश्तेदार बताकर लंबा खेल खेला है. बताते हैं इस शख्स ने अपने कामकाज को आसान बनाने के लिए डाक्टर रमन सिंह की सरकार के एक मंत्री को भी अपना राजदार बना रखा था. भाजपा के पूर्व गृहमंत्री और वरिष्ठ नेता ननकीराम कंवर ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जो शिकायत भेजी है उसमें उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि जिन किसानों को सरकार ने खेती-बाड़ी के लिए सरकारी जमीन आवंटित की थीं उनकी जमीन अवैध ढंग से हथिया ली गई है. अपनी शिकायत में कंवर ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि महज एक तारीख 17 जनवरी 2012 को कई हेक्टयर जमीन जो दूसरों के नाम थीं उसका नामांतरण वॉलफोर्ट के नाम कर दिया गया. ईश्वर रिजतेश नाम के शख्स से जैनम ने अलग-अलग खसरा नंबर की कई हेक्टयर जमीन खरीदी थी जो 17 जनवरी 2012 को वॉलफोर्ट के नाम चढ़ गई. जैनम ने कृषक मनीराम, मंशा, महेश, दसरू, आनंदराम, होरी, रामचंद, अलालू, सगुन, मोतीराम, ईशान और बिसेलाल से भी जमीन ली थीं जिसे उक्त तिथि को वॉलफोर्ट के नाम कर दिया गया.

कंवर का आरोप है कि रायपुर निवासी पंकज लाहोटी ने जमीन के खेल में गोपाल, रामचंद सोनकर, राजीव और शिवमूरत जैसे लोगों का सहयोग लिया. इस खेल में राजस्व अधिकारी घनश्याम शर्मा और पटवारी सनत पटेल मिले हुए थे. पाटन तहसील के अमलेश्वर के पास ग्राम महुदा के पटवारी हल्का नंबर 7 की जिस 38 एकड़ भूमि को हथियाया गया है उसका बाजार मूल्य ही एक अरब 14 करोड़ रुपए के आसपास है. अव्वल तो सरकारी पट्टे की जमीन की न तो बिक्री हो सकती थीं और न ही उसका हस्तांतरण हो सकता था. यहां तक भूमि के मूल स्वरुप में भी परिवर्तन नहीं किया जा सकता था. राजस्व प्रावधानों के अनुसार अगर पट्टे की भूमि पड़त हो भी वह शासन की मानी जाती है और इस तरह की किसी भी भूमि को लेने के लिए कलेक्टर की अनुज्ञा अनिवार्य होती है, लेकिन यहां किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया.

चौका सकती जांच

पूर्व गृहमंत्री की शिकायत के बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पूरे मामले में जांच के आदेश दे दिए हैं. कहा जा रहा है कि अगर सचमुच गंभीरता और सूक्ष्मता से जांच होगी तो कई चौकाने वाले तथ्य सामने आएंगे. जमीन के कारोबार से जुड़े लोगों शनिवार को अपना मोर्चा डॉट कॉम को चर्चा में बताया कि अगर सरकार ने इस जांच में रायपुर और अभनपुर तहसील में चल रहे वॉलफोर्ट के प्रोजेक्ट को भी शामिल कर लिया तो अरबों-खरबों का घोटाला उजागर होगा और कई सपेदपोश चेहरे बेनकाब हो जाएंगे. बताया जाता है कि इस खेल का मुख्य किरदार एक ऐसा व्यापारी है जो मध्य प्रदेश का निवासी है और सालों से छत्तीसगढ़ में काम कर रहा है. पहले यह व्यापारी शेयर का धंधा किया करता था. अब इसके पास स्पंज आयरन संयंत्र के अलावा कोलवाशरी भी है. इस व्यापारी ने ईओडब्लू के पूर्व चीफ के साथ अच्छी- खासी मित्रता कायम कर रखी थीं. सूत्रों का कहना है कि कई बार यह व्यापारी ईओडब्लू चीफ के लिए वसूली का काम भी करता था. व्यापारी के साथ सदर बाजार में सोने-चांदी का कारोबार करने वाले एक अन्य शख्स का नाम भी सामने आ रहा है. ननकीराम कंवर ने जिस पंकज लाहोटी का जिक्र किया है उसे महज मोहरा बताया जा रहा है. शिकायत में जिस गोपाल सोनकर का जिक्र हुआ है वह वॉलफोर्ट सिटी में ही निवास करता है. नब्बे फीसदी जमीनों का लेन-देन इसी शख्स ने किया है. व्यापारी का नाम विस्फोटक सप्लाई से भी जुड़ा हुआ है. सूत्रों का कहना है कि प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थी तब विस्फोटक से भरा एक ट्रक बस्तर में गायब हो गया था. बाद में ट्रक तो मिल गया, लेकिन विस्फोटक नहीं मिला. ट्रक से विस्फोटक पदार्थ के गायब होने का मामला अखबारों की सुर्खियां बना. मामले में एक छोटी सी जांच प्रारंभ हुई लेकिन फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में चला गया. आज तक यह पता नहीं चल पाया है कि आखिर विस्फोटक कहां गया.

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वॉलफोर्ट सिटी बनाने वालों ने किया अरबों का जमीन घोटाला ?

रायपुर. अगर कभी आप रायपुर आए तो रायपुर से भिलाई जाने वाले मार्ग पर आपको एक चमकदार कालोनी नजर आएगी. इस चमकदार कालोनी को देखकर आप चौंक सकते हैं और यह सोचने के लिए मजबूर हो सकते हैं कि जिस राज्य की एक बड़ी आबादी हर रोज अपनी रोजी-रोटी के लिए जद्दोजहद करती है वहां के बांशिदें तीन से चार करोड़ रुपए में एक बंगला खरीदने की हैसियत रखते हैं.

जी हां... हम बात कर रहे हैं वॉलफोर्ट सिटी की. बताते हैं कि इस सिटी में एक बंगले की कीमत तीन से चार करोड़ रुपए हैं. छत्तीसगढ़ के पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने इसी वॉलफोर्ट सिटी के कर्ताधर्ताओं के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है. हालांकि यह अभियान भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह को छेड़ना था, लेकिन उनके शासनकाल में यह कालोनी पल्लवित और पुष्पित हुई थीं तो उनके हिस्से का काम पूर्व गृहमंत्री कंवर ने कर दिया.

कंवर ने पांच जुलाई 2019 को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सौंपी गई एक शिकायत में कहा है कि रायपुर निवासी पंकज लाहोटी ने गोपाल, रामचंद सोनकर, राजीव और शिवमूरत जैसे लोगों के सहयोग से राजस्व अधिकारी रहे घनश्याम शर्मा, पटवारी सनत पटेल से सांठगांठ कर ग्राम महुदा के पटवारी हल्का नंबर 7 अम्लेश्वर तहसील पाटन जिला दुर्ग की करीब 38 एकड़ भूमि जिसका वर्तमान बाजार मूल्य एक अरब 14 करोड़ रुपए है की हेराफेरी कर ली है. कंवर का कहना है कि उक्त जमीन भूमिहीन कृषकों को खेती के जरिए जीवनयापन करने के लिए दी गई थीं, लेकिन कृषकों के साथ धोखाधड़ी कर उनकी जमीन हड़प ली गई है.

अपनी शिकायत के साथ कंवर ने सिलसिलेवार पूरा ब्यौरा दिया है. उन्होंने बताया कि जैनम एग्रो फायनेंस के गोपाल पिता रामचंद्र सोनकर के पास मोहन, रामसिंह की जमीन है. भूपेंद्र कुमार पिता शारदा प्रसाद सोनकर के पास जिन्नतबी छोटे मियां की जमीन है. महेश पिता सोनू राम सोनकर ने हेमंत पिता राजाराम, मनोहर पिता विरुमल, भारत, विष्णु, सरुप, रामाधार की जमीन को अपने नाम कर लिया है. अनिल पिता आरसी ने तुलसी, नंदकुमार और शिवकुमार की जमीन अपने नाम कर ली है. वसुंधरा आयुवैर्दिक अनुसंधान केंद्र प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक राजू पिता शिवमूरत ने मेहतरू, सुखचंद, गिरधर, सिलउ, गोवर्धन, जगतपाल, डेरहा, कन्हैया, दुखवा और सुखऊ की जमीन अपने नाम चढ़ा ली है.

कंवर का कहना है कि गोपाल सोनकर, भूपेंद्र सोनकर, महेंद्र सोनकर और अनिल सोनकर सभी पंकज लाहोटी के खास लोग है. कंवर का आरोप है कि ग्राम कोपेडीह की पटवारी हल्का नंबर सात की जमीन वॉलफोर्ट सिटी को कंपनी टू कंपनी ट्रांसफर की गई है. ऐसा कर शासन को राजस्व की क्षति पहुंचाई गई है. कंवर ने जमीन का जो-जो हिस्सा वॉलफोर्ट सिटी को स्थानांतरित किया गया है उसका ब्यौरा भी सौंपा है. कंवर का कहन है कि यह अरबों रुपए का जमीन घोटाला है. अगर सूक्ष्मता से जांच की जाएगी तो कई चेहरे बेनकाब होंगे. वैसे सूत्रों का कहना है कि वॉलफोर्ट सिटी के निर्माण में भारतीय पुलिस सेवा के एक विवादास्पद पुलिस अफसर की भी बड़ी भूमिका है. प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तब इस पुलिस अफसर ने अवैध धंधों में लिप्त कई लोगों को संरक्षण दे रखा था. सूत्रों का कहना है कि वॉलफोर्ट सिटी के  निर्माण में दूसरा महत्वपूर्ण शख्स वह है जो कई तरह के गोरखधंधों में लिप्त पुलिस अफसर के लिए वसूली का काम किया करता था. बताते हैं कि अफसर जिन लोगों को अपने जाल में फंसाता था उनसे अस्पताल के लिए अनुदान मांगता था. बेगुनाह और मजबूर लोगों से वसूली का काम वॉलफोर्ट सिटी से जुड़ा शख्स ही किया करता था. बहरहाल अरबों के इस जमीन घोटाले की शिकायत शुक्रवार को मुख्यमंत्री तक पहुंच गई है. इस मामले में अभी और कई सनसनीखेज खुलासे होने बाकी है.

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लोग पूछ रहे हैं सवाल... जबरदस्त ढंग से वायरल हो रही है रमन सिंह की दो तस्वीर

रायपुर. छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह की दो तस्वीर सोशल मीडिया में जमकर वायरल हो रही है. यह तस्वीर 22 जून को भाजपा की ओर से दिए गए धरने से संबंधित है. एक तस्वीर में भाजपा के दिग्गज नेता बृजमोहन अग्रवाल और अन्य नेताओं के साथ रमन सिंह बैठे हुए हैं.सोशल मीडिया में पूछा जा रहा है कि भाई आप लोग इतने उदास क्यों हो.क्या इसलिए उदास हो कि धरना-प्रदर्शन करने की आदत नहीं है. बूढ़ा तालाब स्थित धरना स्थल को लेकर एक टिप्पणीकार ने लिखा है- ये बूढ़ा तालाब भी गजब की जगह है. जो लोग कभी बूढ़ा तालाब के पास धरना देने वालों की नहीं सुनते थे वही बूढ़ा तालाब उन्हें अपनी ओर खींच लाया. इसे कहते हैं प्रकृति का न्याय.

दूसरी तस्वीर में रमन सिंह भाषण दे रहे हैं और ब्लैककेट कमांडों उनके आसपास खड़े हैं. अब धरने के दौरान उनका भाषण ओजस्वी था या नहीं यह तो नहीं मालूम... लेकिन इस तस्वीर को लेकर भी यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि ब्लैककेट कमांडों उनके साथ क्या कर रहे हैं. क्या ब्लैककेट कमांडो को धरना स्थल पर मौजूद रहना चाहिए. मजे की बात यह है कि धरना स्थल पर जनता को संबोधित करने गए रमन सिंह को ब्लैक कैट कमांडो ने भाषण के दौरान ऐसे घेर लिया था जैसे कोई सरकारी कार्यक्रम हो. लोग पूछ रहे हैं कि आखिरकार छत्तीसगढ़ की मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा रमन सिंह की सुरक्षा में जबरन बरबाद क्यों किया जा रहा है. गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री की एक तस्वीर तब भी वायरल हुई थी जब चुनाव हारने के बाद वे राजनांदगांव के एक पुल पर अकेले नजर आए थे. तब भी सोशल मीडिया में लोगों ने कहा था कि डाक्टर साहब... अगर सुपर सीएम और वर्दी वाले गुंडे से बचकर जनता की सेवा में लगे रहते तो सबके साथ... सबका विकास का नारा सार्थक हो जाता और अकेले घूमने की नौबत नहीं आती. एक पाठक ने धरने में जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की गैर-मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए हैं. पाठक का कहना है कि जिस धरने में पूर्व मुख्यमंत्री का बेटा जो पूर्व सांसद भी है जब वह ही उपस्थित नहीं था तो फिर जनता की बात छोड़िए.

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क्या बस्तर के ईसाई नक्सली है

बस्तर में ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों पर हमले तेज होते जा रहे हैं. जब कभी ईसाई धर्मावलंबी अपनी शिकायत लेकर थाने जाते हैं तो उन्हें नक्सली बोलकर डराया जाता है. पुलिस कहती है- ज्यादा तीन-पांच करोगे तो नक्सली बनाकर अंदर कर देंगे.

रायपुर. छत्तीसगढ़ में ईसाई समुदाय को प्रताड़ित किए जाने के मामले में एक बार फिर इजाफा हो रहा है. हालांकि प्रताड़ना की सबसे अधिक घटनाएं भाजपा के शासनकाल में हुई थी,लेकिन घटना को अंजाम देने वाले तत्व अब भी अलग-अलग ढंग से हमले कर रहे हैं.

अभी हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ क्रिश्यन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल और महासचिव अंकुश बेरियेकर ने बस्तर इलाके का दौरा कर इस खौफनाक सच को उजागर किया. फोरम के जिम्मेदार पदाधिकारियों ने बताया कि इसी साल 23 मई 2019 को सुकमा जिले के ग्राम बोडिगुडडा में बोडडी कन्ना, पदाम कोना, बोड्डी बाजार, बोड्डी लच्छा, सरियम, देशा, दुल्ला और उनके साथियों ने करम्मू पूरम, देशा पंडा, सुब्बा और हिरमा सरियम के घरों में बलात प्रवेश किया और अनाज तथा अन्य घरेलू समान को लूट लिया. महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की और साड़ी पकड़कर खींचा. गाली-गलौच करते हुए जान से मारने की धमकी दी. हमले के दौरान आक्रामणकारी साफ-साफ कह रहे थे कि अगर गांव के लोग मसीह धर्म को मानना नहीं छोड़ेंगे तो उन्हें जान से हाथ धोना पड़ेगा.

अरुण पन्नालाल और अंकुश बेरियेकर ने बताया कि जब  इस मामले की शिकायत वहां के पास्टर फिलिप ने थाने जाकर की तो थानेदार ने शिकायत लेने से इंकार कर दिया और कहा कि चाहे कुछ भी हो जाय... एफआईआर दर्ज नहीं करूंगा. थानेदार ने घटना स्थल पर जाकर निरीक्षण करने से भी इंकार कर दिया और आदिवासी ग्रामीणों की सहायता के लिए  फोर्स भी नहीं भेजी. पुलिस का संरक्षण मिलने से हमलावरों ने दूसरे दिन यानी 24 मई को भी दोबारा घटना को अंजाम दिया. इसी साल 25 मई को मसीही समाज से जुड़े लोगों ने सुकमा कलक्टर को ज्ञापन सौंपकर जान-ओ-माल की सुरक्षा की गुहार लगाई. अरुण पन्नालाल ने बताया उन्होंने छत्तीसगढ़ क्रिश्यन फोरम के बैनर तले एक प्रतिनिधि मंडल के साथ स्वयं पुलिस अधीक्षक को एफआईआर दर्ज करने का ज्ञापन सौंपकर निवेदन किया लेकिन पुलिस अधीक्षक ने भी किसी तरह की कोई सहायता नहीं की.

पन्नालाल और बेरियेकर ने बताया कि हर कोई अपने-अपने धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र है. सुकमा जिले में गत तीन सालों में ईसाई धर्मावलंबियों पर हमले की घटनाओं में लगातार इजाफा देखने को मिला है. इस घटना से पहले भी 19 नवम्बर 2017 और 8 फरवरी 2019 को हमलावरों ने गांव वालों को पीटा था. उन्होंने बताया कि जब कभी भी ईसाई धर्म को मानने वाले अपनी शिकायत लेकर थाने जाते हैं तो उन्हें नक्सली बोलकर डराया जाता है. पुलिस कहती है- ज्यादा तीन-पांच करोगे तो नक्सली बनाकर अंदर कर देंगे. पन्नालाल ने बताया कि अगर कभी पुलिस गांव में जाती है तो समझौते का खेल करती है. क्या बलात प्रवेश करने, महिलाओं से छेड़छाड़ करने और उनकी इज्जत से खेलने पर किसी तरह का समझौता हो सकती है, लेकिन सुकमा की पुलिस न्यायालय के काम में लगी रहती है. अगर अपराधी थाने से छूट जाएंगे तो फिर न्यायालय की आवश्यकता किसलिए है. अरुण पन्नालाल ने बताया कि बस्तर में कुछ दलाल किस्म के लोग सक्रिय है जो आदिवासियों की जिंदगी से खिलवाड़ करने में लगे रहते हैं. जब गांव में ईसाई धर्म को मानने-समझने वाले लोगों पर हमला होता है कुछ लोग समझौते के खेल में जुट जाते हैं. पुलिस भी ऐसे दलालों से मिली-भगत कर आदिवासियों को लूटने के खेल में लगी रहती है. दोरनापाल के थानेदार सत्येंद्र कुमार ने अपना मोर्चा डॉट कॉम से यह स्वीकारा कि कुछ लोग अक्सर समझौते के लिए थाने में आते रहते हैं. हालांकि थानेदार ने माना कि पुलिस का काम समझौता करवाना नहीं है, लेकिन कई बार दबाव के चलते यह काम भी करना होता है.

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भूपेश बघेल ने नहीं होने दिया एक और किरन्दुल गोलीकांड

राजकुमार सोनी

रायपुर. देश की राजधानी दिल्ली और हैदराबाद में पदस्थ दो अफसरों की दिली ख्वाहिश थीं कि बस्तर के किरन्दुल में आंदोलनरत आदिवासियों पर किसी भी तरह से गोली चालान हो जाए ताकि सरकार की धज्जियां उड़ाई जा सकें, लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सर्तकता ने ऐसा नहीं होने दिया.

जो लोग बस्तर के आंदोलन से जुड़े रहे हैं वे जानते हैं कि 31 मार्च 1978 में बैलाडीला इलाके में कार्यरत अशोका माइनिंग नाम की एक कंपनी ने ठेका समाप्त होने का बहाना कर लगभग चार हजार मजदूरों को छंटनी का नोटिस थमा दिया था. कंपनी की इस नोटिस के बाद जब मजदूर परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट गहराया तो उन्होंने आंदोलन प्रारंभ किया. यह आंदोलन कई दिनों तक चला और अततः 5 अप्रैल 1978 को पुलिस प्रशासन ने निहत्थे आदिवासियों पर गोलियां बरसाई. तब इस घटना में एक पुलिस जवान कोमल सिंह सहित कुल 10 मजदूर मारे गए थे. हालांकि मरने वाले मजदूरों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थीं.

इधर बस्तर के किरन्दुल में आयरन ओर डिपाजिट क्रमांक 13 के साथ-साथ अपने देवी-देवताओं के पहाड़ को बचाने के लिए जब आदिवासी लामबंद हुए तब दिल्ली में जा बसे एक अफसर और हैदराबाद में तैनात एक दूसरे अफसर ने आंदोलन को छिन्न-भिन्न करने की योजना पर मंथन किया था. अफसरों की दिली ख्वाहिश थी कि ऐन-केन-प्रकारेण आंदोलन टूट जाए, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया. सूत्र बताते हैं कि इस आंदोलन को कमजोर करने के लिए कुछ ऐसे तत्वों को भी सक्रिय किया गया था जो बिचौलिए की भूमिका अदा कर रहे थे. आंदोलन के दौरान दंतेवाड़ा में तैनात एक पुलिस अफसर को यह कहते हुए भी सुना गया किआंदोलन के पीछे नक्सलियों का दिमाग काम कर रहा है. वे बार-बार यही बात कह रहे थे कि आंदोलन से कैसे निपटा जाता है उन्हें मालूम है... आंदोलनकारियों से अच्छी तरह से निपटना आता है आदि-आदि. यहां यह बताना लाजिमी है कि बस्तर का माड़िया आदिवासी अन्य आदिवासियों से थोड़ा आक्रामक होता है. आंदोलन में शरीक ज्यादातर आदिवासी माड़िया ही थे, लेकिन पुलिस प्रशासन उस आक्रामकता को ध्यान में रखने के बजाय अपनी आक्रामकता को जाहिर करने में लगा हुआ था. जब इस बात की भनक पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी को लगी तो उन्होंने पूरे मामले में बेहद संतुलन के साथ सावधानी बरतने का निर्देश दिया और साफ-साफ कहा कि कुछ भी अप्रिय घटित नहीं होना चाहिए. दंतेवाड़ा के कलक्टर टोपेश्वर वर्मा भी पूरे समय हालात पर नजर रखे हुए थे. सिचुवेश्चन को संभालने में कांग्रेस के वरिष्ठ अरविंद नेताम, दीपक बैच, मोहन मरकाम और रेखचंद जैन सहित कुछ अन्य लोग भी सक्रिय थे, लेकिन कतिपय तत्व यह भी चाहते थे कि इलाके में हिंसा से अप्रिय स्थिति पैदा हो जाय.

रमन सरकार ने बेचा पहाड़

बस्तर के दंतेवाड़ा जिले के बैलाडीला में जिस डिपाजिट क्रमांक 13 को लेकर आदिवासी आंदोलन करने को मजबूर हुए वहां बेशकीमती आयरन ओर के साथ-साथ नंदराज ( देव )  और पित्तोड़रानी ( देवी ) का स्थान भी है. इस पहाड़ को उद्योगपति गौतम अडानी को सौंपने का फैसला डाक्टर रमन सिंह की सरकार के समय ही कर लिया गया था. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं- पहाड़ को सौंपने के लिए आसपास के 85 गांवों में से किसी भी एक गांव ने अपनी सहमति प्रदान नहीं की थीं बल्कि विरोध में सात प्रस्ताव दिए थे, लेकिन रमन सिंह की सरकार ने फर्जी ढंग से यह दर्शा दिया कि सभी गांवों ने सहमति दे दी है. शुक्ला कहते हैं- बघेल की सरकार ने पहले भी आदिवासियों की जमीन लौटाकर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया है सो उनसे अपेक्षा है कि वे पहाड़ को बचाने के लिए अनुबंध को निरस्त करने की दिशा में लगातार सक्रिय रहेंगे. शुक्ला का कहना है कि अगर कोई गलत जानकारी के आधार पर पर्यावरण व अन्य स्वीकृतियां हासिल कर लेता है तो राज्य सरकार को अनुबंध निरस्त करने के लिए कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है. सरकार को इस बात की भी जांच करनी चाहिए कि डिपाजिट 13 के लिए ग्राम सभाओं में फर्जी ढंग से प्रस्ताव बनाने के खेल में कौन-कौन लोग शामिल थे.  

वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम कहते हैं- वर्ष 1960 के आसपास जब बैलाडीला की खदानों को खोदने का काम प्रारंभ किया गया तब बाहर से आए हुए लोगों ने आदिवासी संस्कृति और सभ्यता को छिन्न-भिन्न करने का काम किया था. इसी वर्ष यह बात भी सामने आई थी कि बाहरी लोग आदिवासी बालाओं को अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं और वे उनकी संतानों को पालने के लिए मजबूर हैं. नेताम कहते हैं- सभ्यता और संस्कृति को विनाश करने की यह प्रवृति अब आदिवासियों के देवी-देवताओं के साथ-साथ उनके विश्वास को नष्ट करने तक आ पहुंची है. नेताम ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री को सारी बातों और चिंताओं से अवगत कराया है. उनकी चिंता में यह बात भी शामिल है कि हालात से निपटने में अक्षम फायरिंग जैसी सिचुश्वेशन पैदा करने वाले अफसरों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए.

 

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बसेगा या उजड़ेगा जिंदल का ऊर्जा नगर

रमेश अग्रवाल रायगढ़

महाजेनको को आबंटित गारे पेलमा सेक्टर में कोल ब्लॉक के माइनिंग क्षेत्र के अंदर जिदल पावर लिमिटेड तमनार का विशाल उर्जानगर भी आ रहा है. लगभग १५० एकड़ में बनी इस पाश कालोनी में ५५५ फ्लैट व बंगले हैं. इसके साथ ही सी.बी.एस.ई मान्यता प्राप्त शानदार सीनियर सेकेंडरी स्कूल भी इसी कालोनी में संचालित है जहां जिंदल के अधिकारियों और कर्मचारियों के बच्चे पढ़ते हैं. इसके अलावा इस पाश कालोनी में बड़े बड़े पार्क व मंदिर भी हैं.  

वर्ष २००६ में बने इस उर्जानगर के अस्तित्व पर अब सवाल उठने लगे हैं. यद्यपि महाजेनको ने जन सुनवाई के लिये तैयार की गई ई.आई.ए. रिपोर्ट में इसका जिक्र तक नहीं किया है, लेकिन ई.आई.ए. रिपोर्ट में माइनिंग क्षेत्र के दिये गये नक़्शे को गूगल अर्थ में बड़ा कर देखा जाए तो उर्जानगर साफ साफ दिखता है. ( देखें नक्शा  ) 

क्या लगभग १५० एकड़ में बनी इस पाश कालोनी को महाजेनको अधिग्रहण करेगा ? यदि करता है तो उसके लिए यह काम आसान नहीं होगा. ये कोई निरीह आदिवासी की जमीन–मकान नहीं है जिसे भूअर्जन से आसानी से लिया जा सकेगा. जिंदल जैसी बड़ी व ताकतवर कंपनी आसानी से इसे अपने हाथों से नहीं जाने देगी. चाहे इसके लिये उसे सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़े. कारण साफ है हजारों की संख्या में इस कालोनी में रहने वाले जिंदल की अधिकारी कर्मचारियों के लिए दूसरी कालोनी तमनार में जगह मिलना ही मुश्किल है. सवाल स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य का भी है.

दूसरी तरफ यदि महाजेनको उर्जानगर को छोड़ कर माइनिंग करता है तो उसे इसके लिए कम से कम २०० एकड़ जमीन  तो छोडनी ही पड़ेगी और इतने बड़े क्षेत्र से निकलने वाले लाखों टन कोयले से हाथ धोना पड़ेगा. जिसकी कीमत अरबों, खरबों में अनुमानित है.  

ताज्जुब की बात है कि जन सुनवाई के लिये ई.आई.ए. रिपोर्ट पर्यावरण विभाग के पास साल भर पहले से आ चुकी थी लेकिन उसने जिला प्रशासन को इस महत्वपूर्ण तथ्य से अवगत नहीं करवाया और आनन- फानन में जन सुनवाई की तिथि निर्धारित करवा ली. यदि रायगढ़ कलेक्टर के संज्ञान में यह बात आई होती तो शायद वे कंपनी से इस बारे में सवाल जरुर करते और हो सकता है माइनिंग प्लान दोबारा बनाने के लिए कहा जाता. बहरहाल उर्जानगर का भविष्य आने वाला समय ही तय करेगा.

विशेष- प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल के इस महत्वपूर्ण आलेख पर जिंदल के जनसंपर्क विभाग का कामकाज देख रहे सुयश शुक्ला ने मंगलवार 4 जून को अपना मोर्चा डॉट कॉम से दूरभाष पर चर्चा की. उनकी आपत्ति थी कि लेख में कोई भी बात सही ढंग से नहीं रखी गई है. हमने श्री शुक्ला से विस्तारपूर्वक उनका पक्ष रखने का आग्रह किया जिस पर वे सहमत नहीं हुए. उनका कहना था कि लेख को वेबसाइट या पोर्टल में जगह ही नहीं मिलनी चाहिए थीं. उन्होंने लेख को पोर्टल से हटाने का आग्रह किया. बहरहाल अब भी श्री शुक्ला इस लेख पर जिंदल कंपनी का कोई पक्ष रखना चाहते हैं तो उसे जस का तस प्रकाशित कर दिया जाएगा. इधर सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने अपने आलेख में जो सवाल उठाए हैं वह पूरी तरह से सही है. अग्रवाल ने बताया कि माइनिंग क्षेत्र में पाश कालोनी बना ली गई है. अब जबकि खदान किसी दूसरे के पास चली गई है तब खनन कैसे संभव होगा.

 

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यह तस्वीर बदलापुर की नहीं... रायपुर की है

राजकुमार सोनी

इस तस्वीर को देखकर कई तरह के कयास लगाए जा सकते हैं और कई तरह का कैप्शन लिखा जा सकता है. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बंपर जीत और लोकसभा में हार के बाद यह तस्वीर बहुत कुछ बयां करती है.

बुधवार को प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी आमंत्रित थे. ( प्रेस क्लब वालों ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और रमन सिंह को आमंत्रित किया या नहीं इसकी जानकारी नहीं है.) कार्यक्रम दोपहर तीन बजे प्रारंभ होना था, लेकिन शाम हो गई. पत्रकार साथी थक गए तो इस  बीच बृजमोहन अग्रवाल प्रेस क्लब पहुंच गए. यहां आकर उन्होंने सभी कनिष्ठ और वरिष्ठ पत्रकारों के बीच लंबा वक्त गुजारा और बताया कि अब उन्होंने हर कार्यक्रम में देर से पहुंचने की अपनी आदत में सुधार कर लिया है. उन्होंने जानकारी दी कि पहले वे हर कार्यक्रम में दो घंटे देर से पहुंचते थे, लेकिन अब एक घंटा देर से पहुंचते है.

देर शाम मुख्यमंत्री पहुंचे तो बृजमोहन अग्रवाल को देखते ही चहक उठे. दोनों के बीच पहले गर्मजोशी से मुलाकात हुई. दोनों ने कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया और मंच पर जा बैठे. कैमरे की आंख दोनों नेताओं पर जाकर टिक गई. दोनों नेता लंबे समय तक एक-दूसरे के कान में ही कुछ कहते रहे.

वैसे लोग राजनीति को कव्हर करते हैं वे जानते हैं कि दोनों के बीच क्या बात हुई होगी. प्रेस कल्ब में मौजूद एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना था कि एक-दूसरे के कान में कोई बात तभी कहीं जाती है जब वह बेहद महत्वपूर्ण होती है. अब यह महत्वपूर्ण बात कौन सी है यह पता लगाने का काम पत्रकारों का है. वैसे वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल के बारे में एक बात प्रसिद्ध है कि देश-प्रदेश के एक-दो भाजपा नेताओं को छोड़करअमूमन सभी से उनके रिश्ते बेहतर हैं. पत्रकार भी उन्हें अपना करीबी मानते हैं. यहीं स्थिति मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ भी है. अलग-अलग दलों में रहने के बावजूद विधानसभा में दोनों नेताओं का प्रतिरोध देखते ही बनता है, लेकिन जब मिलते हैं तो कुछ अंदाज में... जैसा तस्वीर में दिख रहा है. वैसे इस तस्वीर की एक खास बात यह है कि यह बदलापुर की नहीं... रायपुर की है.

 

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भूपेश बघेल ने बताया सावरकर और जिन्ना को देश के विभाजन का जिम्मेदार तो बिलबिला उठे भाजपाई

रायपुर. भले ही पंडित जवाहर लाल नेहरू को कोस-कोसकर केंद्र में मोदी की सरकार बन गई है, लेकिन अब भी भाजपाइयों को यह रास नहीं आ रहा है कि कोई नेहरू को नए संदर्भों के साथ याद करें. सोमवार को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नेहरू की पुण्यतिथि के मौके पर उन्हें याद किया तो भाजपाई बिलबिला उठे. राजधानी के राजीव भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में बघेल ने कहा कि अब भी कतिपय लोग देश के बंटवारे के लिए नेहरू को दोषी मानते हैं, लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि देश के बंटवारे की कल्पना सबसे पहले सावरकर ने की थी और उसे अंजाम तक जिन्ना ने पहुंचाया था. बघेल के इस बयान के बाद भाजपाई ताबड़तोड़ ढंग से सक्रिय हुए. भाजपा समर्थकों ने सोशल मीडिया में एक के बाद एक कई पोस्ट लिखी. किसी ने सावरकर को माटी का सच्चा सपूत बताया तो किसी ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने नेहरू भक्ति का नया दौर प्रारंभ किया है. पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह ने एक निजी चैनल से कहा कि इतिहास को लेकर कांग्रेस का ज्ञान अधूरा है. लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद कांग्रेस सदमे में हैं. आयोजन में देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला ने पुष्पाजंलि अर्पित करने के दौरान पंडित जवाहरलाल नेहरू अमर रहे का नारा लगाकर सबको चौंकाया.

कट्टरता नुकसानदायक

मुख्यमंत्री ने कहा कि जब हम नेहरू की किताब भारत एक खोज पढ़ते हैं तो उनके ज्ञान को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं. नेहरू जी ने बहुत स्पष्ट कहा था कि कट्टरता चाहे कैसी भी हो वह देश के लिए नुकसानदायक होती है. बघेल ने कहा कि नेहरू सवाल पूछे जाने के पक्षधर थे और यह मानते थे कि आजादी में कालर पकड़कर सवाल पूछने का अधिकार केवल लोकतंत्र ने दिया है. उन्होंने कहा कि आज देश के प्रधानमंत्री से आपको सवाल पूछने का अधिकार नहीं है. मुख्यमंत्री ने कहा कि नेहरू की कल्पना में संकुचित राष्ट्रवाद का स्थान नहीं था. उनके भीतर सभी को साथ लेकर चलने की सोच विद्यमान थी. उन्होंने कहा कि नेहरू पोंगापंथ और दकियानूसी विचारों के खिलाफ थे, लेकिन आज पोंगापंथ को बढ़ावा दिया जा रहा है. बघेल ने साफ कहा कि देश के विभाजन की योजना सावरकर ने बनाई थी और जिन्ना भी यही चाहते थे, लेकिन आज आवाम के सामने झूठे तथ्य पेश किए जाते हैं.

कार्यक्रम में लेखक व विचारक पुरषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि वे कांग्रेसी नहीं है, लेकिन नेहरू को सबसे ज्यादा करीब पाते हैं. उन्होंने बताया कि जिस दिन जवाहर लाल नेहरू का निधन हुआ था तब उनकी उम्र महज नौ साल की थी और उस रोज उनके घर खाना नहीं बना था. उन्होंने बताया कि निधन के दिन उनकी मां और पिता खूब रोए थे. वे जिस मठ में जाते थे वहां के महंत को भी रोते हुए देखा था. अग्रवाल ने कहा कि आज कुछ लोग नेहरू को गरियाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि अगर नेहरू नहीं होते तो वे कहीं नहीं होते. उन्होंने कहा कि आज झूठ को इतनी बार बोला जाता है कि वह सच लगने लगता है. लोग कहते है कि झूठ के पैर नहें होते जबकि वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया के इस भयावह दौर में झूठ के पैर नहीं पर होते है.जिस वक्त सच पैर में जूते के फीते बांध रहा होता है, उस वक़्त झूठ दुनिया का चक्कर लगा चुका होता है. कबीर और नेहरू पर अपने बड़े काम की वजह से चर्चित विचारक पुरूषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि नेहरू और पटेल दोनों जानते थे कि एक न एक दिन उनके बीच मतभेद की बात प्रचारित की जाएगी और हुआ भी वहीं लेकिन बावजूद इसके सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को न सिर्फ नेता स्वीकार किया था बल्कि दोनों ने देश के लिए मिलकर काम किया था. पुरूषोत्तम अग्रवाल ने सभागार में मौजूद कांग्रेसजनों के सवालों का जवाब भी दिया. उन्होंने कहा कि अब चुनौतियां ज्यादा बड़ी हो गई है क्योंकि इतिहास के साथ खिलवाड़ करने वाले लोग ज्यादा मजबूती से सक्रिय हैं. उन्होंने कहा कि इतिहास को गलत ढंग से प्रस्तुत करने वाले लोगों का हर स्तर पर जवाब देना होगा. घर बैठने से काम नहीं चलेगा. कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कांग्रेसी राजेश तिवारी ने और आभार प्रदर्शन महामंत्री गिरीश देवांगन ने किया. आयोजन में विशेष रुप से वरिष्ठ संपादक ललित सुरजन, गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू, शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह, सांसद दीपक बैज, पूर्व शिक्षा मंत्री सत्यनारायण शर्मा, राज्यसभा सांसद छाया वर्मा, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजेंद्र तिवारी सहित अन्य कई दिग्गज कांग्रेसी नेता मौजूद थे.

गुनाहों को छिपाने की साजिश

इधर कांग्रेस के इस आयोजन के बाद जब भाजपा सक्रिय हुई तो प्रदेश कमेटी के महामंत्री और संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने भी पलटवार किया. एक बयान में उन्होंने कहा कि भारत के विभाजन के लिए आरएसएस और मुस्लिम लीग जैसी सांप्रदायिक ताकतें सक्रिय थी. यह ताकतें अंग्रेजों की फूट डालो राज करो नीति में सहयोग करती थी. भाजपा आज भी अपने पूर्वजों के गुनाहों पर पर्दा डालने का काम करती हैऔर इसका दोष महात्मा गांधी और नेहरू पर मढ़ने की साजिश करती रहती है. शैलेश ने कहा कि अगर संघी सही ढंग से भारत का इतिहास बांच ले तो उन्हें पता चल जाएगा कि वर्ष 1937 में हिन्दू महासभा के उन्नीसवें अधिवेशन सावरकर ने द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत का खुला समर्थन किया था.

 

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मोदी की जीत के साथ ही अखबारों में बाबा आदम जमाने के शब्दों की घुसपैठ

राजकुमार सोनी

जब मैं अखबार की दुनिया में था तब हर दूसरे- तीसरे दिन मालिक और मूर्धन्य संपादक यही ज्ञान बघारा करते थे कि समाचार की भाषा बेहद सरल होनी चाहिए क्योंकि अखबार रिक्शा चलाने वाला भी पढ़ता है और चाय बेचने वाला भी. लेकिन पिछले कुछ दिनों से अखबार की भाषा बेहद प्राचीन और कठिन हो गई है. विशेषकर नरेंद्र मोदी के चुनाव जीतने के बाद से अखबारों को बांचकर यह लग रहा है कि हर तरफ हवन हो रहा है. हर अखबार वाले का अपना एक निजी हवनकुंड है. जबरदस्त ढंग से हवन चल रहा है. लोग बड़ी संख्या में हवन में शामिल होने के लिए आ रहे हैं और स्वाहा...स्वाहा की आहुति के साथ पंजरी ग्रहण करते जा रहे हैं. चारों तरफ एक अजीब तरह की खूशबू उड़ रही है. इस खूशबू से यह ख्याल ( ख्याल उर्दू का शब्द है... ध्यान लिखना ठीक होगा अन्यथा देशद्रोही घोषित कर दिया जाऊंगा. ) भी आ रहा है कि कहीं अखबारों में स्याही की जगह गंगाजल का इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है. बहरहाल यहां दो दिनों के अखबारों में इस्तेमाल किए गए कुछ प्राचीन शब्दों का उल्लेख कर रहा हूं. मैं यह नहीं कहता कि प्राचीन शब्द खराब होते हैं, लेकिन ये वहीं शब्द हैं जो यह बताने के लिए काफी है कि देश में आने वाले पांच सालों में क्या होने वाला है अर्थात क्या घटने वाला है. यकीन मानिए देश की मीडिया, राजनीति और नौकरशाही इन्हीं शब्दों से चिपककर काम करने वाली है. शनिवार को एक बड़े अखबार ने बकायदा पांच साल का एजेंडा भी बता दिया. अखबार के मालिक ने खुलकर अपनी टिप्पणी में लिखा है कि उसके अखबार के सारे संस्करण नरेंद्र भाई की भावी योजनाओं के साथ रहेंगे. मालिक ने साष्टांग तो नहीं लिखा.... लेकिन पूरी टिप्पणी को पढ़ने के बाद साष्टांग शब्द कई बार उचक-उचककर दर्शन देता हुआ नजर आया.

चाटुकार मीडिया आपको किन शब्दों में उलझाकर पटकना चाहता है जरा उसकी बानगी तो देखिए...

अश्वमेघ का घोड़ा,  राष्ट्रवाद की सवारी, हिंदू सुरक्षा, हिंदू हृदय सम्राट, हिंदू गौरव, खूब लड़ी मर्दानी,क्षीर सागर, शंहनशाह, प्रज्ञा का जागरण बनाम माता का जगराता, आधिदैविक, उद्घोष, अव्यय, आत्मा, पुण्य आत्मा, शौर्य, विजय तिलक, कालिया मर्दन, भभूत, अवधूत, प्रचंड, अखंड, पांव पखारन, ध्यान-साधना, तस्मैं श्री, नौ रत्न, संत शिरोमणी, साधु, मनस्वी, तपस्वी, ऋषि- मुनि, कर्मयोगी, विश्वयोगी, यत्र-तत्र- सर्वत्र, यज्ञ, महायज्ञ, समीधा, विविधा, अतुल्य, स्तुत्य और स्तुत्य, पांडित्य, छंद, निषेधादेश, मोक्ष. तत्यनिष्ठ, देश की रामायण के राम, महाभारत के कृष्ण, असली अर्जुन मोदी, असली चाणक्य शाह, एकात्म मानववाद पर मुहर और महामानव बने मोदी.

आंधी से सुनामी तक

हो सकता है कुछ और शब्द हो जिन पर नजर नहीं पड़ी. अगर आपको कुछ शब्द नजर आए को कृपया अवगत कराइए... उन शब्दों को जोड़ लिया जाएगा. दो दिनों के अखबार में एक खास बात यह भी है कि वर्ष 2014 में जिन अखबार वालों ने मोदी को आंधी बताया था उन्होंने अब सुनामी बताया है. किसी भी अखबार वाले ने अपने सुधि पाठकों को यह जानकारी नहीं दी है कि एक गरीब इंसान की झोपड़ी न तो आंधी में टिकती है और न हीं सुनामी में. जरूरत से ज्यादा आंधी और सुनामी बरबादी का कारण बनती है. एक अखबार वाले ने तो यहां तक लिखा है- छत्तीसगढ़ में भाजपा ने छह महीने के भीतर ही भूपेश बघेल से अपना बदला चुका लिया. नप गए... चप गए शब्दों की तो भरमार है. इन दिनों अखबार वालों के बीच खतरनाक शब्दों की जुगाली का काम्पीटिशन चल रहा है. मजे लीजिए आप भी... बहुत कुछ झेलना है अभी आपको. 

 

( अपना मोर्चा डॉट कॉम की प्रत्येक खबर को आप प्रकाशित करने के लिए स्वतंत्र है. बस... आपको साभार... अपना मोर्चा डॉट कॉम लिखना होगा. खबरों को जस का तस कापी पेस्ट करने वालों से यह एक निवेदन मात्र है. ) 

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इधर चेला गया जेल और उधर आका पर लगा यौन शोषण का आरोप... रमन सिंह भी निशाने पर

रायपुर. सुपर सीएम के नाम से चर्चित अमन सिंह, वर्दी वाले गुंडे के तौर पर विख्यात मुकेश गुप्ता और भ्रष्टाचार में लिप्त पुनीत गुप्ता के कारनामों की वजह से बदनाम हुए रमन सिंह एक बार फिर निशाने पर है. इस बार उनके अत्यंत करीबी धरम कौशिक पर एक महिला ने गंभीर आरोप लगाया है. जाहिर सी बात है कि जब कोई चेला फंसता है तो बदनामी गुरुजी की होती है. महिला के आरोप के बाद राजनीतिक गलियारों में दिनभर यही चर्चा चलती रही है कि भाजपा में एक से बढ़कर एक नगीने है और सारे नगीनों का कारनामा अब जाकर बाहर आ रहा है. गौरतलब है कि हाल के दिनों में एक महिला किरण मगर ने प्रकाश बजाज पर लाखों रुपया हड़पने और छेड़खानी का आरोप लगाया है. प्रकाश बजाज नेता प्रतिपक्ष धरम कौशिक के काफी करीबी है और उन्हें आका कहते हैं. इधर जिस महिला ने प्रकाश बजाज को लपेटे में लिया है उसी महिला का यह भी आरोप है कि वर्ष 2017 में धरम कौशिक ने भी उसे गलत इरादे से छुआ था. यह बताना लाजिमी है कि कौशिक पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को सब कुछ मानते हैं. कहा जाता है कि उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाने में पूर्व मुख्यमंत्री की बड़ी अहम भूमिका रही है. इधर इस घटना के बाद यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या पार्टी अपने होनगार नगीनों को बाहर का रास्ता दिखाएगी. क्या नेता प्रतिपक्ष को नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने के लिए कहा जाएगा.

पूरी मांग में भर दिया रंग... और बाहों में भरना चाहते थे

अंवति विहार में रहने वाली महिला किरण मगर के आरोप बेहद सनसनीखेज और गंभीर है. किरण ने मंगलवार को एक प्रेस कान्प्रेंस में कहा कि वर्ष 2017 में जब वह अपनी दीदी के साथ होली मिलन समारोह में शिकरत करने के लिए धरम कौशिक के निवास पर पहुंची थी तब कौशिक ने गलत इरादे से शरीर का स्पर्श किया था. इतना ही नहीं रंग लगाने के बहाने उसकी पूरी मांग में रंग भर दिया था. बाद में रंग को पोछने के लिए अपना गमछा भी दिया. जब वह मोबाइल व पर्स उठाने के लिए तत्पर हुई तब कौशिक ने उसे बाहों में भरने के लिए इशारों से अपने पास बुलाया, लेकिन वह भाग खड़ी हुई. इस घटना का जिक्र दो साल बाद क्यों किया गया... यह पूछने पर किरण ने बताया कि उसे इस घटना का जिक्र करने के लिए रोका गया था.

आपको बता दें कि किरण वहीं महिला है जिसने दो दिन पहले कौशिक को आका कहने वाले प्रकाश बजाज पर पैसा हड़पने और छेड़खानी करने का आरोप लगाया था. प्रकाश बजाज ने विधानसभा चुनाव से पहले अचानक पुलिस में एक शिकायत की थी और कहा था कि पत्रकार विनोद वर्मा उनके आका को सीडी बनाकर फंसाने का काम कर रहे हैं. हालांकि तब पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए यह जानने की कोशिश ही नहीं की थी कि बजाज का आका कौन है. बहरहाल प्रकाश बजाज के जेल जाने और कौशिक के लपेटे में आने से यह तो साफ हो गया कि सीडी प्रकरण में बहुत कुछ फर्जी था. हालांकि इस मामले में एक स्थानीय टीवी चैनल के मालिक का नाम भी जोरशोर से उछलता रहा,लेकिन उस पर अब तक शिकंजा कसा नहीं जा सका है.  

यह भी गौरतलब है कि जब पुलिस ने प्रकाश बजाज को गिरफ्तार किया तो भाजपा के किसी भी नेता ने उसके पक्ष में बयान नहीं दिया सिवाय नेता प्रतिपक्ष धरम कौशिक के. कौशिक ने प्रेस को बयान दिया कि भूपेश सरकार बदलापुर की कार्रवाई कर रही है. कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में फंसाया जा रहा है. उनके बयान के बाद महिला किरण मगर ने प्रेस काफ्रेंस लेकर कहा कि जो बदलापुर की बात कर रहे हैं वे खुद छेड़छाड़ की कार्रवाई में लिप्त थे...। बहरहाल महिला के आरोप के बाद प्रदेश की राजनीतिक फिजा गर्म हो गई  है. इधर महिला के आरोप को नेता प्रतिपक्ष कौशिक ने बुनियाद और निराधार बताया है. कौशिक का कहना है कि उनके यहां होली मिलन के दौरान सैकड़ों कार्यकर्ता आते रहते हैं. जो महिला आरोप लगा रही है वे तो उन्हें जानते भी नहीं है. महिला उन्हें बदनाम करने की नीयत से आरोप लगा रही है. यह एक साजिश है.

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