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सीएम बघेल ने सेक्सोफोन बजाने वालों के साथ ली सेल्फी तो तालियों से गूंज उठा राज्योत्सव का मैदान

रायपुर. कल 3 नवंबर की शाम सेक्सोफोनिस्ट विजेंद्र धवनकर पिंटू, लिलेश, सुनील और उनके साथियों के साथ- साथ संगीत प्रेमियों के लिए भी  एक यादगार शाम थीं. रायपुर के वृंदावन हॉल और भिलाई के प्रतिष्ठित कलामंदिर में अपनी धमाकेदार प्रस्तुति से लोगों के दिलों में खास छाप छोड़ने वाले सेक्सोफोनिस्टों ने जब राज्योत्सव के विशाल मंच में बेशुमार दर्शकों के बीच सेक्सोफोन बजाया तो हर कोई झूम उठा. एक पुरानी छत्तीसगढ़ी फिल्म घर-द्वार के प्रसिद्ध गीत- सुन-सुन मोर मया पीरा... की धुन को बजाते हुए कलाकार जब समारोह के प्रमुख मंच तक पहुंचे तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल खुद को सेल्फी लेने से नहीं रोक पाए. उन्होंने तीन बार अलग-अलग अंदाज से कलाकारों के साथ सेल्फी ली. मुख्यमंत्री का यह अंदाज सबको खूब पंसद आया क्योंकि इसके पहले छत्तीसगढ़ के लोगों ने यहां के मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह को केवल करीना कपूर, सलमान खान और मुंबई के नामचीन कलाकारों के साथ ही सेल्फी लेते हुए देखा था. मुख्यमंत्री द्वारा ली गई सेल्फी की एक खास बात यह भी थीं कि मंच पर विधानसभा अध्यक्ष चरणदास मंहत, सांसद ज्योत्सना महंत, स्वास्थ्य एवं पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव, गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू, वन मंत्री मोहम्मद अकबर, संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत, नगरीय प्रशासन मंत्री शिव डहरिया, शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह, लोक स्वास्थ्य मंत्री रूद्र गुरू, महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अनिला भेड़िया, मुख्य सचिव आरपी मंडल, प्रधान मुख्य वन संरक्षक राकेश चतुर्वेदी, संस्कृति विभाग के सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी, संचालक अनिल साहू सहित विधायक और वरिष्ठ अफसर मौजूद थे.

राज्योत्सव में कलाकारों ने फिल्म शोले के टाइटल म्यूजिक से जो माहौल बनाया वह अंत तक बरकरार रहा. कलाकारों ने एक से बढ़कर एक धुनें सुनाई. डाक्टर नरेंद्र देव वर्मा लिखित गीत अरपा पैरी के धार की सबसे पहली प्रस्तुति वे भिलाई में दे चुके थे, लेकिन यहां राज्योत्सव में भी जब सेक्सोफोन पर यह गीत गूंजा तो हर कोई यह कहने को मजबूर हो गया कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी में जन्में कलाकार अंग्रेजी बाजे में भी अपनी माटी के प्रति सम्मान प्रकट करने का हुनर जानते हैं. कलाकारों ने छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध गढ़बा बाजा को भी सेक्सोफोन पर बजाकर दर्शकों को नाचने के लिए मजबूर कर दिया. सेक्सोफोन बजाने वाले कलाकार जल्द ही अपनी प्रस्तुति अंबिकापुर, राजनांदगांव, रायगढ़, कोरबा, बिलासपुर जैसे बड़े शहरों में भी देंगे.

 

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बस्तर की बेशकीमती सागौन की लकड़ी को लेकर पत्रकार और वन अफसर आमने-सामने

रायपुर. बस्तर के किसी पत्रकार ( दो-चार को छोड़कर ) से पूछो कि क्या वह रायपुर या देश के किसी बड़े मीडिया संस्थान में काम करने का इच्छुक है तो कहेगा- क्यों नहीं...? मगर बस्तर से बाहर नहीं जाऊंगा. बस्तर में रहकर ही अपनी सेवाएं दूंगा. इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो नहीं मालूम, लेकिन कहते हैं कि जो पत्रकार एक बार बस्तर जाकर बस गया...वह फिर दोबारा कहीं और काम नहीं करना चाहता. अब यह बस्तर की माटी का खिंचाव है या कुछ और...शोध का विषय है. कमोबेश यही स्थिति नौकरशाहों की भी है. बस्तर को माओवाद प्रभावित और काला पानी-काला पानी कहकर प्रचारित करने वाले अफसर अव्वल तो बस्तर जाना नहीं चाहते, लेकिन जब चले जाते हैं तो फिर लौटना नहीं चाहते. उन्हें भी बस्तर की माटी से प्रेम हो जाता है या फिर आय के साधनों में बढ़ोतरी हो जाती है...इस पर भी जांच करने की आवश्यकता है.

पता नहीं इस खबर में ऊपर लिखे गए इंट्रो का क्या महत्व है, मगर कभी-कभी ऐसा लगता है बस्तर के संसाधनों पर कौन-कौन नजरें गड़ाए बैठा है इस पर तथ्यपरक ढंग से अन्वेषण होना चाहिए. बहरहाल यह खबर एक पत्रकार और एक वन अफसर की भिंडत से संबंधित है. बस्तर के पत्रकार नरेश कुशवाह ने जगदलपुर में पदस्थ वन अफसर आरके  जांगड़े पर गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री, वनमंत्री, मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को शिकायत भेजी है. पत्रकार का आरोप है कि जांगड़े ने धमतरी के ठेकेदार गिरधारी लाल के साथ मिलकर सागौन लकड़ी की नीलामी में अफरा-तफरी की है. पत्रकार ने अपनी शिकायत में कहा है कि 2 जून 2018 को सागौन की लकड़ियों की नीलामी हुई थीं. ठेकेदार ने सार्वजनिक तौर पर दस लाख छह सौ रुपए की बोली लगाई थीं, लेकिन बीडशीट में सात लाख छह सौ रुपए दर्शाकर ठेकेदार को लाभ दे दिया गया. पत्रकार कुशवाह का कहना है कि नीलामी के दौरान वनोपज व्यापार के तहत शासकीय मुद्रणालय से मुद्रित और वन विभाग से सत्यापित बीडशीट का उपयोग ही किया जा सकता है, लेकिन वनमंडलाधिकारी जांगड़े ने कम्प्युटर से बीडशीट निकाली और उसका उपयोग किया. इस तरह की बीडशीट कभी भी बदली जा सकती है. कुशवाह का यह भी आरोप है कि किसी भी नीलामी के दौरान अंतिम बोली लगाने वाले को सात दिनों के भीतर बोली गई राशि का 25 फीसदी जमा करना होता है. यदि बोलीदार यह राशि जमा नहीं करता है तो बोली निरस्त कर दी जाती है, लेकिन जांगड़े ने ऐसा नहीं किया और राशि जमा करने से पहले ही 30 जून 2018 को लकड़ी उठाने की स्वीकृति प्रदान कर दी. जब रायपुर टिंबर मर्चेंट एसोसिएशन ने इस बारे में प्रधान मुख्य वन संरक्षक को शिकायत भेजी तब मामले की लीपापोती चालू की गई. पत्रकार ने दावा किया कि ठेकेदार से बैक डेट पर चेक भी लिया गया, लेकिन बैंक में चालान जमा करने की तारीख कुछ और है.

इधर वनमंडलाधिकारी जांगड़े का कहना है कि कुशवाह को पत्रकारिता का काम करना चाहिए था, लेकिन वे किसी भारत टिंबर के जरिए खुद ही लकड़ी की खरीददारी के खेल में लगे थे. यह सही है कि लिपिक की त्रुटि के चलते कागजों में राशि गलत अंकित हो गई थीं, लेकिन जैसे ही यह जानकारी मिली उसे सुधार लिया गया. ठेकेदार को किसी भी तरह का कोई लाभ नहीं दिया गया है. ठेकेदार ने नीलामी में जो बोली लगाई थी उसी आधार पर पैसा लिया गया है. जांगड़े ने अपना मोर्चा डॉट कॉम को बताया कि कुशवाह ने इस मामले की शिकायत कई जगह कर रखी है. हर तरफ से जांच हो रही है मगर किसी को कुछ भी नहीं मिल रहा है क्योंकि वे गलत नहीं है.

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तबादले के बाद भी गंभीर आरोपों से घिरे हुए हैं वन अफसर पंकज राजपूत

रायपुर. जो लोग जंगल महकमे से जुड़े हुए हैं वे लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि उनका महकमे का कामकाज कितना बेहतर है और कितना खौफनाक ? यहां कोई थोड़ी सी भी उंटपटांग हरकत करता है तो मंत्रालय के गलियारों में रिकार्ड प्लेयर चालू हो जाता है-जंगल-जंगल बात चली है... पता चला है. अभी कुछ दिनों पहले भोपाल में जो हनी ट्रैप कांड हुआ था उसमें छत्तीसगढ़ के वन विभाग से जुड़े दो अफसरों का नाम प्रमुखता से उभरा, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक उठापटक के चलते मामला सुलट गया और वे बच गए. बहरहाल इन दिनों पंकज राजपूत नाम के एक वन अफसर की चर्चा जोरों पर है. बताते हैं यह अफसर कभी पूर्व मुख्यमंत्री के सबसे करीबी था और लंबे समय तक राजनांदगांव में ही पदस्थ था.

एक शिकायतकर्ता नरेंद्र ने फिजूलखर्ची और महिलाकर्मियों के साथ व्यवहार को लेकर पंकज के खिलाफ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को शिकायत भेजी है. अपनी शिकायत में नरेंद्र ने कहा है कि पकंज राजपूत के पहले राजनांदगांव में बतौर डीएफओ शाहिद साहब पदस्थ थे. शाहिद साहब ने पदस्थ होते ही सबसे पहले अपने बंगले का रंग-रोगन करवाया, एसी और टाइल्स बदलवाया, लेकिन शाहिद साहब के स्थानांतरण होते ही पंकज राजपूत ने भी यही काम किया और एक तरह से सरकारी खजाने का दुरूपयोग किया. फिजूलखर्ची में वे इतने ज्यादा एक्सपर्ट थे कि जिस व्हालीबाल ग्राउंड पर डीएफओ अरुण प्रसाद ने लाखों रुपए फूंके थे उसी व्हालीबाल ग्राउंड पर दोबारा पैसा फूंका गया. इतना ही नहीं कमीशन के खेल में अंग्रेजी में छपी एक किताब सभी रेंजर और लिपिकों को भेजी गई और उनसे कहा गया कि इसका भुगतान करना है. अब न तो बाबू ढंग से अंग्रेजी जानते हैं और न हीं रेंजर... लेकिन साहब ने कहा है कि भुगतान करना है तो भुगतान कर रहे हैं. शिकायतकर्ता का कहना है कि वनमंडल के पुराने फर्नीचर की मरम्मत और पालिश के नाम पर भी लाखों रुपए बरबाद किए गए हैं. डिवीजन के रिकार्ड से लैपटाप, कम्पयूटर, टीवी, एसी गायब है.

महिला कर्मचारी को अटैक

पकंज राजपूत जब तक पदस्थ थे तब तक महिला कर्मचारियों से उनका व्यवहार दोयम दर्जे का था. एक महिला जिसे वे रोज अपमानित करते थे उसे हार्ट अटैक भी आया और उसके इलाज में लाखों रुपए खर्च हुए. वे अपने अधीनस्थ लिपिकों से भी देर रात घर में काम लेते रहे जिसके चलते एक बाबू भी अटैक का शिकार हुआ. इन दिनों वह बाबू लंबी छुट्टी पर है. शिकायतकर्ता का  कहना है कि पंकज राजपूत अपने चहेतों को नियुक्ति देने में भी आगे रहते थे. उन्होंने मोहम्मद अय्यूब शेख नाम के एक वनपाल को सीधे जिला यूनियन में डिप्टी रेंजर बना दिया जबकि अय्यूब ने कभी भी तेंदूपत्ते का काम ही नहीं देखा. इन दिनों अय्यूब दक्षिण मानपुर का प्रभार संभाल रहा है. वनपाल के प्रशिक्षण से वापस आए कर्मचारी शीतल, भुवन चंद्रवंशी, कृष्णालाल, नमिता, कुशल लटियार, संतोष कुसरे को बगैर किसी पदस्थापना के वेतन दिया गया और फिर बाद में इनका स्थानांतरण दूर-दराज कर दिया गया. शिकायत में भंडार क्रय नियमों के उल्लंघन से संबंधित अनेक बिंदु शामिल किए गए गए हैं. कहा गया है कि पंकज जब तक पदस्थ थे तब तक एक ही ठेकेदार से स्टेशनरी खरीदी जाती रही.

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एंटी करप्शन ब्यूरो में पदस्थ दो बड़े अफसरों को दूसरे अफसर ने लपेटा

रायपुर. एंटी करप्शन ब्यूरो में पदस्थ दो बड़े अफसरों की कार्यप्रणाली को लेकर हर रोज नई-नई बातें सामने आ रही है. कुछ समय पहले एंटी करप्शन ब्यूरो में पदस्थ उप पुलिस अधीक्षक स्तर के एक अधिकारी अजितेश कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी को एक शिकायत भेजकर गंभीर आरोप लगाए हैं.

अधिकारी अजितेश कुमार का कहना है कि दिनांक 28 जून 2019 को बिलासपुर के सहायक आबकारी आयुक्त दिनेश दुबे के मामले में खात्मा प्रकरण न्यायालय के समक्ष पेश किया गया था. जब मामले का खात्मा हो गया तब उनके द्वारा एसीबी के जिस अफसर को वाट्सअप काल पर सूचना दी उसने पहले तो फोन नहीं उठाया, लेकिन बाद में जब फोन उठाया तो गंदी-गंदी गालियों से नवाजा और सीधे वरिष्ठ अफसर को फोन थमा दिया. वरिष्ठ अफसर ने भी अपशब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि तुमने इस मामले में जानकारी छिपाकर अच्छा नहीं किया. अब तुम्हें बरबाद होने से कोई नहीं बचा सकता. तुम्हारा निलंबन तो होकर रहेगा.

फंसा सकते हैं झूठे मामले में

अफसर ने अपनी शिकायत में अपने जान-ओ-माल की सुरक्षा की गुहार लगाई है. अफसर का आरोप है कि दोनों अफसर सीधे-सादे लोगों को झूठे मामलों में फंसाने की कला में माहिर है.अफसर ने खुद को मानसिक तौर पर प्रताड़ित बताते हुए कहा कि जब से दोनों अफसरों ने उसे धमकाया है तब से वह खुदकुशी करने के बारे में सोच रहा है. अगर कल को उसके द्वारा कोई अप्रिय कदम उठा लिया जाता है तो इसके लिए उसे प्रताड़ित करने वाले अफसर जिम्मेदार होंगे. ( अफसर ने जिन्हें जिम्मेदार बताया है उनका नाम भी लिखा है.)

दूसरी शिकायत और भी गंभीर

इधर एंटी करप्शन ब्यूरो में पदस्थ अफसर की दूसरे अफसर की और भी गंभीर शिकायत मंत्रालय के गलियारों में घूम रही है. यह शिकायत राजेश कुमार बानी नाम के किसी सिविल इंजीनियर ने लिखी है जो वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तब भेजी गई थी जब आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता थे. शिकायत में कहा गया है कि अफसर जब धमतरी में पदस्थ था तब वह साहू नाम के एक करीबी पुलिसकर्मी के जरिए हर थाने से मोटी रकम की वसूली करता था. पैसों की वसूली के लिए चालान को रोककर रखा जाता था.

क्लासमेंट को बचाया

शिकायतकर्ता का कहना है कि रायगढ़ जिले घरघोड़ा में सीईओ के पद पर अरूण कुमार शर्मा पदस्थ थे, लेकिन तमाम तरह की छापामार कार्रवाई के बाद उन्हें इसलिए बख्श दिया गया क्योंकि वे पुलिस अफसर के क्लासमेंट थे. इसके अलावा आलोक पांडे, कृष्ण कुमार पाठक, कौशल यादव, श्यामचंद पटेल, राममोहन दुबे को भी जेल जाने से बचा लिया गया. शिकायतकर्ता का कहना है कि अगर सरकार यह जांच करें कि अफसर के नेतृत्व में कब-कब छापामार कार्रवाई की गई है और कितने लोगों का चालान पेश किया गया... कितने बरी हो गए... तो भी सच्चाई सामने आ जाएगी. शिकायत में अफसर के मकान-दुकान समेत अन्य घोषित-अघोषित संपत्तियों का ब्यौरा भी दिया गया है.

 

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कोरबा जिले से नफरत फैलाने वालों को करारा जवाब...अहिंसा के पुजारी को याद करते हुए बच्चों ने लिखा मुख्यमंत्री को खत

रायपुर. ऐसे समय जबकि पूरे देश में धर्म- संप्रदाय और नफरत के जरिए लोगों को बांटने-छांटने और काटने की कवायद चल रही है तब छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले की कलक्टर किरण कौशल और वहां के जिला शिक्षाधिकारी सतीश पांडे ने अपने तरीके का एक अनोखा प्रयास किया है. उनका यह प्रयास बताता है कि अभी अंधेरे से युद्ध किया जा सकता है. नफरत का जवाब शांति और प्रेम से दिया जा सकता है. बताना लाजिमी होगा कि इसी महीने 20 सितंबर को जिले में बड़ी शिद्दत के साथ स्कूल के बच्चों ने अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के कामकाज को याद करते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम पाती लिखी है. बच्चे भी एक-दो नहीं... पूरे डेढ़ से दो लाख. भले ही यह काम सरकारी स्तर पर व्यवस्थित तौर-तरीकों से संभव हो सका, लेकिन देश में खौफनाक माहौल  पैदा करने वालों के खिलाफ यह एक जरूरी कदम था.

जाहिर है कि जब बच्चों ने पत्र लिखना तय किया होगा तब उन्हें महात्मा गांधी की जीवन यात्रा से भी गुजरना पड़ा होगा. बचपन में हम सबने भी महात्मा गांधी को एक निबंध के तौर पर याद किया है, लेकिन महात्मा गांधी के विचारों को आधार बनाकर पत्र लिखने का काम संभवतः देश का पहला प्रयास था. इस प्रयास की सार्थकता इसलिए भी है क्योंकि देश को बांटने वाली शक्तियां वाट्सअप विश्वविद्यालय और झूठे प्रचार के गंदे माध्यमों के जरिए सबसे पहले बच्चों के दिमाग पर ही हमला कर रही है. पूरी ताकत केवल इस बात के लिए ही झोंकी जा रही है कि बच्चे तो बच्चे... हर कोई गांधी जी और उनके कामकाज से किनारा कर लें. कलक्टर किरण कौशल और जिला शिक्षा अधिकारी सतीश पांडेय यह कोशिश नफरत को प्रेम से जवाब देने वाली कोशिश के रुप में याद की जाएगी.

पत्र होंगे पुरस्कृत

अब से कुछ अरसा पहले अखबारों में संपादक के नाम पत्र का एक खास कॉलम हुआ करता था. लोग अपने रिश्तेदारों के अलावा अखबार के संपादकों को भी पत्र लिखकर अपनी भावनाओं से अवगत कराते थे. संचार के माध्यमों में विकास के साथ चिट्ठी लिखने की परम्परा बंद हो गई. मैसेज के नए तौर-तरीकों ने रिश्तों की खूबसूरती का भी कत्ल कर दिया. कोरबा जिले में अगर बच्चों और चिट्ठी-पाती के जरिए विचारों को प्रकट करने का सिलसिला प्रारंभ हुआ है तो किसी न किसी अन्य आजोयन में भी जारी रहना चाहिए. बताते हैं कि जिले के 25 सौ स्कूलों के बच्चों ने महात्मा गांधी के विचारों को पढ़कर मुख्यमंत्री के नाम जो खत लिखा है उसे 23 सितंबर को खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय में जमा करवाया जाएगा. फिर इन पत्रों की छंटनी होगी और प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर दस-दस श्रेष्ठ पत्रों का चयन कर बच्चों को पुरस्कृत भी किया जाएगा. वैसे यह एक ऐसा काम है जिसमें मुख्यमंत्री स्वयं पत्र लिखने वाले बच्चों के बीच मौजूद रहकर उन्हें पुरस्कृत कर सकते हैं. बहराल जिले में हुए इस अनोखे प्रयास की गूंज हर तरफ हो रही है. 

 

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रमन सिंह को अब तक भाजपा ने क्यों नहीं दिखाया बाहर का रास्ता?

रायपुर. पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और डाक्टर रमन सिंह पर लगे गंभीर आरोपों के बाद भाजपा ने अपने कर्मठ कार्यकर्ता मंतूराम पवार को पार्टी से बाहर निकाल दिया है, लेकिन मंतूराम का यह कहना कि मुझे तो निकाल बाहर फेंका...और रमन सिंह को छोड़ दिया...कई तरह के सवाल खड़े करता है.

पाठकों को याद होगा कि वर्ष 2003 में जब अजीत जोगी विधायक खरीद-फरोख्त कांड में फंसे थे तब अरूण जेटली की प्रेस कान्फ्रेंस क बाद कांग्रेस ने जोगी को छह साल के लिए निष्कासित कर दिया था. भाजपा में स्थिति थोड़ी अलग है. डाक्टर रमन सिंह के दामाद डीकेएस घोटाले में फंसे हुए हैं तो पत्नी पर नान घोटाले का छींटा है. पुत्र अभिषेक सिंह पर अरबों-खरबों का धन लेकर फरार हो जाने वाली चिटफंड कंपनियों को प्रश्रय देने का आरोप है तो खुद रमन सिंह पर अंतागढ़ टेपकांड और नान घोटाले में संलिप्त होने का आरोप है. कभी उन्हें मिस्टर क्लीन कहा जाता था, लेकिन अब स्थिति दूसरी है. उनके संरक्षण में पल रहे करीबी अफसर मुकेश गुप्ता जेल जाने से बचने के लिए भागते फिर रहे हैं तो संविदा में पदस्थ रहे सुपर सीएम और उनकी पत्नी भी जांच दायरे से गुजर रहे हैं. कुल मिलाकर पूरा कुनबा गंभीर किस्म के आरोपों से घिरा हुआ है. इतने सारे आरोपों के बाद भी अगर रमन सिंह अगर पार्टी में बने हुए हैं तो जरूर कोई बात होगी. बताया जाता है कि रमन को केंद्र के कतिपय नेताओं का संरक्षण मिला हुआ है. केंद्र के नेता ही उनकी रक्षा में लगे हुए हैं. इधर भाजपा में छत्तीसगढ़ के कुछ बड़े नेता जो अब रमन सिंह का राजनीति से सफाया चाहते हैं वे भी कुछ बोल नहीं पा रहे हैं. नान के एक आरोपी शिवशंकर भट्ट और अंतागढ़ टेपकांड में फंसे मंतूराम पवार के खुलकर सामने आ जाने के बाद फिलहाल भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गई है. पार्टी के लोगों का कहना है कि सामने दंतेवाड़ा का चुनाव है इसलिए कांग्रेस नए-नए शिगूफे छोड़ रही है.

अमन सिंह का भी नाम

अंतागढ़ उपचुनाव में अपना नाम वापस लेकर सुर्खियों में आए मंतूराम पवार ने अब रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता, करीबी ओपी गुप्ता, संजय अग्रवाल और अमन सिंह के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है. छत्तीसगढ़ में भाजपा के बुरे हश्र के लिए जिम्मेदार अमन सिंह इन दिनों दिल्ली में हैं और एक बिजली कंपनी में कार्यरत है. बताते हैं कि यह कंपनी भी कभी छत्तीसगढ़ में बिजली घर स्थापित करना चाहती थी, लेकिन मामला नहीं जम पाया. इधर पहली किसी एफआईआर में अमन सिंह का नाम जुड़ जाने से भाजपा के एक बड़े वर्ग में खुशी की लहर है. भाजपा में शुचिता और नैतिकता को मानने वाले नेताओं के एक खेमे को यह खुशी तब भी हुई थीं जब भूपेश सरकार ने विवादित पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता पर मामला दर्ज किया था.

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अजीत और अमित जोगी की जमानत याचिका खारिज

रायपुर. अंतागढ़ टेप कांड मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और उनके पुत्र अमित जोगी की जमानत याचिका खारिज हो गई है. अंतागढ़ टेप मामले में फंसने बाद प्रथम श्रेणी न्यायाधीश विवेक शर्मा की अदालत मेंं यह याचिका लगाई गई थीं जो अस्वीकार कर दी गई.
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मंतूराम पर बोले रामविचार नेताम- बिकाऊ कभी टिकाऊ नहीं होता

रायपुर. भाजपा के वरिष्ठ नेता रामविचार नेताम के ताजा बयान से हलचल मच गई है. नेताम ने मंतूराम पवार के भाजपा में प्रवेश और फिर उन्हें बाहर किए जाने को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है. नेताम का कहना है कि जो बिकाऊ था वह टिकाऊ कैसे हो सकता है? एक बातचीत में नेताम ने कहा कि जिस गाजेबाजे और लड़ी-पटाखे के साथ मंतूराम का भाजपा प्रवेश हुआ था वह भाजपा के कई बड़े नेताओं के गले से नहीं उतर रहा था. ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय स्तर के किसी बड़े नेता की इंट्री हो गई है. जिस गर्मजोशी के साथ मंतूराम का कार्यसमिति में स्वागत किया गया वह समझ से परे है. प्रवेश के दौरान स्थानीय नेतृत्व को भी भरोसे में नहीं लिया गया. पार्टी के स्थानीय जिम्मेदारों ने अपनों से ज्यादा गैरों पर भरोसा जताया जो दुःखद है. गैरों पर भरोसे के चलते ही आज हमारा बुरा हाल हुआ है.
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शिवशंकर भट्ट का खुलासाः चुनावी चंदे के लिए भाजपा कार्यालय पहुंचा पांच करोड़ तो... रमन सिंह के घर तीन करोड़

रायपुर. नान घोटाले के एक आरोपी शिवशंकर भट्ट ने नीरज श्रीवास्तव की अदालत में शपथपूर्वक दिए गए एक बयान में जो बातें कहीं है वह न केवल सनसनीखेज है बल्कि हैरत में डालने वाली है. उनके बयान के बाद ऐसा लगता है कि पूर्व सरकार में बैठे लोग किस बुरी तरह से छत्तीसगढ़ को लूट रहे थे. भट्ट ने न्यायालय में दावा किया कि मुख्यमंत्री रमन सिंह और पून्नूलाल मोहिले, ने नान के अध्यक्ष लीलाराम भोजवानी को वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा कार्यालय के लेखा शाखा के कर्मचारी श्री जैन के पास पांच करोड़ रुपए जमा करने को कहा था. इस चंदे के लिए चना, दाल के सप्लायर्स के अलावा राइस मिलरों को मजबूर किया गया था. भट्ट ने बताया कि वह कुछ सप्लायर्स के साथ खुद चंदा देने भाजपा कार्यालय गया था. जब वह पैसे को लेकर वहां पहुंचा तब वह धरमलाल कौशिक ( भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष ), सच्चिदानंद उपासने सहित कई बड़े पदाधिकारी उपस्थित थे. मेरे सामने उन लोगों को यह पैसा दिया गया. इसी तरह अक्टूबर 2013 में भी लीलाराम भोजवानी के साथ पून्नूलाल मोहिले के निवास पर एक करोड़ रुपए का चंदा देने गया था. जबकि वर्ष 2013 में अफसर कौशलेंद्र सिंह के साथ तीन करोड़ रुपए लेकर मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के घर गया था. जब पैसा दिया जा रहा था तब मुख्यमंत्री की पत्नी वीणा सिंह वहां मौजूद थीं. कौशलेंद्र सिंह ने मेरी आंखों के सामने तीन करोड़ रुपए दिए थे.

कौशलेंद्र ने दिए थे रेणु सिंह को पैसे

शिवशंकर भट्ट ने अपने बयान में पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह, पूर्व खाद्य मंत्री पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता के साथ-साथ वन अफसर रहे कौशलेंद्र सिंह को नान घोटाले का प्रमुख आरोपी बताया है. अपने बयान में शिवशंकर भट्ट ने कई मर्तबा कौशलेंद्र सिंह का नाम लिया है. भट्ट ने न्यायालय में बताया कि फरवरी 2014 में कौशलेंद्र सिंह मुझे एश्वर्या रेंसीडेंसी में रहने वाली रेणु सिंह के निवास पर ले गए थे. वहां उन्होंने मेरे सामने पांच लाख रुपए रेणु सिंह को दिए. यह पैसे किस मद से दिए गए मुझे इसकी जानकारी नहीं थी और मैं जानना भी नहीं चाहता था. भट्ट ने शपथपत्र में कहा कि 12 फरवरी 2015 को ईओडब्लू ने छापा मारकर एक करोड़ 62 लाख रुपए की फर्जी ढंग से जप्ती बनाई थी. मेरे हाथों से कोई रकम प्राप्त नहीं हुई थी. मेरे पास कोई ऐसी शक्ति नहीं थीं कि मैं इतनी बड़ी रकम कार्यालय में रखता. भट्ट ने कहा कि कौशलेंद्र सिंह और नागरिक आपूर्ति निगम में कार्यरत गिरीश शर्मा, चिंतामणि चंद्राकर आपस में मिलकर लेन-देन और बंदरबांट करते थे. उनके पैसों को मेरे नाम डालकर फर्जी जप्ती बनाई गई थीं. भट्ट ने न्यायालय के समक्ष बताया कि कौशलेंद्र सिंह पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के काफी निकट थे. उनके पारिवारिक रिश्ते थे. नान का पूरा संचालन कौशलेंद्र सिंह, डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी और राधाकृष्ण गुप्ता एक गैंग बनाकर करते थे.

गाली-गलौच करते थे कौशलेंद्र

भट्ट ने कहा कि नागरिक आपूर्ति निगम में किसी भी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह विरोध अथवा आपत्ति दर्ज करें. अगर कोई कौशलेंद्र सिंह के काम पर आपत्ति दर्ज करता तो वे सीधे डाक्टर रमन सिंह और चारों व्यक्तियों का नाम लेकर गाली-गलौच करते थे. कौशलेंद्र सिंह, चिंतामणि और गिरीश शर्मा सभी सप्लायर्स और राइस मिलरों से लगातार लेन-देन करते थे. यह सब देखकर ऐसा प्रतीत ही नहीं होता था कि कोई शासकीय कार्यालय चल रहा है.कौशलेंद्र सिंह मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के प्रियपात्र थे इसलिए वर्ष 2011 और 2014 के बीच उनका केवल दो बार ही तबादला हुआ. वे हर बार मुख्यमंत्री को बोलकर अपना तबादला रूकवा लेते थे. कृतिकांत बारिक के कम्प्यूटर से बरामद पन्ने कौशलेंद्र सिंह के निर्देश पर गिरीश शर्मा ने ही लिखवाए है.

हत्या पर उठाए सवाल

भट्ट ने नागरिक आपूर्ति निगम के एक कर्मचारी त्रिनाथ रेड्डी की वाइफ की हत्या पर भी सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि इस हत्या को आत्महत्या बताने का प्रयास किया गया था. इस हत्या के जरिए यह मैसेज देने की कोशिश की गई थी कि जो कोई भी मुंह खोलेगा उसके साथ अनहोनी हो सकती है. यह हत्या किसने करवाई  इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिए.

शिवशंकर भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ के धान उपार्जन के लिए लगभग 550 करोड़ और फिर 500 करोड़ की अग्रिम सब्सिडी जारी की गई थी. हैरत की बात यह है कि वर्ष 2003-04 से लेकर वर्ष 2014-15 तक लगभग दस हजार करोड़ रुपए की अग्रिम सब्सिडी स्वीकृत की गई. यह सब्सिडी बगैर किसी वैधानिक ऑडिट के केवल प्रस्तुत किए गए बिल के आधार पर की गई थीं. जो भी अधिकारी इसके खिलाफ मुंह खोलता उसे परिणाम भुगतना पड़ता. इस खेल में विपणन संघ के तत्कालीन अध्यक्ष राधाकृष्ण गुप्ता खास पर शामिल थे. डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता ने आपस में सांठगांठ कर हाईप्रोफाइल रैकेट तैयार कर लिया था. इस रैकेट ने शासन को करोड़ों रुपए की क्षति पहुंचाई.

लगभग 21 लाख फर्जी राशनकार्ड

भट्ट ने कहा कि वर्ष 2014 के अगस्त माह में नागरिक आपूर्ति निगम के पास 9 लाख मैट्रिक टन चावल का स्टाक था. इसके बावजूद मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह जो वित्त मंत्री भी थे ने विभाग के अधिकारियों पर दबाव देकर 10 लाख टन मीट्रिक टन चावल का अतिरिक्त उपार्जन करने का आदेश दिया था. इतना ही नहीं अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए 236 करोड़ की क्षतिपूर्ति की गारंटी बिना कैबिनेट की अनुमोदन के पास कर दिया था. जबकि शासन के हित में ऐसा नहीं किया जाना था. इस मामले में विभाग के अधिकारियों ने आपत्ति जताई तो उन्होंने अधिकारियों से कहा कि आपत्ति की आवश्यकता नहीं है. इस संदर्भ में हमें और पार्टी को लंबी-चौड़ी रकम मिलनी है और अगर आप लोग चाहे तो यह रकम आपको भी प्रदान की जाएगी. भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में 21 लाख फर्जी राशनकार्ड बनवाए गए थे. इस काम को खाद्य विभाग का कोई भी अधिकारी स्वेच्छा से करना नहीं चाहता था, लेकिन डाक्टर रमन सिंह, लीलाराम भोजवानी और पून्नूलाल मोहिले ने अधिकारियों को डराया-धमकाया और परिणाम भुगतने को तैयार रहने को कहा.

इधर शिवशंकर भट्ट के द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि हाईकोर्ट से जमानत पर चल रहे शिवशंकर भट्ट से बयान दिलाकर भाजपा की छवि खराब करने की कोशिश की गई है. कांग्रेस नान घोटाले के आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है. अपराधियों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की कोशिश की जा रही है. पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कभी सीएम हाउस में न तो पैसों को लेकर किसी के जाने जैसी कोई बात हुई है और न ही ऐसा करना संभव है. वहां आने-जाने वाले हर व्यक्ति के संबंध में इंट्री होती है. उन्होंने कहा कि वे इस मामले को लेकर कानूनी सलाह लेकर आगे की कार्रवाई करेंगे. 

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शिवशंकर का सनसनीखेज खुलासाः नान घोटाले में शामिल थे रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, कौशलेंद्र सिंह, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता और...

रायपुर. नान घोटाले के एक प्रमुख आरोपी शिवशंकर भट्ट ने नीरज श्रीवास्तव की अदालत में शपथपूर्वक दिए गए बयान में साफ तौर पर यह स्वीकार किया है कि नान घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, वन अफसर कौशलेंद्र सिंह, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता सहित अन्य कई लोग शामिल थे. भट्ट ने कहा कि वर्ष 2014 के अगस्त माह में नागरिक आपूर्ति निगम के पास 9 लाख मैट्रिक टन चावल का स्टाक था. इसके बावजूद मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह जो वित्त मंत्री भी थे ने विभाग के अधिकारियों पर दबाव देकर 10 लाख टन मीट्रिक टन चावल का अतिरिक्त उपार्जन करने का आदेश दिया था. इतना ही नहीं अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए 236 करोड़ की क्षतिपूर्ति की गारंटी बिना कैबिनेट की अनुमोदन के पास कर दिया था. जबकि शासन के हित में ऐसा नहीं किया जाना था. इस मामले में विभाग के अधिकारियों ने आपत्ति जताई तो उन्होंने अधिकारियों से कहा कि आपत्ति की आवश्यकता नहीं है. इस संदर्भ में हमें और पार्टी को लंबी-चौड़ी रकम मिलनी है और अगर आप लोग चाहे तो यह रकम आपको भी प्रदान की जाएगी.

भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में 21 लाख फर्जी राशनकार्ड बनवाए गए थे. इस काम को खाद्य विभाग का कोई भी अधिकारी स्वेच्छा से करना नहीं चाहता था, लेकिन डाक्टर रमन सिंह, लीलाराम भोजवानी और पून्नूलाल मोहिले ने अधिकारियों को डराया-धमकाया और परिणाम भुगतने को तैयार रहने को कहा.

इधर शिवशंकर भट्ट के द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि हाईकोर्ट से जमानत पर चल रहे शिवशंकर भट्ट से बयान दिलाकर भाजपा की छवि खराब करने की कोशिश की गई है. कांग्रेस नान घोटाले के आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है. अपराधियों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की कोशिश की जा रही है. पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कभी सीएम हाउस में न तो पैसों को लेकर किसी के जाने जैसी कोई बात हुई है और न ही ऐसा करना संभव है. वहां आने-जाने वाले हर व्यक्ति के संबंध में इंट्री होती है. उन्होंने कहा कि वे इस मामले को लेकर कानूनी सलाह लेकर आगे की कार्रवाई करेंगे. 

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पत्रकार सुरक्षा कानून का ड्राफ्ट लगभग तैयार...छत्तीसगढ़ में जल्द ही लागू होगा कानून

रायपुर. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की सरकार जल्द ही पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने वाली है. इस कानून के तहत पत्रकारों को किसी भी तरह के झूठे मामलों में फंसाना आसान नहीं होगा. इतना ही नहीं पत्रकारों के खिलाफ दुर्भावनापूर्वक कार्रवाई करने वाले अफसरों और अन्य लोगों को जेल भी हो सकती है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत न्यायाधीश आफताब आलम, दिल्ली हाईकोर्ट की सेवानिवृत न्यायाधीश श्रीमती अंजना कुमार, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील राजूराम चंद्रम की निगरानी में यह ड्राफ्ट लगभग तैयार हो गया है.

गौरतलब है कि प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तब सरकारी अफसरों ने बदले की भावना से बड़ी संख्या में पत्रकारों को निशाना बनाया था. सुपर सीएम के नाम से विख्यात एक अफसर के इशारों पर राजधानी सहित विभिन्न इलाकों के लगभग ढाई सौ पत्रकारों पर जुर्म कायम किया गया था. जब कांग्रेस सत्ता में नहीं थीं तब उसने यह वादा किया था कि नई सरकार के गठन के साथ ही पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाया जाएगा. सरकार ने इस दिशा में मार्च महीने में कानून बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ की थी जो अब अंतिम दौर पर है. फिलहाल इस कानून पर विचार-विमर्श के लिए छत्तीसगढ़ के अफसरों का एक दल शुक्रवार को दिल्ली जा रहा है. इस बारे में शनिवार को एक अहम बैठक होगी.

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पत्रकारों की अधिमान्यता समिति में पहली बार दूर-दराज इलाकों के कई पत्रकार शामिल

राज्य और जिला स्तर के अलावा अब विकासखण्ड स्तर पर भी दी जाएगी अधिमान्यता

रायपुर. भूपेश बघेल की सरकार ने पहली बार राज्य और जिला स्तर के अलावा विकासखंड स्तर पर अधिमान्यता देने का निर्णय लिया है.मीडिया के प्रतिनिधियों को अधिमान्यता प्रदान करने के लिए शासन ने नए अधिमान्यता नियमों के तहत राज्य और संभाग स्तरीय समितियों का गठन भी कर दिया है. इन समितियों में राज्य के विभिन्न हिस्सों के दूर-दराज और कठिन इलाकों में रहकर पत्रकारिता करने वाले कई पत्रकारों को शामिल किया गया है. (अब तक ऐसा नहीं हो पाया था. भाजपा के शासनकाल में बनी समितियों में ज्यादातर गैर-पत्रकार और लाइजनर काबिज हो गए थे. ) बहरहाल नई अधिमान्यता समितियों के गठन की अधिसूचना 3 सितम्बर 2019 के शासकीय गजट में प्रकाशित भी कर दी गई है. सरकार के इस फैसले से पत्रकारों के एक बड़े वर्ग में हर्ष व्याप्त है. सही मायनों में पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों को अब जाकर यह लग रहा है कि उनका हक अब मालिक और उसके परिजन नहीं उठा पाएंगे. यहां यह बताना लाजिमी है कि पिछली सरकार में अखबार के मालिक  और उनके परिजनों ने पत्रकारों का हक मारकर अधिमान्यता हासिल कर रखी थीं. 

राज्य अधिमान्यता समिति में 10 पत्रकार सदस्य और आयुक्त- संचालक जनसम्पर्क के अलावा उनके द्वारा नामांकित अधिकारी समिति के सदस्य होंगे. इसी तरह संभाग स्तरीय अधिमान्यता समिति में 9 पत्रकार सदस्य और संभागीय मुख्यालय स्थित जनसम्पर्क कार्यालय के प्रमुख समिति के सदस्य होंगे. राज्य स्तरीय अधिमान्यता समिति राज्य के स्तर पर अधिमान्यता का काम देखेंगे जबकि संभागीय अधिमान्यता समिति जिला एवं विकासखंड स्तरीय अधिमान्यता प्रदान करेगी.

राज्य स्तरीय अधिमान्यता समिति में भास्कर के संपादक शिव दुबे, अमृत संदेश से संजीव वर्मा, नवभारत से राजेश जोशी, नई दुनिया से आलोक मिश्रा, इवनिंव टाइम्स से नथमल शर्मा, बस्तर इम्पैक्ट से सुरेश महापात्र, देशबन्धु से प्रकाश जैन, पत्रिका से राजेश लाहोटी, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से प्रकाशचन्द्र होता, ब्रम्हवीर सिंह को शामिल किया गया है.

रायपुर संभागीय अधिमान्यता समिति में नवाब फाजिल उप संपादक भास्कर सुश्री रश्मि ड्रोलिया विशेष संवाददाता टाइम्स ऑफ इंडिया, राजकुमार सोनी संपादक अपना मोर्चा डॉट काम, गोकुल सोनी फोटोग्राफर नवभारत, विजय मिश्रा अग्रदूत, आनंद साहू ब्यूरो प्रमुख नई दुनिया, अब्दुल रज्जाक धमतरी, मनोज सिंह संपादक स्वराज एक्सप्रेस और फारूख मेमन आईबीसी-24 सदस्य बनाए गए हैं.

बिलासपुर संभाग के लिए बनी अधिमान्यता समिति में अशोक शर्मा संपादक देशबंधु बिलासपुर, सुनील गुप्ता समाचार संपादक नई दुनिया,  विपुल गुप्ता संपादक दैनिक भास्कर, हर्ष पाण्डेय संपादक नवभारत, अरूण श्रीवास्तव पत्रिका, विजय केडिया संवाददाता पीटीआई, प्रेमचन्द्र जैन संवाददाता कोरबा-बाल्को टाईम्स कोरबा, प्रशान्त सिंह संवाददाता सहारा समय और मनोज सिंह वरिष्ठ संवाददाता आईबीसी-24 बिलासपुर सदस्य होंगे.

दुर्ग संभागीय अधिमान्यता समिति में टी.सूर्याराव, नितिन त्रिपाठी, अतुल अग्रवाल, हरबंसलाल अरोरा, आलोक तिवारी , शशांक तिवारी, अविनाश ठाकुर , मिथलेश ठाकुर, हितेश शर्मा  सदस्य मनोनीत किए गए हैं.

सरगुजा संभागीय अधिमान्यता समिति में उपेन्द्र दुबे ब्यूरो प्रमुख अम्बिकावाणी सूरजपुर,अरूण सिहं ब्यूरो प्रमुख हरिभूमि अम्बिकापुर, योगेश मिश्रा ब्यूरो प्रमुख दैनिक भास्कर अंबिकापुर, सुधीर पाण्डेय ब्यूरो प्रमुख नवभारत अम्बिकापुर, विजय त्रिपाठी प्रधान संपादक दैनिक जशपुरांचल जशपुर, अशोक सिंह ब्यूरो प्रमुख नई दुनिया बैकुण्ठपुर कोरिया,  रमेश शर्मा संवाददाता यूएनआई पत्थलगांव, अमितेष पाण्डेय संवाददाता न्यूज 18 अम्बिकापुर और अभिषेक सोनी संवाददाता आईबीसी-24 अम्बिकापुर सदस्य होंगे.

बस्तर संभागीय अधिमान्यता समिति में पवन दुबे प्रधान संपादक चैनल इंडिया जगदलपुर, मनीष गुप्ता ब्यूरोचीफ नवभारत जगदलपुर, सुरेश रावल ब्यूरो प्रमुख हरिभूमि जगदलपुर, शैलेन्द्र ठाकुर ब्यूरो प्रमुख दैनिक भास्कर दंतेवाड़ा, टिंकेश्वर तिवारी ब्यूरो प्रमुख दण्डकारण्य समाचार कांकेर, राजेन्द्र तिवारी जगदलपुर,  नरेश मिश्रा विशेष संवाददाता आईबीसी-24 जगदलपुर, बप्पी राव संवाददाता और वीरेन्द्र मिश्रा, सदस्य होंगे.  

ज्ञात हो कि गत जुलाई माह में छत्तीसगढ़ समाचार मीडिया प्रतिनिधि अधिमान्यता नियम 2019 लागू किया गया है. नए अधिमान्यता नियमों में प्रिंट मीडिया के साथ-साथ टी.व्ही. न्यूज चैनल्स, न्यूज वेबपोर्टल, न्यूज एजेंसी आदि के समाचार प्रतिनिधियों को अधिमान्यता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है. नए अधिमान्यता नियमों को और विस्तृत करते हुए अब विकासखंड स्तर पर ही अधिमान्यता प्रदान की जाएगी.

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... तो क्या झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं को मौत के घाट उतारने में पुलिस अफसर आरएन दास शामिल थे ?

रायपुर.  छत्तीसगढ़ के लोग मंतूराम पवार के नाम से भली-भांति वाकिफ है. मंतूराम वही है जो कभी कांग्रेस से जुड़े थे ( अब भाजपा में हैं. ) और जिन्होंने धुर माओवाद प्रभावित अंतागढ़ में होने वाले उपचुनाव के दौरान एकायक अपना नाम वापस लेकर सबको चौका दिया था. तब कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल थे. वे इस मामले को लेकर आरोप लगाते रहे कि मंतूराम की खरीद-फरोख्त हुई है, लेकिन तमाम तरह के दस्तावेजी सबूतों के बावजूद कहीं सुनवाई नहीं हुई. यहां तक चुनाव आयोग के सामने धरना-प्रदर्शन हुआ मगर आयोग हाथ में हाथ धरे बैठा रहा. मंतूराम जब भाजपा में चले गए तब भी किसी ने नहीं माना कि खरीद-फरोख्त का खेल हुआ है. शनिवार को मंतूराम ने अदालत के सामने यह मान लिया है कि उन्हें खरीदने के लिए कुल साढ़े सात करोड़ की डील हुई थी. मंतूराम की बात पर यकीने करें तो यह डील मंत्री राजेश मूणत के बंगले पर हुई थीं और खुद मूणत ने अपने हाथ से फिरोज सिद्दिकी और अमीन मेनन को सात करोड़ दिए थे. ( छत्तीसगढ़ के स्थानीय बाशिंदों को यह अवश्य सोचना चाहिए कि जब भाजपा की सरकार थी तब एक-एक मंत्री करोड़ों रुपए अपने बंगले में क्यों रखता था. ) बहरहाल एक ताजा घटनाक्रम में मंतूराम ने धारा 164 के तहत बयान देकर पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, उनके दामाद पुनीत गुप्ता, अजीत जोगी, उनके पुत्र अमित जोगी को आरोपों के कटघरे में खड़ा कर दिया है. मंतू ने अपने बयान में  जो सबसे चौकाने वाली बात कहीं है वह यह है कि नाम वापसी के खेल में कांकेर के एसपी की भी भूमिका थी. मंतूराम की नाम वापसी का घटनाक्रम वर्ष 2014 से जुड़ा है, तब कांकेर एसपी आरएन दास थे. मंतूराम का कहना है- मुझे कांकेर के पुलिस अधीक्षक का फोन आया था. पुलिस अधीक्षक ने कहा- मंतूराम जो कहा जा रहा है वह करो... नहीं तो तुम्हे झीरम घाटी का परिणाम भुगतना होगा. उल्लेखनीय है कि 25 मई 2013 को बस्तर के झीरमघाट में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया था. मंतूराम ने जो कुछ अपने बयान में कहा है अगर उस पर यकीन करें तो यह सवाल स्वाभाविक तौर पर उठता है कि क्या कांग्रेस नेताओं की मौत भाजपा के नेताओं के द्वारा रची गई एक गहरी साजिश थी और उसमें पुलिस अफसर आरएन दास भी शामिल थे?

विवादों से नाता रहा है दास का

आरएन दास इन दिनों पुलिस मुख्यालय में पदस्थ है,लेकिन उनकी गिनती कभी भी संवेदनशील और काबिल पुलिस अफसर के तौर पर नहीं होती रही. उनका नाम हमेशा विवादों से जुड़ा रहा और उनकी पहचान विवादों से नाता रखने वाले पुलिस अफसर शिवराम कल्लूरी के शार्गिद के तौर पर ही बनी रही. यहां यह बताना लाजिमी है कि फरवरी 2017 में आरएन दास ने अधिवक्ता शालिनी गेरा को अपने मोबाइल की बजाय एक संदिग्ध के नंबर से फोन करके धमकाया था. दास ने शालिनी को माओवादियों के साथ संबंध रखने का आरोप लगाते हुए थाने बुलाया. जब शालिनी और उनके साथियों ने जब नंबर की पड़ताल की तो वह अग्नि संस्था के एक सदस्य फारूख़ अली का निकला था. शालिनी गेरा ने इस बात की शिकायत मानवाधिकार में भी की थी. इसके अलावा बस्तर में निर्दोष आदिवासियों और बच्चों को मौत के घाट उतारने के मामले में भी आरएन दास की भूमिका को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं.

पहली बार आया डाक्टर रमन सिंह का नाम

अंतागढ़ टेपकांड में खरीद-फरोख्त किए जाने को लेकर अब तक पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी,अमित जोगी, पुनीत गुप्ता का नाम ही सामने आता रहा है, लेकिन पहली बार मंतूराम ने पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह को भी निशाना बनाया है. धारा 164 के तहत दिए गए अपने बयान में मंतूराम ने कहा है कि जब मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था तब फिरोज सिद्दिकी और अमीन मेनन ने कहा था कि अगर तुम यह काम नहीं करोगे तो रमन सिंह तुम्हारे पूरे खानदान को नहीं छोडेंगे. झीरमघाटी की तरह ही तुम्हें पूरे परिवार के साथ मसलकर फेंक दिया जाएगा. मैं जिस क्षेत्र से आता हूं वहां यह बात चर्चित एवं स्पष्ट थीं कि झीरम घाटी हत्याकांड में बड़े नेताओं का हाथ है. मंतूराम ने अपने बयान में यह भी कहा है कि जब रमन सिंह अपनी पत्नी के इलाज के लिए विदेश गए थे तब फिरोज सिद्दिकी ( फिरोज इन दिनों जेल में हैं. )  ने किसी के फोन से उनसे बात करवाई थीं. फोन पर बातचीत के दौरान रमन सिंह ने कहा था वे लोग जो कह रहे हैं वो तुमको करना है और मैं तुमको आर्शीवाद दूंगा. मंतूराम ने बयान में साफ किया कि पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, अजीत जोगी और अमित जोगी मिलकर काम करते थे. यह बात उन्हें फिरोज सिद्दिकी और अमीन मेनन ने बताई थी. मंतूराम ने शपथपूर्वक दिए गए अपने बयान में यह भी कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने उसका राजनीतिक भविष्य बनाने और लालबत्ती दिलाने का आश्वासन दिया था. अंतागढ़ चुनाव को प्रभावित करने में रमन सिंह, अजीत जोगी, अमित जोगी शामिल थे. जबरन ही उनका नाम ( मंतूराम ) खराब किया गया.

 

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प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजनाः गुणवत्ता में छत्तीसगढ़ पहले स्थान पर

रायपुर. भूपेश सरकार के सबसे काबिल मंत्री टीएस सिंहदेव ने एक बार फिर बाजी मार ली है. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में गुणवत्ता को लेकर छत्तीसगढ़ ने पहला स्थान हासिल कर लिया है. फिलहाल टीएस सिंहदेव पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री है.

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में गुणवत्ता का सबसे अधिक ध्यान रखा जाता है. इसके लिए सड़कों की तीन स्तरों पर जांच की जाती है. प्रथम स्तर पर विभागीय अभियंताओं के द्वारा जांच की जाती है. दूसरे स्तर पर राज्य के गुणवत्ता समीक्षकों के द्वारा और अंत में ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से नियुक्त किए गए गुणवत्ता निरीक्षकों के द्वारा. बहरहाल वर्ष 2019 में राष्ट्रीय स्तर के गुणवत्ता समीक्षकों ने कुल 204 सड़कों का निरीक्षण किया था. निरीक्षण में 95.59 फीसदी कार्य संतोषजनक पाया गया था. निरीक्षकों ने इस पड़ताल के आधार पर छत्तीसगढ़ को प्रथम स्थान प्रदान किया है जबकि 45 सड़कों के निरीक्षण के आधार पर कर्नाटक दूसरे स्थान पर है. यहां यह बताना लाजिमी है कि वर्ष 2017-18 में जब भाजपा की सरकार थीं और उसके मंत्री अजय चंद्राकर थे तब राज्य को गुणवत्ता में तृतीय स्थान हासिल हुआ था.

मुख्य कार्यपालन अधिकारी आलोक कटियार ने बताया कि राष्ट्रीय गुणवत्ता समीक्षकों के द्वारा सड़कों के निरीक्षण का कार्य पूर्ण पारदर्शिता के साथ किया जाता है. इसके लिए बकायदा समाचार पत्रों में जानकारी दी जाती है. यहां तक गुणवत्ता के समीक्षकों के नाम और मोबाइल नंबर की जानकारी भी दी जाती है. उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 से लेकर जून 2019 तक छत्तीसगढ़ में सात किलोमीटर प्रतिदिन के हिसाब से कुल 2414 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण सफलतापूर्वक कर लिया गया है. पिछले पन्द्रह सालों में किसी भी एक छमाही में इतनी लंबी सड़कों का निर्माण प्रदेश में पहले कभी नहीं हुआ. छत्तीसगढ़ के घोर माओवादी इलाकों में भी वृहत स्तर पर सड़कों का निर्माण कर लेना एक बड़ी उपलब्धि है. श्री कटियार ने इस उपलब्धि का श्रेय पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री टीएस सिंहदेव एवं अपर मुख्य सचिव आरपी मंडल के अलावा ग्रामीण विकास अभिकरण के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को दिया है. कटियार ने बताया कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के प्रथम चरण के अंतर्गत सभी कार्य पूर्ण हो चुके हैं. इसके बाद ही दूसरे चरण की पात्रता दी गई थीं. अब तीसरे चरण के लिए भी राज्य को अच्छा-खासा पैकेज मिलेगा.

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एक्सप्रेस- वे की सड़क धंसी... अनिल राय पर भी उठे सवाल

रायपुर. छोटी लाइन को हटाकर रेलवे स्टेशन से शदाणी दरबार तक बनाए गए 12 किमी फोरलेन एक्सप्रेस-वे की सड़क का एक हिस्सा गुरुवार को धसक गया. इस सड़क के धंसने से एक कार पलट गई और महावीर नगर निवासी अभिनव शुक्ला-दिव्या राज शुक्ला को गंभीर चोटें आई. सड़क के धसकने के साथ भाजपा बचाव की मुद्रा में आ खड़ी हुई तो कांग्रेस ने भाजपा शासनकाल की कमीशन खोरी को जिम्मेदार माना है. प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने एक्सप्रेस वे हुए हादसे के लिए पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह पूर्व पीडब्ल्यूडी मंत्री राजेश मूणत और पूर्व विधायक श्रीचंद सुन्दरानी को जिम्मेदार ठहराया है. जबकि कांग्रेस के संयुक्त सचिव नरेश गड़पाल ने सीधे तौर पर पीडब्लूडी विभाग के अनिल राय पर निशाना साधा है.

नरेश गड़पाल का कहना है कि 22 अप्रैल 2017 में इस सड़क के निर्माण कार्य का ठेका आयरन ट्रेंगल लिमिटेड को कुल 258.11 करोड़ में दिया गया था. धीरे-धीरे यह राशि और अधिक हो गई. गड़पाल ने कहा कि जिस रोज से यह सड़क बन रही थीं उसी रोज से इसकी गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे थे और भ्रष्टाचार की बू आने लगी थीं.कई तरह की शिकायतों के बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई और अततः इस साल की पहली झमाझम बारिश में सड़क के कई हिस्से धसक गए. उन्होंने कहा कि पूर्व पीडब्लू मंत्री राजेश मूणत तो इसके जिम्मेदार है ही, लेकिन योजना को अंजाम देने वाले अनिल राय भी इसके मुख्य कर्ताधर्ता है. गड़पाल ने कहा कि अनिल राय वन विभाग के अफसर है जिन्हें सड़क निर्माण और उसकी गुणवत्ता का अनुभव भी नहीं है बावजूद इसके वे लंबे समय से पीडब्लूडी विभाग में जमे हुए हैं. 

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर का कहना है कि एक्सप्रेस-वे के उदघाटन के लिए भाजपा ने प्रदर्शन किया था जो घटिया निर्माणकर्ता ठेकेदार के हित को समर्पित था. भाजपा को राजधानी में रहने वाली जनता की सुरक्षा नही बल्कि एक्सप्रेस वे का निर्माण करने वाले ठेकेदार की बिल की चिंता थी.इधर सड़क के धसक जाने के बाद लोक निर्माण मंत्री ताम्रध्वज साहू ने जांच के निर्देश तो दे दिए हैं, अब यह देखना बाकी है कि इस जांच में अनिल राय पर कोई कार्रवाई होती भी है या नहीं ? वैसे पिछले कुछ समय से राजनीति और प्रशासनिक  गलियारों में एक सवाल लगातार उठ रहा है कि मंत्रालय में पदस्थ रहे बहुत से वन अफसरों की उनके मूल विभाग में वापसी हो गई है तो फिर अनिल राय को वापस क्यों नहीं भेजा जा रहा है ? आखिर अनिल राय को किसका संरक्षण हासिल है ? 

 

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खुशखबरीः प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तीसरे चरण के लिए छत्तीसगढ़ को मिल सकता है बड़ा पैकेज

रायपुर. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के क्रियान्वयन में देश में प्रथम स्थान हासिल करने के बाद छत्तीसगढ़ को तीसरे चरण के लिए केंद्र से एक बड़ा पैकेज मिल जाने की उम्मीद है. यह पैकेज तीन से पांच हजार करोड़ या उससे अधिक का हो सकता है. अगर ऐसा होता है तो निश्चित रुप से इसका श्रेय मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके सबसे काबिल मंत्री टीएस सिंहदेव के खाते में जाना तय है.

गौरतलब है कि इसी साल सात जून को केंद्रीय ग्रामीण विकास विभाग के सचिव की अध्यक्षता में प्रोजेक्ट रिव्यू कमेटी की बैठक हुई थी.इस बैठक में यह तथ्य सामने आया कि सभी राज्यों की अपेक्षा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत निर्मित होने वाली सड़कों की प्रगति छत्तीसगढ़ में सबसे बेहतर है. प्रदेश में 2248.71 किमी सड़कों का निर्माण किया जाना था और छत्तीसगढ़ ने तय समय में गुणवत्ता के साथ 2013.65 किमी सड़कों का निर्माण कर लिया था. इतना ही नहीं पीएमजीएसवाय-2 के तहत छत्तीसगढ़ ने यातायात के हिसाब से अधिक घनत्व रखने वाली सड़कों में पुल-पुलियों के साथ डामरीकरण का कार्य भी सफलतापूर्वक संपन्न कर लिया था.

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के मुख्य कार्यपालन अधिकारी आलोक कटियार ने बताया कि तीसरे चरण में पूरे देश कुल 80 हजार किलोमीटर सड़कें बनेगी. इसके तहत छत्तीसगढ़ में भी ग्रामीण बसाहटों को सुगम बनाने के लिए सड़कों का निर्माण होगा. कटियार ने बताया है कि तीसरे चरण के लिए फिलहाल ड्राफ्ट गाइड लाइन जारी हुआ है. सभी जिलों में डीआरआरपी ( डायरेक्ट रुलर रोड़ प्लान ) तैयार कर लिया गया है. अब यूनिटी वैल्यू के आधार पर जिला स्तर पर प्राथमिकता का ध्यान रखते हुए सड़कों के चयन का काम चल रहा है. उन्होंने बताया कि डीपीआर कंसलटेंट की नियुक्ति के लिए निविदा आमंत्रण की कार्यवाही पूर्ण की जा चुकी है. मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने कहा है कि फेस-2 को लेकर केंद्र से मिली सराहना के बाद फेस-3 का काम भी शानदार ढंग से संपादित किया जाएगा. उन्होंने कहा कि विभागीय मंत्री टीएस सिंहदेव की अगुवाई में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के समस्त कर्मचारी एवं अधिकारी प्रतिबद्धता के साथ कार्यरत है इसलिए यह तय है कि तीसरे चरण का काम भी पूरी गुणवत्ता के साथ निर्धारित समय में पूर्ण कर लिया जाएगा.

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