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बिलासपुर प्रेस क्लब अध्यक्ष और उसके बेटे को शराब ठेकेदार ने दी जान से मारने की धमकी... मामले ने तूल पकड़ा

रायपुर. बिलासपुर प्रेस कल्ब के अध्यक्ष तिलक राज सलूजा और उनके पुत्र गुरजीत सलूजा को  शराब ठेकेदार राजा भाटिया द्वारा गाली-गलौच कर जान से मारने की धमकी देने वाले मामले ने तूल पकड़ लिया है. हालांकि पुलिस ने शराब ठेकेदार के खिलाफ धारा 294 और 506 के तहत मामला दर्ज कर लिया है, लेकिन दूसरी ओर पुलिस ने राजा भाटिया की शिकायत पर एक काउंटर रिपोर्ट भी दर्ज कर ली है. इधर सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में शराब ठेकेदार की ओर से प्रेस क्लब अध्यक्ष के खिलाफ किए जा रहे दुष्प्रचार से प्रेस कल्ब के जिम्मेदार सदस्य खफा है और जल्द ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मिलकर वस्तुस्थिति से अवगत कराने की योजना पर विचार कर रहे हैं.

गौरतलब है कि इसी माह 16 मई को शीतला मंदिर दयालबंद का रहवासी गुरजीत सलूजा उर्फ शानू रात 8 बजे अपने पिता तिलक सलूजा के लौटने का इंतजार कर रहा था. ठीक उसी दौरान वहां राजा भाटिया आया और उसने गाली-गलौच करते हुए उसे जान से मारने की धमकी दी. भाटिया ने शानू के पिता का नाम लेकर उसे भी देख लेने को कहा. बताया जाता है कि शराब ठेकेदार और शानू के बीच घर के पास की एक जमीन में गेट लगाए जाने को लेकर पुराना विवाद चल रहा है. इसके पहले भी कई बार विवाद की स्थिति निर्मित हो चुकी है. गुरजीत का आरोप है कि जमीन छोड़ने के एवज में राजा भाटिया उनसे 10 लाख रुपए मांग करता है. गुरजीत का कहना है कि अब भी राजा भाटिया इधर-उधर से धमकी-चमकी के खेल में लगा हुआ है. उसके हौसले बुलंद है. प्रेस कल्ब अध्यक्ष तिलक राज सलूजा का कहना है कि पुराने जमीनी विवाद में शराब ठेकेदार आए दिन विवाद की स्थिति पैदा करते रहा है. अगर कोई बात गलत है तो उसका निराकरण कानून- सम्मत तरीके से ही हो सकता है, लेकिन गाली-गलौच और जान से मारने की धमकी देना यह साबित करता है कि शराब ठेकेदार के हौसले बुलंद है. 

 

 

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बिलासपुर में आईजी बंगले के पास सामाजिक कार्यकर्ता नंद कश्यप पर गुंडों ने किया हमला

रायपुर. बिलासपुर के रहवासी देश के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता नंद कश्यप पर बीती रात कुछ गुंडों ने प्राणघातक हमला कर उन्हें बुरी तरह से घायल कर दिया है. हमले में कश्यप के बड़े भाई और उनके पुत्र अंकित कश्यप को भी चोटें आई है. अंकित फिलहाल अपोलो अस्पताल में भर्ती है जहां उसकी स्थिति गंभीर बनी हुई है.

बताया जाता है कि कश्यप बिलासपुर में ठीक आईजी बंगले के पास सिविल लाइन में निवास करते हैं. यहीं पर राकेश सहगल नाम का चिकित्सक पिछले कई सालों से एक अस्पताल का संचालन करता है. रिहाइशी इलाके में अस्पताल के संचालन की वजह से आए दिन पार्किंग को लेकर विवाद की स्थिति निर्मित होते रहती है. बीती रात भी पार्किंग को लेकर बहस हुई और इतनी ज्यादा बढ़ गई कि थोड़ी ही देर में तालापारा के पालित गुंड़ों ने कश्यप और उनके परिजनों पर हमला कर दिया. बताते हैं कि तालापारा में तैय्यब नाम के शख्स ने पैसे लेकर काम करने वाले कुछ असामाजिक तत्वों को संरक्षण दे रखा है. यह शख्स शहर के रसूखदार लोगों  इशारे पर अपनी फौज लेकर घटना स्थल पर पहुंच जाता है. शहर के वे लोग जो गुंडे और मवालियों से मदद लेने के आदी है अक्सर तैय्यब गैंग की सेवाएं लेते रहते हैं. ऐसे लोगों में शहर के नामी-गिरामी नेता भी शामिल है. सूत्रों का कहना है कि यह शख्स लोगों से मकान खाली करवाने से लेकर अन्य सभी तरह के अवैधानिक कामों को प्रोफेशनल तौर-तरीके से अंजाम देता है. ऐसा नहीं है कि पुलिस को इस गैंग की जानकारी नहीं है, लेकिन वह खामोश बनी रहती है. इस घटना में राकेश सहगल के साथ तैय्यब गैंग और गुलशन नाम के एक नेताजी की भूमिका सामने आई है. घटना के बाद पुलिस ने कुछ संदिग्ध लोगों की धरपकड़ की है, लेकिन अब तक राकेश सहगल, तैय्यब और घटना से जुड़े प्रमुख लोग गिरफ्त से बाहर है. पीयूसीएल के पूर्व अध्यक्ष लाखन सिंह और अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला ने बताया कि बुधवार को घटना के विरोध में सामाजिक कार्यकर्ता और ट्रेड यूनियन से जुड़े लोग कलक्टर से मिलकर ज्ञापन सौपेंगे.

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बिलासपुर की अधिवक्ता प्रियंका को बदनाम करने की साजिश

रायपुर. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाली प्रियंका शुक्ला एक अधिवक्ता होने के साथ-साथ एक प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता भी है. कई सामाजिक मुद्दों पर जूझते रहने की वजह से प्रियंका ने बेहद अल्प समय में ही अपनी एक अलग पहचान कायम कर ली है, लेकिन उनकी यही पहचान परेशानी का सबब बन गई है.कतिपय असामाजिक तत्व उनकी पहचान को मटियामेट करने के खेल में लग गए हैं. पिछले दिनों प्रियंका के खिलाफ बिलासपुर के गोंडपारा में रहने वाली एक महिला विमला लहरे ने पुलिस अधीक्षक से शिकायत में यह आरोप लगाया था कि प्रियंका सामाजिक कार्यों की आड़ लेकर किसी दूसरे तरह के कामधंधों में लिप्त है जिसे समाज खुले तौर पर स्वीकार नहीं कर सकता. जाहिर सी बात है कि कोई महिला सामाजिक विद्रूपताओं के खिलाफ संघर्ष करती है तो आरोप चारित्रिक हनन के भंयकर आरोपों से ग्रसित ही होगा. इस शिकायत के बाद पुलिस भी ताबड़तोड़ ढंग से सक्रिय हुई क्योंकि वह भी प्रियंका के आंदोलन से लगातार परेशान चल रही थी. समय-असमय कुछ पुलिसकर्मी उन्हें सबक सिखाने की धमकी भी दे चुके हैं. खैर... पुलिस ने जबरदस्त ढंग से छानबीन की तो पता चला कि गोंडपारा में विमला लहरे नाम की कोई महिला ही नहीं रहती है और शिकायत झूठी है. इस झूठी शिकायत के बाद भी पुलिस ने प्रियंका को बयान देने के लिए थाने बुलवाया और मनोवैज्ञानिक ढंग से दबाव बनाते हुए कहा- मैडम...अब शिकायत मिली है तो जांच करनी ही पड़ती है.

बहरहाल झूठी शिकायत और पुलिस की छानबीन के बाद सोमवार को बिलासपुर के सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता आनंद मिश्रा, नंद कश्यप, लाखन सुबोध, रजनी सौरेन, गायत्री सुमन, निकिता, सोनिया, दिव्या जायसवाल, मनोज अग्रवाल, राधा श्रीवास, निलोत्पल शुक्ला, संपा सिकंदार, इंदु यादव, तुषार बीके और डाक्टर लाखन सिंह ने पुलिस अधीक्षक अभिषेक मीणा से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा है. पुलिस अधीक्षक ने प्रतिनिधि मंडल से कहा कि जो कोई भी सामाजिक क्षेत्र में काम करता है उसे ऐसी विचित्र स्थितियों का सामना करना ही पड़ता है. अव्वल तो पुलिस की कार्रवाई ही संदेह के घेरे में है. जब एक शिकायत को पुलिस ने अपनी स्वयं की छानबीन में गलत पा लिया तो फिर प्रियंका को बयान देने के लिए थाने क्यों बुलवाया. पुलिस प्रियंका का बयान लेकर क्या यह संदेश देना चाहती थी कि ज्यादा आंदोलन करने से इसी तरह की जांच-पड़ताल से गुजरना होता है. पुलिस अधीक्षक मीणा का यह बयान भी चौकाने वाला है जब वे कहते हैं कि कोई सामाजिक कार्य करता है तो उसे इसी तरह की परिस्थितियों का सामना करना ही होता है. बेहतर होता कि पुलिस अधीक्षक कहते- हमने शिकायत को झूठी पाया है अब हम यह पता लगाने की कोशिश करते है कि इस गुमनाम चिट्ठी के खेल के पीछे कौन है. पुलिस अधीक्षक अगर इस तथ्य पर काम करते तो बेहतर स्थिति होती और फिर कोई दोबारा जनहित के मसलों पर काम करने वाली किसी महिला के खिलाफ झूठी शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटाता.

कौन हो सकता है साजिशकर्ता

इस गुमनाम चिट्ठी के बाद यह सवाल उठ रहा है कि आखिरकार प्रियंका से किसको दिक्तत है. कौन है मुख्य साजिशकर्ता. प्रियंका कहती है- पिछले कुछ समय से वह महिला एवं बाल विकास विभाग के मामलों को देख रही थी. इस विभाग की भर्राशाही से परेशान कतिपय लोगों ने उनसे संपर्क किया था. एक बच्चे को गोद लेने वाले मामले में भी एक वकील ने फोन करके कहा था कि कहां पचड़े में पड़ रही हो. माना जा रहा है कि इस गुमनाम, लेकिन आरोपों से भरे सनसनीखेज खत के पीछे इसी विभाग के एक कद्दावर अधिकारी की भूमिका है. चारित्रिक आरोपों के जरिए प्रियंका को बदनाम करने के खेल में धारा 376 के केस में फंसे एक युवक और पुलिस की भूमिका को भी जोड़कर देखा जा रहा है. प्रियंका ने अपना मोर्चा डॉट कॉम से कहा कि इधर-उधर जो पत्राचार हुआ है उसकी भाषा से यह तो समझ में आ गया है कि खेल के पीछे कौन है.... जल्द ही पर्दाफाश भी हो जाएगा.

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मुकेश गुप्ता से मेरी जान को खतरा... पत्रकार नारायण शर्मा ने लगाई मुख्यमंत्री से गुहार

रायपुर. इंडियन मीडिया वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार नारायण शर्मा ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को खत लिखकर विवादास्पद निलंबित आईपीएस मुकेश गुप्ता के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है. श्री शर्मा ने कहा है कि मुकेश गुप्ता उन्हें पहले भी जान से मारने की धमकी दे चुके हैं और अब भी उनके ऊपर जान माल की हानि का खतरा मंडरा रहा है.

15 मई 2019 को लिखे एक खत में नारायण शर्मा ने मुख्यमंत्री बघेल से गुहार लगाते हुए पूर्व में घटित एक वाक्ये का जिक्र भी किया है. श्री शर्मा ने अपने आवेदन के साथ भाजपा सरकार के समय पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह को सौंपा गया एक खत भी संलग्न किया है. इस खत में उन्होंने लिखा है कि दिनांक 17 जनवरी 2014 को जब वे बस्तर में गिरफ्तार किए गए माओवादियों की गिरफ्तारी से संबंधित समाचार के संकलन के लिए तत्कालीन पुलिस महानिदेशक रामनिवास से मुलाकात करने उनके कक्ष में गए थे तब अचानक मुकेश गुप्ता वहां पहुंचे और उन्होंने वहां मौजूद एक अन्य पुलिस अफसर से कहा कि हमारा अगला टारगेट नारायण शर्मा है. इनको पन्द्रह से बीस दिन में निपटा देना है. अफसर ने भी गुप्ता की हां में हां मिलाई. नारायण शर्मा ने लिखा कि वे चुपचाप मुकेश गुप्ता की बात सुनते रहे. पुलिस महानिदेशक रामनिवास ने मुकेश गुप्ता को खामोश रहने के लिए कहा, लेकिन वे खामोश नहीं हुए और नजदीक आकर बोले- मुझे सब पता है कि तुम कितनी बार माणिक मेहता से मिलने जेल गए और कितनी बार उसकी मां श्यामा मेहता से मिलने कोर्ट में गए थे. मुझे यह भी पता है कि तुम फोन में किस-किस से क्या-क्या बात करते हो.

नारायण शर्मा ने अपना मोर्चा डॉट कॉम से कहा कि जब यह घटना घटित हुई थी तब भूपेश बघेल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे और अब भी है. घटना की विस्तृत जानकारी लेने के बाद श्री बघेल ने दिनांक 13 फरवरी 2014 को डाक्टर रमन सिंह को खत लिखकर पुलिस अफसरों के कृत्य को निदंनीय और गंभीर बताते हुए कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन रमन सिंह ने मुकेश गुप्ता के खिलाफ कभी किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की. उलटे मुकेश गुप्ता और ज्यादा शक्तिशाली बना दिए गए. इधर भूपेश बघेल की सरकार ने मुकेश गुप्ता के खिलाफ एक्शन तो लिया है, लेकिन अब भी निरकुंशता कम नहीं हुई है. श्री शर्मा ने कहा कि वर्ष 2014 में ही मुकेश गुप्ता ने साफ-साफ कहा था कि उन्हें सब पता है कि तुम फोन पर किससे-किससे बात करते हो... जाहिर सी बात है कि तब मुकेश गुप्ता मेरा ( नारायण शर्मा ) का फोन टेप करते थे. नारायण शर्मा ने कहा कि पूर्व में भी मुकेश गुप्ता ने उन्हें चार झूठे मामलों में फंसाया था और अब भी वे अपने सहयोगियों के साथ मिलकर मुझे और मेरे परिवार को जान से खत्म करने की साजिश रच रहे हैं.

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कैसे मिलेगी मलाईदार पोस्टिंग... उठा-पटक में लगे हैं लूप लाइन में बैठे वन अफसर

रायपुर. प्रदेश में जब रमन सिंह की सरकार थीं तब भारतीय वन सेवा के अधिकांश अफसर मंत्रालय और अन्य महत्वपूर्ण जगहों पर मलाई छान रहे थे. नई सरकार के गठन के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने लंबे समय से मंत्रालय में पदस्थ रहने वाले अफसरों को अरण्य भवन रास्ता दिखाया, लेकिन वन अफसरों में लोक निर्माण के सचिव अनिल राय, योजना सांख्यिकी में पदस्थ आशीष भट्ट, सामान्य प्रशासन विभाग विभाग के कौशलेंद्र सिंह और सचिव जयसिंह महस्के ऐसे हैं जिनकी पदस्थापना मंत्रालय में है. आशीष भट्ट और महस्के को लेकर गंभीर शिकायतें भी नहीं है, लेकिन भाजपा सरकार में सुपर सीएम की नाक का बाल समझे जाने वाले अनिल राय अब तक मंत्रालय में कैसे टिके हैं इसे लेकर कई तरह की चर्चा प्रशासनिक गलियारों में कायम है. मंत्रालय से बाहर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क में पदस्थ आलोक कटियार की विवादित कार्यशैली की गूंज भी अब हर चौक-चौराहों में सुनाई देने लगी है. सीएसआईडीसी में पदस्थ अरुण प्रसाद से उनका अपना स्टाफ ही खफा चल रहा है. ( आधे से ज्यादा पुराने साहब सुनील मिश्रा से घरोबा रखने वाले हैं. )  अलबत्ता पर्यटन एवं संस्कृति विभाग में पदस्थ अनिल साहू न काहू से दोस्ती न  काहू से बैर... सिद्धांत का पालन करते हुए काम कर रहे हैं.

इधर चुनाव परिणाम के बाद 27 मई तक आचार सहिता हट जाएगी, लेकिन वन विभाग में लूप लाइन में पदस्थ अफसर मलाईदार जगह पाने के लिए अभी से जोड़-तोड़ में लग गए हैं. सुपर सीएम के साथ कई बार विदेश यात्रा करने वाले सुनील मिश्रा अरण्य भवन लौटे तो उन्हें दो महीने तक बैठने की जगह तक नहीं मिली. उनकी सारी हेकड़ी निकल गई थी. जैसे-तैसे उन्होंने वन विभाग की कमान संभालने वाले राकेश चतुर्वेदी को मनाया तो उन्हें काम सौंपा गया. फिलहाल वे वन विभाग की शिकायतों का निराकरण करने में लगे हुए हैं और चिट्ठी-पत्री का जवाब देते हैं. खबर है कि मिश्रा एक बार फिर मंत्री परिक्रमा में लग गए हैं. वन अफसर संजय शुक्ला पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांड के बेहद नजदीकी समझे जाते थे. जब तक ढांड मंत्रालय में पदस्थ थे तब तक उन्हें महत्वपूर्ण दायित्व भी दिया जाता रहा. जमीनों की खरीदी और बेशुमार संपत्ति अर्जित करने के आरोपों से घिरे संजय शुक्ला भी अरण्य भवन तो लौटे तो कई दिनों तक खाली रहे. फिलहाल उन्हें अनुश्रणव एवं मूल्यांकन का कामकाज सौंपा गया है. सूत्र बताते हैं कि वे भी अपने पुराने संबंधों के जरिए जोड़-तोड़ कर रहे हैं. हालांकि श्री शुक्ला राज्य लघु वनोपज संघ में एडिशनल एमडी बनने के लिए पहले भी प्रयासरत थे, लेकिन तब उनका जुगाड़ काम नहीं आया. तुरुप का पता ही फेल हो गया. हार्टिकल्चर से लौटे नरेंद्र पांडे किसी तरह की कवायद में नहीं लगे हैं क्योंकि उनकी सेवानिवृति को कुछ समय ही बाकी है. इसी 30 जून को वरिष्ठ अफसर कौशलेंद्र सिंह, केसी यादव और एके द्विवेदी भी सेवानिवृत हो रहे हैं सो वे भी खामोश है. अगर पुरानी सरकार होती तो अफसर संविदा में तैनाती के लिए आवेदन लगा चुके होते. अरण्य भवन लौटने वालों में वन अफसर नरसिम्हाराव और रामाराव भी शामिल है. ये दो अफसर ऐसे हैं जिनके पास किसी भी तरह का कोई काम नहीं है. ये दोनों अफसर अरण्य भवन में काफी-चाय पीने आते हैं. किसी चपरासी से पूछिए कि साहब... क्या कर रहे हैं तो जवाब मिलता है- साहब... मक्खी मार रहे हैं.

( अपना मोर्चा डॉट कॉम की प्रत्येक खबर को आप प्रकाशित करने के लिए स्वतंत्र है. बस... आपको साभार... अपना मोर्चा डॉट कॉम लिखना होगा. खबरों को जस का तस यानी कापी पेस्ट करने वालों से यह निवेदन मात्र है. ) 

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मशहूर कत्थक नृत्यांगना से विकास ने पूछा- बताइए आपके हसबैंड छत्तीसगढ़ छोड़कर क्यों भाग गए

रायपुर. अब तक पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के प्रमुख सचिव ही विवादों में घिरे हुए थे, लेकिन अब मशहूर कत्थक नृत्यांगना यास्मीन सिंह भी विवादों के घेरे में आ गई है. संविदा में लगभग 14 साल तक नियुक्ति के बाद सरकार ने एक शिकायत के आधार पर उनके खिलाफ जांच बिठा दी है. इधर मीडिया के जरिए जांच की सूचना मिलने के बाद यास्मीन सिंह ने शिकायतकर्ता विकास तिवारी और उन्हें बदनाम करने वाले लोगों पर कानूनी कार्रवाई करने की बात कही है. यास्मीन सिंह का कहना है कि उनकी नियुक्ति सारे नियमों के हिसाब से सक्षम अधिकारियों की मंजूरी के साथ पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए की गई थीं. उनके ऊपर लगाए गए तमाम आरोप असत्य और निराधार है. जबकि कांग्रेस प्रवक्ता विकास तिवारी  ने एक बार फिर यास्मीन सिंह और उनके पति को आड़े हाथों लिया है. विकास तिवारी ने यास्मीन सिंह से पूछा है कि उन्हें इस बात का जवाब अवश्य देना चाहिए नई सरकार के बनते ही उनके पति छत्तीसगढ़ छोड़कर क्यों भाग गए.

बेरोजगार होंगे तो आहत तो जारी रहेगा प्रतिवाद

विकास तिवारी ने यास्मीन सिंह के द्वारा सोशल मीडिया और अखबारों में दिए गए बयान पर  कहा है कि एक महिला होने के नाते उनका स्वागत और सम्मान रहेगा, लेकिन अगर गलत काम और गलत नियुक्ति पर छत्तीसगढ़ के लाखों बेरोजगार आहत होते हैं तो वे अपना प्रतिवाद भी जारी रखेंगे. तिवारी ने कहा कि अगर प्रदेश सरकार यास्मीन सिंह का सम्मान नहीं करती तो प्रारंभिक जांच का आदेश ही नहीं देती. उन्हें तो इस बात के लिए सरकार का आभारी होना चाहिए कि उनकी नियुक्ति के खिलाफ जांच के लिए एक महिला अधिकारी को ही जवाबदारी दी गई है. यहां तक जांच के लिए आदेश जारी करने वाली भी एक महिला है. यास्मीन सिंह ने अपने बयान में यह कहा है कि उनके खिलाफ शिकायत कांग्रेस पार्टी के एक सदस्य ने की है. विकास तिवारी ने जानना चाहा है कि क्या अनियमितताओं, भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी  के खिलाफ कांग्रेस के सदस्यों को शिकायत करने का अधिकार नहीं है. क्या सारे अधिकार भारतीय जनता पार्टी के पास ही सुरक्षित हैं ? यास्मीन सिंह ने यह भी कहा है कि उनके और उनके परिवार वालों को राजनीतिक द्वेष के तहत टारगेट किया जा रहा है. प्रवक्ता विकास तिवारी ने पूछा है कि यास्मीन सिंह और उनके पति को स्पष्ट करना चाहिए के वे किस राजनीतिक दल से सबद्ध थे।

यास्मीन सिंह ने अपनी नियुक्ति का ठीकरा राज्य सरकार के अधिकारियों पर फोड़ा है.  उनके बयान में यह स्पष्ट है कि भाजपा सरकार के अधिकारियों ने ही उन्हें नियुक्त किया था. विकास तिवारी ने कहा है कि यही तो देखने लायक होगी कि कौन-कौन से अधिकारियों नियुक्ति की थी? किस आधार पर नियुक्ति दी गई थी ? किस योग्यता और क्षमता को ध्यान में रखा गया था ? आपकी पदस्थापना कब-कब और कहां- कहां रही ? आपने अपने दफ्तर को कितना समय दिया और नृत्य कला को कितना समय दिया. सरकारी और सार्वजनिक समारोह में आपको प्रत्येक प्रस्तुति के लिए कितना भुगतान किया गया ? हर बार समारोह में जाने के लिए आपने किस विभाग प्रमुख से अनुमति ली ? जो वेतन 35 हजार था वह अचानक एक लाख कैसे हो गया ?

मुकदमे का स्वागत

प्रवक्ता विकास तिवारी ने कहा कि सरकार के पास तमाम दस्तावेजों और सबूतों के आधार पर शिकायत की गई है. जहां तक मुकदमे का सवाल है तो वे उसका स्वागत करते है. वे मुकदमे की धमकी से भयभीत नहीं है. उन्होंने कहा कि अगर सरकार किसी तरह का राजनीतिक विद्वेष रखती तो आपकी और आपके पति की संपत्ति के मामलों के जांच का आदेश भी जारी कर देती. फिलहाल तो  मामला असंवैधानिक ढंग से की गई है नियुक्ति का है. उन्होंने यास्मीन सिंह से आग्रह किया कि वे दिल्ली छोड़कर छत्तीसगढ़ में रहे और पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ जांच का सामना करें. इधर विकास तिवारी के नए बयान के बाद नृत्यांगना यास्मीन सिंह की प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है. अगर उनका कोई पक्ष मिलता है तो उसका प्रकाशन भी किया जाएगा.

 

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नाहर मेडिकल एजेंसी का कारनामा... मल्टी विटामिन सिरप घोटाले में ईओडब्लू ने प्रारंभ की जांच

रायपुर. छत्तीसगढ़ के आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने मल्टी विटामिन सिरप घोटाले की जांच प्रारंभ कर दी है. अभी हाल के दिनों में सामाजिक कार्यकर्ता नितिन भंसाली ने राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को दस्तावेजों के साथ शिकायत में आरोप लगाया था कि डायरेक्टर हेल्थ के दबाव के बाद छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन ने मल्टी विटामिन सिरप की खरीदी कर धमतरी की नाहर मेडिकल एजेंसी को लगभग 13 करोड़ सात लाख रुपए का लाभ पहुंचाया है. आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने श्री भंसाली को इसी माह 14 मई को बयान देने के लिए बुलाया है.

यह है पूरा मामला

दिनांक 23 फरवरी 2016 को डायरेक्टर हेल्थ ऑफ सर्विसेस ने छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन लिमिटेड को 441 दवाईयों की खरीदी के लिए एक पत्र लिखा था. इस पत्र के आधार पर 11 अगस्त 2016 को आनलाइन टेंडर जारी किया गया, लेकिन थोड़े ही दिनों यह कहा जाने लगा कि टेंडर निकालने में देरी हो गई है इसलिए 23 जरूरी दवाईयां ( ब्यूरो ऑफ फार्मा पीएसवीएस ऑफ इंडिया ) बीपीपीआई के माध्यम से अनुमोदित की दरों पर खरीद ली जाए. इसके बाद डायरेक्टर हेल्थ ने बगैर टेंडर के दवाईयां खरीदने की अनुमति मांगी थी.

मल्टीविटामिन सीरप का चक्कर

डायरेक्टर हेल्थ लगभग पचास लाख अठावन हजार पांच सौ चालीस मल्टीविटामिन बोतल ( प्रत्येक बोतल 100 एमएल ) की खरीदी करना चाहता था, लेकिन छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन ने जानकारी दी कि दवा सप्लायरों के पास 200 एमएल की बोतल ही उपलब्ध है जिसकी कीमत 27 रुपए 64 पैसे हैं. इस बारे में डायरेक्टर हेल्थ और छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन लिमिटेड के बीच पत्र व्यवहार चलता रहा. डायरेक्टर हेल्थ ने दिनांक 27 मार्च 2017 को एक पत्र के जरिए अवगत कराया कि उसे अब सीरप की जरुरत नहीं होगी. सीरप के बजाय मल्ली विटामिन टेबलेट ( ड्रग कोड डी-63 ) खरीद लिया जाय.... और तब..........

बताते हैं कि डायरेक्टर हेल्थ और मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन के बीच चले पत्र व्यवहार के बाद पूर्व मुख्यमंत्री के एक नजदीक के रिश्तेदार ने दबाव देना प्रारंभ किया.उनके दबाव के बाद अचानक 100 एमएल वाली मल्टीविटामिन वाली सीरप की बोतल भी मिल गई. डायरेक्टर हेल्थ महज पचास लाख अठावन हजार पांच सौ चालीस बोतल चाहता था, लेकिन मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन ने 73 लाख 94 हजार पांच सौ बोतल खरीद ली. इस पूरे मामले का सबसे संदिग्ध पक्ष यह है कि जब डायरेक्टर हेल्थ सीरप चाहता था तो सीरप की बोतल नहीं मिल रही थी और जब डायरेक्टर हेल्थ ने कहा कि चलिए बोतल नहीं मिल रही है तो टेबलेट खरीद लीजिए तब अचानक बोतल मिल गई. डायरेक्टर हेल्थ जितनी संख्या में बोतल चाहता था उससे कहीं ज्यादा संख्या में सीरप की खरीदी हो गई. बताते हैं कि सप्लाई का सारा काम धमतरी की नाहर नाम की एक मेडिकल एजेंसी को दिया गया था. इस एजेंसी को भी 90 दिनों के भीतर सप्लाई करनी थी, लेकिन इस सप्लायर ने 75 दिन देरी से सीरप की सप्लाई की. भंसाली का आरोप है कि बाजार से अधिक दर पर मल्टीविटामिन सीरप की खरीदी कर शासन को करोड़ों रुपए का नुकसान पहुंचाया गया है जबकि नाहर नाम की मेडिकल एजेंसी 13 करोड़ सात रुपए अतिरिक्त भुगतान हासिल करने में सफल रही. खबर है कि इस मामले में छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन के प्रमुख रामाराव को कुछ अधिकारियों ने समझाइश दी थी कि वे नियम-कानून से परे जाकर सिरप की खरीदी न करें, लेकिन वे नहीं माने. जिन अफसरों से समझाइश दी थी बाद में उनका तबादला अन्यत्र कर दिया गया.

 

 

 

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सरकार ने मुकेश गुप्ता को थमाया आरोप पत्र...डीएम अवस्थी को आपराधिक मामलों की विभागीय जांच का जिम्मा

रायपुर. सरकार ने विवादास्पद पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता को आरोप पत्र देने के साथ ही उनके आपराधिक मामलों की विभागीय जांच का जिम्मा पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी को सौंप दिया है. सरकार ने अखिल भारतीय सेवा ( अनुशासन तथा अपील ) नियम 1969 के नियम 8 ( 6 ) सी के अंतर्गत जांच अधिकारी के समक्ष शासन का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए दुर्ग के पुलिस महानिरीक्षक हिमांशु गुप्ता को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी भी बनाया है. गृह विभाग के अवर सचिव डीपी कौशल की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि पुलिस महानिदेशक श्री अवस्थी पूरी तत्परता से मुकेश गुप्ता के खिलाफ जांच प्रारंभ करें और मय दस्तावेज अपना प्रतिवेदन शासन को उपलब्ध कराए. प्रस्तुतकर्ता अधिकारी हिमांशु गुप्ता से भी अपेक्षा की गई है कि वे जांच अधिकारी से संपर्क स्थापित कर अभिलेखों के साथ कार्रवाई को जल्द से जल्द पूरी करें.

तीन बिन्दुओं का आरोप पत्र

कई तरह के आरोपों से घिरे मुकेश गुप्ता पर विभागीय जांच के लिए तीन बिन्दुओं का आरोप पत्र तैयार किया गया है. पहले बिन्दु में उल्लेखित है कि वर्ष 1988 बैच के मुकेश गुप्ता ने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एवं आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के महानिदेशक के पद पर रहने के दौरान अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से कार्यालयीन दस्तावेजों एवं रजिस्टर में बैक डेट में प्रविष्टियां करवाई थीं. उनका यह कृत्य अखिल भारतीय सेवा आचरण नियम 1968 के नियम 3 का उल्लंघन है इसलिए क्यों न उन पर कार्रवाई की जाय. आरोप पत्र के दूसरे बिन्दु में उल्लेखित है कि गुप्ता ने अपराध क्रमांक 9 / 2015 में कायमी दिनांक के पूर्व प्रावधानों का उल्लंघन कर आम नागरिकों का फोन टेप किया था और उसका उपयोग साक्ष्य के तौर पर किया. तीसरे बिन्दु में साफ कहा गया है कि उन्होंने लोकसेवक के पद पर रहते हुए कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान स्वेच्छाचारिता प्रदर्शित की जिससे पुलिस की छवि धूमिल हुई. पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी के जांच अधिकारी एवं दुर्ग रेंज के आईजी हिमांशु गुप्ता के प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त होने के बाद यह माना जा रहा है कि दोनों अधिकारी अपनी रिपोर्ट शासन को जल्द से जल्द सौंप देंगे.

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पुनीत गुप्ता को थमाया जाएगा आरोप पत्र सस्पेंड करने की तैयारी भी

रायपुर. अंतागढ़ टेपकांड और डीकेएस सुपरस्पेशलिटी अस्पताल में करोड़ों के उपकरण खरीदी घोटाले में फंसे पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के दामाद डाक्टर पुनीत गुप्ता को जल्द ही आरोप पत्र थमाकर सस्पेंड किया जा सकता है. गौरतलब है कि डाक्टर गुप्ता को इसी साल 21 जनवरी को अस्पताल के अधीक्षक पद से हटाकर ओएसडी बनाया गया था. उन्होंने 22 फरवरी 2019 को ओएसडी के पद पर अपना कार्यभार ग्रहण किया था और फिर सात दिनों के लिए छुट्टी पर चले गए थे. उम्मीद की जा रही थी कि ओएसडी के पद पर रहते हुए वे तमाम तरह के मामलों का सामना करेंगे, लेकिन अचानक 4 फरवरी को उन्होंने शासन के खाते में एक माह का वेतन लगभग एक लाख 72 हजार रुपए जमा कर मेडिकल कालेज के आवक-जावक शाखा में अपना इस्तीपा सौंप दिया था. इस बीच चर्चा थीं कि देर-सबेर उनका इस्तीफा मंजूर कर लिया जाएगा, लेकिन उनके द्वारा किसी भी तरह का नो ड्यूज न दिए जाने चलते उनके इस्तीफे को मंजूरी नहीं दी गई. अब स्वास्थ्य महकमा उन्हें आरोप पत्र थमाकर सस्पेंड करने की तैयारी कर रहा है. सूत्र बताते हैं कि उन्हें दो-चार दिनों में सस्पेंड कर दिया जाएगा.

डाक्टर पुनीत गुप्ता पर आरोप है कि डीकेएस अस्पताल को नया बनाने के लिए मनमाने ढंग से 104 करोड़ रुपए फूंके थे. उन्हें कुल 59 करोड़ रुपए के उपकरण की खरीदी करनी थीं, लेकिन नियम-कानून को बलाए-ताक रखकर उन्होंने 128 करोड़ के उपकरण खरीदे. अस्पताल में कुल 141 पदों पर भर्ती की जानी थी, लेकिन चार ऐसे पदों पर भी भर्ती की गई जिसका उल्लेख नहीं था. उन पर एबुलेंस की खरीदी और फार्मेसी की निविदा में गड़बड़ी का आरोप भी लगा. बताया जाता है कि उन्होंने फार्मेंसी में सिंगल टेंडर के जरिए एक व्यापारी को उपकृत किया.

 

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बाप रे बाप... मुकेश गुप्ता के मिक्की मेहता मेमोरियल ट्रस्ट के 97 खाते

रायपुर. देश के विवादास्पद पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता का अब किसी भी सूरत में बच निकलना मुश्किल लग रहा है. छत्तीसगढ़ की रमन सरकार मुकेश गुप्ता के कारनामों पर पर्दा डालती रही, लेकिन भूपेश सरकार ने गुप्ता के नए-पुराने सभी कारनामों को उधेड़कर रख दिया है. गुप्ता पर पुलिस का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है. अवैध ढंग से फोन टेपकर संभ्रात लोगों को ब्लैकमेल करने के  आरोप में फंसे मुकेश गुप्ता पर अभी हाल के दिनों में गृह विभाग ने मनी लांड्रिग से संबंधित एक शिकायत पर जांच की अनुमति दी है. सूत्रों का कहना है कि मिक्की मेहता के सगे भाई माणिक मेहता ने तमाम तरह के सबूतों और दस्तावेजों के आधार पर इस मामले की सबसे पहली शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी थी, वहां से जांच के लिए निर्देश आने के बाद ईओडब्लू ने मामला दर्ज कर गृह विभाग से जांच की अनुमति मांगी थी. बताते हैं कि मिक्की मेहता मेमोरियल ट्रस्ट ने एक बैंक में कुल 97 खाते खोल रखे है. हैरत की बात यह है कि कोई ट्रस्ट अगर ईमानदारी से कार्य कर रहा है तो उसे इतनी बड़ी संख्या में खातों के संचालन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थीं. बहरहाल पुलिस यह पता लगाने में जुट गई है कि इतनी  बड़ी संख्या में खातों का परिचालन किस मकसद से किया जाता था. किस खाते में कितनी रकम कब-कब जमा की गई और किसने दी.

जो फंसता था लिया जाता था तगड़ा डोनेशन

गौरतलब  है कि भारतीय पुलिस सेवा में रहने और पूर्व से शादी-शुदा होने के बावजूद मुकेश गुप्ता ने नेहरू नगर भिलाई की निवासी श्माया मेहता की पुत्री और माणिक मेहता की बहन मिक्की से ब्याह रचाया था. एक रोज संदिग्ध परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई तब परिजनों ने आरोप लगाया कि मिक्की की हत्या कर दी गई है. मिक्की की मौत के बाद जब मुकेश गुप्ता ने  मिक्की मेहता मेमोरियल ट्रस्ट खोला तो पहले-पहल लोगों ने यह माना कि यह मिक्की की स्मृति को जीवित रखने का कोई उपक्रम है, लेकिन बहुत जल्द ही इस ट्रस्ट की गतिविधियों को लेकर आरोप लगना शुरू हो गया. धीरे-धीरे यह बात सामने आई कि ट्रस्ट संवेदना बटोरने के लिए ही नहीं बल्कि उसकी आड़ में लोगों से डोनेशन लेने के लिए खोला गया था. खबर है कि जो लोग काली कमाई करने में माहिर थे वे इस ट्रस्ट में अपने काले धन को सफेद करने के लिए पैसा लगाते थे. जो कोई भी मुकेश गुप्ता की गिरफ्त में फंसता था तो वह तभी बच पाता था जब वह मिक्की मेहता मेमोरियल ट्रस्ट में डोनेशन देने के लिए तैयार हो जाता था. सामान्य तौर पर जो कोई भी किसी धर्मार्थ या परमार्थ ट्रस्ट में डोनेशन देता है उसे आयकर विभाग से छूट मिलती है. मिक्की मेहता मेमोरियल ट्रस्ट धनाढ्य लोगों के काले धन को सफेद करने का एक केंद्र बन गया था. सूत्रों का कहना है कि ईओडब्लू ने अपनी प्रारंभिक जांच में अवैध ढंग से कई खातों का परिचालन होना पाया है. गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के विधानसभा मार्ग पर स्थित मिक्की मेहता मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना को लगभग 18 साल हो गए हैं. इन 18 सालों में एक भी बार इस ट्रस्ट ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट पंजीयक सार्वजनिक न्यास को नहीं सौंपी है. इस ट्रस्ट से कौन-कौन लोग जुड़े हैं. वे क्या करते हैं. ट्रस्ट में उनकी कितनी पूंजी लगी है. ट्रस्ट की वार्षिक आम सभा कब-कब हुई. किसने कितना चंदा दिया है. कब दिया है... अब तक कुछ भी सार्वजनिक नहीं किया गया है. बहरहाल एक ही बैंक में 97 खातों का होना चौंकाने वाला मामला है. 

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