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मामला छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण का मुख्यमंत्री की नाराजगी के बाद ओमप्रकाश सिंह ने सौंपा चार्ज

रायपुर. आखिरकार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की नाराजगी के बाद छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण की परियोजना ईकाई सूरजपुर में पदस्थ ओमप्रकाश सिंह ने अंबिकापुर में पदस्थ कार्यपालन अभियंता सोहन चंद्र को चार्ज सौंप दिया है.

गौरतलब है कि ओमप्रकाश सिंह गत कई सालों से अंबिकापुर जिले के आसपास ही चक्कर काटते रहे हैं. उनके खिलाफ कई तरह की गंभीर शिकायतों को अफसर यह कहकर दबाते रहे हैं कि वे राजनाथ सिंह के रिश्तेदार है. एक शिकायत के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उन्हें उनके मूल विभाग ( जल संसाधन ) में वापस भेजने का निर्णय लिया था. मुख्यमंत्री के इस फैसले  के बाद छत्तीसगढ़ ग्रामीण विकास अभिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी आलोक कटियार ने एक जून 2020 को एक आदेश में उन्हें समस्त दायित्वों से भारमुक्त करते हुए उनकी सेवाएं जल संसाधन विभाग को लौटा दी थी बावजूद इसके ओमप्रकाश सिंह सूरजपुर छोड़ने को तैयार नहीं थे. इस बारे में अपना मोर्चा डॉट कॉम ने 15 जून 2020 को एक खबर भी प्रकाशित की थीं.

हर तबादले की डिटेल खंगाली जाएगी

बताते हैं कि जब कार्यपालन अभियंता सोहन चंद्र चार्ज लेने गए तो उनसे यह कहा गया कि वे चाहे तो ऊपर लेबल पर बात कर सकते हैं. उनके वहां डटे रहने के दौरान यह खबर भी प्रचारित होती रही कि वे सूरजपुर में ही नए ढंग से तैनाती को लेकर जोड़-तोड़ कर रहे हैं. इधर 17 जून को ओमप्रकाश सिंह ने अंबिकापुर के कार्यपालन अभियंता सोहन चंद्र को अपना कार्यभार सौंप दिया है. बहरहाल ओमप्रकाश सिंह के हटने के साथ ही यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि जब उन्हें एक जून को ही उनके मूल विभाग में वापस भेज दिया गया था तो 16 दिनों तक वे क्या कर रहे थे. सूत्रों का कहना है कि इस दौरान उनके द्वारा ठेकेदारों को चेक से भुगतान किया गया है. अब यह चेक पुरानी तिथि में जारी किए गए हैं अथवा 16 दिनों में इसका खुलासा किसी जांच के बाद ही हो पाएगा. सूत्र यह भी कहते हैं कि छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में मुख्य कार्यपालन अधिकारी द्वारा नियमों- कानून को ध्यान में रखे बगैर कई अभियंताओं और उप अभियंताओं को इधर से उधर किया गया है. उनके द्वारा जितने भी तबादले किए गए हैं उन सबकी डिटेल भी खंगाली जाएगी. इस पड़ताल में यह भी देखा जाएगा कि तबादले के खेल में कौन-कौन लोग संलिप्त थे.

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भाड़ में गया कोरोना... छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में होता रहा तबादला

रायपुर. पूरे देश में जब मार्च से लेकर जून के प्रथम सप्ताह तक सरकारी कामकाज लगभग ठप्प था तब छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में उठा-पटक जारी थीं.अधिकारियों-कर्मचारियों की प्रताड़ना और तबादले के लिए बदनाम हो रहे अभिकरण में इस दौरान भी तबादलों का खेल चलता रहा.

ज्ञात हो कि सामान्य प्रशासन विभाग की तबादला नीति के अनुसार फिलहाल तबादलों पर पूरी तरह से प्रतिबंध है. इसी साल 27 मई 2020 को वित्त विभाग के अपर सचिव सतीश पाण्डेय ने एक आदेश में फिर साफ किया कि लॉकडाउन के कारण प्रदेश की राजस्व प्राप्तियां बेहद कमजोर है इसलिए हर तरह के तबादले केवल समन्वय में अनुमोदन के उपरांत ही किए जा सकेंगे. लेकिन अभिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने जिस तरह से अभियंताओं-उप अभियंताओं का तबादला किया है उसे देखकर तो यह लगता नहीं है कि प्रदेश में कोरोना नाम का कोई संकट है या प्रदेश भयावह किस्म के संकट काल से गुजर रहा है?

इसी साल 2 मई 2020 को जांजगीर-चांपा में पदस्थ सबसे ज्यादा विवादास्पद कार्यपालन अभियंता ओपी सिंह का तबादला किया गया. लंबे समय से अंबिकापुर जिले का चक्कर लगाने वाले ओपी सिंह को एक बार फिर परियोजना ईकाई सूरजपुर का काम सौंप दिया गया. तबादले में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं था कि श्री सिंह का तबादला समन्वय में अनुमोदन के उपरांत किया गया है. तबादला आदेश की प्रतिलिपि भी केवल पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री के निज सहायक, छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण के स्टॉफ आफिसर, मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता को ही दी गई.

दो मई को ही कार्य एवं प्रशासनिक सुविधा के लिहाज से अंबिकापुर परियोजना ईकाई क्रमांक एक में पदस्थ सोहन चंद्रा का तबादला किया गया. इन्हें बलरामपुर भेजा गया. इसी तिथि को बलौदाबाजार में पदस्थ पीके गुप्ता अंबिकापुर भेजे गए जबकि 4 मई को परियोजना ईकाई क्रमांक- 2 बीजापुर में पदस्थ प्रभारी कार्यपालन अभियंता संतोष साहू को बेमेतरा, पी मोहन राव को परियोजना क्रियान्वयन ईकाई जगदलपुर,पीएल चौरे को परियोजना मंडल क्रमांक एक जगदलपुर, रायपुर में पदस्थ बीएस पटेल को धमतरी, महासमुंद में पदस्थ मनोज रात्रे को जांजगीर-चांपा कर दिया गया.

इसी साल कोरोना काल में 15 मई को ग्यारह उप अभियंता इधर से उधर किए गए. इनके तबादले को लेकर इतनी ज्यादा हड़बड़ी थीं कि जिस दिन सूची बनी और उसी दिन तत्काल प्रभाव से आदेश जारी कर दिया गया. बहरहाल 15 मई को ग्रामीण विकास संभाग मुंगेली में बेहतर ढंग से कार्यों का संपादन कर रहे चंदन यादव और अन्तराम आदित्य को परियोजना क्रियान्वयन ईकाई क्रमांक बीजापुर भेज दिया गया. जांजगीर-चांपा से वासुदेव पोर्ते और श्रीकांत पारधी का तबादला धुर माओवाद प्रभावित नारायणपुर किया गया. कोरबा में पदस्थ भीमदेव कुर्रे और चमन कुमार मिश्रा भी बीजापुर और सुकमा भेजे गए. राजनांदगांव में पदस्थ आलोक खोबरागढ़े और सुनील बारले के कामकाज को लेकर भी कोई शिकायत नहीं थीं बावजूद इसके गुणवत्तापूर्ण कार्य संपादन के नाम पर बीजापुर भेज दिया गया. दुर्ग के ग्रामीण विकास संभाग में कार्यरत धीरेंद्र सोनी, लीलाधऱ ढीमर और भास्कर राव औचार भी सुकमा पदस्थ कर दिए गए. इसी तिथि को एक अन्य आदेश में सतानंद महिकवार, मोविश लहरे, यशवंत साहू और लोकेश सोनी को क्रमशः कोरबा, बलौदाबाजार, कोरिया और बेमेतरा में पदस्थ कर दिया गया. कोरोना काल में एक जून को मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने सूरजपुर में पदस्थ ओम प्रकाश सिंह की प्रतिनियुक्ति समाप्त करते हुए उन्हें उनके पैतृक विभाग ( जल संसाधन ) जाने के लिए भारमुक्त कर दिया. इसके लिए बकायदा आदेश जारी हुआ, लेकिन अब तक सिंह ने नए कार्यपालन अभियंता सोहन चंद्रा को चार्ज नहीं दिया है.

छह जून को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अवर सचिव रामलाल खैरवार ने कांकेर में पदस्थ प्रभारी कार्यपालन अभियंता यूके कोपूलवार, जशपुर में पदस्थ एसके गुप्ता, सूरजपुर में पदस्थ आरपी गुप्ता और गरियाबंद में पदस्थ सहायक अभियंता आरके रिछारिया को उनके मूल विभाग ( जल संसाधन )  में वापस भेजने के लिए आदेश जारी कर दिया है, लेकिन ये अभियंता भी इस जोड़-तोड़ में लगे है कि किसी भी तरह से ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण में तैनाती बनी रहे. बहरहाल अभिकरण में ताबड़तोड़ ढंग से किए जा रहे तबादलों को लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है.सवाल भी उठ रहे हैं.  अपना मोर्चा डॉट कॉम ने इस बारे में मुख्य कार्यपालन अधिकारी आलोक कटियार से उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने फोन नहीं उठाया, लेकिन वहां पदस्थ चीफ इंजीनियर दयाशंकर परगनिहा ने कहा कि वरिष्ठ अफसर चाहे तो बगैर समन्वय के भी तबादले हो सकते हैं. समन्वय और अनुमोदन वगैरह की प्रक्रिया बाद में पूरी कर ली जाती है.

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जिस कार्यपालन अभियंता को हटाने के लिए सीएम ने दिया था निर्देश... वह ताल ठोंककर डटा हुआ है अब तक

रायपुर. इस खबर में जो तस्वीर दिखाई दे रही है वह ओमप्रकाश सिंह की है. वैसे तो ओमप्रकाश सिंह जलसंसाधन विभाग से है, लेकिन गत 16  सालों से ही वे किसी न किसी तरीके से प्रतिनियुक्ति के जरिए अंबिकापुर व उसके आसपास के जिलों में डटे हुए हैं. बीच में एकाध-बार उनका तबादला जांजगीर-चांपा किया गया, लेकिन तब भी उनका अंबिकापुर प्रेम कम नहीं हुआ. हाल-फिलहाल भी वे अंबिकापुर से सटे बलरामपुर जिले के राजपुर में ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में पदस्थ है. हालांकि उन्हें अभिकरण से हटाने का आदेश हो चुका है. यह आदेश किसी और ने नहीं स्वयं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दिया है, बावजूद इसके वे हटने का नाम नहीं ले रहे हैं.

बंद कर देना चाहिए जल संसाधन विभाग

पता नहीं ऐसा क्या है, लेकिन यह सच है कि जल संसाधन विभाग के ज्यादातर अभियंता अपने मूल विभाग में काम ही नहीं करना चाहते.वहां पदस्थ अभियंता इसी कवायद में लगे रहते हैं कि वे किसी न किसी तरीके से मलाईदार विभाग में जगह हासिल कर लें. प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तब जल संसाधन विभाग के अधिकांश अभियंता इसी जोड़-तोड़ में लगे रहते थे कि किसी न किसी तरह से पंचायत एवं ग्रामीण विभाग की ग्राम सड़क योजना से जुड़ जाय. ऐसे सभी अभियंताओं की यह मंशा होती थी कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में अरबो-खरबों रुपए है. यदि दो-चार साल भी टिक गए तो सात पीढ़ी तर जाएगी.

अभियंताओं की यह कवायद अब भी कम नहीं हुई है. अब भी ज्यादातर अभियंता छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण से जुड़ने के लिए जोड़-तोड़ करते रहते हैं और जुड़े हुए हैं. ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में अभियंताओं की फौज देखकर तो यही लगता है कि जल संसाधन विभाग को पूरी तरह से बंद ही कर देना चाहिए. हालांकि नई सरकार बनने के बाद ऐसे सभी अभियंताओं को उनके मूल विभाग ( जल संसाधन ) में वापस भेजने का एक सैद्धांतिक फैसला लिया गया है, लेकिन इस फैसले पर ठोस तरीके से अमल नहीं हो पाया है. अब भी कई जगहों पर जल संसाधन विभाग के अभियंता ही महत्वपूर्ण पदों पर आसीन और मनमाने ढंग से काम कर रहे है.

शिकायत के बाद सीएम ने दिया हटाने का आदेश

ओमप्रकाश सिंह छत्तीसगढ़ ग्रामीण विकास अभिकरण की बलरामपुर जिले की राजपुर ईकाई में कार्यपालन अभियंता के तौर पर पदस्थ है. लंबे समय से अंबिकापुर जिले के आसपास ही पदस्थापना के चलते उनके खिलाफ शिकायतों का अंबार भी है. बताया जाता है कि उनकी गंभीर सी गंभीर शिकायतों को विभाग के अफसर यह कहकर दबाते रहे हैं कि वे राजनाथ सिंह के रिश्तेदार है. बहरहाल एक शिकायत के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उन्हें उनके मूल विभाग ( जल संसाधन ) में वापस भेजने का निर्णय लिया. मुख्यमंत्री के इस फैसले की जानकारी पंचायत एवं ग्रामीण विकास के अवर सचिव रामलाल खैरवार ने 29 मई 2020 को छत्तीसगढ़ ग्रामीण विकास अभिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी आलोक कटियार को भेजी. श्री कटियार ने इसके परिपालन में एक जून 2020 को एक आदेश में उन्हें समस्त दायित्वों से भारमुक्त करते हुए उनकी सेवाएं जल संसाधन विभाग को लौटा दी, लेकिन ओमप्रकाश सिंह के ऊपर इन आदेशों को कोई प्रभाव नहीं पड़ा.

फोन आ गया है ऊपर बात कर लो

आदेश में यह साफ-साफ उल्लेखित था कि भारमुक्त होने के साथ ही ओमप्रकाश सिंह अपना समस्त प्रभार अंबिकापुर जिले की परियोजना ईकाई में पदस्थ सोहन चंद्रा को सौंप देंगे. बताते हैं कि जब चंद्रा चार्ज लेने गए तो उन्हें कहा गया कि रायपुर से फोन आ चुका है... वे चाहे तो ऊपर बात कर सकते हैं. अब यह माजरा समझ से परे हैं कि रायपुर से किस शख्स ने ऐसा फोन घुमा दिया है जिसकी वजह से ओमप्रकाश सिंह को डटे रहने का मौका मिल गया. क्या यह फोन छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण के सिविल लाइन स्थित कार्यालय से किया गया है या फिर किसी बंगले से ? प्रशासनिक गलियारों में यह सवाल तैर रहा है कि मुख्यमंत्री द्वारा ओमप्रकाश सिंह को हटाने के निर्णय के बाद ऐसा कौन है जो यह कहते हुए फोन घुमा रहा है कि कोई चार्ज देने की जरूरत नहीं है. नए सिरे से फिर फाइल चलाई जाएगी. इधर-उधर की उठापटक के लिए मशहूर छत्तीसगढ़ ग्रामीण विकास अभिकरण से जुड़ी एक खबर यह भी है कि यहां पदस्थ एक अधिकारी ने मुख्यमंत्री और मंत्री को भरोसे में न लेकर बगैर समन्वय के कई कार्यपालन अभियंताओं को भी इधर से उधर कर दिया है. बहरहाल ग्रामीण सड़क अभिकरण के कामकाज से जुड़े कतिपय लोग एक बार फिर मुख्यमंत्री से मिलकर वस्तुस्थिति से अवगत कराने की जुगत में हैं.

 

 

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छत्तीसगढ़ के कोविड के मामले में बदहाली से परेशान नर्सों ने कहा-हम भी इंसान है...हमारे जीवन का भी ख्याल रखिए

रायपुर. बिलासपुर जिले के सिम्स चिकित्सालय के कोविड-19 ओपीडी में कार्यरत स्टाफ और नर्सों ने खुद के जीवन को बचाने के लिए सिम्स चिकित्सालय के संयुक्त संचालक और चिकित्सा अधीक्षक से गुहार लगाई है.

ओपीड़ी में कार्यरत स्टाफ और नर्सों ने संयुक्त संचालक और चिकित्सा अधीक्षक को एक पत्र भेजकर कहा है कि कोविड़-19 के ओपीडी, आईपीडी और आइसोलेशन वार्ड में कार्यरत कर्मचारियों का संपर्क संदेही मरीजों से होता है. जो भी मरीज संदेही होता है उसका सैंपल लेकर जांच के लिए भेजा जाता है. जब तक मरीज का पॉजिटिव नहीं पाया जाता तब तक वह कोविड-19 के नाम से बनाए गए अस्पताल में कार्यरत स्टाफ व नर्सों के संपर्क में रहता है. फिलहाल हमें सिम्स में 14 दिनों तक कार्य लिया जाता है. जब 14 दिन की डयूडी पूरी हो जाती है तो बिना आरटीपीसी आर टेस्ट के घर जाने को कह दिया जाता है. नियमानुसार संक्रमित मरीजों के संपर्क में रहने वाले अस्पताल के प्रत्येक स्टाफ व नर्स का चेकअप होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है. नर्सों और स्टाफ ने कहा है कि अगर कोई कर्मचारी संक्रमित होता है और संक्रमण उसके परिवार में फैलता है तो उसकी जिम्मेदारी सिम्स प्रबंधन की मानी जाएगी. ( पत्र देखें )  

 

 

 

 

 

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छत्तीसगढ़ में फर्नीचर सप्लाई में गड़बड़झाला करने वाले फर्मों की शिकायत प्रधानमंत्री से

रायपुर. छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार रहने के दौरान एक बड़ा फर्नीचर घोटाला सामने आया था. तब इस घोटाले शिकायत प्रधानमंत्री से की गई थीं. एक बार फिर फर्नीचर सप्लाई करने वाले चुनिंदा फर्मों की कारगुजारियां प्रधानमंत्री तक भेजी गई है. जिन फर्मों की शिकायत भेजी गई  है उनमें ड्रोलिया इंटरप्राइजेस, गणपति इंटरप्राइजेस, गोयल फर्नीचर, सवाडिया स्टील, शर्मा स्टील, हरिओम उद्योग, खंडेलवाल सेल्स कार्पोरेशन, एमएस रानी सती उद्योग, सांई इंडस्ट्रीज सहित फर्नीचर सप्लाई करने वाली दो अन्य फर्म का नाम शामिल है.

जब केदार कश्यप शिक्षा मंत्री थे तब ठीक चुनाव पहले वे गंभीर विवादों में फंस गए थे. तब यह आरोप सामने आया था कि जिला शिक्षा अधिकारियों पर दबाव डालकर स्कूलों में फर्नीचर खरीदी के नाम पर 50 करोड़ का गोलमाल किया गया है. बताया जाता है कि प्रदेश में सीएसआइडीसी में पंजीकृत 180 सूक्ष्म और लघु इकाइयों को निविदा प्रक्रिया से बाहर कर दिया था. लघु इकाईयों के बाहर हो जाने से इनमें काम करने वाले 45 हजार बढ़ई और अन्य मजदूर बेरोजगार हो गए थे. ठेका उन्हीं फर्मों को मिला था जो साठगांठ करने में सफल हो गए थे. इस मामले में स्थानीय मीडिया में जमकर गूंज होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने जांच के आदेश भी दिए थे, लेकिन धीरे-धीरे पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला गया. इधर एक बार फिर नए सिरे से शिकायत भेजी गई है.

यह है शिकायत में

शिकायत में ई-मानक सीएसआईडीसी पोर्टल पर सवाल उठाए गए हैं. कहा गया है कि फर्नीचर ई मानक पर लगभग 189 रेटकांट्रेक्ट सप्लायर है, लेकिन इन सप्लायरों में केवल पांच फर्म और उनसे जुड़े लोग ही अपना उल्लू साध रहे हैं. जिन पांच फर्मों को सबसे ज्यादा महत्व दिया जा रहा है उन पर जांच लंबित है. ऑनलाइन जेम से क्रय प्रक्रिया बंद कर दिए जाने के बाद फर्म से जुड़े कर्ताधर्ता जिला शिक्षा अधिकारियों से सांठगांठ कर ई-मानक पोर्टल पर अपनी मर्जी चला रहे हैं. ई-मानक पोर्टल का उद्देश्य स्थानीय उद्योगों को काम देना है, लेकिन यह बात केवल दिखावे में रह गई है. उन सभी विभागों में जहां-जहां फर्नीचर की खरीदी होती है वहां जमकर भ्रष्टाचार हो रहा है.

जमकर चला खेल

शिकायत में कहा गया है कि प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तब जो सप्लायर अफसरों से सांठगांठ कर चूना लगा रहे थे वहीं सप्लायर अब भी सबसे ज्यादा सक्रिय है. पहले भी सबसे ज्यादा काम गणपति इंटरप्राइजेस, गोयल फर्नीचर्स, खंडेलवाल सेल्स कारपोरेशन सवाडिया स्टील, शर्मा स्टील, हरिओम उद्योग, एमएस रानी सती उद्योग, सांई इंडस्ट्रीज सहित दो अन्य फर्म को दिया गया था. अब भी इन्हीं फर्मों से जुड़े कर्ताधर्ता सीएसआईडीसी के दफ्तर में अफसरों के कमरों में देखे जा सकते हैं.

जेम पोर्टल को ठेंगा

केंद्र में मोदी की सरकार बनने के बाद सरकारी खरीदी में पारदर्शिता के लिए जेम पोर्टल से खरीदी का नियम बनाया गया था. हालांकि यह व्यवस्था भी छत्तीसगढ़ में अफसरों के लिए कमाई का जरिया बन गई थी. जेम पोर्टल में एक बार किसी एक वस्तु का रजिस्ट्रेशन करवाकर  सप्लायर दूसरी सामग्री भी सप्लाई कर रहे थे. जेम पोर्टल में अधिक रेट पर अपने माल को अप्रूव कराने के लिए दलालों का एक रैकेट सक्रिय था. इधर ई-मानक सीएसआईडीसी पोर्टल के माध्यम से भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. बताया जाता है कि अब भी वहीं सप्लायर हावी है जो पुराने खिलाड़ी है. इस बारे में सीएसआईडीसी के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि एक बार जो सिस्टम बन जाता है वह नियम-कानून बदल जाने के बाद भी लगभग-लगभग कायम ही रहता है. अधिकारी ने कहा कि सीएसआईडीसी केवल रेट का निर्धारण करता है जबकि खरीदी का काम विभागों से होता है. अब कौन सा विभाग किस दर पर खरीदी कर रहा है कैसे बताया जा सकता है. बहुत संभव है कि सप्लायरों ने शिक्षा विभाग और अन्य अधिकारियों से गठजोड़ कर लिया हो.

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15 साल तक पत्रकारों को कुचलते रहे डाक्टर रमन और अब अर्णब की तरफदारी

रायपुर. छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के कार्यकाल में पत्रकार किस दबाव में काम कर रहे थे यह किसी से छिपा नहीं है. ( कुछेक दरबारी पत्रकारों को छोड़कर ) सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले हर पत्रकार के ऊपर किसी न किसी गंभीर धारा के तहत जुर्म दर्ज था. ऐसा करने के पीछे सरकार की मंशा यही रहती थी कि पत्रकार घुटनों के बल रेंगकर हत्यारी विचारधारा का साथ देते हुए अपने काम को संपादित करते रहे.

इधर हाल के दिनों में जब रिपल्बिक टीवी पर भड़काऊ खबरें दिखाकर देश को सांप्रदायिक उन्माद की ओर ले जाने वाले अर्णब गोस्वामी पर कांग्रेस ने एफआईआर के जरिए शिकंजा कसा तो डाक्टर रमन सिंह अर्णब गोस्वामी के समर्थन में आ खड़े हुए. उन्होंने अर्णव गोस्वामी पर हुए कथित हमले को लोकतंत्र के लिए शर्मनाक बताया. डाक्टर रमन ने कहा कि कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस मामले में देश और ख़ास कर प्रेस जगत से निःशर्त क्षमायाचना करनी चाहिए.

डाक्टर रमन सिंह के इस बयान के बाद कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने भी जोरदार हमला बोला है. एक बयान में त्रिवेदी ने कहा कि रमन सिंह और उनकी सरकार ने 15 साल में पत्रकारों के साथ जो बर्ताव किया उसे भी याद रखना चाहिए. पत्रकारों की एक- एक नकारात्मक रिपोर्ट  पर न केवल उनका तबादला करवाया गया बल्कि उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर भी किया गया. पत्रकारों की पत्नी और परिजनों  की नौकरी छीनी गई. पत्रकारों को तरह-तरह की धमकियां दी गई और खासकर माओवादी इलाकों में कार्यरत पत्रकारों का जीना मुश्किल कर दिया गया. अफसरों ने पत्रकारों को जान से मारने की धमकी भी दी. बस्तर में पत्रकारों के काम करने की जो स्थिति रही उसे लेकर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की एक सनसनीखेज रिपोर्ट है. अगर बयान जारी करने के पहले डाक्टर रमन इस रिपोर्ट को पढ़ लेते तो ज्यादा बेहतर होता. इस रिपोर्ट की पूरी दुनिया में चर्चा हुई जिससे वे तिलमिला गए थे. रमन सिंह सरकार में पत्रकारों पर जो दबाव बनाया गया और पत्रकारों को जिन परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया गया डाक्टर रमन सिंह को उस पर भी एक नजर डालनी चाहिए. भाजपा सरकार के शासनकाल में पत्रकारों को जिस तरीके से धमकियां दी गई जान से मारने और झूठे मामलों में फंसाने की साजिशें की गयीं उसे छत्तीसगढ़ अभी भूला नहीं है.

त्रिवेदी ने कहा है कि आज रमन सिंह को पत्रकारों की सुरक्षा,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की याद आ रही है. जब कलबुर्गी की हत्या हुई थी जब गौरी लंकेश की हत्या हुई थी तब प्रधानमंत्री मोदी और रमन सिंह जैसे नेता उस पर चुप्पी साधे रहे मगर अब अर्णव पर स्याही फेंके जाने की कथित घटना से रमन सिंह को सब कुछ याद आ रहा है. मोदी रमन की पोल खोलने वाले एक कार्यक्रम के प्रसारित होने के बाद एबीपी न्यूज़ चैनल के साथ क्या किया गया. किस तरीके से एबीपी न्यूज़ के सिग्नल को डिस्टर्ब किया गया यह किसी से छिपा नहीं है. देश के वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपाई को किन परिस्थितियों में नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया उसे पूरा देश  जानता और समझता है.

त्रिवेदी ने कहा है कि पूरा देश और छत्तीसगढ़ इस बात को बखूबी समझ रहा है कि अर्णव गोस्वामी ने 16 अप्रैल को राहुल गांधी की पत्रकार वार्ता  को लेकर  झूठे तथ्य प्रसारित किए थे. उसके बाद सोनिया गांधी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की गई. ऐसा करके अर्णव गोस्वामी ने यह जता दिया कि वे केंद्र की मोदी सरकार द्वारा करोना से निपटने में हुई लापरवाही और आपराधिक भूल से ध्यान हटाने के एजेंडे के तहत काम कर रहे हैं.

स्याही फेंकने की कथित घटना को लोकतंत्र के लिए शर्मनाक बताने वाले डाक्टर रमन सिंह को यह भी बताना चाहिए कि 25 मई 2013 को बस्तर के झीरम में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुआ हमला क्या था? अर्णव पर  दो लोगों द्वारा स्याही फेंकने से भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रमन सिंह इतने विचलित और उद्वेलित हो गए कि इसे लोकतंत्र का भारी नुकसान बताकर प्रवचन देने लगे. रमन सिंह के दामाद डॉ पुनीत गुप्ता के माध्यम से अंतागढ़ में लोकतंत्र को पहुंचाए गए नुकसान पर तो रमनसिंह ने कभी कुछ नहीं बोला ?

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कोरोना के साथ-साथ नफरत का वायरस फैलाने वालों का भी इलाज चल रहा है छत्तीसगढ़ में

नफरत का जहर उगलने वाले हर सांप के फन को कुचलने की चल रही है तैयारी 

रायपुर. कोरोना से निपटने के मामले में छत्तीसगढ़ सरकार की सराहना पूरे देश में हो रही है. इस बीमारी के अधिकांश मरीज ठीक होकर अपने घर जा रहे हैं और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को धन्यवाद ज्ञापित कर रहे हैं. इधर सरकार ने इस गंभीर बीमारी के साथ-साथ नफरत का वायरस फैलाने वालों का इलाज भी प्रारंभ कर दिया है.

पिछले दिनों पुलिस ने एक महिला पार्षद विश्वदिनी पांडेय के खिलाफ मामला दर्ज किया है. भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी इस महिला पार्षद पर आरोप है कि उसने एक समाज विशेष की भावनाओं को आहत करने की नीयत से अपने फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट की थी. पुलिस ने विश्वदिनी पांडेय के खिलाफ धारा 153 ए, 295- ए, 505 ( 2 )  और धारा 188 के तहत अपराध पंजीयबद्ध किया है. अभी महिला की गिरफ्तारी नहीं हुई है, लेकिन समझा जाता है कि पुलिस जल्द ही उसे गिरफ्त में ले लेगी.

इधर निशा जिंदल के नाम से एक फर्जी फेसबुक एकाउंट संचालित करने के मामले में पुलिस ने रवि पुजार नाम के एक शख्स को भी गिरफ्तार कर लिया है. रवि पुजार अपने फेसबुक में पाकिस्तान की खूबसूरत अभिनेत्रियों की फोटो लगाकर लोगों को गुमराह करता था. निशा जिंदल उर्फ रवि पुजार के कई हजार लोग फॉलोवर थे और वह फेसबुक पेज पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली पोस्ट व फोटो अपलोड़ करते रहता था. बताया जाता है कि रवि 11 साल से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था और अब तक पास नहीं हो पाया था. इधर खबर है कि पुलिस ऐसे बहुत से एकाउंट की छानबीन कर रही है जिसमें देश और प्रदेश के सौदार्द को खराब करने का मकसद छिपा है. तर्कों और सबूतों के साथ राजनीतिक टीका-टिप्पणी अपनी जगह है, लेकिन आपसी सौहार्द को खत्म करने वालों पर सख्ती तय मानी जा रही है.

चीखने वाले एंकरों का सुर बदला

देश में भाई-चारे को बढ़ावा देने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक भी अब एकजुट होने लगे हैं. वे सांप्रदायिकता का जहर बोने वाले चैनलों और संवाददाताओं की शिकायत कर रहे हैं. देश में लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्षधर नागरिक सांप्रदायिक खबरों को बढ़ावा देने वाले टीवी चैनलों और एंकरों के वीडियो और अखबारों का संग्रहण भी कर रहे हैं ताकि निकट भविष्य में उन्हें अदालत में घसीटा जा सकें. पिछले दिनों बांद्रा से स्पेशल ट्रेन चलाने की अफवाह आधारित खबर दिखाने के मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने एक चैनल के संवाददाता राहुल कुलकर्णी को गिरफ्तार किया तो टीवी पर चीख-चीखकर सौहार्द को मटियामेट करने में जुटे एंकरों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है. अभी हाल के दिनों में एक ऐसी महिला एंकर के खिलाफ भी पुलिस में शिकायत हुई है जो कोरोना फैलने के लिए एक समुदाय विशेष को ही जिम्मेदार ठहराती थी. पुलिस में शिकायत के बाद अब महिला एंकर का सुर बदल गया है. अब जो नया वीडियो जारी हुआ है उसमें वह अपने ही चैनल की खबरों का बेहद मासूमियत के साथ खंडन करते हुए नजर आ रही है. महिला बेहद अफसोसजनक तरीके से यह बता रही है कि जो खबर चलाई गई थी वह पूरी तरह से अफवाह पर आधारित थीं. एक रिपोर्टर की गिरफ्तारी के साथ ही तीन बड़े चैनलों की रिपोर्टिंग का अंदाज भी थोड़ा बदल गया है. ( पूरी तरह नहीं ) देश के बहुत से लेखकों की राय है कि नफरत के वायरस के निपटने के लिए जहर उगलने वाले हर सांप के फन को कुचलना बेहद आवश्यक है चाहे वह किसी भी समुदाय से जुड़ा हुआ ही क्यों न हो. कोरोना के भीषण संकटकाल में यह देखना बाकी है कि कितने सांपों का फन कुचला जाता है.

 

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कोरोना के भीषण संकटकाल में केंद्र और छत्तीसगढ़ के भाजपा नेताओं की भूमिका पर उठा सवाल

रायपुर. कोरोना जैसे भीषण संकटकाल में छत्तीसगढ़ के भाजपा नेताओं ने पत्र लेखन प्रकोष्ठ खोल लिया है. अमूमन भाजपा के सभी छोटे-बड़े नेता इन दिनों लेटरबाजी में व्यस्त है. अब जब लेटरबाजी होगी तो भला कांग्रेस के लोग कहां चुप बैठने वाले हैं. पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री के एक पत्र का मीडिया सलाहकार रुचिर गर्ग ने जवाब दिया तो डाक्टर रमन सिंह के मीडिया कंसल्टेंट और भाजपा के प्रकाशन विभाग से जुड़े पकंज झा ने लंबा-चौड़ा खत लिख मारा.  उनके खत के बाद कलक्टर की नौकरी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए ओपी चौधरी ने चिट्ठी लिखी. इधर कांग्रेस के संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने दोनों की चिट्ठियों पर सवाल दागते हुए कहा है कि छत्तीसगढ़ में कोरोना से निपटने के लिए केंद्र और भाजपा के स्थानीय नेताओं ने कितना सहयोग दिया है इसका खुलासा होना चाहिए.

त्रिवेदी का कहना है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सलाहकार रुचिर गर्ग के पत्र के जवाब में भारतीय जनता पार्टी की ओर से आए दो पत्रों के जरिए इधर -उधर की बातों से ध्यान भटकाने की कोशिश की है, लेकिन यह नहीं बताया कि केंद्र सरकार की ओर से राज्य को कोरोना संकट से लड़ने के लिए आख़िर क्या मिला? एक तरह से भाजपा ने कठिन सवालों से कन्नी काटने की कोशिश की है. त्रिवेदी ने पंकज झा और ओपी चौधरी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने कोरोना संकट से जूझने के लिए जो एक लाख 70 हज़ार करोड़ का जो पैकेज की घोषणा तो की है, लेकिन उसमें से कितना पैसा छत्तीसगढ़ राज्य को मिलने जा रहा है यह स्पष्ट होना चाहिए.

इस पैकेज में जो एक बड़ी घोषणा है कि मनरेगा की मज़दूरी पहली अप्रैल से 20 रुपए बढ़ जाएगी. इसका मतलब यह है कि एक मज़दूर को 100 दिन का काम मिल जाता है तो साल में उसे मात्र 2000 रुपए अतिरिक्त मिलेंगे. और मिलेंगे तब जब भुगतान होगा. राज्यों को वर्ष 2019-20 का 1555 करोड़ रुपए केंद्र से मिलना बचा है. इसमें से कुछ राशि अभी आई है लेकिन वह भी ऊंट के मुंह में जीरा है. भाजपा बताए कि केंद्र सरकार मनरेगा का पूरा पैसा क्यों नहीं दे रही है?

केंद्र के पैकेज में जो राशि श्रमिकों को देने की बात हुई है, उसमें उन 83 प्रतिशत मज़दूरों को क्या मिलेगा जो अनौपचारिक क्षेत्र में जुड़े हुए हैं. कामगारों को ईपीएफ़ से 75 प्रतिशत या तीन महीने की तनख़्वाह के बराबर पैसे निकालने की छूट दी है, लेकिन यह बताना भूल गए कि ईपीएफ़ का पैसा उनका अपना पैसा है और अगर वह निकाल लिया तो भविष्य अनिश्चित हो जाएगा.

इसके अलावा छत्तीसगढ़ को केंद्र की ओर से मिलने वाला जीएसटी भुगतान का बड़ी राशि बकाया है. राज्य को मिलने वाले केंद्रीय टैक्स में पिछले साल 14 प्रतिशत की कमी आई है. उसकी भरपाई या भुगताने के बारे में केंद्र सरकार चुप क्यों है?

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री किसान योजना के एक किस्त के भुगतान की बात की है, लेकिन छत्तीसगढ़ में तो अभी पुराना भुगतान ही पूरा नहीं हुआ है, तो नई किस्त का किसान कैसे भरोसा करें. उज्जवला गैस मुफ़्त देने का फ़ैसला किया है लेकिन उससे हासिल क्या होगा जब ग़रीबों का रोज़गार छिन जाएगा? और छत्तीसगढ़ में तो उज्जवला का रिफ़िल रेट ही 1.8 प्रतिशत है. इसके अलावा यह सवाल तो अब भी अनुत्तरित है कि समय पर केंद्र सरकार ने किट्स क्यों उपलब्ध नहीं करवाए? समय पर और टेस्टिंग लैब की अनुमति क्यों नहीं दी? और केंद्र की ओर से राज्यों को संकट से लड़ने के लिए पर्याप्त संसाधन क्यों उपलब्ध नहीं करवाए? उन्होंने कहा है कि राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल शुरु से कह रहे हैं कि केंद्र सरकार ने सिर्फ़ लॉक डाउन की घोषणा की और संकट से जूझने का काम राज्यों पर, उनके अपने संसाधनों पर छोड़ दिया. केंद्र सरकार ने राजनीति छोड़कर यदि समय पर क़दम उठाए होते तो राज्यों में जो कोरोना मरीज़ पहुंचे हैं, उन्हें भी रोका जा सकता था, लेकिन भाजपा एकतरफ़ा गुणगान करने में लगी है.

भाजपा को अपने केंद्रीय नेतृत्व से कहना चाहिए कि वे राज्यों को संसाधन उपलब्ध करवाएं जिससे कि लॉक-डाउन ख़त्म होने के बाद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का इंतज़ाम किया जा सके. भाजपा इस बात पर चुप्पी साध लेती है क्योंकि छत्तीसगढ़ में तो भाजपा सांसदों तक ने उन लोगों के लिए धन नहीं दिया जिनसे वे वोट मांगकर जीते हैं. दरअसल भाजपा अपनी नाकामियों से घबराई हुई और झुंझलाई हुई है. वो इस अहम सवाल तक का जवाब देने से कतरा गई कि आखिर कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी में मुख्य मंत्री सहायता कोष या राज्यों के राहत कोष को शामिल क्यों नहीं किया गया ? 

त्रिवेदी ने कहा कि ओपी चौधरी और पंकज झा को समझना चाहिए कि जो सवाल बड़े हैं उसके जवाब बड़े नेता ही दे सकते हैं. जिस पार्टी की दिलचस्पी 20 हज़ार करोड़ के नए संसद भवन के निर्माण में हो वो आम जनता के सवालों के जवाब से तो मुंह ही छुपायेगी!

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राहत देने वाली खबरः मंदिर के पुजारी को ऑटो चालक हबीब ने पहुंचाया राशन

राजकुमार सोनी

रायपुर. संभव है कि देशभर में ऐसी बहुत सी तस्वीरें और खबरें इधर-उधर घूम रही होगी, लेकिन तबलीगी-फबलीगी के चक्कर में फंसे हुए लोगों ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया होगा. यह भी संभव है कि कुछ लोगों ने  ध्यान देने के लिए रिमोट का बटन दबाया हो, लेकिन हर बटन दबने के साथ ही कोई एक सिरफिरा चीखते मिला होगा तो वे कर भी क्या लेंगे. तीसरे-चौथे और पांचवे बटन के दबने पर भी जब सिरफिरे समझाइश देते मिले होंगे कि कोरोना वायरस निपट लेंगे...मगर.... ( आप समझ गए न ? )

आप भयभीत हो गए होंगे और सोचने लगे होंगे कि क्या वाकई दाढ़ी रखने और टोपी पहनने वाले हमारा सफाया कर देंगे. जबकि कोरोना काल में कौन किसको मारेगा...यह साफ नहीं है. दिल्ली एक डरावने स्वप्न का नाम है. हो सकता है कि किसी रोज देश की छाती पर चुभने वाली सफेद दाढ़ी वाले किसी बूढ़े का स्वप्न आए और हम लुढ़क जाय. दीया-बाती के युग में कुछ भी हो सकता है. बहरहाल लॉकडाउन के उजाड़ और उदास मौसम में दिल को राहत देने वाली एक खबर छत्तीसगढ़ रायपुर के देवपुरी इलाके से आई है. अपने दिल को तसल्ली दीजिए और गहरी सांस खींचकर बोलिए- ऑल इज वेल

देवपुरी में एक सांई वाटिका है. इस वाटिका में कई लोग रहते हैं जो ठीक-ठाक कमाते हैं. समय-असमय सांस्कृतिक कार्यक्रम और भंडारे का आयोजन भी करते रहते हैं. वाटिका के भीतर एक सांई मंदिर है. इस मंदिर में एक पुजारी रहता हैं. दिन-रात सेवा करता है. कभी किसी को नाराज नहीं करता. शायद उनका गांव दूर है इसलिए अब तक उसका कोई राशन कार्ड नहीं बन पाया है. इसी वाटिका में एक महिला मीनाक्षी रहती है. मीनाक्षी समय-असमय पुजारी की मदद भी करती है. वह कल भी मंदिर के पुजारी का हालचाल पूछने गई थीं. बातचीत के दौरान उसे पता चला कि पुजारी के घर का राशन खत्म हो गया है. मीनाक्षी ने यह बात पेशे से पत्रकार अपनी बहन रेणु नंदी को बताई और रेणु ने फ्रेण्ड्रस ग्रुप से जुड़े सदस्यों को. मुख्य रुप से फ्रेण्ड्रस ग्रुप को शेख तनवीर और रिजवान भाई संचालित करते हैं. इस ग्रुप का रायपुर शहर में खूब नाम है. ग्रुप के सभी सदस्य संगीत के क्षेत्र से जुड़े हैं. रिजवान भाई ने पुजारी के घर पर राशन पहुंचाने की जवाबदारी सौंपी एक ऑटो चालक हबीब खान को. हबीब खान ने खुशी-खुशी यह जवाबदारी ली और पहुंच गए चावल-दाल, तेल, नमक और साबुन- सोड़ा लेकर.

जब हबीब खान पहुंचे तो वाटिका के बहुत से लोग घबरा गए कि अरे कौन आ गया है.... लेकिन फिर बाद में सभी सहज हो गए. अब यह सवाल मत करिएगा कि वाटिका के लोग अपने पुजारी का ध्यान क्यों नहीं रख पा रहे हैं. मुमकिन है घर के भीतर खुद को बंद कर लेने वाले लोगों को इसकी जानकारी नहीं मिल पाई हो कि बाहर क्या चल रहा है. यह भी कहना ठीक नहीं होगा कि किसी को जानकारी नहीं मिली. मीनाक्षी को मालूम चला तभी तो उसने रास्ता निकाला. बहरहाल जाते-जाते हबीब खान पुजारी से कह गए हैं- और किसी चीज की जरूरत हो तो बताइगा... सब पहुंच जाएगा. सांई बाबा की इबादत करिएगा...और कहिएगा हम सब लोगों का संकट जल्द ही दूर हो. सांई...सबकी सुनते हैं.

अब थोड़ी सी बात फ्रेण्ड्रस ग्रुप को लेकर कर लेता हूं. यह ग्रुप लॉक डाउन के दूसरे दिन से दिव्यांग, कमजोर और बेसहारा लोगों के बीच पहुंच रहा है. लगभग दस दिनों तक तो इस ग्रुप के सदस्यों ने प्रतिदिन 20 हजार रुपए की सब्जियों का वितरण किया. जब भी कोई सूचना देता है कि फलां जगह कोई भूखा है. कोई प्यासा है तो ग्रुप के सदस्य राशन-पानी लेकर सेवा में हाजिर हो जाते हैं. ग्रुप के एक प्रमुख सदस्य रिजवान कहते हैं-यह सब करके हम किसी पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं. यह जीवन नेकी के कामों में इजाफे के लिए ही मिला है. हमारे दिल को अच्छा लगता है तो हम करते हैं. मुझे रिजवान भाई का नंबर मिला है. आप चाहे तो उनसे बात कर उनकी हौसला-आफजाई कर सकते हैं- 7987023845

 

- कितना भी सिर पटक लो नागपुरी संतरो... यह देश सबका है. तुम्हारी कोई भी कोशिश भाई-चारे का खात्मा नहीं कर पाएगी.

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साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल से फोन पर हाल-चाल पूछा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने

रायपुर. सामान्य तौर पर सत्ताधीश साहित्यकारों की उपेक्षा ही करते हैं, लेकिन जो राजनीतिज्ञ दूरदर्शी होते हैं वे इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि साहित्य...राजनीति के आगे चलने वाली मशाल का नाम हैं. छत्तीसगढ़ में पुराने निजाम के बदल जाने के साथ ही कई तरह के परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. फिलहाल तो छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बचाए रखने की कवायद जारी है. इधर कोरोना से प्रभावित हरेक शख्स का पूरा ख्याल रखने वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने गुरुवार को वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल से दूरभाष पर उनका हालचाल जाना. मुख्यमंत्री ने उनसे पूछा कि लॉकडाउन के दौरान उनकी दिनचर्या कैसी है?  वे क्या करते है. कुछ नई कविताएं लिख रहे हैं या नहीं ? जवाब में श्री शुक्ल ने बताया कि वे अल-सुबह उठ जाते हैं और फिर चाय-नाश्ते के बाद लिखने बैठ जाते हैं. शुक्ल ने बताया कि इस बीच उन्होंने कुछ कविताएं लिखी है. मुख्यमंत्री ने प्रसन्नता जाहिर करते हुए उनके बेहतर स्वास्थ्य और दीघार्यु होने की कामना की.

ज्ञात हो कि श्री शुक्ल यहीं रायपुर के शैलेंद्र नगर में निवास करते हैं. देश में उनकी ख्याति हिंदी के प्रसिद्ध कवि और उपन्यासकार के तौर पर हैं. उनकी एकदम भिन्न साहित्यिक शैली ने परिपाटी को तोड़ते हुए ताज़ा झोकें की तरह पाठकों को प्रभावित किया, जिसको 'जादुई-यथार्थ' के आसपास की शैली के रूप में महसूस किया जा सकता है. उनका पहला कविता संग्रह 1971 में 'लगभग जय हिन्द' नाम से प्रकाशित हुआ. 1979 में 'नौकर की कमीज़' नाम से उनका उपन्यास आया जिस पर फ़िल्मकार मणिकौल ने फिल्म भी बनाई. कई सम्मानों से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल को उपन्यास 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के लिए 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। विनोद कुमार शुक्ल हिंदी कविता के वृहत्तर परिदृश्य में अपनी विशिष्ट भाषिक बनावट और संवेदनात्मक गहराई के लिए जाने जाते हैं। वे कवि होने के साथ-साथ शीर्षस्थ कथाकार भी हैं। उनके उपन्यासों ने हिंदी में पहली बार एक मौलिक भारतीय उपन्यास की संभावना को राह दी है। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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चंदूलाल चंद्राकर के पोते ने भगवा बिग्रेड पर साधा निशाना-जो कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ राज्य बने... वे ही कर रहे हैं विरोध

रायपुर. छत्तीसगढ़ में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को अब देश के मूर्धन्य पत्रकार रहे चंदूलाल चंद्राकर के नाम कर दिया गया है. इस नामकरण के बाद ऐसे लोग विरोध में उतर आए हैं जिन्होंने विश्वविद्यालय परिसर को बांटने, छांटने और काटने वाली वैचारिक दुकान में तब्दील कर रखा था. बताते हैं कि परिसर में ऐसे-ऐसे लोगों का जमावड़ा होता था ( शायद अब भी हो... क्योंकि वहां ऐसे लोग तैनात हैं.) जिनका एकमात्र लक्ष्य छात्र-छात्राओं के बीच वैमनस्य का बीज बांटना था. भाजपा शासनकाल के 15 सालों में यहां कई तरह के विचारक यहां अपना ज्ञान बघारने के लिए आते रहे. इन विचारकों में से अधिकतर का लक्ष्य अलगाव को बढ़ावा देना था. एक तरह से यह विश्वविद्यालय नफरत की राजनीति करने वालों का केंद्र बन गया था. इधर कतिपय लोगों के विरोध के बीच चंदूलाल चंद्राकर के पोते अमित चंद्राकर ने फेसबुक पर एक पोस्ट साक्षा की है. इस पोस्ट पर उन्होंने भगवा बिग्रेड पर निशाना साधते हुए कहा है कि जो लोग कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण हो... वे ही विरोध की राजनीति कर रहे हैं.

अमित चंद्राकर ने लिखा है- जो लोग विश्वविद्यालय के नए नामकरण का विरोध कर रहे हैं उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि घर के जिस पते पर वे छत्तीसगढ़ को लिखते हैं वह चंदूलाल चंद्राकर की ही देन है. वे पहले ऐसे भारतीय पत्रकार थे जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन का इंटरव्यूह लिया था. वर्ष 1946 से 47 तक उन्हें नई दिल्ली के बिरला हाउस में महात्मा गांधी के व्याख्यान को कव्हर करने की जिम्मेदारी दी गई थीं. आज से चालीस साल पहले ही उन्होंने लगभग 148 देशों की यात्राएं की थीं. उन्हें देश-दुनिया की गहन जानकारी थीं. वर्ष 1995 में जब उनका देहांत हुआ तब भाजपा के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी की आंखे नम थीं. वाजपेयी ने संसद में कहा था- देश ने ऐसा नेता खो दिया है जिसकी भरपाई शायद ही हो पाए. अमित चंद्राकर ने अपना मोर्चा डॉट कॉम से भी बातचीत में कहा कि चंदूलाल चंद्राकर के नाम के विरोध के पीछे नफरत की राजनीति को बढ़ावा देने वाले तत्व सक्रिय है. ऐसे तत्वों को बेनकाब करना बेहद जरूरी है.

कौन है कुशाभाऊ ठाकरे ?

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे कुशाभाऊ ठाकरे का जन्म मध्यप्रदेश के धार जिले में हुआ था. उनकी शिक्षा-दीक्षा भी छत्तीसगढ़ में नहीं हुई थीं. वे लंबे समय तक संघ के प्रचारक थे और फिर जब भाजपा के शीर्ष पद पर पहुंचे तो संगठन के काम को बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ आया करते थे. सोशल मीडिया में लोग कुशाभाऊ ठाकरे के पत्रकारिता में दिए गए योगदान को लेकर सवाल उठा रहे हैं. एक फेसबुक पोस्ट है जिसमें लिखा है- मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी हूं. मुझसे आज तक किसी भी प्राध्यापक ने नहीं कहा कि बेटा जीवन में अगर कभी कुछ बनना है तो कुशाभाऊ ठाकरे जैसा पत्रकार बनना.

क्या कुलपति को हटाया जाएगा ?

विश्वविद्यालय के नए कुलपति बलदेव शर्मा को एक खास तरह के विचारक भारतीयता के पोषक तत्व के रुप में प्रचारित करते हैं. श्री शर्मा संघ के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक रहे हैं. हालांकि अपनी तैनाती के बाद बलदेव शर्मा ने मीडिया से कहा है- कुलपति किसी पार्टी का नहीं होता. अब उनका एकमात्र लक्ष्य शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ावा देना है. अब यह कैसे और किस तरह से संभव हो पाएगा यह भविष्य की बात है, लेकिन इधर छत्तीसगढ़ सरकार ने विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्तियों को लेकर नया नियम-कानून बना लिया है इसलिए राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा चल पड़ी है कि जल्द ही कुलपति को हटा दिया जाएगा. इसके साथ ही विश्वविद्यालय में नफरत की विचारधारा को बढ़ावा देने वाले प्राध्यापकों पर भी गाज गिर सकती है. बताते हैं कि विश्वविद्यालय में एक ऐसा प्राध्यापक भी तैनात है जो एक संगठन का प्रमुख पदाधिकारी है. कुलपति के पदभार ग्रहण के दौरान विश्वविद्यालय में एक खास दल और उनसे जुड़े लोगों के शक्ति प्रदर्शन को लेकर भी कई तरह की बातें हो रही हैं. पदभार समारोह के दौरान कुछ खबरची लोग भी मौजूद थे. उनका कहना है- पदभार समारोह को देखकर लग रहा था जैसे नेताजी बारात लेकर आ गए हैं. जोरदार ढंग के तमाशे और नारों के बीच खबरची को फिल्म चाइना गेट के जगीरा का संवाद भी याद आ रहा था- हमसे न भिंडियो... मेरे मन को भाया... तो मैं कुत्ता काट के खाया. खबरची के कहने का पूरा भाव यहीं था कि कुछ लोग यह सोचकर धक्का-मुक्की और नारेबाजी कर रहे थे जैसे उन्होंने बहुत बड़ी जंग जीत ली है.

 

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क्या अखबार छूने और पढ़ने से कोरोना फैल जाएगा ?

रायपुर. पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया में यह खबर बड़ी तेजी से फैली है कि अखबार छूने और पढ़ने से कोरोना फैल सकता है. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से निकलने वाले एक सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ ने तो बकायदा अपने अखबार का प्रकाशन ही स्थगित कर दिया है. अखबार ने वॉट्सअप, फेसबुक और टिव्हटर के जरिए पाठकों तक पहुंचने की घोषणा की है.कोरोना वायरस से बचाव के लिए संकल्पित कतिपय नागरिकों का भी मानना है कि जो खबरें सोशल मीडिया और टीवी में दिनभर घूमते रहती हैं, कमोबेश वहीं खबरें दूसरे दिन अखबार में देखने को मिलती है. अब अखबार की किसी भी खबर में नई तरह की जानकारी और सूचनाएं नहीं रहती...इसलिए अगर कुछ दिनों तक अखबार के वाचन पर रोक लगा दी जाय तो इसमें बुराई नहीं है.

प्रकाशन को स्थगित रखने के पीछे छत्तीसगढ़ अखबार ने लिखा है- हिंदुस्तानियों की सेहत पर आया यह आज तक का सबसे बड़ा जानलेवा खतरा है जिसके जल्दी टलने के आसार नहीं है. सैकड़ों लोग बेहद सुरक्षित तरीके से अखबार निकालते हैं बावजूद इसे घर-घर तक पहुंचाने में हजारों लोग लगते हैं, और उनकी जिंदगी भी खतरे में आती है. कई ग्राहकों ने कोरोना का खतरा खत्म होने तक हॉकर से अखबार डालने के लिए मना भी किया है, इसलिए हम खतरा टलने तक ऑनलाइन रहेंगे.

वैसे यह बात पूरी तरह से सच है कि रायपुर की कई कॉलोनियों में रहने वाले नागरिकों ने हॉकरों को अखबार डालने से मना कर दिया है. राजधानी के अम्लीडीह स्थित मारुति रेसीडेंसी में अखबार, दूध बांटने वाले और घर में काम करने वाली बाइयों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. वहां निवासरत पत्रकार रेणु नंदी ने बताया कि अखबार वाला गेट पर ही अखबार रखकर चला जाता है. जिस नागरिक को अखबार पढ़ना होता है वह गेट पर जाकर अखबार पढ़ लेता है, लेकिन ज्यादातर लोगों ने अखबार पढ़ना बंद कर दिया है. दुर्ग-भिलाई और बिलासपुर से भी ऐसी खबरें आ रही है कि हॉकरों ने अखबार का वितरण करने से इंकार कर दिया है. इधर कतिपय बड़े अखबार वाले सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि उनका अखबार पूरी तरह से सुरक्षित है क्योंकि वे सैनेटाइजर का छिड़काव करते हुए अखबार का प्रकाशन कर रहे हैं.

अभी चंद रोज पहले कांग्रेस के एक मुख्य प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने अपने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली है. इस पोस्ट के जरिए श्री शुक्ला ने यह जानना चाहा था कि क्या अखबार भी कोरोना का संवाहक बन सकता है? उनकी इस पोस्ट पर बहुत से लोगों ने टिप्पणी करते हुए यह माना है कि अखबार से भी कोरोना वायरस फैल सकता है. उनकी पोस्ट पर डाक्टर राकेश गुप्ता ने लिखा है- संक्रमित मरीज के संपर्क में आने पर अखबार संक्रमण का शिकार बन सकते हैं. इस बारे में जब हमने भी डाक्टर गुप्ता से चर्चा की. उन्होंने साफ-साफ कहा कि अगर किसी का वायरस ट्रांसफर हो गया है तो संक्रमण फैल सकता है. वैसे अगर कोई हॉकर कोरोना पॉजिटिव हो जाएगा तो वह अखबार बांटने लायक ही नहीं रहेगा. उन्होंने कहा कि अभी हमारे देश का हेल्थ स्ट्रेक्चर बेहद पीछे हैं इसलिए सावधानी और सामाजिक अनुशासन ही कोरोना से बचाव का एकमात्र उपाय है.

सोशल मीडिया में चल रही एक खबर में यूएस सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के हवाले से कहा गया है कि जीवित कोशिकाओं के बाहर ज्‍यादातर सतहों पर कोरोना वायरस बहुत समय तक जिंदा नहीं रहता है. वायरोलॉजिस्‍ट का कहना है कि जब आप अखबार छूते हैं तो संक्रमण फैलने की आशंका तकरीबन न के बराबर होती है. एक खबर में यह भी कहा गया है कि अखबार को असुरक्षित कहने का कोई तर्क नहीं है. अगर आप भीड़भाड़ वाली जगह पर अखबार पढ़ रहे हैं तो संक्रमण फैलने का खतरा ज्‍यादा है. लेकिन, इसकी वजह अखबार नहीं, बल्कि यह है कि आप सामाजिक दूरी बनाकर नहीं चल रहे हैं.

देश के नामी अखबारों में से एक नवभारत टाइम्स ने लिखा है- कोरोना वायरस (कोविड-19) के संकट के दौरान अखबार अपने पाठकों के लिए प्रतिबद्ध हैं. अखबारों के जरिए कोरोना वायरस (कोविड-19) नहीं फैलता. डब्लूएचओ की गाइडलाइंस के मुताबिक, अखबार जैसी चीजें लेना सुरक्षित है. मॉर्डन प्रिंटिंग तकनीक पूरी तरह ऑटोमेटेड है. व्यावसायिक सामान के दूषित होने की संभावना कम है.

 

 

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मंत्री शिव डहरिया और उनकी बेटी को कोरोना हो जाने की खबर निकली भ्रामक

रायपुर. छत्तीसगढ़ के नगरीय प्रशासन मंत्री शिव डहरिया और उनकी पुत्री को कोरोना हो जाने की खबर भ्रामक निकली है. गौरतलब है कि श्री डहरिया राज्यसभा सांसद केटीएस तुलसी का सार्टिफिकेट छोड़ने के लिए दिल्ली गए थे. जब वे दिल्ली से लौट रहे थे तभी उनकी पुत्री ने यह जानकारी दी कि वह भी विदेश से लौट रही है. डहरिया पुत्री के दिल्ली लौट आने के बाद उनके साथ रायपुर लौटे. इस बीच दिल्ली में उनकी पुत्री की थर्मल स्क्रीनिंग की गई जिसमें किसी भी प्रकार के लक्षण परिलक्षित नहीं हुए. इस बीच यह खबर फैल गई कि मंत्री और उनकी पुत्री कोरोना से ग्रसित हो गए हैं. शिव डहरिया ने बताया कि लंदन एयरपोर्ट में सभी तरह की आवश्यक जांच के बाद दिल्ली जाने की अनुमति प्रदान की गई थी. जब पुत्री दिल्ली में उतरी तो भी संपूर्ण जांच की गई जिसमें सभी रिपोर्ट नेगेटिव पाई गई है. उन्होंने बताया कि चूंकि पुत्री विदेश से लौटी है तथा उनकी मुलाकात हुई है इसलिए चिकित्सकों और विशेषज्ञों की सलाह पर होम आइसोलेशन दी गई है. यह आइशोलेन उनके निवास के फ्लोर में अलग से हैं. इसका निरीक्षण योग्य चिकित्सकों के द्वारा करवाया गया है. डहरिया ने बताया कि उनके द्वारा किसी भी प्रकार की कोई जानकारी स्वास्थ्य विभाग से नहीं छिपाई गई है. योग्य स्वास्थ्य अधिकारियों के निर्देशन में हर कार्य किया जा रहा है. मंत्री ने बताया कि उनके लिए देश और देश के लोग पहले हैं. इसलिए उन्होंने स्वयं सुरक्षा का ख्याल रखते हुए परिवार के सांथ सेल्फ क्वेरेंटाइन में 14 दिन तक आइसोलेशन में रहने का निर्णय लिया है.

 

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छत्तीसगढ़ का उद्यानिकी और बागवानी मिशन एक बार फिर बदनाम

रायपुर. अपने कामकाम को लेकर बेहद चाक-चौबंद समझे जाने वाले रविंद्र चौबे के कृषि मंत्री रहने के बाद भी छत्तीसगढ़ का उद्यानिकी एवं बागवानी मिशन बदनाम हो रहा है. गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में दोनों मिशन के कामकाज की सबसे ज्यादा बदनामी तब हुई थीं जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थीं. तब यह बात प्रचलित थीं कि संचालक हरी-भरी सब्जियों के साथ-साथ हरा-हरा नोट चबाता है. इधर एक बार फिर उद्यानिकी और बागवानी मिशन में कमीशन कल्चर जोर मार रहा है.

अभी हाल के दिनों में भांठागांव के गोपी यादव नाम के एक शख्स ने कृषि उत्पादन आयुक्त को उद्यानिकी और बागवानी मिशन में चल रही कमीशनखोरी और गड़बड़ियों को लेकर शिकायत भेजी है. शिकायत करने वाले ने मिशन के संचालक को जबरदस्त ढंग से आड़े हाथों लिया है. शिकायतकर्ता का कहना है कि नए संचालक जब से तैनात हुए हैं तब से हर मामले में कमीशन का खुला खेल चल रहा है.

वर्मी बेड़ के वितरण में घोटाला

शिकायतकर्ता का आरोप है कि राष्ट्रीय उद्यानिकी मिशन के तहत किसानों को केंचुआ खाद बनाने के लिए वर्मी बेड प्रदान किया जाता है. एक वर्मी बेड की कीमत 16 हजार रुपए होती है. इस बेड का आधा खर्चा मिशन के द्वारा वहन किया जाता है तो आधा किसानों को अदा करना होता है, लेकिन नए संचालक ने किसानों से अंश राशि न लेकर घटिया किस्म का वर्मी बेड़ वितरित कर दिया है. किसानों को जो वर्मी बेड़ बांटा गया है उसमें केंचुआ खाद का निर्माण ही नहीं हो रहा है. बाजार में जिस वर्मी बेड़ की कीमत दो से ढाई हजार रुपए हैं उसे प्रति किसान सोलह हजार रुपए के मान से वितरित किया गया है. एक अनुमान है कि अब तक 40 करोड़ रुपए का वर्मी बेड़ बांटा जा चुका है.

आलू बीज घोटाला

उद्यानिकी एवं बागवानी मिशन आलू की खेती को बढ़ावा देने के लिए आलू के बीज का भी वितरण करता है. शिकायतकर्ता का कहना है कि इस बार आलू बीज का वितरण तब किया गया जब बोनी के लिए समय निकल गया. कई किसानों के खेत में आलू सड़ गया. जो बीज वितरित किया गया उसकी गुणवत्ता भी बेहद घटिया थीं जिसके चलते कई किसानों ने उसे अपने खेत में बोने से इंकार कर दिया.

फूल और सब्जी बीज घोटाला

मिशन के द्वारा फूलों की खेती को बढ़ावा देने का काम भी किया जाता है. इस वित्तीय वर्ष में ग्लेडियोलस रजनीगंधा गेंदे के फूल कंद-बीज बोनी का समय निकल जाने के बाद बांटा गया. ऐसा इसलिए किया गया ताकि सप्लायर को फायदा पहुंचाया जा सकें. इस तरह सब्जियों का जो बीज वितरित किया उसमें अंकुरण की स्थिति ही नहीं बन पाई. भिंडी और मिर्ची की खेती करने वाले किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि उन्हें उनके खेतों में उत्पादन हीं नहीं हुआ. शिकायतकर्ता का आरोप है कि उद्यानिकी मिशन ने जिन जगहों पर पाली और नेट हाउस का निर्माण किया है उसकी गुणवत्ता भी बेहद घटिया है. पाली नेट हाउस तेज हवा चलने में फट जाता है.

कमीशन के चलते काम करना मुश्किल

कृषि के क्षेत्र में सामानों का वितरण करने वाले कई सप्लायर कार्यरत है. नाम न छापने की शर्त में सप्लायरों ने भी बताया कि उद्यानिकी एवं बागवानी मिशन में कमीशनबाजी के चलते काम करना कठिन हो गया है. बात-बात पर पैसों की मांग की जाती है. कोई भी सप्लायर दो पैसे कमाना चाहता है, लेकिन घटिया सामाग्री का वितरण कर अपनी फर्म का नाम बदनाम नहीं करना चाहता. सप्लायरों कहना है कि दाल में नमक वाली बात तो समझ में आती है, लेकिन नमक में दाल वाली परम्परा के चलते प्रदेश के अच्छे सप्लायरों ने अपना कामकाज समेट लिया है. अब उद्यानिकी एवं बागवानी मिशन में वहीं सप्लायर काम कर रहे हैं जो घटिया बीज-कंद या अन्य सामान का वितरण करने के खेल में माहिर है.

 

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समाज कल्याण विभाग में कार्यरत महिलाओं ने कहा- एक नंबर का भ्रष्टाचारी है पंकज वर्मा

रायपुर. एक फर्जी संस्था बनाकर करोड़ों रुपए का वारा-न्यारा करने के खेल में फंसे समाज कल्याण विभाग के संयुक्त संचालक पंकज वर्मा पर उनके अपने ही विभाग में कार्यरत महिलाओं ने गंभीर आरोप लगाए हैं. महिलाओं ने उन्हें एक नंबर का भ्रष्टाचारी बताया है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, राज्यपाल अनसुइयां उइके और महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री अनिला भेड़िया को भेजी गई शिकायत में श्रीमती ललिता लकड़ा, जी सीता, अभिलाषा पण्डा, वैशाली भरड़वार, संगीता सिंह, क्षमा सिंह, सिनीवाली पथिक ने कहा है कि पंकज वर्मा शासकीय योजनाओं की राशि को गबन करने के खेल में माहिर है. महिलाओं का कहना है कि पंकज वर्मा की चल-अचल सभी तरह की संपत्तियों की जांच होनी चाहिए क्योंकि गत 20 सालों से वे भ्रष्टाचार में लिप्त है और उन्होंने अपार संपत्ति बना ली है.

गौरतलब है कि अभी हाल के दिनों में उच्चन्यायालय बिलासपुर ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह माना है कि प्रदेश के अफसरों ने राज्य स्त्रोत केंद्र ( एनजीओ ) खोलकर करोड़ों की राशि का गबन किया है. इस खेल में प्रदेश के कई बड़े अफसरों की भूमिका सामने आई है. उच्चन्यायालय ने इस मामले में सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश भी दिए हैं. समाज कल्याण विभाग में कार्यरत महिलाओं ने जो शिकायत की है उसमें भी इस बात का उल्लेख किया है कि राज्य स्त्रोत केंद्र में करोड़ों का भ्रष्टाचार किया गया है. महिलाओं का कहना है कि पंकज वर्मा राज्य स्त्रोत केंद्र के कार्यकारी निदेशक थे और उनके इस पद में रहने के दौरान ही करोड़ों का गबन हुआ है. महिलाओं का कहना है कि पंकज वर्मा ने संबल एवं स्वाभिमान योजना, आनलाइन सर्वेक्षण योजना, निराश्रित निधि योजना में भी जमकर अफरा-तफरी की है. विभाग में कार्यरत महिलाओं का कहना है कि वर्मा कई संस्थाओं के अकेले प्रभारी अधिकारी बने रहे हैं और व्यापक रुप से भ्रष्टाचार में लिप्त रहे हैं. वे दिव्यांग बच्चों के नाम पर मिलने वाली बड़ी धनराशि भी हड़पते रहे हैं. उन्होंने जिस ढंग से वित्तीय अनियमितता की है उसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता. वे हर महीने लाखों रुपए का फर्जी बिल-बाउचर बनाते हैं. विभाग के सभी बाबू उनके दबाव में काम करने को मजबूर है. 

शरदचंद्र तिवारी, भूपेंद्र पांडे और शिखा पर विशेष मेहरबानी

विभाग की महिलाओं ने पंकज वर्मा पर वर्कशॉप मैनेंजर के तौर पर कार्यरत शरद तिवारी, भूपेंद्र पांडे और शिखा पर खास ढंग से मेहरबान होने का आरोप भी लगाया है. महिला कर्मचारियों का कहना है कि जो महिलाएं ईमानदार है उन पर गलत आरोप लगाकर उनका तबादला कर दिया जाता है. वही शरद तिवारी, भूपेंद्र पांडे और शिखा को कई संस्थाओं का प्रभार देकर रखा गया है. ये सभी लोग  पंकज वर्मा की शह पाकर हर माह लाखों रुपए का गबन कर रहे हैं. महिलाओं का आरोप है कि शरद तिवारी खुद को फिजियोथैरिपिस्ट बताता है परन्तु जिस संस्थान में उसकी नियुक्ति की गई थी वहां फिजियोथैरिपिस्ट का कोई पद ही नहीं था. शरद तिवारी को भ्रष्टाचार करने के लिए ही ऑक्यूपेशनलथेरेपिस्ट पद के विरुद्ध नियुक्ति देकर प्रमोट किया गया है. शरद तिवारी की फर्जी नियुक्ति की भी हर हाल में जांच होनी चाहिए.

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हमें घटिया औरत...नौकरानी... कामवाली बाई कहता है पंकज वर्मा...समाज कल्याण विभाग की कामकाजी महिलाओं ने खोला मोर्चा

रायपुर. एक फर्जी संस्थान के जरिए करोड़ों रुपए का वारा-न्यारा करने के आरोपों से घिरे संयुक्त संचालक पंकज वर्मा पर समाज कल्याण विभाग की महिलाओं ने गंभीर आरोप लगाए हैं. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, राज्यपाल अनसुइयां उइके और महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री अनिला भेड़िया को भेजी गई एक शिकायत में श्रीमती ललिता लकड़ा, जी सीता, अभिलाषा पण्डा, वैशाली भरड़वार, संगीता सिंह, क्षमा सिंह, सिनीवाली पथिक ने कहा है कि पंकज वर्मा कई सालों से महिला कर्मचारी एवं अधिकारियों से अशोभनीय और अभद्र व्यवहार कर रहे हैं. महिलाओं का आरोप है कि पंकज वर्मा फर्जी वाउचर पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डालते हैं. जो महिला कर्मचारी या अधिकारी ऐसा करने से इंकार करती है उनके साथ सार्वजनिक स्थलों पर गाली-गलौच की जाती है. उन्हें घटिया औरत... कामवाली बाई...  नौकरानी... कहकर लताड़ा जाता है.

अधिकारियों के घर चाकरी

महिला कर्मचारी और अधिकारियों का कहना है कि पंकज वर्मा पूरी तरह से स्त्री विरोधी है. विभाग में कार्यरत चतुर्थ श्रेणी की महिला कर्मचारियों को काम करने के नाम पर डरा-धमकाकर अधिकारियों के घर भेजा जाता है. समाज कल्याण विभाग की माना स्थित संस्था बहु विकलांग गृह, अस्थि बाधितार्थ बालगृह, वृद्धाश्रम और मानसिक बच्चों की संस्था में कार्यरत बेसहारा विधवा महिलाओं से गलत काम करवाया जा रहा है. कुछ महिलाओं को अधिकारियों ने 15-15 सालों से अपने घर पर रखा हुआ है.

बस्तर भेज देने की धमकी

गलत कामों पर साथ नहीं दिए जाने पर पंकज वर्मा महिला कर्मचारियों को बस्तर भेजने की धमकी देते हैं. विभाग की महिला कर्मचारियों को सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया गया है. बालोद में कार्यरत उपसंचालक बरखा कानू को पहले निलंबित किया गया तो एक शिकायतकर्ता श्रीमती ललिता लकड़ा को सबके सामने निपटाने की धमकी दी गई. विभाग में जब भी कोई अनियमतता होती है तो सबसे पहले महिला कर्मचारियों को ही आरोपी बनाकर उन्हें निलंबित कर दिया जाता है.

फर्जी प्रमाण पत्र पर नौकरी

महिला कर्मचारियों ने पंकज वर्मा पर फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने का आरोप भी लगाया है. इस आरोप को प्रमाणित करने के लिए कुछ दस्तावेज भी संलग्न किए गए हैं. महिलाओं का आरोप है कि पंकज वर्मा महज दसवी कक्षा पास है. उन्होंने खुद को पढ़ा-लिखा साबित करने के लिए उत्तर प्रदेश से फर्जी प्रमाण पत्र पेश किया है. वे विभाग के अकेले ऐसे व्यक्ति है जिनका धड़ल्ले से प्रमोशन होता रहा है. उन्हें जिस ढंग से पदोन्नति मिलती रही है वह भी जांच का विषय है. उन्हें दिव्यांगों के विषय में न तो कोई ज्ञान है और न ही कोई संवेदनशीलता. सरकार की ओर से द्विव्यांगों के लिए जो धनराशि खर्च की जाती है उसे वे हड़प रहे हैं. महिलाओं ने पंकज वर्मा के कारनामों को लेकर कई पेज की दो शिकायतें भेजी है. दूसरी शिकायत में और भी गंभीर आरोप जड़े गए हैं. आरोपों के संबंध में जब पंकज वर्मा से दूरभाष पर चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि वे कुछ भी बोलना नहीं चाहते. 

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