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खबरों से चिढ़कर रमन सरकार ने पत्रकार की पत्नी की छीनीं थी नौकरी... भूपेश बघेल ने ससम्मान लौटाई

रायपुर. भूपेश बघेल सरकार ने गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय कथक नृत्यांगना डॉ. अनुराधा दुबे की पर्यटन मंडल में वापसी पर मुहर लगा दी है. छत्तीसगढ़ में जब भाजपा की सरकार थीं तब पत्रकार राजेश दुबे की पत्नी डॉ. अनुराधा दुबे को पर्यटन अधिकारी के पद से बर्खास्त कर दिया था. पूर्व सरकार के इस कारनामे को अंजाम देने में संविदा में पदस्थ सुपर सीएम के तौर पर विख्यात एक अफसर के अलावा दो अन्य अफसरों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीं. प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस प्रकरण की जांच करवाई और सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए डॉ. अनुराधा दुबे की सेवा को बहाल करने का फैसला किया. मुख्यमंत्री के इस फैसले से मीडिया जगत से जुड़े लोगों ने प्रसन्नता जाहिर की है.

एक दैनिक समाचार पत्र रायपुर में काम करने के दौरान राजेश दुबे ने वर्ष 2011 से 2013 तक रमन सरकार के खिलाफ लगातार कलम चलाई थीं. इनमें बहुचर्चित मीना खलको हत्याकाण्ड, एचएम स्क्वायड की वसूली व गुण्डागर्दी, रोगदा बांध का उद्योगों को बेचा जाना, मुख्यमंत्री के सुरक्षा सलाहकार बनाए गए पंजाब के सेवानिवृत पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल का बहुचर्चित साक्षात्कार सहित सैकड़ों समाचार शामिल हैं. इन खबरों की वजह से रमन सिंह की सरकार लंबे समय तक असहज रही.

वर्ष 2013 में विधानसभा चुनाव के दौरान जब सरकार में पदस्थ नौकरशाह खबरों को रोकने में सफल नहीं हुए तो उन्होंने अखबार से जुड़े पत्रकारों पर दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया. तब अखबार से जुड़े हर शख्स के खिलाफ राज्य के हर जिले में एफआईआर दर्ज करवाई गई. पूर्व सरकार के इस कृत्य की थू-थू होती रही, लेकिन सरकार अनजान बनी रही. इसके बाद भी जब बात नहीं जमी तो नौकरशाह पत्रकारों के घरों की महिलाओं और बच्चों पर हमला करने लगे. किसी पत्रकार की पत्नी का तबादला किया गया तो किसी पत्रकार के बच्चे को झूठे मामले में फंसाकर जेल भिजवाया गया. इस दौरान राज्य में पांच पत्रकारों की हत्या भी हुई.

अफसरों को दी गई थी सुपारी

अनुराधा दुबे को हटाने के लिए सरकार के जिन अफसरों को इस काम के लिए सुपारी दी गई थी, उन्होंने मुख्यमंत्री के जनदर्शन कार्यक्रम एक झूठी शिकायत करवाई. इस शिकायत में यह  लिखा गया था कि पर्यटन मंडल में डॉ. अनुराधा दुबे की नियुक्ति नियम-कायदों के विपरीत की गई है.इसकी जांच करवाई जाए व उसके बाद डॉ. दुबे व संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई सुनिश्चित हो. शिकायत मिलते ही खुन्नस निकालने को तैयार बैठी रमन सरकार हरकत में आ गई और इस बात का परीक्षण किए बिना कि शिकायतकर्ता का कोई वजूद है या नहीं, जांच के आदेश दे दिए और महज पंद्रह से बीस दिनों के भीतर जांच पूरी हो गई. जल्द ही इसकी रिपोर्ट मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह को सौंप दी गई.  इस बीच पत्रकार राजेश दुबे ने शिकायत करने वाले की खोजबीन की, लेकिन कोई नहीं मिला. बाद में किसी अज्ञात शख्स ने दुबे के निवास स्थान पर पत्र भेजकर यह जानकारी दी कि आपकी पत्नी को नौकरी से निकाले जाने की योजना मंत्रालय के एक कमरे में बनी थीं जिसमें संविदा में पदस्थ और खुद को देश का सबसे पावरफुल अफसर बताने वाले सुपर सीएम ने बनाई थीं. उनके साथ इस कृत्य दो अन्य लोग शामिल थे. वैसे संविदा में पदस्थ इस अफसर की नियुक्ति खुद ही संदिग्ध थी. इस नियुक्ति को लेकर कुछ लोगों ने अदालत की शरण भी ली थी,  लेकिन अफसर की प्रतापगढ़िया शैली वाली गुंडई के चलते लोग पीछे हट गए. जो लोग नियुक्ति की वैधानिकता को लेकर चुनौती देते रहे उनके परिजनों को झूठे मामलों में फंसाया जाता रहा. अफसर ने अपने बचाव के लिए तरह-तरह की जुगत भी कर रखी थी. उसने कुछ पत्रकारों को वेबसाइट खोलकर सरकार के पक्ष में माहौल बनाते रहने के लिए भरपूर आर्थिक सहायता दी थी और नियम विरुद्ध विज्ञापन भी दिलवाया था. वैसे तो संविदा में पदस्थ इस कथित सुपर सीएम का विरोध आईएएस अफसर भी करते थे, लेकिन लूप लाइन में फेंक दिए जाने के चलते वे मुखर नहीं हो पाए.

संचालक मंडल के अधिकारों पर अतिक्रमण

बताना लाजिमी होगा कि छत्तीसगढ राज्य पर्यटन मंडल एक स्वायत्तशासी संस्था है और उसके संचालक मंडल को सभी प्रकार के फैसले करने का अधिकार है, लेकिन डॉ. अनुराधा दुबे के मामले में पूर्ववर्ती सरकार ने मंडल के अधिकारों पर अतिक्रमण किया और संचालक मंडल को भरोसे में लिए बगैर उन्हें सेवा से पृथक करने का एकतरफा आदेश जारी कर दिया था, जबकि अनुराधा दुबे की नियुक्ति मंडल के नियम-कायदों के अनुरूप की गई, जिसका अनुमोदन तत्कालीन पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल व तत्कालीन सचिव, पर्यटन आरपी जैन ने भी किया था. परंतु इन सबको नजरअंदाज करते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निर्देश पर विभाग के तत्कालीन सचिव केडीपी राव व तत्कालीन प्रबंध संचालक संतोष केमिश्रा ने 7 अगस्त 2012 को डॉ. अनुराधा दुबे को सेवामुक्त करने का आदेश जारी किया था. हालांकि यह दोनों अफसर महज निर्देशों को मानने के लिए बाध्य थे. भूपेश सरकार बनने के बाद एक अफसर ने यह माना कि डाक्टर रमन सिंह के कार्यकाल में सुपर सीएम के चलते सभी भयभीत रहते थे. वे जिस काम को करने के लिए बोलते थे उसे हर हाल में करना ही होता था चाहे वह कितना ही गलत क्यों न हो. अफसर ने माना कि राजेश दुबे की पत्नी को नौकरी से निकाले जाने को लेकर बेहद दबाव था.

 मुख्यमंत्री की संवदेनशीलता

भूपेश बघेल जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे वे तब से इस प्रकरण से वाकिफ थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस प्रकरण में विशेष रुचि दिखाई और पूरे मामले की नए सिरे से जांच करवाई. मामले की पूरी छानबीन के बाद उन्होंने इस मामले को राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष रखा और सदस्यों को बताया कि पत्रकार की पत्नी अनुराधा दुबे के साथ  पूर्व सरकार ने जो कुछ किया वह मानवीय नहीं है. मुख्यमंत्री की पहल पर मंत्रिमंडल के सदस्यों ने डॉ. अनुराधा दुबे की छत्तीसगढ राज्य पर्यटन मंडल में वापसी के प्रस्ताव पर मुहर लगाकर यह संदेश भी दिया है कि भूपेश सरकार में अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान बरकरार रहने वाला है. मुख्यमंत्री बघेल के इस फैसले पर राज्य के मीडिया जगत ने हर्ष जाहिर करते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया है. 

अखबार का दोहरा चरित्र

वैसे जब अनुराधा दुबे नौकरी से हटाई गई तब अखबार ने थोड़े समय तक पत्रकार राजेश दुबे का साथ दिया, लेकिन उसके बाद उनका तबादला कभी कोलकाता, कभी भोपाल तो कभी जगदलपुर किया जाता रहा. सरकार विरोधी खबर लिखने की वजह से अन्य पत्रकारों को भी तबादले में इधर-उधर भेजा जाता रहा. अखबार के मालिक और प्रधान संपादक जब भी रायपुर आते तो प्रेस में कार्यरत सभी पत्रकारों के समक्ष नैतिकता का कंबल ओढ़कर कहते थे- देखिए.... रमन सिंह के लोग खबरों में समझौते के लिए प्रेशर बना रहे हैं, लेकिन न तो मैं झुकूंगा और न ही मेरा अखबार.अफसर मुझसे मिलकर कहते है कि सरकार से समझौता कर लीजिए...खबरों का टोन डाउन कर दीजिए.... लेकिन मैंने भी तय कर लिया है कि जब तक राजेश दुबे की पत्नी की नौकरी वापस नहीं होगी तब तक कोई समझौता नहीं होगा. वैसे अखबार ने जब छत्तीसगढ़ से अपना प्रकाशन प्रारंभ किया था तब खबरों को छापने में बड़ी हिम्मत दिखाई थी, लेकिन वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले अखबार ने अपने तेवर बदले. धीरे- धीरे यह अखबार भगवा लोगों का प्रमुख पत्र बन गया.अब भी अखबार के सभी संस्करणों में भगवा संस्कृति को बढ़ावा देने वाले संपादक और पत्रकार कार्यरत है. छत्तीसगढ़ से निकलने सभी संस्करणों की खबरों से रू-ब-रू होने के बाद यह साफ दिखता है कि अखबार के संपादक और पत्रकार भगवा सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अखबार के मालिक, संपादक और रिपोर्टरों ने जबरदस्त ढंग से भगवा लहर को बढ़ावा देने का काम किया था. शायद अखबार के मालिक से लेकर पत्रकार सभी को यह भरोसा था कि चौथीं बार भी छत्तीसगढ़ में पुरानी सरकार रिपीट हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. केन्द्र में सरकार रिपीट हुई तो अखबार के मालिक ने अपने एक लेख में बड़ी बेशर्मी से यह ऐलान भी किया कि उनके अखबार का हर संस्करण मोदी की सेवा के लिए समर्पित रहेगा.अखबार मालिक के इस भयानक किस्म के संकल्प की हर मंच से तीखी आलोचना हुई. सबने यह माना कि शरणागत होने की दौड़ में अखबार ने सबको पीछे छोड़ दिया है.

 

 

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सीएम से मिला निर्देश और मंडल निकल पड़े बस्तर के धान खरीदी केंद्रों का औचक निरीक्षण करने

रायपुर. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मिले निर्देश के बाद राज्य के मुख्य सचिव आरपी मंडल रविवार की अलसुबह बस्तर के जगदलपुर, कोंडागांव, नारायणपुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले के धान खरीदी केंद्रों का औचक निरीक्षण करने हेलिकाप्टर से रवाना हो गए हैं. उनके साथ धान खरीदी में गड़बड़ियों को पकड़ने वाला छापामार दस्ता भी चल है. गौरतलब है कि इसके पूर्व मुख्य सचिव ने रायगढ़, जांजगीर-चापा, बिलासपुर और मुंगेली जिलों के धान खरीदी केंद्रों पर छापामार कार्रवाई कर किसानों को राहत दिलवाई थीं.

किसानों से सही मूल्य और सही तौल पर धान खरीदी को लेकर सरकार पूरी तरह से मुस्तैद है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पूरी खरीदी प्रक्रिया की खुद ही मानिटरिंग कर रहे हैं. यह सब इसलिए भी संभव हो रहा पा रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री स्वयं किसान परिवार से हैं. मुख्यमंत्री के अलावा उनके परिवार के लोग आज भी खेती-किसानी करते हैं. किसानों के एक बड़े वर्ग में उनकी पैठ को देखकर भाजपा ने धान खरीदी में कथित गड़बड़ियों को लेकर आरोप लगाया था, लेकिन जल्द ही यह भी साफ हो गया कि सारे आरोप राजनीति से प्रेरित थे. इधर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक बार फिर कहा कि किसान अफवाह फैलाने वालों से सावधान रहे. उनकी सरकार किसानों से घोषणा पत्र में किए गए वादे के मुताबिक ही धान की खरीदी करेगी. विपक्ष को इस बात के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है कि इसके लिए आवश्यक धन कहां से आएगा. धान खरीदी के लिए कोई लिमिट भी तय नहीं की गई है.

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खुद को पूर्व चीफ सेक्रेटरी सुनील कुजूर का करीबी बताकर मंत्रालय में घूमता रहता था ठगी का आरोपी मनीष शाह

रायपुर.निजी कंपनी में शेयर होल्डर बनाकर लाभांश दिलाने का झांसा देने वाले मनीष शाह और उनकी पत्नी ऋचा शाह पर पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया है, लेकिन अभी तक आरोपी दंपत्ति की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है. बताते हैं इस दंपत्ति ने शहर के और भी कई नामी-गिरामी लोगों को भी ठगी का शिकार बनाया है. सूत्रों का कहना है कि मनीष शाह ने मंत्रालय में पदस्थ भारतीय प्रशासनिक सेवा के कई अफसरों के बीच खासी पैठ बना रखी थीं. वह खुद को पूर्व चीफ सेक्रेटरी सुनील कुजूर का करीबी बताकर मंत्रालय में घूमता भी रहता था.

पूर्व केंद्रीय मंत्री पुरुषोत्तम कौशिक के बेटे दिलीप कौशिक ने मनीष शाह और ऋचा शाह के खिलाफ पुलिस थाने रिपोर्ट दर्ज करवाई है. दिलीप कौशिक  का कहना है कि उसने वर्ष 2013 -14 में लक्ष्य नेचुरल फुड प्राइवेट लिमिटेड में चार करोड़ के आसपास शेयर किया था. इतनी बड़ी रकम शेयर करने के बाद ऋचा शाह और मनीष शाह ने उन्हें लक्ष्य नेचुरल फूड्स प्राइवेट लिमिटेड, लक्ष्य टेक्नोक्रेट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, सीजी सोया प्राइवेट लिमिटेड में डायरेक्टर बना दिया और यह आश्वासन देते रहे कि जल्द ही मुनाफे के साथ पैसा वापस कर दिया जाएगा, लेकिन जब पैसा वापस नहीं हुआ तब उन्होंने थाने की शरण ली. कौशिक ने बताया कि कंपनी में खेती-किसानी की मशीन व उपकरण तैयार किए जाते हैं. इस कंपनी में 40 से अधिक किसानों का पैसा भी लगा हुआ है. उन्होंने बताया कि इस कंपनी में उन्होंने बैंक से लोन लेकर इनवेस्ट किया था. कौशिक ने जानकारी दी कि शाह दंपत्ति से कई और लोग पीड़ित है.

भाजपा के शासनकाल से चल रहा है शाह का गोरखधंधा

प्रदेश में मनीष शाह और उसकी कथित कंपनी का गोरखधंधा भाजपा के शासनकाल से ही फलता-फूलता रहा है. प्रदेश में जब रमन सिंह की सरकार थी तब शाह ने एक से बढ़कर एक कारनामों को अंजाम दिया. शाह ने सोया मिल्क, बिस्कुट और केटलफिड की बिक्री के नाम पर भी करोड़ों का खेल खेला. ज्ञात हो कि भाजपा के शासनकाल में सरकार ने बच्चों के कुपोषण को दूर करने के लिए सोया मिल्क बांटने का फैसला किया था. सरकार की रजामंदी के बाद शाह ने केंद्रीय और राज्य स्तरीय प्रयोगशाला से जांच करवाए बगैर बच्चों को दूध का पैकेट वितरित कर दिया था. कई स्कूलों में जब बच्चे बीमार पड़ने लगे तब थोड़े समय के लिए पैकेट के वितरण में रोक लगी.

बीज निगम से सांठगांठ

रमन सिंह की सरकार में बीज निगम ने जन निजी भागीदारी ( पीपीपी मोड ) के तहत सोया बिस्कुट, सोया मिल्क और केटलफिड की खरीदी की थी. इसके लिए शाह की कंपनियों से अनुबंध किया गया था. इन चीजों की खरीदी के लिए सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य शर्त यह थीं कि कंपनी को  छत्तीसगढ़ में अपनी ईकाई स्थापित करनी थी और प्रदेश के किसानों या बाजार से कच्चे माल की खरीददारी करनी थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बीज निगम के अधिकारियों ने यह जांचे-परखे कि किसी तरह की कोई ईकाई स्थापित की है या नहीं...शाह को करोड़ों का काम सौंप दिया था. जाहिर सी बात है कि जब ईकाई स्थापित नहीं हुई हो तो स्थानीय बाजार और किसानों से खरीददारी भी नहीं हुई होगी. ऐसा ही हुआ. शाह ने सोया मिल्क के लिए कच्चा सामान पड़ोसी राज्यों से खरीदा और स्कूल शिक्षा विभाग तथा महिला बाल विकास विभाग की ओर से संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों में इसकी जमकर सप्लाई की. शाह ने पशु आहार के लिए भी किसी तरह की कोई ईकाई स्थापित नहीं की और गौशालाओं में पशु आहार पहुंचाया जाता रहा. बिस्कुट की ट्रेडिंग नागपुर के सुंदर इंडस्ट्रीज से की गई और स्कूल तथा आंगनबाड़ी केंद्रों में वितरण होता रहा. सूत्रों का कहना है कि जल्द ही बीज निगम के वे अधिकारी भी लपेटे में आएंगे जो शाह के साथ गोरखधंधे में शामिल थे. 

महालेखाकार की आपत्ति

एक शिकायत के बाद महालेखाकार ( कैग ) ने 31 मई 2015 को आपत्ति जताते हुए बीज निगम को नियमों के खिलाफ की जा रही खरीदी और भुगतान पर रोक लगाने को कहा. निगम ने कैग की तमाम आपत्तियों को उस दौरान रद्दी की टोकरी में डाल दिया और बड़े पैमाने पर खरीदी और भुगतान का खेल जारी रखा. वर्ष 2015 से वर्ष 2018 तक यह क्रम जारी रहा. वर्ष 2018 में कैग ने एक बार फिर बीज निगम को खरीदी और पर रोक लगाने को कहा तब बीज निगम ने 11 जनवरी 2019 को खानापूर्ति करते मनीष शाह को एक पत्र लिखा और कहा कि वे जल्द से जल्द प्लांट स्थापित कर लें. अब तक न तो प्लांट लगा है और न ही स्थानीय स्तर पर कच्चे माल की खरीदी होती है. सारा कुछ बाहर से नियंत्रित होता है. अधिकारियों की सांठगांठ से शासन को चूना लगाने का खेल अब तक चल रहा है. बताते हैं कि शाह  ने कृषि विभाग, बीज निगम और शिक्षा विभाग में पदस्थ अधिकारियों से मिली-भगत कर करोड़ों रुपए का काम हथियाया और हर विभाग में घटिया सप्लाई की.

 

 

 

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धान खरीदी में लिमिट को कोरी अफवाह करार दिया खाद्य विभाग ने

रायपुर. खाद्य विभाग के सचिव ने धान खरीदी में लिमिट को कोरी अफवाह करार दिया है. एक पत्रवार्ता में उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में एक से छह दिसम्बर तक महज एक सप्ताह में एक लाख 73 हजार 491 किसानों से 7 लाख 11 हजार 306 मैट्रिक टन धान की खरीदी की गई है और धान विक्रय करने वाले एक लाख 26 हजार 897 किसानों को 700 करोड़ रूपए से अधिक का भुगतान भी किया जा चुका है.

गौरतलब है कि पहले कुछ समय से कतिपय राजनीतिक दलों द्वारा यह अफवाह फैलाई जा रही है कि सरकार लिमिट तय कर धान की खरीदी कर रही है. खाद्य सचिव  के मुताबिक प्रदेश के वास्तविक कृषकों से धान खरीदी सुनिश्चित करने के लिए अवैध धान खपाने की कोशिशों पर लगाम कसने की प्रभावी कार्रवाई की जा रही है. साथ ही दूसरे प्रदेशों से आने वाले धान पर तथा कोचियों, बिचैलियों पर प्रभावी कार्यवाही की जा रही है. उन्होंने बताया कि 7 दिसम्बर 2019 की स्थिति में कुल 2 हजार 270 प्रकरणों में 2 हजार 138 कोचियों और 132 अंतर्राज्यीय प्रकरणों में 29 हजार 170 टन अवैध धान की जप्ती की गई है, जिसमें 260 वाहनों के खिलाफ कार्यवाही की गई है. किसी भी किसान के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है. सभी प्रकरणों में धान खरीदी के ऐसे प्रकरण जिसमें बिना किसी मंडी लाइसेंस अथवा अन्य दस्तावेज जैसे खरीदी पत्रक नहीं होने पर कार्यवाही की गई है. उन्होंने बताया कि प्रदेश में छोटे व्यापारियों द्वारा वैध तरीके से किसानों से धान खरीदने पर कोई प्रतिबंध भी नहीं लगाया गया है.

उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा में की गई घोषणा के अनुरूप एक ही प्रकार के कृषि उपज के संबंध में मंडी अधिनियम के तहत 4 क्विंटल के स्थान पर 10 क्विंटल के संग्रहण की अनुमति छोटे व्यापारियों को दी गई है. प्रदेश में धान खरीदी की अपनी पूरी अवधि 15 फरवरी 2020 तक की जाएगी.  धान खरीदी केन्द्रों के क्षमता के अनुसार किसानों को असुविधा से बचाने के लिए टोकन जारी करने की व्यवस्था प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी गई है. उन्होंने बताया कि धान की खरीदी के लिए छोटे-बड़े सभी किसानों से उनके पंजीकृत रकबे के अनुसार प्रति एकड़ 15 क्विंटल की दर से धान खरीदी सुनिश्चित की जाएगी एवं धान खरीदी के लिए प्रत्येक किसान को अपनी उपज बेचने का अवसर प्रदान किया जाएगा. प्रदेश में धान खरीदी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर की जा रही है। 2500 प्रति क्विंटल की दर से शेष राशि के भुगतान के लिए अन्य राज्यों में प्रचलित योजना का अध्ययन कर पृथक योजना शीघ्र लागू की जाएगी. राज्य शासन द्वारा धान खरीदी के लिए आवश्यक धन राशि तथा बारदानों की व्यवस्था की गई है.

   

 

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रमन सिंह, मुकेश गुप्ता, टीजे लांगकुमेर, प्रशांत अग्रवाल और सुरक्षाबलों पर दर्ज हो हत्या का मामला- हिमांशु कुमार

रायपुर. सारकेगुड़ा न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद देशभर के मानवाधिकार कार्यकर्ता अब बस्तर में जुटने लगे हैं. प्रसिद्ध मानवाधिकार व सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार भी गुरुवार को बीजापुर के सारकेगुड़ा में मौजूद रहेंगे. बस्तर रवानगी से पहले अपना मोर्चा डॉट कॉम से खास चर्चा में हिमांशु कुमार ने कहा ( देखिए वीडियो लिंक  https://www.youtube.com/watch?v=ZuaBwVGoq84&t=5s )कि जब सलवा जुडूम चल रहा था तब भाजपा की सरकार ने सारकेगुड़ा को पूरी से उजाड़ दिया था. जैसे-तैसे हमने इस गांव को बसाया, लेकिन जल्द ही इस गांव के 17 बेकसूर आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया. अब जबकि न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट सामने आ गई है तब साफ-साफ दिख रहा है कि इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, तात्कालीन खुफिया चीफ मुकेश गुप्ता, बस्तर के आईजी टीजे लांगकुमेर, बीजापुर के पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल सहित अन्य कमांडिंग अफसर संलिप्त थे. हिमांशु कुमार ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, खुफिया चीफ मुकेश गुप्ता सहित अन्य सभी जिम्मेदार लोगों पर एफआईआर दर्ज होनी ही चाहिए. हिमांशु कुमार ने कहा कि अगर ग्रामीण चाहेंगे कि सभी दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो तो वे ग्रामीणों के साथ प्राथमिकी दर्ज करवाने थाने अवश्य जाएंगे.

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छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर कंपनीः तृप्ति सिन्हा और केआरसी मूर्ति हटाए गए..सुपर सीएम की गैंग में शामिल और भी कई अफसरों की होगी छुट्टी

रायपुर. राज्य सरकार ने स्टेट पॉवर जनरेशन कंपनी लिमिटेड के डायरेक्टर एवं प्रबंध संचालक केआरसी मूर्ति और पारेषण कंपनी की प्रबंध निदेशक तृप्ति सिन्हा को हटा दिया है. मूर्ति मुख्य रुप से एनटीपीसी के रीजनल एक्जीक्यूटिव डायरेक्ट थे. अभी वे डेढ़ साल तक पॉवर कंपनी में बने रह सकते थे, लेकिन पुख्ता शिकायतों के आधार पर उनकी सेवाएं एनटीपीसी को लौटा दी गई है. तृप्ति सिन्हा वैसे इस 30 नवम्बर को सेवानिवृत हो गई थीं, लेकिन भाजपा के शासनकाल में उन्हें पारेषण कंपनी का प्रबंध निदेशक बना दिया गया था. वे 31 मई 2020 तक इस पद पर काबिज रह सकती थी. इधर सरकार ने बुधवार को उन्हें भी विदाई दे दी है. मूर्ति की जगह सेवानिवृत चीफ इंजीनियर राजेश वर्मा को डायरेक्टर व एमडी बनाया गया है जबकि तृप्ति सिन्हा के स्थान पर अशोक कुमार को नई जिम्मेदारी दी गई है.

बिजली कंपनी में फिलहाल खुद को देश के सबसे बड़े नौकरशाह और सुपर सीएम के रुप में प्रचारित करने वाले अफसर से जुड़े हुए लोगों की विदाई का सिलसिला चल रहा है. बिजली कंपनी कंपनी में इसे स्वच्छता अभियान के तौर पर देखा जा रहा है. कुछ माह पहले सरकार ने 19 साल तक मंत्रालय में जमे रहे एमएस रत्नम को ससम्मान घर भेज दिया था. हालांकि वे सेवानिवृत हो गए थे, मगर  संविदा में नियुक्ति पाने के लिए जोड़तोड़ कर रहे थे. मूर्ति और तृप्ति सिन्हा को एमएम रत्नम का खास समझा जाता था. मूर्ति पर बिजली उत्पादन कंपनी में उत्पादन को प्रभावित करने के साथ-साथ अन्य कई तरह के गंभीर आरोप थे. तृप्ति सिन्हा के कामकाज को लेकर भी कई तरह की शिकायतें थीं. छत्तीसगढ़ राज्य बिजली कंपनी की अलग-अलग ईकाईयों में निदेशक जीसी मुखर्जी, ओसी कपिला और हेमराज नरवरे भी कार्यरत है. सूत्रों का कहना है कि उक्त सभी अफसरों की भी जल्द ही छुट्टी हो जाएगी. इसके अलावा गैंग में शामिल अन्य अफसरों पर भी गाज गिर सकती है. 

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विधानसभा में ऊंगली को लेकर बवाल

रायपुर. छत्तीसगढ़ की विधानसभा में मंगलवार को विपक्ष के सदस्य अजय चंद्राकर ने जमकर हंगामा मचाया. दरअसल विधायक वृहस्पति सिंह ने उन्हें ऊंगली दिखाते हुए जवाब दे दिया था. चंद्राकर ने कहा कि वे सम्मानित सदस्य है लेकिन कांग्रेस के सदस्य उन्हें ऊंगली दिखा रहे हैं. चंद्राकर के साथ विपक्ष के अन्य सदस्य भी अपनी जगह से उठकर खड़े हो गए और ऊंगली दिखाए जाने को लेकर हंगामा करने लगे. हंगामे के बीच ही कांग्रेस विधायक अरुण वोरा ने खड़े होकर आपत्ति जताई तो विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत ने उन्हें इस बात के लिए धन्यवाद दिया कि उन्होंने एक के बजाय चार ऊंगली दिखाई है. विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि अब कोई भी सदस्य ऊंगली दिखाकर चर्चा नहीं करेगा. विधायक वृहस्पति सिंह ने कहा कि चंद्राकर बार-बार व्यवधान उत्पन्न करते हैं यह ठीक नहीं है. जनता कांग्रेस के विधायक धर्मजीत सिंह ने वृहस्पति सिंह को मानव बम बताया. उन्होंने बताया कि सरकार ने विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए मानव बम पैदा कर दिया है.
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सीएम बघेल ने सेक्सोफोन बजाने वालों के साथ ली सेल्फी तो तालियों से गूंज उठा राज्योत्सव का मैदान

रायपुर. कल 3 नवंबर की शाम सेक्सोफोनिस्ट विजेंद्र धवनकर पिंटू, लिलेश, सुनील और उनके साथियों के साथ- साथ संगीत प्रेमियों के लिए भी  एक यादगार शाम थीं. रायपुर के वृंदावन हॉल और भिलाई के प्रतिष्ठित कलामंदिर में अपनी धमाकेदार प्रस्तुति से लोगों के दिलों में खास छाप छोड़ने वाले सेक्सोफोनिस्टों ने जब राज्योत्सव के विशाल मंच में बेशुमार दर्शकों के बीच सेक्सोफोन बजाया तो हर कोई झूम उठा. एक पुरानी छत्तीसगढ़ी फिल्म घर-द्वार के प्रसिद्ध गीत- सुन-सुन मोर मया पीरा... की धुन को बजाते हुए कलाकार जब समारोह के प्रमुख मंच तक पहुंचे तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल खुद को सेल्फी लेने से नहीं रोक पाए. उन्होंने तीन बार अलग-अलग अंदाज से कलाकारों के साथ सेल्फी ली. मुख्यमंत्री का यह अंदाज सबको खूब पंसद आया क्योंकि इसके पहले छत्तीसगढ़ के लोगों ने यहां के मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह को केवल करीना कपूर, सलमान खान और मुंबई के नामचीन कलाकारों के साथ ही सेल्फी लेते हुए देखा था. मुख्यमंत्री द्वारा ली गई सेल्फी की एक खास बात यह भी थीं कि मंच पर विधानसभा अध्यक्ष चरणदास मंहत, सांसद ज्योत्सना महंत, स्वास्थ्य एवं पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव, गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू, वन मंत्री मोहम्मद अकबर, संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत, नगरीय प्रशासन मंत्री शिव डहरिया, शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह, लोक स्वास्थ्य मंत्री रूद्र गुरू, महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अनिला भेड़िया, मुख्य सचिव आरपी मंडल, प्रधान मुख्य वन संरक्षक राकेश चतुर्वेदी, संस्कृति विभाग के सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी, संचालक अनिल साहू सहित विधायक और वरिष्ठ अफसर मौजूद थे.

राज्योत्सव में कलाकारों ने फिल्म शोले के टाइटल म्यूजिक से जो माहौल बनाया वह अंत तक बरकरार रहा. कलाकारों ने एक से बढ़कर एक धुनें सुनाई. डाक्टर नरेंद्र देव वर्मा लिखित गीत अरपा पैरी के धार की सबसे पहली प्रस्तुति वे भिलाई में दे चुके थे, लेकिन यहां राज्योत्सव में भी जब सेक्सोफोन पर यह गीत गूंजा तो हर कोई यह कहने को मजबूर हो गया कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी में जन्में कलाकार अंग्रेजी बाजे में भी अपनी माटी के प्रति सम्मान प्रकट करने का हुनर जानते हैं. कलाकारों ने छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध गढ़बा बाजा को भी सेक्सोफोन पर बजाकर दर्शकों को नाचने के लिए मजबूर कर दिया. सेक्सोफोन बजाने वाले कलाकार जल्द ही अपनी प्रस्तुति अंबिकापुर, राजनांदगांव, रायगढ़, कोरबा, बिलासपुर जैसे बड़े शहरों में भी देंगे.

 

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बस्तर की बेशकीमती सागौन की लकड़ी को लेकर पत्रकार और वन अफसर आमने-सामने

रायपुर. बस्तर के किसी पत्रकार ( दो-चार को छोड़कर ) से पूछो कि क्या वह रायपुर या देश के किसी बड़े मीडिया संस्थान में काम करने का इच्छुक है तो कहेगा- क्यों नहीं...? मगर बस्तर से बाहर नहीं जाऊंगा. बस्तर में रहकर ही अपनी सेवाएं दूंगा. इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो नहीं मालूम, लेकिन कहते हैं कि जो पत्रकार एक बार बस्तर जाकर बस गया...वह फिर दोबारा कहीं और काम नहीं करना चाहता. अब यह बस्तर की माटी का खिंचाव है या कुछ और...शोध का विषय है. कमोबेश यही स्थिति नौकरशाहों की भी है. बस्तर को माओवाद प्रभावित और काला पानी-काला पानी कहकर प्रचारित करने वाले अफसर अव्वल तो बस्तर जाना नहीं चाहते, लेकिन जब चले जाते हैं तो फिर लौटना नहीं चाहते. उन्हें भी बस्तर की माटी से प्रेम हो जाता है या फिर आय के साधनों में बढ़ोतरी हो जाती है...इस पर भी जांच करने की आवश्यकता है.

पता नहीं इस खबर में ऊपर लिखे गए इंट्रो का क्या महत्व है, मगर कभी-कभी ऐसा लगता है बस्तर के संसाधनों पर कौन-कौन नजरें गड़ाए बैठा है इस पर तथ्यपरक ढंग से अन्वेषण होना चाहिए. बहरहाल यह खबर एक पत्रकार और एक वन अफसर की भिंडत से संबंधित है. बस्तर के पत्रकार नरेश कुशवाह ने जगदलपुर में पदस्थ वन अफसर आरके  जांगड़े पर गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री, वनमंत्री, मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को शिकायत भेजी है. पत्रकार का आरोप है कि जांगड़े ने धमतरी के ठेकेदार गिरधारी लाल के साथ मिलकर सागौन लकड़ी की नीलामी में अफरा-तफरी की है. पत्रकार ने अपनी शिकायत में कहा है कि 2 जून 2018 को सागौन की लकड़ियों की नीलामी हुई थीं. ठेकेदार ने सार्वजनिक तौर पर दस लाख छह सौ रुपए की बोली लगाई थीं, लेकिन बीडशीट में सात लाख छह सौ रुपए दर्शाकर ठेकेदार को लाभ दे दिया गया. पत्रकार कुशवाह का कहना है कि नीलामी के दौरान वनोपज व्यापार के तहत शासकीय मुद्रणालय से मुद्रित और वन विभाग से सत्यापित बीडशीट का उपयोग ही किया जा सकता है, लेकिन वनमंडलाधिकारी जांगड़े ने कम्प्युटर से बीडशीट निकाली और उसका उपयोग किया. इस तरह की बीडशीट कभी भी बदली जा सकती है. कुशवाह का यह भी आरोप है कि किसी भी नीलामी के दौरान अंतिम बोली लगाने वाले को सात दिनों के भीतर बोली गई राशि का 25 फीसदी जमा करना होता है. यदि बोलीदार यह राशि जमा नहीं करता है तो बोली निरस्त कर दी जाती है, लेकिन जांगड़े ने ऐसा नहीं किया और राशि जमा करने से पहले ही 30 जून 2018 को लकड़ी उठाने की स्वीकृति प्रदान कर दी. जब रायपुर टिंबर मर्चेंट एसोसिएशन ने इस बारे में प्रधान मुख्य वन संरक्षक को शिकायत भेजी तब मामले की लीपापोती चालू की गई. पत्रकार ने दावा किया कि ठेकेदार से बैक डेट पर चेक भी लिया गया, लेकिन बैंक में चालान जमा करने की तारीख कुछ और है.

इधर वनमंडलाधिकारी जांगड़े का कहना है कि कुशवाह को पत्रकारिता का काम करना चाहिए था, लेकिन वे किसी भारत टिंबर के जरिए खुद ही लकड़ी की खरीददारी के खेल में लगे थे. यह सही है कि लिपिक की त्रुटि के चलते कागजों में राशि गलत अंकित हो गई थीं, लेकिन जैसे ही यह जानकारी मिली उसे सुधार लिया गया. ठेकेदार को किसी भी तरह का कोई लाभ नहीं दिया गया है. ठेकेदार ने नीलामी में जो बोली लगाई थी उसी आधार पर पैसा लिया गया है. जांगड़े ने अपना मोर्चा डॉट कॉम को बताया कि कुशवाह ने इस मामले की शिकायत कई जगह कर रखी है. हर तरफ से जांच हो रही है मगर किसी को कुछ भी नहीं मिल रहा है क्योंकि वे गलत नहीं है.

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तबादले के बाद भी गंभीर आरोपों से घिरे हुए हैं वन अफसर पंकज राजपूत

रायपुर. जो लोग जंगल महकमे से जुड़े हुए हैं वे लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि उनका महकमे का कामकाज कितना बेहतर है और कितना खौफनाक ? यहां कोई थोड़ी सी भी उंटपटांग हरकत करता है तो मंत्रालय के गलियारों में रिकार्ड प्लेयर चालू हो जाता है-जंगल-जंगल बात चली है... पता चला है. अभी कुछ दिनों पहले भोपाल में जो हनी ट्रैप कांड हुआ था उसमें छत्तीसगढ़ के वन विभाग से जुड़े दो अफसरों का नाम प्रमुखता से उभरा, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक उठापटक के चलते मामला सुलट गया और वे बच गए. बहरहाल इन दिनों पंकज राजपूत नाम के एक वन अफसर की चर्चा जोरों पर है. बताते हैं यह अफसर कभी पूर्व मुख्यमंत्री के सबसे करीबी था और लंबे समय तक राजनांदगांव में ही पदस्थ था.

एक शिकायतकर्ता नरेंद्र ने फिजूलखर्ची और महिलाकर्मियों के साथ व्यवहार को लेकर पंकज के खिलाफ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को शिकायत भेजी है. अपनी शिकायत में नरेंद्र ने कहा है कि पकंज राजपूत के पहले राजनांदगांव में बतौर डीएफओ शाहिद साहब पदस्थ थे. शाहिद साहब ने पदस्थ होते ही सबसे पहले अपने बंगले का रंग-रोगन करवाया, एसी और टाइल्स बदलवाया, लेकिन शाहिद साहब के स्थानांतरण होते ही पंकज राजपूत ने भी यही काम किया और एक तरह से सरकारी खजाने का दुरूपयोग किया. फिजूलखर्ची में वे इतने ज्यादा एक्सपर्ट थे कि जिस व्हालीबाल ग्राउंड पर डीएफओ अरुण प्रसाद ने लाखों रुपए फूंके थे उसी व्हालीबाल ग्राउंड पर दोबारा पैसा फूंका गया. इतना ही नहीं कमीशन के खेल में अंग्रेजी में छपी एक किताब सभी रेंजर और लिपिकों को भेजी गई और उनसे कहा गया कि इसका भुगतान करना है. अब न तो बाबू ढंग से अंग्रेजी जानते हैं और न हीं रेंजर... लेकिन साहब ने कहा है कि भुगतान करना है तो भुगतान कर रहे हैं. शिकायतकर्ता का कहना है कि वनमंडल के पुराने फर्नीचर की मरम्मत और पालिश के नाम पर भी लाखों रुपए बरबाद किए गए हैं. डिवीजन के रिकार्ड से लैपटाप, कम्पयूटर, टीवी, एसी गायब है.

महिला कर्मचारी को अटैक

पकंज राजपूत जब तक पदस्थ थे तब तक महिला कर्मचारियों से उनका व्यवहार दोयम दर्जे का था. एक महिला जिसे वे रोज अपमानित करते थे उसे हार्ट अटैक भी आया और उसके इलाज में लाखों रुपए खर्च हुए. वे अपने अधीनस्थ लिपिकों से भी देर रात घर में काम लेते रहे जिसके चलते एक बाबू भी अटैक का शिकार हुआ. इन दिनों वह बाबू लंबी छुट्टी पर है. शिकायतकर्ता का  कहना है कि पंकज राजपूत अपने चहेतों को नियुक्ति देने में भी आगे रहते थे. उन्होंने मोहम्मद अय्यूब शेख नाम के एक वनपाल को सीधे जिला यूनियन में डिप्टी रेंजर बना दिया जबकि अय्यूब ने कभी भी तेंदूपत्ते का काम ही नहीं देखा. इन दिनों अय्यूब दक्षिण मानपुर का प्रभार संभाल रहा है. वनपाल के प्रशिक्षण से वापस आए कर्मचारी शीतल, भुवन चंद्रवंशी, कृष्णालाल, नमिता, कुशल लटियार, संतोष कुसरे को बगैर किसी पदस्थापना के वेतन दिया गया और फिर बाद में इनका स्थानांतरण दूर-दराज कर दिया गया. शिकायत में भंडार क्रय नियमों के उल्लंघन से संबंधित अनेक बिंदु शामिल किए गए गए हैं. कहा गया है कि पंकज जब तक पदस्थ थे तब तक एक ही ठेकेदार से स्टेशनरी खरीदी जाती रही.

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एंटी करप्शन ब्यूरो में पदस्थ दो बड़े अफसरों को दूसरे अफसर ने लपेटा

रायपुर. एंटी करप्शन ब्यूरो में पदस्थ दो बड़े अफसरों की कार्यप्रणाली को लेकर हर रोज नई-नई बातें सामने आ रही है. कुछ समय पहले एंटी करप्शन ब्यूरो में पदस्थ उप पुलिस अधीक्षक स्तर के एक अधिकारी अजितेश कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी को एक शिकायत भेजकर गंभीर आरोप लगाए हैं.

अधिकारी अजितेश कुमार का कहना है कि दिनांक 28 जून 2019 को बिलासपुर के सहायक आबकारी आयुक्त दिनेश दुबे के मामले में खात्मा प्रकरण न्यायालय के समक्ष पेश किया गया था. जब मामले का खात्मा हो गया तब उनके द्वारा एसीबी के जिस अफसर को वाट्सअप काल पर सूचना दी उसने पहले तो फोन नहीं उठाया, लेकिन बाद में जब फोन उठाया तो गंदी-गंदी गालियों से नवाजा और सीधे वरिष्ठ अफसर को फोन थमा दिया. वरिष्ठ अफसर ने भी अपशब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि तुमने इस मामले में जानकारी छिपाकर अच्छा नहीं किया. अब तुम्हें बरबाद होने से कोई नहीं बचा सकता. तुम्हारा निलंबन तो होकर रहेगा.

फंसा सकते हैं झूठे मामले में

अफसर ने अपनी शिकायत में अपने जान-ओ-माल की सुरक्षा की गुहार लगाई है. अफसर का आरोप है कि दोनों अफसर सीधे-सादे लोगों को झूठे मामलों में फंसाने की कला में माहिर है.अफसर ने खुद को मानसिक तौर पर प्रताड़ित बताते हुए कहा कि जब से दोनों अफसरों ने उसे धमकाया है तब से वह खुदकुशी करने के बारे में सोच रहा है. अगर कल को उसके द्वारा कोई अप्रिय कदम उठा लिया जाता है तो इसके लिए उसे प्रताड़ित करने वाले अफसर जिम्मेदार होंगे. ( अफसर ने जिन्हें जिम्मेदार बताया है उनका नाम भी लिखा है.)

दूसरी शिकायत और भी गंभीर

इधर एंटी करप्शन ब्यूरो में पदस्थ अफसर की दूसरे अफसर की और भी गंभीर शिकायत मंत्रालय के गलियारों में घूम रही है. यह शिकायत राजेश कुमार बानी नाम के किसी सिविल इंजीनियर ने लिखी है जो वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तब भेजी गई थी जब आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता थे. शिकायत में कहा गया है कि अफसर जब धमतरी में पदस्थ था तब वह साहू नाम के एक करीबी पुलिसकर्मी के जरिए हर थाने से मोटी रकम की वसूली करता था. पैसों की वसूली के लिए चालान को रोककर रखा जाता था.

क्लासमेंट को बचाया

शिकायतकर्ता का कहना है कि रायगढ़ जिले घरघोड़ा में सीईओ के पद पर अरूण कुमार शर्मा पदस्थ थे, लेकिन तमाम तरह की छापामार कार्रवाई के बाद उन्हें इसलिए बख्श दिया गया क्योंकि वे पुलिस अफसर के क्लासमेंट थे. इसके अलावा आलोक पांडे, कृष्ण कुमार पाठक, कौशल यादव, श्यामचंद पटेल, राममोहन दुबे को भी जेल जाने से बचा लिया गया. शिकायतकर्ता का कहना है कि अगर सरकार यह जांच करें कि अफसर के नेतृत्व में कब-कब छापामार कार्रवाई की गई है और कितने लोगों का चालान पेश किया गया... कितने बरी हो गए... तो भी सच्चाई सामने आ जाएगी. शिकायत में अफसर के मकान-दुकान समेत अन्य घोषित-अघोषित संपत्तियों का ब्यौरा भी दिया गया है.

 

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कोरबा जिले से नफरत फैलाने वालों को करारा जवाब...अहिंसा के पुजारी को याद करते हुए बच्चों ने लिखा मुख्यमंत्री को खत

रायपुर. ऐसे समय जबकि पूरे देश में धर्म- संप्रदाय और नफरत के जरिए लोगों को बांटने-छांटने और काटने की कवायद चल रही है तब छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले की कलक्टर किरण कौशल और वहां के जिला शिक्षाधिकारी सतीश पांडे ने अपने तरीके का एक अनोखा प्रयास किया है. उनका यह प्रयास बताता है कि अभी अंधेरे से युद्ध किया जा सकता है. नफरत का जवाब शांति और प्रेम से दिया जा सकता है. बताना लाजिमी होगा कि इसी महीने 20 सितंबर को जिले में बड़ी शिद्दत के साथ स्कूल के बच्चों ने अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के कामकाज को याद करते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम पाती लिखी है. बच्चे भी एक-दो नहीं... पूरे डेढ़ से दो लाख. भले ही यह काम सरकारी स्तर पर व्यवस्थित तौर-तरीकों से संभव हो सका, लेकिन देश में खौफनाक माहौल  पैदा करने वालों के खिलाफ यह एक जरूरी कदम था.

जाहिर है कि जब बच्चों ने पत्र लिखना तय किया होगा तब उन्हें महात्मा गांधी की जीवन यात्रा से भी गुजरना पड़ा होगा. बचपन में हम सबने भी महात्मा गांधी को एक निबंध के तौर पर याद किया है, लेकिन महात्मा गांधी के विचारों को आधार बनाकर पत्र लिखने का काम संभवतः देश का पहला प्रयास था. इस प्रयास की सार्थकता इसलिए भी है क्योंकि देश को बांटने वाली शक्तियां वाट्सअप विश्वविद्यालय और झूठे प्रचार के गंदे माध्यमों के जरिए सबसे पहले बच्चों के दिमाग पर ही हमला कर रही है. पूरी ताकत केवल इस बात के लिए ही झोंकी जा रही है कि बच्चे तो बच्चे... हर कोई गांधी जी और उनके कामकाज से किनारा कर लें. कलक्टर किरण कौशल और जिला शिक्षा अधिकारी सतीश पांडेय यह कोशिश नफरत को प्रेम से जवाब देने वाली कोशिश के रुप में याद की जाएगी.

पत्र होंगे पुरस्कृत

अब से कुछ अरसा पहले अखबारों में संपादक के नाम पत्र का एक खास कॉलम हुआ करता था. लोग अपने रिश्तेदारों के अलावा अखबार के संपादकों को भी पत्र लिखकर अपनी भावनाओं से अवगत कराते थे. संचार के माध्यमों में विकास के साथ चिट्ठी लिखने की परम्परा बंद हो गई. मैसेज के नए तौर-तरीकों ने रिश्तों की खूबसूरती का भी कत्ल कर दिया. कोरबा जिले में अगर बच्चों और चिट्ठी-पाती के जरिए विचारों को प्रकट करने का सिलसिला प्रारंभ हुआ है तो किसी न किसी अन्य आजोयन में भी जारी रहना चाहिए. बताते हैं कि जिले के 25 सौ स्कूलों के बच्चों ने महात्मा गांधी के विचारों को पढ़कर मुख्यमंत्री के नाम जो खत लिखा है उसे 23 सितंबर को खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय में जमा करवाया जाएगा. फिर इन पत्रों की छंटनी होगी और प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर दस-दस श्रेष्ठ पत्रों का चयन कर बच्चों को पुरस्कृत भी किया जाएगा. वैसे यह एक ऐसा काम है जिसमें मुख्यमंत्री स्वयं पत्र लिखने वाले बच्चों के बीच मौजूद रहकर उन्हें पुरस्कृत कर सकते हैं. बहराल जिले में हुए इस अनोखे प्रयास की गूंज हर तरफ हो रही है. 

 

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रमन सिंह को अब तक भाजपा ने क्यों नहीं दिखाया बाहर का रास्ता?

रायपुर. पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और डाक्टर रमन सिंह पर लगे गंभीर आरोपों के बाद भाजपा ने अपने कर्मठ कार्यकर्ता मंतूराम पवार को पार्टी से बाहर निकाल दिया है, लेकिन मंतूराम का यह कहना कि मुझे तो निकाल बाहर फेंका...और रमन सिंह को छोड़ दिया...कई तरह के सवाल खड़े करता है.

पाठकों को याद होगा कि वर्ष 2003 में जब अजीत जोगी विधायक खरीद-फरोख्त कांड में फंसे थे तब अरूण जेटली की प्रेस कान्फ्रेंस क बाद कांग्रेस ने जोगी को छह साल के लिए निष्कासित कर दिया था. भाजपा में स्थिति थोड़ी अलग है. डाक्टर रमन सिंह के दामाद डीकेएस घोटाले में फंसे हुए हैं तो पत्नी पर नान घोटाले का छींटा है. पुत्र अभिषेक सिंह पर अरबों-खरबों का धन लेकर फरार हो जाने वाली चिटफंड कंपनियों को प्रश्रय देने का आरोप है तो खुद रमन सिंह पर अंतागढ़ टेपकांड और नान घोटाले में संलिप्त होने का आरोप है. कभी उन्हें मिस्टर क्लीन कहा जाता था, लेकिन अब स्थिति दूसरी है. उनके संरक्षण में पल रहे करीबी अफसर मुकेश गुप्ता जेल जाने से बचने के लिए भागते फिर रहे हैं तो संविदा में पदस्थ रहे सुपर सीएम और उनकी पत्नी भी जांच दायरे से गुजर रहे हैं. कुल मिलाकर पूरा कुनबा गंभीर किस्म के आरोपों से घिरा हुआ है. इतने सारे आरोपों के बाद भी अगर रमन सिंह अगर पार्टी में बने हुए हैं तो जरूर कोई बात होगी. बताया जाता है कि रमन को केंद्र के कतिपय नेताओं का संरक्षण मिला हुआ है. केंद्र के नेता ही उनकी रक्षा में लगे हुए हैं. इधर भाजपा में छत्तीसगढ़ के कुछ बड़े नेता जो अब रमन सिंह का राजनीति से सफाया चाहते हैं वे भी कुछ बोल नहीं पा रहे हैं. नान के एक आरोपी शिवशंकर भट्ट और अंतागढ़ टेपकांड में फंसे मंतूराम पवार के खुलकर सामने आ जाने के बाद फिलहाल भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गई है. पार्टी के लोगों का कहना है कि सामने दंतेवाड़ा का चुनाव है इसलिए कांग्रेस नए-नए शिगूफे छोड़ रही है.

अमन सिंह का भी नाम

अंतागढ़ उपचुनाव में अपना नाम वापस लेकर सुर्खियों में आए मंतूराम पवार ने अब रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता, करीबी ओपी गुप्ता, संजय अग्रवाल और अमन सिंह के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है. छत्तीसगढ़ में भाजपा के बुरे हश्र के लिए जिम्मेदार अमन सिंह इन दिनों दिल्ली में हैं और एक बिजली कंपनी में कार्यरत है. बताते हैं कि यह कंपनी भी कभी छत्तीसगढ़ में बिजली घर स्थापित करना चाहती थी, लेकिन मामला नहीं जम पाया. इधर पहली किसी एफआईआर में अमन सिंह का नाम जुड़ जाने से भाजपा के एक बड़े वर्ग में खुशी की लहर है. भाजपा में शुचिता और नैतिकता को मानने वाले नेताओं के एक खेमे को यह खुशी तब भी हुई थीं जब भूपेश सरकार ने विवादित पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता पर मामला दर्ज किया था.

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अजीत और अमित जोगी की जमानत याचिका खारिज

रायपुर. अंतागढ़ टेप कांड मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और उनके पुत्र अमित जोगी की जमानत याचिका खारिज हो गई है. अंतागढ़ टेप मामले में फंसने बाद प्रथम श्रेणी न्यायाधीश विवेक शर्मा की अदालत मेंं यह याचिका लगाई गई थीं जो अस्वीकार कर दी गई.
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मंतूराम पर बोले रामविचार नेताम- बिकाऊ कभी टिकाऊ नहीं होता

रायपुर. भाजपा के वरिष्ठ नेता रामविचार नेताम के ताजा बयान से हलचल मच गई है. नेताम ने मंतूराम पवार के भाजपा में प्रवेश और फिर उन्हें बाहर किए जाने को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है. नेताम का कहना है कि जो बिकाऊ था वह टिकाऊ कैसे हो सकता है? एक बातचीत में नेताम ने कहा कि जिस गाजेबाजे और लड़ी-पटाखे के साथ मंतूराम का भाजपा प्रवेश हुआ था वह भाजपा के कई बड़े नेताओं के गले से नहीं उतर रहा था. ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय स्तर के किसी बड़े नेता की इंट्री हो गई है. जिस गर्मजोशी के साथ मंतूराम का कार्यसमिति में स्वागत किया गया वह समझ से परे है. प्रवेश के दौरान स्थानीय नेतृत्व को भी भरोसे में नहीं लिया गया. पार्टी के स्थानीय जिम्मेदारों ने अपनों से ज्यादा गैरों पर भरोसा जताया जो दुःखद है. गैरों पर भरोसे के चलते ही आज हमारा बुरा हाल हुआ है.
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शिवशंकर भट्ट का खुलासाः चुनावी चंदे के लिए भाजपा कार्यालय पहुंचा पांच करोड़ तो... रमन सिंह के घर तीन करोड़

रायपुर. नान घोटाले के एक आरोपी शिवशंकर भट्ट ने नीरज श्रीवास्तव की अदालत में शपथपूर्वक दिए गए एक बयान में जो बातें कहीं है वह न केवल सनसनीखेज है बल्कि हैरत में डालने वाली है. उनके बयान के बाद ऐसा लगता है कि पूर्व सरकार में बैठे लोग किस बुरी तरह से छत्तीसगढ़ को लूट रहे थे. भट्ट ने न्यायालय में दावा किया कि मुख्यमंत्री रमन सिंह और पून्नूलाल मोहिले, ने नान के अध्यक्ष लीलाराम भोजवानी को वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा कार्यालय के लेखा शाखा के कर्मचारी श्री जैन के पास पांच करोड़ रुपए जमा करने को कहा था. इस चंदे के लिए चना, दाल के सप्लायर्स के अलावा राइस मिलरों को मजबूर किया गया था. भट्ट ने बताया कि वह कुछ सप्लायर्स के साथ खुद चंदा देने भाजपा कार्यालय गया था. जब वह पैसे को लेकर वहां पहुंचा तब वह धरमलाल कौशिक ( भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष ), सच्चिदानंद उपासने सहित कई बड़े पदाधिकारी उपस्थित थे. मेरे सामने उन लोगों को यह पैसा दिया गया. इसी तरह अक्टूबर 2013 में भी लीलाराम भोजवानी के साथ पून्नूलाल मोहिले के निवास पर एक करोड़ रुपए का चंदा देने गया था. जबकि वर्ष 2013 में अफसर कौशलेंद्र सिंह के साथ तीन करोड़ रुपए लेकर मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के घर गया था. जब पैसा दिया जा रहा था तब मुख्यमंत्री की पत्नी वीणा सिंह वहां मौजूद थीं. कौशलेंद्र सिंह ने मेरी आंखों के सामने तीन करोड़ रुपए दिए थे.

कौशलेंद्र ने दिए थे रेणु सिंह को पैसे

शिवशंकर भट्ट ने अपने बयान में पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह, पूर्व खाद्य मंत्री पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता के साथ-साथ वन अफसर रहे कौशलेंद्र सिंह को नान घोटाले का प्रमुख आरोपी बताया है. अपने बयान में शिवशंकर भट्ट ने कई मर्तबा कौशलेंद्र सिंह का नाम लिया है. भट्ट ने न्यायालय में बताया कि फरवरी 2014 में कौशलेंद्र सिंह मुझे एश्वर्या रेंसीडेंसी में रहने वाली रेणु सिंह के निवास पर ले गए थे. वहां उन्होंने मेरे सामने पांच लाख रुपए रेणु सिंह को दिए. यह पैसे किस मद से दिए गए मुझे इसकी जानकारी नहीं थी और मैं जानना भी नहीं चाहता था. भट्ट ने शपथपत्र में कहा कि 12 फरवरी 2015 को ईओडब्लू ने छापा मारकर एक करोड़ 62 लाख रुपए की फर्जी ढंग से जप्ती बनाई थी. मेरे हाथों से कोई रकम प्राप्त नहीं हुई थी. मेरे पास कोई ऐसी शक्ति नहीं थीं कि मैं इतनी बड़ी रकम कार्यालय में रखता. भट्ट ने कहा कि कौशलेंद्र सिंह और नागरिक आपूर्ति निगम में कार्यरत गिरीश शर्मा, चिंतामणि चंद्राकर आपस में मिलकर लेन-देन और बंदरबांट करते थे. उनके पैसों को मेरे नाम डालकर फर्जी जप्ती बनाई गई थीं. भट्ट ने न्यायालय के समक्ष बताया कि कौशलेंद्र सिंह पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के काफी निकट थे. उनके पारिवारिक रिश्ते थे. नान का पूरा संचालन कौशलेंद्र सिंह, डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी और राधाकृष्ण गुप्ता एक गैंग बनाकर करते थे.

गाली-गलौच करते थे कौशलेंद्र

भट्ट ने कहा कि नागरिक आपूर्ति निगम में किसी भी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह विरोध अथवा आपत्ति दर्ज करें. अगर कोई कौशलेंद्र सिंह के काम पर आपत्ति दर्ज करता तो वे सीधे डाक्टर रमन सिंह और चारों व्यक्तियों का नाम लेकर गाली-गलौच करते थे. कौशलेंद्र सिंह, चिंतामणि और गिरीश शर्मा सभी सप्लायर्स और राइस मिलरों से लगातार लेन-देन करते थे. यह सब देखकर ऐसा प्रतीत ही नहीं होता था कि कोई शासकीय कार्यालय चल रहा है.कौशलेंद्र सिंह मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के प्रियपात्र थे इसलिए वर्ष 2011 और 2014 के बीच उनका केवल दो बार ही तबादला हुआ. वे हर बार मुख्यमंत्री को बोलकर अपना तबादला रूकवा लेते थे. कृतिकांत बारिक के कम्प्यूटर से बरामद पन्ने कौशलेंद्र सिंह के निर्देश पर गिरीश शर्मा ने ही लिखवाए है.

हत्या पर उठाए सवाल

भट्ट ने नागरिक आपूर्ति निगम के एक कर्मचारी त्रिनाथ रेड्डी की वाइफ की हत्या पर भी सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि इस हत्या को आत्महत्या बताने का प्रयास किया गया था. इस हत्या के जरिए यह मैसेज देने की कोशिश की गई थी कि जो कोई भी मुंह खोलेगा उसके साथ अनहोनी हो सकती है. यह हत्या किसने करवाई  इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिए.

शिवशंकर भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ के धान उपार्जन के लिए लगभग 550 करोड़ और फिर 500 करोड़ की अग्रिम सब्सिडी जारी की गई थी. हैरत की बात यह है कि वर्ष 2003-04 से लेकर वर्ष 2014-15 तक लगभग दस हजार करोड़ रुपए की अग्रिम सब्सिडी स्वीकृत की गई. यह सब्सिडी बगैर किसी वैधानिक ऑडिट के केवल प्रस्तुत किए गए बिल के आधार पर की गई थीं. जो भी अधिकारी इसके खिलाफ मुंह खोलता उसे परिणाम भुगतना पड़ता. इस खेल में विपणन संघ के तत्कालीन अध्यक्ष राधाकृष्ण गुप्ता खास पर शामिल थे. डाक्टर रमन सिंह, पून्नूलाल मोहिले, लीलाराम भोजवानी, राधाकृष्ण गुप्ता ने आपस में सांठगांठ कर हाईप्रोफाइल रैकेट तैयार कर लिया था. इस रैकेट ने शासन को करोड़ों रुपए की क्षति पहुंचाई.

लगभग 21 लाख फर्जी राशनकार्ड

भट्ट ने कहा कि वर्ष 2014 के अगस्त माह में नागरिक आपूर्ति निगम के पास 9 लाख मैट्रिक टन चावल का स्टाक था. इसके बावजूद मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह जो वित्त मंत्री भी थे ने विभाग के अधिकारियों पर दबाव देकर 10 लाख टन मीट्रिक टन चावल का अतिरिक्त उपार्जन करने का आदेश दिया था. इतना ही नहीं अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए 236 करोड़ की क्षतिपूर्ति की गारंटी बिना कैबिनेट की अनुमोदन के पास कर दिया था. जबकि शासन के हित में ऐसा नहीं किया जाना था. इस मामले में विभाग के अधिकारियों ने आपत्ति जताई तो उन्होंने अधिकारियों से कहा कि आपत्ति की आवश्यकता नहीं है. इस संदर्भ में हमें और पार्टी को लंबी-चौड़ी रकम मिलनी है और अगर आप लोग चाहे तो यह रकम आपको भी प्रदान की जाएगी. भट्ट ने कहा कि वर्ष 2013-2014 में 21 लाख फर्जी राशनकार्ड बनवाए गए थे. इस काम को खाद्य विभाग का कोई भी अधिकारी स्वेच्छा से करना नहीं चाहता था, लेकिन डाक्टर रमन सिंह, लीलाराम भोजवानी और पून्नूलाल मोहिले ने अधिकारियों को डराया-धमकाया और परिणाम भुगतने को तैयार रहने को कहा.

इधर शिवशंकर भट्ट के द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि हाईकोर्ट से जमानत पर चल रहे शिवशंकर भट्ट से बयान दिलाकर भाजपा की छवि खराब करने की कोशिश की गई है. कांग्रेस नान घोटाले के आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है. अपराधियों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की कोशिश की जा रही है. पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कभी सीएम हाउस में न तो पैसों को लेकर किसी के जाने जैसी कोई बात हुई है और न ही ऐसा करना संभव है. वहां आने-जाने वाले हर व्यक्ति के संबंध में इंट्री होती है. उन्होंने कहा कि वे इस मामले को लेकर कानूनी सलाह लेकर आगे की कार्रवाई करेंगे. 

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