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जल जीवन मिशन योजना में धांधलीः मुख्यमंत्री का करप्शन पर वॉर

रायपुर. जल जीवन मिशन के ठेके में उपजे विवाद के बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सभी टेंडर निरस्त करके एक जोरदार पहल की है.पानी की आपूर्ति के नाम पर लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में पदस्थ अफसरों द्वारा भारी गड़बड़ी किए जाने की शिकायत कांग्रेस के जिम्मेदार कार्यकर्ताओं के माध्यम से मुख्यमंत्री तक पहुंची थी. मुख्यमंत्री ने पहले तो जांच बिठाई ( जिसकी रिपोर्ट अभी आनी बाकी है ) लेकिन कैबिनेट की बैठक में सभी टेंडर को निरस्त करके साफ-साफ यह संकेत दे दिया है कि छत्तीसगढ़ में गड़बड़ी और धांधली करने वाले अफसरों की खैर नहीं है. अब पूरे खेल में कौन लोग जिम्मेदार है इसका खुलासा तो रिपोर्ट के आने के बाद ही हो पाएगा, लेकिन माना जा रहा है कि लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के ईएनसी एमएल अग्रवाल, मुख्य अभियंता अजय साहू और पीएचई मंत्री के ओएसडी कैलाश मढ़रिया पर गाज गिर सकती है. इसके अलावा टेंडर के खेल में शामिल कुछ बड़े ठेकेदार भी लपेटे में आ सकते हैं.

यह है पूरा मामला

गौरतलब है कि केंद्र की जल जीवन मिशन योजना के लिए राज्य को साढ़े सात हजार करोड़ रुपए की कार्य योजना तैयार कर टेंडर जारी करना था. छत्तीसगढ़ के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने इसके लिए कई तरह के नियम-कानून के साथ टेंडर जारी किया. बताया जाता है कि प्रदेश के बाहर की लगभग 44 कंपनियों को काम दे दिया गया. जिन कंपनियों को ठेका दिया गया अगर वे योग्य होती तो शायद कोई बात नहीं उठती. टेंडर में हिस्सेदारी दर्ज करने वाली अधिकांश कंपनियां पाइप निर्माण करने वाली थी तो कुछ कंपनियां सोने-चांदी के कारोबार से संबंधित थीं. सूत्र कहते हैं कि कुछ ऐसे लोग भी काम हासिल करने में सफल हो गए जो पेट्रोल पंप और होटल के कारोबार से संबंधित थे. प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद मोटे तौर पर यह तय हुआ  था कि छत्तीसगढ़ के लोगों को ही ज्यादे से ज्यादा काम दिया जाएगा, लेकिन इस बड़े काम में ऐसा नहीं हुआ. बताया जाता है कि अफसरों ने सोची-समझी योजना के तहत बड़े टर्न ओवर वालों को बड़े जिले में काम थमा दिया और छोटे टर्न ओवर वाले छोटे जिले तक सीमित कर दिए गए. छत्तीसगढ़ के अधिकांश ठेकेदार बस्तर भेज दिए गए जबकि प्रदेश के बाहर के ठेकेदार जो नलजल योजना के काम से अनभिज्ञ थे वे मैदानी इलाकों का काम हासिल करने में सफल हो गए. खबर यह भी है कि बिना वर्क आर्डर दिए प्रभारी ईएनसी ने करोड़ों रुपए के काम का आवंटन भी कर दिया है. इस पूरे घटनाक्रम में एक कारोबारी और एक ओएसडी का विवादास्पद चैट भी चर्चा में हैं. हालांकि ओएसडी का कहना है कि कुछ लोगों ने उसे फंसाने के लिए साजिश रची है और शिकायत सामने आने के बाद वे सभी जगहों पर अपनी सफाई दे चुके हैं, लेकिन ठेकेदारों का आरोप है कि ओएसडी ने ही भ्रष्टाचार की चेन बनाई थी. नलजल योजना में गड़बड़ी के बाद जिन ठेकेदारों ने पीएचई मंत्री के घर के बाहर प्रदर्शन का रास्ता अख्तियार किया उसके पीछे भी ओएसडी की भूमिका थीं. बताया जाता है कि ओएसडी सी और डी श्रेणी के ठेकेदारों का टेंडर निरस्त किए जाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन मुख्यमंत्री ने पूरे मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए सभी टेंडर को  निरस्त कर दिया. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में जब भी नए टेंडर की प्रक्रिया प्रारंभ होगी उसमें छत्तीसगढ़ में विभिन्न श्रेणियों में पंजीकृत ठेकेदार  लाभान्वित होंगे. इधर छत्तीसगढ़ कांट्रेक्टर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष बीरेश शुक्ला ने मुख्यमंत्री के द्वारा टेडर निरस्त किए जाने के फैसले का स्वागत किया है. उनका कहना है कि पूर्ववर्ती सरकार में सभी श्रेणियों के ठेकेदार कामकाज को लेकर परेशान थे. वर्तमान सरकार के मुखिया से उम्मीद बंधी है कि वे कभी भी छत्तीसगढ़ वासियों का अहित नहीं होने देंगे.

 

 

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पत्रकार के साथ बदसलूकी का मामलाः कांकेर के थाना प्रभारी पर गिरी गाज

रायपुर. कांकेर के पत्रकार कमल शुक्ला पर किए गए हमले पर पत्रकारों की जांच समिति द्वारा रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक को परीक्षण कर कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे. इस परिप्रेक्ष्य में कांकेर के थाना प्रभारी मोरध्वज देशमुख को लाइन हाजिर कर दिया गया है. उन्हें आगामी आदेश तक रक्षित केंद्र कांकेर में पदस्थ किया गया है. उनकी जगह गोण्डाहूर के उपनिरीक्षक राजेश राठौर को कांकेर का थाना प्रभारी नियुक्त किया गया है. जबकि रक्षित केंद्र कांकेर के निरीक्षक जवाहर गायकवाड़ गोण्डाहूर के थाना प्रभारी बनाए गए हैं. पुलिस महानिरीक्षक सुन्दरराज पी ने जांच रिपोर्ट की अनुशंसा प्राप्त हो जाने के बाद निष्पक्ष विवेचना की कार्रवाई के लिए तीन सदस्यों की विशेष अनुसंधान टीम गठित की है. इस कमेटी में जगदलपुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ओपी शर्मा, कांकेर के उप पुलिस उप पुलिस अधीक्षक आकाश मरकाम और उपनिरीक्षक राजेश राठौर शामिल किए गए हैं.

 

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कांकेर में पत्रकार कमल शुक्ला के ऊपर किए गए हमले का असली सच आया सामने

जांच समिति ने सौंपी रिपोर्ट

रायपुर. कांकेर के पत्रकार कमल शुक्ला के ऊपर किए गए हमले का सच सामने आ गया है. मामले की जांच के लिए गठित समिति के सदस्य राजेश जोशी, सुरेश महापात्र, रुपेश गुप्ता, अनिल द्विवेदी और शगुफ्ता शरीन ने शनिवार को अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी. समिति ने हमले की घटना के लिए कई कारणों को जिम्मेदार मानकर कांकेर थाने के समूचे स्टाफ और पुलिस अधीक्षक पर कार्रवाई की अनुशंसा की है. समिति ने माना है कि इस तरह की घटना को रोकने के लिए किसी भी सूरत में पत्रकार सुरक्षा कानून का लागू होना बेहद अनिवार्य है. समिति ने मामले में कई गंभीर धाराओं को जोड़ने की सिफारिश भी की है, लेकिन कई बिन्दुओं में पत्रकार कमल शुक्ला और उनके साथ जुड़े लोगों के आचार-व्यवहार पर भी सवाल उठाए हैं. समिति ने घटना की पृष्ठभूमि, सभी पक्षों की संलिप्तता, भूमिका, पुलिस प्रशासन की भूमिका, पब्लिक डोमन में उपलब्ध आरोपों की पड़ताल जैसे बिन्दुओं पर अपनी जांच केंद्रित रखी थीं. मुख्यमंत्री को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में 16 पेज का मूल प्रतिवेदन और 450 पेज के अन्य दस्तावेज शामिल है.

घटना के पीछे कई कारण सामने आए हैं. एक महत्वपूर्ण कारण पांच हजार रुपए का विज्ञापन भी है. बताया जाता है कि कमल शुक्ला ने विधायक शिशुपाल सोरी का एक विज्ञापन प्रकाशित किया था जिसके भुगतान में विलंब हो गया था. जब सोरी के प्रतिनिधि ने विज्ञापन की राशि भेजी तो कमल शुक्ला ने पैसे लेने से इंकार किया. समिति के सदस्यों ने कई लोगों से मुलाकात के बाद वाट्सअप चैट की स्क्रीन शाट एकत्रित की है. एक जगह कमल शुक्ला लिखते हैं- आज से आदर मत करना भाई. मुझे सब पता है आप लोग क्या कर रहे हो. मैं यहां की राजनीति छोड़कर रायपुर चला गया पर कल से अपना काम कांकेर में शुरू कर दिया हूं. अब कांकेर के विकास में आप लोगों की भूमिका को मेहनत से पूरे देश में पहुंचाने की कोशिश करूंगा. आज आपने जिस तरह से मुझको सहयोग किया ऐसा ही सहयोग सुमित्रा मारकोले ने भी किया था. ऐसा ही सहयोग शंकर  ध्रुवा ने भी किया था.

मारपीट की घटना की पृष्ठभूमि में एक विवाद नजूल की जमीन पर कब्जे को लेकर भी जुड़ा है. समिति ने अपनी रिपोर्ट में इसका भी जिक्र किया है. समिति ने लिखा है- प्रदेश सरकार ने नजूल की जमीन पर कब्जा शुल्क लेकर कब्जेदार को पट्टा देने की बड़ी योजना लागू की है. कांकेर में सड़क चौड़ीकरण और कुछ विकास कामों के लिए कोशिश चल रही है. कई पत्रकारों ने नजूल की भूमि पर कब्जा कर रखा है. प्रशासन ने कुछ को नोटिस भेजा तो विवाद और टकराव बढ़ गया. कांकेर के पत्रकार कमल शुक्ला और सतीश यादव को भी यह नोटिस भेजा गया तो नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष जितेंद्र सिंह ठाकुर को लेकर सतीश यादव ने अपने फेसबुक पर व्यक्तिगत टिप्पणियां लिखी. रिपोर्ट में और भी कई सारे तथ्य ऐसे हैं जो यह बताने के लिए काफी है कि मामला पूरी तरह से एकतरफा नहीं है. यह घटना दुर्भाग्यजनक और शर्मनाक तो है ही, लेकिन मौजूद तथ्य यह बताने के लिए भी काफी है कि पत्रकार और पत्रकारिता क्यों बदनाम है? यह रिपोर्ट पत्रकारिता की आड़ में गोरखधंधा करने वालों का पर्दापाश तो करती है वहीं राजनीति और प्रशासन की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है. समिति ने मीडिया के भीतर विमर्श पर भी जोर दिया है. समिति के सदस्यों का कहना है कि एक पत्रकार के रुप में लक्ष्मण रेखा कहां तक होनी चाहिए यह मीडिया को सोचना है. उसका अपना दायरा क्या है. कांकेर में जो कुछ घटित हुआ उसमें कमल शुक्ला और सतीश यादव ने पत्रकारिता से बेपटरी होकर अपनी निजी नाराजगी को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रस्तुत किया जिसके चलते दोनों के साथ गंभीर घटना घटित हुई. पूरे घटनाक्रम में अहं का टकराव साफ-साफ दिखाई देता है. यह स्थिति संवादहीनता से पैदा होती है. समिति ने माना है कि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृति नहीं होनी चाहिए. ऐसी किसी भी घटना को रोका जाना चाहिए. इधर समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक को जांच रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.

 

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दागी अफसर को बना दिया प्रमुख अभियंता

रायपुर. पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के मंत्री टीएस सिंहदेव की छवि बेहद साफ-सुथरी है,लेकिन उनके विभाग के अफसर ही उनकी छवि को बट्टा लगाने के खेल में लगे हुए हैं.अब इस बात की जानकारी मंत्री टीएस सिंहदेव को है या नहीं यह तो नहीं मालूम, लेकिन हाल के दिनों में एक दागी अफसर को विकास आयुक्त कार्यालय का प्रमुख अभियंता बना दिया गया है.

इस दागी अफसर का नाम है एसएन श्रीवास्तव. जब एसएन श्रीवास्तव प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना चीफ इंजीनियर के प्रभार में थे जब एंटी करप्शन ब्यूरो ने उनके कई ठिकानों पर छापामार कार्रवाई की थीं. इस छापे में 2.72 करोड़ रुपए की संपत्ति का खुलासा हुआ था. ब्यूरो को अम्लीडीह के लेविस्टा कालोनी में एक बेशकीमती मकान होने की जानकारी मिली थीं. इसके अलावा बिलासपुर के रामग्रीन सिटी, जबलपुर और छतरपुर में मकान और 20 एकड़ जमीन के दस्तावेज मिले थे. इधर पूरे चार साल बीत जाने के बाद भी एंटी करप्शन ब्यूरो एसएन श्रीवास्तव के खिलाफ चालान पेश नहीं कर पाया है. बताते हैं कि ब्यूरो की तरफ से कई मर्तबा विभाग से अनुमति मांगी गई है, लेकिन कोई न कोई पेंच निकालकर अंतिम कार्रवाई को टाला जाता रहा है.

यहां बताना लाजिमी है कि एंटी करप्शन ब्यूरो ने जब वर्ष 2016 में छापे की कार्रवाई की थीं तब पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर ने श्रीवास्तव को चीफ इंजीनियर के प्रभार से हटाते हुए मंत्रालय में अटैच कर दिया था. सामान्य प्रशासन विभाग ने यह हिदायत भी दे रखी है कि जो अफसर दागी है उसे किसी भी तरह से महत्वपूर्ण ओहदा न दिया जाय. यहां तक फील्ड में काम भी न लिया जाय. विभाग के इस निर्देश के बाद यह उम्मीद की जा रही थीं कि श्रीवास्तव जैसे दागी अफसरों को महत्वपूर्ण काम नहीं मिलेगा, लेकिन उल्टा हो गया. श्रीवास्तव को कई महत्वपूर्ण जवाबदारी देते हुए इन दिनों पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के विकास आयुक्त कार्यालय का प्रमुख अभियंता बना दिया गया है. उनकी यह नियुक्ति विकास आयुक्त कार्यालय के अफसर एसके गुप्ता के स्थान पर की गई है जो इसी महीने सेवानिवृत हुए हैं.

सूत्र बताते हैं कि एसएन श्रीवास्तव ने अंबिकापुर के किसी अजय नाम के शख्स के जरिए राजधानी रायपुर में अपनी जड़े जमा ली है. बहरहाल एक दागी अफसर को नई और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपे जाने से पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में हलचल मची हुई है. विभाग के छोटे-बड़े सभी तरह के अफसर यह कहने को मजबूर हुए है कि...दागी सच्चे हैं... और दाग अच्छे हैं.

 

 

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ऊर्जा विभाग में ओएसडी रहे रत्नम ने किया वेतन घोटाला... मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से शिकायत

रायपुर. छत्तीसगढ़ में नई सरकार के गठन को सत्रह महीने बीत चुके हैं. इस बीच पुरानी सरकार के एक से बढ़कर एक घोटाले सामने आते रहे. घोटालों के उजागर होने का सिलसिला अब भी थमा नहीं  है. अभी हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी के सेवानिवृत मुख्य अभियंता वीरेंद्र बिलैया ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को मय दस्तावेज जानकारी भेजकर आरोप लगाया है कि ऊर्जा विभाग में विशेष सचिव की हैसियत से पदस्थ रहे एमएस रत्नम ने अपने चहेतों को उपकृत करने के लिए वेतन निर्धारण में बड़ा घोटाला किया है.

शिकायतकर्ता  जो जानकारी भेजी है उसके अनुसार एसबी अग्रवाल स्टेट पावर जनरेशन कंपनी में एमडी बनाए गए थे. इस कंपनी में एमडी बनने के पहले वे एनटीपीसी में पदस्थ थे और वर्ष 2010 में सेवानिवृत हो चुके थे, लेकिन एमएस रत्नम ने मार्च 2014 के वेतन को आधार बनाकर उसका निर्धारण किया जो पूरी तरह से गलत था. एनटीपीसी के कार्यपालक निदेशक को मई 2015 में 3,09,654 वेतन मिलता था जबकि श्री अग्रवाल को प्रतिमाह 3,75,000 रुपए ( तीन साल तक का भुगतान किया जाता रहा. इतना ही नहीं रत्नम ने बिजली बोर्ड के एक दूसरे एमडी केआरसी मूर्ति की संविदा नियुक्ति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और उनके वेतन निर्धारण में सारा रिकार्ड ही तोड़ दिया था. मूर्ति भी एनटीपीसी से आए थे. उन्हें सेवानिवृति के समय मूल वेतन, महंगाई भत्ता, परफार्मेश लिंकड, मकान भत्ता, अवकाश नगदीकरण, अटेन्डेट एलाउंस सहित प्रतिमाह 5 लाख 54 हजार 755 रुपए का भुगतान किया जाता रहा. छत्तीसगढ़ में सेवानिवृत होने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों को संविदा नियुक्ति दिए जाने की स्थिति में वेतन निर्धारण के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं. बिजली कंपनी से सेवानिवृत हुए व्हीके श्रीवास्तव, एनटीपीसी से सेवानिवृत हुए अरुण शर्मा को सरकार ने छत्तीसगढ़ नियामक आयोग का सदस्य बनाया था. यहां तक सेवानिवृत न्यायाधीश आरबी सिंह भी लोकपाल बनाए गए थे. इन सभी को छत्तीसगढ़ राज्य संविदा नियुक्ति के अनुसार ही वेतन दिया जाता था, लेकिन एसबी अग्रवाल और केआरसी मूर्ति के वेतन निर्धारण के दौरान संविदा नियम के तहत होने वाले वेतन निर्धारण की धज्जियां उड़ा दी गई. जबकि जनरेशन कंपनी के एमडी पद के लिए अखबारों में जो विज्ञापन प्रकाशित किया गया वह 45900-76300 +5000 था.

नहीं था वेतन निर्धारण का अधिकार 

शिकायत में इस बात का भी उल्लेख है कि एमएस रत्नम बिजली उत्पादन कंपनी के अधिकारी थे. सरकार ने अपनी सुविधा के लिए उन्हें ऊर्जा विभाग में विशेष सचिव का ओहदा दिया था. नियमानुसार मूल रुप से ऊर्जा विभाग का ही कोई अधिकारी वेतन निर्धारण का काम कर सकता था, लेकिन रत्नम ने अवैधानिक ढंग से अपने चहेतों का वेतन निर्धारण किया. बिलैया का आरोप है कि रत्नम ने यह सब कुछ इसलिए किया क्योंकि वे अग्रवाल और मूर्ति के माध्यम से बिजली बोर्ड से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों का प्रमोशन व तबादला कर भ्रष्टाचार करते थे. एसबी अग्रवाल वर्ष 2014 से वर्ष 2017 तक प्रबंध निदेशक बने रहे. इसी दौरान मड़वा प्रोजेक्ट की लागत कई गुणा बढ़ गई. इस प्रोजेक्ट के चलते कई हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. शिकायतकर्ता का कहना है कि रत्नम ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर सरकार के कोष को चूना लगाने का काम किया है. जिन अधिकारियों को अतिरिक्त राशि का भुगतान किया गया है उनसे ब्याज सहित वसूली कर कठोर कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए.

19 साल तक मंत्रालय में पदस्थापना का रिकार्ड

मंत्रालय में 19 साल तक प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ रहने का रिकार्ड भी एमएस रत्नम के नाम पर है. राज्य निर्माण से लेकर अब तक कई तरह के सचिव, मुख्य सचिव सेवानिवृत होकर घर बैठ गए,लेकिन रत्नम का कोई बाल बांका नहीं कर पाया. जब वे बिजली बोर्ड से मंत्रालय भेजे गए थे तब कार्यपालन अभियंता बनकर गए थे लेकिन जल्द ही उन्हें विशेष सचिव का दर्जा मिल गया. बिजली बोर्ड के कर्मचारियों और अधिकारियों का कहना है कि रत्नम कभी खुद को पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांड का करीबी बताकर बचते रहे हैं तो कभी शिवराज सिंह का करीबी बनकर. उन पर संविदा में पदस्थ एक ऐसे अधिकारी का भी वरदहस्त रहा है जो इन दिनों सब कुछ छोड़-छाड़कर दिल्ली जा बसा है. प्रदेश में ठीक लोकसभा चुनाव से पहले जगह- जगह बिजली कटौती का खेल चला था तब इस खेल में रत्नम की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे थे. बिजली बोर्ड अभियंता संघ के एक प्रमुख पदाधिकारी का कहना है कि छत्तीसगढ़ जब अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था तब बस्तर के बारसूर प्रोजेक्ट में एमएस रत्नम की तैनाती की गई थी. रत्नम मुख्य रुप से सिविल इंजीनियर है जबकि बिजली विभाग का कामकाज समझने के लिए इलेक्ट्रिक इंजीनियर होना अनिवार्य है. पदाधिकारी का कहना है कि एक सिविल इंजीनियर की वजह से ऊर्जा विभाग को कई बार आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो और सीबीआई की जांच प्रक्रिया से भी गुजरना पड़ा है.

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मामला छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण का मुख्यमंत्री की नाराजगी के बाद ओमप्रकाश सिंह ने सौंपा चार्ज

रायपुर. आखिरकार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की नाराजगी के बाद छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण की परियोजना ईकाई सूरजपुर में पदस्थ ओमप्रकाश सिंह ने अंबिकापुर में पदस्थ कार्यपालन अभियंता सोहन चंद्र को चार्ज सौंप दिया है.

गौरतलब है कि ओमप्रकाश सिंह गत कई सालों से अंबिकापुर जिले के आसपास ही चक्कर काटते रहे हैं. उनके खिलाफ कई तरह की गंभीर शिकायतों को अफसर यह कहकर दबाते रहे हैं कि वे राजनाथ सिंह के रिश्तेदार है. एक शिकायत के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उन्हें उनके मूल विभाग ( जल संसाधन ) में वापस भेजने का निर्णय लिया था. मुख्यमंत्री के इस फैसले  के बाद छत्तीसगढ़ ग्रामीण विकास अभिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी आलोक कटियार ने एक जून 2020 को एक आदेश में उन्हें समस्त दायित्वों से भारमुक्त करते हुए उनकी सेवाएं जल संसाधन विभाग को लौटा दी थी बावजूद इसके ओमप्रकाश सिंह सूरजपुर छोड़ने को तैयार नहीं थे. इस बारे में अपना मोर्चा डॉट कॉम ने 15 जून 2020 को एक खबर भी प्रकाशित की थीं.

हर तबादले की डिटेल खंगाली जाएगी

बताते हैं कि जब कार्यपालन अभियंता सोहन चंद्र चार्ज लेने गए तो उनसे यह कहा गया कि वे चाहे तो ऊपर लेबल पर बात कर सकते हैं. उनके वहां डटे रहने के दौरान यह खबर भी प्रचारित होती रही कि वे सूरजपुर में ही नए ढंग से तैनाती को लेकर जोड़-तोड़ कर रहे हैं. इधर 17 जून को ओमप्रकाश सिंह ने अंबिकापुर के कार्यपालन अभियंता सोहन चंद्र को अपना कार्यभार सौंप दिया है. बहरहाल ओमप्रकाश सिंह के हटने के साथ ही यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि जब उन्हें एक जून को ही उनके मूल विभाग में वापस भेज दिया गया था तो 16 दिनों तक वे क्या कर रहे थे. सूत्रों का कहना है कि इस दौरान उनके द्वारा ठेकेदारों को चेक से भुगतान किया गया है. अब यह चेक पुरानी तिथि में जारी किए गए हैं अथवा 16 दिनों में इसका खुलासा किसी जांच के बाद ही हो पाएगा. सूत्र यह भी कहते हैं कि छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में मुख्य कार्यपालन अधिकारी द्वारा नियमों- कानून को ध्यान में रखे बगैर कई अभियंताओं और उप अभियंताओं को इधर से उधर किया गया है. उनके द्वारा जितने भी तबादले किए गए हैं उन सबकी डिटेल भी खंगाली जाएगी. इस पड़ताल में यह भी देखा जाएगा कि तबादले के खेल में कौन-कौन लोग संलिप्त थे.

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भाड़ में गया कोरोना... छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में होता रहा तबादला

रायपुर. पूरे देश में जब मार्च से लेकर जून के प्रथम सप्ताह तक सरकारी कामकाज लगभग ठप्प था तब छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में उठा-पटक जारी थीं.अधिकारियों-कर्मचारियों की प्रताड़ना और तबादले के लिए बदनाम हो रहे अभिकरण में इस दौरान भी तबादलों का खेल चलता रहा.

ज्ञात हो कि सामान्य प्रशासन विभाग की तबादला नीति के अनुसार फिलहाल तबादलों पर पूरी तरह से प्रतिबंध है. इसी साल 27 मई 2020 को वित्त विभाग के अपर सचिव सतीश पाण्डेय ने एक आदेश में फिर साफ किया कि लॉकडाउन के कारण प्रदेश की राजस्व प्राप्तियां बेहद कमजोर है इसलिए हर तरह के तबादले केवल समन्वय में अनुमोदन के उपरांत ही किए जा सकेंगे. लेकिन अभिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने जिस तरह से अभियंताओं-उप अभियंताओं का तबादला किया है उसे देखकर तो यह लगता नहीं है कि प्रदेश में कोरोना नाम का कोई संकट है या प्रदेश भयावह किस्म के संकट काल से गुजर रहा है?

इसी साल 2 मई 2020 को जांजगीर-चांपा में पदस्थ सबसे ज्यादा विवादास्पद कार्यपालन अभियंता ओपी सिंह का तबादला किया गया. लंबे समय से अंबिकापुर जिले का चक्कर लगाने वाले ओपी सिंह को एक बार फिर परियोजना ईकाई सूरजपुर का काम सौंप दिया गया. तबादले में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं था कि श्री सिंह का तबादला समन्वय में अनुमोदन के उपरांत किया गया है. तबादला आदेश की प्रतिलिपि भी केवल पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री के निज सहायक, छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण के स्टॉफ आफिसर, मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता को ही दी गई.

दो मई को ही कार्य एवं प्रशासनिक सुविधा के लिहाज से अंबिकापुर परियोजना ईकाई क्रमांक एक में पदस्थ सोहन चंद्रा का तबादला किया गया. इन्हें बलरामपुर भेजा गया. इसी तिथि को बलौदाबाजार में पदस्थ पीके गुप्ता अंबिकापुर भेजे गए जबकि 4 मई को परियोजना ईकाई क्रमांक- 2 बीजापुर में पदस्थ प्रभारी कार्यपालन अभियंता संतोष साहू को बेमेतरा, पी मोहन राव को परियोजना क्रियान्वयन ईकाई जगदलपुर,पीएल चौरे को परियोजना मंडल क्रमांक एक जगदलपुर, रायपुर में पदस्थ बीएस पटेल को धमतरी, महासमुंद में पदस्थ मनोज रात्रे को जांजगीर-चांपा कर दिया गया.

इसी साल कोरोना काल में 15 मई को ग्यारह उप अभियंता इधर से उधर किए गए. इनके तबादले को लेकर इतनी ज्यादा हड़बड़ी थीं कि जिस दिन सूची बनी और उसी दिन तत्काल प्रभाव से आदेश जारी कर दिया गया. बहरहाल 15 मई को ग्रामीण विकास संभाग मुंगेली में बेहतर ढंग से कार्यों का संपादन कर रहे चंदन यादव और अन्तराम आदित्य को परियोजना क्रियान्वयन ईकाई क्रमांक बीजापुर भेज दिया गया. जांजगीर-चांपा से वासुदेव पोर्ते और श्रीकांत पारधी का तबादला धुर माओवाद प्रभावित नारायणपुर किया गया. कोरबा में पदस्थ भीमदेव कुर्रे और चमन कुमार मिश्रा भी बीजापुर और सुकमा भेजे गए. राजनांदगांव में पदस्थ आलोक खोबरागढ़े और सुनील बारले के कामकाज को लेकर भी कोई शिकायत नहीं थीं बावजूद इसके गुणवत्तापूर्ण कार्य संपादन के नाम पर बीजापुर भेज दिया गया. दुर्ग के ग्रामीण विकास संभाग में कार्यरत धीरेंद्र सोनी, लीलाधऱ ढीमर और भास्कर राव औचार भी सुकमा पदस्थ कर दिए गए. इसी तिथि को एक अन्य आदेश में सतानंद महिकवार, मोविश लहरे, यशवंत साहू और लोकेश सोनी को क्रमशः कोरबा, बलौदाबाजार, कोरिया और बेमेतरा में पदस्थ कर दिया गया. कोरोना काल में एक जून को मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने सूरजपुर में पदस्थ ओम प्रकाश सिंह की प्रतिनियुक्ति समाप्त करते हुए उन्हें उनके पैतृक विभाग ( जल संसाधन ) जाने के लिए भारमुक्त कर दिया. इसके लिए बकायदा आदेश जारी हुआ, लेकिन अब तक सिंह ने नए कार्यपालन अभियंता सोहन चंद्रा को चार्ज नहीं दिया है.

छह जून को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अवर सचिव रामलाल खैरवार ने कांकेर में पदस्थ प्रभारी कार्यपालन अभियंता यूके कोपूलवार, जशपुर में पदस्थ एसके गुप्ता, सूरजपुर में पदस्थ आरपी गुप्ता और गरियाबंद में पदस्थ सहायक अभियंता आरके रिछारिया को उनके मूल विभाग ( जल संसाधन )  में वापस भेजने के लिए आदेश जारी कर दिया है, लेकिन ये अभियंता भी इस जोड़-तोड़ में लगे है कि किसी भी तरह से ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण में तैनाती बनी रहे. बहरहाल अभिकरण में ताबड़तोड़ ढंग से किए जा रहे तबादलों को लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है.सवाल भी उठ रहे हैं.  अपना मोर्चा डॉट कॉम ने इस बारे में मुख्य कार्यपालन अधिकारी आलोक कटियार से उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने फोन नहीं उठाया, लेकिन वहां पदस्थ चीफ इंजीनियर दयाशंकर परगनिहा ने कहा कि वरिष्ठ अफसर चाहे तो बगैर समन्वय के भी तबादले हो सकते हैं. समन्वय और अनुमोदन वगैरह की प्रक्रिया बाद में पूरी कर ली जाती है.

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जिस कार्यपालन अभियंता को हटाने के लिए सीएम ने दिया था निर्देश... वह ताल ठोंककर डटा हुआ है अब तक

रायपुर. इस खबर में जो तस्वीर दिखाई दे रही है वह ओमप्रकाश सिंह की है. वैसे तो ओमप्रकाश सिंह जलसंसाधन विभाग से है, लेकिन गत 16  सालों से ही वे किसी न किसी तरीके से प्रतिनियुक्ति के जरिए अंबिकापुर व उसके आसपास के जिलों में डटे हुए हैं. बीच में एकाध-बार उनका तबादला जांजगीर-चांपा किया गया, लेकिन तब भी उनका अंबिकापुर प्रेम कम नहीं हुआ. हाल-फिलहाल भी वे अंबिकापुर से सटे बलरामपुर जिले के राजपुर में ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में पदस्थ है. हालांकि उन्हें अभिकरण से हटाने का आदेश हो चुका है. यह आदेश किसी और ने नहीं स्वयं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दिया है, बावजूद इसके वे हटने का नाम नहीं ले रहे हैं.

बंद कर देना चाहिए जल संसाधन विभाग

पता नहीं ऐसा क्या है, लेकिन यह सच है कि जल संसाधन विभाग के ज्यादातर अभियंता अपने मूल विभाग में काम ही नहीं करना चाहते.वहां पदस्थ अभियंता इसी कवायद में लगे रहते हैं कि वे किसी न किसी तरीके से मलाईदार विभाग में जगह हासिल कर लें. प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तब जल संसाधन विभाग के अधिकांश अभियंता इसी जोड़-तोड़ में लगे रहते थे कि किसी न किसी तरह से पंचायत एवं ग्रामीण विभाग की ग्राम सड़क योजना से जुड़ जाय. ऐसे सभी अभियंताओं की यह मंशा होती थी कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में अरबो-खरबों रुपए है. यदि दो-चार साल भी टिक गए तो सात पीढ़ी तर जाएगी.

अभियंताओं की यह कवायद अब भी कम नहीं हुई है. अब भी ज्यादातर अभियंता छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण से जुड़ने के लिए जोड़-तोड़ करते रहते हैं और जुड़े हुए हैं. ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में अभियंताओं की फौज देखकर तो यही लगता है कि जल संसाधन विभाग को पूरी तरह से बंद ही कर देना चाहिए. हालांकि नई सरकार बनने के बाद ऐसे सभी अभियंताओं को उनके मूल विभाग ( जल संसाधन ) में वापस भेजने का एक सैद्धांतिक फैसला लिया गया है, लेकिन इस फैसले पर ठोस तरीके से अमल नहीं हो पाया है. अब भी कई जगहों पर जल संसाधन विभाग के अभियंता ही महत्वपूर्ण पदों पर आसीन और मनमाने ढंग से काम कर रहे है.

शिकायत के बाद सीएम ने दिया हटाने का आदेश

ओमप्रकाश सिंह छत्तीसगढ़ ग्रामीण विकास अभिकरण की बलरामपुर जिले की राजपुर ईकाई में कार्यपालन अभियंता के तौर पर पदस्थ है. लंबे समय से अंबिकापुर जिले के आसपास ही पदस्थापना के चलते उनके खिलाफ शिकायतों का अंबार भी है. बताया जाता है कि उनकी गंभीर सी गंभीर शिकायतों को विभाग के अफसर यह कहकर दबाते रहे हैं कि वे राजनाथ सिंह के रिश्तेदार है. बहरहाल एक शिकायत के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उन्हें उनके मूल विभाग ( जल संसाधन ) में वापस भेजने का निर्णय लिया. मुख्यमंत्री के इस फैसले की जानकारी पंचायत एवं ग्रामीण विकास के अवर सचिव रामलाल खैरवार ने 29 मई 2020 को छत्तीसगढ़ ग्रामीण विकास अभिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी आलोक कटियार को भेजी. श्री कटियार ने इसके परिपालन में एक जून 2020 को एक आदेश में उन्हें समस्त दायित्वों से भारमुक्त करते हुए उनकी सेवाएं जल संसाधन विभाग को लौटा दी, लेकिन ओमप्रकाश सिंह के ऊपर इन आदेशों को कोई प्रभाव नहीं पड़ा.

फोन आ गया है ऊपर बात कर लो

आदेश में यह साफ-साफ उल्लेखित था कि भारमुक्त होने के साथ ही ओमप्रकाश सिंह अपना समस्त प्रभार अंबिकापुर जिले की परियोजना ईकाई में पदस्थ सोहन चंद्रा को सौंप देंगे. बताते हैं कि जब चंद्रा चार्ज लेने गए तो उन्हें कहा गया कि रायपुर से फोन आ चुका है... वे चाहे तो ऊपर बात कर सकते हैं. अब यह माजरा समझ से परे हैं कि रायपुर से किस शख्स ने ऐसा फोन घुमा दिया है जिसकी वजह से ओमप्रकाश सिंह को डटे रहने का मौका मिल गया. क्या यह फोन छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण के सिविल लाइन स्थित कार्यालय से किया गया है या फिर किसी बंगले से ? प्रशासनिक गलियारों में यह सवाल तैर रहा है कि मुख्यमंत्री द्वारा ओमप्रकाश सिंह को हटाने के निर्णय के बाद ऐसा कौन है जो यह कहते हुए फोन घुमा रहा है कि कोई चार्ज देने की जरूरत नहीं है. नए सिरे से फिर फाइल चलाई जाएगी. इधर-उधर की उठापटक के लिए मशहूर छत्तीसगढ़ ग्रामीण विकास अभिकरण से जुड़ी एक खबर यह भी है कि यहां पदस्थ एक अधिकारी ने मुख्यमंत्री और मंत्री को भरोसे में न लेकर बगैर समन्वय के कई कार्यपालन अभियंताओं को भी इधर से उधर कर दिया है. बहरहाल ग्रामीण सड़क अभिकरण के कामकाज से जुड़े कतिपय लोग एक बार फिर मुख्यमंत्री से मिलकर वस्तुस्थिति से अवगत कराने की जुगत में हैं.

 

 

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छत्तीसगढ़ के कोविड के मामले में बदहाली से परेशान नर्सों ने कहा-हम भी इंसान है...हमारे जीवन का भी ख्याल रखिए

रायपुर. बिलासपुर जिले के सिम्स चिकित्सालय के कोविड-19 ओपीडी में कार्यरत स्टाफ और नर्सों ने खुद के जीवन को बचाने के लिए सिम्स चिकित्सालय के संयुक्त संचालक और चिकित्सा अधीक्षक से गुहार लगाई है.

ओपीड़ी में कार्यरत स्टाफ और नर्सों ने संयुक्त संचालक और चिकित्सा अधीक्षक को एक पत्र भेजकर कहा है कि कोविड़-19 के ओपीडी, आईपीडी और आइसोलेशन वार्ड में कार्यरत कर्मचारियों का संपर्क संदेही मरीजों से होता है. जो भी मरीज संदेही होता है उसका सैंपल लेकर जांच के लिए भेजा जाता है. जब तक मरीज का पॉजिटिव नहीं पाया जाता तब तक वह कोविड-19 के नाम से बनाए गए अस्पताल में कार्यरत स्टाफ व नर्सों के संपर्क में रहता है. फिलहाल हमें सिम्स में 14 दिनों तक कार्य लिया जाता है. जब 14 दिन की डयूडी पूरी हो जाती है तो बिना आरटीपीसी आर टेस्ट के घर जाने को कह दिया जाता है. नियमानुसार संक्रमित मरीजों के संपर्क में रहने वाले अस्पताल के प्रत्येक स्टाफ व नर्स का चेकअप होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है. नर्सों और स्टाफ ने कहा है कि अगर कोई कर्मचारी संक्रमित होता है और संक्रमण उसके परिवार में फैलता है तो उसकी जिम्मेदारी सिम्स प्रबंधन की मानी जाएगी. ( पत्र देखें )  

 

 

 

 

 

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छत्तीसगढ़ में फर्नीचर सप्लाई में गड़बड़झाला करने वाले फर्मों की शिकायत प्रधानमंत्री से

रायपुर. छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार रहने के दौरान एक बड़ा फर्नीचर घोटाला सामने आया था. तब इस घोटाले शिकायत प्रधानमंत्री से की गई थीं. एक बार फिर फर्नीचर सप्लाई करने वाले चुनिंदा फर्मों की कारगुजारियां प्रधानमंत्री तक भेजी गई है. जिन फर्मों की शिकायत भेजी गई  है उनमें ड्रोलिया इंटरप्राइजेस, गणपति इंटरप्राइजेस, गोयल फर्नीचर, सवाडिया स्टील, शर्मा स्टील, हरिओम उद्योग, खंडेलवाल सेल्स कार्पोरेशन, एमएस रानी सती उद्योग, सांई इंडस्ट्रीज सहित फर्नीचर सप्लाई करने वाली दो अन्य फर्म का नाम शामिल है.

जब केदार कश्यप शिक्षा मंत्री थे तब ठीक चुनाव पहले वे गंभीर विवादों में फंस गए थे. तब यह आरोप सामने आया था कि जिला शिक्षा अधिकारियों पर दबाव डालकर स्कूलों में फर्नीचर खरीदी के नाम पर 50 करोड़ का गोलमाल किया गया है. बताया जाता है कि प्रदेश में सीएसआइडीसी में पंजीकृत 180 सूक्ष्म और लघु इकाइयों को निविदा प्रक्रिया से बाहर कर दिया था. लघु इकाईयों के बाहर हो जाने से इनमें काम करने वाले 45 हजार बढ़ई और अन्य मजदूर बेरोजगार हो गए थे. ठेका उन्हीं फर्मों को मिला था जो साठगांठ करने में सफल हो गए थे. इस मामले में स्थानीय मीडिया में जमकर गूंज होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने जांच के आदेश भी दिए थे, लेकिन धीरे-धीरे पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला गया. इधर एक बार फिर नए सिरे से शिकायत भेजी गई है.

यह है शिकायत में

शिकायत में ई-मानक सीएसआईडीसी पोर्टल पर सवाल उठाए गए हैं. कहा गया है कि फर्नीचर ई मानक पर लगभग 189 रेटकांट्रेक्ट सप्लायर है, लेकिन इन सप्लायरों में केवल पांच फर्म और उनसे जुड़े लोग ही अपना उल्लू साध रहे हैं. जिन पांच फर्मों को सबसे ज्यादा महत्व दिया जा रहा है उन पर जांच लंबित है. ऑनलाइन जेम से क्रय प्रक्रिया बंद कर दिए जाने के बाद फर्म से जुड़े कर्ताधर्ता जिला शिक्षा अधिकारियों से सांठगांठ कर ई-मानक पोर्टल पर अपनी मर्जी चला रहे हैं. ई-मानक पोर्टल का उद्देश्य स्थानीय उद्योगों को काम देना है, लेकिन यह बात केवल दिखावे में रह गई है. उन सभी विभागों में जहां-जहां फर्नीचर की खरीदी होती है वहां जमकर भ्रष्टाचार हो रहा है.

जमकर चला खेल

शिकायत में कहा गया है कि प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तब जो सप्लायर अफसरों से सांठगांठ कर चूना लगा रहे थे वहीं सप्लायर अब भी सबसे ज्यादा सक्रिय है. पहले भी सबसे ज्यादा काम गणपति इंटरप्राइजेस, गोयल फर्नीचर्स, खंडेलवाल सेल्स कारपोरेशन सवाडिया स्टील, शर्मा स्टील, हरिओम उद्योग, एमएस रानी सती उद्योग, सांई इंडस्ट्रीज सहित दो अन्य फर्म को दिया गया था. अब भी इन्हीं फर्मों से जुड़े कर्ताधर्ता सीएसआईडीसी के दफ्तर में अफसरों के कमरों में देखे जा सकते हैं.

जेम पोर्टल को ठेंगा

केंद्र में मोदी की सरकार बनने के बाद सरकारी खरीदी में पारदर्शिता के लिए जेम पोर्टल से खरीदी का नियम बनाया गया था. हालांकि यह व्यवस्था भी छत्तीसगढ़ में अफसरों के लिए कमाई का जरिया बन गई थी. जेम पोर्टल में एक बार किसी एक वस्तु का रजिस्ट्रेशन करवाकर  सप्लायर दूसरी सामग्री भी सप्लाई कर रहे थे. जेम पोर्टल में अधिक रेट पर अपने माल को अप्रूव कराने के लिए दलालों का एक रैकेट सक्रिय था. इधर ई-मानक सीएसआईडीसी पोर्टल के माध्यम से भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. बताया जाता है कि अब भी वहीं सप्लायर हावी है जो पुराने खिलाड़ी है. इस बारे में सीएसआईडीसी के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि एक बार जो सिस्टम बन जाता है वह नियम-कानून बदल जाने के बाद भी लगभग-लगभग कायम ही रहता है. अधिकारी ने कहा कि सीएसआईडीसी केवल रेट का निर्धारण करता है जबकि खरीदी का काम विभागों से होता है. अब कौन सा विभाग किस दर पर खरीदी कर रहा है कैसे बताया जा सकता है. बहुत संभव है कि सप्लायरों ने शिक्षा विभाग और अन्य अधिकारियों से गठजोड़ कर लिया हो.

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15 साल तक पत्रकारों को कुचलते रहे डाक्टर रमन और अब अर्णब की तरफदारी

रायपुर. छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के कार्यकाल में पत्रकार किस दबाव में काम कर रहे थे यह किसी से छिपा नहीं है. ( कुछेक दरबारी पत्रकारों को छोड़कर ) सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले हर पत्रकार के ऊपर किसी न किसी गंभीर धारा के तहत जुर्म दर्ज था. ऐसा करने के पीछे सरकार की मंशा यही रहती थी कि पत्रकार घुटनों के बल रेंगकर हत्यारी विचारधारा का साथ देते हुए अपने काम को संपादित करते रहे.

इधर हाल के दिनों में जब रिपल्बिक टीवी पर भड़काऊ खबरें दिखाकर देश को सांप्रदायिक उन्माद की ओर ले जाने वाले अर्णब गोस्वामी पर कांग्रेस ने एफआईआर के जरिए शिकंजा कसा तो डाक्टर रमन सिंह अर्णब गोस्वामी के समर्थन में आ खड़े हुए. उन्होंने अर्णव गोस्वामी पर हुए कथित हमले को लोकतंत्र के लिए शर्मनाक बताया. डाक्टर रमन ने कहा कि कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस मामले में देश और ख़ास कर प्रेस जगत से निःशर्त क्षमायाचना करनी चाहिए.

डाक्टर रमन सिंह के इस बयान के बाद कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने भी जोरदार हमला बोला है. एक बयान में त्रिवेदी ने कहा कि रमन सिंह और उनकी सरकार ने 15 साल में पत्रकारों के साथ जो बर्ताव किया उसे भी याद रखना चाहिए. पत्रकारों की एक- एक नकारात्मक रिपोर्ट  पर न केवल उनका तबादला करवाया गया बल्कि उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर भी किया गया. पत्रकारों की पत्नी और परिजनों  की नौकरी छीनी गई. पत्रकारों को तरह-तरह की धमकियां दी गई और खासकर माओवादी इलाकों में कार्यरत पत्रकारों का जीना मुश्किल कर दिया गया. अफसरों ने पत्रकारों को जान से मारने की धमकी भी दी. बस्तर में पत्रकारों के काम करने की जो स्थिति रही उसे लेकर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की एक सनसनीखेज रिपोर्ट है. अगर बयान जारी करने के पहले डाक्टर रमन इस रिपोर्ट को पढ़ लेते तो ज्यादा बेहतर होता. इस रिपोर्ट की पूरी दुनिया में चर्चा हुई जिससे वे तिलमिला गए थे. रमन सिंह सरकार में पत्रकारों पर जो दबाव बनाया गया और पत्रकारों को जिन परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया गया डाक्टर रमन सिंह को उस पर भी एक नजर डालनी चाहिए. भाजपा सरकार के शासनकाल में पत्रकारों को जिस तरीके से धमकियां दी गई जान से मारने और झूठे मामलों में फंसाने की साजिशें की गयीं उसे छत्तीसगढ़ अभी भूला नहीं है.

त्रिवेदी ने कहा है कि आज रमन सिंह को पत्रकारों की सुरक्षा,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की याद आ रही है. जब कलबुर्गी की हत्या हुई थी जब गौरी लंकेश की हत्या हुई थी तब प्रधानमंत्री मोदी और रमन सिंह जैसे नेता उस पर चुप्पी साधे रहे मगर अब अर्णव पर स्याही फेंके जाने की कथित घटना से रमन सिंह को सब कुछ याद आ रहा है. मोदी रमन की पोल खोलने वाले एक कार्यक्रम के प्रसारित होने के बाद एबीपी न्यूज़ चैनल के साथ क्या किया गया. किस तरीके से एबीपी न्यूज़ के सिग्नल को डिस्टर्ब किया गया यह किसी से छिपा नहीं है. देश के वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपाई को किन परिस्थितियों में नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया उसे पूरा देश  जानता और समझता है.

त्रिवेदी ने कहा है कि पूरा देश और छत्तीसगढ़ इस बात को बखूबी समझ रहा है कि अर्णव गोस्वामी ने 16 अप्रैल को राहुल गांधी की पत्रकार वार्ता  को लेकर  झूठे तथ्य प्रसारित किए थे. उसके बाद सोनिया गांधी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की गई. ऐसा करके अर्णव गोस्वामी ने यह जता दिया कि वे केंद्र की मोदी सरकार द्वारा करोना से निपटने में हुई लापरवाही और आपराधिक भूल से ध्यान हटाने के एजेंडे के तहत काम कर रहे हैं.

स्याही फेंकने की कथित घटना को लोकतंत्र के लिए शर्मनाक बताने वाले डाक्टर रमन सिंह को यह भी बताना चाहिए कि 25 मई 2013 को बस्तर के झीरम में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुआ हमला क्या था? अर्णव पर  दो लोगों द्वारा स्याही फेंकने से भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रमन सिंह इतने विचलित और उद्वेलित हो गए कि इसे लोकतंत्र का भारी नुकसान बताकर प्रवचन देने लगे. रमन सिंह के दामाद डॉ पुनीत गुप्ता के माध्यम से अंतागढ़ में लोकतंत्र को पहुंचाए गए नुकसान पर तो रमनसिंह ने कभी कुछ नहीं बोला ?

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कोरोना के साथ-साथ नफरत का वायरस फैलाने वालों का भी इलाज चल रहा है छत्तीसगढ़ में

नफरत का जहर उगलने वाले हर सांप के फन को कुचलने की चल रही है तैयारी 

रायपुर. कोरोना से निपटने के मामले में छत्तीसगढ़ सरकार की सराहना पूरे देश में हो रही है. इस बीमारी के अधिकांश मरीज ठीक होकर अपने घर जा रहे हैं और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को धन्यवाद ज्ञापित कर रहे हैं. इधर सरकार ने इस गंभीर बीमारी के साथ-साथ नफरत का वायरस फैलाने वालों का इलाज भी प्रारंभ कर दिया है.

पिछले दिनों पुलिस ने एक महिला पार्षद विश्वदिनी पांडेय के खिलाफ मामला दर्ज किया है. भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी इस महिला पार्षद पर आरोप है कि उसने एक समाज विशेष की भावनाओं को आहत करने की नीयत से अपने फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट की थी. पुलिस ने विश्वदिनी पांडेय के खिलाफ धारा 153 ए, 295- ए, 505 ( 2 )  और धारा 188 के तहत अपराध पंजीयबद्ध किया है. अभी महिला की गिरफ्तारी नहीं हुई है, लेकिन समझा जाता है कि पुलिस जल्द ही उसे गिरफ्त में ले लेगी.

इधर निशा जिंदल के नाम से एक फर्जी फेसबुक एकाउंट संचालित करने के मामले में पुलिस ने रवि पुजार नाम के एक शख्स को भी गिरफ्तार कर लिया है. रवि पुजार अपने फेसबुक में पाकिस्तान की खूबसूरत अभिनेत्रियों की फोटो लगाकर लोगों को गुमराह करता था. निशा जिंदल उर्फ रवि पुजार के कई हजार लोग फॉलोवर थे और वह फेसबुक पेज पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली पोस्ट व फोटो अपलोड़ करते रहता था. बताया जाता है कि रवि 11 साल से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था और अब तक पास नहीं हो पाया था. इधर खबर है कि पुलिस ऐसे बहुत से एकाउंट की छानबीन कर रही है जिसमें देश और प्रदेश के सौदार्द को खराब करने का मकसद छिपा है. तर्कों और सबूतों के साथ राजनीतिक टीका-टिप्पणी अपनी जगह है, लेकिन आपसी सौहार्द को खत्म करने वालों पर सख्ती तय मानी जा रही है.

चीखने वाले एंकरों का सुर बदला

देश में भाई-चारे को बढ़ावा देने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक भी अब एकजुट होने लगे हैं. वे सांप्रदायिकता का जहर बोने वाले चैनलों और संवाददाताओं की शिकायत कर रहे हैं. देश में लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्षधर नागरिक सांप्रदायिक खबरों को बढ़ावा देने वाले टीवी चैनलों और एंकरों के वीडियो और अखबारों का संग्रहण भी कर रहे हैं ताकि निकट भविष्य में उन्हें अदालत में घसीटा जा सकें. पिछले दिनों बांद्रा से स्पेशल ट्रेन चलाने की अफवाह आधारित खबर दिखाने के मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने एक चैनल के संवाददाता राहुल कुलकर्णी को गिरफ्तार किया तो टीवी पर चीख-चीखकर सौहार्द को मटियामेट करने में जुटे एंकरों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है. अभी हाल के दिनों में एक ऐसी महिला एंकर के खिलाफ भी पुलिस में शिकायत हुई है जो कोरोना फैलने के लिए एक समुदाय विशेष को ही जिम्मेदार ठहराती थी. पुलिस में शिकायत के बाद अब महिला एंकर का सुर बदल गया है. अब जो नया वीडियो जारी हुआ है उसमें वह अपने ही चैनल की खबरों का बेहद मासूमियत के साथ खंडन करते हुए नजर आ रही है. महिला बेहद अफसोसजनक तरीके से यह बता रही है कि जो खबर चलाई गई थी वह पूरी तरह से अफवाह पर आधारित थीं. एक रिपोर्टर की गिरफ्तारी के साथ ही तीन बड़े चैनलों की रिपोर्टिंग का अंदाज भी थोड़ा बदल गया है. ( पूरी तरह नहीं ) देश के बहुत से लेखकों की राय है कि नफरत के वायरस के निपटने के लिए जहर उगलने वाले हर सांप के फन को कुचलना बेहद आवश्यक है चाहे वह किसी भी समुदाय से जुड़ा हुआ ही क्यों न हो. कोरोना के भीषण संकटकाल में यह देखना बाकी है कि कितने सांपों का फन कुचला जाता है.

 

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कोरोना के भीषण संकटकाल में केंद्र और छत्तीसगढ़ के भाजपा नेताओं की भूमिका पर उठा सवाल

रायपुर. कोरोना जैसे भीषण संकटकाल में छत्तीसगढ़ के भाजपा नेताओं ने पत्र लेखन प्रकोष्ठ खोल लिया है. अमूमन भाजपा के सभी छोटे-बड़े नेता इन दिनों लेटरबाजी में व्यस्त है. अब जब लेटरबाजी होगी तो भला कांग्रेस के लोग कहां चुप बैठने वाले हैं. पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री के एक पत्र का मीडिया सलाहकार रुचिर गर्ग ने जवाब दिया तो डाक्टर रमन सिंह के मीडिया कंसल्टेंट और भाजपा के प्रकाशन विभाग से जुड़े पकंज झा ने लंबा-चौड़ा खत लिख मारा.  उनके खत के बाद कलक्टर की नौकरी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए ओपी चौधरी ने चिट्ठी लिखी. इधर कांग्रेस के संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने दोनों की चिट्ठियों पर सवाल दागते हुए कहा है कि छत्तीसगढ़ में कोरोना से निपटने के लिए केंद्र और भाजपा के स्थानीय नेताओं ने कितना सहयोग दिया है इसका खुलासा होना चाहिए.

त्रिवेदी का कहना है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सलाहकार रुचिर गर्ग के पत्र के जवाब में भारतीय जनता पार्टी की ओर से आए दो पत्रों के जरिए इधर -उधर की बातों से ध्यान भटकाने की कोशिश की है, लेकिन यह नहीं बताया कि केंद्र सरकार की ओर से राज्य को कोरोना संकट से लड़ने के लिए आख़िर क्या मिला? एक तरह से भाजपा ने कठिन सवालों से कन्नी काटने की कोशिश की है. त्रिवेदी ने पंकज झा और ओपी चौधरी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने कोरोना संकट से जूझने के लिए जो एक लाख 70 हज़ार करोड़ का जो पैकेज की घोषणा तो की है, लेकिन उसमें से कितना पैसा छत्तीसगढ़ राज्य को मिलने जा रहा है यह स्पष्ट होना चाहिए.

इस पैकेज में जो एक बड़ी घोषणा है कि मनरेगा की मज़दूरी पहली अप्रैल से 20 रुपए बढ़ जाएगी. इसका मतलब यह है कि एक मज़दूर को 100 दिन का काम मिल जाता है तो साल में उसे मात्र 2000 रुपए अतिरिक्त मिलेंगे. और मिलेंगे तब जब भुगतान होगा. राज्यों को वर्ष 2019-20 का 1555 करोड़ रुपए केंद्र से मिलना बचा है. इसमें से कुछ राशि अभी आई है लेकिन वह भी ऊंट के मुंह में जीरा है. भाजपा बताए कि केंद्र सरकार मनरेगा का पूरा पैसा क्यों नहीं दे रही है?

केंद्र के पैकेज में जो राशि श्रमिकों को देने की बात हुई है, उसमें उन 83 प्रतिशत मज़दूरों को क्या मिलेगा जो अनौपचारिक क्षेत्र में जुड़े हुए हैं. कामगारों को ईपीएफ़ से 75 प्रतिशत या तीन महीने की तनख़्वाह के बराबर पैसे निकालने की छूट दी है, लेकिन यह बताना भूल गए कि ईपीएफ़ का पैसा उनका अपना पैसा है और अगर वह निकाल लिया तो भविष्य अनिश्चित हो जाएगा.

इसके अलावा छत्तीसगढ़ को केंद्र की ओर से मिलने वाला जीएसटी भुगतान का बड़ी राशि बकाया है. राज्य को मिलने वाले केंद्रीय टैक्स में पिछले साल 14 प्रतिशत की कमी आई है. उसकी भरपाई या भुगताने के बारे में केंद्र सरकार चुप क्यों है?

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री किसान योजना के एक किस्त के भुगतान की बात की है, लेकिन छत्तीसगढ़ में तो अभी पुराना भुगतान ही पूरा नहीं हुआ है, तो नई किस्त का किसान कैसे भरोसा करें. उज्जवला गैस मुफ़्त देने का फ़ैसला किया है लेकिन उससे हासिल क्या होगा जब ग़रीबों का रोज़गार छिन जाएगा? और छत्तीसगढ़ में तो उज्जवला का रिफ़िल रेट ही 1.8 प्रतिशत है. इसके अलावा यह सवाल तो अब भी अनुत्तरित है कि समय पर केंद्र सरकार ने किट्स क्यों उपलब्ध नहीं करवाए? समय पर और टेस्टिंग लैब की अनुमति क्यों नहीं दी? और केंद्र की ओर से राज्यों को संकट से लड़ने के लिए पर्याप्त संसाधन क्यों उपलब्ध नहीं करवाए? उन्होंने कहा है कि राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल शुरु से कह रहे हैं कि केंद्र सरकार ने सिर्फ़ लॉक डाउन की घोषणा की और संकट से जूझने का काम राज्यों पर, उनके अपने संसाधनों पर छोड़ दिया. केंद्र सरकार ने राजनीति छोड़कर यदि समय पर क़दम उठाए होते तो राज्यों में जो कोरोना मरीज़ पहुंचे हैं, उन्हें भी रोका जा सकता था, लेकिन भाजपा एकतरफ़ा गुणगान करने में लगी है.

भाजपा को अपने केंद्रीय नेतृत्व से कहना चाहिए कि वे राज्यों को संसाधन उपलब्ध करवाएं जिससे कि लॉक-डाउन ख़त्म होने के बाद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का इंतज़ाम किया जा सके. भाजपा इस बात पर चुप्पी साध लेती है क्योंकि छत्तीसगढ़ में तो भाजपा सांसदों तक ने उन लोगों के लिए धन नहीं दिया जिनसे वे वोट मांगकर जीते हैं. दरअसल भाजपा अपनी नाकामियों से घबराई हुई और झुंझलाई हुई है. वो इस अहम सवाल तक का जवाब देने से कतरा गई कि आखिर कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी में मुख्य मंत्री सहायता कोष या राज्यों के राहत कोष को शामिल क्यों नहीं किया गया ? 

त्रिवेदी ने कहा कि ओपी चौधरी और पंकज झा को समझना चाहिए कि जो सवाल बड़े हैं उसके जवाब बड़े नेता ही दे सकते हैं. जिस पार्टी की दिलचस्पी 20 हज़ार करोड़ के नए संसद भवन के निर्माण में हो वो आम जनता के सवालों के जवाब से तो मुंह ही छुपायेगी!

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राहत देने वाली खबरः मंदिर के पुजारी को ऑटो चालक हबीब ने पहुंचाया राशन

राजकुमार सोनी

रायपुर. संभव है कि देशभर में ऐसी बहुत सी तस्वीरें और खबरें इधर-उधर घूम रही होगी, लेकिन तबलीगी-फबलीगी के चक्कर में फंसे हुए लोगों ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया होगा. यह भी संभव है कि कुछ लोगों ने  ध्यान देने के लिए रिमोट का बटन दबाया हो, लेकिन हर बटन दबने के साथ ही कोई एक सिरफिरा चीखते मिला होगा तो वे कर भी क्या लेंगे. तीसरे-चौथे और पांचवे बटन के दबने पर भी जब सिरफिरे समझाइश देते मिले होंगे कि कोरोना वायरस निपट लेंगे...मगर.... ( आप समझ गए न ? )

आप भयभीत हो गए होंगे और सोचने लगे होंगे कि क्या वाकई दाढ़ी रखने और टोपी पहनने वाले हमारा सफाया कर देंगे. जबकि कोरोना काल में कौन किसको मारेगा...यह साफ नहीं है. दिल्ली एक डरावने स्वप्न का नाम है. हो सकता है कि किसी रोज देश की छाती पर चुभने वाली सफेद दाढ़ी वाले किसी बूढ़े का स्वप्न आए और हम लुढ़क जाय. दीया-बाती के युग में कुछ भी हो सकता है. बहरहाल लॉकडाउन के उजाड़ और उदास मौसम में दिल को राहत देने वाली एक खबर छत्तीसगढ़ रायपुर के देवपुरी इलाके से आई है. अपने दिल को तसल्ली दीजिए और गहरी सांस खींचकर बोलिए- ऑल इज वेल

देवपुरी में एक सांई वाटिका है. इस वाटिका में कई लोग रहते हैं जो ठीक-ठाक कमाते हैं. समय-असमय सांस्कृतिक कार्यक्रम और भंडारे का आयोजन भी करते रहते हैं. वाटिका के भीतर एक सांई मंदिर है. इस मंदिर में एक पुजारी रहता हैं. दिन-रात सेवा करता है. कभी किसी को नाराज नहीं करता. शायद उनका गांव दूर है इसलिए अब तक उसका कोई राशन कार्ड नहीं बन पाया है. इसी वाटिका में एक महिला मीनाक्षी रहती है. मीनाक्षी समय-असमय पुजारी की मदद भी करती है. वह कल भी मंदिर के पुजारी का हालचाल पूछने गई थीं. बातचीत के दौरान उसे पता चला कि पुजारी के घर का राशन खत्म हो गया है. मीनाक्षी ने यह बात पेशे से पत्रकार अपनी बहन रेणु नंदी को बताई और रेणु ने फ्रेण्ड्रस ग्रुप से जुड़े सदस्यों को. मुख्य रुप से फ्रेण्ड्रस ग्रुप को शेख तनवीर और रिजवान भाई संचालित करते हैं. इस ग्रुप का रायपुर शहर में खूब नाम है. ग्रुप के सभी सदस्य संगीत के क्षेत्र से जुड़े हैं. रिजवान भाई ने पुजारी के घर पर राशन पहुंचाने की जवाबदारी सौंपी एक ऑटो चालक हबीब खान को. हबीब खान ने खुशी-खुशी यह जवाबदारी ली और पहुंच गए चावल-दाल, तेल, नमक और साबुन- सोड़ा लेकर.

जब हबीब खान पहुंचे तो वाटिका के बहुत से लोग घबरा गए कि अरे कौन आ गया है.... लेकिन फिर बाद में सभी सहज हो गए. अब यह सवाल मत करिएगा कि वाटिका के लोग अपने पुजारी का ध्यान क्यों नहीं रख पा रहे हैं. मुमकिन है घर के भीतर खुद को बंद कर लेने वाले लोगों को इसकी जानकारी नहीं मिल पाई हो कि बाहर क्या चल रहा है. यह भी कहना ठीक नहीं होगा कि किसी को जानकारी नहीं मिली. मीनाक्षी को मालूम चला तभी तो उसने रास्ता निकाला. बहरहाल जाते-जाते हबीब खान पुजारी से कह गए हैं- और किसी चीज की जरूरत हो तो बताइगा... सब पहुंच जाएगा. सांई बाबा की इबादत करिएगा...और कहिएगा हम सब लोगों का संकट जल्द ही दूर हो. सांई...सबकी सुनते हैं.

अब थोड़ी सी बात फ्रेण्ड्रस ग्रुप को लेकर कर लेता हूं. यह ग्रुप लॉक डाउन के दूसरे दिन से दिव्यांग, कमजोर और बेसहारा लोगों के बीच पहुंच रहा है. लगभग दस दिनों तक तो इस ग्रुप के सदस्यों ने प्रतिदिन 20 हजार रुपए की सब्जियों का वितरण किया. जब भी कोई सूचना देता है कि फलां जगह कोई भूखा है. कोई प्यासा है तो ग्रुप के सदस्य राशन-पानी लेकर सेवा में हाजिर हो जाते हैं. ग्रुप के एक प्रमुख सदस्य रिजवान कहते हैं-यह सब करके हम किसी पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं. यह जीवन नेकी के कामों में इजाफे के लिए ही मिला है. हमारे दिल को अच्छा लगता है तो हम करते हैं. मुझे रिजवान भाई का नंबर मिला है. आप चाहे तो उनसे बात कर उनकी हौसला-आफजाई कर सकते हैं- 7987023845

 

- कितना भी सिर पटक लो नागपुरी संतरो... यह देश सबका है. तुम्हारी कोई भी कोशिश भाई-चारे का खात्मा नहीं कर पाएगी.

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साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल से फोन पर हाल-चाल पूछा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने

रायपुर. सामान्य तौर पर सत्ताधीश साहित्यकारों की उपेक्षा ही करते हैं, लेकिन जो राजनीतिज्ञ दूरदर्शी होते हैं वे इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि साहित्य...राजनीति के आगे चलने वाली मशाल का नाम हैं. छत्तीसगढ़ में पुराने निजाम के बदल जाने के साथ ही कई तरह के परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. फिलहाल तो छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बचाए रखने की कवायद जारी है. इधर कोरोना से प्रभावित हरेक शख्स का पूरा ख्याल रखने वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने गुरुवार को वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल से दूरभाष पर उनका हालचाल जाना. मुख्यमंत्री ने उनसे पूछा कि लॉकडाउन के दौरान उनकी दिनचर्या कैसी है?  वे क्या करते है. कुछ नई कविताएं लिख रहे हैं या नहीं ? जवाब में श्री शुक्ल ने बताया कि वे अल-सुबह उठ जाते हैं और फिर चाय-नाश्ते के बाद लिखने बैठ जाते हैं. शुक्ल ने बताया कि इस बीच उन्होंने कुछ कविताएं लिखी है. मुख्यमंत्री ने प्रसन्नता जाहिर करते हुए उनके बेहतर स्वास्थ्य और दीघार्यु होने की कामना की.

ज्ञात हो कि श्री शुक्ल यहीं रायपुर के शैलेंद्र नगर में निवास करते हैं. देश में उनकी ख्याति हिंदी के प्रसिद्ध कवि और उपन्यासकार के तौर पर हैं. उनकी एकदम भिन्न साहित्यिक शैली ने परिपाटी को तोड़ते हुए ताज़ा झोकें की तरह पाठकों को प्रभावित किया, जिसको 'जादुई-यथार्थ' के आसपास की शैली के रूप में महसूस किया जा सकता है. उनका पहला कविता संग्रह 1971 में 'लगभग जय हिन्द' नाम से प्रकाशित हुआ. 1979 में 'नौकर की कमीज़' नाम से उनका उपन्यास आया जिस पर फ़िल्मकार मणिकौल ने फिल्म भी बनाई. कई सम्मानों से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल को उपन्यास 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के लिए 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। विनोद कुमार शुक्ल हिंदी कविता के वृहत्तर परिदृश्य में अपनी विशिष्ट भाषिक बनावट और संवेदनात्मक गहराई के लिए जाने जाते हैं। वे कवि होने के साथ-साथ शीर्षस्थ कथाकार भी हैं। उनके उपन्यासों ने हिंदी में पहली बार एक मौलिक भारतीय उपन्यास की संभावना को राह दी है। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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चंदूलाल चंद्राकर के पोते ने भगवा बिग्रेड पर साधा निशाना-जो कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ राज्य बने... वे ही कर रहे हैं विरोध

रायपुर. छत्तीसगढ़ में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को अब देश के मूर्धन्य पत्रकार रहे चंदूलाल चंद्राकर के नाम कर दिया गया है. इस नामकरण के बाद ऐसे लोग विरोध में उतर आए हैं जिन्होंने विश्वविद्यालय परिसर को बांटने, छांटने और काटने वाली वैचारिक दुकान में तब्दील कर रखा था. बताते हैं कि परिसर में ऐसे-ऐसे लोगों का जमावड़ा होता था ( शायद अब भी हो... क्योंकि वहां ऐसे लोग तैनात हैं.) जिनका एकमात्र लक्ष्य छात्र-छात्राओं के बीच वैमनस्य का बीज बांटना था. भाजपा शासनकाल के 15 सालों में यहां कई तरह के विचारक यहां अपना ज्ञान बघारने के लिए आते रहे. इन विचारकों में से अधिकतर का लक्ष्य अलगाव को बढ़ावा देना था. एक तरह से यह विश्वविद्यालय नफरत की राजनीति करने वालों का केंद्र बन गया था. इधर कतिपय लोगों के विरोध के बीच चंदूलाल चंद्राकर के पोते अमित चंद्राकर ने फेसबुक पर एक पोस्ट साक्षा की है. इस पोस्ट पर उन्होंने भगवा बिग्रेड पर निशाना साधते हुए कहा है कि जो लोग कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण हो... वे ही विरोध की राजनीति कर रहे हैं.

अमित चंद्राकर ने लिखा है- जो लोग विश्वविद्यालय के नए नामकरण का विरोध कर रहे हैं उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि घर के जिस पते पर वे छत्तीसगढ़ को लिखते हैं वह चंदूलाल चंद्राकर की ही देन है. वे पहले ऐसे भारतीय पत्रकार थे जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन का इंटरव्यूह लिया था. वर्ष 1946 से 47 तक उन्हें नई दिल्ली के बिरला हाउस में महात्मा गांधी के व्याख्यान को कव्हर करने की जिम्मेदारी दी गई थीं. आज से चालीस साल पहले ही उन्होंने लगभग 148 देशों की यात्राएं की थीं. उन्हें देश-दुनिया की गहन जानकारी थीं. वर्ष 1995 में जब उनका देहांत हुआ तब भाजपा के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी की आंखे नम थीं. वाजपेयी ने संसद में कहा था- देश ने ऐसा नेता खो दिया है जिसकी भरपाई शायद ही हो पाए. अमित चंद्राकर ने अपना मोर्चा डॉट कॉम से भी बातचीत में कहा कि चंदूलाल चंद्राकर के नाम के विरोध के पीछे नफरत की राजनीति को बढ़ावा देने वाले तत्व सक्रिय है. ऐसे तत्वों को बेनकाब करना बेहद जरूरी है.

कौन है कुशाभाऊ ठाकरे ?

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे कुशाभाऊ ठाकरे का जन्म मध्यप्रदेश के धार जिले में हुआ था. उनकी शिक्षा-दीक्षा भी छत्तीसगढ़ में नहीं हुई थीं. वे लंबे समय तक संघ के प्रचारक थे और फिर जब भाजपा के शीर्ष पद पर पहुंचे तो संगठन के काम को बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ आया करते थे. सोशल मीडिया में लोग कुशाभाऊ ठाकरे के पत्रकारिता में दिए गए योगदान को लेकर सवाल उठा रहे हैं. एक फेसबुक पोस्ट है जिसमें लिखा है- मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी हूं. मुझसे आज तक किसी भी प्राध्यापक ने नहीं कहा कि बेटा जीवन में अगर कभी कुछ बनना है तो कुशाभाऊ ठाकरे जैसा पत्रकार बनना.

क्या कुलपति को हटाया जाएगा ?

विश्वविद्यालय के नए कुलपति बलदेव शर्मा को एक खास तरह के विचारक भारतीयता के पोषक तत्व के रुप में प्रचारित करते हैं. श्री शर्मा संघ के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक रहे हैं. हालांकि अपनी तैनाती के बाद बलदेव शर्मा ने मीडिया से कहा है- कुलपति किसी पार्टी का नहीं होता. अब उनका एकमात्र लक्ष्य शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ावा देना है. अब यह कैसे और किस तरह से संभव हो पाएगा यह भविष्य की बात है, लेकिन इधर छत्तीसगढ़ सरकार ने विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्तियों को लेकर नया नियम-कानून बना लिया है इसलिए राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा चल पड़ी है कि जल्द ही कुलपति को हटा दिया जाएगा. इसके साथ ही विश्वविद्यालय में नफरत की विचारधारा को बढ़ावा देने वाले प्राध्यापकों पर भी गाज गिर सकती है. बताते हैं कि विश्वविद्यालय में एक ऐसा प्राध्यापक भी तैनात है जो एक संगठन का प्रमुख पदाधिकारी है. कुलपति के पदभार ग्रहण के दौरान विश्वविद्यालय में एक खास दल और उनसे जुड़े लोगों के शक्ति प्रदर्शन को लेकर भी कई तरह की बातें हो रही हैं. पदभार समारोह के दौरान कुछ खबरची लोग भी मौजूद थे. उनका कहना है- पदभार समारोह को देखकर लग रहा था जैसे नेताजी बारात लेकर आ गए हैं. जोरदार ढंग के तमाशे और नारों के बीच खबरची को फिल्म चाइना गेट के जगीरा का संवाद भी याद आ रहा था- हमसे न भिंडियो... मेरे मन को भाया... तो मैं कुत्ता काट के खाया. खबरची के कहने का पूरा भाव यहीं था कि कुछ लोग यह सोचकर धक्का-मुक्की और नारेबाजी कर रहे थे जैसे उन्होंने बहुत बड़ी जंग जीत ली है.

 

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