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जब मीडिया ही सिटिज़न के खिलाफ हो जाए, तो फिर सिटिज़न को मीडिया बनना ही पड़ेगा.

 रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार के दौरान रवीश कुमार के भाषण का प्रमुख अंश 

दुनियाभर में सूरज की आग में जलते लोकतंत्र को चांद की ठंडक चाहिए. यह ठंडक आएगी सूचनाओं की पवित्रता और साहसिकता से, न कि नेताओं की ऊंची आवाज़ से. सूचना जितनी पवित्र होगी, नागरिकों के बीच भरोसा उतना ही गहरा होगा. देश सही सूचनाओं से बनता है. फेक न्यूज़, प्रोपेगंडा और झूठे इतिहास से भीड़ बनती है. रैमॉन मैगसेसे फाउंडेशन का शुक्रिया, मुझे हिन्दी में बोलने का मौका दिया, वरना मेरी मां समझ ही नहीं पातीं, कि क्या बोल रहा हूं. आपके पास अंग्रेज़ी में अनुवाद है और यहां सब-टाइटल हैं.

दो महीने पहले जब मैं ‘Prime Time’ की तैयारी में डूबा था, तभी सेलफोन पर फोन आया. कॉलर आईडी पर फिलीपीन्स फ्लैश कर रहा था. मुझे लगा कि किसी ट्रोल ने फोन किया है. यहां के नंबर से मुझे बहुत ट्रोल किया जाता है. अगर वाकई वे सारे ट्रोल यहीं रहते हैं, तो उनका भी स्वागत है, मैं आ गया हूं.

ख़ैर, फिलीपीन्स के नंबर को उठाने से पहले अपने सहयोगियों से कहा कि ट्रोल की भाषा सुनाता हूं. मैंने फोन को स्पीकर फोन पर ऑन किया, लेकिन अच्छी-सी अंग्रेज़ी में एक महिला की आवाज़ थी, “May I please speak to Mr Ravish Kumar…?” हज़ारों ट्रोल में एक भी महिला की आवाज़ नहीं थी. मैंने फोन को स्पीकर फोन से हटा लिया. उस तरफ से आ रही आवाज़ मुझसे पूछ रही थी कि मुझे इस साल का रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार दिया जा रहा है. मैं नहीं आया हूं, मेरी साथ पूरी हिन्दी पत्रकारिता आई है, जिसकी हालत इन दिनों बहुत शर्मनाक है. गणेश शंकर विद्यार्थी और पीर मूनिस मोहम्मद की साहस वाली पत्रकारिता आज डरी-डरी-सी है. उसमें कोई दम नहीं है. अब मैं अपने विषय पर आता हूं.

 

यह समय नागरिक होने के इम्तिहान का है. नागरिकता को फिर से समझने का है और उसके लिए लड़ने का है. यह जानते हुए कि इस समय में नागरिकता पर चौतरफा हमला हो रहे हैं और सत्ता की निगरानी बढ़ती जा रही है, एक व्यक्ति और एक समूह के तौर पर जो इस हमले से ख़ुद को बचा लेगा और इस लड़ाई में मांज लेगा, वही नागरिक भविष्य के बेहतर समाज और सरकार की नई बुनियाद रखेगा. दुनिया ऐसे नागरिकों की ज़िद से भरी हुई है. नफ़रत के माहौल और सूचनाओं के सूखे में कोई है, जो इस रेगिस्तान में कैक्टस के फूल की तरह खिला हुआ है. रेत में खड़ा पेड़ कभी यह नहीं सोचता कि उसके यहां होने का क्या मतलब है, वह दूसरों के लिए खड़ा होता है, ताकि पता चले कि रेत में भी हरियाली होती है. जहां कहीं भी लोकतंत्र हरे-भरे मैदान से रेगिस्तान में सबवर्ट किया जा रहा है, वहां आज नागरिक होने और सूचना पर उसके अधिकारी होने की लड़ाई थोड़ी मुश्किल ज़रूर हो गई है. मगर असंभव नहीं है.

 

नागरिकता के लिए ज़रूरी है कि सूचनाओं की स्वतंत्रता और प्रामाणिकता हो. आज स्टेट का मीडिया और उसके बिज़नेस पर पूरा कंट्रोल हो चुका है. मीडिया पर कंट्रोल का मतलब है, आपकी नागरिकता का दायरा छोटा हो जाना. मीडिया अब सर्वेलान्स स्टेट का पार्ट है. वह अब फोर्थ एस्टेट नहीं है, बल्कि फर्स्ट एस्टेट है. प्राइवेट मीडिया और गर्वनमेंट मीडिया का अंतर मिट गया है. इसका काम ओपिनियन को डायवर्सिफाई नहीं करना है, बल्कि कंट्रोल करना है. ऐसा भारत सहित दुनिया के कई देशों में हो रहा है.

 

न्यूज़ चैनलों की डिबेट की भाषा लगातार लोगों को राष्ट्रवाद के दायरे से बाहर निकालती रहती है. इतिहास और सामूहिक स्मृतियों को हटाकर उनकी जगह एक पार्टी का राष्ट्र और इतिहास लोगों पर थोपा जा रहा है. मीडिया की भाषा में दो तरह के नागरिक हैं – एक, नेशनल और दूसरा, एन्टी-नेशनल. एन्टी नेशनल वह है, जो सवाल करता है, असहमति रखता है. असहमति लोकतंत्र और नागरिकता की आत्मा है. उस आत्मा पर रोज़ हमला होता है. जब नागरिकता ख़तरे में हो या उसका मतलब ही बदल दिया जाए, तब उस नागरिक की पत्रकारिता कैसी होगी. नागरिक तो दोनों हैं. जो ख़ुद को नेशनल कहता है, और जो एन्टी-नेशनल कहा जाता है.

 

दुनिया के कई देशों में यह स्टेट सिस्टम, जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है, और लोगों के बीच लेजिटिमाइज़ हो चुका है. फिर भी हम कश्मीर और हांगकांग के उदाहरण से समझ सकते हैं कि लोगों के बीच लोकतंत्र और नागरिकता की क्लासिक समझ अभी भी बची हुई है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं. आख़िर क्यों हांगकांग में लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले लाखों लोगों का सोशल मीडिया पर विश्वास नहीं रहा. उन्हें उस भाषा पर भी विश्वास नहीं रहा, जिसे सरकारें जानती हैं. इसलिए उन्होंने अपनी नई भाषा गढ़ी और उसमें आंदोलन की रणनीति को कम्युनिकेट किया. यह नागरिक होने की रचनात्मक लड़ाई है. हांगकांग के नागरिक अपने अधिकारों को बचाने के लिए उन जगहों के समानांतर नई जगह पैदा कर रहे हैं, जहां लाखों लोग नए तरीके से बात करते हैं, नए तरीके से लड़ते हैं और पल भर में जमा हो जाते हैं. अपना ऐप बना लिया और मेट्रो के इलेक्ट्रॉनिक टिकट ख़रीदने की रणनीति बदल ली. फोन के सिमकार्ड का इस्तेमाल बदल लिया. कंट्रोल के इन सामानों को नागरिकों ने कबाड़ में बदल दिया. यह प्रोसेस बता रहा है कि स्टेट ने नागरिकता की लड़ाई अभी पूरी तरह नहीं जीती है. हांगकांग के लोग सूचना संसार के आधिकारिक नेटवर्क से ख़ुद ही अलग हो गए.

 

कश्मीर में दूसरी कहानी है. वहां कई दिनों के लिए सूचना तंत्र बंद कर दिया गया. एक करोड़ से अधिक की आबादी को सरकार ने सूचना संसार से अलग कर दिया. इंटरनेट शटडाउन हो गया. मोबाइल फोन बंद हो गए. सरकार के अधिकारी प्रेस का काम करने लगे और प्रेस के लोग सरकार का काम करने लग गए. क्या आप बग़ैर कम्युनिकेशन और इन्फॉरमेशन के सिटिज़न की कल्पना कर सकते हैं…? क्या होगा, जब मीडिया, जिसका काम सूचना जुटाना है, सूचना के तमाम नेटवर्क के बंद होने का समर्थन करने लगे, और वह उस सिटिज़न के खिलाफ हो जाए, जो अपने स्तर पर सूचना ला रहा है या ला रही है या सूचना की मांग कर रहा है.

 

यह उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के सारे पड़ोसी प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में निचले पायदान पर हैं. पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और भारत. नीचे की रैंकिंग में भी ये पड़ोसी हैं. पाकिस्तान में एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी है, जो अपने न्यूज़ चैनलों को निर्देश देता है कि कश्मीर पर किस तरह से प्रोपेगंडा करना है. कैसे रिपोर्टिंग करनी है. इसे वैसे तो सरकारी भाषा में सलाह कहते हैं, मगर होता यह निर्देश ही है. बताया जाता है कि कैसे 15 अगस्त के दिन स्क्रीन को खाली रखना है, ताकि वे कश्मीर के समर्थन में काला दिवस मना सकें. जिसकी समस्या का पाकिस्तान भी एक बड़ा कारण है.

 

दूसरी तरफ, जब ‘कश्मीर टाइम्स’ की अनुराधा भसीन भारत के सुप्रीम कोर्ट जाती हैं, तो उनके खिलाफ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया कोर्ट चला जाता है. यह कहने कि कश्मीर घाटी में मीडिया पर लगे बैन का वह समर्थन करता है. मेरी राय में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी का दफ्तर एक ही बिल्डिंग में होना चाहिए. गनीमत है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कश्मीर में मीडिया पर लगी रोक की निंदा की और प्रेस कांउंसिल ऑफ इंडिया की भी आलोचना की. पी.सी.आई. बाद में स्वतंत्रता के साथ हो गया. दोनों देशों के नागरिकों को सोचना चाहिए, लोकतंत्र एक सीरियस बिज़नेस है. प्रोपेगंडा के ज़रिये क्या वह एक दूसरे में भरोसा पैदा कर पाएंगे…? होली नहीं है कि इधर से गुब्बारा मारा, तो उधर से गुब्बारा मार दिया. वैसे, भारत के न्यूज़ चैनल परमाणु हमले के समय बचने की तैयारी का लेक्चर दे रहे हैं. बता रहे हैं कि परमाणु हमले के वक्त बेसमेंट में छिप जाएं. आप हंसें नहीं. वे अपना काम काफी सीरियसली कर रहे हैं.

 

अब आप इस संदर्भ में आज के विषय के टॉपिक को फ्रेम कीजिए. यह तो वही मीडिया है, जिसने अपने खर्चे में कटौती के लिए ‘सिटिज़न जर्नलिज़्म’ को गढ़ना शुरू किया था. इसके ज़रिये मीडिया ने अपने रिस्क को आउटसोर्स कर दिया. मेनस्ट्रीम मीडिया के भीतर सिटिज़न जर्नलिज़्म और मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर के सिटिज़न जर्नलिज़्म दोनों अलग चीज़ें हैं. लेकिन जब सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में लोग सवाल करने लगे, तो यही मीडिया सोशल मीडिया के खिलाफ हो गया. न्यूज़रूम के भीतर ब्लॉग और वेबसाइट बंद किए जाने लगे. आज भी कई सारे न्यूज़रूम में पत्रकारों को पर्सनल ओपिनियन लिखने की अनुमति नहीं है. यह अलग बात है कि उसी दौरान बगदाद बर्निंग ब्लॉग के ज़रिये 24 साल की छात्रा रिवरबेंड (असल नाम सार्वजनिक नहीं किया गया) की इराक पर हुए हमले, युद्ध और तबाही की रोज की स्थिति ब्लॉग पोस्ट की शक्ल में आ रही थी और जिसे साल 2005 में ‘Baghdad Burning: Girl Blog from Iraq’ शीर्षक से किताब की शक्ल में पेश किया गया, तो दुनिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने माना कि जो काम सोशल मीडिया के ज़रिये एक लड़की ने किया, वह हमारे पत्रकार भी नहीं कर पाते. यह सिटिजन ज़र्नलिज़्म है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर हुआ.

 

आज कोई लड़की कश्मीर में ‘बगदाद बर्निंग’ की तरह ब्लॉग लिख दे, तो मेनस्ट्रीम मीडिया उसे एन्टी-नेशनल बताने लगेगा. मीडिया लगातार सिटिज़न जर्नलिज़्म के स्पेस को एन्टी-नेशनल के नाम पर डि-लेजिटिमाइज़ करने लगा है, क्योंकि उसका इंटरेस्ट अब जर्नलिज़्म में नहीं है. ज़र्नलिज़्म के नाम पर मीडिया स्टेट का कम्प्राडोर है, एजेंट है. मेरे ख़्याल से सिटिज़न ज़र्नलिज़्म की कल्पना का बीज इसी वक्त के लिए है, जब मीडिया या मेनस्ट्रीम जर्नलिज़्म सूचना के खिलाफ हो जाए. उसे हर वह आदमी देश के खिलाफ नज़र आने लगे, जो सूचना पाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है. मेनस्ट्रीम मीडिया नागरिकों को सूचना से वंचित करने लगे. असमहति की आवाज़ को गद्दार कहने लगे. इसीलिए यह टेस्टिंग टाइम है.

 

जब मीडिया ही सिटिज़न के खिलाफ हो जाए, तो फिर सिटिज़न को मीडिया बनना ही पड़ेगा. यह जानते हुए कि स्टेट कंट्रोल के इस दौर में सिटिज़न और सिटिज़न जर्नलिज़्म दोनों के ख़तरे बहुत बड़े हैं और सफ़लता बहुत दूर नज़र आती है. उसके लिए स्टेट के भीतर से इन्फॉरमेशन हासिल करने के दरवाज़े पूरी तरह बंद हैं. मेनस्ट्रीम मीडिया सिटिज़न जर्नलिज़्म में कॉस्ट कटिंग और प्रॉफिट का स्कोप बनाना चाहता है और इसके लिए उसका सरकार का PR होना ज़रूरी है. सिटिज़न जर्नलिज़्म संघर्ष कर रहा है कि कैसे वह जनता के सपोर्ट पर सरकार और विज्ञापन के जाल से बाहर रह सके.

 

भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया पढ़े-लिखे नागरिकों को दिन-रात पोस्ट-इलिटरेट करने में लगा है. वह अंधविश्वास से घिरे नागरिकों को सचेत और समर्थ नागरिक बनाने का प्रयास छोड़ चुका है. अंध-राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता उसके सिलेबस का हिस्सा हैं.

 

यह स्टेट के नैरेटिव को पवित्र-सूचना (प्योर इन्फॉरमेशन) मानने लगा है. अगर आप इस मीडिया के ज़रिये किसी डेमोक्रेसी को समझने का प्रयास करेंगे, तो यह एक ऐसे लोकतंत्र की तस्वीर बनाता है, जहां सारी सूचनाओं का रंग एक है. यह रंग सत्ता के रंग से मेल खाता है. कई सौ चैनल हैं, मगर सारे चैनलों पर एक ही अंदाज़ में एक ही प्रकार की सूचना है. एक तरह से सवाल फ्रेम किए जा रहे हैं, ताकि सूचना के नाम पर धारणा फैलाई जा सके. इन्फॉरमेशन में धारणा ही सूचना है. (perception is the new information), जिसमें हर दिन नागरिकों को डराया जाता है, उनके बीच असुरक्षा पैदा की जाती है कि बोलने पर आपके अधिकार ले लिए जाएंगे. इस मीडिया के लिए विपक्ष एक गंदा शब्द है.

 

जब मेनस्ट्रीम मीडिया में विपक्ष और असहमति गाली बन जाए, तब असली संकट नागरिक पर ही आता है. दुर्भाग्य से इस काम में न्यूज़ चैनलों की आवाज़ सबसे कर्कश और ऊंची है. एंकर अब बोलता नहीं है, चीखता है.

 

भारत में बहुत कुछ शानदार है, एक महान देश है, उसकी उपलब्धियां आज भी दुनिया के सामने नज़ीर हैं, लेकिन इसके मेनस्ट्रीम और TV मीडिया का ज़्यादतर हिस्सा गटर हो गया है. भारत के नागरिकों में लोकतंत्र का जज़्बा बहुत ख़ूब है, लेकिन न्यूज़ चैनलों का मीडिया उस जज़्बे को हर रात कुचलने आ जाता है. भारत में शाम तो सूरज डूबने से होती है, लेकिन रात का अंधेरा न्यूज चैनलों पर प्रसारित ख़बरों से फैलता है.

 

भारत में लोगों के बीच लोकतंत्र ख़ूब ज़िंदा है. हर दिन सरकार के खिलाफ ज़ोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं, मगर मीडिया अब इन प्रदर्शनों की स्क्रीनिंग करने लगा है. इनकी अब ख़बरें नहीं बनती. उसके लिए प्रदर्शन करना, एक फालतू काम है. बगैर डेमॉन्स्ट्रेशन के कोई भी डेमोक्रेसी डेमोक्रेसी नहीं हो सकती है. इन प्रदर्शनों में शामिल लाखों लोग अब खुद वीडियो बनाने लगे हैं. फोन से बनाए गए उस वीडियो में खुद ही रिपोर्टर बन जाते हैं और घटनास्थल का ब्योरा देने लगते हैं, जिसे बाद में प्रदर्शन में आए लोगों के व्हॉट्सऐप ग्रुप में चलाया जाता है. इन्फॉरमेशन का मीडिया उन्हें जिस नागरिकता का पाठ पढ़ा रहा है, उसमें नागरिक का मतलब यह नहीं कि वह सरकार के खिलाफ नारेबाज़ी करे. इसलिए नागरिक अपने होने का मतलब बचाए रखने के लिए व्हॉट्सएप ग्रुप के लिए वीडियो बना रहा है. आंदोलन करने वाले सिटिज़न जर्नलिज़्म करने लगते हैं. अपना वीडियो बनाकर यूट्यूब पर डालने लगते हैं.

 

जब स्टेट और मीडिया एक होकर सिटिज़न को कंट्रोल करने लगें, तब क्या कोई सिटिज़न जर्नलिस्ट के रूप में एक्ट कर सकता है…? सिटिज़न बने रहने और उसके अधिकारों को एक्सरसाइज़ करने के लिए ईको-सिस्टम भी उसी डेमोक्रेसी को प्रोवाइड कराना होता है. अगर कोर्ट, पुलिस और मीडिया होस्टाइल हो जाएं, फिर सोसायटी का वह हिस्सा, जो स्टेट बन चुका है, आपको एक्सक्लूड करने लगे, तो हर तरह से निहत्था होकर एक नागरिक किस हद तक लड़ सकता है…? नागरिक फिर भी लड़ रहा है.

 

मुझे हर दिन व्हॉट्सएप पर 500 से 1,000 मैसेज आते हैं. कभी-कभी यह संख्या ज़्यादा भी होती है. हर दूसरे मैसेज में लोग अपनी समस्या के साथ पत्रकारिता का मतलब भी लिखते हैं. मेनस्ट्रीम न्यूज़ मीडिया भले ही पत्रकारिता भूल गया है, लेकिन जनता को याद है कि पत्रकारिता की परिभाषा कैसी होनी चाहिए. जब भी मैं अपना व्हॉट्सएप खोलता हूं, यह देखने के लिए कि मेरे ऑफिस के ग्रुप में किस तरह की सूचना आई है, मैं वहां तक पहुंच ही नहीं पाता. मैं हज़ारों लोगों की सूचना को देखने में ही उलझ जाता हूं, इसलिए मैं अपने व्हॉट्सएप को पब्लिक न्यूज़रूम कहता हूं. देशभर में मेरे नंबर को ट्रोल ने वायरल किया कि मुझे गाली दी जाए. गालियां आईं, धमकियां भी आईं. आ रही हैं, लेकिन उसी नंबर पर लोग भी आए. अपनी और इलाके की ख़बरों को लेकर. ये वे ख़बरें हैं, जो न्यूज़ चैनलों की परिभाषा के हिसाब से ख़त्म हो चुकी हैं, मगर उन्हीं चैनलों को देखने वाले ये लोग जब ख़ुद परेशानी में पड़ते हैं, तो उन्हें पत्रकार का मतलब पता होता है. उनके ज़हन से पत्रकारिता का मतलब अभी समाप्त नहीं हुआ है.

 

जब रूलिंग पार्टी ने मेरे शो का बहिष्कार किया था, तब मेरे सारे रास्ते बंद हो गए थे. उस समय यही वे लोग थे, जिन्होंने अपनी समस्याओं से मेरे शो को भर दिया. जिस मेनस्ट्रीम मीडिया ने सिटिज़न जर्नलिज़्म के नाम पर ज़र्नलिज़्म और सत्ता के खिलाफ बोलने वाले तक को आउटसोर्स किया था, जिससे लोगों के बीच मीडिया का भ्रम बना रहे, सिटिज़न के इस समूह ने मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया में सिटिज़न जर्नलिस्ट बना दिया. मीडिया का यही भविष्य होना है. उसके पत्रकारों को सिटिज़िन जर्नलिस्ट बनना है, ताकि लोग सिटिज़न बन सकें.

 

ठीक उसी समय में, जब न्यूज़ चैनलों से आम लोग ग़ायब कर दिए गए, और उन पर डिबेट शो के ज़रिये पोलिटिकल एजेंडा थोपा जाने लगा, एक तरह के नैरेटिव से लोगों को घेरा जाने लगा, उसी समय में लोग इस घेरे को तोड़ने का प्रयास भी कर रहे थे. गालियों और धमकियों के बीच ऐसे मैसेज की संख्या बढ़ने लगी, जिनमें लोग सरकार से डिमांड कर रहे थे. मैं लोगों की समस्याओं से ट्रोल किया जाने लगा. क्या आप नहीं बोलेंगे, क्या आप सरकार से डरते हैं…? मैंने उन्हें सुनना शुरू कर दिया.

 

‘Prime Time’ का मिजाज़ (नेचर) बदल गया. हज़ारों नौजवानों के मैसेज आने लगे कि सेंट्रल गर्वनमेंट और स्टेट गर्वनमेंट सरकारी नौकरी की परीक्षा दो से तीन साल में भी पूरी नहीं करती हैं. जिन परीक्षाओं के रिज़ल्ट आ जाते हैं, उनमें भी अप्वाइंटमेंट लेटर जारी नहीं करती हैं. अगर मैं सारी परीक्षाओं में शामिल नौजवानों की संख्या का हिसाब लगाऊं, तो रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहे नौजवानों की संख्या एक करोड़ तक चली जाती है. ‘Prime Time’ की ‘जॉब सीरीज़’ का असर होने लगा और देखते-देखते कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले और अप्वाइंटमेंट लेटर मिला. जिस स्टेट से मैं आता हूं, वहां 2014 की परीक्षा का परिणाम 2018 तक नहीं आया था. बस मेरा व्हॉट्सऐप नंबर पब्लिक न्यूज़रूम में बदल गया. सरकार और पार्टी सिस्टम में जब मेरे सीक्रेट सोर्स किनारा करने लगे, तब पब्लिक मेरे लिए ओपन सोर्स बन गई.

 

‘Prime Time’ अक्सर लोगों के भेजे गए मैसेज के आधार पर बनने लगा है. ये व्हॉट्सऐप का रिवर्स इस्तेमाल था. एक तरफ राजनीतिक दल का आईटी सेल लाखों की संख्या में सांप्रदायिकता और ज़ेनोफोबिया फैलाने वाले मैसेज जा रहे थे, तो दूसरी तरफ से असली ख़बरों के मैसेज मुझ तक पहुंच रहे थे. मेरा न्यूज़रूम NDTV के न्यूज़रूम से शिफ्ट होकर लोगों के बीच चला गया है. यही भारत के लोकतंत्र की उम्मीद हैं, क्योंकि इन्होंने न तो सरकार से उम्मीद छोड़ी है और न ही सरकार से सवाल करने का रास्ता अभी बंद किया है. तभी तो वे मेनस्ट्रीम में अपने लिए खिड़की ढूंढ रहे हैं. जब यूनिवर्सिटी की रैंकिंग के झूठे सपने दिखाए जा रहे थे, तब कॉलेजों के छात्र अपने क्लासरूम और टीचर की संख्या मुझे भेजने लगे. 10,000 छात्रों पर 10-20 शिक्षकों वाले कॉलेज तक मैं कैसे पहुंच पाता, अगर लोग नहीं आते. जर्नलिज़्म इज़ नेवर कम्प्लीट विदाउट सिटिज़न एंड सिटिज़नशिप. मीडिया जिस दौर में स्टेट के हिसाब से सिटिज़न को डिफाइन कर रहा था, उसी दौर में सिटिज़न अपने हिसाब से मुझे डिफाइन करने लगे. डेमोक्रेसी में उम्मीदों के कैक्टस के फूल खिलने लगे.

 

मुझे चंडीगढ़ की उस लड़की का मैसेज अब भी याद है. वह ‘Prime Time’ देख रही थी और उसके पिता TV बंद कर रहे थे. उसने अपने पिता की बात नहीं मानी और ‘Prime Time’ देखा. वह भारत के लोकतंत्र की सिटिज़न है. जब तक वह लड़की है, लोकतंत्र अपनी चुनौतियों को पार कर लेगा. उन बहुत से लोगों का ज़िक्र करना चाहता हूं, जिन्होंने पहले ट्रोल किया, गालियां दीं, मगर बाद में ख़ुद लिखकर मुझसे माफ़ी मांगी. अगर मुझे लाखों गालियां आई हैं, तो मेरे पास ऐसे हज़ारों मैसेज भी आए हैं. महाराष्ट्र के उस लड़के का मैसेज याद है, जो अपनी दुकान पर TV पर चल रहे नफरत वाले डिबेट से घबरा उठता है और अकेले कहीं जा बैठता है. जब घर में वह मेरा शो चलाता है, तो उसके पिता और भाई बंद कर देते हैं कि मैं देशद्रोही हूं. मेनस्ट्रीम मीडिया और आईटी सेल ने मेरे खिलाफ यह कैम्पेन चलाया है. आप समझ सकते हैं कि इस तरह के कैम्पेन से घरों में स्क्रीनिंग होने लगी है.

 

यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि आज सिटिज़न जर्नलिस्ट होने के लिए आपको स्टेट और स्टेट की तरह बर्ताव करने वाले सिटिज़न से भी जूझना होगा. चुनौती सिर्फ स्टेट नहीं है, स्टेट जैसे हो चुके लोग भी हैं. सांप्रदायिकता और अंध-राष्ट्रवाद से लैस भीड़ के बीच दूसरे नागरिक भी डर जाते हैं. उनका जोखिम बढ़ जाता है. आपको अपने मोबाइल पर यह मैसेज देखकर घर से निकलना होता है कि मैसेज भेजने वाला मुझे लिंच कर देना चाहता है. आज का सिटिज़न दोहरे दबाव में हैं. उसके सामने चुनौती है कि वह इस मीडिया से कैसे लड़े. जो दिन-रात उसी के नाम पर अपना धंधा करता है.

 

हम इस मोड़ पर हैं, जहां लोगों को सरकार तक पहुंचने के लिए मीडिया के बैरिकेड से लड़ना ही होगा. वर्ना उसकी आवाज़ व्हॉट्सऐप के इनबॉक्स में घूमती रह जाएगी. पहले लोगों को नागरिक बनना होगा, फिर स्टेट को बताना होगा कि उसका एक काम यह भी है कि वह हमारी नागरिकता के लिए ज़रूरी निर्भीकता का माहौल बनाए. स्टेट को क्वेश्चन करने का माहौल बनाने की ज़िम्मेदारी भी सरकार की है. एक सरकार का मूल्यांकन आप तभी कर सकते हैं, जब उसके दौर में मीडिया स्वतंत्र हो. इन्फॉरमेशन के बाद अब अगला अटैक इतिहास पर हो रहा है, जिससे हमें ताकत मिलती है, प्रेरणा मिलती है. उस इतिहास को छीना जा रहा है.

 

आज़ादी के समय भी तो ऐसा ही था. बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, डॉ अम्बेडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी, पीर मुहम्मद मूनिस – अनगिनत नाम हैं. ये सब सिटिज़न जर्नलिस्ट थे. 1917 ईस्वी में चंपारण सत्याग्रह के समय महात्मा गांधी ने कुछ दिनों के लिए प्रेस को आने से रोक दिया. उन्हें पत्र लिखा कि आप चंपारण सत्याग्रह से दूर रहें. गांधी ख़ुद किसानों से उनकी बात सुनने लगे. चंपारण में गांधी के आस-पास पब्लिक न्यूज़रूम बनाकर बैठ गई. वह अपनी शिकायतें प्रमाण के साथ उन्हें बताने लगी. उसके बाद भारत की आज़ादी की लड़ाई का इतिहास आप सबके सामने है.

 

मैं ऐसे किसी दौर या देश को नहीं जानता, जो ख़बरों के बग़ैर धड़क सकता है. किसी भी देश को ज़िंदादिल होने के लिए सूचनाओं की प्रामाणिकता बहुत ज़रूरी है. सूचनाएं सही और प्रामाणिक नहीं होंगी, तो नागरिकों के बीच का भरोसा कमज़ोर होगा. इसलिए एक बार फिर सिटिज़न जर्नलिज़्म की ज़रूरत तेज़ हो गई है. वह सिटिजन जर्नलिज्म, जो मेनस्ट्रीम मीडिया की कारोबारी स्ट्रेटेजी से अलग है. इस हताशा की स्थिति में भी कई लोग इस गैप को भर रहे हैं. कॉमेडी से लेकर इन्डिविजुअल यूट्यूब शो के ज़रिये सिटिजिन जर्नलिज़्म के एसेंस को ज़िंदा किए हुए हैं. उनकी ताकत का असर यह है कि भारत के लोकतंत्र में अभी सब कुछ एकतरफा नहीं हुआ है. जनता सूचना के क्षेत्र में अपने स्पेस की लड़ाई लड़ रही है, भले ही वह जीत नहीं पाई है.

 

महात्मा गांधी ने 12 अप्रैल, 1947 की प्रार्थनासभा में अख़बारों को लेकर एक बात कही थी. आज के डिवाइसिव मीडिया के लिए उनके प्रवचन काम आ सकते हैं. गांधी ने एक बड़े अख़बार के बारे में कहा, जिसमें ख़बर छपी थी कि कांग्रेस की वर्किंग कमेटी में अब गांधी की कोई नहीं सुनता है. गांधी ने कहा था कि यदि अख़बार दुरुस्त नहीं रहेंगे, तो फिर हिन्दुस्तान की आज़ादी किस काम की. आज अख़बार डर गए हैं. वे अपनी आलोचना को देश की आलोचना बना देते हैं, जबकि मैं मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर न्यूज़ चैनलों की आलोचना अपने महान देश के हित के लिए ही कर रहा हूं. गांधी ने कहा था – आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें. कुछ ख़बर सुननी हो, तो एक दूसरे से पूछ लें. अगर पढ़ना ही चाहें, तो सोच-समझकर अख़बार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों. जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों. भारत के अखबारों और चैनलों में हिन्दू-मुसलमान को लड़ाने-भड़काने की पत्रकारिता हो रही है. गांधी होते, तो यही कहते, जो उन्होंने 12 अप्रैल, 1947 को कहा था और जिसे मैं यहां आज दोहरा रहा हूं.

 

आज बड़े पैमाने पर सिटिज़न जर्नलिस्ट की ज़रूरत है, लेकिन उससे भी ज्यादा ज़रूत है सिटिज़न डेमोक्रेटिक की…

 

DEMOCRACY NEED MORE CITIZEN JOURNALISTS, MORE THAN THAT, DEMOCRACY NEEDS DEMOCRATIC CITIZEN .

 

मैं NDTV के करोड़ों दर्शकों का शुक्रिया अदा करता हूं. NDTV के सभी सहयोगी याद आ रहे हैं. डॉ प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने कितना कुछ सहा है. मैं हिन्दी का पत्रकार हूं, मगर मराठी, गुजराती से लेकर मलयालम और बांग्लाभाषी दर्शकों ने भी मुझे ख़ूब प्यार दिया है. मैं सबका हूं. मुझे भारत के नागरिकों ने बनाया है. मेरे इतिहास के श्रेष्ठ शिक्षक हमेशा याद आते रहेंगे. मेरे आदर्श महानतम अनुपम मिश्र को याद करना चाहता हूं, जो मनीला चंडीप्रसाद भट्ट जी के साथ आए थे. अनुपम जी बहुत ही याद आते हैं. मेरा दोस्त अनुराग यहां है. मेरी बेटियां और मेरी जीवनसाथी. मैं नॉयना के पीछे चलकर यहां तक पहुंचा हूं. काबिल स्त्रियों के पीछे चला कीजिए. अच्छा नागरिक बना कीजिए.

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क्या आप बगैर कपड़ों के गाड़ी चलाने वाले इस शख्स को जानते हैं?

राजकुमार सोनी

रायपुर. इस चित्र को गौर से देखिए...। अरे भाई... इसमें गौर से देखने लायक क्या बात है. साफ तौर पर दिख रहा है कि चित्र में नजर आने वाले शख्स ने हेलमेट पहन रखा है, लेकिन उसके कपड़े गायब है. यह शख्स कौन है? क्या करता है? इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है. बहुत से लोगों को लग रहा है बगैर कपड़ों के गाड़ी चलाने वाला जो भी है उनका अपना है. कुछ लोग इस चित्र को अश्लील और शैतानी दिमाग की उपज बता रहे हैं, लेकिन नागरिक पत्रकारिता ( सोशल मीडिया ) से जुड़े मानते हैं कि केंद्र ने जो नया ट्रैफिक नियम बनाया है वह इस चित्र से ज्यादा अश्लील और अभद्र है.

नया ट्रैफिक नियम कहता है कि आप भारत के किसी भी कोने में गाड़ी चलाने के दौरान  नियमों का उल्लंघन करते हुए पकड़े गए तो दस  गुना ज्यादा जुर्माना चुकाना पड़ेगा. सोशल मीडिया में इस जैसे हजारों-हजारों चित्रों और कमेंट के जरिए लोग ट्रैफिक के नए कठोर नियमों के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कर रहे हैं. लोगों के पास इसके अलावा और कोई दूसरा तरीका भी नहीं है. मुख्यधारा का कथित मीडिया धरती पर कीड़े-मकोड़ों सी जिंदगी व्यतीत करने वाले इंसानों को छोड़कर मोदी और चंदामामा की स्तुति में लगा है तो लोग क्या करेंगे ?आखिर उनका गुस्सा कहीं न कहीं तो निकलेगा. कोई कार्टून बनाकर विरोध प्रकट कर रहा है तो कोई सनी लियोनी की फोटो लगाकर अपना गम दूर कर रहा है. यहां हम सनी लियोनी की तस्वीर नहीं दे रहे हैं, लेकिन एक शख्स ने शिक्षक दिवस के दिन लियोन की बेहद कामुक तस्वीर को पोस्ट करते हुए  लिखा है- आपने मुझे जीना सिखाया है. मैं आपको बहुत मानता हूं.आप मेरी असली टीचर हो. बस... एक बार चालान से बचने का तरीका भी सीखा दीजिए.

अगर आप बात-बात में खानदान-खानदान और संस्कार-संस्कार चिल्लाते रहते हैं, और खुद को परमपिता परमेश्वर की शुद्ध और असली संतान मानते हैं तो शायद आपको सनी लियोनी की तस्वीर के साथ की गई यह टिप्पणी अश्लील लग सकती है, लेकिन मनोविज्ञान कहता है कि सभ्य समाज के भीतर भी अभद्रता विद्यमान रहती है. जब किसी एक का दुख सबका दुख बन जाता है तो गाली विकार निकालने का सबसे अच्छा जरिया साबित होती है.

.... तो लोग गालियां दे रहे हैं. केंद्र को दे रहे हैं. नियम-कानून बनाने वाले को दे रहे हैं. ( अब यह बताने की जरूरत नहीं है कि सबसे ज्यादा गाली किसे दी जा रही है.)

 

1- भले ही अब ज्यादातर लोग दहेज की बात नहीं करते, लेकिन ट्रैफिक कानून के बाद एक पोस्ट आई है. इस पोस्ट में लिखा है- पहली सितम्बर से दूल्हे के नए रेट- इंजीनियर का दस लाख. डाक्टर बीस लाख और ट्रैफिक हवलदार-पचास लाख.

 

2- अभिताभ बच्चन कौन बनेगा करोड़पति में - आप बहुत बड़ी राशि जीत चुके हैं. क्या कीजिएगा इतनी बड़ी धनराशि का.प्रतिभागी- जमकर ऐसी-तैसी हो गई है सर... चालान भरूंगा और क्या.

3- पति- मैं शराब पीने जा रहा हूं...। पत्नी- हां... हां... बिल्कुल जाओ... लेकिन सुनो जी... साइकिल लेकर जाना

4-अपने लड़के को छुड़वाना चाहते हो तो एक लाख रुपए लेकर आ जाओ. लड़के की मां- कमीने रुक मैं अभी पुलिस को फोन करती हूं. मैडम... हम पुलिसवाले ही बोल रहे हैं.

5-अगर किसी को श्राप देना हो तो अवश्य दीजिए. एक नया श्राप- जा हरामजादे... आज तेरा चालान कट जाय.

6-अबे सालों... अगर लोगों के पास 20-25 हजार रुपए चालान भरने के लिए होते क्या उनके बच्चे हास्पिटल में बगैर आक्सीजन के मरते ?

7-अगर कोई पुलिसवाला चालान काटे तो उसके सामने ही अपनी गाड़ी को आग लगा दो. आजकल सैंकड़हैंड गाड़ी दस-बारह हजार में मिल जाती है.

8-भक्तों... और बनाओ दढ़ियल को हीरो. जब अर्थव्यवस्था चौपट हो गई तो चालान काटकर हमारी जेब पर डाका डालने लगे. अबे अब तो सुधर जाओ कमीनों.

9- सड़क क्या तुम्हारा बाप बनाएगा. हर साल टैक्स पटाता हूं. चले हो चालान काटने. दूंगा कान के नीचे खींचकर

10- एक भक्त की अपील- पुलिसवालों ने आज मेरे परिवार की चार गाड़ियों का चालान बना दिया. एक लाख का चूना लग गया... फिर भी राष्ट्रहित में पीछे नहीं हटूंगा.... बोलो... भारत माता की जय.

सोशल मीडिया में इससे भी ज्यादा भयानक कमेंट और चित्र विचरण कर रहे हैं. फिलहाल इतने से काम चलाइए और एक बार फिर ऊपर दिए गए चित्र को गौर से देखिए....। क्या आपको लगता है कभी ऐसा आपके साथ हो सकता है. हो सकता है... क्योंकि.............. है तो मुमकिन है.

 

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की यह तस्वीर हो रही है जमकर वायरल

रायपुर. शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के जन्मदिन के मौके पर प्रदेश के असंख्य लोगों और संगठन से जुड़े लोगों ने मुलाकात की. मुख्यमंत्री निवास पर एक महिला अपने छोटे से बच्चे के साथ बधाई देने पहुंची थीं. बच्चे को देखते ही मुख्यमंत्री के चेहरे पर मुस्कान तैर गई. उसके बाद जो कुछ हुआ वह इस तस्वीर मेंं कैद है. छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध छायाकार गोकुल सोनी की यह तस्वीर सोशल मीडिया मेंं जमकर वायरल हो रही है. तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया में कई तरह की टिप्पणियां लिखी गई है. एक पाठक ने लिखा है- भविष्य सुरक्षित हाथों मेंं. एक पाठक की टिप्पणी है- वर्तमान और भविष्य साथ-साथ.
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भ्रम फैलाना ठीक नहीं... तेल और कोयले की कीमत में इजाफे के चलते उपभोक्ताओं पर लगा है वीसीए चार्ज

रायपुर. छत्तीसगढ़ के बिजली उपभोक्ताओं को कोयले एवं तेल की कीमत में बढ़ोतरी होने के कारण आगामी दो माह तक 13 पैसा वेरियबल कास्ट एडजस्टमेंट (वीसीए) चार्ज देना होगा. इस चार्ज के निर्धारण का प्रावधान इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की धारा 62(4) के तहत राज्य नियामक आयोग द्वारा जारी नियमों के अनुसार किया गया है. इसके निर्धारण में बिजली कंपनी अथवा राज्य शासन की कोई भूमिका नहीं है. इधर वीसीए चार्ज में मामूली सी बढ़ोतरी को भाजपा ने सरकार के मत्थे मढ़ने की कोशिश की है. भाजपा का आरोप है कि सरकार उपभोक्ताओं को लूट रही है.छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कंपनीज के अध्यक्ष शैलेंद्र शुक्ला का कहना है कि वीसीए चार्ज का समायोजन देश की सभी बिजली कंपनियों द्वारा समय-समय पर किया जाता है. इसका भुगतान उपभोक्ताओं को करना ही होता है. ऐसा नहीं है कि केवल छत्तीसगढ़ के बिजली उपभोक्ताओं से ही वीसीए चार्ज लिया जा रहा है. छत्तीसगढ़ में 30 जून 2012 से बिजली उपभोक्ताओं से वीसीए चार्ज लेना आरंभ किया गया था. यह चार्ज समय-समय पर कम-ज्यादा होता रहता है.

उन्होंने स्पष्ट किया कि बिजली का उत्पादन करने के लिए कोयले एवं तेल की आवश्यकता होती है और इन दोनों प्रमुख घटकों की कीमत बाजार में घटती और बढ़ती रहती है. इसका निर्धारण केंद्र सरकार के द्वारा किया जाता है जबकि बिजली की दरों का निर्धारण राज्य नियामक आयोग द्वारा किया जाता है. बिजली की दरों के निर्धारण के उपरांत कोयले एवं तेल की कीमत में परिवर्तन का प्रभाव बिजली की दरों पर भी पड़ता है. अतः इन घटकों की बढ़ी अथवा घटी हुई कीमत का समायोजन बिजली दरों में करने के लिए  प्रत्येक तीन माह में इसका आंकलन किया जाता है और घटी-बढ़ी राशि को वीसीए (वेरियबल कास्ट एडजस्टमेंट) चार्ज के रूप में बिजली बिल में जोड़कर अथवा घटाकर उपभोक्ताओं से परिवर्तित राशि ली जाती है। 

उन्होंने बताया कि वीसीए की दर की गणना मई 2012 से लेकर सितम्बर 2015 तक त्रैमासिक आधार पर की जाती रही है. अब यह दर द्विमासिक आधार पर की जा रही है. प्रदेश में अब तक अधिकतम 51 पैसा प्रति यूनिट वीसीए चार्ज समायोजित करने का निर्णय किया गया है जो कि अप्रैल तथा मई 2017 के बिलों में समायोजित किया गया था. वर्तमान में यह दर केवल 13 पैसे प्रति यूनिट है जिसे जुलाई 19 तथा अगस्त 19 के बिल में समायोजित किया जायेगा. प्रदेश की नवगठित सरकार द्वारा एक मार्च से हाफ दर पर बिजली भुगतान की योजना लागू की गई है जिसके अन्तर्गत घरेलू उपभोक्ताओं को प्रथम 400 यूनिट की बिजली खपत पर आधे दर से भुगतान करना है. इस योजना का लाभ भी वीसीए चार्ज पर मिलेगा. 

 

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किसानों को बड़ी राहत दे सकती है एग्री एम्बुलेंस... विजय बुधिया ने दिया सुझाव

रायपुर. जिस प्रकार से मरीजों को लाने-ले जाने के लिए एम्बुलेंस होती है ठीक वैसी ही खेती-किसानी से संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए भी एम्बुलेंस तैयार की जा सकती है. एक स्वयंसेवी संस्था के जरिए सामाजिक कार्यों में जुटे सामाजिक कार्यकर्ता विजय बुधिया ने इसे लेकर मुख्यमंत्री को लिखित में  सुझाव भेजा है.

उन्होंने कहा है कि छोटे एवं मध्यम श्रेणी के किसानो को फसलों को उत्पादन के दौरान कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. यदि कभी फसलों पर कीट-प्रकोप लगने जैसी स्थिति पैदा होती है तब किसान अपने फसल के बचाव को लेकर चिंताग्रस्त हो जाते हैं. अगर किसानों को उचित समय पर फसलों के रख-रखाव करने वाले डाक्टर की सहायता मिल जाय तो इससे बड़ी राहत कोई और दूसरी नहीं हो सकती.

उनका कहना है कि सरकार आठ-दस गांवों को शामिल कर एक एग्री एम्बुलेंस तैयार कर सकती है. यह एम्बुलेंस सभी प्रकार की फसलों के कीटनाशक और अन्य औजारों से लैस रहेगी. जैसे ही किसी किसान से यह जानकारी मिलेगी कि उसके खेत को कीट-पतंगों से नुकसान पहुंच रहा है... एम्बुलेंस वहां पहुंचकर किसान को राहत दे सकती है. सरकार की यह सहायता छत्तीसगढ़ के अन्नदाताओं को बड़ी राहत दे सकती है. आज भी छत्तीसगढ़ के किसान कीटनाशक दवाईयों को खरीदने के लिए शहरों का रुख करते हैं और दुकानदार अपनी मर्जी के हिसाब से उन्हें दवाओं का डिब्बा थमा देते हैं. कई बार दवाईयां काम कर जाती है, लेकिन अक्सर किसान महंगे कीटनाशकों को खरीदकर खुद को लुटा बैठता है.

 

विजय बुधिया ने कहा कि एक ट्रैक्टर ट्राली के ऊपर पांच हजार लीटर की पानी टंकी, एक दवा सिंचाई करने वाले यंत्र, एक होस पाइप रोल, एक दवा पाइप रोल, दवा मिलाने का ड्रम और एक इन्वर्टर मोटर लगाकर बड़ी आसानी से एग्री एम्बुलेंस को तैयार किया जा सकता है. इस एम्बुलेंस के निर्माण से ग्रामीणों को रोजगार भी मुहैया होगा और इसे देश का पहला अनोखा प्रयास भी माना जाएगा. बुधिया ने बताया कि अगर किसी खेत को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है तो भी इस एग्री एम्बुलेंस का इस्तेमाल जल एकत्रित करने के लिए किया जा सकता है.

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छत्तीसगढ़ का वो अफसर जब जेल जाएगा तो लोग टिफिन बाक्स लेकर मिलना चाहते हैं ?

रायपुर. इस खबर का शीर्षक पढ़कर आपके चेहरे पर एक मुस्कान तैर सकती हैं, विशेषकर उन बेगुनाह लोगों के चेहरों पर जो अफसर के जुल्म और ज्यादातियों के शिकार रहे हैं. जो बिल्कुल नए और भोले-भंडारी किस्म के पाठक है, उनकी सुविधा के लिए यहां एक चित्र भी चस्पा है. इस चित्र को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह अफसर कौन है जिसके जेल जाने का इंतजार बड़ी बेसब्री से हो रहा हैं ?

जी हां... यह सच है और छत्तीसगढ़ की बड़ी जनभावना भी.

छत्तीसगढ़ में एक विवादित अफसर है. छत्तीसगढ़ जब अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था तब भी इस अफसर ने एक से बढ़कर एक कारनामों के अंजाम दिया था. छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के बाद जब तक अजीत जोगी सत्ता में रहे तब तक इस अफसर की खूब चली. पिछले पन्द्रह साल जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थीं तब तो इस अफसर ने इतना उत्पात मचाया कि पूछिए मत. हर कोई डरा और सहमा रहता था. जिन लेखकों और पत्रकारों ने इस अफसर को वर्दी वाला गुंडा लिखा उन्हें ऐन-केन-प्रकारेण झूठे मामलों में फंसा दिया गया.

इस अफसर के पास कितने अरब की संपत्ति है इसकी कोई ठीक-ठाक और विधिवत जानकारी किसी के पास उपलब्ध नहीं है, लेकिन अफसर के साथ काम कर चुके सीनियर अफसर का कहना है- एक बार जब मैंने कहा कि गलत तो गलत होता है... अगर कभी गलत काम करते हुए फंस गए तो कैसे बचोंगे ?  उसने जवाब दिया- फंसने की चिंता गरीब आदमी करता है. तुम अपनी सोचो. मैं ढ़ाई हजार करोड़ का मालिक हूं.नौकरी को जूते की नोंक पर रखता हूं.

बहरहाल छत्तीसगढ़ में सताए हुए लोग उस अफसर के जेल जाने का इंतजार कर रहे हैं. लोग इस बात की भी मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हैं कि भूपेश बघेल पहले ऐसे छत्तीसगढ़िया मुख्यमंत्री है जिसने एक जालिम की गर्दन जोर से पकड़ ली है, लेकिन बहुत से लोग पुलिस विभाग की पूछताछ पर पूछताछ और तारीख पर तारीख... वाली कार्रवाई से नाखुश भी है.ऐसे लोगों का कहना है कि भूपेश बघेल जालिम अफसरों को ठिकाने लगाना चाहते हैं, मगर पुलिस महकमे में बैठे हुए लोग आततायी अफसर को कानूनी दांव-पेंच से बचने का मार्ग प्रशस्त किए हुए हैं. छत्तीसगढ़ के बहुत से सरकारी अफसर इस बात को लेकर आश्वस्त है कि एक दिन आततायी अफसर को जेल की सजा अवश्य होगी तब वे  टिफिन बाक्स ( लंच बाक्स ) लेकर जेल में मिलने जाएंगे. छत्तीसगढ़ में पत्रकारों का एक वर्ग जेल में ही उनका इंटरव्यूह करने की तमन्ना रखता है. अब आप समझ गए होंगे कि यहां खबर में किस अफसर के बारे में बात हो रही है. अगर आप उस अफसर के बारे में जान गए हैं तो दूसरों को भी बताए कि छत्तीसगढ़ का वह नाम कमाऊं अफसर कौन है. वैसे यह पहली मर्तबा है जब लोग एक अफसर को लेकर ऐसा सोच रहे हैं. 

 

 

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बिंदेश्वरी देवी बघेल के निधन पर विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत ने जताया शोक

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की माता श्रीमती बिंदेश्वरी  देवी  बघेल  के निधन  पर विधान सभा अध्यक्ष  डॉ चरण दास महंत ने गहन शोक जताया है. अपने शोक संदेश में डॉ. महंत ने ईश्वर से दिवंगत  आत्मा को शांति प्रदान करने और शोक संतप्त  परिवार को अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की है.उन्होंने कहा कि दुःख के इस समय में वे और उनका पूरा  परिवार शोक संतप्त परिवार के साथ है. कोरबा सांसद ज्योत्सना चरणदास मंहत ने श्रीमती बिंदेश्वरी देवी के निधन को अपनी निजी क्षति बताया. उन्होंने अपने शोक संदेश में कहा कि श्रीमती बिंदेश्वरी देवी साक्षात ममता की प्रतिमूर्ति थीं. आज छत्तीसगढ़ प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के पश्चात मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जिस तत्परता के साथ किसानों को उन्नत करने, कर्ज से मुक्ति दिलाने, गांवों में गौठान का निर्माण सहित विकास का जो काम कर रहे थे उसकी प्रेरणा निश्चित रुप से उन्हें अपनी मां से ही मिलती थीं.स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव, नगरीय निकाय मंत्री शिव डहरिया और राजस्व मंत्री जयसिंहअग्रवाल ने भी शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदना प्रकट की है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक शुक्ला, नंद कश्यप,रमा कांत बंजारे, डा.लाखन सिंह ने कहा है कि छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन सहित अन्य सामाजिक संगठन इस शोक में शरीक है.इधर श्रीमती बिंदेश्वरी बघेल का पार्थिव देह रामकृष्ण अस्पताल से भिलाई-3 ले जाया गया है. आठ जुलाई को मुक्ति धाम उम्दा रोड भिलाई तीन में दोपहर 12 बजे उनका अंतिम संस्कार होगा. मुख्यमंत्री को मातृशोक की वजह से 8 जुलाई को पूर्व से प्रस्तावित प्रदेश व्यापी आंदोलन स्थगित कर दिया गया है.

कई राष्ट्रीय नेताओं ने जताया शोक

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की माता जी के निधन पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह,  राहुल गांधी, मोतीलाल वोरा, मुकुल वासनिक, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ, राजबब्बर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मोहसिना किदवई, भाजपा के वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, प्रेमप्रकाश पांडे ने भी शोक जताया है. अंतिम संस्कार में कई राष्ट्रीय नेताओं के शामिल होने की भी खबर है. 

विवादित टिव्हट

इधर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अपनी संवेदना प्रकट की है, लेकिन उनके बेटे अमित जोगी ने भूपेश बघेल की माता जी के निधन के मौके पर एक विवादास्पद टिव्हट कर दिया है. दरअसल बाराद्वार इलाके में शराब दुकान बंद करने को लेकर जोगी कांग्रेस के लोग कई दिनों से आंदोलन कर रहे हैं. अमित जोगी ने कहा है कि वे सोमवार को बाराद्वार जा रहे हैं, लेकिन भूपेश बघेल अपनी स्वर्गवासी मां को मुखाग्नि देते हुए यह तय कर लें कि या तो वे बाराद्वार की शराब दुकान को बंद कर लें या फिर मुझे ? अमित जोगी के इस टिव्हट की तीखी आलोचना हो रही है. लोग उनकी इस टीप को संस्कारों से जोड़कर भी देख रहे हैं. अधिकांश लोगों का कहना है कि टिव्हट करने का यह समय उचित नहीं है. अमित जोगी को यह तो ख्याल रखना चाहिए कि कब- कहां- क्या बोलना चाहिए. 

 

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बाप का जूता बड़ा होकर बल्ला हो गया है...

देश के प्रसिद्ध पत्रकार रवीश कुमार ने फेसबुक पर एक तस्वीर के साथ पोस्ट लिखी है. इसमें उन्होंने लिखा है-बाप का जूता बड़ा होकर बल्ला हो गया है. जो तस्वीर शेयर की गई है उसमें आकाश विजयवर्गीय के होनहार पिता कैलाश विजयवर्गीय एक अफसर को जूता मारते हुए नजर आ रहे हैं. बताते हैं कि जिस अफसर पर उन्होंने जूता ताना था उस अफसर का नाम प्रमोद फड़नीकर है जो उन दिनों एएसपी था और तब कैलाश विजयवर्गीय महज एक महापौर थे. वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की यह पोस्ट जबरदस्त ढंग से वायरल हो रही है.
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राजीव गांधी फाउंडेशन के सदस्यों ने दस्तक दी बस्तर के कोंडागांव में....और अवलोकन किया राजाराम त्रिपाठी की आधुनिक खेती का

रायपुर. राजीव गांधी फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विजय महाजन और उनके सात सदस्यीय दल ने चंद दिनों पहले कोंडागांव के प्रगतिशील कृषक राजाराम त्रिपाठी के चिखलपुटी गांव में स्थित मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म हाउस पहुंचकर आधुनिक खेती पद्धति का अवलोकन किया. गौरतलब है कि राजीव गांधी फाउंडेशन वह महासंगठन है जिसकी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी है. इस संगठन में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, चिदंबरम सहित अन्य कई अर्थशास्त्री जुड़े हुए हैं.

बीते रविवार को दल के विशेषज्ञों ने पेड़ों पर लगी हुई काली मिर्च को देखा तथा काली मिर्च की खेती से  होने वाली,प्रति एकड़ आय का  व्यवहारिक आंकलन किया. इतना ही नहीं पेड़ों पर लगी पकी हुई काली मिर्च तोड़कर चखी और काली मिर्च  की खेती तथा स्वाद दोनों की  तारीफ की. दल के सदस्य यह जानकर खुश हुए कि काली मिर्च की विशिष्ट प्रजाति जो बस्तर में ही विकसित की गई है वह साल - महुआ ,आम, नीम,इमली सहित सभी पेड़ों पर चढ़कर बहुत अच्छा उत्पादन दे रही है. इससे बस्तर के बचे-खुचे जंगलों को काली मिर्च लगाकर कटने से बचाया जा सकता है तथा स्थानीय जनजातीय समुदाय की आमदनी को दुगुनी तिगुनी करके उनका जीवन स्तर ऊंचा उठाया जा सकता है. इस बारे में काली मिर्च की त्रिस्तरीय जैविक खेती की पद्धति के बारे मे मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के अनुराग त्रिपाठी ने विस्तार पूर्वक जानकारी दी.

कृषक राजाराम त्रिपाठी ने आने वाली सदी की फसल के नाम से जाने वाली स्टीविया यानी की मीठी तुलसी के बारे में बताया. उन्होंने सदस्यों से कहा कि आने वाले दिनों में बस्तर पूरे देश में स्टीविया की खेती के लिए भी जाना जाएगा. उन्होंने कहा कि बस्तर में स्थानीय  प्रगतिशील किसानों को इसकी खेती से जोड़ते हुए स्टीविया को  बड़े पैमाने पर लगाने की कोशिश चल रही है. उन्होंने कहा कि स्टीविया की पत्तियों से बिना कैलोरी वाली शक्कर भी बस्तर के कोंडागांव में ही तैयार की जाएगी. गौरतलब हैं कि  यह जैविक शक्कर बाजार में बिकने वाली आम केमिकल शक्कर की तुलना में 250  गुना मीठी होगी और शक्कर को  डायबिटीज के मरीज भी आसानी उपयोग में ला सकेंगे. यह शक्कर मोटापे और हृदय रोग में भी कारगर होगी.

यह बताना लाजिमी है कि जापान तथा अमेरिका जैसे दर्जनों देशों में बहुत बड़ी संख्या में लोग इस शक्कर का प्रयोग करने लगे हैं. बस्तर के लिए गौरव की बात यह भी है कि कि सीएसआईआर आईएचबीटी, भारत सरकार के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित कड़वाहट रहित स्टीविया की नई  प्रजाति के पौधों की खेती तथा इसके पौधों की पत्तियों से शक्कर तैयार करने के लिए भारत सरकार की सीएसआईआर से मां दंतेश्वरी हर्बल समूह  से भी अनुबंध किया है. 

इसी कड़ी में इस दल ने ऑस्ट्रेलियन टीक के वृक्षारोपण का खेतों पर निरीक्षण, परीक्षण किया तथा मौके पर खड़े पेड़ों से प्राप्त होने वाली इमारती लकड़ी की मात्रा का आकलन कर वर्तमान बाजार भाव से आकलन कर प्रति एकड़ लाभदायकता को व्यावहारिक रूप से परखा. उन्होंने इस पौधे के द्वारा वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर जमीन में जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के द्वारा जमीन की उपजाऊ क्षमता को दोगुना करने के प्रयोगों को बेहद सराहा. इस दल ने खेतों पर ही जैविक खाद,दवाई तैयार करने प्रयोगों को भी देखा.  जैविक पद्धति से खाद तथा कीटाणु नाशक जैविक दवाई बनाने की प्रक्रिया के बारे में मां दंतेश्वरी  हर्बल समूह की महिला दल की प्रमुख जसवती नेताम ने विस्तार से जानकारी प्रदान की. मां दंतेश्वरी हर्बल समूह की गुणवत्ता तथा प्रमाणीकरण विभाग की प्रमुख अपूर्वा त्रिपाठी ने बताया कि हमारे समूह के द्वारा उत्पादित जड़ी बूटियां , हर्बल चाय, सफेद मूसली, काली मिर्च  आदि पूरी तरह से जैविक पद्धति से तैयार की जाती है तथा इससे विश्व के 7 सात सर्वश्रेष्ठ प्रमाणीकरण संस्थाओं ने गुणवत्ता प्रमाण पत्र से नवाजा है. इन्हें देश -विदेश से सैकड़ों प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके हैं. यही कारण है कि ये उत्पाद यूरोप तथा अमेरिका भी जा रहे हैं.

दल के क्षेत्र भ्रमण-आकलन के अंत में राजीव गांधी फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री विजय महाजन  ने कहा कि उच्च लाभदायक समेकित -जैविक खेती की यह अवधारणा तथा इसका यह जमीन पर खड़ा यह कोंडागांव  मॉडल पूरी तरह से सफल तथा व्यवहारिक है, जिसके तहत किसान बहुत कम लागत में अपनी आमदनी भी बढ़ा सकता है तथा अपने आसपास अन्य लोगों के लिए रोजगार का सृजन भी इस कोंडागांव मॉडल के जरिए कर सकता है.

 

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अब कोरबा के ग्रामीण हाट बाजारों में भी होगा आदिवासियों का इलाज

कोरबा. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की हाट बाजारों में ग्रामीणों को ईलाज की निःशुल्क सुविधा देने की योजना कोरबा जिले के आदिवासी बाहुल्य वनांचलों के लिए संजीवनी साबित होगीं। कोरबा जिले में लगभग 41 प्रतिशत जनसंख्या आदिवासी समुदाय की है। परंपरागत रीति रिवाजों को मानने वाले इस समुदाय में पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, गोड़, राजगोड़, बिंझवार, धनवार प्रमुख जनजातियां हैं। जिले में गांवों का दुरस्थ जगहों तक फैलाव चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार के लिए बड़ी चुनौती है। जिले के 45 सामुदायिक एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डाक्टरों के 18 पद खाली पड़े हैं ऐसे में लोगों को समय पर उपयुक्त ईलाज की सुविधा देना एक अतिरिक्त चुनौती है। जिले के ग्रामीण इलाकों में नियत स्थान पर सप्ताह में लगभग सभी दिन हाट बाजारों लगते हैं और उनमें आसपास के गांवों के लोग साग-सब्जी, तेल नून के साथ अपनी दैनिक जरूरतों की चीजें भी खरीदने आते हैं। हाट बाजारों में मोबाइल अस्पताल से निःशुल्क ईलाज की सुविधा हो जाने से लोगों को बीमारी के दौरान दूर अस्पतालों तक नहीं जाना पड़ेगा। 

      कोरबा जिले में कोयला खदानों और बड़े उद्योगों के कारण प्रदूषण का स्तर भी सामान्य से कुछ अधिक है। जिले के ढाई सौ से अधिक गांव खनन प्रभावित क्षेत्रों में है। ऐसे में लोग सामान्य सर्दी-खांसी, एलर्जी या चर्म रोग जैसी बीमारियों को भी अस्पताल दूर होने के कारण नजरअंदाज कर देते हैं। अब हाट बाजार में डाक्टरों की  जांच से इन सामान्य बीमारियों का प्राथमिक स्तर पर ही ईलाज संभव हो सकेगा। आदिवासी बाहुल्य कोरबा जिले में कुपोषण भी 22.42 प्रतिशत है। जिले की दस बाल विकास परियोजना क्षेत्रों में से  कुछ क्षेत्रों में यह प्रतिशत 25 से भी अधिक है। छोटे बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण की बेहतरी के लिए भी इन हाट अस्पतालों से अच्छा परिणाम आ सकता है। बच्चों के स्वास्थ्य की हर हफ्ते हाट बाजार में लगे अस्पताल में ही जांच हो सकेगी उन्हें जरूरी दवाएं और पोषक आहार मिलेंगे। इसके साथ ही सेहत में होने वाले सुधार की मानिटरिंग भी हर हफ्ते हो पायेगी।  

      कोरबा जिले के आदिवासी अंचलों की महिला अपने स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा जागरूक नहीं हैं। कमजोरी, खून की कमी या महिलाओं को होने वाले अन्य रोगों की स्थिति में भी वे तत्काल अस्पताल जाना पसंद नहीं करतीं और धीरे-धीरे उनकी बीमारी जानलेवा हो जाती है। ग्रामीण अंचलों की महिलाओं की स्वस्थ्य सुधार में चलित हाट अस्पतालों की भूमिका अत्याधिक महत्वपूर्ण होगी।  बाजार में पहुंचकर जरूरत का सामान खदीदने के साथ ही डाक्टरों से अपना स्वास्थ्य परीक्षण कराने पर बीमारियों का प्रारंभिक अवस्था में ही पता चल पायेगा और उनका समुचित ईलाज हो सकेगा। ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों में विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी के कारण बीमार लोगों को ईलाज के लिए कई बार बड़े अस्पतालों को रिफर करना पड़ता है। हर हफ्ते हाट अस्पताल में विशेषज्ञ डाक्टर से जांच और ईलाज की सुविधा भी ऐसे मरीजों को त्वरित रूप से मिल सकेगी। जिले में ग्रामीण क्षेत्रों में पैथोलाजी प्रयोगशालाएं नहीं होने के कारण मरीजों को छोटी-छोटी जांचों के लिए भी शहरी क्षेत्रों या कोरबा तक आना पड़ता है। पैथोलाजी लैबों में जांचें बहुत महंगी पड़ती हैं। अब हाट बाजार में ही रक्तचाप, मधुमेंह, सिकलसेल, एनीमिया, हीमोग्लोबिन, मलेरिया, टाईफाईड जैसी बीमारियों के लिए खून की जांच निःशुल्क हो सकेगी। जिससे लोगों का बीमारी की स्थिति में त्वरित ईलाज भी हो सकेगा।

 

 

 

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भाजपाई अफवाह फैलाते रहे और इधर 22 घंटे बिजली देने वाले 5 राज्यों में शामिल हो गया छत्तीसगढ़

रायपुर. छत्तीसगढ़ स्टेट पाॅवर कंपनीज द्वारा विद्युत अधोसंरचना को सुदृढ़ बनाने के लिये अत्याधुनिक टेक्नालाजी का उपयोग किया जा रहा है, फलस्वरूप शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में निर्बाध बिजली आपूर्ति हो रही है। प्रदेश में स्थापित विद्युत प्रणालियों में आने वाली खराबी तथा इससे उत्पन्न विद्युत व्यधान को न्यूनतम समय में पूरा करने में कामयाबी मिली है। उक्त जानकारी देते हुए  पाॅवर कम्पनी अध्यक्ष शैलेन्द्र शुक्ला ने बताया कि भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय द्वारा अपने वेबपोर्टल में विभिन्न प्रदेशों की बिजली व्यवस्था का मूल्यांकन कर राज्यों को उनके उत्कृष्ट कार्य हेतु रेटिंग किया गया। इस सूची में छत्तीसगढ़ राज्य के बिजली व्यवस्था को देष के उत्कृष्ट श्रेणी में अंकित किया गया। केन्द्र सरकार द्वारा जारी सेफी (सिस्टम एवरेज इंटरप्शन फ्रिक्वेंसी इंडेक्स) के रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य के डिवीजनों के फीडरों का भी मूल्यांकन किया गया। इस प्रतिवेदन के अनुसार छत्तीसगढ़ के फीडरों को टाॅप थ्री में स्थान दिया गया है। अध्यक्ष श्री शुक्ला ने उक्त संदर्भ में जानकारी देते हुए बताया कि देश भर के विभिन्न राज्यों के ग्रामीण फीडरों में बिजली की उपलब्धता 9 प्रतिशत 14 प्रतिशत 17 प्रतिशत और 22 प्रतिशत रही। इसकी तुलना में छत्तीसगढ़ राज्य में औसतन प्रतिदिन 22 घण्टे बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित की गई। ग्रामीण अंचलों में बिजली की आवश्यकता कृषि कार्यों में सर्वाधिक होता है। कृषि पम्पों के लिए पृथक किए गए ग्रिड में निश्चित समय के लिए बिजली बंद की जाती है अन्यथा ऐसे फीडर, जिनमें कृषि पम्पों के साथ अन्य कनेक्शन भी हैं, उनमें निरन्तर विद्युत प्रवाह सुनिश्चित किया जाता है। केवल आंधी-तूफान व भारी वर्षा के समय ब्रेकडाउन अथवा मरम्मत कार्यों के लिए शटडाउन लेने पर बिजली सप्लाई प्रवाहित होती है। यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि कम से कम समय में बिजली सप्लाई पुनः चालू कर ली जाए. प्रदेशभर में ग्रामीण अंचलों व आदिवासी क्षेत्रों में बिजली की सतत् आपूर्ति के लिए कंपनी प्रबंधन निरन्तर प्रयासरत है। राज्य शासन की रीति-नीति के अनुरूप सभी योजनाओं का लाभ उपभोक्ताओं को प्राप्त हो रहा है।  

 ट्रांसमीशन नेटवर्क विस्तार में बना नया कीर्तिमान

प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण बिजली की आपूर्ति हेतु पारेषण प्रणाली को सुदृढ़ बनाने का कार्य पाॅवर ट्रांसमिशन कम्पनी द्वारा युद्धस्तर पर किया जा रहा है। इस दिशा में नये सबस्टेशनों की स्थापना, लाईनों का विस्तार, ट्रांसफार्मरों का ऊर्जीकरण एवं पारेषण क्षमता में वृद्धि जैसे अनेक कार्य किये जा रहे हैं। 

विदित हो कि बस्तर में सतत् बिजली आपूर्ति हेतु हेतु वर्तमान में 400 के0व्ही0 का एक सबस्टेशन क्रियाशील है। 33/11 के.व्ही. एवं 11/04 के.व्ही. के सैंक़ड़ों उपकेन्द्रों के माध्यम से बस्तर क्षेत्र में निरन्तर बिजली सप्लाई की जा रही है। नई सरकार के गठन उपरान्त धरसीवाँ कुथरेल में 220 के.व्ही. सबस्टेशन में 160 एमव्हीए का नया ट्रांसफार्मर स्थापित किया गया है। पारेषण क्षमता अब बढ़कर 7 हजार एमव्हीए हो गई है, जिसमें से 10 प्रतिशत वृद्धि इस 6 माह की है। औद्योगिक क्षेत्रों को बढ़ावा देने हेतु रायपुर के समीप उरला में सेक्टर-ए के लिए 40 एमव्हीए का तथा सेक्टर सी के लिए 40 एमव्हीए का नया ट्रांसफार्मर लगाया गया। इससे पारेषण क्षमता में वृद्धि के साथ ही पूर्व से लम्बित आवेदनों का निराकरण किया गया एवं उपभोक्ताओं को नये कनेक्शन तीव्रता से प्रदान किये गये हैं। 

पाॅवर कंपनी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार  जून, 2019 में ही 220 के.व्ही उपकेन्द्र भिलाई स्थित सबस्टेशन में 160 एमव्हीए का नया ट्रांसफार्मर ऊर्जीकृत किया गया, जिससे अब इस पारेषण सबस्टेशन की कुल क्षमता 695 एमव्हीए हो गई है और इस क्षेत्र में निरन्तर बिजली सप्लाई के लिए पर्याप्त है। इस ट्रांसफार्मर के लगने से 220 के.व्ही. उपकेन्द्र की क्षमता में वृद्धि हुई है और संबंधित क्षेत्र के रहवासियों को ओवर लोडिंग जैसी समस्याओं से छुटकारा मिलेगा। 

प्रदेश में अप्रैल माह के आंकड़ों के अनुसार पारेषण प्रणाली की सुदृढ़ीकरण हेतु प्रयास किये गये है जिससे पाॅवर कंपनी के अति उच्चदाब उपकेन्द्रों की संख्या 118 नग हो चुकी है तथा अति उच्चदाब लाईनों की लंबाई 12300 सर्किट किलोमीटर तक पहंुच चुकी है। इसी प्रकार 33/11 के.व्ही. उपकेन्द्रों की संख्या 1248 नग हो चुकी है एवं 33 केव्ही लाईनों की लंबाई 22088 किलोमीटर तक विस्तार कर लिया गया है। 11/04 उपकेन्द्रों की संख्या भी बढ़कर डेढ़ लाख से अधिक हो गई है। 11 के.व्ही. लाईनों की लंबाई 1 लाख 12 हजार तक पहुंच चुकी है। इसी के साथ-साथ निम्नदाब लाइनों की लंबाई में एक लाख 90 हजार तक वृद्धि हुई है। 

बिजली बिल हाफ का बढ़ने लगा लाभ

सभी घरेलू उपभोक्ताओं को उनके द्वारा खपत की गई चार सौ यूनिट पर हाफ बिजली बिल स्कीम का लाभ देने का निर्णय छत्तीसगढ़ राज्य शासन द्वारा लिया गया था। शासन के इस जनहितैषी निर्णय को छत्तीसगढ़ स्टेट पाॅवर कंपनी द्वारा 01 मार्च से प्रभावषील कर दिया गया, जिसका लाभ प्रदेश के घरेलू उपभोक्ताओं को मिलने लगा है।

प्रदेश के नवगठित सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘बिजली बिल हाफ‘ का लाभ उपभोक्ताओं को मिल रहा है। साथ ही लाभान्वित उपभोक्ता इस योजना से संतुष्ट होकर समय पर बिजली बिल जमा कर रहे है। पाॅवर कंपनी के अध्यक्ष श्री शैलेन्द्र शुक्ला ने बताया कि बिल भुगतान के आंकड़ों का मूल्यांकन करने पर ज्ञात हुआ कि अप्रैल माह में केवल 29 लाख उपभोक्ता इस योजना से लाभान्वित हुए थे, जिन्होंने निर्धारित तिथि पर बिल का भुगतान किया। दूसरे माह में लाभान्वित उपभोक्ताओं की संख्या बढ़कर 35 लाख हो गई। तुलनात्मक अध्ययन में विगत माह में लाभान्वित उपभोक्ताओं में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

आगे श्री शुक्ला ने बताया कि इस योजना से राज्य के समस्त बी.पी.एल. एवं फ्लैट रेट योजना के अंतर्गत शामिल अन्य घरेलू श्रेणी के उपभोक्ताओं को इससे बड़ी राहत मिली है। प्रदेश में 19 लाख 93 हजार से अधिक बीपीएल. कनेक्शन देकर गरीब तबके के लोगों को बिजली की मूलभुत सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। 

बिजली बिल हाफ योजना का लाभ उठाते हुए उपभोक्ताओं में भी निर्धारित तिथि के पूर्व बिजली बिल जमा करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है। प्रदेश के अधिकांश घरेलू उपभोक्ता योजना का लाभ लेने हेतु समय पर बिजली बिल भुगतान कर रहे है। जिससे पाॅवर कंपनी को भी समय पर राजस्व का लाभ मिल रहा है। जिससे इस योजना से पाॅवर कंपनी के साथ उपभोक्ता भी लाभान्वित हो रहे हैं और उन्हें सरचार्ज भी नहीं देना पड़ रहा है।  

6 माह में बनाए गए 116 विद्युत उपकेन्द्र,ट्रांसफार्मर क्षमता

छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के दिशा निर्देशों के अनुरूप पाॅवर कम्पनी द्वारा प्रदेश की विद्युत प्रणाली में अनवरत् सुधार कार्य किये जा रहे हैं। पूर्व के कार्यों का आकलन कर नई कार्ययोजना तैयार की गई है। पूर्ववर्ती राज्य सरकार द्वारा नये कनेक्शन दिये जाने का वादा तो किया गया किन्तु उसके अनुरूप ट्रांसफार्मरों की संख्या, उनकी क्षमता में वृद्धि एवं ग्रिड के संचालन का कार्य उसके अनुपात में नहीं किया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि देवभोग एवं गरियाबंद जैसे क्षेत्रों में लो वोल्टेज एवं प्रणालियों पर बार-बार ओवरलोड की समस्या उत्पन्न होने लगी। इसके निराकरण हेतु प्रदेश की वर्तमान कांग्रेस सरकार ने विगत पांच महिनों में ही मुख्यमंत्री ऊर्जा प्रवाह योजना अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में 33/11 केव्ही के 34 नये उपकेन्द्र की स्थापना के कार्य को प्राथमिकता से किया जा रहा है। साथ ही शहरी क्षेत्रों में 33/11 केव्ही के 9 उपकेन्द्र स्थापित किये गये। 

उल्लेखनीय है कि वर्तमान में स्थापित 33 सबस्टेशनों में अतिरिक्त ट्रांसफार्मर लगाकर क्षमता वृद्धि करते हुये बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने का निर्णय लिया गया है। पूर्व में संचालित पाॅवर ट्रांसफार्मर में 40 नये एवं उन्नत क्षमता के ट्रांसफार्मर लगाकर ग्रिड को मजबूती प्रदान करने का प्रस्ताव है। इस प्रकार कुल 116 सबस्टेषन में नवीन स्थापना क्षमता, उन्नयन कार्य किया गया। इसका लाभ बलोदाबाजार के राजदेवरी, कटगी, गिधपुरी, बलरामपुर के महावीरगंज, पास्ता, जांजगीर-चांपा के कचन्दा, कोेसी, लखानी व गरियाबन्द के मालगाँव एवं डोंगरीगाँव जैसे अनेकों दूरस्थ ग्रामों को मिला।

प्रथम चरण में प्रदेश के दूरस्थ ऐसे स्थानों का चयन किया गया है, जहाँ तक बिजली पहुँचा दी गई थी, किन्तु बिजली की सतत् आपूर्ति एवं वोल्टेज़ को मेंटेन करने में बहुत कठिनाईयाॅ आ रही थी। पाॅवर कम्पनी द्वारा ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है एवं सतत् बिजली आपूर्ति हेतु स्थायी समाधान करने के लिए प्रयासरत किये जा रहे हैं। 

19 साल बाद रौशन सरगुजा के 174 गांव

छत्तीसगढ़ को पॉवर हब चाहे जब घोषित कर दिया गया हो, परंतु सरगुजा के जनकपुर क्षेत्र के 174 गांवों तक असल उजाला 19 साल बाद अब जाकर पहुंचा है। बिजली का भरपूर उत्पादन करने वाले छत्तीसगढ़ के इन गांवों के हजारों लोग इतने वर्षों तक सिर्फ इसलिए समस्याओं से जूझते रहे, क्योंकि उन तक उनके अपने प्रदेश की बिजली पहुंच ही नहीं पाई थी। मध्यप्रदेश से इन गांवों को ऊंची कीमत पर बिजली की आपूर्ति हो रही थी। अब जाकर इस समस्या का स्थायी समाधान हो पाया है।*   केवल साढ़े 3 महीने के रिकार्ड समय में नयी सरकार ने 60 किलोमीटर नयी विद्युत लाइन बिछाकर छत्तीसगढ़ से ही बिजली पहुंचाने का इंतजाम कर दिया है।

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की जानकारी में जब जनकपुर क्षेत्र की समस्या लाई गई तो उन्होंने इसके तत्काल समाधान का निर्देश दिया। राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ ने विद्युत उत्पादन के मामले में हालांकि सरप्लस राज्य के रूप में पहचान बनाई, लेकिन अधोसंरचना के मामले में अनेक सीमावर्ती उपेक्षित रह गए। जनकपुर क्षेत्र भी इन्हीं में से एक था। 19 सालों में भी इस क्षेत्र को छत्तीसगढ़ के निकटतम विदुयत उपकेंद्र से कनेक्ट नहीं किया गया। मध्यप्रदेश से जिस 33 केवी लाइन से विद्युत आपूर्ति की जा रही थी, उसकी लंबाई 100 किलोमीटर है। इसीलिए इस क्षेत्र के गांवों को न तो निर्बाध बिजली मिल पा रही थी, और न ही सही वोल्टेज। 

4178 उपभोक्ताओं वाले जनकपुर क्षेत्र में आए दिन बिजली गुल रहा करती थी। लाइन में खराबी आने पर सुधार के लिए मध्यप्रदेश के अधिकारियों-कर्मचारियों के भरोसे रहना पड़ता था। समय पर सुधार नहीं हो पाने के कारण अक्सर कई-कई दिनों तक बिजली बाधित रहती थी। 

मध्यप्रदेश से बिजली की व्यवस्था किए जाने से जहां ग्रामीण परेशान थे, वहीं छत्तीसगढ़ को हर महीने बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा था। हाल के दिनों तक छत्तीसगढ़ को मध्यप्रदेश से हर महीने 1.14 मिलियन यूनिट बिजली खरीदनी पड़ रही थी। इसके ऐवज में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी द्वारा औसत प्रति यूनिट 7 रुपए 21 पैसे की दर से हर महीने 82 लाख रुपए का भुगतान मध्यप्रदेश को किया जा रहा था। अब जबकि छत्तीसगढ़ से बिजली आपूर्ति की व्यवस्था हो गई है, मात्र 5 रुपए 43 पैसे की दर से बिजली उपलब्ध हो जाएगी। इस तरह 20 लाख 30 हजार रुपए की बचत हर महीने होगी।

         जनकपुर क्षेत्र के लिए 33 केवी की 60 किलोमीटर लंबी नयी लाइन बिछाने का काम मात्र साढ़े तीन महीने के रिकार्ड समय में पूरा कर लिया गया है, बावजूद इसके कि यह पूरी लाइन जंगल क्षेत्र से होकर गुजरती है। छत्तीसगढ़ के केल्हारी 33/11 केवी सब स्टेशन से जनकपुर क्षेत्र तक यह लाइन बिछाई गई है। इसमें 13 करोड़ 88 लाख रुपए खर्च हुए हैं। नयी लाइन के जरिये अब 174 गांवों को भरपूर वोल्टेज के साथ निर्बाध बिजली मिल पाएगी। लाइन में किसी तरह की खराबी या बाधा आने पर वे छत्तीसगढ़ के ही           अधिकारियों-कर्मचारियों से शिकायत कर उसे तुरत ठीक करा पाएंगे। जनकपुर क्षेत्र को मध्यप्रदेश से 33 केवी लाइन पर लगभग 23 केवी वोल्टेज प्राप्त हो रहा था, नई लाइन के चालू होने पर वोल्टेज बढ़कर 27 केवी हो गया है। 

देवभोग के 200 गांवों में रोशनी की राह

अधोसरंचना की खामियों की वजह से बिजली की समस्याओं से जूझ रहे देवभोग क्षेत्र के 200 गांवों को जल्द राहत मिल जाएगी। इस क्षेत्र को अच्छी गुणवत्ता के साथ निर्बाध बिजली की आपूर्ति करने के लिए भूपेश सरकार 67 करोड़ रुपए खर्च करने जा रही है। इस राशि से इंदा गांव में एक नये सब स्टेशन का निर्माण कराया जाएगा। 132 केवी की 68 किलोमीटर लंबी नयी विद्युत लाइन नगरी से बिछाने की तैयारी कर ली गई है। बीते वर्षों में देवभोग क्षेत्र में विद्युत कनेक्शनों की संख्या जिस रफ्तार से बढ़ी, उस रफ्तार से अधोसंरचना में सुधार का काम नहीं हो पाया। क्षेत्र की विद्युत संबंधी दिक्कतें संज्ञान में आने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अधोसंरचना संबंधी खामियों को जल्द से जल्द दूर करने के निर्देश अधिकारियों को दिए थे। इस समय गरियाबंद के 132 केवी सब स्टेशन से देवभोग को बिजली की आपूर्ति की जाती है। देवभोग तक बिजली पहुंचाने वाली 33 केवी की लाइन 140 किलोमीटर लंबी है। लंबाई अधिक होने की वजह से 33 केवी उपकेंद्रों में 33 केवी की जगह मात्र 21-22 केवी वोल्टेज प्राप्त हो पा रहा है। इसीलिए क्षेत्र के गांवों को लो-वोल्टेज की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। खेती-किसानी के मौसम में पंप चलने के कारण फीडर में लोड बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, जिसके कारण अक्सर तार टूटने की घटनाएं होती रहती हैं। इन सब की वजह से अक्सर गांवों में बिजली गुल रहती है। 

          देवभोग क्षेत्र के 33 हजार से ज्यादा उपभोक्ता पिछले 8 सालों से इसी तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं। अब छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड ने इंदा गांव में 40 एमवीए क्षमता के 132/33 केवी विद्युत उपकेंद्र के निर्माण की तैयारी शुरू कर दी है। 13 करोड़ रुपए लागत वाले इस विद्युत उपकेंद्र के लिए राज्य नियामक आयोग से अनुमति प्राप्त की जा चुकी है। नगरी से जो नयी विद्युत लाइन बिछाई जाएगी, उसमें 54 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इस तरह इस पूरे काम में 67 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। सब स्टेशन के निर्माण के लिए टेंडर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जुलाई से काम शुरू होने की संभावना है। इस उपकेंद्र के निर्माण के बाद देवभोग क्षेत्र में विद्युत आपूर्ति करने वाली 33 केवी लाइन की लंबाई मात्र 50 किलोमीटर रह जाएगी, जिससे क्षेत्र में लो वोल्टेज तथा तार टूटने की वजह से विद्युत-बाधा की समस्या हल हो जाएगी.

   

 

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बिजली को लेकर भाजपा के अफवाह की हवा निकाली विद्युत प्राधिकरण ने

रायपुर. छत्तीसगढ़ में बिजली को लेकर भाजपाइयों का अफवाह तंत्र लगातार सक्रिय है. इस बीच केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने भाजपाई अफवाह की हवा निकाल दी है. प्राधिकरण के पोर्टल में साफ दिख रहा है कि  बिजली की उपलब्धता सहित विद्युत प्रणालियों की सुदृढ़ता के कारण छत्तीसगढ़ में बिजली सप्लाई की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर बनी हुई है. केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण, नई दिल्ली द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य में माह जनवरी से मई 2019 तक विद्युत की उपलब्धता 97.62 प्रतिशत दर्ज हुई. उक्त जानकारी पावर कंपनी के विगत पांच  महीनों में विद्युत की उपलब्धता मांग के अनुरूप बनी हुई है. केन्द्र शासन के ऊर्जा विभाग द्वारा जारी आकड़ों के अनुसार इस स्थिति को उत्कृष्ट श्रेणी में रखा गया है.

ऊर्जा मंत्रालय के वेबपोर्टल के अनुसार विगत पांच माह जनवरी से मई 2019 तक प्रदेश में मांग के अनुरूप बिजली की आपूर्ति रही. जनवरी, 2019 में बिजली की मां 1990 मिलियन यूनिट थी, जिसके विरूद्ध 1983 मिलियन यूनिट बिजली आपूर्ति की गई. मांग के अनुपात में आपूर्ति में मात्र 0.4 प्रतिषत् कमी दर्ज की गई. सतत् मानीटरिंग और युद्धस्तर पर बिजली व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण के फलस्वरूप माह फरवरी और मार्च में यह कमी घटकर मात्र 0.3 प्रतिशत पहुंच गई. बिजली कर्मचारियों के लगातार प्रयासों से माह अप्रैल और मई, 2019 में छत्तीसगढ़ राज्य ने नया कीर्तिमान स्थापित किया, जिसमें मांग के विरूद्ध शत्-प्रतिशत विद्युत प्रदाय किया गया, अर्थात ’’शून्य‘‘ प्रतिशत कमी दर्ज हुई, यह स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर मांग और उपलब्धता के औसत से कहीं बेहतर है, यही कारण है कि पिछले 5 महीनों में नेशनल पावर पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार बिजली सप्लाई की विश्वसनीयता 97.62 प्रतिशत रही।

पावर कंपनी के विद्युत गृहों की बेहतर कार्यनिष्पत्ति एवं सतत् मानिटरींग की जा रही है जिससे विद्युत उत्पादन की स्थिति संतोषजनक बनी हुई है.  बढ़ती गर्मी तथा उपभोक्ताओं की संख्या में लगातार वृद्धि के बावजूद पावर कंपनी अपने उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण विद्युत आपूर्ति करने में सफल रही।

 

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जंगल कटता रहेगा तो एक दिन झुलसकर मर जाएंगे हम सब

नंद कुमार कश्यप

हम प्रत्येक वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं, परंतु उसके साथ ही यह भी सच्चाई है कि उपभोक्ता वादी व्यवस्था के चलते हमारी ऊर्जा खपत बढ़ने से पृथ्वी गर्म हो रही है और धीरे धीरे यह संकट बढ़ता ही जा रहा है। आवश्यक जंगलों को बचाने की जगह समारोह पूर्वक वृक्षारोपण कार्य में करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं परंतु उनके रखरखाव के अभाव में वे नन्हे पौधे वृक्ष नहीं बन पाते। दूसरी ओर लोग एक दिनी समारोह के बाद प्रर्यावरण की चिंता छोड़ देते हैं। वास्तविकता यह है कि आज का संकट वृक्षारोपण की औपचारिकताओं से बहुत बड़ा है। हमारे देश की आबादी की तुलना में शुद्ध जल बहुत सीमित है और हिमालय क्षेत्र के बाद विशुवत (कर्क रेखा क्षेत्र) रेखा के वनों से निकलने वाली नदियां शुद्ध जल का मुख्य स्रोत हैं। परंतु आज विभिन्न खनिजों के खासकर कोयले और बाक्साईट के दोहन के लिए इन वनों को काटा जा रहा है। नतीजा यह है कि एक ओर मध्य और मध्य पश्चिम भारत में तापमान पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते जा रहा है और पेयजल का भीषण संकट खड़ा हो गया है। सरकारों द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की जगह मिथकीय भटकावों की ओर जाने से यह संकट गहराया है। दुनिया की ओर देखें तो जिन देशों में आस्था के ऊपर वैज्ञानिक दृष्टिकोण है वहां की नदियां साफ सुथरी हैं और वहां पानी का संकट नहीं है लेकिन जहां विज्ञान पर आस्था और मिथक हावी है वहां नदियां कचरे के ढेर में बदल गई हैं और जंगल नष्ट हो रहे हैं। इसलिए आइए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हमारे प्रर्यावरण के लिए सोचें।

पृथ्वी को ठंडा रखने में उष्ण कटिबंधीय जंगलों की भूमिका और उत्तरी छत्तीसगढ़ के घने जंगल

 

Ecosystem restoration is the alpha and omega of managing this little spaceship we call Earth.

We lose an acre and half of every forest, every second. Almost 15 billion trees a year.

 

जैसा कि हम सभी जानते हैं वृक्ष दिन में आक्सीजन छोड़ते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड खींचते हैं। पृथ्वी के गर्म होने के बड़े कारणों में एक ग्रीनहाउस गैसों का अति उत्सर्जन और लगभग प्रति सेकेंड डेढ़ एकड़ जंगलों की कटाई है, मतलब साल भर में लगभग 15 अरब वृक्षों की कटाई। एक ओर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और दूसरी ओर जंगलों की कटाई,इसने पृथ्वी के पर्यावास को ही असंतुलित कर दिया है। मार्च 2017 में ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि जंगलों की भूमिका सिर्फ कार्बन अवशोषण तक सीमित नहीं है वरन् वे पृथ्वी की सतह और वातावरण के बीच जल और उर्जा संचरण को भी नियंत्रित करते हैं इसलिए जंगलों को बचाना अति आवश्यक कर्त्तव्य है।

 

(Trees impact climate by regulating the exchange of water and energy between Earth surface and the atmosphere,an important influence that should be considered as policymakers contemplate effort to conserve forested land , said the author's of an international study)

 

इस अध्ययन के शोधकर्ताओं ने पाया कि एक ओर ये उष्णकटिबंधीय जंगल भूमध्य रेखा की ओर की धरती को बड़ी मात्रा में ठंडा करते हैं तो वहीं दूसरी ओर ऊपर ध्रुवों की ओर के वातावरण को गर्म रखते हैं।यह इस बात की तस्दीक करता है कि उष्ण कटिबंधीय वन पृथ्वी के एयरकंडीशनर हैं। यद्यपि उष्णकटिबंधीय मिश्रित वर्षावन पूरी पृथ्वी के 7% भूभाग में है परंतु वह पृथ्वी के 50% वन और जैव विविधता को धारण करते हैं, साथ ही विश्व के दो तिहाई सूक्ष्म जीव जंतुओं को, लगभग 30 लाख प्रजात के जीव जंतु इन वनों में पाए जाते हैं।

आइए जानें कि उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र क्या है और उनका ऐतिहासिक महत्व क्या है।ट्रापिक या विषुवत रेखा पृथ्वी पर वो काल्पनिक रेखाएं हैं जिन्हें सूर्य की गति और ताप वितरण मापने के लिए 2000 साल पहले नाम दिया गया था।उत्तरी गोलार्ध में कर्क रेखा और दक्षिणी गोलार्ध में मकर रेखा। ये रेखाएं भूमध्य रेखा से लगभग 23.5 डिग्री पर हैं। चूंकि सूर्य भी अपने अक्ष से 23अंश झुका हुआ है इसलिए विषुवत रेखाओं पर सूर्य पूरे वर्ष अपनी रोशनी और गर्मी देता है। लगातार रोशनी और फोटो सिंथेसिस ने करोड़ों वर्षों में इन क्षेत्रों में सघन वन विकसित किए जिसके कारण पृथ्वी का तापमान जीवन के अनुकूल हुआ, और जो आज तक बना हुआ है। मकर रेखा से लगे हुए अमेज़न के जंगल और नदी विशव  ट्रापिकल जंगल का सबसे बड़ा क्षेत्र है जो दो महाद्वीपों तक फैला हुआ है। अमेज़न के जंगल जहां 55 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं वहीं अमेज़न बेसिन 70लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।

भारत में कर्क रेखा देश के लगभग बीचों-बीच पार करती है। उत्तर पूर्व में मिज़ोरम के चंफई 23.45°अक्षांश , त्रिपुरा के उदयपुर 23.53°अक्षांश नदी गोमती, बंगाल कृष्ण नगर 23.4° अक्षांश जलंगी नदी, झारखंड लोहरदगा 23.43°अक्षांश कोएल नदी, छत्तीसगढ़ सोनहत 23.47°अक्षांश हसदेव नदी, मध्यप्रदेश शाजापुर 23.43°अक्षांश पार्बती नदी कालीसिंध बेसिन, राजस्थान कलिंजर 23.43°अक्षांश माही नदी एवं गुजरात जसडन 22.03°अक्षांश माही नदी कर्क रेखा को दो बार पार करती है वह मध्यप्रदेश के धार झाबुआ से होते हुए राजस्थान के बांसवाड़ा से लौटते हुए गुजरात के जसडेन से होते हुए अरब सागर में मिलती है। गुजरात से छत्तीसगढ़ के सोनहत तक कर्क रेखा के क्षेत्र न सिर्फ सघन वन क्षेत्र हैं वरन् यह आदिवासी बहुल इलाके भी हैं। सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के अमरकंटक से नर्मदा और सोन जैसी दो राष्ट्रीय नदियों के साथ साथ अनेक छोटी बड़ी नदियां निकलती हैं जिनमें हसदेव अहिरन आदि महत्वपूर्ण नदियां हैं। छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य क्षेत्र सघन वन क्षेत्र है है। इसके साथ ही साथ यह क्षेत्र देश के मानसून की प्रगति के लिए बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। छत्तीसगढ़ दक्षिण पश्चिम मानसून के मध्य, उत्तर, उत्तर पश्चिम भारत की ओर जाने का प्रवेश द्वार है।हम जानते हैं कि सूर्य किरणें  कर्क रेखा पर जून में सीधी पड़तीं है, और उसके आसपास के तापमान को यही सघन वन कम रखते हैं। अमरकंटक क्षेत्र में बाक्साईट और हसदो अरण्य क्षेत्र में कोयले के खनन से इस क्षेत्र के वनों का बड़ा हिस्सा काट दिया गया इस कारण क्षेत्र का मई जून महीनों का तापमान पिछले 25 वर्षों में औसतन 5°सेल्सियस से ज्यादा बढ़ा है।हम यह भी जानते हैं कि यदि सतह का तापमान बढ़ता है तो उपरी हवा काफी ऊंचाई तक पहुंच मानसूनी बादलों को आगे उड़ा ले जाती है। उत्तर छत्तीसगढ़ के वनों के विनाश से न सिर्फ बड़ी नदियां मर जाएंगी ,बड़ी संख्या में आदिवासियों का विस्थापन होगा वरन् मानसून के बादल छत्तीसगढ़ मध्य भारत छोड़कर सीधे हिमालय क्षेत्र में कहर बरपा रहें हैं। इसलिए यह जरूरी है कि सरकारें और योजना बनाने वाले लोग हसदेव अरण्य क्षेत्र का व्यापक अध्ययन कर देश के प्रर्यावरण को केंद्र में रखकर योजना बनाएं और तब तक इस क्षेत्र में नये खनन की अनुमति नहीं दें। बिलासपुर शहर भी 22.8° अक्षांश पर बसा हुआ है इसलिए आसपास के जंगलों के कटने और शहर के भीतर 100 पुराने सिरिस के पेड़ कटने से लगभग 10 करोड़ लीटर सतही भूजल से वंचित हो गया। इसलिए आज बिलासपुर शहर का तापमान लगातार बढ़ रहा है और शहर पानी के संकट से जूझ रहा है।

   

 

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आइए लहलहाएं अपने हिस्से की हरियाली

एल.डी. मानिकपुरी ( सूचना सहायक, मुख्यमंत्री सचिवालय मंत्रालय ) 

आज यहां महात्मा गांधी जी की एक लेख ‘की टू हेल्थ’ (स्वस्थ कुंजी) का जिक्र करना चाहूंगा, जिसमें गांधी जी ने कहा था कि शरीर को तीन प्रकार के प्राकृतिक पोषण की आवश्यकता होती है हवा, पानी और भोजन, लेकिन साफ हवा सबसे आवश्यक है।। गांधी जी कहते हैं कि प्रकृति ने हमारी जरूरत के हिसाब से पर्याप्त हवा फ्री में दी है. लेकिन उनकी पीड़ा थी कि आधुनिक सभ्यता ने इसकी भी कीमत तय कर दी है। वह कहते हैं कि किसी व्यक्ति को कहीं दूर जाना पड़ता है तो उसे साफ हवा के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है। आज से करीब 101 साल पहले 1 जनवरी 1918 को अहमदाबाद में एक बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने भारत की आजादी को तीन मुख्य तत्वों वायु, जल और अनाज की आजादी के रूप में परिभाषित किया था। उन्होंने 1918 में जो कहा और किया था उसे अदालतें आज जीवन के अधिकार कानून की व्याख्या करते हुए साफ हवा, साफ पानी और पर्याप्त भोजन के अधिकार के रूप में परिभाषित कर रही हैं।.

पूरा विश्व ‘पर्यावरण’ को लेकर 1972 में जो चिंता व चिंतन किया वह 47 बरस बाद ‘भंयकर चिंता’ बन गया है। यह चिंता जायज भी है, लेकिन चिंता ही काफी नहीं है। आज हमारे आस-पास विकास के नाम पर हो रहे पर्यावरण के नुकसान का असर यह हो रहा है कि आने वाली पीढ़ी को सिर्फ और सिर्फ एक ऐसा संसार देने जा रहे हैं, जहां आधुनिक संचार माध्यमों से ही उन्हें बता पाएंगे कि पहले देखो कि कितना साफ-सुथरा तालाब, नदियां, घने जंगल, रंग-बिरंगी पक्षियां, जीव-जंतु, वन्य प्राणी, उपजाऊ जमीन और चमकता आसमान हुआ करता था, और अब.......। बुढ़ापे में हम अपने सगे-संबंधी, नाती-पोतों को कहानी के माध्यम से ऐसे वातावरण से परिचित करा पाएंगे।
वैसे तो भारत में प्राचीनकाल से वन संस्कृति, ऋषि संस्कृति, कृषि संस्कृति चला आ रहा है। हमें अपने पूर्वजों को धन्यवाद देना चाहिए कि जिनके बदौलत ही हमें वृक्ष, तालाब, नदियां, घने जंगल, वन्य प्राणी देखने को मिल जाता है। हमें धन्यवाद देना चाहिए ऐसे महान लोगों को जिन्होंने धरती की सेवा करते-करते अपने जीवन व्यतीत कर दिया। पर्यावरण व जैव-विविधता के कमी होने से प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़, सूखा, साल-दर-साल बारिश का कम होना, भूजल स्तर कम होना और इसके विपरीत गर्मी की तपन बढ़ते जाना और तूफान आदि आने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। लाखों विशिष्ट जैविक की कई प्रजातियों के रूप में पृथ्वी पर जीवन उपस्थित है और हमारा जीवन प्रकृति का अनुपम उपहार है। प्रमुख विचारक स्टीवर्ट उडैल ने कहा था-‘हवा और पानी को बचाने, जंगल और जानवर को बचाने वाली योजनाएं असल में मनुष्य को बचाने की योजनाएं हैं’। इसी तर्ज पर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने विगत तीन चार दिनों से तपती धूप में छत्तीसगढ़ के दूरस्थ अंचल बस्तर एवं सरगुजा जाकर न सिर्फ जनप्रतिनिधियों से मुलाकात कर रहे हैं बल्कि ‘नरवा-गरवा-घुरवा-बाड़ी’ के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ, पेड़-पौधे, पानी व ताजा हवा के महत्व को बताते हुए आम व खास लोगों से पेड़ की छांव में चौपाल लगाकर उनकी समस्याएं सुन रहे हैं तथा उसे छांव तले उनकी समस्याओं को हल भी कर हैं। पेड़ की महत्ता, शुद्ध वातावरण में जो निर्णय ले रहे हैं वह अपने आप में एक सराहनीय कदम है। 
छत्तीसगढ़ की धरती के नीचे और ऊपर प्रकृति के अनमोल भण्डार तो है ही पर्यावरण, जैव-विविधिता तथा वन व वन्य जीव भी अधिक हैं। वन संसाधन में राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 44 प्रतिशत भाग में वनों का विस्तार है। छत्तीसगढ़ वन आवरण के दृष्टिकोण से देश में तीसरे स्थान पर है। राज्य के 59,772 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वनों का विस्तार है जो देश के कुल वन क्षेत्र का लगभग 7.77 प्रतिशत है। 
वन्य प्राणियों के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए उचित प्रयास व उचित रखरखाव के विभिन्न पहलुओं पर तेजी के साथ राज्य सरकार काम करने लगी है। वैसे तो छत्तीसगढ़ में पक्षियों की कई लुप्तप्राय प्रजातियां पाई गई हैं। राज्य में लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क जैसे पक्षियों की उपस्थिति बताती है कि राज्य की आबो-हवा इन लुप्तप्राय प्रजातियों के लिये अनुकूल होने के कारण भारत में पाई जाने वाली कुल 1300 विभिन्न प्रजातियों में से 400 से अधिक पक्षियों का रहवास छत्तीसगढ़ में है। छत्तीसगढ़ में नदियों के उद्गम स्थल होने के साथ ही देश के वृहद प्रवाह क्रम गंगा, नर्मदा, महानदी एवं गोदावरी प्रवाह क्रम के बीच महत्वपूर्ण जल विभाजक का कार्य करता है। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मण्डल द्वारा प्रदूषण को रोकने अनेक कार्य कर रहे हैं। प्रदूषणकारी उद्योगों को ‘ऑन लाइन कन्सेट मैनेजमेंट एण्ड मॉनिटरिंग सिस्टम’ के तहत उद्योगों में यह स्थापना हो चुकी है। 
सारी दुनिया अब यह मानने लगा है कि पर्यावरण  और विकास एक ही सिक्के दो पहलू हैं और उन्हें प्रतियोगी नहीं बल्कि पूरक के रूप में देखने की आवश्यकता है। पर्यावरण विशेषज्ञ तो यह मानने लगा है कि पर्यावरण एवं जैव विविधता में हुए हृस के कारण आए दिन हमें नई-नई बीमारियों का सामना करना पड़ा है। क्योंकि ऐसे रोगों के प्रतिरोधक अंश हमें जिन जीवों एवं वनस्पतियों से प्राप्त होते थे, वह अब समाप्त हो चुके हैं। यदि इस पर अब भी गम्भीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति बद से बदतर होती जाएगी। इस बात की कोई चिंता नहीं कि आने वाले पीढ़ी हमें क्या कहेंगे, किसे दोष देंगे? अब हमें चेत ही जाना चाहिए कि यह पर्यावरण हमारे लिए, जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी है।।. कवि अभय कुमार जी का वह कविता को याद करना चाहूंगा, जो पृथ्वी गान पर लिखा था-

ब्रह्मांड की नीली मोती, धरती
ब्रह्मांड की अदभुत ज्योति, धरती 
सब महाद्वीप, महासागर संग -संग 
सब वनस्पति, सब जीव संग -संग 
संग -संग पृथ्वी की सब प्रजातियाँ
काले, सफेद, भूरे, पीले, अलग-अलग रंग
इंसान हैं हम , धरती हमारा घर 

आइये हम सब अपने हिस्से के पौधा जरूर लगाएं और इसकी देखभाल भी करें, कुछ वर्षों बाद यह बड़ा होगा तो दिल को सुकून देगा, नई पीढ़ी को छांव मिलेगा, आइए लहलहाएँ अपने हिस्से की हरियाली।
 

 

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जलवायु परिवर्तन के नाम पर आदिवासियों के भोजन पर सीधा हमला

रायपुर. भोजन के अधिकार अभियान सम्मेलन में छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच की ओर से आयोजित परिचर्चा में भोजन सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और वन अधिकार विषय पर चर्चा की गई. इस परिचर्चा में  बैगा, पहाड़ी कोरवा महापंचायत व अन्य आदिवासी समाज ने अपनी हिस्सेदारी दर्ज की.

वनाधिकार मंच के संयोजक विजेंद्र अजनबी ने बताया कि सम्मेलन में विभिन्न प्रदेशों में भोजन के अधिकार अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता चर्चा करने के लिए राजधानी रायपुर में एकत्रित हुए हैं. इस सम्मेलन में एक सत्र जंगल से भोजन और पोषण की सुरक्षा तथा वन अधिकार पर आसन्न चुनातियों पर केन्द्रित रखा गया था. इस सत्र में मध्यप्रदेश के नरेश बिश्वास ने बहुत रोचक अंदाज में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि जंगल से वननिर्भर समुदाय 163 किस्म के खाद्य पदार्थ हासिल करते हैं. इनमे से बहुत से खाद्य पदार्थों में पाए जाने वाले पोषक तत्व, बाज़ार में बिकने वाले या खेतों में उगने वाले अन्न के मुकाबले कहीं ज्यादा होते है. जंगल में खाना, सिर्फ कंद-मूल में ही नहीं, बल्कि, फूल, कली, बीज, गोंद, बेलें और कवकों के रूप में भी होते हैं. सिर्फ आदिवासी ही है, जो इनका महत्त्व समझ सकते हैं, और इन्हें बचाकर ही जंगल को बचाया जा सकता है. 

महाराष्ट्र के शोषित जनांदोलन से जुड़ी मुक्ता श्रीवास्तव ने बताया कि वर्ष 1927 में बने भारतीय वन कानून में प्रस्तावित संशोधन वनों पर अपने भोजन और आजीविका पर निर्भर समुदाय के लिए बेहद खतरनाक है. एक तरफ वन अधिकार कानून होने के बावजूद उक्त संशोधन, आदिवासियों को जंगल में प्रवेश करने से रोकेगा और उन पर अत्याचार बढ़ जाएंगे. उन्होंने कहा कि वन विभाग के पास आधुनिक हथियार रखने और किसी के शक के आधार पर बंदी बनाने की गैर-जरुरी शक्तियां आ जाएगी.    

झारखण्ड वनाधिकार मंच से  संबंद्ध मिथिलेश कुमार ने बताया कि झारखण्ड में भी वनाधिकार कानून का बदहाल है. लोगों को जंगल पर बेहद कम अधिकार मिले हैं, और उनके ज्यादातर दावे लटकाए रखे गए हैं. उन्होंने पलामू जिले का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां रेल परियोजना के लिए वनभूमि का बगैर ग्रामसभा की सहमति के आसानी से डाइवर्ट कर दिया गया पर वही, वनाधिकार के लंबित दावों को नहीं निपटाया गया. ऐसी परिस्थिति में आदिवासी समाज अपनी भोजन की जरूरतों के लिए जंगल से विमुख होने के लिए मजबूर हो गया है. 

विजेंद्र ने बताया कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की कार्ययोजना में जंगलों को निजी भागीदारी से सिर्फ लकड़ी उत्पादन करने वाली ईकाई के रूप में बदले जाने का खतरा बढ़ गया है, जिससे वहां की जैव-विविधता संकट में पड़ जाएगी और वन-निर्भर समाज पर बेदखली की तलवार लटकने लगेगी, जिसके परिणामस्वरूप, उनके भोजन की स्वतंत्रता और स्वायत्ता ख़त्म हो जाएगी. सिर्फ प्राकृतिक जंगलों से और सामुदायिक प्रबंधन से ही जंगलों से खाद्य सुरक्षा मिल सकती है. 

परिचर्चा में गढ़चिरोली, महाराष्ट्र में ग्रामसभाओं के वन-प्रबंधन के प्रयोग से जुड़े केशव गुरनुले, खोज-गरियाबंद के बेनीपुरी, कवर्धा से इतवारी बैगा ने भी अपने विचार प्रकट किए.

 

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विश्व का सबसे लंबा तिरंगा लहराया जाएगा रायपुर में

रायपुर.देशभक्ति वह नहीं है जो हर रोज टीवी चैनलों पर खबरों के जरिए दिखाई जा रही है. लोगों को आपस में बांटने, कांटने और छांटने की वजह से यह देश एक संक्रमण काल से गुजर रहा है. इस विशाल देश को अक्षुण्ण बनाए रखने की नीयत से ही कुछ लोगों ने विश्व का सबसे लंबा तिरंगा लहराने के बारे में विचार किया है. अंतरराष्ट्रीय  पर्यावरणविद ,जैविक एवं हर्बल खेती के लिए विख्यात डॉ राजाराम त्रिपाठी के साथ छत्तीसगढ़ चेंबर ऑफ कॉमर्स की उपाध्याय भरत बजाज, साहित्यकार समाजसेवी लक्ष्मी नारायण लाहोटी, युवा समाजसेवी रोहित सिंह, अमजीत जुनेजा और सरोज सिंह ने पिछले दिनों वृंदावन हॉल में आयोजित एक बैठक में तय किया कि लोगों में देशभक्ति की नवभावना का संचार करने के लिए तिरंगा लहराया जाय. बैठक में इस बात पर मंथन किया गया कि आयोजन की सफलता के लिए किन-किन संगठनों और लोगों को जोड़ना महत्वपूर्ण होगा. सभी ने यह तय किया कि रायपुर के हर सामाजिक संगठन और नागरिकों से आयोजन में जुड़ने का अनुरोध किया जाए. विश्व का सबसे बड़ा तिरंगा लहराने की योजना को मूर्तरुप देने का बीड़ा फिलहाल वसुधैव कुटुंबकम फाउंडेशन ने उठाया है. आयोजन के मुख्य कर्ताधर्ता राजाराम त्रिपाठी ने बताया कि हमारे लिए देश और देश के लोग और उनकी एकता बेहद महत्वपूर्ण है. उन्होंने बताया कि इस आयोजन में शहीद परिवारों को भी आमंत्रित किया जाएगा.

 

 

 

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