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विश्व का सबसे लंबा तिरंगा लहराया जाएगा रायपुर में

रायपुर.देशभक्ति वह नहीं है जो हर रोज टीवी चैनलों पर खबरों के जरिए दिखाई जा रही है. लोगों को आपस में बांटने, कांटने और छांटने की वजह से यह देश एक संक्रमण काल से गुजर रहा है. इस विशाल देश को अक्षुण्ण बनाए रखने की नीयत से ही कुछ लोगों ने विश्व का सबसे लंबा तिरंगा लहराने के बारे में विचार किया है. अंतरराष्ट्रीय  पर्यावरणविद ,जैविक एवं हर्बल खेती के लिए विख्यात डॉ राजाराम त्रिपाठी के साथ छत्तीसगढ़ चेंबर ऑफ कॉमर्स की उपाध्याय भरत बजाज, साहित्यकार समाजसेवी लक्ष्मी नारायण लाहोटी, युवा समाजसेवी रोहित सिंह, अमजीत जुनेजा और सरोज सिंह ने पिछले दिनों वृंदावन हॉल में आयोजित एक बैठक में तय किया कि लोगों में देशभक्ति की नवभावना का संचार करने के लिए तिरंगा लहराया जाय. बैठक में इस बात पर मंथन किया गया कि आयोजन की सफलता के लिए किन-किन संगठनों और लोगों को जोड़ना महत्वपूर्ण होगा. सभी ने यह तय किया कि रायपुर के हर सामाजिक संगठन और नागरिकों से आयोजन में जुड़ने का अनुरोध किया जाए. विश्व का सबसे बड़ा तिरंगा लहराने की योजना को मूर्तरुप देने का बीड़ा फिलहाल वसुधैव कुटुंबकम फाउंडेशन ने उठाया है. आयोजन के मुख्य कर्ताधर्ता राजाराम त्रिपाठी ने बताया कि हमारे लिए देश और देश के लोग और उनकी एकता बेहद महत्वपूर्ण है. उन्होंने बताया कि इस आयोजन में शहीद परिवारों को भी आमंत्रित किया जाएगा.

 

 

 

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लूट सको तो लूट लो... कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में भी चल रहा था गजब का खेल

रायपुर. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक खास प्रचारक के रुप में विख्यात कुशाभाऊ ठाकरे का पत्रकारिता में क्या योगदान है इसकी जानकारी देश के अच्छे खासे नामचीन लेखकों और पत्रकारों के पास नहीं है. ( इस खबर के रिपोटर के पास भी नहीं है क्योंकि आज तक पत्रकारिता के किसी भी मूर्धन्य ने इस रिपोटर से यह नहीं कहा कि जीवन में अगर कुछ बनना चाहो तो कुशाभाऊ ठाकरे जैसा पत्रकार बनना.) जब भी कभी श्रेष्ठ पत्रकार बनने या बनाने की बात होती रही तो गणेश शंकर विद्यार्थी के बाद माखनलाल चर्तुवेदी, राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी का नाम लिया जाता रहा. बहरहाल यहां छत्तीसगढ़ के  कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय का जिक्र इसलिए हो रहा है क्योंकि यह विश्वविद्यालय इन दिनों सुर्खियों में है. सुर्खियों की एक वजह यह है कि भूपेश सरकार ने यहां पढ़ने-लिखने और साहित्य से गहरा अनुराग रखने वाले एक कुल सचिव आनंद शंकर बहादुर की तैनाती कर दी है. अब नए कुल सचिव ने तैनात होते ही गंदगी पर चूना छिड़कने का काम बंद कर दिया है. कुल सचिव ने हाल के दिनों में विश्वविद्यालय के अधीन शोधपीठों के चार अध्यक्षों से कामकाज का हिसाब मांग लिया है जिसे लेकर हडकंप मचा हुआ है.

बताइए तो सही क्या किया आपने

कुल सचिव ने माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोधपीठ की अध्यक्ष आशा शुक्ला को पत्र जारी कर पूछा है कि आप 17 मार्च 2015 से 7 मार्च 2018 तक पदस्थ थीं. अब आप बताइए कि आपने कब-कब मासिक, छमाही या वार्षिक प्रतिवेदन तैयार किया है. पत्र में यह भी उल्लेखित है कि बतौर अध्यक्ष आशा शुक्ला को 32 लाख 37 हजार 97 रुपए का मानदेय दिया गया. उन्होंने राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोधपीठ की अध्यक्ष बने रहने के दौरान कुछ आयोजन भी किए थे जिन पर 3 लाख 90 हजार 826 रुपए का खर्च आया. इसी तरह दीनदयाल उपाध्याय मानव अध्ययन शोध पीठ के अध्यक्ष प्रवीण मैशरी एक जुलाई 2017 से 22 दिसम्बर 2018 तक बतौर अध्यक्ष पदस्थ थे. इस अवधि में उन्हें कुल 12 लाख 75 हजार रुपए का मानदेय दिया गया और उन्होंने जो आयोजन किए उस पर 3 लाख 24 हजार 826 रुपए का व्यय हुआ. श्री मैशरी से भी उनके द्वारा किए गए कामकाज का लेखा-जोखा मांगा गया है. भाजपा नेता चंद्रशेखर साहू के अत्यंत करीबी समझे जाने वाले प्रभात मिश्रा हिन्द स्वराज पीठ के अध्यक्ष थे. वे 26 मई 2018 से 22 दिसम्बर 2018 तक पदस्थ थे. इस दौरान उन्हें चार लाख 64 हजार 516 रुपए का मानदेय दिया गया. उनसे भी पूछा गया है कि बताइए प्रतिवेदन कहां है. कबीर विकास संचार अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष मनोज चतुर्वेदी 5 अक्टूबर 2018 से 22 दिसम्बर 2018 तक तैनात थे. उन्हें भी कुल एक लाख 93 हजार 549 रुपए का मानदेय दिया गया. खबर है कि चारों अध्यक्ष ने अब तक अपने कामकाज का लेखा-जोखा यानी प्रतिवेदन विश्वविद्यालय को अब तक नहीं सौंपा है. अभी यह साफ नहीं है कि विश्वविद्यालय प्रशासन अध्यक्षों पर कोई कानूनी कार्रवाई करेगा या नहीं, लेकिन भूपेश सरकार को एक्शन लेने वाली सरकार माना जाता है इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि सभी अध्यक्ष देर-सबेर नप जाएंगे.

पूर्व अध्यक्षों पर भी गिरेगी गाज

माधव राव सप्रे शोधपीठ पर श्रीमती आशा शुक्ला से पहले परितोष चक्रवर्ती नाम के एक शख्स तैनात थे. खबर है कि उनके कार्यकाल में भी किसी तरह का कोई कामकाज नहीं हुआ. सूत्र बताते हैं कि जल्द ही उन्हें भी प्रतिवेदन देने के लिए नोटिस भेजा जाएगा. इसी तरह कबीर विकास संचार अध्ययन केंद्र में दिल्ली के भाजपा कार्यालय में रहने वाले डाक्टर आर बाला शंकर नियुक्त किए गए थे. वे भी  कभी-कभार ही विश्वविद्यालय में आया करते थे. विश्वविद्यालय में कई तरह के प्रोफेसरों की नियुक्ति भी कर दी गई थी जो महीने में केवल एक बार तनख्वाह लेने के लिए आते थे. पूर्व सरकार ने एक हास्य कवि के पुत्र को भी इस विश्वविद्यालय में स्थायी प्रोफेसर बना दिया है जो इन दिनों अपनी सेवाएं कहीं और दे रहा है.

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दादागिरी का चरम... एक भी बार पीएचक्यू दर्शन देने नहीं पहुंचे मुकेश गुप्ता

रायपुर. देश के सबसे ज्यादा विवादास्पद पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता इसी साल 9 फरवरी को निलंबित कर दिए गए थे. सरकार ने निलंबन अवधि के दौरान जीवन निर्वाह भत्ता देने के साथ आदेश में साफ तौर पर कहा था कि उन्हें पुलिस मुख्यालय ( पीएचक्यू ) में आमद देनी होगी, लेकिन निलंबन के तीन महीने पूरे होने जा रहे हैं और उन्होंने एक भी बार पीएचक्यू में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवाई है. जबकि उनके साथ ही निलंबित किए गए आईपीएस रजनेश सिंह केवल एक मर्तबा पीएचक्यू आए थे और फिर वे भी गायब है.वैसे जो कर्मचारी या अफसर निलंबित कर दिए जाते हैं उनका कर्तव्य स्थल पर उपस्थित रहना अनिवार्य नहीं होता, लेकिन पुलिस की नौकरी में ऐसा नहीं है. यहां एक प्रचलित और मान्य परम्परा यह रही है कि कर्मचारी या अफसर को सिविल ड्रेस में सरकार द्वारा निर्धारित किए गए स्थल पर आमद देनी होती है.

नहीं जा सकते मुख्यालय छोड़कर

नाम न छापने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि निलंबित कर्मचारी या अफसर अपने जीवन-यापन के लिए किसी भी तरह के  व्यवसाय या काम-धंधे को करने के लिए स्वतंत्र होते हैं, लेकिन आमद देने के लिए जो स्थान निर्धारित किया जाता है वहां हाजिरी देनी ही होती है. निलंबन अवधि के दौरान उन्हें मुख्यालय छोड़ने की अनुमति भी नहीं होती. यदि किसी विशेष परिस्थिति में मुख्यालय से बाहर जाने की आवश्यकता होती है तो विभाग प्रमुख से अनुमति अनिवार्य होती है. इधर निलंबन के बाद से  मुकेश गुप्ता का  ज्यादातर समय दिल्ली ही बीत रहा है. एक बार तो दिल्ली के खान मार्केट में उन्हें सुपर सीएम की उपाधि से विख्यात अमन सिंह के साथ भी देखा गया था. पुलिस अफसर का कहना है कि जब सरकार ने मुकेश गुप्ता को शासकीय आवास आवंटित किया है तो उन्हें अपनी सभी कानूनी कार्रवाई शासकीय आवास से ही संपादित करनी चाहिए, लेकिन कानूनी प्रक्रियाओं में उनका पता किसी दूसरी जगह का दिख रहा है. हाल के दिनों में जब वे ईओडब्लू में अपना बयान देने के लिए पहुंचे तो यह कहते हुए पाए गए थे कि वे दिल्ली से बयान देने के लिए रायपुर आए हैं. यहां तक उनके केस की पैरवी करने के लिए भी दिल्ली से महंगे वकील छत्तीसगढ़ पहुंचे थे. वैसे यह जांच का विषय है कि पुलिस का एक अफसर अपनी तयशुदा कमाई से कितने और किस तरह के महंगे वकीलों की सेवाएं ले सकता है. महंगे वकीलों की फीस कौन दे रहा है. गौरतलब है कि सरकार ने मुकेश गुप्ता को कई बिन्दुओं पर आरोप पत्र थमा दिया है. सूत्र कहते हैं कि उनकी गैर- मौजूदगी को लेकर भी उनसे जल्द ही जवाब मांगा जा सकता है.

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गुटखे का पैसा खाओगे तो परिवार में कैंसर हो जाएगा... और फिर...कहर बनकर टूटी पुलिस

रायपुर. अगर आप सरकारी अफसर है तो आपको अपने मातहतों को ऊर्जा से लबरेज कर सकारात्मक काम लेने का हुनर आना चाहिए. हर जगह अपनी पदस्थापना के दौरान नवाचार के लिए मशहूर रहे पुलिस अफसर हिमांशु गुप्ता ( अब दुर्ग आईजी ) को मालूम था कि अन्य जिलों की तरह  दुर्ग की पुलिस भी गुटखे के कारोबारियों से उपकृत होते रहती है. बस... उन्होंने अपने मातहत पुलिस कर्मचारियों की एक बैठक ली और बेहद संवेदनात्मक ढंग से कहा- क्या आप जानते हैं कि जो कुछ भी हम बुरा करते हैं उसका असर हमारे परिवार पर होता है. याद रखो... अगर गुटखे का पैसा खाओगे तो एक न एक दिन परिवार के किसी न किसी सदस्य को कैंसर हो जाएगा. उनकी यह टिप्पणी एक पंच लाइन थीं और फिर पुलिसकर्मियों ने छापामार कार्रवाई को अंजाम देकर यह साबित कर दिया कि वे अपने परिवार को कैंसर से मुक्त रखना चाहते हैं.

पिछले महीने 29 अप्रैल को गुटखा कारोबारियों को धरपकड़ की सबसे पहली कार्रवाई जेवरा-सिरसा पुलिस ने की. पुलिस को यह सूचना मिल गई थी कि एक पिकअप क्रमांक सीजी 07 बीजी 2279 में पानराज गुटखा भरकर भिलाई ले जाया जा रहा है. पुलिस टीम ने तत्काल अलर्ट होकर घेराबंदी की और पिकअप को पकड़ लिया. जांच के दौरान पिकअप से हरे रंग की आठ बोरियों में छह कट्टा जर्दायुक्त गुटखा मिला. जप्त गुटखे की कीमत तीन लाख 45 हजार छह सौ रुपए आंकी गई है. पुलिस ने इस मामले में पंचम सिंह परिहार, नफीस अहमद, राजेंद्र पंडा,  मोहम्मद बिसमिल्लाह को आरोपी बनाया है, लेकिन खबर है कि ये सारे लोग साजिद खान नाम के व्यक्ति के लिए काम करते हैं. पुलिस ने जेवरा-सिरसा में साजिद खान के गोदाम में भी दबिश देकर लगभग 40 लाख रुपए मूल्य के गुटखे का कच्चा मटेरियल जप्त किया है. यहां यह बताना लाजिमी है कि पूरे प्रदेश में जर्दायुक्त गुटखे के विक्रय में प्रतिबंध है बावजूद हर जगह इसकी बिक्रीधड़ल्ले से होती है. छत्तीसगढ़ की राजधानी में भी गुटखा कारोबारी पुलिस की मिली-भगत से करोड़ों का अवैध व्यापार संचालित कर रहे हैं. फिलहाल तो जर्दायुक्त गुटखा बेचने के नाम पर जहर बेचने वाले कारोबारियों पर जेवरा-पुलिस ने ही शिकंजा कसा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में दुर्ग जिले की पुलिस की तरह सभी थानों की पुलिस गुटखा कारोबारियों पर कहर बनकर टूटेगी.

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बैगा आदिवासी ने डीएम अवस्थी से कहा- कैसे उतार पाऊंगा आपका अहसान

रायपुर. आम जनता के कठिन से कठिन काम को कैसे सरल बनाया जा सकता है इसे अगर सही ढंग से जानना है तो कभी आपको छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक दुर्गेश माधव अवस्थी की कार्यप्रणाली को नजदीक से देखने- समझने की चेष्टा अवश्य करनी चाहिए. सामान्य तौर पर यह धारणा कायम रही है कि जो कोई भी पुलिस की वर्दी पहन लेता है वह खुद को भीतर से पत्थर का बना लेता हैं, लेकिन पुलिस महानिदेशक अवस्थी इस धारणा को अक्सर तोड़ते रहते हैं. पुलिस परिवार को राहत देने के लिए वे हर सप्ताह अपने दफ्तर में समस्या निवारण शिविर लगाते हैं. इस शिविर में अब तक हजारों लोगों को राहत मिल चुकी है. इसके अलावा वे हर रोज आमजन से मुलाकात करते हैं और उनकी समस्याओं का तुरन्त निराकरण भी करते हैं. अगर कोई सही है तो उनसे मिलना बेहद आसान है, लेकिन अगर कोई गलत है तो फिर उनसे मिलने में मुसीबत खड़ी हो सकती है. वैसे उनके पुलिस महानिदेशक बनने से लिखने-पढ़ने वालों के अलावा समाज का एक बड़ा वर्ग बेहद खुश भी है. उनके पहले जितने भी पुलिस महानिदेशक हुए उन सबने खुद को जनता से काट लिया था. एक पुलिस महानिदेशक तो मिलने-जुलने वालों के सामने ही सिगरेट पर सिगरेट फूंकते रहते थे. आधी जनता तो कैंसर होने के भय से ही भाग जाती थीं. एक पुलिस महानिदेशक छोटा सा चवन्नी छाप मोबाइल लेकर घूमते थे और केवल रमन सिंह और उनके रिश्तेदारों का ही फोन अटैंड करते थे. फिर चाहे कोई भी फोन लगाए... घंटी बजती रहती है और सबको सुनना पड़ता था- ओम जय जगदीश हरे... स्वामी जय जगदीश हरे.

बहरहाल इस खबर में डीएम अवस्थी का जिक्र इसलिए हो रहा है क्योंकि अभी हाल के दिनों में उन्होंने बैंगलोर में पदस्थ एक पत्रकार मंजू साईनाथ की सूचना के बाद जो कार्रवाई की हैं उसकी चौतरफा प्रशंसा हो रही है. मंजू साईनाथ ने उन्हें फोन पर अवगत कराया कि मध्यप्रदेश के शहडोल के रहने वाले बैगा आदिवासी केशव प्रसाद की पत्नी का सेक्टर 9 भिलाई में देहांत हो गया है. केशव की पत्नी बर्न यूनिट में भर्ती थी और केशव अपनी प्रापर्टी बेचकर उसकी चिकित्सा करवा रहा था. मंजू साईनाथ ने जानकारी दी कि पैसों की तंगी की वजह से केशव जैसे-तैसे इलाज करवा रहा था, लेकिन अब 80 हजार रुपयों का भुगतान करने में उसे दिक्कत पेश आ रही है. पुलिस महानिदेशक ने इस सूचना के बाद तुरन्त आईजी दुर्ग रेंज हिमांशु गुप्ता से संपर्क किया और सेक्टर 9 अस्पताल प्रबंधन से मानवीय आधार पर बात करने का आग्रह किया. दुर्ग आईजी गुप्ता भी मानवीय कामों के लिए अग्रणी रहते हैं सो उन्होंने भी तत्काल प्रबंधन को बकाया राशि माफ करने का अनुरोध किया. अस्पताल प्रबंधन ने सारी औपचारिकताएं पूरी की और जल्द ही रिजनों को शव सौंप दिया गया. इस पूरी कार्रवाई में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक दुर्ग रोहित झा और निरीक्षक प्रमिला मंडावी ने भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई. इस मानवतापूर्ण कार्रवाई के लिए बैगा आदिवासी केशव प्रसाद और उसके परिवार ने पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी के प्रति आभार जताया है. 

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी

जिसको भी देखना कई बार देखना

हार और जीत तो मुकद्दर की बात है

टूटी है किसके हाथ में तलवार देखना

 

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मुंह खोलेगी.. वो बोलेगी... तभी जमाना बदलेगा

बिलासपुर. चार मार्च को छत्तीसगढ़ की न्यायधानी में अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए युवतियों और महिलाओं ने एक जबरदस्त मार्च निकालकर अपना प्रतिवाद दर्ज किया. यह मार्च मिनी माता चौक, तालापारा से होते हुए मगरपारा पहुंचा. इस दौरान महिलाओं ने जमकर नारेबाजी की और जनगीत गाकर मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश जताया. कार्यक्रम की संयोजक प्रियंका शुक्ला ने बताया कि घृणा और हिंसा से भरे वर्तमान सरकार की नीति सबसे ज्यादा महिलाओं के अधिकारों का हनन कर रही है.उन्होंने कहा कि फासी और मनुवादी ताक़तों में बढ़ोतरी की वजह से दलित, ईसाईयों, मुस्लिमों और अल्पसंख्यकों पर हमले तेज हुए हैं. हर नागरिक असुरक्षित है. जाहिर सी बात है महिलाएं भी अछूती नहीं है. इस दौरान महिलाओं ने बराबरी का अधिकार दिए जाने को लेकर आवाज बुलंद की.  

मार्च में अधिवक्ता रजनी सोरेन, साहित्यकार सत्यभामा अवस्थी, सविता गंधर्व, रिजवाना, रुखसार, सम्पा, सरिता सबिया, आशा साहू, प्रियंका, सिम्पल रजक, ज्योति, कुलबीर सतपथी, राधा श्रीवास सहित सैकड़ों महिलाएं, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे. मार्च में महिला अधिकार मंच, ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन, पीयूसीएल, जगलग, आम आदमी पार्टी, छत्तीसगढ़, वसुधा महिला समिति, इप्टा बिलासपुर, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन, एचआरएलएन, जन स्वास्थ्य अभियान, जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ सहित अन्य कई महत्वपूर्ण संगठन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया.

 

 

 

 

 

 

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डोंट वान्ट मोदी... नहीं मांगता है अपुन को नहीं मांगता मोदी

 इस गाने को नाट्य संस्था कोरस भिलाई के साथी जय प्रकाश नायर, संतोष बंजारा, जावेद और अमित के साथ मिलकर गाया है. ईयरफोन लगाकर सुनिए यह गीत... शायद आपको अच्छा लगे. गाना सुनने के लिए नीचे दिए गए वीडियो पर क्लिक करें.

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शंकरलाल का जीवन बचाने आगे आया मसीही समाज

रायपुर. छत्तीसगढ़ क्रिश्चयन फोरम के प्रदेश अध्यक्ष अरुण पन्नालाल की अगुवाई में मंगलवार को एक प्रतिनिधि मंडल  ने पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी से मुलाकात की. फोरम के सदस्यों ने बताया कि जिला जांजगीर चांपा की तहसील नवागढ़ के ग्राम गोधना के रहने वाले 40 वर्षीय शंकरलाल साहू ने तीन साल पहले विधिवत तरीके से धर्म परिवर्तन कर लिया था, लेकिन इसके बाद उसके चचेरे भाइयों ने उसे प्रताड़ित करना प्रारंभ कर दिया. फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल ने कहा कि शंकरलाल के घर के सामने बाधा खड़ी कर दी गई है. इतना ही नहीं चचेरे भाई उसे न तो खेती करने देते हैं और न ही हैंडपंप से पानी निकालने देते हैं. आए दिन उसके परिवार के साथ मारपीट की जा रही है. उन्होंने बताया कि शंकरलाल अपने साथ हुई ज्यादती की शिकायत थाने में करता रहा है, लेकिन उचित कार्रवाई के अभाव में उसे और उसके परिवार को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है. फोरम के सदस्यों ने पुलिस प्रमुख को एक-दो अन्य घटनाओं के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि समाज से बहिष्कृत व्यक्ति समय पर न्याय नहीं मिल पाने की दशा में खुद को अपमानित महसूस करते हुए घातक कदम उठा लेता है. पुलिस महानिदेशक ने प्रतिनिधि मंडल को उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया. उन्होंने कहा कि आवश्यकता होने सभी पक्षों को बुलाकर सामाजिक बैठक की जाएगी और समस्या का हल ढूंढ लिया जाएगा.

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शराबबंदी के लिए गठित होने वाले अध्ययनदल में ममता शर्मा को शामिल करने की मांग

रायपुर.छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार शराब बंदी के पक्ष में हैं, लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि यह एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला होगा सो समाज के सभी वर्गों से सलाह-मश्विरा बेहद अनिवार्य है.अभी हाल के दिनों में नशामुक्ति अभियान के सदस्यों ने जब मुख्यमंत्री और आबकारी मंत्री से मुलाकात की तो उन्होंने आश्वस्त किया कि  शराबबंदी अवश्य होगी, लेकिन यह भी देखना होगा कि बंद के बाद घर पहुंच सेवा प्रारंभ न हो जाए. प्रतिनिधि मंडल में शामिल अभिषेक सिंह, ब्यास मुनि, कन्हैया अग्रवाल, रफीक सिद्दकी, मोहम्मद आरिफ, पकंज दास सहित अन्य सदस्यों ने मुख्यमंत्री और आबकारी मंत्री से यह आग्रह भी किया कि अभियान की प्रदेश संयोजक ममता शर्मा ने शराब बंदी के मसले पर काफी काम किया है सो उन्हें अध्ययनदल में अवश्य शामिल करें.मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया कि उनकी सरकार सभी पक्षों से बातचीत के आधार पर आगे बढ़ना चाहती है सो योग्य और क्षमतावान लोगों को सुझाव के लिए अवसर प्रदान किया जाएगा. मुख्यमंत्री ने इस बारे में अधिकारियों को आवश्यक निर्देश भी दिए.सदस्यों ने शराब बंदी करने वाले राज्यों के अध्ययन, नशामुक्ति के क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक संस्थाओं को शामिल करने के अलावा अस्पतालों में हेल्प डेस्क स्थापित करने की मांग भी की. सदस्यों का कहना था कि बिहार में शराब को लेकर सख्त कानून है. अगर कानून कठोर होगा तो अन्य नशीले पदार्थों की रोकथाम भी हो सकेगी.

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भाजपा के प्रतिशोध का शिकार हुए प्रगतिशील कृषक राजाराम

राजेश ( संपादक कल्ट करंट )

अगर फुरसत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना

हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है.

देश के प्रसिद्ध शायर बशीर भद्र का यह शेर आज सत्तासीनों को थोड़ी करवट बदलकर जमीनी हकीकत से रू-ब-रू होने को कहता है. आमतौर पर देखा गया है कि सत्ता में आने के बाद सत्ताधारी दल जनता के लिए जनपक्षीय नहीं रह जाते हैं. अभी हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद नई सरकारें बनी, लेकिन क्या व्यवस्था में कोई नयापन आएगा यह देखना अभी बाकी है.

दरअसल, सत्ता का उदासीन रवैया देखना हो तो उदाहरणों की कमी नहीं है. अविभाजित मध्य प्रदेश की सरकारी पत्रिका उद्यमिता समाचार का प्रकाशन उद्योग विभाग करता था. वर्ष 2000 के अंक में मुखपृष्ठ पर देश के सर्वश्रेष्ठ हर्बल किसान के रूप में डॉ राजाराम त्रिपाठी का फोटो छपा था तथा पूरी आवरण कथा उन पर ही केंद्रित थी. इसी क्रम में केंद्रीय विज्ञान एवं तकनीकी मंत्रालय की पत्रिका साइंस टेक इंटरप्रेन्योर ने भी अपने मुखपृष्ठ पर लिखा था कि देश का सर्वश्रेष्ठ हर्बल फार्म बस्तर में आकार ले रहा है. वर्ष 2001 में मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ बना. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनी और अजीत जोगी मुख्यमंत्री बने तब उन्हें बस्तर के किसान डॉ राजाराम त्रिपाठी के बारे में पता चला कि उन्होंने बैंक अधिकारी की नौकरी छोड़कर खेती में सफलताएं हासिल की है. उनकी इस सफलता को जानने के लिए जोगी स्वयं डॉ त्रिपाठी के कोंडागांव स्थित फार्म आए. उनके कार्य ,माडल को जमीन पर देखा और समझा तथा प्रदेश को हर्बल स्टेट घोषित किया. कुछ समय बाद राज्यपाल भी फार्म पर पहुंचे. धीरे-धीरे मंत्री अधिकारी सभी उनकी खेती के तौर-तरीकों को देखने समझने लिए कोंडागांव आने लगे.

 

जमकर चला राजनीतिक प्रतिशोध

राजनेताओं के आवागमन का परिणाम यह हुआ यह कि बीएससी,एल एल बी, हिंदी साहित्य, अंग्रेजी भाषा, इतिहास तथा अर्थशास्त्र सहित चार विषयों में एम ए तथा पीएचडी डाक्टरेट  की सर्वोच्च उपाधियों से विभूषित, प्रदेश के  सबसे ज्यादा शिक्षित किसान राजाराम त्रिपाठी को प्रगतिशील उच्च शिक्षित किसान का प्रदेश का चेहरा माना जाने लगा. राज्य बनने के लगभग डेढ़ साल बाद ही चुनाव हुए, भाजपा सत्ता में आई तब से लगातार 15 वर्षों तक राज्य में भाजपा का शासन रहा. लेकिन सत्ता में आते ही भाजपा राजनीतिक प्रतिशोध के अपने एजेंडे पर चल निकली. हांलाकि डॉ त्रिपाठी कभी किसी राजनीतिक दल के ना तो कभी सदस्य रहे हैं और ना ही किसी राजनीतिक दल से उनका कभी कोई सीधा जुड़ाव रहा है, लेकिन सत्ता में आई भाजपा उन्हें कांग्रेस समर्थक मानते हुए लगातार उपेक्षित और प्रताड़ित करती रही. न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि पूरे देश में कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए कम दर पर बिजली का कनेक्शन किसानों को दिया जाता है, लेकिन डॉ त्रिपाठी को राजनीतिक साजिश के तहत कमर्शियल बिजली कनेक्शन दिया गया और और बढ़ा-चढ़ा कर बिल आरोपित किया गया. बाद में बिजली का कनेक्शन भी काट दिया गया. अंततः न्यायालय की शरण लेने के बाद डॉ त्रिपाठी को राहत मिली. डाक्टर त्रिपाठी कोंडागांव में हर्बल उत्पाद से औषधि बनाने के लिए एक कारखाना स्थापित करना चाहते थे, लेकिन टालमटोल करते हुए बिजली विभाग ने तीन वर्ष तक बिजली का कनेक्शन नहीं दिया, जिसकी वजह से कारखाना अपने निर्धारित समय में पूरा नहीं हो सका और व्यवसाय प्रारंभ होने के पूर्व ही समाप्त हो गया. तीन साल की टालमटाल के बाद जब कनेक्शन मिला तो कारखाना शुरु करने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई तो श्रम कानून के विभिन्न पेंचों में फंसा कर कई तरह के मुकदमें दर्ज कर दिए गए.

झूठे मुकदमों की बाढ़

केंद्र में भाजपा के शासन में आने के तत्काल बाद डॉ. त्रिपाठी और उनके परिवार के सदस्यों पर दर्जनों झूठे आयकर के मुकदमें दर्ज कर दिये गये. हालांकि सभी शत-प्रतिशत मुकदमों में उन्हें ससम्मान जीत मिली और आयकर विभाग को हार का सामना करना पड़ा यहां तक कि न्यायालय ने अपने फैसलों में संबंधित आयकर अधिकारियों के विरुद्ध टीप भी लिखा। इस दौरान डॉ राजाराम त्रिपाठी जैविक खेती और औषधिय खेती के विशेषज्ञ के तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके थे. देश के राष्ट्रपति एपीजे कलाम साहब भी उनके फार्म पर आए व पीठ ठोंकी, फिर राष्ट्रपति भवन भी बुलाया. देश के विभिन्न हिस्सों में तथा दुनिया के 34  देशों में डॉ त्रिपाठी ने अपनी विशेषज्ञता से कृषि को लाभान्वित करने के प्रयास में लगे रहे. लेकिन पिछले 15 वर्षों में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सैकड़ों आयोजन जैविक खेती, उन्नत कृषि, पर्यावरण संरक्षण तथा आयुर्वेदिक उत्पाद आदि पर किए गए लेकिन किसी भी आयोजनों में इस अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ को आमंत्रित नहीं किया गया. इतना ही नहीं जिला स्तरीय सेमिनार ,वर्कशॉप आदि  में भी इन्हें बुलाने से भरसक परहेज किया गया. राजनीतिक भेदभाव और प्रताड़ना का ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है. किसी राजनीतिक दल तथा सक्रिय राजनीति से  न जुड़े होने के बावजूद इन्हें हर स्तर पर कांग्रेस समर्थक ही माना जाता रहा, लेकिन अब जब कि राज्य में कांग्रेस पुनः सत्ता में लौटी है, तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेसी सरकार डॉ राजाराम त्रिपाठी की विशेषज्ञता का लाभ प्रदेश के कृषि के उत्थान के लिए करेगी तथा उन्हें उनका सम्मान दिलाएगी. चुनाव के दौरान कांग्रेस ने किसानों की कर्ज माफी की घोषणा की थी, लेकिन यह सभी जानते हैं कि किसानों की समस्याओं का समाधान कर्ज माफी नहीं है. उन्हें समस्याओं के दुष्चक्र से निकालने के लिए उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने की आवश्यकता है और यह स्वावलंबन डॉ त्रिपाठी के कृषि मॉडल से आ सकता है. डॉ त्रिपाठी के द्वारा विकसित किए गए उच्च मूल्य, उच्च गुणवत्ता की चयनित फसलें, न्यूनतम कृषि लागत, खेतों पर ही प्राथमिक प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन तदुपरांत न्यूनतम लागत पर प्रभावी विपणन तथा वितरण नेटवर्क इनके सफल प्रायोगिक  मॉडल में  सन्निहित हैं.

कौन हैं राजाराम

एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे भारत का हरित योद्धा कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा. दरअसल,  डॉ त्रिपाठी ने भारतीय कृषि की बनी बनाई लीक तोड़ी है और वैज्ञानिक तत्व निहित खेती को परिभाषित किया है. उन्होंने विलुप्त हो रही जड़ी-बुटियों के संरक्षण के लिए न केवल महत्वपूर्ण कार्य किया है बल्कि इसके लिए उन्होंने इथिनो मेडिको गार्डेन के रूप में हर्बल फारेस्ट भी विकसित किया है, जहां इन विलुप्त होती प्रजातियों का संरक्षण किया जा रहा है. छत्तीसगढ़ के अति पिछड़े व अतिसंवेदनशील क्षेत्र के रूप में बस्तर को जाना जाता है, वहीं डॉ त्रिपाठी जन्मे और पले बढ़े.  इस पिछड़े इलाके में उन्होंने वहां उम्मीद की एक नई पौध का रोपण किया है और वहां के 400 से अधिक आदिवासी परिवार मां दंतेश्वरी हर्बल समूह ( www.mdhherbals.com) के साथ हर्बल फार्मिंग से जुड़ कर न केवल अपनी आजीविका चला रहे हैं बल्कि भारत की विरासती जड़ी-बुटियों को संजो रहे हैं इसके अलावा सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन (CHAMF www.chamf.org) के माध्यम से देश के 50 हजार से अधिक आर्गेनिक फार्मर्स डॉ त्रिपाठी के इस अभियान में कदम ताल कर रहे हैं.बी.एससी,  एलएलबी , हिंदी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य, इतिहास, अर्थशास्त्र सहित चार विषयों में एम. ए.तथा दो विषयों में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त डॉ त्रिपाठी को  देश का सबसे ज्यादा शिक्षा प्राप्त किसान माना जाता है. अभी हाल ही में डा. त्रिपाठी को  देश के ४५ किसान संगठनों के  महासंघ अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा )  का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है। डॉ त्रिपाठी के नेतृत्व में मां दंतेश्वरी हर्बल  को देश का पहला आर्गेनिक (जैविक) सर्टिफाइड उत्पाद बनाने वाली कंपनी के रूप में 18 साल पहले वर्ष 2000 में मान्यता मिली. दो दशकों से  वे अपने उत्पादों का यूरो,अमेरिका सहित कई देशों में निर्यात भी कर रहे हैं और वहां इसे काफी पसंद भी किया जा रहा है. उन्हें  बेस्ट एक्सपोर्टर का अवार्ड भी मिल चुका है. अभी हाल में ही भारत सरकार के सबसे बड़े कृषि क्षेत्र के संगठन सी .एस .आई. आर. CSIR के साथ करार कर स्टिविया की खेती और  इससे  कड़वाहट रहित स्टिविया की शक्कर बनाने के लिए कारखाना लगाने के लिए २- दो   करार किया है।  उल्लेखनीय है हर्बल या आर्गेनिक व्यवसाय से जुड़ी देश की बड़ी कंपनियां जंगली जड़ी-बुटियों का भारी मात्रा में दोहन तो कर रही हैं लेकिन उनके संरक्षण की दिशा में उनका योगदान नगण्य है, इसकी वजह से जुड़ी बुटियों की ढेर सारी प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर है. ऐसी विलुप्त हो रही जुड़ी-बुटियों को संरक्षित करने का महती कार्य वे कर रहे हैं. उनके इन योगदान को देखते हुए उन्हें की अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई पुरस्कार जिनमें ग्रीन वारियर भी शामिल हैं, से नवाजा गया हैं.अब तक देश-विदेश से उन्हें 150 से अधिक अवार्ड मिले हैं.

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