संस्कृति

अपसंस्कृति फैलाने वाले छालीवुड के कलाकारों को संस्कृति विभाग ने  दिखाया बाहर का रास्ता... एक बड़े वर्ग में हर्ष

अपसंस्कृति फैलाने वाले छालीवुड के कलाकारों को संस्कृति विभाग ने दिखाया बाहर का रास्ता... एक बड़े वर्ग में हर्ष

रायपुर. छत्तीसगढ़ में अब बहुत कुछ अच्छा हो रहा है... बस... छत्तीसगढ़ी में निर्मित होने वाली फिल्मों का स्तर ही निराश करने वाला है. मुंबईयां फिल्मों की चोरी-चकारी और अपसंस्कृति को परोसने की वजह से छत्तीसगढ़ का प्रबुद्ध दर्शक यहां के फिल्मी कलाकारों को न तो सम्मान देता है और न ही गंभीरता से लेता है. इक्के-दुक्के दो-चार कलाकार प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहे हैं, मगर लगता है कि इन दिनों वे भी भेड़चाल में फंसकर रह गए हैं. छत्तीसगढ़ी में निर्मित होने वाली फिल्में कितनी बंडल होती है अगर इसकी बानगी देखनी हो तो हाल में रीलिज हुई राजा भैया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. इस फिल्म को देखने के बाद अपने माथे पर हथौड़ा मारकर खुद को चोटिल कर लेने की इच्छा बलवती हो जाती है. बहरहाल यहां छत्तीसगढ़ी फिल्मों का जिक्र इसलिए हो रहा  है क्योंकि हाल के दिनों में सरकार के संस्कृति विभाग ने छालीवुड के तथाकथित नामचीन कलाकारों को राज्योत्सव से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. विभाग के इस कदम की हर कोई सराहना कर रहा है. हालांकि जानने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि सब कुछ ढचरा हो जाता...अगर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल प्रत्येक कार्यक्रम पर पैनी नजर नहीं रखते ? 

भाजपा के प्रचार में लगे थे कलाकार

राज्य में जब भाजपा की सरकार काबिज थी तब संस्कृति विभाग ने छत्तीसगढ़ी फिल्मों और उससे जुड़े कलाकारों को मोटी रकम देकर प्रमोट करना ही संस्कृति को बढ़ावा देना मान लिया था. एक से बढ़कर एक घटिया दर्जें की फिल्मों में काम करने वाले कलाकारों ने पूरे विभाग पर कब्जा कर रखा था. ( हालांकि यह कोशिश संस्कृति विभाग में सालों से जमे कमीशनखोर अफसरों के चलते वे अब भी कर रहे हैं, लेकिन तेज-तर्रार मंत्री और संचालक की वजह से सफल नहीं हो पा रहे हैं. ) संस्कृति को बढ़ावा देने के नाम पर संस्कृति विभाग या तो ठुमके लगाने वाली मुबंई की हिरोइनों को आमंत्रित करता था या फिर भाजपा के लिए चुनाव में प्रचार करने वाले कलाकारों को अवसर प्रदान करता था. पाठकों को आश्चर्य होगा कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों में काम करने वाले दो-चार कलाकार खुलेआम भाजपा के लिए काम कर रहे थे. एक कलाकार पूर्व मुख्यमंत्री के सांसद बेटे की नाक का बाल बन गया था. यह महान कलाकार जिसे समाजसेवा के लिए पद्मश्री हासिल है, वह ही तय करता था कि किस कलाकार को राज्योत्सव में काम मिलेगा और किसे नहीं ? भाटापारा से भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ने का इच्छुक यह कलाकार किसी समय पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का भी करीबी था. बताते हैं कि इस कलाकार ने ही पन्द्रह सालों में संस्कृति विभाग से करोड़ों का अनुदान हासिल किया. यह राशि इतनी ज्यादा है कि इससे छत्तीसगढ़ के सैकड़ों जरूरतमंद कलाकारों को सम्मानजनक मानदेय प्रदान किया जा सकता था. बहरहाल एक के बाद एक फ्लाप फिल्मों की चलते अब इस तथाकथित महान कलाकार की हालत फिल्म एक्टर कुमार गौरव जैसी हो गई है. एक दूसरा कलाकार जो जरूरत से ज्यादा बड़बोला है वह भी भाजपा की टिकट पर महासमुंद लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का इच्छुक था. इन दिनों यह बड़बोला कलाकार भी परिदृश्य से गायब है. एक विलेन हर रोज जय रमन-जय रमन किया करता था. इन दिनों उसने पाला बदल लिया है. एक डायरेक्टर पूर्व मुख्यमंत्री के ओएसडी के बेहद निकट था. घर-परिवार और अफसरों की चाकरी के चलते इस डायरेक्टर ने पिछले साल एक बड़ा सम्मान हासिल कर लिया था. इन दिनों यह डायरेक्टर छत्तीसगढ़ की सिने इंडस्ट्रीज को प्रमोट करने के लिए चालू किस्म की फिल्में बनाने में व्यस्त है. पाठकों को याद होगा कि कुछ साल पहले भाजपा सरकार के मुखिया की पुत्री की रुचि के चलते सलमान खान छत्तीसगढ़ में दर्शकों को टाटा-बाय-करने आए थे. छत्तीसगढ़ में चेहरा दिखाने के लिए सलमान खान ने करोड़ो रुपए मांगे थे. सरकार यह पैसा संस्कृति विभाग के मद से देना चाहती थी, लेकिन वहां पदस्थ एक अधिकारी ने हाथ खड़े कर दिए. नतीजा यह हुआ कि सलमान का पैमेंट वीडियोकान नाम की कंपनी ने किया. सलमान के बाद करीना कपूर आई तो संस्कृति विभाग ने एक करोड़ 14 लाख रुपए का भुगतान किया. यह सवाल अब भी उठ खड़ा होता है कि क्या एक करोड़ 14 लाख  में छत्तीसगढ़ के  हजारों-हजार प्रतिभावान जरूरतमंद कलाकारों का सम्मान नहीं हो सकता था.?

बंटमारी करने को दिखाया बाहर का रास्ता

इस बार संस्कृति विभाग ने छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य, भरथरी और सरगुजिहा गायन से जुड़े कलाकारों के अलावा लोक नाट्य के कलाकारों को तव्वजों दी है. संस्कृति के नाम पर बंटमारी करने वाले कलाकारों को बाहर का रास्ता  दिखाए जाने से संस्कृति और कला के क्षेत्र से जुड़े एक बड़े वर्ग में हर्ष की लहर है. भिलाई के प्रसिद्ध रंगकर्मी सुरेश गोण्डाले कहते हैं- प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कुछ शुरूआत तो बड़ी अच्छी की है. स्थानीय तीज-त्योहार और परम्परा-संस्कृति को बढ़ावा देने के नाम पर वे जो कुछ कर रहे हैं उसे एक बड़ा वर्ग नोटिस में ले रहा है. सबको अच्छा लग रहा है. प्रदेश के संस्कृति विभाग ने भी अगर स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन देने का सिलसिला प्रारंभ किया है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए. आखिरकार दूर-दराज इलाके के कलाकार कब तक अपनी बारी का इंतजार करते रहेंगे. छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर के रहवासी और कई उपन्यासों के लेखक कैलाश बनवासी कहते हैं- संस्कृति विभाग ने राज्योत्सव में छालीवुड के कलाकारों से किनारा करके ठीक ही किया है. अब तक एक भी ऐसी छत्तीसगढ़ी फिल्में नहीं बनी जो छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करती हो तो फिर ऐसी फिल्मों से जुड़े किसी भी कलाकार को किसी प्रतिष्ठित समारोह का हिस्सा क्यों बनने देना चाहिए. छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में रचे-बसे लोक कलाकार हमारी धरोधर है. इन धरोहरों को अब हर सम्मानजनक आयोजन में  स्थान मिलना चाहिए. संस्कृतिकर्मी आशीष का मानना है- किसी भी राज्य की संस्कृति तभी बची रहती है जब वहां के तीज-त्योहार, मान्यताओं और परम्पराओं को संरक्षण मिलता है. पिछले पन्द्रह सालों में बहुत से लोगों ने छत्तीसगढ़ को कचरे में तब्दील करने का काम किया है. ऐसे लोगों की शिनाख्त बहुत जरूरी है. यह भी देखना होगा कि संस्कृति के नाम पर कचरा फैलाने वाले कलाकार के भेष में छिपे हुए कारोबारी है या संस्कृति के लुटेरे हैं. छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग ने कचरा परोसने वालों से किनारा करके पहली बार शानदार काम किया है.आने वाले दिनों में भी यह सिलसिला कायम रहे तब तो बात बनेगी. एक संस्कृतिकर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर अपनी चिंता कुछ यूं जताई है-  देखिए... संस्कृति विभाग फिलहाल तो जो कर रहा है वह स्वागत योग्य है, लेकिन वहां ऐसे अधिकारियों का जमावड़ा हो चुका है जिनके मुंह में पैसों का खून लगा है. वे हर कलाकार से कार्यक्रम के बाद कमीशन की डिमांड करते हैं. जो कलाकार पैसे नहीं देता है उसका बिल रोक दिया जाता है. कुछ अधिकारी भाजपा के कलाकारों से सांठगांठ करके चलते हैं. विभाग में अब भी दलालों की घुसपैठ बरकरार है. विभाग में एक महिला कलाकार का दबदबा पूरी तरह से कायम है. इस महिला कलाकार को एक राजनेता का संरक्षण प्राप्त है. पिछली सरकार में इस महिला को लालबत्ती गाड़ी दी गई थीं जो अब तक वापस नहीं ली गई. इस कलाकार के दबदबे का आलम यह है कि सब भींगी बिल्ली बनकर घूमते हैं. प्रदेश की संस्कृति तभी बेहतर हो पाएगी जब संस्कृति विभाग का कचरा साफ होगा और सुथरे वातावरण का निर्माण होगा. अभी विभाग के कुछ लोग भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हुए हैं. 

 

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