अंदरखाने की बात

बाबा की छवि को दागदार करने में लगे अफसर

पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के मंत्री टीएस सिंहदेव की छवि अब तक तो साफ-सुथरी बनी हुई है, लेकिन लगता नहीं है कि उनके विभाग के अफसर बहुत ज्यादा दिनों तक उनकी छवि को साफ- सुथरा रहने देंगे. विभाग में पदस्थ एक वरिष्ठ अफसर का कारनामा इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है. बताते हैं कि अफसर ने छोटी-बड़ी हर सड़क पर कुदाल चलाने का निर्देश दे रखा है. सड़कों की जांच के लिए अफसर ने अपना एक स्कावड गठित कर रखा है. स्कावड के सदस्य बगैर किसी सूचना के सड़क की जांच के लिए निकल जाते हैं और फिर जहां मन करता है सड़क का पोस्टमार्टम कर दिया जाता है स्कावड की जांच-पड़ताल से सड़क निर्माण के काम में लगे ठेकेदार बेहद परेशान चल रहे हैं. पिछले चार महीनों में गुणवत्ता जांचने के नाम पर जरूरत से ज्यादा सड़कों का पोस्टमार्टम किया चुका है. विभागीय लोगों का कहना है कि अगर प्रदेश की सड़कें जरूरत से ज्यादा खराब है तो फिर हर सड़क की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए, लेकिन ऐसा भी नहीं हो रहा है.

अफसर से विभाग में बहुत से लोग प्रताड़ित भी चल रहे हैं. बताते हैं उन्होंने मंत्री और सचिव से पूछे बगैर ही कतिपय अफसरों का तबादला भी कर दिया है. जिस किसी एक्जीक्यूटिव इंजीनियर का तबादला करना होता है उसके आदेश में स्थानांतरण न लिखकर प्रभार लिख दिया जाता है. विभाग में दूर-दराज के बहुत से अधिकारी प्रभार में ही काम कर रहे हैं. अफसर ने ब्रिज के कामकाज को देखने वाले एक अधिकारी को जरूरत से ज्यादा पावर भी दे रखा है. ब्रिज को संभालने वाला अफसर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के काम को भी देख लेता है जबकि इस काम को देखने का जिम्मा किसी दूसरे अफसर का है. जानकारों का कहना है कि अफसर पहले अपने आपको भाजपा के एक सांसद का रिश्तेदार बताया करता था. इन दिनों वह खुद को कांग्रेस के परिवार का सदस्य बताता है. हालांकि विभाग में चारों तरफ कैमरे लगे हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि चंदा उस जगह पर लिया जा रहा है जहां कैमरा नहीं होता. सूत्रों का कहना है कि अफसर ने चुनाव के समय अपने मातहत अफसरों को एक बड़ा लक्ष्य दिया था. लक्ष्य की ठीक-ठाक पूर्ति नहीं हो पाई तो अब तक उगाही चल रही है. विभाग के मंत्री टीएस सिंहदेव गुरुवार को एक बड़ी बैठक लेने वाले हैं. इस बैठक में सभी जिलों के मुख्य कार्यपालन अधिकारी सहित अन्य अन्य कई प्रमुख लोग शामिल होंगे. उम्मीद की जानी चाहिए वे उस अफसर को पहचानने में देर नहीं करेंगे. वैसे इस बार बैठक बड़ी होटल में नहीं बल्कि निमोरा के एक प्रशिक्षण केंद्र में हो रही है.

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भाजपा के लिए 70 सभाएं करने वाले कवि का बेटा...प्रोफेसर बनकर मचा रहा है उत्पात

कवि हर जगह पाए जाते हैं मगर बेमतलब की बात पर हास्य कविता लिखने वाले हास्य कवि कुकुरमुत्तों की तरह पाए जाते हैं. कुकुरमुत्ते के बारे यह बात विख्यात है कि वह कहीं भी उग जाता है. खैर... देश के अन्य हिस्सों की तरह छत्तीसगढ़ में एक हास्य कवि है. इस हास्य कवि की विशेषता यह है कि जब जोगी की सरकार थी तब वह जोगी की जय-जयकार करता था. जब भाजपा की सरकार बनी तो कहने लगा- जोगी हम सब ला एक दिन  मर.....वाही. ( ज्ञात हो कि मरवाही जोगी का विधानसभा क्षेत्र है. ) 

देश के लिखने-पढ़ने वाले लेखक और कवि इस हास्य कवि से बेहद चिढ़ते हैं. इस चिढ़ की वजह यह नहीं है कि कवि की कविताएं सर्वोत्तम है और साहित्यकार अपनी लकीर बड़ी नहीं कर पा रहे हैं. वजह यह है कि सारी रचनाएं बी और सी ग्रेड की फिल्मों जैसी है कवि की  हरकतें सी ग्रेड फिल्मों के खलनायक जोगेंद्रर जैसी.  

जोगेंद्रर को नहीं पीढ़ी नहीं जानती. ( जोगेंद्रर वह खलनायक है जो बलात्कार के दृश्य में पीले और गंदे दांत निकालकर हंसता है और हिरोइन के कपड़े तार-तार कर देता है. ) कुछ वामपंथी साहित्यकारों का मानना है कि हास्य कवि के भीतर भी एक जोगेंद्रर बैठा हुआ है जो हर रचना और उसकी आत्मा को तार-तार करते रहता है. कविता की इज्जत लूटकर कवि जोंगेद्रर हंसता है... खुद ही हंसता है... और सोचता है जनता ताली बजा रही है. वामपंथी साहित्यकार इस कवि को घटिया कवि कहने से भी नहीं चूकते. मंचों पर कविता पढ़ने के लिए जोड़-तोड़ और नेतागिरी करने वाले अन्य कवियों का कहना है कि इस कवि ने भाजपा के शासनकाल में जमकर मलाई छानी और अब सत्ताधारी दल के करीब जाने की जुगत कर रहा है.

वैसे विधानसभा चुनाव के ठीक पहले इस कवि की चमचई को देखकर यह अहसास हो गया था कि एक न दिन कवि का भाजपा प्रवेश हो जाएगा. भाजपा में प्रवेश कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि इस कवि से पहले भी कुछ कवि और साहित्यकार भाजपा प्रवेश कर चुके थे. दुर्ग में एक स्थूल काया रखने वाले कवि ने तो बकायदा अपने बाल-बच्चों के साथ भाजपा प्रवेश किया था और अपने समाज और मोहल्ले वालों को लंगर भी खिलाया था.इस हास्य कवि ने जब भाजपा प्रवेश किया तब शायद भाजपा वालों को लगा होगा कि जिस कवि को सुनने के लिए भारी भीड़ जुटती है उस कवि की वजह से वोटों की बारिश होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. कवि ने विधानसभा चुनाव के दौरान लगभग 70 सभाएं की, और जहां-जहां भी सभाएं हुई वहां-वहां भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा.

बहरहाल इस कवि का एक बेटा इन दिनों एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है. अंदरखाने की बात यह है कि जब विश्वविद्यालय में भर्ती चल रही थी तब अंतिम तिथि में कवि के बेटे ने अपनी नियुक्ति के लिए आवेदन जमा किया था. सूत्र कहते हैं कि एक लड़की जो कवि के बेटे से ज्यादा योग्य थी उसे जगह नहीं मिली और कवि के बेटे का चयन कर लिया गया. अब सुनिए... कवि के सुपुत्र जिस विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं वहां एमबीए में वे एकमात्र प्रोफेसर है. अब उन्हें पढ़ने-पढ़ाने में कोई रुचि नहीं थी तो उन्होंने प्रतिनियुक्ति की राह पकड़ ली. अब साहबजादे प्रशासन अकादमी में कार्यरत है. साहबजादे की यह प्रतिनियुक्ति तब हुई थी जब विश्वविद्यालय में भाजपाइयों को कब्जा था. नई सरकार के गठन के बाद हालात बदले तो खुलासा हुआ कि साहबजादे विश्वविद्यालय परिसर में ही नेतागिरी के काम में भी लगे रहते थे. इधर खबर है कि विश्वविद्यालय के कुल सचिव ने उनकी प्रतिनियुक्ति को समाप्त करने के लिए प्रशासन अकादमी को लेटर लिख दिया है. अब साहबजादे बच्चों को पढ़ाने लौटते हैं या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन कवि महोदय अपने योग्य पुत्र की बेहतरी के लिए तमाम बड़े-बड़े लोगों से मिल-जुल रहे हैं और फोन करवा  रहे हैं. इधर कवि पुत्र की नियुक्ति और प्रतिनियुक्ति को लेकर जांच की मांग भी उठ खड़ी हुई है, लेकिन कवि महोदय का पुत्र कहता फिर रहा है- जब तक पापा है तब तक कोई कुछ नहीं कर पाएगा. कवि पुत्र का उत्पात जारी है. 

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छत्तीसगढ़ को लूटने वाले दो बदनाम अफसर वारासिवनी पहुंचे और फिर...

सोमवार 13 मई को मिली एक ताजा सूचना के अनुसार छत्तीसगढ़ को लूटने वाले दो बदनाम अफसर मध्यप्रदेश जिले के वारासिवनी  पहुंचे और फिर वहां उनके साथ छत्तीसगढ़ के चंद अफसरों ने मुलाकात की. मुलाकात के लिए इस जगह का चयन इसलिए किया गया क्योंकि बदनाम अफसरों में से एक कभी बालाघाट में पदस्थ था. जानकार सूत्र बताते हैं कि दोनों अफसरों के खाने-पीने और ठहरने का इंतजाम वारासिवनी और बालाघाट की पुलिस ने किया. अब आप सोच रहे होंगे कि इस मुलाकात में क्या खबर है. भई... यह देश सबका है. कोई कही भी... कभी मुलाकात कर सकता है, लेकिन जरा सोचिए कि बदनाम अफसर छत्तीसगढ़ में रहकर क्यों नहीं मिलना चाहते. दरअसल अफसरों को भय है कि छत्तीसगढ़ में वे कभी भी गिरफ्तार किए जा सकते हैं. कोर्ट से जब राहत मिलेगी तब मिलेगी, गिरफ्तारी तो कभी भी हो सकती है.

वैसे छत्तीसगढ़ की पावन धरती ऐसी धरती है वह जब तक आदर देती है तब तक आदर देती है, और जब निष्कासित करती है फिर दोबारा सिर छिपाने की जगह नहीं देती. राजनीतिज्ञों और घमंड से भरे हुए अफसरों के पतन के यहां सैकड़ों उदाहरण देखने को मिलते हैं. यहां यह बताना लाजिमी है कि अब से कुछ महीने पहले तक जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थीं तब दोनों अफसरों की तूती बोलती थी. एक अफसर जो संविदा में था वह जिसे फंसाना चाहता था उसके खिलाफ केस कर देता था और दूसरा उस बंदे को गिरफ्तार कर लेता था. दोनों अफसरों ने एक से बढ़कर एक कांड किए जिसके चलते रमन सिंह की सरकार पन्द्रह सीटों पर आकर सिमट गई. सरकार के बनते ही एक अफसर इस्तीफा देकर भाग खड़ा हुआ जबकि सरकार ने कहा ही नहीं था कि नौकरी छोड़िए. नई सरकार के गठन के साथ ही पोल खुलनी लगी तो भाजपाइयों ने कहा- सरकार बदलापुर की राजनीति चल रही है. अब जाकर भाजपाइयों को भी समझ में आने लगा कि कानून अपना काम कर रहा है और कानून को अपना काम करने देना चाहिए. अब कोई भी भाजपाई यह नहीं कहता कि भ्रष्ट अफसरों पर शिकंजा नहीं कसा जाना चाहिए.

छत्तीसगढ़ की मेहनतकश और गरीब जनता की कमाई को लूटकर दिल्ली जा बसे एक अफसर पर भूपेश सरकार ने एक के बाद कई केस लाद दिए हैं. एक अभी बचा हुआ है... लेकिन देर-सबेर उसकी गर्दन भी नापी जाएगी यह तय है. करोड़ों रुपए की प्रापर्टी और माल-मत्ता होने के बावजूद दोनों अफसर इस बात से भयभीत है कि कही छत्तीसगढ़ पहुंचते ही सरकार गिरफ्तार न कर लें. उनका भय स्वाभाविक भी है, क्योंकि दोनों अफसरों ने संत आशाराम और राम-रहीम का हश्र देखा है. देश के इन अतुलनीय संतों के पास अरबों-खरबों की प्रापर्टी है. आज भी दोनों के शिष्य भूखे -प्यासे लोगों के लिए  भंडारे का आयोजन करते हैं बावजूद इसके लोगों की दुआएं उन्हें जेल से रिहा नहीं करवा पा रही है. छत्तीसगढ़ के ये दोनों अफसर इतने ज्यादा कुकर्म में शामिल रहे हैं कि  उनका जेल जाना बेहद अनिवार्य माना जा रहा है. आम छत्तीसगढ़ियों की भावना भी यही है कि बघेल सरकार दोनों को जेल भेजें. अगर भूपेश सरकार दोनों को जेल पहुंचाने में कामयाब हो जाती है तो निश्चित रुप से जनता के बीच सरकार की वाह-वाह तय है. वैसे दोनों अफसरों पर सरकार ने इतने बेहतर ढंग से शिकंजा कसा है कि अब उनका बच निकलना मुश्किल ही माना जा रहा है. हालांकि एक अफसर ने छुटभैय्ये पत्रकारों के पास सूचना छोड़ रखी थी कि वह पर्णिकर से जुड़ गया है. केंद्रीय गृहमंत्रालय में फिट हो रहा है. मगर बाद में साफ हुआ कि यह अफवाह जानबूझकर फैलाई गई थीं. बहरहाल प्रदेश की भूपेश सरकार को लेकर पब्लिक का रियेक्शन यही है कि भई... चाहे जो हो... जिसको रमन ने बचाया... उसको भूपेश बघेल ने दमदारी से निपटाया. अंदरखाने की खबर है कि छत्तीसगढ़ के अफसरों से वारासिवनी में मिलने वाले अफसरों ने भूपेश बघेल के बारे में जमकर फीडबैंक लिया है. इस फीडबैंक के एवज में चार अफसरों को यह कहते हुए नोटों की गड्डियां भी थमायी गई कि आधा अभी रख लो... आधा काम होने के बाद. छत्तीसगढ़ के जयचंद अफसरों ने भी यह कहते हुए गड्डियां रख ली कि सर... जरूरत तो पड़ती है और फिर नोट तो छत्तीसगढ़ का ही है.

 

 

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बिजली कंपनियों के चेयरमैन शुक्ला को हटाने के लिए चल रही है साजिश

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के गनियारी में जन्मे शैलेंद्र शुक्ला इन दिनों बिजली कंपनियों के चेयरमैन है, लेकिन इस छत्तीसगढ़िया का चेयरमैन बन जाना भाजपाइयों और उनसे सांठगांठ कर चलने वाले कतिपय अफसरों को बर्दाश्त नहीं हो रहा है. उनके बारे में तरह-तरह की कहानियां प्रचारित की जा रही है. जो लोग राजनीति और प्रशासन में दखल रखते हैं उन्हें दिख रहा है कि कैसे एक छत्तीसगढ़ी मूल के इस अफसर के खिलाफ सोची-समझी मुहिम चल रही है.कभी कहा जा रहा है कि जबसे वे चेयरमैन बने हैं तब से सुबह-शाम बिजली गुल हो रही है तो कभी यह बात प्रचारित की जाती है कि वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर नहीं है. अभी हाल के दिनों में यह खबर भी फैलाई गई है कि चूंकि बिजली वितरण कंपनी का चेयरमैन एक आईएएस है तो बिजली कंपनियों का चेयरमैन भी किसी आईएएस को  ही होना चाहिए. फिलहाल उनको हटाने की साजिश में एक ऐसा अफसर भी शामिल है जिसने पिछले पन्द्रह सालों में छत्तीसगढ़ को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इस अफसर ने अपने काले-पीले कारनामों से अकूत संपत्ति अर्जित कर रखी है. इस अफसर का काला धन देश-विदेश में कई जगहों पर लगा हुआ है. यहां तक न्यूज झूठी खबरें फैलाने वाली वेबसाइटों पर भी. इस शख्स की पूरी कोशिश छत्तीसगढ़ को धान के कटोरे के बजाय भीख के कटोरे में बदलने की थी, लेकिन भला हुआ कि सरकार बदल गई अन्यथा छत्तीसगढ़ियों के खून-पसीने की कमाई का बड़ा हिस्सा दुबई के किसी फ्लैट में लगा होता. खबर है कि इस अफसर का अकूत धन विदेश के बैंकों में जमा है. अब जब भूपेश सरकार ने सख्ती दिखाई है तो मियां जी... दिल्ली में रिमोट कंट्रोल लेकर चैनल बदल रहे हैं.

पाठक सोच रहे होंगे कि जो अफसर छत्तीसगढ़ को लूटकर दिल्ली में जा बसा भला अब उसका छत्तीसगढ़ से क्या लेना-देना.... लेकिन ऐसा नहीं है. अफसर का लेना भी है और देना भी. अब भी अफसर और वर्ष 2005 बैच के उनके चेले-चपाटी आईएएस अफसरों को लग रहा है कि नई सरकार को बदनाम करके ही वे भाजपा सरकार को ला सकते हैं.सख्ती पर सख्ती देखकर वे नई सरकार को फेल करने की कसरत में लगे हुए हैं. यह मामला कुछ इसी तरह का है कि सरकार पुल बनाना चाहती है तो बनाए, लेकिन हम पुल के नीचे बम लगा देंगे. बिजली गुल नहीं हो रही है तो कोई बात नहीं हम ट्रांसफार्मर पर पत्थर फेंक देंगे तो ट्रांसफार्मर खराब हो जाएगा. शैलेंद्र शुक्ला को लेकर पूरा मामला ठीक वैसे ही चल रहा है जैसे चुनाव के दिनों में होता है. यह बताना लाजिमी है कि किसानों की कर्ज माफी के बाद भूपेश सरकार का सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट हर उपभोक्ता का बिजली बिल हाफ करना है. इस प्रोजेक्ट को कामयाबी न मिले इसलिए यह सवाल उठाया जा रहा है कि रहने दीजिए.... पहले बिजली तो दीजिए... फिर बिल हाफ करिए... बत्ती बुझाकर क्या माफ कर रहे हो.

अभी हाल के दिनों में फेणी तूफान की वजह से कुछ जिलों में बिजली की व्यवस्था चरमराई थी, लेकिन उसे समय रहते ठीक कर लिया गया. कुछ दिन पहले बस्तर, दुर्ग, राजनांदगांव और रायपुर में बिजली गायब रही है तो दिल्ली में बैठे अफसर के चमचों से यह प्रचारित करने को कहा कि भले ही बिजली का बिल हाफ मत करिए... कम से कम बिजली तो गुल मत करिए. ऐसा भी नहीं है कि बिजली के क्षेत्र में 37 वर्षों का अनुभव रखने वाले शैलेंद्र शुक्ला इस सारे खेल वाकिफ नहीं है. उन्हें पता है कि कौन सा अफसर कहां जाकर लूज टाक कर रहा है और कौन कलाकारी में लगा हुआ है. सूत्र कहते हैं कि उन्होंने दस्तावेजों के साथ पूरी जानकारी तैयार भी कर रखी है, लेकिन अभी उनकी पहली प्राथमिकता बिजली के मसले पर सरकार के एजेंडे को सही ढंग से लागू करना है. वैसे बिजली कंपनी हमेशा विवादों में घिरी रही है. बिजली विभाग को सबसे ज्यादा नुकसान तब हुआ था जब उसका विघटन हुआ है. उससे ज्यादा नुकसान की स्थिति तब बनी जब बोर्ड कई कंपनियों में तब्दील हो गया है. सबसे ज्यादा खराब स्थिति भाजपा सरकार में ही बनी जब घटिया ट्रांसफार्मरों की बड़े पैमाने पर खरीदी की गई. अब ये सारे घटिया ट्रांसफार्मर ही प्रदेशवासियों को रुला रहे हैं. पिछली सरकार का एक बड़ा कारनामा यह भी था कि जिस मढ़वा प्रोजेक्ट को छह हजार करोड़ रुपए में बनकर तैयार हो जाना था वह प्रोजेक्ट अब तक तैयार नहीं हुआ और उसका बजट 9 हजार करोड़ रुपए हो गया. बहरहाल भेड़िया धसान वाले मुहावरे को चरितार्थ करने वाली स्थिति से घिरे हुए शैलेंद्र शुक्ला कब तक टिके रह पाते हैं यह देखना दिलचस्प होगा. साजिश तो उन्हें बुरी तरह से फंसा देने की भी चल रही है. खबर है कि दिल्ली में बैठे शातिर अफसर ने दिल्ली की ही कुछ प्रोफेशनल लड़कियों को बदनाम करने वाली योजना का हिस्सा भी बनाया है. यह लड़कियां केवल शैलेंद्र शुक्ला को ही नहीं कुछ दूसरे विश्वासपात्र अफसरों को भी निशाना बनाने के लिए  दिल्ली में ट्रेनिंग ले रही है.  

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भूपेश सरकार को बदनाम करने के लिए होटल में बैठक

किसी ने सच ही कहा है कि जिस किसी को भी हराम की कमाई खाने का शौक चढ़ जाता है फिर वह चाहे जैसे भी हो... लूट-खसोट के नए-नए तौर-तरीके ढूंढते रहता है. छत्तीसगढ़ में नई सरकार के गठन के साथ ही बहुत से अफसर खुश हैं और पूरी मेहनत-लगन और प्रतिबद्धता के साथ अपने काम को अंजाम दे रहे हैं, लेकिन चंद अफसर ऐसे भी है जो इस बात के लिए खफा है कि भूपेश बघेल ने उनकी अवैध कमाई की पाइप लाइन को काट दिया है. ऐसे चंद अफसर पुरानी सरकार के साथ स्वामी भक्ति का परिचय देते हुए एयरपोर्ट मार्ग पर स्थित एक होटल में आए दिन बैठक कर रहे हैं. जाहिर सी बात है कि अफसर होटल में जाएंगे तो भजन-कीर्तन नहीं करेंगे. जब खाने के पहले छककर पीने का उपक्रम चलता है तो फिर बात पर बात निकलती है और दूर तलक जाती है........।

अंदरखाने की खबर यह है कि पिछले दिनों होटल में चंद अफसर केवल इस बात के लिए ही जुटे कि भूपेश सरकार को बदनाम कैसे किया जाय. इस बैठक में मंत्रालय के लोक निर्माण विभाग में लंबे समय से पदस्थ वन विभाग के एक अफसर के अलावा वह शख्स भी शामिल था जिसे लेकर हाल के दिनों में ईओडब्लू ने प्रकरण दर्ज करने की अनुमति मांगी है. खबर हैं कि इस बैठक का नेतृत्व सेवानिवृति के बाद संविदा में पदस्थ एक आईएएस अफसर ने की थी. बताते हैं कि इस बैठक के बाद ही चिप्स का सर्वर डाउन हो गया था. बैठक में सुकमा में पदस्थ रहे अफसर के भी शामिल होने की बात सामने आई है. हालांकि सर्वर डाउन होने के खेल में केवल यहीं एक अफसर नहीं है. इस खेल में लंबे समय से व्यापमं में जमी एक देवी और एक महाराज की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. बैठक में अवैध कमाई पर विराम लग जाने से आहत एक अफसर ने कहा- पुरानी सरकार को हम लोग जैसा चाहे वैसा चलाते थे. कहीं कोई तकलीफ नहीं थीं. अब तो एसआईटी का डर बैठ गया है. पता नहीं कब तक चलेगा ऐसा. बैठक में एक नाम के पीछे राजिम शब्द को चस्पा करके चलने वाले एक अफसर को लेकर भी बात हुई. इस अफसर के बारे में अन्य अफसरों ने कहा कि देखिए... भले ही अफसर शाखा में जाता है, लेकिन क्या जबरदस्त समन्वय है. एक साथ कई विभाग संभाल रहा है. एक अफसर ने कहा- सरकारें तो आती-जाती रहती है. यदि राजनीतिक एप्रोच तगड़ी हो हर कोई ईओडब्लू का नेगी बन सकता है. जानकार बताते हैं कि ईओडब्लू में कोई नेगी नाम का अफसर है जो किसी  पूर्व मंत्री का करीबी है और एक ही जगह पर लंबे समय से पदस्थ है. वैसे प्रशासनिक हल्कों में यह चर्चा है कि पुलिस विभाग के चंद वरिष्ठ अफसर सरकार के साथ डबल गेम खेल रहे हैं. वे सरकार के साथ भी है और निलंबित आईपीएस को गोपनीय सूचनाएं देने के काम-धंधे में भी लगे हुए हैं. ( हालांकि निलंबित आईपीएस के पत्रकार बिरादरी के दो संपादक भी शामिल है. ) खबर है कि  दिल्ली में जा बसे सुपर सीएम अब भी अपनी धौंसपट्टी अफसरों पर झाड़ने से बाज नहीं आ रहे हैं. वे बार-बार यहीं कहते हैं- भूलो मत कि मैंने तुमको ऊपर उठाया है. मैंने तुमको बनाया है. सुपर सीएम की गैंग में शामिल भारतीय प्रशासनिक सेवा वर्ष 2005 बैच के बहुत से अफसर अब भी छोटी सी छोटी जानकारी सुपर सीएम तक पहुंचा रहे हैं.

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शिक्षामंत्री के निवास पर गोपीचंद जासूस

आदिवासी सीधे और सरल ही होते हैं सो शिक्षामंत्री भी सीधे और सरल हैं. हर कोई उनकी सरलता और सहजता का फायदा उठाना चाहता है. आप कभी शिक्षामंत्री के बंगले जाइए... वहां का नजारा देखकर आपका माथा घूम जाएगा. कोई मंत्री को इस कोने में ले जाकर बात करते मिलेगा तो कोई दूसरे कोने में. हर कोई उनसे बड़ी आसानी से कोन्टागिरी कर लेता है. इधर उनके स्टाफ के कर्मठ लोग इस बात को लेकर परेशान है कि बंगले में जो कुछ भी घटता है उसकी खबर बाहर कैसे लीक हो जाती है. काफी खोजबीन के बाद मंत्री जी के करीबी यह पता लगाने में कामयाब हो गए हैं कि आखिर वह गोपीचंद जासूस कौन है. अंदरखाने की खबर है यह कि शिक्षा विभाग को लेकर विशेष रुचि रखने वाले एक मूर्धन्य ने बंगले में अपना जासूस तैनात करवा दिया है. यहां बताना लाजिमी है कि शिक्षा विभाग में हर दूसरे-तीसरे महीने सैकड़ों तरह के काम जारी होते हैं. कभी प्रश्नपत्र की छपाई का तो कभी टेबल-कुर्सी की सप्लाई का. प्रकाशक और ठेकेदार तो काम हासिल करने के लिए दौड़-भाग करते ही है, लेकिन इधर खबर है कि आनन-फानन दर पर सामानों की सप्लाई में रुचि रखने वाले एक शख्स ने पल-पल की खबरें हासिल करने के लिए बंगले में अपने खास आदमी को फिट कर दिया है. अब जासूस अल-सुबह आ जाता है. मंत्री जी का पैर छूता है और फिर तभी घर वापस जाता है जब सभी फाइलें आलमारी में जाकर सो जाती है. कब... किस वक्त क्या होता है... कौन सी फाइल आगे बढ़ रही है. किस फाइल पर आपत्ति लगी है आदि-आदि यानी पल-पल की खबर संबंधित को पहुंचते रहती है. 

पाठकों को याद होगा कि अभी चंद रोज पहले एक खबर कुछ जगह पर छपी थीं.इस खबर में कहा गया था कि मंत्री के एक अत्यंत करीबी ने सभी जिलों के डीओ को किसी खास व्यक्ति से ही सामानों की खरीदी करने का निर्देश दिया है. बाद में पता चला कि यह खबर भी जशपुर के रोशनलाल नामक एक साइकिल विक्रेता और डीओ के साथ मिलकर जासूस ने ही फैलाई थीं. रोशनलाल भाजपा के शासनकाल में भी सप्लाई का काम करता था, लेकिन इधर जब उसकी दाल गलनी बंद हो गई तब उसने जासूस के साथ एक और एक मीडियाकर्मी का सहारा लेकर यह खबर फैला दी कि सारे जिले के डीओ परेशान है. खबर है कि रोज सुबह-सुबह हाजिरी बजाने वाला जासूस बंगले में आने-जाने वाले प्रत्येक शख्स का अच्छे ढंग से हिसाब-किताब  रखता है. मनीष पारख कौन है. उसे कुल कितने का काम मिला है. अशोक और कुमार साहब ने कितने कार्यकर्ताओं को कितने करोड़ का काम बांटा. किसको किसके कहने पर उपकृत किया. वैभव अग्रवाल को दस जिलों में प्रश्नपत्र की छपाई का काम कैसे मिला. धर्मेंद्र और शैलेश पांडे ने अपने किस प्रिय को बगैर प्रिटिंग मशीन के कैसे काम दिलवाया. कोरबा का पंकज कब बंगले आएगा... आएगा तो क्या लाएगा. जासूस की जासूसी और निष्ठा देखकर लगता है कि मंत्री का विभाग हथियाने के लिए कोई शख्स गहरी साजिश रच रहा है. अब मंत्री जी जितनी जल्दी समझ जाय तो उतना अच्छा है. मंत्री जी को याद रखना होगा कि कमल छाप वालों इसी तरह की जासूरी के चलते कांग्रेस को पन्द्रह साल तक सत्ता से दूर रखा था. कमल से बचकर रहना ही ठीक होगा अन्यथा कमल की परिक्रमा मंत्री जी को भारी पड़ सकती  है. 

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छत्तीसगढ़ के संपादक परेशान, लेकिन पत्रकार खुश

छत्तीसगढ़ के अमूमन सभी ( इक्का-दुक्का को छोड़कर ) अखबारों और चैनलों के संपादक इन दिनों परेशान चल रहे हैं. उनकी परेशानी की वजह यह नहीं है कि काम का बोझ बढ़ गया है. बल्कि वे इसलिए परेशान चल रहे हैं कि अब उन्हें मुख्यमंत्री सचिवालय से किसी चमन-फमन सिंह का फोन नहीं आ रहा है. अब से ठीक दो-ढाई महीने पहले तक स्थिति काफी बुरी थीं. मुख्यमंत्री सचिवालय से हर दूसरे-तीसरे दिन संपादकों ( कई बार तो मालिकों के पास ) खबर को रोक देने... फलांनी खबर को ढिकांनी कर देने... मतलब एंगल बदल देने, अमकां रिपोर्टर को ठिकाने लगा देने के लिए फोन आया करता था. संपादक और मालिक इस बात के लिए आत्ममुग्ध रहते थे कि चलो चमन सिंह ने उन्हें अपने बगीचे का फूल तो माना. वैल्यू बनी रहती थीं तो फोकट फंट में हवाई जहाज की टिकट से लेकर और भी दस तरह के काम वे करवा लेते थे, लेकिन उनकी वैल्यू के चक्कर में रिपोर्टर को बलि चढ़ जाती थीं. अब संपादकों को बलि चढ़ाने का मौका नहीं मिल रहा है. पिछले दो-ढाई महीनों से अखबारों और चैनलों में पिछले पन्द्रह साल से चल रही बलि प्रथा पर विराम लग गया है.

अंदरखाने की खबर यह है कि पिछले दिनों कुछ संपादकों ने एक जगह एकत्र होकर इस बात के लिए विचार-विमर्श किया कि वैल्यू में इजाफा कैसे और किस तरह से किया जाय. पूर्व मुख्यमंत्री भी वैल्यू एडीशन पर काफी जोर दिया करते थे सो एक संपादक ने सुझाव दिया- अब तक मुख्यमंत्री जी संपादकों को आमंत्रित करते थे... क्यों न इस बार सारे संपादक मिलकर  मुख्यमंत्री को लंच पर आमंत्रित करें. एक ने कहा- यह काम अलग-अलग रहकर भी किया जा सकता है. सब अपने-अपने अखबार में आमंत्रित करते हैं. एक ने पकी-पकाई सलाह दी- क्यों ने मुख्यमंत्री को एक दिन का एडिटर बना दिया जाय. जिस रोज वे एडिटर बनेंगे उस रोज सारी खबरें वे तय करेंगे यहां तक हैडिंग भी. सुझाव देने के लिए मशहूर एक संपादक ने अपना दर्द बयां किया- यार... हर रिपोर्टर आंख दिखाता है. कहता है- खबर छापना है तो छापो... नहीं तो भाड़ में जाओ... कोई भी अखबार दशा और दिशा तय नहीं करता है. अब अखबार से ज्यादा सोशल मीडिया हावी है. एक संपादक की पीड़ा थीं- रिपोर्टरों पर पकड़ तब तक रहती है जब तक उनके भीतर नौकरी का डर रहता है. थोड़ा-बहुत भी समझाओ तो रिपोर्टर कहता है- अभी वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं मांगा है. हम किसी खबर पर कार्रवाई करने के बारे में सोचते ही रहते हैं उससे पहले सरकार ही निपटा देती है. साला... खबर का असर लिखने का मौका भी नहीं मिल पा रहा है.

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