पहला पन्ना

क्या नान का पैसा पहुंचा था अंतागढ़ में

रायपुर. क्या सच में नान घोटाले के पैसे का इस्तेमाल अंतागढ़ उपचुनाव में प्रत्याशियों को मैदान से हटाने के लिए किया गया था. अपना मोर्चा डॉट कॉम के पास सात सितम्बर 2014 की डायरी का एक पन्ना हाथ लगा है. इस पन्ने को मामले की जांच के लिए गठित एसआईटी के समक्ष जांच के लिए प्रस्तुत किए जाने का दावा भी किया जा रहा है. इस पन्ने में एक बारिक को छोड़कर बाकी सब नाम कोड में हैं. एक जगह किसी हाउस का उल्लेख करते हुए रकम का उल्लेख किया गया है. एक जगह लोकल शब्द लिखा हुआ है. इसके आगे एमपी एंड एफएस / एजे लिखा गया है. कयास लगाया जा रहा है कि एफएस का मतलब अंतागढ़ मामले की स्टिंग करने वाले फिरोज सिद्की है. जब हमने फिरोज से उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि वे डायरी के पन्नों में हैं या नहीं इसकी जानकारी अगर एसआईटी चाहेगी तो वे अवश्य देना चाहेंगे. बहरहाल डायरी के पन्ने पर उल्लेखित आकंडों को देखकर हर कोई यह सोचने के लिए मजबूर हो सकता है कि छत्तीसगढ़ को किस बुरी तरह से लूटा गया है.

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मुकेश गुप्ता के बाद रजनेश सिंह पर भी गिरी गाज फरार न हो जाए इसलिए... हो सकती है गिरफ्तारी

रायपुर. विवादों में घिरे पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता और नारायणपुर के पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह निलंबित कर दिए गए है. गृह विभाग के एक वरिष्ठ अफसर ने दोनों अफसरों के निलंबन की पुष्टि की है. सूत्रों का कहना है कि दोनों विवादित अफसर फरार न हो जाए इसलिए उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है.

गौरतलब है कि ईओडब्लू ने दोनों अफसरों के खिलाफ नागरिक आपूर्ति निगम घोटाले की जांच के दौरान आरोपियों और अन्य लोगों के फोन टेप करने, साजिश रचने और रसूखदार लोगों को बचाने के मामले में धारा 166, 166 ए ( बी ), 167, 193, 194, 196, 201, 218, 466, 467, 471 और 120 बी के तहत मामला दर्ज किया है. पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह और सुपर सीएम के नाम से विख्यात अमन सिंह के करीबी समझे जाने वाले मुकेश गुप्ता का पूरा कार्यकाल विवादों से भरा रहा है. उनका नाम कभी मिक्की मेहता हत्याकांड में जुड़ा तो कभी झीरम घाटी के माओवादी हमले में. पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे की मौत के मामले में भी उनकी भूमिका संदेह के दायरे में हैं. इधर खुद को रमन सिंह के रिश्तेदार के तौर पर प्रचारित करने वाले रजनेश सिंह भी पन्द्रह सालों में काफी पावरफुल बन गए थे. उनके खिलाफ भी कई तरह की गंभीर शिकायतें है. बताना लाजिमी होगा कि ईओडब्लू ने जिन गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है उसके बाद दोनों अफसरों का निलंबन तय था. कानून के जानकार कहते हैं कि अधिकांश धारा गैर-जमानती है इसलिए उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है. सूत्रों का कहना है कि निलंबन के बाद दोनों अफसर कानूनी मश्चिरा ले रहे हैं, लेकिन ऐसी भी खबर है कि गिरफ्तारी से बचने के लिए वे फरार हो सकते हैं. बहरहाल सरकार के इस दमदार फैसले का चौतरफा स्वागत हो रहा है. 

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मुख्यमंत्री के बगल में नजर नहीं आया कोई अफसर अर्थशास्री

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने शुक्रवार को अपना पहला बजट पेश किया. गांव- गरीब और किसान को केंद्र में रखकर तैयार किए गए इस बजट के कई महत्वपूर्ण अंशों का प्रकाशन शनिवार को अखबारों में होगा. इसके साथ ही हर चैनल में नजर आने वाले चिर-परिचित अर्थशास्रियों की टिप्पणियां भी पढ़ने को मिलेगी, लेकिन एक खास बात जिसका जिक्र यहां जरूरी है. पहली बार बतौर वित्तमंत्री बजट पेश करने के बाद बघेल जब पत्रकारों से मुखातिब हुए तब उनकी बगल में कोई अफसर अर्थशास्री विराजमान नहीं था. पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के कार्यकाल में बजट पेश करने के बाद आयोजित होने वाली पत्रवार्ता में अगल-बगल सुपर सीएम, चमन-चटनी, लौंग-इलायची और भी न जाने कितने अफसर एकत्रित हो जाते थे. सीएम के आजू-बाजू बैठने वाले अफसर खुद को अर्थशास्री समझते हुए पत्रकारों के सवालों पर कूढ़ते और उन्हें धमकाते थे. एक अफसर तो बकायदा नाम ले- लेकर प्रश्न पूछने के लिए कहता था. प्रश्न पूछने वाले वही लोग होते थे जो आगे चलकर कंसोल इंडिया के शेयर होल्डर बनने में कामयाब हुए.

बहरहाल शुक्रवार को बजट भाषण की एक खास बात यह भी थीं इस दौरान मुख्यमंत्री ने एक भी बार पानी नहीं पीया. सामान्य तौर पर वित्तमंत्री ( मुख्यमंत्री ) बजट को हौव्वे की तरह पेश करते रहे हैं. आठ से दस बार पानी पीकर वित्तमंत्री यह जताने का प्रयास करते रहे है कि भाइयों... बजट इतना भारी-भरकम है कि हलक सूख गया है. बघेल जब बजट पेश कर रहे थे तब यह साफ झलक रहा था कि लक्ष्य एकदम स्पष्ट है. उन्हें पता है कि सरकार की ओर से दिए जाने वाले लाभ का पहला हकदार कौन है. कहना लाजिमी होगा कि बघेल के बजट की पहली प्राथमिकता में हमारे अन्नदाता है जो दुनिया का पेट भरते हैं. अपने बजट भाषण में उन्होंने जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए पर्याप्त राशि देने के साथ-साथ गैर- जरूरी एवं प्रत्यक्ष लाभ न देने वाली योजनाओं के प्रावधानों में संशोधनों पर विचार करने की बात कहकर यह भी समझा दिया कि वे बेमतलब की योजनाओं पर सरकारी धन को खर्च कर अफसरों के लिए खाने-पीने और ठेकेदारों के लिए कमीशनखोरी का रास्ता खोलने के पक्ष में नहीं है.

नए जेल खोलने की बात पर भड़का विपक्ष

रायपुर और बिलासपुर में नई जेल की स्थापना को लेकर भी बजट में प्रावधान किया गया है. सदन में जैसे ही इस बात का उल्लेख हुआ तो गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने विपक्ष के सदस्यों को देखकर कहा- ये जेले आप लोगों के लिए बन रही है. गृहमंत्री की बात पर विपक्षी सदस्य भड़क गए. उन्होंने इसे अपना अपमान बताया.

 

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अंतागढ़ मामले में मंतूराम, अजीत जोगी, अमित जोगी, राजेश मूणत और रमन सिंह के दामाद के खिलाफ मामला दर्ज

रायपुर. बहुचर्चित अंतागढ़ मामले में पंडरी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्य एवं प्रवक्ता किरणमयी नायक की रिपोर्ट के आधार पर राजधानी की पंडरी पुलिस ने भारतीय दंड विधान की धारा 171 इ, 171 एफ, 406, 420, 120, धारा 9, 13 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया है.

अपनी रिपोर्ट किरणमयी नायक ने कहा है कि वर्ष 2014 में अंतागढ़ के उपचुनाव में कांग्रेस ने मंतूराम पवार को अपना प्रत्याशी घोषित किया था, लेकिन थोड़े ही दिनों के बाद मंतूराम पवार मैदान छोड़कर चले गए. उनके इस कृत्य से पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा. जब पार्टी ने इसकी छानबीन की तो पता चला कि मंतूराम को मंत्री राजेश मूणत, विधानसभा के सदस्य अमित जोगी, लोकसेवक पुनीत गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने आर्थिक प्रलोभन दिया था. किरणमयी नायक ने अपना मोर्चा डॉट काम को बताया कि उन्होंने इस मामले से जुड़े सभी आवश्यक तथ्यों और दस्तावेजों के साथ पहले भी सिविल लाइन थाने में शिकायत की थी, लेकिन तब उनकी शिकायत पर कोई ध्यान नहीं दिया था. अब जबकि एक बार फिर मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित हो गई है तो रिपोर्ट लिखवाई है. किरणमयी ने फिलहाल मामले से जुड़े कुछ अहम सबूत सौंपे हैं और कहा है कि जब भी पुलिस को मूल टेप और ट्रांसक्रिप्ट के अलावा अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों की जरूरत होगी तो वह उन्हें सौंप देगी. उन्होंने कहा कि अंतागढ़ में लोकतंत्र का चीरहरण करने की घृणित कोशिश की गई थी. पूरे मामले में कई करोड़ रुपए की डील के बाद मंतूराम पवार ने अचानक अपना नाम वापस ले लिया था. इस घटना के थोड़े ही दिनों बाद मंतूराम ने भाजपा प्रवेश कर कांग्रेस के आरोपों की पुष्टि कर दी थी.

 

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ननकी के बाद अब भाजपा प्रवक्ता ने भी सीएम को सौंपा शिकायतों का पुलिंदा

रायपुर. भले ही पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह कविता-कहानी के जरिए बदलापुर-बदलापुर का राग आलाप रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि उनकी ही पार्टी के नेता मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पूर्ववर्ती सरकार के कारनामों का कच्चा चिट्ठा सौंपकर जांच की मांग कर रहे हैं. पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर के बाद हाल के दिनों में भाजपा के एक प्रवक्ता ने भी मुख्यमंत्री को शिकायत सौंपी है.

इस खबर में जो तस्वीर आप देख रहे हैं उस शख्स का नाम गौरीशंकर श्रीवास है. आपने इसे विभिन्न चैनलों द्वारा आयोजित की जाने वाली डिबेट में कांग्रेस और विशेषकर भूपेश बघेल पर जुबानी हमला करते हुए देखा होगा. भाजपा और रमन सरकार के लिए एक ढाल की तरह काम करते रहने की वजह से भाजपा के कुछ बड़े नेता इस शख्स में रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह की झलक भी देखते हैं. कुछ नेताओं का मानना है कि यह शख्स भाजपा की राजनीति का एक चमकता सितारा है और आने वाले दिनों में एक नया क्षत्रप गढ़ने में कामयाब होगा. बहरहाल हाल के दिनों में इस भाजपा प्रवक्ता ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति पाटिल के खिलाफ मुख्यमंत्री को शिकायत सौंपकर कार्रवाई की मांग की है.

कुलपति को बताया कमीशनखोर

यहां यह बताना लाजिमी है कि कुलपति पाटिल की नियुक्ति भाजपा के शासनकाल में हुई थीं और उन पर कदाचार और भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगते रहे हैं, बावजूद इसके पूर्व सरकार ने न तो उन्हें हटाना जरूरी समझा और न ही कभी कोई कार्रवाई की. अपनी शिकायत में गौरीशंकर श्रीवास ने कहा है कि इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यकाल हमेशा से विवादित रहा है. उनकी कमीशनखोरी का खेल काफी दिनों से चल रहा है. वे कमीशन लेकर नियुक्तियां करते रहे हैं. सूचना के अधिकार से हासिल दस्तावेजों से यह खुलासा हुआ है कि कीटविज्ञान में पीएचडी किए हुए एक छात्र रणदीप कुशवाहा की जगह कुलपति ने कम अंक हासिल करने वाले किसी अन्य छात्र को नौकरी दे दी है. श्रीवास ने कहा कि छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान राज्य है. छत्तीसगढ़ के अधिकांश नौजवान कृषि को अपना कैरियर बनाना चाहते हैं, लेकिन कुलपति संस्था को बदनाम करने में लगे हुए हैं. भाजपा प्रवक्ता ने मुख्यमंत्री से नियुक्तियों में की गई गड़बड़ियों की जांच की जांच का निवेदन करते हुए कुलपति को बर्खास्त करने की मांग की है.

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अकेले क्यों पड़ गए रमन

राजकुमार सोनी

रायपुर. कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ की विधानसभा का नजारा बदला था ठीक वैसे ही शनिवार को गणतंत्र दिवस के मौके पर राजभवन का नजारा भी बदला हुआ नजर आया. हर साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजनेताओं, नौकरशाहों, उद्योगपतियों, साहित्यकारों, पत्रकारों और शायद ( शराब ठेकेदारों ) को आमंत्रित किया जाता है सो इस बार भी वहीं सब लोग राजभवन में मौजूद थे. सबको सायंकाल 4 बजे से मौजूद रहने कहा गया था. ज्यादातर लोग निर्धारित समय पर राजभवन पहुंचे. इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह जब भी राजभवन पहुंचते थे तब उनके आगे-पीछे सुपर सीएम और अन्य कई तरह के पीएम-सीएम मौजूद रहते थे, लेकिन पहली बार ऐसा नहीं था. शनिवार को राजभवन में कोई सुपर सीएम मौजूद नहीं था. पूर्व मुख्यमंत्री राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की बगल वाली सीट पर बैठे रहे. उनसे मिलने-जुलने वालों की संख्या भी काफी कम थीं. अफसर भी देख-समझकर मिल रहे थे. हालांकि कुछ लोगों ने उनके साथ तस्वीरें खिंचवाई, लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के राजभवन के हाल में प्रवेश करने के साथ ही भीड़ छंट गई. राजभवन में मौजूद हर दूसरा मेहमान मुख्यमंत्री बघेल के साथ तस्वीरें खिंचवाने में लग गया. बहरहाल अपना मोर्चा डॉट काम ने भी एक तस्वीर खींची है. इस तस्वीर को गौर से देखिए...। इसे देखकर कई तरह के शीर्षक याद आ रहे हैं, फिलहाल इतना ही लिखना ठीक होगा- आदमी तब अकेला होता है ( चाहे वह राजनांदगांव के पुल में ही क्यों न हो ) जब वह सबके साथ... सबके विकास का नारा तो देता है, लेकिन केवल और केवल अपने और अपने परिवार का विकास करता है. राजभवन में एक नौकरशाह की जोरदार टिप्पणी सुनने को मिली- जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझने वाले अपने सुकून के लिए खाली पीपे ( कनस्तर ) के नीचे वाले प्लाट की तलाश में रहते हैं. इस तस्वीर में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू भाजपा के कद्दावर नेता बृजमोहन अग्रवाल से न जाने क्या बात कर रहे हैं, लेकिन जो भी हो... तीनों नेता बड़ी देर तक हंसते रहे.

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भाजपा की समीक्षा बैठक में उछला अमन सिंह का नाम

राजकुमार सोनी

रायपुर. खुद को देश का सबसे पॉवरफुल नौकरशाह साबित कर छत्तीसगढ़ को लूटने के खेल में लगे आजमगढ़ के मूल निवासी अमन सिंह का नाम अब भाजपा की समीक्षा बैठकों में उछलने लगा है. शनिवार को कांकेर के कमल सदन में भाजपा की शर्मनाक हार के कारणों की पड़ताल को लेकर कांकेर, भानुप्रतापपुर और अंतागढ़ के पदाधिकारियों की बैठक आयोजित थी. इस बैठक में वरिष्ठ नेता बालमुकुंद शर्मा ने खुले तौर पर कहा कि लोगों को मुख्यमंत्री से केवल इस बात की ही नाराजगी थी कि वे अमन सिंह जैसे भ्रष्ट अफसरों का साथ लेकर चल रहे थे. जनता के बीच यह संदेश चला गया था कि प्रदेश में रमन सिंह की नहीं ब्लकि अमन सिंह की सरकार चल रही है. बालमुकुंद का कहना था कि वैसे तो प्रदेश में 27 राजस्व और संगठन के कुल 29 जिले हैं, लेकिन सभी जिला संगठनों को पंगु बना दिया गया था. जो काम पार्टी के जिलाध्यक्ष को करना चाहिए था वह काम जिले के कलक्टर और एसपी करते थे. जब कभी भी भाजपा का कोई कार्यक्रम होता था तो कलक्टर और एसपी ही तय करते थे कि मंच पर कौन नेता बैठेगा और कौन नहीं.

ओपी गुप्ता से कहा- चल जाएगा जूता

बालमुकुंद ने बैठक में बताया कि जब आचार संहिता नहीं लगी थीं तब जिले के कलक्टर और एसपी लोगों को डंडे से हांककर सभा स्थल तक ले जाते थे. आचार संहिता लगने के बाद भानुप्रतापपुर के ग्राम हल्बा में मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह आए थे तब उतनी भीड़ नहीं थीं. वहां तीन सौ लोगों की उपस्थिति देखकर रमन सिंह के निज सहायक ओपी गुप्ता कार्यकर्ताओं पर भड़क गए. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि भीड़ जुटाने के लिए हलधर साहू को पांच लाख रुपए दिए गए थे. उनकी बात सुनकर हल्बा ग्राम के स्थानीय नेता तैश खा गए. विवाद के दौरान एक कार्यकर्ता ने ओपी गुप्ता से यहां तक कह दिया था- अगर वे जल्द ही इलाके को छोड़कर नहीं गए तो जूता चल जाएगा.

नौकरशाही जिम्मेदार

बैठक में कांकेर भाजपा के महामंत्री आलोक ठाकुर ने कहा कि रमन सिंह की सरकार प्रारंभ में अच्छा काम कर रही थी, लेकिन बाद में नौकरशाहों के भरोसे चलने लगी. छोटे से छोटा अफसर कार्यकर्ताओं के साथ दादागिरी करता था. भाजपा नेता राजेंद्र राठौर का कहना था कि कार्यकर्ताओं के बीच यह भावना घर कर गई थीं कि अगर चौथी बार सरकार आएगी तो अफसर कार्यकर्ताओं को घर से खींच-खींचकर मारेंगे. भाजपा के पूर्व महामंत्री राजकिशोर ने बैठक में बताया कि उनकी बहु सरकारी नौकरी करती है. एक रोज उसका तबादला कांकेर से मानपुर-मोहला कर दिया गया. उन्होंने बताया कि वे अपनी बहु का तबादला रुकवाने के लिए विधायक-सांसद सबके पास हाथ जोड़ते रहे, लेकिन किसी ने कोई काम नहीं किया. बाद में राजनांदगांव के  एक कांग्रेस नेता को 40 हजार रुपए दिए तो काम हो गया. बैठक में कांकेर जिले के प्रभारी सुनील सोनी खास तौर पर मौजूद थे. उन्होंने लोकसभा की जीत के लिए कमर कसने की बात कहीं तो पदाधिकारियों ने कहा कि गुंडरदेही, बालोद, डौंडीलोहारा, केशकाल, सिहावा-नगरी, कांकेर, भानुप्रतापपुर और अंतागढ़ सहित कुल आठ विधानसभा में भाजपा  दो लाख 38 हजार वोटों से हारी है. कार्यकर्ता कितनी भी ताकत लगा लेंगे तब भी जीत मुश्किल होगी.

सुपर सीएम की शिकायत

भाजपा के वरिष्ठ नेता रमेश बैस काफी पहले अमन सिंह को सुपर सीएम की उपाधि दे चुके हैं. पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को की गई एक शिकायत में अमन सिंह को आड़े हाथों लिया था. अभी हाल के दिनों में उन्होंने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को भारतीय पुलिस सेवा के विवादित अफसर मुकेश गुप्ता के खिलाफ जो शिकायत सौंपी है उसमें भी अमन सिंह के कारनामों का जिक्र किया है. नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट सामने आने के बाद नई सरकार भी सुपर कम्प्यूटर घोटाले को सुपर सीएम का कारनामा मान रही है. देश और प्रदेश के कई सामाजिक कार्यकर्ता उनकी घोषित-अघोषित संपत्ति की जानकारी एकत्रित करने में जुटे हुए हैं. बहराल सुपर सीएम इसलिए भी निशाने पर हैं क्योंकि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के अलावा उन्होंने अफसरों- पत्रकारों के एक बड़े वर्ग से नाराजगी मोल ले रखी हैं. छत्तीसगढ़ के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी अफसर को पार्टी की करारी हार और राज्य को बरबाद करने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माना जा रहा है.

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पूर्व गृहमंत्री और आदिवासी नेता ननकीराम कवर से सनसनीखेज सवाल

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मुंबई-दिल्ली और गुजरात की कंपनियों की लूट का केंद्र बन गया था संवाद

राजकुमार सोनी

छत्तीसगढ़ में जनसंपर्क विभाग की सहयोगी संस्था संवाद ने पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का चेहरा चमकाने के लिए जिन 21 कंपनियों को काम दे रखा था उनमें से अधिकांश का संबंध मुंबई-दिल्ली और गुजरात से था.जनसंपर्क विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि संवाद में बड़ा काम लेने के लिए स्थानीय स्तर पर सूचीबद्ध सभी फिल्मकारों को कमीशन देना पड़ता था, लेकिन जो कोई भी गुजरात की धौंसपट्टी दिखाता था उसे नियमों-कानून को बलाए-ए-ताक पर रखकर काम सौंप दिया जाता था.

वीडियो फिल्म एवं सोशल मीडिया के जरिए मुख्यमंत्री के प्रचार-प्रसार का जिम्मा मूविंग पिक्सल नाम की जिस कंपनी को दिया गया था वह अहमदाबाद की थी. उसके कर्ताधर्ता स्थानीय फिल्म निर्माताओं को दोयम दर्जें का समझते थे. सरकार के कामकाज पर फीडबैक हासिल कर उसका विश्लेषण करने के लिए अहमदाबाद की वार रुम स्ट्रेटजी सक्रिय थीं, लेकिन इस कंपनी का सारा कामकाज चिप्स में होता था जिसके कर्ताधर्ता सुपर सीएम थे.

फोटोग्राफी का काम भी गुजराती को

वैसे तो जनसंपर्क विभाग में कुल नौ फोटोग्राफर कार्यरत है,लेकिन जनसंपर्क आयुक्त राजेश टोप्पो  ने हर तरह की फोटोग्राफी का जिम्मा भी कृति स्टूडियो संचालित करने वाले एक गुजराती को सौंप दिया था. इस स्टूडियो के कर्ताधर्ताओं ने मुख्यमंत्री निवास में एक मशीन लगा रखी थीं. जो कोई भी मुख्यमंत्री से मिलने जाता उसे आधे-घंटे के दरम्यान तस्वीरें सौंप दी जाती थी. इस काम के लिए स्टूडियो को हर माह पांच लाख का भुगतान दिया जाता था. इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं के आगमन पर एयरपोर्ट में भी यूनिट डाली जाती थीं. व्हीकल माउंटेड एलईडी स्क्रीन के माध्यम से मुख्यमंत्री के दौरों की प्रदर्शनी का ठेका व्यापक इंटरप्राइजेस नाम की जिस कंपनी को मिला था वह कंपनी गुजरात की नहीं थीं, लेकिन इस कंपनी को भी मेटेंनस के नाम पर प्रत्येक माह पांच लाख 60 हजार रुपए का भुगतान दिया गया है. आपने थ्री-डी, फोर डी तो सुना होगा, लेकिन सरकार ने अपने कामकाज को रेखांकित करने के लिए पाइव डी फार्मेट में भी एक फिल्म बनाई थीं. यह फिल्म सिर्फ नई राजधानी के एक विशेष हॉल में देखी जा सकती थीं. एक कंपनी ऐसी भी थीं जिसने जगदलपुर से सुकमा तक होर्डिंग का ठेका ले रखा था. इस कंपनी ने दंतेवाड़ा में प्रधानमंत्री के आगमन के दौरान महज पांच सौ मीटर में ब्रांडिंग करने के भी करोड़ों रुपए हासिल किए हैं.  

सलाहकारों की पौ-बारह

पूर्व सरकार ने वैसे तो कई तरह के सलाहकार पाल रखें थे. उर्जा विभाग में सलाहकार थे तो मुख्यमंत्री निवास में भी सलाहकारों की पौ-बारह थीं. सरकार ने सरकारी साहित्य के प्रकाशन के लिए सूरजपुर मध्यप्रदेश की संगीता एम रसैली मिश्रा को भी काम दे रखा था. इसी तरह दस्तावेजीकरण एवं संग्रहण के लिए सत्येंद्र खरे भोपाल को अनुबंधित कर रखा था.

2005 बैच के अफसरों का बोलबाला

कांग्रेस के शासनकाल में जनसंपर्क की कमान भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों के हाथों में होती थीं. वर्ष 2014 में जनसंपर्क विभाग की कमान बैजेंद्र कुमार के हाथों में थीं, लेकिन उन्हें रुखसत किए जाने के बाद जूनियर अफसर हावी हो गए. भाजपा की टोपी पहनने वाले ओपी चौधरी भी थोड़े समय तक जनसंपर्क विभाग में पदस्थ रहे. ओपी के बाद रजत कुमार और फिर राजेश टोप्पो ने कामकाज संभाला. बीच में कुछ समय के लिए संतोष मिश्रा और जीएस मिश्रा भी पदस्थ किए गए थे. बताते हैं कि दोनों अफसर सुपर सीएम के हस्तक्षेप से बहुत ज्यादा नाराज थे. दोनों अफसर जल्द ही हटा दिए गए.

चल रही है जांच

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद 21 से ज्यादा कंपनियों के खिलाफ जांच बिठाई गई है. अनियमिताओं के सामने आने के बाद दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई अवश्य की जाएंगी.

तारण सिन्हा ( आयुक्त एवं सह-संचालक जनसंपर्क )  

 

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रमन सरकार में बदनाम अफसरों ने दी थीं दागी कंपनियों को क्लीन चिट

राजकुमार सोनी

रायपुर / भले ही अब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चिटफंड कंपनियों के अभिकर्ताओं के खिलाफ केस वापस लेने और निवेशकों को राहत देने के लिए कवायद कर रहे हैं, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि रमन सरकार में भाजपा के एजेंट के तौर पर काम करने के लिए बदनाम हो चुके अफसरों ने कई दागी कंपनियों को छत्तीसगढ़ में कारोबार करने की छूट दे रखी थीं. ऐसे सभी अफसरों को लेकर छत्तीसगढ़ अभिकर्ता एवं उपभोक्ता सेवा संघ ने कई स्तरों पर शिकायत भी कर रखी हैं.

 

संघ के महासचिव नंदकुमार निषाद ने बताया कि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( सेबी ) ने देशभर की लगभग 91 कंपनियों को चिटफंड का कारोबार करने के लिए प्रतिबंधित किया था, लेकिन छत्तीसगढ़ में कई दागी कंपनियां आईएएस अफसरों के संरक्षण की वजह से फल-फूल रही थीं. कई मौकों पर ऐसा भी लगता था कि अफसर ही कंपनियों को संचालित कर रहे हैं. कंपनी से जुड़े अभिकर्ताओं के संज्ञान में जैसे ही यह जानकारी आती थीं कि अमुक कंपनी डिफाल्टर है तो उसकी शिकायत वे उच्चाधिकारियों से करते थे. कंपनी के प्रमुख कर्ताधर्ताओं से थोड़े समय के लिए पूछताछ की जाती थीं और फिर बाद में कंपनी को प्रदेश के भोले-भाले लोगों को लूटने की छूट प्रदान कर दी जाती थीं.

 

दागी कंपनियों को था इन अफसरों का संरक्षण

अभिकर्ता एवं उपभोक्ता सेवा संघ ने उच्च न्यायालय के समक्ष लगभग 20 हजार शपथ पत्रों के साथ एक याचिका प्रस्तुत की है. इस याचिका में इस बात का उल्लेख है कि प्रदेश में चिटफंड का गोरखधंधा अफसरों के संरक्षण में फल-फूल रहा था. बहराल संघ ने अपनी शिकायत में लिखा है कि कलकत्ता वेयर इंडस्ट्री को आर संगीता, जयप्रकाश कश्यप, बीआर ठाकुर, अनबलगन पी, राम सिंह ठाकुर, राजपाल त्यागी, अलरमेल मंगई डी का संरक्षण प्राप्त था. सांई प्रसाद ग्रुप पर रीना बाबा साहेब कंगाले, सिद्धार्थ कोमल परदेशी, नीलकंठ टेकाम, तीरथराज अग्रवाल, बीएस जागृत, रितु सेन, भीमसेन, जीएल भारद्वाज और रतनलाल डांगी की नजरें इनायत थीं. निर्मल इन्फ्राहोम कार्पोरेशन लिमिटेड और मिलियन माइल्स ग्रुप को राजेश टोप्पो, विनायक ग्रुप को ओपी चौधरी ( अब भाजपा में शामिल ) सनसाइन और श्रीराम रियल एस्टेट ग्रुप को अमृतलाल ध्रुव, पीआईसीएल ग्रुप को संजीव कुमार झा और रोज वल्ली ग्रुप को सौम्य चौरसिया का वरदहस्त हासिल था. संघ ने लिखा है कि जो अफसर प्रतिबंधित कंपनियों को प्रदेश में फलने-फूलने का अवसर दे रहे थे दरअसल वे पार्टी विशेष के लिए फंड की व्यवस्था में लगे थे.

 

काम नहीं करने दिया गया चिटफंड प्रकोष्ठ को

छत्तीसगढ़ विधानसभा में जब कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में थी तब  चिटफंड कंपनियों की लूट और फरारी को लेकर विधायक मोतीलाल देवांगन ने कई सवाल उठाए थे. कांग्रेस के हमले के बाद सरकार ने दुर्ग, बिलासपुर और रायपुर में चिटफंड प्रकोष्ठ का गठन किया था. इसको अस्तित्व में लाने के पीछे का मकसद यह था कि प्रकोष्ठ चिटफंड कंपनियों के प्रमुख कार्यकर्ताओं की धरपकड़ करेगा, निवेशकों को पैसा वापस दिलाने में मदद करेगा, लेकिन इस प्रकोष्ठ को सरकार के आला अफसरों ने ढंग से काम ही नहीं करने दिया. सरकार ने प्रकोष्ठ में एक उप पुलिस अधीक्षक को तैनात किया, लेकिन उसके साथ किसी भी तरह का स्टाफ नहीं दिया. चिटफंड प्रकोष्ठ के गठन से पहले चिटफंड कंपनियों के प्रमुख कर्ताधर्ताओं की धरपकड़ का काम विशेष अनुसंधान शाखा द्वारा किया जाता था. वस्तुस्थिति यह है कि विशेष अनुसंधान शाखा में पर्याप्त स्टाफ है. अगर कोई कमी है तो स्थापित प्रभारी अधिकारी की. जैसे दुर्ग रेंज में ही अनुसूचित जाति- जनजाति थाने के प्रभारी मौखिक आदेश से कार्य कर रहे हैं. रायपुर और बिलासपुर में तबादले से प्रभावित अधिकारी कामकाज कर रहे हैं. पुलिस महकमे से जुड़े अफसरों का मानना है कि अगर सभी जगहों के चिटफंड प्रकोष्ठ में पदस्थ उप पुलिस अधीक्षकों को विशेष अनुसंधान शाखा में पदस्थापना देकर काम लिया जाता तो चिटफंड कंपनियों के धोखे के शिकार लोगों को न्याय मिल सकता था.

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अमन- मुकेश ने उजाड़ा रमन का चमन

राजकुमार सोनी

बहुत से मित्रों और शुभचिंतकों ने कहा है कि छत्तीसगढ़ की बदली हुई राजनीतिक फिजा को लेकर मैं कुछ लिखूं. राजस्थान पत्रिका नाम के जिस संस्थान में काम करता था उस संस्थान ने ठीक चुनाव के पहले मुझे कोयम्बत्तूर भेजा था और ठीक दो महीने बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया है. वजह क्या है...यह  जानने के लिए श्रम विभाग में अर्जी लगाई है. यह भी सोचता हूं कि अगर वहां रहता तो क्या लिखने का कोई बेहतर अवसर मिल पाता. बहरहाल इस सारी राम कहानी से इत्तर एक हकीकत यहां बया कर रहा हूं.

मतगणना से ठीक एक रोज पहले भाजपा के एक प्रवक्ता टीवी में चीख रहे थे- छत्तीसगढ़ में बारिश इसलिए हुई है क्योंकि बारिश से कीचड़ होता है और सबको पता है कि कमल कीचड़ में ही खिलता है. टीवी का एंकर कोई नौजवान था. उसने कहा- जब कीचड़ ही करना था तो फिर सड़कें क्यों बनाई. प्रवक्ता ने जवाब दिया- भाजपा की सरकार ऐसी सरकार है जिसने विकास की भूख पैदा की है. आत्ममुग्ध प्रवक्ता खुद को संबित पात्रा का बाप समझ रहा था और जो कुछ बकना था बक रहा था. प्रवक्ता ने टीवी डिबेट के अंत में जोर देकर कहा है- 11 दिसम्बर को जब सूरज उगेगा तो छत्तीसगढ़ में एक नए तरह का उजाला देखने को मिलेगा.एक बार फिर भाजपा की सरकार बनेगी और मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह चौथीं बार मुख्यमंत्री बनेंगे, लेकिन 11 दिसम्बर को भूपेश  बघेल और टीएस सिंहदेव की पिक्चर रीलिज हो चुकी थीं. इस पिक्चर के रीलिज होने के साथ छत्तीसगढ़ के गोदी मीडिया ने पलटी मारी और अपने महान तरह के विश्लेषण में यह बताया कि कैसे भूपेश ने कांग्रेस को आक्सीजन जोन से बाहर निकालने में सफल हुए. कैसे टीएस सिंहदेव सबको साथ लेकर चलने में कामयाब हुए. छत्तीसगढ़ के छोटे- बड़े सभी चैनल में बड़े-बड़े संपादक गला फाड़-फाड़कर यह बताने में लग गए कि कांग्रेस ने खुद को कैसे स्टैंड किया. छत्तीसगढ़ आदिकाल से कांग्रेस का गढ़ रहा है.. यहां कभी भाजपा अपने पैर जमा ही नहीं सकती थीं आदि-आदि. गोदी मीडिया यह तो बता रहा है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस किसानों का कर्जा माफ, धान का बोनस, बिजली बिल हाफ सहित अन्य कई वादों की वजह से सत्ता में आ गई है, लेकिन यह नहीं बता रहा है कि किन मंत्रियों और अफसरों के कारनामों की वजह से भाजपा का सुपड़ा साफ हुआ है. एक राष्ट्रीय चैनल एबीपी न्यूज में अशोक वानखेड़े ने अमन सिंह और मुकेश गुप्ता जैसे अफसरों के नामों का उल्लेख करते हुए बेहद दमदारी के साथ कहा कि राज्य को चौपट करने में इन अफसरों की भूमिका बेहद खतरनाक थी, लेकिन अब भी यहां का मीडिया राज्य की बरबादी के लिए इन अफसरों ( इन जैसे और कई अफसरों ) को जिम्मेदार मानने को तैयार नहीं है.

 

वैसे यह कम गंभीर बात नहीं है कि जिस मुकेश गुप्ता ने भाजपा के आदिवासी नेता नंदकुमार साय के पैर तोड़ दिए थे उस मुकेश गुप्ता को सरकार ने 15 सालों में फलने-फूलने का भरपूर मौका दिया. मुकेश गुप्ता का नाम कभी मदनवाड़ा में पुलिस और माओवादियों के बीच हुए मुठभेड़ में जुड़ता रहा तो कभी झीरमघाट के नरसंहार में. मुकेश गुप्ता वहीं शख्स है जिन्होंने नागरिक आपूर्ति निगम के घोटाले की धरपकड़ में डायरी पकड़ी थीं और उस डायरी में मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह और सीएम मैडम का जिक्र आया था. यह अलग बात है कि जो अंतिम चालान पेश किया गया उसमें न तो सीएम का उल्लेख किया गया और न ही सीएम मैडम का. कमोबेश ऐसी ही विवादास्पद स्थिति मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव अमन कुमार सिंह की भी बनी. खुद को बाबूश-फाबूश डॉट कॉम में पावरफूल घोषित करने वाले इस अफसर की भूमिका पुराने हिंदी फिल्मों के खलनायक केएन सिंग की तरह ही थी.

अगर आप पुरानी सस्पेंस फिल्मों के शौकीन है तो कभी केएन सिंग की फिल्म भी अवश्य देखिए. पर्दें के पीछे एक परछाई नजर आएगी और टेप में भारी-भरकम
आवाज. केएन सिंह फिल्म के हीरो के साथ नजर आएगा और आप यानि जनता समझती रहेगी कि पर्दें के पीछे नजर आने वाला शख्स ही खलनायक है. जबकि खलनायक वह निकलता था जो हीरो के साथ खड़े रहता था. छत्तीसगढ़ में भी खलनायक वहीं अफसर थे जो  जनता के साथ खड़े थे. इन अफसरों के इशारों पर किसानों पर लाठियां बरस रही थीं. शिक्षाकर्मी पीटे जा रहे थे. बस्तर और सरगुजा के बेगुनाह मासूम आदिवासी मौत के घाट उतारे जा रहे थे. असहमति व्यक्त करने वालों के बीच भय और आंतक का एक ऐसा वातावरण निर्मित हो गया था कि लोग कहने लगे थे- कोई ईश्वर भी है क्या... अगर हैं तो क्या उसे अत्याचार नजर नहीं आता है. क्या कोई बदुआ होती है. अगर होती है तो इन जालिमों को लगती क्यों नहीं है.

 

ऐसा नहीं है कि प्रदेश में अपने काम के प्रति निष्ठावान और प्रतिबद्ध अफसरों की कमी है, या उनका टोटा है, लेकिन ऐसे सभी सभी अफसर असली केएन सिंग से परेशान थे. अफसर जानते थे कि पर्दें के पीछे नजर आने वाली परछाई भी अमन सिंह की है और हीरो के साथ खड़े रहकर खुद को पाक-साफ बताने वाला अफसर भी अमन सिंह ही है. छत्तीसगढ़ के अफसर अमन सिंह और मुकेश गुप्ता की जुगलबंदी से परेशान थे. प्रतिबद्ध अफसरों के एक बड़े वर्ग ने कुछ समय पहले कांग्रेस के शीर्ष नेताओं और दिल्ली के पत्रकारों को दस्तावेजों के साथ यह जानकारी दी थीं कि कैसे ये दो अफसर  अन्य अफसरों पर अनैतिक काम के लिए दबाव बनाते हैं और किस तरह के गोरखधंधे में लिप्त है. अफसरों की माने तो भ्रष्टाचार की बड़ी धनराशि नेत्र चिकित्सालय में वैध करने के लिए ही डोनेट की जाती थीं.

मुख्यमंत्री के सिंह कुनबे में अमन सिंह ने जब इंट्री ली थी तब उनकी बोली-बानी और कामकाज के तौर तरीकों को लेकर अफसर और पत्रकार खूब तारीफ करते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने प्रशासनिक कामकाज पर ऐसा कब्जा जमाया कि होनहार अफसर साइड लाइन हो गए. जो साइड लाइन नहीं हुए उन्हें गुलाम बना दिया गया. ऐसे गुलाम अफसरों में भारतीय प्रशासनिक सेवा 2010 बैच के बाद के बहुत से अफसर शामिल है. अब जबकि सरकार बदल गई है तब अफसरों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस के नेताओं और पत्रकारों को खुलकर जानकारी दे रहा है कि दोनों अफसरों ने कैसा-कैसा भयानक गुल खिलाया है. यह तो तय है कि आने वाले दिनों में इन दो अफसरों के अलावा भाजपा के इशारों पर काम करने वाले बहुत से अफसरों पर गाज गिरेगी, लेकिन यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि अफसरों की करतूतों ने मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के चेहरे को जबरदस्त ढंग से मलिन किया जिसका खामियाजा उन्हें चुनाव में भुगतना पड़ा है. हाल के दिनों में सांसद रमेश बैस, नंदकुमार साय , बंशीलाल महतो, देवजी पटेल सहित अन्य कई नेताओं का स्टिंग सामने आया है. इस स्टिंग में रमेश बैस साफ तौर पर कहते हुए दिखते हैं कि रमन सिंह सीएम है, मगर अमन सिंह तो सुपर सीएम है.

तो सुपर सीएम नए अफसरों का गिरोह बनाकर नियम-कायदे से परे जाकर काम करता था वहीं पुलिस अफसर छापे-फापे का भय दिखाकर आंतकित करता था. ऐसा नहीं है कि  पन्द्रह सालों में रमन सिंह की सरकार ने कोई काम ही नहीं किया. अगर काम नहीं होता तो तीन मर्तबा जनमत नहीं मिलता, लेकिन चौथीं मर्तबा सरकार अफसरों के खतरनाक चंगुल में फंस गई. राजनीति के व्यावहारिक फैसलों पर अफसरशाही हावी हो गई और हर वर्ग अपने को डरा-सहमा सा महसूस करने लगा. शहर और गांव-गांव में परिवर्तन का नारा तो गूंजा , लेकिन इसके साथ ही लोगों ने एक बात और सुनी- अगर चौथीं बार भाजपा आ गई तो अमन सिंह मार डालेगा. मुकेश गुप्ता झूठे मामलों में फंसा देगा. वर्ष 2000 से लेकर 2003 तक जब प्रदेश में जोगी की सत्ता थीं तब लोग यह कहते हुए पाए जाते थे- अगर जोगी रिपीट हो गए तो जीना मुहाल हो जाएगा. कमोबेश 2003 की स्थिति 2018 में भी देखने को मिली. इस 11 दिसम्बर को जब सत्ता का अंत हुआ तो लोगों ने खुलकर कहा- अच्छा हुआ चले गए... नहीं तो आग भूकते. सुबह-सुबह छत्तीसगढ़ के एक लेखक ने फोन लगाकर कहा- चलो... कहीं घूमने चलते हैं. पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि आज छत्तीसगढ़ की सुबह थोड़ी अलग है. न जाने क्यों लग रहा है कि यहां की हवाओं में फैलाया गया नफरत का जहर बुझ गया है. सरकार की बंदूक हर रोज यहां के निहत्थे आदमी को डरा रही थीं, लेकिन अब बंदूकों का रुख मुड़ गया है.

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संविधान की शपथ लेकर एक हुए दूल्हा-दुल्हन, रिक्शे से निकली बारात

इस शादी में ज्यादातर मजदूर, गरीब और जन आंदोलन से जुड़े लोग ही बाराती के तौर पर शामिल थे और खास बात यह कि बारात रिक्शे पर बड़ी ही धूमधाम से निकाली गई थी। रात के वक्त जब शादी की यह अनूठी रस्में शुरू हुईं तो सबकी आंखें खुली की खुली ही रह गईं।

वर-वधू ने कुछ इस तरह संविधान की शपथ ली और हमेशा-हमेशा के लिए एक-दूजे के हो गए। जी हां, शादी के मंडप में कई जोड़ों को आपने सात फेरे लेकर और पूरे रस्म-ओ-रिवाज के साथ सात जन्मों का बंधन में बंधते देखा होगा। लेकिन हम जिस विवाह की आज यहां बात कर रहे हैं वो उन रीति-रिवाजों से बिल्कुल ही अलग है। बीते 23 दिसंबर यानी रविवार को छत्तीसगढ़ के रायपुर से करीब 150 किलोमीटर दूर रतनपुर के पास लखनीपुर में एक अनोखी शादी हुई। इस शादी की तैयारी, शादी की रस्में, बारात और शादी का जश्न सबकुछ दूसरी शादियों से एकदम अलग था। पेशे से वकील प्रिया ने थियेटर कलाकार अनुज संग शादी संविधान की शपथ लेकर रचाई।

इस शादी में ज्यादातर मजदूर, गरीब और जन आंदोलन से जुड़े लोग ही बाराती के तौर पर शामिल थे और खास बात यह कि बारात रिक्शे पर बड़ी ही धूमधाम से निकाली गई थी। रात के वक्त जब शादी की यह अनूठी रस्में शुरू हुईं तो सबकी आंखें खुली की खुली ही रह गईं। प्रियंका और अनुज ने संविधान की शपथ खाकर एक-दूसरे को अपनाया। शपथ के दौरान दूल्हा-दुल्हन ने एक साथ कुछ इस तरह संविधान की किताब में लिखी बातों को दोहराया।


मैं अनुज/प्रियंका भारत के संविधान की शपथ लेते हैं कि हम एक दूसरे को हमेशा एक दूसरे की तरह रहने देंगे। हम दोनों कभी भी मतभेद को मनभेद में नहीं बदलेंगे। हम दोनों आजीवन घर के सारे काम आपस में बराबर से बांट लेंगे। कितना भी गुस्सा आए हम दोनों हिंसा से दूर रहेंगे। घर के अंदर या बाहर जातिवाद, अभद्र, महिला विरोधी, वर्ग विरोधी सांप्रदायिक भााषा का इस्तेमाल नहीं करेंगे। दुनिया के सारे बच्चों को अपने बच्चों की तरह मानेंगे। सारे वंचित समाज को अपना परिवार मानेंगे। अपना आदर्श स्थापित कर समाज बदलेंगे। हम भारत के संविधान द्वारा स्थापित मूल्यों और सिद्धांतों के प्रति ना सिर्फ निष्ठा रखेंगे बल्कि उनको कायम रखने के लिए जीवन समर्पित कर देंगे। इस शपथ को लेने के बाद प्रियंका ने इनकलाब जिंदाबाद के नारे भी लगाए।

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