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राहुल गांधी ने चौकीदार से नहीं...सुप्रीम कोर्ट से जताया खेद

नई दिल्ली. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी काफी लंबे समय से खुद को देश का चौकीदार बताने वाले प्रधानमंत्री को चोर की संज्ञा से नवाजते रहे हैं. अभी हाल के दिनों की एक चुनावी रैली में उन्होंने कहा था- अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है कि चौकीदार चोर है. उनके इस कथन के बाद भाजपा नेत्री मीनाक्षी लेखी ने एक याचिका दायर कर कोर्ट की अवमानना का आरोप लगाया था. बीते 15 अप्रैल को लेखी की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगाई ने साफ किया था कि सुप्रीम कोर्ट ने कभी भी कोई ऐसा बयान नहीं दिया है जिसे गलत ढंग से प्रस्तुत किया जाय. कोर्ट ने इस मामले में राहुल गांधी को नोटिस जारी कर सफाई भी मांगी थी. सोमवार 22 अप्रैल को जब एक बार फिर सुनवाई हुई तो राहुल ने सुप्रीम कोर्ट को जोड़कर कही गई अपनी बातों के लिए खेद जता दिया.

भक्तों को लगा हो गई बल्ले-बल्ले

राहुल गांधी के खेद जताने के साथ ही मोदी भक्त खुशी से उछल पड़े है. सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में राहुल को चरसी... गंजेडी और मंदबुद्धि लिखा जा रहा है. अपनी निजी टिप्पणियों में भक्त यह भी लिख रहे हैं कि चोर-चोर कहने से भाजपा को लगातार नुकसान हो रहा था, लेकिन अब तीसरे चरण के चुनाव के साथ ही स्थिति सुधर जाएगी और बाजी पलट जाएगी. इधर कांग्रेस समर्थक भी सोशल मीडिया में सफाई दे रहे हैं कि राहुल ने चौकीदार से नहीं ब्लकि सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगी है. समर्थकों का कहना है कि चौकीदार अब भी चोर ही है.

 

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मोदी से कांपने वाली दलाल मीडिया ने ढंग से नहीं छापी पुण्य प्रसुन बाजपेयी की खबर

रायपुर. शनिवार को देश के प्रसिद्ध पत्रकार पुण्य प्रसुन बाजपेयी गांधी ग्लोबल फैमली की ओर से आयोजित प्रतिरोध के स्वर नामक एक कार्यक्रम में  छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मौजूद थे. उन्हें सुनने के लिए हजारों लोग साइंस कॉलेज के पास स्थित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम पहुंचे. सत्ता की गलत नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध के सबसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के रुप में विख्यात बाजपेयी को कव्हरेज करने अमूमन सभी अखबार और चैनलों के नामचीन प्रतिनिधि भी मौजूद थे, लेकिन अततः हुआ वहीं जिसका अंदेशा था. कार्यक्रम की समाप्ति के बाद कई प्रबुद्ध श्रोताओं ने आशंका जताई कि बाजपेयी की सच्ची बातों को गोदी मीडिया में क्या ठीक-ठाक जगह मिल पाएगी. उनका अंदेशा सही साबित हुआ. अखबारों ने तड़का-फड़का टैलेंट... महिलाओं ने खेला सांप-सीढ़ी का खेल और पेशाब कम होने पर ज्यादा पानी पीने की सलाह देने वाली खबरें तो छापी लेकिन बाजपेयी को ढंग से जगह नहीं दी. ( एक- दो अखबार और चैनल को छोड़कर...एक अखबार ने तो मरी-खपी सी जगह पर फोटो के साथ कैप्शन लगाकर इतिश्री कर ली.) हालांकि सोशल मीडिया में बाजपेयी की खबर जमकर चली और अब भी चल रही है.

अपने ढ़ाई घंटे के तार्किक भाषण में बाजपेयी ने शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी अधिकारों को लेकर कई तरह के सवाल खड़े किए. उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार की ओर से जारी किए गए आंकड़ों को आधार बनाकर बताया कि सरकार बेहद खौफनाक ढंग से आवाम को बेवकूफ बना रही है. उन्होंने कहा कि केंद्र की सरकार ने देश का पूरा सिस्टम ही ध्वस्त कर दिया है. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की वेबसाइट में लोगों को भरमाने के लिए कई तरह के आंकड़े दे रखे हैं, लेकिन जब इन आंकड़ों की तस्दीक की जाती है तो वे झूठे निकलते हैं. उन्होंने कहा कि हर विभाग को पर्याप्त बजट जारी होता है, लेकिन उसका लाभ देश की जनता को नहीं मिल पा रहा है. बजट की भारी-भरकम राशि का उपयोग कार्पोरेट जगत से जुड़े लोग ही कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि अब देश का होनहार बच्चा देश छोड़कर जाता है तो फिर दोबारा लौटने की नहीं सोचता क्योंकि देश का माहौल उतना बेहतर नहीं है. कुछ अरसा पहले विदेशी बच्चे भी भारत की सभ्यता और संस्कृति को जानने समझने के लिए आते थे, लेकिन अब उनकी संख्या में भी भारी कमी आ गई है. बाजपेयी ने कहा कि हम अब तक एक भी ऐसा विश्वविद्यालय खड़ा नहीं कर पाए हैं जिस पर हमें गर्व हो.बाजपेयी ने देश की मीडिया को भी आड़े हाथों लिया. उन्होंने कहा कि मीडिया का स्वरुप पूरी तरह से बदल गया है. उन्होंने मीडिया को प्रचार के लिए जारी होने वाली राशि का भी खुलासा किया और कहा कि अब मीडिया में जनता से जुड़ी हुई सच्ची और अच्छी खबरों की गुंजाइश खत्म कर दी गई है. उन्होंने हॉल में उपस्थित दर्शकों को 23 मई तक  टीवी न देखने की सलाह भी दी. उन्होंने कहा कि मौजूदा समय अंधेरे का समय अवश्य है, लेकिन देश के लोगों को तय करना होगा कि वे अंधेरे से लड़ना चाहते हैं या फिर अंधेरे में रहना चाहते हैं. 

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साध्वी को टिकट दिए जाने का देशभर में विरोध... भाजपा की जमकर फजीहत

रायपुर. महाराष्ट्र के मालेगांव बम बलास्ट की एक आरोपी साध्वी प्रज्ञा को भोपाल से टिकट दिए जाने का देशभर में विरोध हो रहा है, छत्तीसगढ़ भी उससे अछूता नहीं है. शनिवार को प्रदेश के अमन पसन्द नागरिक भगत सिंह चौक पर साध्वी के उस बयान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने की तैयारी में हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि आईपीएस हेमंत करकरे को उनके कर्मों की वजह से सजा मिली है. करकरे को उनका श्राप लग गया.

संगठित मीडिया दबाव में

देश का संगठित मीडिया जिसे मुख्यधारा का मीडिया कहा जाता है वह अब भी भगवा दबाव में दिखाई देता हैं और यह खबर छापने से कतरा रहा है कि साध्वी को टिकट दिए जाने के पीछे का असली खेल क्या है. अब तक संगठित मीडिया में इस बात को लेकर किसी तरह की कोई गंभीर रपट देखने को नहीं मिली कि साध्वी पर दांव खेलने की सबसे बड़ी वजह क्या है. मोटे तौर पर केवल यह बात ही प्रचारित की जा रही है कि साध्वी को जेल हुई थी... और उसे जेल में बहुत सताया गया है. मुख्यधारा की मीडिया का फोकस इस बात को लेकर नहीं है कि आतंकवाद का जड़ मूल से खात्मा कर देने का दावा कर देने वाली भाजपा को आतंकवाद के कंधों की जरूरत क्यों पड़ रही है.

मुखर है सोशल मीडिया

फेसबुक, टिव्हटर व अन्य माध्यमों में इस बात को लेकर तीखी बहस चल रही है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयं सेवक को किनारे कर भगवा आतंकवाद के सहारे चुनावी नैय्या पार लगना चाहते हैं. साध्वी ने बम ब्लास्ट के आरोप में कई साल जेल में बिताए हैं और इन दिनों वह सशर्त जमानत पर रिहा है. साध्वी के रोने-धोने और जेल की कथा-कहानी के जरिए मीडिया का एक बड़ा वर्ग सहानुभूति की पतंग उड़ाने की कवायद कर रहा है, लेकिन इसके उलट सोशल मीडिया में प्रतिक्रिया बेहद तीखी है. आइए... कुछ पोस्ट का जिक्र यहां करते हैं- रोशनी सागर ने अपने फेसबुक पर लिखा है-मीडिया भाजपा के वोटों के लिए शहीदों का गीत गाती है, लेकिन अब प्रज्ञा ने जो बयान दिया है उस पर खामोश अख्तियार कर ली है. सफाई कामगारों पर किताब लिखने वाले संजीव खुदशाह की टिप्पणी है- प्रज्ञा ठाकुर के बयान से तो लगता है कि कसाब को इसी ने बुलाया था. यानी दोनों आतंकवादी आपस में  मिले हुए थे. शैलेंद्र गुप्ता ने लिखा है- मनोज तिवारी से लोग गाने की फरमाइश करते थे. साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से बम फोड़कर दिखाने की फरमाइश करेंगे. नवीन जायसवाल साह ने लिखा है-भाजपा ने साध्वी को टिकट देकर साबित कर दिया है कि कल अगर जमानत मिले तो वह आशाराम और राम-रहीम को भी टिकट दे सकती है. राकेश परिहार लिखते हैं- प्रज्ञा कह रही है कि उसे करकरे ने फंसा दिया था. करकरे भ्रष्ट है. क्या एक भ्रष्ट अधिकारी देश के लिए अपनी जान दे सकता है. अब्दुल कलाम ने फेसबक में लिखा है- मित्रों जब पाकिस्तान में हाफिज सईद चुनाव लड़ सकता है तो भारत में प्रज्ञा ठाकुर क्यों नहीं लड़ सकती. मोदी ने पाक को उसी भाषा में जवाब दिया है. बिग्रेडियर प्रदीप यदु का कहना है- पुलवामा में 42 सैनिक मारे गए और इधर भाजपा ने एक आतंकी को टिकट दे दिया. यह है दिखावे का राष्ट्रवाद. धनजंय सिंह ठाकुर का कहना है- किरकिरी के बाद भाजपा प्रज्ञा ठाकुर के बयान से किनारा कर रही है. जब बयान से पल्ला झाड़ना था तो फिर टिकट ही क्यों दिया. रमन सिंह की सरकार में जेल भेजे गए बस्तर के एक पत्रकार प्रभात सिंह ने लिखा है- अपुन को भी टिकट चाहिए. अपुन आतंकवादी न सही जेल तो देखेला है बीडू. साहित्यकार बुद्धिलाल पाल ने लिखा है- प्रज्ञा के राजतिलक से पूरी दुनिया में यह संदेश तो चला ही गया है कि भारत में आतंकवादियों की बल्ले-बल्ले है. स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अनुज लिखते हैं- प्रज्ञा अगर साधु होना तुम्हारे जैसा होना है तो मैं तुम्हारी पूरी जमात से नफरत करता हूं. पीयूसीएल के पूर्व अध्यक्ष लाखन सिंह ने लिखा है- प्रज्ञा को टिकट देकर मालेगांव के निवासियों के जख्मों पर नमक छिड़क दिया गया है. सोनू शर्मा की टिप्पणी व्यंग्य से भरी हुई है. उन्होंने लिखा है- नमो टीवी की नई पेशकश... साध्वी बनी श्रापन. सामाजिक कार्यकर्ता विक्रम सिंह चौहान ने अपने वॉल पर एक लंबी टिप्पणी लिखी है. वे लिखते हैं- अशोक चक्र से सम्मानित हेमंत करकरे का अपमान कर प्रज्ञा ने अक्षम्य अपराध किया है. यह अपराध अब माफी मांगने से भी माफ नहीं होगा. नचिकेता ने एक पोस्टर शेयर किया है. इसमें लिखा है- भोपालवासियों... क्या आपका बहुमूल्य वोट मालेगांव बम बलास्ट के आरोपियों क समर्पित हो सकता है. सुदर्शन लिखते हैं- प्रज्ञा ठाकुर साध्वी है या बम बाइक वाली बाई. सोनू ने इंदौर के एक अखबार की कतरन शेयर की है. अग्निबाण नाम के इस अखबार की खबर है- शिवराज सरकार ने प्रज्ञा को दो बार गिरफ्तार करवाया था. विनोद दुबे ने भी एक खबर का लिंक शेयर किया है जिसमें लिखा है-बीजेपी प्रत्याशी प्रज्ञा पर है छह लोगों की हत्या का इल्जाम. अभी जमानत पर है.

 

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रमन के चेहरे पर फेयर एंड लवली चुपड़ने के खेल में लगे टोप्पो पर जुर्म दर्ज

रायपुर. कमाल के हैं टोप्पो साहब...। टोप्पो मतलब राजेश सुकुमार टोप्पो। कद-काठी में छोटे हैं. लगता है कि जैसे अभी-अभी किसी गांव की हायर सेकेंडरी स्कूल से बारहवीं पास करके निकले हैं. नाम के साथ सुकुमार चस्पा है तो यह अहसास भी होता है कि सुकुमार ही होंगे, लेकिन ऐसा नहीं है. प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तो पूर्व मुख्यमंत्री और सुपर सीएम के नाम से कुख्यात एक भ्रष्ट अफसर की नाक के बाल बने हुए थे. टोप्पो साहब से हर कोई भयभीत रहता था. हर छोटी-बड़ी खबर में अखबार और चैनल के मालिकों को फोन किया करते थे और समझाइश देने से भी नहीं चूकते थे कि खबर कैसी लिखी जानी चाहिए. साहब को हाइलाइट करने का गुर समझाते रहते थे. उनकी भक्ति को इस कदर शक्ति मिली हुई थीं कि वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल की सीडी बनवाने के खेल में लगे हुए थे. बहुत बाद में यह भी साफ हुआ कि पूर्व मुख्यमंत्री के निवास में पदस्थ ओएसडी अरुण बिसेन और सुपर सीएम के इशारे पर वे छत्तीसगढ़ के चुनिंदा पत्रकारों को बैंकाक-पटाया ले जाकर उनकी सेक्स सीडी भी बनवाना चाहते थे. ( हालांकि पहली खेप में वे पत्रकारों के एक दल को बैकांक-पटाया भेजने में सफल भी हो गए. ) लेकिन इधर नई सरकार बनने के बाद टोप्पो ईओडब्लू के हत्थे चढ़ गए हैं. शुक्रवार को उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा- 7 ( सी ) व धारा 13 ( ए ) के तहत दो मामलों में अपराध दर्ज कर लिया गया हैं. ईओडब्लू के प्रमुख जीपी सिंह के मुताबिक यह रिपोर्ट संवाद के प्रमुख उमेश मिश्रा, पंकज गुप्ता, हीरालाल देवांगन, जेएल दरियो की कमेटी की ओर से प्रारंभिक जांच के बाद सौंपी गई रिपोर्ट और नए सिरे की गई तहकीकात के आधार पर दर्ज की गई है. उन्होंने बताया कि अभी कई खुलासे बाकी है. संभव है आगे कुछ और मामलों में एफआईआर दर्ज हो.

बचाव में लगे थे टोप्पो

पुरानी सरकार में आग भूंकने वाले टोप्पो नई सरकार के बनते ही थोड़े समय के लिए अंर्तध्यान हो गए थे. जैसे सुपर सीएम के बारे में यह अफवाह प्रचारित थीं कि वे गोवा के मुख्यमंत्री पर्रिकर के यहां जगह बनाने में सफल हो गए हैं ठीक वैसे ही टोप्पो को लेकर कहा जा रहा था कि वे नौकरी छोड़कर किसी मल्टीनेशनल कंपनी को ज्वाइन करने वाले हैं. इधर सामाजिक कार्यकर्ता उचित शर्मा उनकी करतूतों का भांडा फोड़ने में लगे हुए थे. सूचना के अधिकार के तहत हासिल की गई जानकारियों के बाद उचित शर्मा यह प्रमाणित करने में सफल हो गए कि जनसंपर्क और संवाद के प्रमुख रहने के दौरान टोप्पो ने कई करोड़ रुपए की वित्तीय गड़बड़ियों को अंजाम दिया है. बताते हैं कि टोप्पो ने पिछले दिनों राज्य के कई कद्दावर अफसरों और नेताओं से अपने बचाव के लिए मेल-मुलाकात की थीं. प्रशानिक हल्कों में यह चर्चा थीं कि वे किसी न किसी तरह की जोड़-जुगाड़ से बच निकलेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. शुक्रवार को उनके साथ-साथ क्यूब मीडिया एंड ब्रांडिग लिमिटेड, मूविंग फिक्सल सहित अन्य कुछ कंपनियों के प्रमुखों को आरोपी बनाया गया है.

48 फर्म जांच के दायरे में

नई सरकार बनने के बाद जनसंपर्क और संवाद के अधिकारियों ने 21 निविदा प्रक्रियाओं के तहत पंजीबद्ध 48 फर्मों और एजेंसियों को जांच के दायरे में रखा था. जिन कंपनियों को जांच के दायरे में रखा गया उनमें मुंबई की बैटर कम्युनिकेशन, एड फैक्टर, टच वुड, 77 इंटरटेनमेंट, एक्सेस माई इंडिया, दिल्ली की वीडियो वॉल, करात इंटरटेनमेंट, ग्रीन कम्युनिकेशन, सिल्वर टच, यूएनडीपी, गुजरात की वॉर रुम, मूविंग फिक्सल, रायपुर की ब्रांड वन, व्यापक इंटरप्राइजेस, क्यूबस मीडिया लिमिटेड, आईबीसी 24, कंसोल इंडिया, भिलाई की कंपनी क्राफ्ट, आसरा शामिल थीं. इसके अलावा आलोक नाम के एक प्रोफेसर ने भी संवाद में अपनी दुकान खोल रखी थी. जबकि क्यूब मीडिया के सीईओ श्री डोढ़ी का कारोबार भी संवाद से ही संचालित हो रहा था. हैरत की बात यह है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अफसर की पत्नी की जितनी सक्रियता मुख्यमंत्री निवास में बनी हुई थीं उससे कहीं ज्यादा वह संवाद में सक्रिय थीं. अफसर की पत्नी यही से पूर्व मुख्यमंत्री के साथ छत्तीसगढ़ के गरीब बच्चों की तस्वीरों को फेसबुक, वाट्सअप में शेयर करती थी और लिखती थीं- गरीब बच्चों को आशीष दे रहे हैं हमारे बड़े पापा...हम सबके बड़े पापा.

भाजपा के प्रचार का अड्डा बन गया था संवाद

शासन की नीतियों का प्रचार-प्रसार तो अमूमन सभी शासकीय विभाग करते हैं,लेकिन छत्तीसगढ़ के संवाद का दफ्तर भाजपा के प्रचार का अड्डा बन गया था. यहां विभिन्न निजी कंपनियों के लिए कार्यरत कर्मचारी सुबह से लेकर शाम तक सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में यही देखा करते थे कि विपक्ष की कौन सा मैटर ट्रोल हो रहा है. पाठकों को याद होगा कि कंसोल इंडिया से जुड़े कर्मचारियों ने ही सोशल मीडिया में किसानों की कर्ज माफी को लेकर झूठी पोस्ट वायरल की थी. इस निजी कंपनी में एक कद्दावर अफसर की पत्नी का भाई कार्यरत था. वैसे तो इस कंपनी के कई जगहों पर कार्यालय थे लेकिन रायपुर के अंबुजा माल स्थित मुख्य दफ्तर में ही इस कंपनी ने प्रदेश के मूर्धन्य संपादकों, इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया के पत्रकारों को धन बांटा था और उनका वीडियो भी बनाया था. फिलहाल इस दफ्तर में ताला जड़ गया है.

सुपर सीएम का दखल

हालांकि अभी केवल आईएएस टोप्पो पर जुर्म दर्ज किया गया है, लेकिन बताते हैं कि जनसंपर्क विभाग और संवाद में सुपर सीएम की जबरदस्त दखलदांजी कायम थीं. वे हर पल यहीं देखते थे कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के चेहरे को कैसे प्रोजेक्ट किया जाए. सीएम को प्रोजक्ट करने के चक्कर में कई बार अन्य मंत्रियों की तस्वीरों को भी हटा दिया जाता था. जनसंपर्क विभाग और संवाद का दफ्तर उनके निर्देशों की पालना में ही लगा रहता था. एक कर्मचारी ने बताया कि जनसंपर्क और संवाद का काम सही आकंड़ों को प्रस्तुत करना है, लेकिन पूरा महकमा जनता के समक्ष झूठ परोसने के काम में ही लगा हुआ था. विभाग के एक कर्मचारी का कहना है कि संवाद ने जिला विकास नाम की जो पुस्तिका प्रकाशित की थीं उसमें सारे के सारे आकंड़े झूठे थे लेकिन सरकार के कामकाज को बेहद विश्वसनीय और अनोखा बताने के लिए कमजोर आकंड़ों को मजबूत बताने की कवायद की गई थीं.

कुछ ऐसे चला खेल

यह कम हैरत की बात नहीं है कि वर्ष 2003 के बाद से जनसंपर्क विभाग कभी भी जनता से सीधा संपर्क नहीं रख पाया। विभाग और उसकी सहयोगी संस्था संवाद में बट्टमार और उठाईगिर जगह बनाने में इसलिए सफल हो गए हैं क्योंकि निजी कंपनियों के लोग अफसरों और कर्मचारियों को बगैर किसी मध्यस्थता के सीधे घर पर जाकर कमीशन देने लगे थे. विभाग के कतिपय लोग यह भी कहते हैं कि कतिपय अफसर शराब और शबाब के शौकीन थे. जिसका फायदा निजी कंपनियों ने जमकर उठाया. इस विभाग में निजी कंपनियों की इंट्री तब सबसे ज्यादा हुई जब वर्ष 2014 में मोदी प्रधानमंत्री बनने में सफल हुए. गुजरात से यह हवा चली कि मोदी को जिताने में सोशल मीडिया की अहम भूमिका है. मोदी ने एक टीम बनाकर काम किया और....

सर्वविदित है कि संवाद का काम केवल पब्लिसिटी मैटर क्रियेट करना है, लेकिन मोदी की जीत के बाद निजी कंपनियों को काम देने के लिए विज्ञापन निकाला गया. सबसे पहले मुंबई की एड फैक्टर ने इंट्री ली. यह कंपनी वर्ष 2015 से लेकर 2017 तक सक्रिय रही और इसे प्रत्येक माह लगभग साढ़े पांच लाख रुपए का भुगतान मिलता रहा. इसी कंपनी में कार्यरत तुषार नाम के एक शख्स ने कुछ ही दिनों में वॉर रुम नाम की एक नई संस्था खोली और जनसंपर्क आयुक्त राजेश टोप्पो के साथ मिलकर लंबा खेल खेला.

 

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सियासत में गिरते ग्राफ को बचाने फिल्म मोदी को हिट करवाने हथकंडा

रायपुर. ओमंग कुमार निर्देशित फिल्म पीएम मोदी को हिट करने के लिए एक पार्टी विशेष से जुड़े लोग सिनेमाघरों के मालिकों को पूरे एक हफ्ते की टिकट सुरक्षित रखने के लिए लगातार फोन कर रहे हैं. राजधानी के एक सिनेमाघर के मालिक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अब तक सलमान, शाहरुख, आमिर और अक्षय कुमार के फैन्स फिल्म को हिट करवाने के लिए जोर आजमाइश किया करते थे, लेकिन पहली बार एक फ्लाप एक्टर विवेक ओबेरॉय की फिल्म को लेकर गुणा-भाग दिख रहा है. बहरहाल अगर आप एक सामान्य दर्शक है और फिल्म को देखने के बादअपनी कोई राय बनाना चाहते हैं तो आपको थोड़ा इंतजार करना चाहिए. अगर आप हर फिल्म को पहले ही हफ्ते में देखने के शौकीन है तब भी आपको थोड़ी प्रतीक्षा करनी चाहिए क्योंकि पूरे एक हफ्ते छत्तीसगढ़ के सिनेमाघर.... चौकीदारों से भरे रहने वाले हैं. हर संवाद के साथ अगर आपको मैं भी हूं चौकीदार... मैं भी हूं चौकीदार का शोर सुनाई देगा तो फिल्म देखने का मजा किरकिरा हो सकता है.

चुनाव के समय ही फिल्म क्यों

 यह सौ फीसदी सच है कि पीएम नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अब पहले जैसी नहीं है. उनका ग्राफ कमजोर हुआ है. वर्ष 2014 में वे हर-हर मोदी... घर-घर मोदी थे, लेकिन इन दिनों अबकी बार... माफ कर यार... की गूंज कुछ ज्यादा ही सुनाई दे रही है. अब जबकि इसी 11 अप्रैल से लोकसभा चुनाव के पहले चरण की शुरूआत हो जाएगी तब ओमांग कुमार निर्देशित फिल्म पीएम मोदी भी रिलीज हो जाएगी. पहले यह फिल्म पांच अप्रैल को सिनेमाघरों में आने वाली थीं, लेकिन चुनाव के समय राजनीतिक दलों की आपत्ति के बाद रिलीज की डेट को लेकर संशय बढ़ गया है. माना जा रहा है कि अब यह फिल्म 12 अप्रैल को प्रदर्शित हो सकती है. अब तक तो यह आम धारणा रही है कि जो फिल्म रिलीज होने के पहले सुर्खिया बटोरती है वह रिलीज होने के बाद पैसे भी बटोरती है, लेकिन ऐसा तब हो पाता है जब दर्शक फिल्म को स्वाभाविक ढंग से स्वीकार कर उसकी माउथ पब्लिसिटी करता है. फिलहाल तो ऐसा मुमकिन नहीं दिख रहा है.  विवेक ओबेरॉय के अभिनय से सजी इस फिल्म का ट्रेलर ही दर्शकों को पसन्द नहीं आ रहा है. फिल्म लाइन को जानने-समझने वालों का मानना है कि चावल के एक दाने को हाथ में लेने के बाद ही यह समझ में आ जाता है कि वह पका है या नहीं. अभी तो ट्रेलर देखकर ही लग रहा है कि फिल्म को मोदी भक्तों के अलावा एक सामान्य दर्शक का प्यार और दुलार नहीं मिलने वाला है. वैसे जब से यह बात प्रचारित हुई है कि फिल्म के एक प्रोड्यूसर आनंद महाराष्ट्र के भाजपा कामर्स सेल के कोषाध्यक्ष भी रहे हैं तब से फिल्म को लेकर और ज्यादा नकारात्मक प्रचार प्रारंभ हो गया है. इस फिल्म के निर्माण के साथ ही यह सवाल उठने लगा था कि फिल्म से जुड़े लोग एक खास एजेंडे के तहत फिल्म बना रहे हैं.

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पुनीत है या अजीत

राजकुमार सोनी

रायपुर. कई हिंदी फिल्मों में शानदार ढंग से खलनायक की भूमिका अदा करने वाले अजीत को भला कौन नहीं जानता है. फिल्मों में अजीत सोने के बिस्कुट की तस्करी करते थे. सिगार पीते थे. लाल-पीली-नीली लाइट और अत्याधुनिक तकनीक से निर्मित अड्डे में किसी न किसी मोना डार्लिंग से घिरे रहते थे. जब कोई हीरो उनसे दो-दो हाथ करने पहुंचता तो बेहद शालीन ढंग से कहते थे- सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है... और हजरत एक आप ही है जिनसे पहले कभी मुलाकात नहीं हुई. अब आप सोच रहे होंगे कि इस खबर में पुनीत गुप्ता के साथ खलनायक अजीत की तस्वीर का क्या कोई मेल है. दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता को लेकर जो खबरें आ रही है वह खलनायक अजीत के तौर-तरीकों की याद दिला रही है.

पिछले कुछ समय से मीडिया में पुनीत गुप्ता को लेकर कई तरह की खबरें चल रही है. एक खबर आई कि वे वाट्स अप कर देते थे और टेंडर जारी हो जाता था. इस खबर को पढ़कर लगा कि जैसे अजीत ने अपने सहयोगी को दस रुपए का फटा हुआ नोट देकर आदेश दिया हो- राबर्ट... तुम ठीक रात को 12 बजे समुन्दर के पास चले जाना... वहां इस फट्टे नोट का दूसरा हिस्सा मिलेगा. नोट का मिलान करने के बाद सारा सोना लेकर चले आना. पुनीत गुप्ता को लेकर बुधवार को एक दूसरी खबर यह आई है कि वे आयुष विश्वविद्यालय के पैसे पर विदेश गए थे और इस दौरे में उनके साथ कोई महिला भी थीं. महिलाकर्मी ने पुलिस को दिए अपने बयान में बताया है कि वह गुप्ता के साथ गई तो थीं लेकिन निजी खर्चों पर. इधर एक महिला चिकित्सक का दावा है कि पुनीत गुप्ता एक नहीं कई बार विदेश गए थे और हर बार उनके साथ एक-दो महिलाएं अवश्य रहती थीं. खबर में यह भी उल्लेखित है कि डीकेएस में अधीक्षक रहने के दौरान पुनीत गुप्ता ने अपने चैंबर को बेहद हाईटेक बनवाया था. उन्होंने अपने चैंबर के अंदर ही पांच-छह आलमारियां बना रखीं थी. एक ऐसी आलमारी भी थी जिसका बटन उनके पास ही था. जब वे बटन दबाते थे तब आलमारी खुलती थीं और फिर आलमारी के पीछे एक आलीशान कमरा नजर आता था. ( याद आया आपको... ऐसा अजीत की फिल्मों में कई बार होता था. दर्शक कमरे की भव्यता...शराब की बोतलें... कैबरे डांसर... झूमर... मरे हुए शेर की खाल...अनुशासित ढंग से खड़े हुए सिक्युरिटी गार्ड... लप-लप-लीप-लीप करते हुए कैमरों को देखकर भौंचक रह जाता था. )

खैर... सूत्रों के हवाले  से खबर में यह दावा भी किया गया है कि पुनीत गुप्ता के आलमारी के पीछे नजर आने वाले कमरे में सारी सुविधा मौजूद थी. डायनिंग टेबल, फ्रिज, बिस्तर... इतना ही नहीं आरोपी पुनीत गुप्ता जब तक स्वयं नहीं चाहते थे तब तक कोई उनसे मिल भी नहीं सकता था. अपने स्टिंग ऑपरेशन के जरिए कई नामचीन लोगों को बेनकाब करने वाले फिरोज सिद्धकी भी जैसे-तैसे उनसे मिल पाए थे... मगर स्टिंग करने में सफल रहे. हालांकि यह पहले से ही प्रमाणित था पुनीत गुप्ता अंतागढ़ टेपकांड में शामिल हैं, लेकिन अब जाकर यह बात पुष्ट हो रही है कि वे कई बड़े कारनामों के  मास्टर माइंड भी थे. सूत्रों का कहना है कि पुनीत गुप्ता के हाइटेक कमरे में सप्लायर लोकेश शर्मा और प्रसुन सिंह उर्फ मोनू सिंह की बेरोक-टोक आवाजाही थीं. बताते है कि दोनों में से एक सप्लायर लोकेश शर्मा कृषि विभाग में हर तरह के सामानों की सप्लाई का ठेका लेने वाले गिरोह हिस्सा था जबकि मोनू खुद को पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी का रिश्तेदार बताकर सभी काम हथिया लिया करता था. दोनों सप्लायरों से अफसर भय खाते थे. इन्हें पुनीत गुप्ता ने नियम-कानून से परे जाकर उपकृत कर रखा था. डीकेएस के हर छोटे-बड़े काम में इनकी दखल थीं. यहां तक लोगों को नौकरी लगाने में भी. पुनीत गुप्ता के अधीक्षक रहने के दौरान डीकेएस में एचआर के पद पर अमित मिश्रा, सीनियर मार्केटिंग मैंनेजर श्वेता और निकिता जसवानी  को सीनियर ट्रांसप्लांट काउंसलर के तौर पर नियुक्त किया गया था. स्वास्थ्य विभाग ने फिलहाल इनकी नियुक्ति को फर्जी मान लिया है. 

जैसे फिल्मों में अजीत को हीरो के साथ-साथ पुलिस भी खोजती थी, ठीक वैसे ही छत्तीसगढ़ की पुलिस भी पुनीत को खोज रही है. कमबख्त अजीत भी छकाता था... पुनीत भी छका रहा है.

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सोशल मीडिया में जमकर उड़ रहा है रमन सिंह और पुनीत गुप्ता का मजाक

रायपुर. इस खबर के साथ एक तस्वीर चस्पा की गई है. यह तस्वीर वाट्स अप और फेसबुक विश्वविद्यालय के गलियारों में जमकर विचरण कर रही है. आजकल इसी का जमाना है क्योंकि दलाली के चक्कर में अखबार और चैनल वालों ने अपनी विश्वसनीयता दांव पर लगा रखी हैं.सच तो यह है कि अब अखबारों में आप दूसरे दिन वहीं सब कुछ पढ़ने को मजबूर है जो किसी वेबसाइट या सूचना के जरिए सोशल मीडिया के समुन्दर में पहले ही तैर चुकी होती है. खैर... गौर से देखिए... तस्वीर में क्या लिखा है. पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के हाथ में फोन हैं, वे पूछ रहे हैं- कहा फरार हो गे हस रे पुनीत...। जवाब में पुनीत गुप्ता कहते हैं- का बताऊं तोर अमन... हमन सबके बाजा बजवा दिस.

सच्चा चौकीदार होने का परिचय दो

विधानसभा चुनाव से पहले अखबार वालों को कई-कई पेज का विज्ञापन मिलता था सो पहले पेज से लेकर अंतिम पेज तक में रमन सिंह की विभिन्न मुद्राओं में तस्वीरें छपा करती थीं. चुनाव हारने के बाद अखबार वालों ने पलटी तो मारी, लेकिन अब भी ऐसा लग रहा है कि सुपर सीएम और कंसोल इंडिया का हैंग ओवर उतरा नहीं है. इस मामले में एक बड़े सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है- पन्द्रह साल से नमक खाने वाले लोगों से आप उम्मीद करेंगे कि वे स्वामी भक्ति छोड़ देंगे तो आप गलत ठहरा दिए जाएंगे. हो सकता है कि सामाजिक कार्यकर्ता का सोचना सही हो. इधर कुछ समय पहले जब डाक्टर रमन सिंह ने अपने नाम के आगे चौकीदार लगाया तो उन्हें जमकर सुर्खियां मिली, लेकिन अब उनके दामाद को लेकर उनकी चौकीदारी पर ही सवाल उठने लगा है. फेसबुक विश्वविद्याल में उमेश केशरवानी ने लिखा है- चौकीदार रमन सिंह को अपने फरार दामाद को सामने लाकर सच्चा चौकीदार होने का परिचय देना चाहिए. सतीश जटवार लिखते हैं- घोटालेबाज और घपलेबाज चौकीदार रमन सिंह के फरार दामाद पुनीत गुप्ता का कुछ पता चलें तो हमें भी बताना. समीर चंद्राकर ने लिखा है- चौकीदार रमन सिंह के चोरहा दामाद फरार हो गे हे. आखिर कहा तक अऊ कब तक भाग बे रे चोरहा. दिनेश नेताम की टिप्पणी है- दमाद बाबू दुलरू कहा लुकागे रे. पुष्कर ने लिखा है- आवश्यकता है- मैं भी चौकीदार कहने वाले सालों की... ताकि वे अपने जीजा पुनीत गुप्ता को पुलिस के हवाले कर सकें.

पुलिस की भूमिका को लेकर भी उठे सवाल

जल-जंगल-जमीन को लेकर आंदोलन करने वाले सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ता भी पुनीत गुप्ता की गिरफ्तारी जल्द से जल्द चाहते हैं. अभी चंद रोज पहले दो आरटीआई कार्यकर्ता नेहरु दुतकामड़ी और राकेश कौशिक ने दुर्ग के कलक्टर परिसर में सत्याग्रह किया था. इन दोनों का वीडियो भी जमकर वायरल हुआ. दोनों कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर कोई साधारण आदमी पचास करोड़ का घपला करता तो पुलिस उसे तुरन्त जेल भेज देती, लेकिन पुलिस डाक्टर रमन सिंह के दामाद को गिरफ्तार करने से घबरा रही है. प्रसिद्ध एक्टिविस्ट अनिल अग्रवाल ने अपने फेसबुक में एक के बाद एक कई पोस्ट शेयर की है. अनिल ने लिखा है- पत्रकार विनोद वर्मा को पकड़ने में पुलिस ने जो मुस्तैदी दिखाई थीं वैसी मुस्तैदी अब क्यों नहीं दिखा रही है. क्या पुलिस पुनीत गुप्ता को जमानत का अवसर देकर बचाना चाहती है. अपनी एक पोस्ट में उन्होंने रायपुर के पुलिस अधीक्षक को भी चुनौती दे डाली है. अनिल ने इस पोस्ट में लिखा है- अगर मुझे एक घंटे के लिए रायपुर का पुलिस अधीक्षक बना दिया जाएगा तो पुनीत गुप्ता जेल की सलाखों के पीछे होगा.

पहिली तोर दामाद ला तो...

मजे की बात यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह ने जनता के सवालों का जवाब देने के लिए शनिवार को फेसबुक पर मौजूद थे. फेसबुक में वे ज्यादातर समय नरेंद्र मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ते रहे तो टिप्पणियों में लोग उनके मुख्यमंत्रित्व काल के घपले-घोटालों और अनियमिताओं को लेकर सवाल उठाते रहे. ( आज के अखबारों में शायद इन टिप्पणियों का उल्लेख नहीं होगा. ) कुछ लोगों ने यहां भी उनके दामाद को घेरा है. लोधी धर्मराज ने पूछा - आपका दामाद कहां भागा है. नीतेश पत्रकार का सवाल है- आपके दामाद पर जो आरोप है उस पर आपका क्या कहना है. रविंद्र  का कमेंट है- पहिली तोर दामाद ला तो छोछ के ला.

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देश के सीने पर चुभ रही है मोदी की सफेद दाढ़ी

 

राजकुमार सोनी

 

पहले वे आए कम्युनिस्टों के लिए

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था.

फिर वे आए ट्रेड यूनियन वालों के लिए

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था.

फिर वे आए यहूदियों के लिए

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं यहूदी नहीं था.

फिर वे मेरे लिए आए

और तब तक कोई नहीं बचा था

जो मेरे लिए बोलता.

 

मोदी  ने अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में जिस ढंग से मानवाधिकार संगठनों, कार्यकर्ताओं और संवैधानिक संस्थाओं को कुचलने का काम किया है उसके बाद हिटलर के शासनकाल के एक कवि और फासीवादी विरोधी कार्यकर्ता पास्टर निमोलर की यह कविता बरबस याद आती है. देश अब लोकसभा का चुनाव देखने को तैयार है. इस बार भाजपा की यह पूरी कोशिश होगी कि उसका वोटर राम नाम की माला जपते हुए उसका बेड़ा पार लगा दें, लेकिन सरकार की कारगुजारियों से इतना संकेत तो मिलता ही है कि अब की बार... मोदी सरकार का नारा अब की बार... माफ कर दो यार में बदल सकता है. हालांकि मोदी भक्तों का संसार इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है. मोदी को कण-कण में भगवान जैसा मानने वाले मूढ़ भक्तों को लगता है कि यदि देश को मुसलमानों से बचाना है तो मोदी को लाना जरूरी है. उनको लगता है कि देश की सरहद पर मजदूर और किसान के बेटे नहीं ब्लकि मोदी का विचार एक सैनिक ( रक्षा कवच ) बनकर तैनात है और मोदी देश को सर्जिकल स्ट्राइक में झोंककर सुरक्षित रखे हुए हैं. मोदी की दुनिया को सर्वव्यापी बताने वाले विचारक यह मानने को तैयार ही नहीं है कि तिलिस्म टूट चुका है और मोदी अब एक ऐसी ढलान पर है जहां से उन्हें नीचे और नीचे ही उतरते जाना है.

बहरहाल अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में मोदी ने जितनी ज्यादा बार झूठ का सहारा लिया है उससे कहीं ज्यादा बार उन्होंने अपनी हत्यारी करतूतों से लेखकों, पत्रकारों, कवियों, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को डराया-धमकाया है. उनके भक्त गंदे तरीके से यह बात प्रचारित करते हैं कि मुसलमान देश को डराने के लिए दाढ़ी रखते हैं, लेकिन वे कभी नहीं कहते कि मोदी की झक सफेद दाढ़ी का एक-एक बाल आवाम और अभिव्यक्ति की छाती पर भद्दे तरीके से चूभता रहा है और अब भी चूभ ही रहा है. यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद देश को एक नए तरह के आपातकाल से गुजरना पड़ा है और यह भयावह स्थिति शायद हथकंड़ों के जरिए चुनाव के परिणामों तक बरकरार रहने वाली है.

यह कैसा राष्ट्रवाद

मोदी सरकार और उनके अनन्य भक्तों ने एक नए तरह के राष्ट्रवाद को जन्म दे रखा है. भक्त मानते हैं कि अगर कोई मुसलमान गाय को घूर लें तो गाय अपवित्र हो जाती है. और कोई हाथ फेरता हुआ पकड़ा जाए तो फिर उसकी खैर ही नहीं.अभी हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने एक रिपोर्ट जारी की है जो आंख खोलने वाली है. इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि मोदी सरकार अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों को रोकने और उनकी जांच को लेकर पूरी तरह से नाकाम रही है. वर्ष 2017 में कतिपय कट्टरपंथियों ने जानबूझकर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के बारे में यह अफवाह फैलाई थीं कि वे गायों को खरीदते-बेचते हैं और फिर उन्हें मार देते हैं. इस अफवाह का नतीजा यह हुआ कि अल्पसंख्यकों को जानलेवा हमले का शिकार होना पड़ा. वर्ष 2017 में देशभर में 38 से ज्यादा हमले हुए जिसमें दस लोग मारे गए. ह्यूमन राइट्स वॉच' का यह भी आरोप है कि सत्ताधारी दल भाजपा के कई नेताओं ने भारतीयों के बुनियादी अधिकारों की कीमत पर केवल हिंदू ही श्रेष्ठ हैं के एजेंडे पर काम किया और एक राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जिसमें हिंसा का स्थान महत्वपूर्ण हो गया.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने 90 से ज़्यादा देशों में मानवाधिकारों की स्थिति का जायजा लेते हुए अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के अधिकार के हनन और क़ानून व्यवस्था लागू करने के नाम पर भारत में इंटरनेट सेवाओं को बंद करने के चलन का मुद्दा भी उठाया है. रिपोर्ट बताती है कि राज्य सरकारों ने हिंसा या सामाजिक तनाव रोकने की आड़ लेकर इंटरनेंट बंद करने सहारा लिया है ताकि क़ानून व्यवस्था को कायम रखा जा सके. इंटरनेट सेवाओं को ठप करने की सबसे खराब स्थिति जम्मू और कश्मीर में बताई गई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने निजता और अभिव्यक्ति की आजादी  के अधिकार को संविधान के मौलिक अधिकारों का दर्जा दिया था, लेकिन धरातल पर ऐसा नजर नहीं आया बल्कि हुआ यूं कि दमनकारी सरकारी नीतियों की आलोचना करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, कवियों, पत्रकारों को आपराधिक मानहानि और राजद्रोह जैसे मामलों का सामना करना पड़ा.

 

देशभर में सबसे ज्यादा बुरी स्थिति छत्तीसगढ़ की रही हैं. अब तो यहां कांग्रेस सत्तासीन है, लेकिन जब भाजपा की सरकार थीं तो उसने चुन-चुनकर पत्रकारों को निशाना बनाया. भाजपा ने कार्पोरेट जगत के अखबार मालिकों को तो बख्श दिया, लेकिन उनके यहां कार्यरत पत्रकार जेल में ठूंसे गए या फिर नौकरी से हकाल दिए गए. सत्ता के आगे मालिकों की घुटना टेक नीति के चलते छोटे-बड़े सभी तरह के पत्रकारों को रोजी-रोटी का संकट झेलने को भी विवश होना पड़ा. सर्वाधिक प्रताड़ना माओवाद प्रभावित बस्तर के पत्रकारों को झेलनी  पड़ी. इसके अलावा सरकार की नीतियों के खिलाफ असहमति व्यक्त करने वाले सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता सीधे पर माओवादी घोषित किए गए. बच्चों के कुपोषण के खिलाफ काम करने वाले डाक्टर विनायक सेन माओवादियों के शहरी नेटवर्क का हिस्सा होने के आरोप में लंबे समय तक जेल में बंद रहे. पिछले साल 29 अगस्त को देश भर छापे डाले गए. छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के अधिकारों को लेकर कार्यरत रही नामी अधिवक्ता सुधा भारद्वाज सहित अन्य पांच प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी ने यह दर्शाया कि मोदी जरूरत से ज्यादा डरे हुए हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जिस  ढंग से प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश में शामिल होना बताया गया उससे हुआ कि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां किसी न किसी बहाने जन आंदोलन से जुड़े लोगों को जेल के सींखचों के पीछे धकेलकर विरोध के स्वर को कुचलना चाहती है.

 

फिलहाल तो सरकार असहमति रखने वालों की देशभक्ति पर सवाल उठाना आम बात हो गई है. दलितों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों को माओवादी कहकर जेल में डाल देने की प्रवृत्ति अब भी बरकरार है. जब अदालतें हस्तक्षेप करती हैं, तभी पीड़ित और प्रताड़ित लोगों को कुछ उम्मीद बंधती है, लेकिन अब अदालतों में न्यायाधीशों की चीख-पुकार भी सामने आने लगी है. पिछले दिनों देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की चीख-पुकार एक पत्रकार वार्ता के जरिए सामने आई थी.

 

यहां यह बताना लाजिमी है कि केंद्र में जिसकी भी सरकार होती है विपक्ष उसकी सीबीआई को तोता कहता रहा है. बात तोता और मैना तो ठीक थीं, लेकिन मोदी सरकार के साढ़े चार सालों के कार्यकाल में पहली सीबीआई के दो शीर्ष अफसर आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश आस्थाना के बीच अभूतपूर्व झगड़े की गूंज देशभर में सुनाई दी. इस झगड़े से राष्ट्रीय जांच एजेंसी छवि को काफी नुकसान पहुंचा. दोनों अफसरों के बीच झगड़े की शुरूआत 2017 में हुई थी जब वर्मा ने कुछ अफसरों को एजेंसी में शामिल करने की सिफारिश की अस्थाना को नई तैनाती पर आपत्ति थीं. यह झगड़ा जब बढ़ गया तो केंद्र का दखल साफ तौर पर दिखने लगा. रात के अंधेरे में कार्रवाई होने लगी. सीबीआई में जो कुछ हुआ उसे पूरे देश ने देखा. इस झगड़े के बीच सोशल मीडिया में एक टिप्पणी काफी मजेदार ढंग से लोकप्रिय हुई. हालांकि यह महज टिप्पणी है, लेकिन इसे पढ़कर लगता है कि निजी चैनल में दिखाए जाने वाले क्राइम पेट्रोल की एक नहीं ब्लकि दस-बीस स्टोरी अकेले सीबीआई को लेकर ही बनाई जा सकती है.

 

टिप्पणी कुछ इस तरह की है- वर्मा अस्थाना के खिलाफ हैं, अस्थाना वर्मा के खिलाफ हैं, अस्थाना शर्मा के भी खिलाफ हैं, शर्मा भी अस्थाना के खिलाफ हैं, वर्मा राव के खिलाफ हैं, राव बस्सी के खिलाफ हैं, बस्सी अस्थाना के खिलाफ हैं. यह भी देखो कि प्रधानंमत्री किसके साथ हैं और भाजपा अध्यक्ष किसके साथ हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार किसके साथ हैं और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव किसका साथ दे रहे हैं, वित्त मंत्री किसके साथ हैं और कैबिनेट सचिव किसके पक्ष में हैं.

 

जो भी हो... अभी तो देश का लोकतंत्र निलंबित है.

 

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की सरकार ने एक नारा दिया है- छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र बहाल हो गया है. उम्मीद करनी चाहिए कि देश में भी लोकतंत्र निलंबित नहीं  रहेगा.

 

 

 

 

 

 

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जिस मॉडल की हत्या हुई उसके निकट थे भारतीय वन सेवा के 19 अफसर

रायपुर. वन विभाग के एक रेंजर उदय सिंह ठाकुर की करीबी रही आंचल यादव की हत्या के बाद पुलिस को तफ्तीश के दौरान कई सनसनीखेज जानकारी मिली है. पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी के निर्देश के बाद बालोद पुलिस अधीक्षक एमएल कोटवानी की अगुवाई में गठित टीम ने बुधवार को रायपुर स्थित फ्लावर वैली में आंचल के घर पर छापामार कार्रवाई में कई आपत्तिजनक सामाग्री बरामद की है. पुलिस ने एक लैपटॉप, चार पैन ड्राइव, एक हार्डडिस्क सहित कई तरह की सीडी और कम उम्र की लड़कियों की अश्लील तस्वीरों की जप्ती बनाई है. इन लड़कियों के साथ रायपुर शहर के कई रसूखदार घरानों के लड़कों की तस्वीरें भी है. इसके अलावा पुलिस को भारतीय वन सेवा के 19 ऐसे अफसरों के बारे में भी पता चला है जो आंचल के संपर्क में थे. पुलिस को विनय विपिन बिहारी नाम के एक ऐसे कोयला कारोबारी के बारे में भी जानकारी मिली है जिसने आंचल को फ्लावर वैली में मकान दिलवाया था. बताते हैं कि यह कोयला कारोबारी आंचल के घर नियमित रुप से आया- जाया करता था.

मूल रुप से धमतरी की रहने वाली आंचल वैसे तो एक साधारण परिवार से हैं, लेकिन पैसों की चमक-दमक और ऐशो-आराम की जिंदगी ने उसे बेहद हाईप्रोफाइल बना दिया था. वह पहली बार सुर्खियों में तब आई जब उसने धमतरी के एक रेंजर उदय सिंह ठाकुर के साथ खुद की आपत्तिजनक तस्वीरों को सार्वजनिक किया. आंचल का आरोप था कि उदय ठाकुर लंबे समय से उसका शारीरिक शोषण कर रहा था. पुलिस ने तब आंचल की शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाय उदय सिंह की रिपोर्ट को तव्वजो दी थीं और उसे ढाई महीने जेल में रहना पड़ा था. अभी चंद रोज पहले जब उसकी हत्या हुई तब वह धमतरी में थीं. पुलिस को शक है कि कुछ लोग धमतरी से ही उसका अपहरण कर बालोद ले गए थे और गुरुर नहर में उसे मारकर फेंक दिया गया. बहराल पुलिस जप्त किए लैपटॉप, पैन ड्राइव की जांच कर रही है. पुलिस ने घटना के बाद जो मोबाइल जप्त किया है उसमें कई रसूखदार लोगों का मैसेज भी है.

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विदेश न भाग जाए पुनीत गुप्ता... जप्त होगा पासपोर्ट

रायपुर. छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता पर पुलिस अपना शिकंजा लगातार कसते जा रही है. डीकेएस सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के अधीक्षक रहने के दौरान करोड़ों के उपकरणों की खरीदी सहित अन्य कई मामलों फंसे पुनीत गुप्ता फिलहाल किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से अलॉट सिम कार्ड का उपयोग कर रहे हैं. उनकी लोकेशन का भी पता नहीं चल पा रहा है. पुलिस को यह अंदेशा है कि वे विदेश भी भाग सकते हैं इसलिए  उनका पासपोर्ट जप्त करने की तैयारी चल रही है. जल्द ही पुलिस रेड कार्नर नोटिस भी जारी करेगी. हालांकि अब तक रेड कार्नर नोटिस जारी करने का काम इंटरपोल की तरफ से ही होता रहा है, लेकिन किसी विशेष मामले में पुलिस भी गृह विभाग की अनुमति लेकर इंटरपोल की मदद ले सकती है. रेडकार्नर नोटिस जारी होने की अवस्था में देश के समस्त एयरपोर्ट के इमिग्रेशन चेकपोस्ट पर पुनीत गुप्ता की तस्वीर के साथ-साथ हुलिए आदि की जानकारी मुहैया करवा दी जाएगी.

डीकेएस सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में अधीक्षक रहने के दौरान पुनीत गुप्ता ने कई तरह की गड़बड़ियों को अंजाम दिया था. उन पर यह आरोप है कि उन्होंने रायपुर के मैग्नेटो मॉल स्थित ह्यूमन कनेक्शन प्राइवेट लिमिटेड के साथ चिकित्सकों, मेडिकल स्टॉफ आदि की सेवाओं के लेकर अनुबंध किया था. यह निजी कंपनी पहले से कार्य कर रही थी मगर अनुबंध बाद में किया गया. उन पर यह भी आरोप है कि हॉस्पिटल के लिए करोड़ों रुपए के उपकरण खरीदे गए. उपकरणों की खरीदी के दौरान इस बात का भी ध्यान नहीं रखा गया  कि उसकी आवश्यकता है या नहीं. आवश्यकता अगर एक मशीन की थीं तो कई गुना अधिक मशीन खरीदी गई. गौरतलब है कि डाक्टर गुप्ता के खिलाफ डीकेएस हॉस्पिटल के अधीक्षक केके सहारे ने इसी महीने 15 मार्च को एफआईआर दर्ज करवाई है. एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही उनकी गिरफ्तारी को लेकर सोशल मीडिया सहित अन्य माध्यमों में आवाजें उठ रही है. देश-प्रदेश के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर कोई साधारण व्यक्ति होता तो पुलिस अब तक उसे जेल की सलाखों के पीछे भेज देती, लेकिन वे पूर्व मुख्यमंत्री के दामाद है इसलिए पुलिस के हाथ-पांव कांप रहे हैं. इधर पुलिस के एक वरिष्ठ अफसर ने अपना मोर्चा डॉट काम को बताया कि गिरफ्तारी के लिए पुख्ता सबूत जुटा लिए गए हैं. जल्द ही पुनीत गुप्ता की गिरफ्तारी हो सकती है.

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छत्तीसगढ़ में 15 किन्नरों की होगी शादी... शामिल होंगे भूपेश बघेल

रायपुर.अभी आप सब होली की खुमारी से बाहर नहीं निकले होंगे. ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि हम सब थोड़े-बहुत उत्सवधर्मी तो होते ही हैं. खैर... कल जब अखबार छपकर आएंगे तो प्रथम पेज पर ज्यादातर खबरें भाजपा सांसदों की टिकट कट जाने को लेकर होगी. भाजपा को कभी हारता हुआ न देखने की अभ्यस्त आत्माएं इस बात को लेकर भी परेशान होगी कि आखिर छत्तीसगढ़ के सांसदों के साथ भाजपा आलाकमान भंयकर किस्म का अन्याय क्यों कर  रहा है. अंदर के पन्नों की खबरें होली के दिन चले हुए चाकू-छुरे से संबंधित हो सकती है. अब परम्परागत ढंग से कल जो छपेगा सो छपेगा,लेकिन आज आप इस खबर से गुजर लीजिए

सामाजिक कार्यकर्ता नीना युसूफ के माध्यम से शुक्रवार को एक बेहद स्पेशल कार्ड पहुंचा है. इस कार्ड में छत्तीसगढ़ की धरती पर 15 किन्नरों की शादी का उल्लेख है, जिसमें से छह जोड़े छत्तीसगढ़ के हैं. कार्ड में इस बात का दावा भी किया गया है कि यह विश्व का पहला किन्नरों का सामूहिक विवाह है. जो भी हो यह एक अच्छी पहल हैं. सामान्य तौर पर हम किन्नरों से दुआ तो चाहते हैं, लेकिन कभी यह नहीं सोचते कि उनका भी घर बस जाय. वे सुखी पारिवारिक जीवन जिए. उन्हें ट्रेनों में यात्रियों के आगे ताली बजाकर भीख न मांगनी पड़े. बहरहाल 15 किन्नरों की शादी पुजारी पार्क में बकायदा विधि-विधान के साथ होगी. सभी किन्नरों की बारात सिविल लाइन के अंबेडकर भवन से निकलेगी. बारात घड़ी चौक, जयस्तंभ कालीबाड़ी चौक से होते हुए टिकरापारा के पुजारी पार्क तक पहुंचेगी. शादी 30 मार्च को है, लेकिन इसके पहले 29 मार्च को मेंहदी और संगीत का कार्यक्रम भी चलेगा. इस शादी में खास तौर पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल मौजूद रहेंगे. इसके अलावा विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत, स्वास्थ्य एवं पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव, गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू, कृषि मंत्री रविंद्र चौबे, नगरीय प्रशासन मंत्री शिव डहरिया, महिला एवं बाल विकास मंत्री अनिला भेड़िया, महापौर प्रमोद दुबे, बिलासपुर के विधायक शैलेष पाण्डेय और पूर्व विधायक अमित जोगी मौजूद रहेंगे. आयोजकों ने भाजपा से एक मात्र विधायक एवं पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को विशिष्ट अतिथि बनाया है. शेष किसी का भी नाम कार्ड में नहीं छापा गया है. यहां तक पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के नाम का भी उल्लेख नहीं है. अब इसकी क्या वजह हो सकती है यह आयोजक ही बता सकते हैं, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि भाजपा के शासनकाल में संचालित सामूहिक कन्या विवाह योजना में काफी घपले-घोटाले उजागर हुए थे. अफसर दहेज का सामान खुद ही हड़प लेते थे. यहां तक रवि का काला पंखा भी नहीं छोड़ते थे. पैसे की भूख इतनी ज्यादा थीं हर जोड़ों को अफसरों को रिश्वत देने के लिए कई-कई बार शादी करनी पड़ती थी. जोड़ों को शादी में जो भी उपहार मिलता था उसे वे अफसरों को भेंट कर देते थे. बहरहाल 30 मार्च को जिनकी शादी हो रही है उनके नाम इस प्रकार है- प्रिया नागवानी के साथ विशाल नागवानी, सलौनी किन्नर के साथ दिलीप कौसले, रचना भारती- सतनाम सिंह, सोनाली देवी-अजय भाई रागी, राखी किन्नर-सूरज पांडे, अनुप्रिया सिंह- रजत सिंह, मोनिका- मिथिलेश कुमार, अंकिता- नवीन कुमार, जया सिंह परमार- जुनैद खान, पायल कुंवर-कैयूर चौहान, रीना पटेल- संजय राठवा, शिवानी- निरमाल्यो सिंह, सलौनी- गुलाब  नबी अंसारी, रमा बाघ-शम्मी खान, सौम्या जंघेल- वंशमणि प्रसाद द्विवेदी.

शादी की तैयारियों में जुटी नीना युसूफ ने बताया कि इस शादी के लिए चित्रवाही फिल्मस मुंबई के सुरेश शर्मा विशेष रुप से सक्रिय है. सुरेश वही है जिन्होंने किन्ररों के जीवन पर हंसा एक संयोग नामक फिल्म का निर्माण किया है. इसके अलावा तृतीय लिंग कल्याण बोर्ड की सदस्य विद्या राजपूत एवं चित्रवाही फिल्मस की पब्लिसिटी हेड रवीना बरिहा भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रही है.

चलिए... शादियां तो आपने बहुत सी देखी होगी... लेकिन इस शादी में वक्त निकालकर अवश्य आइए. कार्ड में एक जगह लिखा है- किन्नरों की दुआ कभी खाली नहीं जाती. दुआ देने नहीं तो कम से कम दुआ लेने के लिए ही सही.... पधारिए जरूर.

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तो जनाब... इसलिए हटाया गया कल्लूरी को

रायपुर. भारतीय पुलिस सेवा 1994 बैच के अफसर शिवराम प्रसाद कल्लूरी पर सरकार ने कई बड़े मामलों की जांच सौंप रखी थीं, लेकिन अब उन्हें हटा दिया गया है. कल्लूरी को हटाए जाने के पीछे एक सीधा-सादा सा यह कारण बताया जा रहा है कि वे अपने काम को बेहतर अंजाम नहीं दे पा रहे थे, लेकिन यह सच नहीं है. हकीकत में कल्लूरी अपने काम के साथ कुछ ऐसा कर रहे थे जो सरकार की नजर में खटक गया. हालांकि कम समय में उन्होंने जो कुछ किया उसके परिणाम स्वरुप उन्हें परिवहन विभाग में अपर आयुक्त बनाया गया है. नेताओं और अखबारवालों की भाषा में इस विभाग को मलाई छानने वाला विभाग भी माना जाता है.

सूत्रों का दावा है कि कल्लूरी 11 फरवरी को विजय नाम के एक शख्स के साथ दिल्ली गए थे. विजय के बारे में यह विख्यात है कि वह कभी सूचना के अधिकार के तहत जानकारी हासिल कर पूर्ववर्ती सरकार के लिए मुसीबत खड़ी किया करता था. विजय ने पिछले कुछ साल से एक पूर्व कद्दावर नौकरशाह राजनेता से नजदीकियां बढ़ा ली थीं. सूत्र कहते हैं कि दिल्ली में विजय ने चिप्स घोटाले से जुड़े सारे कागजात उस सुपर सीएम को सौंप दिए हैं जिसकी वजह से जांच प्रभावित हो सकती है. सूत्रों का कहना है कि कल्लूरी को टीवी टॉवर के पास स्थित होटल इटोलॉजी में एक ऐसे विवादित शख्स के साथ भी देखा गया है जो एमसीएक्स के कारोबार से जुड़ा हुआ है. यह शख्स प्रदेश के भ्रष्ट अफसरों को बचाने के लिए पैसों का लेन-देन भी करता है.

स्वामीभक्त अफसरों पर नजर

इसमें कोई दो मत नहीं कि प्रदेश में कुछ अफसर अपने काम को बेहतर अंजाम दे रहे हैं, लेकिन यह भी उतना बड़ा सच है कि बहुत से अफसर खुद को पिछली सरकार के प्रभाव से मुक्त नहीं कर पा रहे हैं. उन पर अमन-चमन और उसके गैंग का हैंगओवर कायम है. कांग्रेस की सरकार किसी अफसर, नेता या पत्रकार का फोन टेप नहीं कर रही है, बावजूद इसके नेटवर्क इतना तगड़ा है कि स्वामीभक्त अफसरों के पल-प्रतिपल की खबर सरकार को दस्तावेजों के साथ मिल रही है. स्वामीभक्त अफसरों की फौज सरकार की योजनाओं को लेट-लतीफ करने और काम में रोड़ा अटकाने के साथ-साथ अर्नगल प्रचार-प्रसार  के खेल में लगी हुई है. यह भी कहा जा रहा है कि भ्रष्ट अफसरों का एक तबका सरकार को फेल करने की कवायद में जुटा हुआ है. इस खेल में एकता कपूर के सीरियलों के पात्र जैसा वह अफसर भी शामिल है जो चिंगम चबाते रहता हैं. कल्लूरी को ईओडब्लू और एसीबी से हटाने के बाद सरकार ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि वह पूर्ववर्ती सरकार की तरह नौकरशाहों के इशारों पर नाचने वाली सरकार नहीं है. कल्लूरी को हटाने के बाद भाजपा की बोलती भी बंद हो गई है.

 

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बस्तर की बच्चियां मिलने पहुंची तो भाग खड़ी हुई निहारिका बारिक

रायपुर. बस्तर जगदलपुर के डोंगाघाट स्थित गायत्री इंस्टीयूट में अध्यनरत कुछ बच्चियां पिछले तीन दिनों से राजधानी में भटक रही है. वे स्वास्थ्य सचिव निहारिका बारिक से मिलकर अपनी समस्या बताना चाहती है ताकि कोई हल निकल सकें, लेकिन मैडम को फुरसत नहीं है. गुरुवार को बच्चियों ने बकायदा मंत्रालय में पास बनाया और मुलाकात करने की कोशिश की, लेकिन बच्चियों के आगमन की सूचना मिलते ही मैडम भाग खड़ी हुई. दफ्तर में मौजूद कर्मचारियों ने कहा- अब मैडम कब आएगी पता नहीं... आप  लोग जाइए... कल फिर आइए.

खेत बेचकर भरनी पड़ रही है फीस

बच्चियों की व्यथा यह है कि अब उन्हें अपनी मां के जेवर और पिता के खेत को बेचकर इंस्टीट्यूट की फीस भरनी पड़ रही है. दरअसल वर्ष 2015 में भाजपा की सरकार ने बस्तर और सरगुजा क्षेत्र की अनुसूचित जनजाति वर्ग की छात्राओं को यूरोपीय कमीशन के अनुदान से तीन साल तक नर्सिंग का निःशुल्क प्रशिक्षण देने का निर्णय लिया था. इस योजना में बस्तर संभाग से 63 एवं सरगुजा संभाग से 37 उन बच्चियों का मेरिट के आधार पर चयन किया जाना था जिन्होंने 12 वीं कक्षा पास कर ली थीं. नर्सिंग के प्रशिक्षण के लिए छात्राओं को यह छूट दी गई थीं कि वे किसी भी संस्थान चाहे वह प्राइवेट हो या सरकारी... एडमिशन ले सकती है. सरकार ने वर्ष 2015-2016 के बजट में यह भी तय किया कि जिन छात्राओं का नर्सिंग के लिए चयन हो जाएगा उनके खाते में हर साल 80 हजार रुपए डाल दिए जाएंगे ताकि वे 42 हजार रुपए टयूशन फीस, 36000 रुपए भोजन व आवास व्यय का वहन कर सकें. सरकार ने पहले साल तो योजना के तहत चयनित सभी छात्राओं के खाते में पैसे भेजे, लेकिन वर्ष 2016 से बच्चियों के खाते में पैसा आना बंद हो गया. अब फीस के अभाव में इंस्टीटयूट वालों ने दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया है. हाल के दिनों में बच्चियों ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते से मुलाकात कर अपनी पीड़ा बताई है. पराते ने बच्चियों को मंत्रालय ले जाकर स्वास्थ्य सचिव निहारिका बारिक से रु-ब-रु करवाने की कोशिश की, मगर उन्हें भी सफलता नहीं मिली. पराते ने बताया कि वे कई बार मैडम को फोन लगा चुके हैं, लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं किया गया. बच्चियां अब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात करना चाहती है.

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शिव डहरिया के आगे हाथ जोड़ लेते हैं अजय चंद्राकर

रायपुर. छत्तीसगढ़ विधानसभा के जनवरी- मार्च के सत्र में बहुत से प्रश्न और ध्यानाकर्षण खास रहे हैं. इन सबके बीच एक खास बात यह भी हुई है कि कांग्रेस को पूर्व संसदीय कार्यमंत्री अजय चंद्राकर से मुकाबले के लिए एक नेता मिल गया है. पूर्व मंत्री चंद्राकर को अच्छा वक्ता माना जाता है. उनके बारे में यह विख्यात है कि वे हर मामले में हस्तक्षेप कर सकते हैं और करते भी हैं, लेकिन कई मर्तबा उनके हस्तक्षेप से सदन गरम हो उठता है.अजय चंद्राकर के अमूमन हर विषय पर हस्तक्षेप का सामना इन दिनों शिव डहरिया कर रहे हैं. उनका अंदाज इतना सधा हुआ रहता है कि चंद्राकर को भी हाथ जोड़ना ( नमन वाली मुद्रा में ) पड़ रहा है.

सदन के भीतर सत्तापक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच तीखी नोंक-झोंक स्वाभाविक ढंग से होती रही है. अभी हाल के दिनों में जब हुडको की जमीन के मामले में अजय चंद्राकर ने हस्तक्षेप किया तो शिव डहरिया ने उन्हें अपने अंदाज में समझाया और कहा- मैं मंत्री हूं और मैं जवाब दूंगा... आप बार-बार खड़े क्यों हो जाते हैं. दोनों नेताओं के बीच प्रश्नकाल और ध्यानाकर्षण के दौरान कई बार नोंक-झोंक हो चुकी है. बुधवार को भी दोनों नेता बिलासपुर शहर के सीवरेज और गढ़ढों के मामले में उलझे तो अध्यक्ष चरणदास महंत को हस्तक्षेप करना पड़ा. प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में अवैध स्लाटर हाउस के मामले में अजय चंद्राकर उन्हें घेरना चाहते थे, लेकिन ढंग से घेर नहीं पाए. बहरहाल सदन के बाहर और भीतर दोनों नेताओं का मुकाबला चर्चा का विषय बना हुआ है.

 

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सुपर सीएम के चहेते सुनील मिश्रा ने जमकर की देश-विदेश की यात्रा

रायपुर. भारतीय वन सेवा के अफसर और सुपर सीएम के सबसे चहेते  सुनील मिश्रा ने छत्तीसगढ़ में औद्योगिक निवेश को आमंत्रित करने के नाम पर देश-विदेश की जमकर यात्राएं की है. हालांकि यात्रा में उनके साथ अन्य अफसर भी शामिल रहे हैं, लेकिन सीएसआईडीसी में पदस्थापना के दौरान अमूमन हर यात्रा में उनकी मौजूदगी रही है.

वर्ष 2014 से लेकर 2018 की अवधि तक सुनील मिश्रा ने कुल कितनी यात्राएं की इसका ब्यौरा विधानसभा में एक प्रश्न के उत्तर में दिया गया है. लोरमी के विधायक धर्मजीत सिंह के सवाल पर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने बताया कि सुनील मिश्रा 6 अप्रैल से 13 अप्रैल तक चीन की यात्रा में थे. यहां उनके साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर सुबोध सिंह, कार्तिकेय गोयल और सीएसआईडीसी के कार्यपालन अभियंता एसके सोनी भी थे. सुनील मिश्रा 4 से 9 अक्टूबर 2016 में ताइवान में थे. यहां भी उनके साथ सुबोध सिंह थे. जबकि दिनांक 26 नवम्बर से 7 दिसम्बर 2016 तक यूएसए की यात्रा में भी उक्त अफसर शामिल थे. औद्योगिक निवेश को आमंत्रित करने के लिए वे 24 मई 2017 से 28 मई 2017 तक शेनझेन ( चीन ) हांगकांग और टोकियो गए थे और वहीं से वे ओसाका ( जापान ) और दक्षिण कोरिया सियोल निकल गए थे. दिनांक 14 से 24 जनवरी तक उन्होंने वाणिज्य एवं उद्योग विभाग के तत्कालीन सचिव कमलप्रीत सिंह, तत्कालीन उद्योग संचालक अलरमेल मंगई डी के साथ आस्ट्रेलिया की यात्रा की थी. निवेशकों को रिझाने के लिए वे कई बार बैंगलूरु, मुंबई, कोलकाता, नई दिल्ली, गोवा, अहमदाबाद, बेलगाम ( कर्नाटक ) भी गए.

सीएसआईडीसी में लंबे समय तक पदस्थ रहने का रिकार्ड बना चुके सुनील मिश्रा की कार्यप्रणाली हमेशा विवादित रही है. कई कारणों से उनकी हवाई यात्राएं भी सुर्खियां बटोरती रही है. उनका नाम चूल्हा कांड में जुड़ा था. सरकार ने हाल-फिलहाल उनकी सेवाएं वन विभाग को वापस लौटा दी गई है और अभी कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं दी है. सीएसआईडीसी में पदस्थ एक अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यात्राओं में 60 करोड़ 90 लाख रुपए फूंके गए  मगर धुआंधार यात्राओं के बाद भी किसी निवेशक ने छत्तीसगढ़ का रुख नहीं किया.

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अब लोकसभा चुनाव के लिए उछला रुचिर गर्ग का नाम

रायपुर. भाजपा में रायपुर लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए दावेदारों का टोटा कायम है. भाजपा की ओर से अब तक सांसद रमेश बैस का नाम ही दौड़ रहा है. कहा जा रहा है कि अगर बैस ने चुनाव लड़ने से मना भी किया तब भी आलाकमान उन्हें समझो भाई मजबूरी है...मोदी को लाना  जरूरी का मर्म समझाकर चुनाव समर में झोंक ही देगा, लेकिन कांग्रेस में ऐसी स्थिति नहीं है. यहां एक से बढ़कर एक दावेदार ताल ठोंक रहे है. विधानसभा चुनाव में बंपर जीत के बाद प्रत्याशियों की सूची और भी थोड़ी लंबी हो गई है. वैसे अभी यह साफ नहीं है कि कांग्रेस का प्रत्याशी कौन होगा, लेकिन शुक्रवार को अचानक रायपुर लोकसभा सीट के लिए सरकार के मीडिया सलाहकार रुचिर गर्ग का नाम उभरा. गर्ग का नाम विधानसभा चुनाव के दौरान भी चर्चा में था तब राजनीति के धुंरधरों ने यह माना था कि अगर उन्हें टिकट दे दी जाती तो वे इतिहास रच सकते थे. हालांकि उनके करीबियों का कहना है कि वे चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं है और दूर-दूर तक उनके चुनाव लड़ने की कोई संभावना भी नहीं है.

मैदान में कई दिग्गज

अभी आचार संहिता भी लागू नहीं हुई है, बावजूद इसके राजनीति के गलियारों में कई नामों की चर्चा बनी हुई है. वरिष्ठ नेता राजेंद्र तिवारी और पूर्व महापौर किरणमयी नायक की दावेदारी सबसे पुख्ता समझीं जा रही है. रायपुर लोकसभा की आठ विधानसभा सीटों में से रायपुर ग्रामीण में सत्यनारायण शर्मा, धरसींवा में अनीता शर्मा, रायपुर पश्चिम में विकास उपाध्याय, भाटापारा में शिवरतन शर्मा और बलौदाबाजार में प्रमोद शर्मा कुल मिलाकर पांच ब्राम्हण प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है इसलिए कहा जा रहा है कि इस बार कांग्रेस किसी ब्राम्हण प्रत्याशी को मौका दे सकती है. अगर ऐसा होता है तो राजेंद्र तिवारी टिकट पाने में सफल हो सकते हैं. वैसे हर बार अंतिम समय में पिछड़ जाने वाले कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख शैलेश नितिन त्रिवेदी भी रायपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के इच्छुक है. कहा जा रहा है कि उन्हें टिकट के लिए कुछ आलानेताओं ने आश्वस्त भी कर दिया है. रायपुर उत्तर में सिख समुदाय के कुलदीप जुनेजा, अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट आरंग में शिव डहरिया और अभनपुर सीट पर पिछड़ा वर्ग के धनेंद्र साहू ने जीत कायम की है सो यह तर्क भी चल रहा है कि एक बार फिर कुर्मी समुदाय का प्रत्याशी मैदान में उतारा जा सकता है. राजनीति के जानकार किरणमयी नाम को एक बेहतर विकल्प मानकर चल रहे हैं. लेकिन इसके साथ यह बात भी कही जा रही है कि चूंकि राज्यसभा में सांसद छाया वर्मा कुर्मी समुदाय से ही हैं इसलिए किसी अन्य नाम पर भी विचार हो सकता है.इन दो नामों के अलावा दिल्ली में आला नेताओं से निकटतम संबंधों को लेकर चर्चा में रहने वाले पारस चोपड़ा का नाम भी सुर्खियों में हैं. कभी कसडोल तो कभी भाटापारा से चुनाव लड़ने का दावा करने वाले राजकमल सिंघानिया की दावेदारी भी मजबूत बताई जा रही है. राजनीति के जानकार महापौर प्रमोद दुबे को भी लोकसभा का संभावित प्रत्याशी बता रहे हैं. हालांकि जानकारों का यह भी कहना है कि प्रमोद दुबे ने बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ विधानसभा का चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था सो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उन पर दोबारा दांव नहीं लगाएंगे. रायपुर लोकसभा सीट से दो मजबूत दावेदार और भी है. एक है- महंत रामसुंदर दास और दूसरे कांग्रेस के प्रभारी महामंत्री गिरीश देवांगन. महंत रामसुंदर दास को विधानसभा का टिकट नहीं दिया गया था बावजूद इसके उन्होंने कई प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार किया. गिरीश देवांगन के बारे में सर्वविदित है कि वे प्रभारी महामंत्री रहते हुए कांग्रेस के लिए बेहतर ढंग से काम कर रहे हैं.

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