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चमन बहार: एक भयावह यथार्थ से परिचय

हेमलता महिश्वर 

‘चमन बहार’ छत्तीसगढ़ के एक छोटे से कस्बेनुमा नगर की एक कहानी है जो जिला बन गया है। यहॉं का सारा समाज ग्रामीण परिवेश से शहरी परिवेश की ओर जाने को अग्रसर है। पर यह सोपान मूलत: भौतिक है। इसमें भावात्मकता तो है, भौतिक विकास की चाहत भी है पर वैचारिकता सिरे से नदारत है। 

यहॉं का युवा वर्ग इसी सपने में जी रहा है। वह सपने तो देख रहा है पर सपनों को पूरा करने के लिए उसके पास कोई दिशा-निर्देश नहीं है। ऐसी स्थिति में वह स्वत: जितना कुछ समझ पाता है, उतना ही करने के लिए न केवल प्रयासरत है बल्कि सन्नद्ध भी है। 

विवेच्य फ़िल्म के अनुसार छत्तीसगढ़ में यह युवा चार तरह का है -पहला तो वह जो निपट स्थानीय है, दूसरा वह जो बाहर से आया है और प्रभुत्व हासिल कर चुका है, तीसरा वह जो स्थानीय नेतागीरी में दाख़िला ले रहा है और चौथा वह जो इन दोनों के बीच तालमेल बिठाते हुए अपने पौ बारह करना चाहता है। सारी फ़िल्म इसी कथानक के इर्द-गिर्द बुनी गई है। 

फ़िल्म का नायक जो पहली तरह का युवा ‘बिल्लू’ है जो वन विभाग के चौकीदार पिता की तरह जीवन नहीं जीना चाहता। वह स्वप्नदर्शी है। वह सरकारी नौकरी करते हुए जीवन बीताना नहीं, जीवन जीना चाहता है इसलिए जंगल का सुरक्षाकर्मी बनने के बजाय अपनी दुकान खोलना चाहता है। चूँकि मुँगेली को शहर में तब्दील करने की योजना है, सो वह संभावित हाइवे पर एक पान की दुकान खोलता है। यह जगह उसे अचानक ही सस्ते में मिल जाती है। पर इस जगह की बहार उजाड़ में बदल जाती है और ग्राहक न मिलने के कारण वह मक्खी मारता, उंघता हुआ ट्रांजिस्टर सुनता है। जगह ऐसी बियाबान है कि ट्रांजिस्टर की फ़्रीक्वेंसी तक मैच नहीं करती। इस समय चौथी तरह के दो युवक उसके पास आते हैं और उसे सूचना देते हैं कि तुम्हें यह जगह सस्ते में बेचकर जानेवाला अपना मुनाफ़ा कमा गया। अब यहॉं हाइवे नहीं बनेगा और तुम्हारी दुकान पर कोई ग्राहक नहीं आएगा। इतनी सूचना देकर वे बिल्लू की दुकान से बिना पैसे दिए गुटका आदि ले लेते हैं और बिल्लू के पैसे माँगने पर उसे उल्टे धमका भी देते हैं। अब बिल्लू की चिंता शुरू होती है। एकाएक वह समझ नहीं पाता कि उसे करना क्या चाहिए। अगले दिन से वह फिर से दुकान में जाकर के बैठ जाता है। घूरे के दिन फिरते हैं - बिल्लू के दिन भी फिरने का अवसर आया। सड़क के दूसरी तरफ़ एकमात्र खड़े डुप्लेक्स मकान का रंग-रोगन होना आरंभ होता है। एक दिन वह देखता है कि एक परिवार उसकी दुकान के ठीक सामने सड़क पार बने इसी एकमात्र भवन में आकर उसे गुलज़ार करता है। 

अचानक बारिश होती है जो इस बात का संकेत है कि उजाड़-बियाबान हरियाली में परिवर्तित होनेवाला है। सामानवाले ट्रक के पीछे एक कार आती है जिसमें से उस परिवार के सदस्य उतरते हैं। अचानक बारिश अच्छी तेज होती है और उस तेज बारिश में ही एक लड़की अपने कुत्ते के साथ उतरती है और दौड़कर मकान के भीतर चली जाती है। तेज बारिश के साथ लड़की का देखना एक फैंटेसी क्रिएट करता है, एक संकेत देता है। निर्देशक यहॉं पर पौराणिक कथा का आधार लेने से बिलकुल नहीं चूकता। ठीक इस समय यही बिल्लू अपनी दुकान में लक्ष्मी का फ़ोटो टाँगने के लिए कील ठोंकता भी है और सामने की तरफ़ देखता भी है जिससे हथौड़ी से उसे चोट लग जाती है। इसी समय चौथे नंबर के दो युवक है उससे कहते हैं कि लक्ष्मी आ गई है, लड़की आ गई है, अब दुकान चलेगी। इस तरह से निर्देशक जनता में निर्मित भाववाद को हरियाने में सफल हो जाता है। ये दोनों लड़के शहर के दूसरे और तीसरी श्रेणी के युवकों को बिल्लू की दुकान तक लाने के तरह-तरह के जतन करते हैं। बिल्लू की दुकान चल पड़ती है। 

निर्देशक युवकों में लहलहाती पितृसत्तात्मक मानसिकता की उपस्थिति दर्ज़ करने लगता है।  लड़की जो स्कूल गोइंग है, वह सारे शहर के युवा वर्ग का आई-टॉनिक बन जाती है। स्कूल गोइंग  लड़के हों या शहर के युवा नेता या शहर का युवा व्यवसायी कोई भी। कोई भी लड़का उस लड़की की झलक पाने के लिए, उसको अपना बताने के लिए इस पान की दुकान तक आता है और उस लड़की को अपना बताने का प्रयास करता है। ये लड़के साइकिल, पैदल, जीप या मोटरसाइकिल आदि जो हर तरह के वर्ग के संबंधित हैं, पान की दुकान पर अड्डेबाज़ी करने लगते हैं। यह युवा वर्ग इस बात की चिंता ही नहीं करता कि लड़की क्या चाहती है। लड़की और लड़की का परिवार बहुत ही पॉलिश्ड है और अड्डेबाज़ी करते युवकों के समूह में लड़की और लड़की के परिवार से मैच करता कुछ भी नहीं है। न रहन-सहन, न बोली-भाषा, न मानसिकता, पान चबाते, सिगरेट-शराब पीते, मॉं-बहन एक करते हर तरह के लड़के उस लड़की को पाने का ख़्वाब लिए पान की दुकान पर मंडराने लगे। चौथी श्रेणी के दो युवकों ने पूरे शहर के प्रभावशाली युवकों को बिल्लू की दुकान की ओर भेज दिया। इन दोनों लड़कों की लफुटई को इससे स्थायित्व प्राप्त हो रहा था। एक नेता और एक व्यवसायी को आपस में भिड़ाकर इनका उल्लू सीधा होने लगा था। ऐसा नहीं है कि यह बिल्लू नहीं समझ रहा था। बिल्लू की दुकान अच्छी चलने लगी। चौथी श्रेणी के युवकों ने दुकान के बाजू में कैरम बोर्ड भी रखवा दिया। सिगरेट, गुटका, कोल्डड्रिंक के अलावा प्रभावशाली लड़के शराब लेकर वहॉं जम जाते। बिल्लू को यह पसंद नहीं आ रहा था। एक बार लड़की उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुराई थी क्योंकि एक आवारा कुत्ते से बिल्लू ने लड़की के कुत्ते को बचाया था। बिल्लू ने  लड़की के एक सहज मानवीय शिष्टाचार का ग़लत मतलब निकाला जो पुरुष मानसिकता ‘लड़की हँसी तो फँसी’ का द्योतक है। 

लड़की की इच्छा हो या न हो, इसे जाने बग़ैर लड़के उसके आस-पास मंडराने लगते हैं। यह जिला मुंगेली की ही नहीं, पूरे भारत की ही दशा है। लड़की का यह परिवार मिडिल क्लास परिवार है। इस परिवार की यह लड़की स्कूल जाती है, स्कूटी चलाती है और अपने कुत्ते को लेकर घुमाने जाती है। कुल मिलाकर यह लड़की अपने घर से तीन बार ही निकलती है। बिल्लू यह नोटिस लेता है कि लड़की अपनी स्कूटी से पहले अपने छोटे भाई को स्कूल छोड़ने जाती है। दूसरी बार वो निकलती है तो स्कूटी से अपने स्कूल जाती है और तीसरी बार शाम को वो अपने कुत्ते को बाहर पैदल घुमाने ले जाती है। इस ताज़ा-ताज़ा जिला बने शहर में किसी लड़की का स्कूटी चलाना एक बड़ा आश्चर्य है, दूसरे लड़की का लंबे खुले सीधे बाल रखना बहुत बड़ा आश्चर्य है, तीसरा जो क़हर बरपाता हुआ आश्चर्य हैं कि लड़की शॉर्ट्स पहनती है और कुत्ते को घुमाने ले जाती है, फिर चौथी परेशानी यह है कि लड़की किसी की तरफ़ देखती तक नहीं। वह सिर्फ़ अपने काम से काम रखती है। अपना काम करती है और घर वापस चली जाती है। जिस जीवन स्तर को वो लड़की अपने परिवार के साथ जी रही है, समान जीवन स्तर तो दूर, इनके आस-पास एक भी घर भी नहीं है ताकि वह इधर-उधर कहीं जा सके। आज भी लड़कियों की कंडीशनिंग ऐसे ही होती है कि वह चुपचाप अपने घर से निकलकर चुपचाप अपना काम करके वापस आ जाए। उसका इधर-उधर देखने का मतलब चरित्र ढीला है। यह लड़की भी किसी की तरफ़ देखती तक नहीं है। लड़की की भूमिका सिर्फ़ इतनी है कि वह घर से निकलती है स्कूटी से और घर वापस आती है स्कूटी से। वह स्कूटी से ही स्कूल से भी निकलती दिखाई देती है। वहॉं भी उसके कोई दोस्त या सहेलियां नहीं हैं। निर्देशक इस मामले में ये बताने की कोशिश कर रहा है कि लड़की वाला पात्र उसके चित्रण का हिस्सा नहीं है, वो केवल और केवल युवकों की मानसिकता पर केंद्रित हो रहा है।

शहरी आबादी से दूर अकेला परिवार निपट अकेले मकान में है और सड़क के इस तरफ़ बिल्लू की दुकान जहॉं शहर के तमाम लड़के जमा होना शुरू हो जाते हैं। लड़के बिल्लू से यह पता करने का प्रयास करते हैं कि लड़की किस-किस समय घर से बाहर निकलती है पर बिल्लू अंजान बना रहता है। एक बार पूरे हुजूम के डटे रहने पर बिल्लू देखता है कि लड़की अपने कुत्ते को घुमाने बाहर लेजा रही है, वह लड़कों का पूरा ध्यान कैरम पर केंद्रित करवाता है। 

बिल्लू न तो ताक़तवर है न ही प्रभावशाली। सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट की तर्ज़ पर वह तरह- तरह के षडयंत्र रचता हुआ युवा नेता और युवा व्यवसायी को भिड़ाकर अपने लिए सुरक्षित स्थान बनाना चाहता है। वह अपने एकतरफ़ा प्यार में इतना सघन है कि वह यह चुनौती भी ले लेता है कि अपने ही पिता के बॉस को फ़ोन करता है और उससे कहता है कि अपने बेटे को सिगरेट पीने से मना करो। बॉस का यह बेटा भी लड़की के चक्कर में उसकी दुकान पर सिगरेट फूँकता बैठा रहता था। 

 वह आम लड़कों की तरह अपनी साक्षरता बस इतना सा लाभ ले पाता है कि जगह-जगह दिल का तीर लगा निशान अपने और रिंकू के नाम के साथ उकेर देता है। वह ‘आर’ अक्षर अपने हाथ में गुदवा लेता है। वह पिता द्वारा पसंद की गई लड़की से शादी नहीं करना चाहता। यहॉं पिता एक सूत्र वाक्य कहता है-“औरत है तो समाज है।” स्त्री की ऐसी ही महत्ता बुद्ध भी स्थापित करते हैं। 

बिल्लू अपना प्यार जताने के लिए लड़की को एक लव-कार्ड देना चाहता है। लड़की को वह कार्ड नहीं दे पाता तो उसकी बालकनी की तरफ़ उछाल देता है। निर्देशक ने यहॉं लड़के की मनोदशा को बड़ी ही ख़ूबसूरती से चित्रित किया है। पर यह कॉर्ड लड़की के पिता के हाथ लगता है। पिता के द्वारा पूछे जाने पर कि कार्ड किसने डाला, बिल्लू साफ़ नट लेता है और अपनी अनभिज्ञता ज़ाहिर करता है। 

अब पुलिस आती है और बिल्लू की खूब पिटाई करती है और अन्य लड़कों की भी पिटाई करती है। इसके बाद जब एक दिन लड़की रस्सी पर सूख रहे कपड़े भितराने के लिए टैरेस पर आती है तो बिल्लू को अपनी ओर देखता पाकर तुरंत वापस चली जाती है। बिल्लू का एक तरफ़ा प्यार इस उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह दुकान नहीं खोलता, उधारी सामान देनेवाले तगादा करते हैं। पर वह तो अब लड़की से बदला लेने को आतुर है। वह लड़की का पीछा करता है और कुछ करने के पहले ही नाकाम हो जाता है। वह ‘सोनम गुप्ता बेवफ़ा है’ की तर्ज़ पर ‘रिंकू नोनारिया बेवफ़ा है’ नोटों पर लिखता है, तगादा करनेवालों को वही नोट देकर लड़की को बदनाम करता है। पुलिस को इस हरकत का पता चलते ही वह उसे न केवल पकड़कर ले जाती है अपितु उसकी दुकान भी तोड़ देती है। अब तो शहर की पितृसत्ता जाग जाती है और ख़ुद को बचाए रखने के लिए मानवाधिकार के छद्म में अपनी आवाज़ बुलंद करती है। बिल्लू की दुकान का न होना मतलब नैन सुख का अवसर न होना। सारे दुष्ट मर्द इकट्ठे होकर पुलिस थाने में अपनी मॉंग दर्ज करते हैं कि बिल्लू निर्दोष है, कमज़ोर पर पुलिस रौब झाड़ती है। स्थानीय न्यूज़ चैनल इसे हॉट टॉपिक बनाते हैं। अंतत: लड़की का पिता ही उसकी बेल कराता है। इससे यह ज़ाहिर होता है कि यह परिवार किसी का बुरा नहीं चाहता। ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटे को उत्पात’ की तर्ज़ पर या बुद्ध दर्शन की करूणा पर संचालित होता हुआ यह परिवार बिल्लू को सुधार का अवसर देना चाहता है। बिल्लू के जेल से रिहा होने पर उसे हीरो बनाकर युवा राजनेता द्वारा अपनी राजनीति चमकाने का प्रयास किया जाता है। इसमें युवा राजनेता की मॉं भी शामिल है। पितृसत्ता उन महिलाओं को खुलकर सामने आने देती है जो पितृसत्ता की जड़ें मज़बूत करने में सक्रिय सहयोग देती हैं। 

पर बिल्लू लड़की के पिता की सह्रदयता से प्रभावित है। वह लड़की के घर जाता है। लड़की की मॉं बग़ैर किसी द्वेष के बिल्लू को ससम्मान भीतर बुलाती है। बिल्लू अपने जूते उतारने लगता है, वह उसे जूतों सहित अंदर बुलाती है। सोफ़े पर लड़की के पिता के सामने उसे बैठने को कहती है। बिल्लू के लिए यह एक नई दुनिया है। वह पूरे कमरे को झिझकती नज़र से देखता है। लड़की के माता-पिता का सामने बैठना, लड़के का सामने टेबल पर पढ़ाई करना, दीवार पर पूरे परिवार की तस्वीर का अलग-अलग अंदाज़ में होना, परिवार के सदस्यों का पोर्ट्रेट होना, लड़की का पोर्ट्रेट होना यह सब देखता हुआ वह पर्दे के पीछे खड़ी लड़की को देखते रह जाता है। यहॉं निर्देशक ने क़माल किया कि कोई सीन क्रियेट नहीं किया। मॉं यह भाँपकर अपनी बेटी से कहती है-“बेटा, चाय लाना तो।” और निर्देशक ने दिखाया कि बिल्लू जैसे ज़मीन में गड़ गया। उसकी नज़रें उठती ही नहीं जबकि लड़की चाय देकर भी चली जाती है। परिवार बिल्लू को सूचना देता है कि यह शहर उनके लायक़ नहीं है। वे अपना परिवार वापस बिलासपुर शिफ़्ट कर देंगे। बिल्लू वापस होता है और पश्चाताप करता है। वह अपनी ही चप्पल से अपने ही सिर को मारता है। स्थिर होकर पुनः उसी जगह पर अपनी वही दुकान खोलता है और वैसे ही मक्खी मारता ट्रॉंजिस्टर सुनता है। एक दिन मकान में वह एक गुलाबी काग़ज़ फड़फड़ाते हुए देखता है। वह उस काग़ज़ को ले आता है और देखता है कि काग़ज़ के एक तरफ़ कोई डायग्राम बना है और दूसरी तरफ़ उसी की तस्वीर है जिसमें वह अपनी विशिष्ट मुद्रा में अपनी दुकान के सामने खड़ा रहता था। इससे यह ज़ाहिर होता है कि जिसने भी लाइव पेंटिंग की थी, उसने बिल्लू को अपना सब्जेक्ट बनाया था। निर्देशक ने बड़े चातुर्य के साथ इसे संशय की तरह उपस्थित करने का प्रयास किया है। जैसी पात्रता होगी, वही ग्रहण किया जा सकेगा। मेरे नज़रिए से इस निर्जन स्थान में यही एक जीवन था जिसे लाइव पेंटिंग में दर्ज किया गया। अपनी दुकान में मक्खी मारता बिल्लू एक दिन देखता है कि सामनेवाले मकान में फिर कोई सामान से लदा ट्रक आकर खड़ा हुआ है, स्कूटी उतारी जा रही है और बिल्लू पुन: उसी पेंटिंग वाली मुद्रा में खड़ा है। 

यह फ़िल्म छत्तीसगढ़ के युवकों की स्थिति पर सोचने के लिए बाध्य करती है। छत्तीसगढ़ भारत का वह राज्य है जहाँ आज भी स्त्री और पुरुष जनसंख्या का अनुपात लगभग बराबर है और ग्रामीण क्षेत्र में तो और भी समानुपातिक जनसंख्या है। इसका मतलब है कि वहॉं लड़की का पैदा होना सामाजिक शर्म का कारण नहीं है। छत्तीसगढ़ की औरतें दाम्पत्य जीवन का निर्वाह करने में अभी भी काफ़ी स्वतंत्र हैं। यदि पति से पटरी नहीं बैठ रही है तो उसे यह सामाजिक अधिकार प्राप्त है कि वह पति का घर छोड़ सकती है। साथ ही, उसे यह अधिकार भी प्राप्त है कि वह दूसरा विवाह रचा सकती है। उत्तर भारत की औरतें यह सोच भी नहीं सकतीं। उनकी संस्कृति तो पति के घर में जाने के बाद अर्थी उठने की ही है। पितृसत्ता का जैसा शिकंजा और जकड़न उनके भीतर कसा हुआ है यह छत्तीसगढ़ की औरतों के साथ नहीं है। छत्तीसगढ़ में तमाम पितृसत्ताक व्यवस्था के बावजूद स्त्री सहमति/असहमति मायने रखती है। 

इस फ़िल्म को देखने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि उत्तर भारतीय जनता जो छत्तीसगढ़ में निवासरत है, अपनी कुसंस्कृति की जड़ें जमा रही है। 

कितने ही समझदार माता-पिता क्यों ना यदि लड़की के लिए इतना प्रोटेक्टिव होना पड़ेगा तो ऑनर किलिंग की नौबत आते देर न लगेगी। छत्तीसगढ़ के लड़के स्त्री को इस तरह से वस्तु में बदल देंगे? 

छत्तीसगढ़ में बेरोज़गारी और शिक्षा का दर और स्तर क्या है कि युवकों की इतनी बड़ी संख्या एक लड़की के पीछे पड़ जाएगी? 

इस फ़िल्म का कथानक भयावह है। फ़िल्म के निर्देशक ने एक भयावह सचाई सामने रखी है। हमें छत्तीसगढ़ की सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, आर्थिक, राजनीतिक पड़ताल वर्तमान संदर्भ में करने की अनिवार्य आवश्यकता है। इन सारे मुद्दों पर चिंतन करने के लिए बाध्य करना ‘चमन बहार’ के निर्देशक की सफलता है। फ़िल्म यथास्थिति से परिचय कराती है। 

बाक़ी कलाकारों का अभिनय उम्दा है, कहीं भी नकलीपन ज़ाहिर नहीं होता। गीत-संगीत, संवाद यथावसर उचित हैं। 

 

परिचय- 
प्रोफ़ेसर एवं पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली 
जन्म तिथि - नवम्बर 5, 1966
जन्म स्थान- बालाघाट, मध्य प्रदेश
शिक्षा- एम.ए., बी.एड., एम.फिल., पीएच.डी.
माता - प्रेमलता मेश्राम 
पिता - रामप्रसाद मेश्राम 
 
संस्थापक सदस्य -अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच 
 
प्रकाशित ग्रंथ
1. स्त्री लेखन और समय के सरोकार, चिंतन, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली
2. नील, नीले रंग के- कविता संग्रह, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली 
सह लेखन
 
धम्म परित्तं - सम्यक् प्रकाशन 
 
संपादित ग्रंथ
1. समय की शिला पर, मुकुटधर पाण्डेय पर केन्द्रित, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर 
2. उनकी जिजीविषा, उनका संघर्ष - शिल्पायन प्रकाशन, नई दिल्ली 
3. रजनी तिलक : एक अधूरा सफ़र 
 
पत्रिका
संपादन 
1. उड़ान 
संपादक सदस्य 
1. हाशिए उलाँघती स्त्री- युद्धरत आम आदमी का विशेषांक 
 
इनके अतिरिक्त विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र- पत्रिकाओं जैसे आलोचना, कथादेश, हंस, वर्तमान साहित्य, अनभैं साँचा, युद्धरत आम आदमी, दलित अस्मिता, स्त्री काल  आदि में आलोचनात्मक लेख, कविता, कहानी प्रकाशित 
 
कुछ कहानी, कविताओं और लेखों का मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी में अनुवाद। 
कहानी जैन विश्वविद्यालय, बैंगलोर और इटली के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही हैं। 
 
 
 
संपर्क 
9560454760 
H-18, Jasola Hight, Pocket 9 A, Jasola Vihar, New Delhi 110025

 

 

 

 

 

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उजड़े चमन में नई बहार

अंजन कुमार

हाल में ही मुझे अपूर्वधर बड़गैया के द्वारा निर्देशित फिल्म चमन बहार को देखने का अवसर मिला। कोई भी फिल्म अपने समय से अलग नहीं होती और समय से काटकर उसका मूल्यांकन भी नहीं  किया जा सकता हैं। इसलिए फिल्म पर बात करने से पहले थोड़ी-सी बात यदि वर्तमान संदर्भ पर कर ली जाए तो मुझे लगता है कि फिल्म को और भी बेतहर व नये ढंग से समझने के कुछ नए सूत्र मिल सकते हैं.

सबसे पहले हम अपने बाजारवाद से पनपे  उपभोक्तावादी संस्कृति की बात करते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि बाजारवाद ने गांव और शहर के बीच एक गहरी खाई को जन्म दे रखा है. इसने साथ ही व्यक्ति के भीतर असंतोष की उस कुंठा को भी जो उसे कहीं न कहीं से हिंसक बनाती है. जब कोई बाजार आधारित जीवन के तमाम सुख-सुविधाओं से खुद को वंचित पाता है तो एक आधुनिक खूबसूरत लड़की से प्रेम की इच्छा उसके लिए स्वप्नमात्र बनकर रह जाती हैं। यह वंचित वर्ग आत्महीनता, घृणा, नफरत जैसी कुंठाओं से भरा हुआ है और असंतोष का जीवन जीने के लिए बाध्य है. इसी असंतोष के चलते स्त्रियों पर तथा दूसरे तरह के अपराध हो रहे हैं. उपभोक्तावादी संस्कृति ने मनुष्य को उपभोग की वस्तु या फिर उपभोक्ता पशु में तब्दील कर दिया हैं। मनुष्य के भीतर की संवेदना, संबंधों की गरिमा, प्रेम की कोमल भावना और सुंदरता जैसे महत्वपूर्ण जीवन मूल्यों को बुरी तरह विकृत कर दिया है। आजकल की अधिकतर फिल्में, वेब सीरिज इन्हीं विकृतियों का शिकार है और पैसा कमाने में लगी हुई है। इस तरह से यह समय कई तरह की विद्रूपताओं से भरा है।

 

मगर इस खौफनाक समय में जब हम चमन बहार से गुजरते हैं तो पाते हैं कि यह फिल्म सारी विकृतियों से बचते हुए और उसका बेहद सुंदर ढंग से प्रतिरोध करती हैं। इस फिल्म का नायक बिल्लू इसी प्रतिरोध का प्रतीक है। जो पढ़ा-लिखा होने के बावजूद बाजार के इन सारे प्रभावों से मुक्त एक स्वप्नजीवी पात्र हैं। जो फिल्म की नायिका को लगातार उन बाजारू नजरों से बचाने की कोशिश करता नजर आता है जो उसे एक आकर्षक वस्तु की तरह देखते है। बिल्लू इस समाज का वही वंचित वर्ग है जो किसी आधुनिक सुंदर लकड़ी से प्रेम करने का स्वप्न देखता है, लेकिन उन कुंठाओं से मुक्त है जो उसे हिंसक बना सकती थीं...क्योकि बिल्लू के जीवन में रिंकू उसके स्वप्न को साकार करने वाली एक आशा या उम्मीद की तरह आती हैं। इस बात को समझने के लिए फिल्म के एक दृश्य याद करना पड़ेगा। बिल्लू अपने ठेले पर माता लक्ष्मी की फोटो को टांगने के लिए कील ठोंक रहा होता है तब रिंकू अपनी गाड़ी से कुत्ते को लेकर उतरती है. बारिश होती है. फिल्म का पात्र सोमू डैडी बिल्लू से कहता है - ’’लड़की शुभ है तेरे लिए डैडी’’। फिर लक्ष्मी की तस्वीर की तरफ कैमरा घूमता है। बिल्लू की आंखों में अपने स्वप्न के पूरे होने की उम्म्मीद की चमक तैर जाती है। बिल्लू, रिंकू को अपने पहचान की आशा के रूप में देखता है और उससे मन ही मन प्यार करने लगता है। यह प्रेम बाजारू संस्कृति के दुष्प्रभाव से मुक्त बेहद स्वभाविक और कोमल भावों से युक्त प्रेम है। जिससे वंचित हो जाने का डर उसे लगातार उन छुटभैय्ये नेता शीला, आशु और अन्य आवारा लड़कों से बना रहता है। जिसे फिल्म बीच-बीच में चल रहे एक गाने - ‘भौरें ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राजकुंवर’ के माध्यम से समझा जा सकता हैं। प्रेम भावनाओं के साथ कैसे राजनीतिक समझ को भी विकसित करता हैं। इसे बिल्लू के द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वियों को रास्ते से हटाने की चालों से समझा जा सकता हैं। निम्न वर्ग का बिल्लू संभ्रात परिवार की रिंकू को प्रेमपत्र के रूप में ग्रिटिंग देना चाहता है, लेकिन उसकी गरीबी उसे कमजोर बनाती है तो वह गले में एक लॉकेट अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने उद्देश्य से पहनता है। क्योंकि उसके जीवन ऐसा कुछ भी नहीं जो उसे आत्मविश्वास से भर सकें. जिसे बाद में उतारकर भी फेंक देता है। पुलिस के द्वारा पीटे जाने के बाद उसका प्रेम से भरा संवेदनशील हृदय अपनी आत्महीनता के और गहरे तल में जा गिरता हैं। पिता उसकी शादी कर देना चाहते है। वे कहते हैं - ‘‘एक स्त्री समाज से जोड़ती है। शादी कर लेगा तो समाज से फिर जुड़ जायेंगे’’  यह संवाद स्त्री के महत्व के साथ ही उनकी सामाजिक स्थिति व पीड़ा को भी उजागर करता है। इसी तरह साधु और उसके बीच का संवाद जहां साधु, बिल्लू से कहता है - ‘‘जीवन कुछ नहीं नदिया का पानी है, या तो खुद को नाव बना लें या धारा के साथ हो जाओ, उल्टा तैरेगा तो मारा जायेगा’’ यह कहते हुए साधु अपने प्रेम की विफलता अपनी प्रेमिका के बेवफा हो जाने को बताता हैं। जिसका जिक्र करते हुए साधु मर जाता है। बिल्लू  छाती पर उसकी प्रेमिका का नाम खुदा हुआ देखता है और फिर अपने हाथ को जिसमें रिंकू के नाम का पहला अक्षर आर खुदा रहता हैं। यहां साधु के प्रेम और अपने प्रेम की विफलता को वह एक साथ महसूस करता है...और वह रिंकू को बेवफा के रूप में प्रचारित करने के लिए पूरे गांव में जगह-जगह और नोट में लिख देता कि रिंकू बेवफा है। अपने इस कृत्य के कारण वह पुलिस की पिटाई भी खाता है। उसका पान ठेला पलट दिया जाता हैं। फिल्मकार ने इस दृश्य को बहुत अच्छे से फिल्माया है। उसे जेल में डाल दिया जाता है। जिस पर शीला भईया और उसकी मां आंटी जी राजनीति करने लगती हैं। रिंकू के पिता सारा कुछ हो जाने के बावजूद बिल्लू को थाने से छुड़ाते हैं। यह उनकी मानवीय संवेदना को दर्शाता है। थाने से राजनीतिक रैली निकाली जाती है। बिल्लू अपने घर से सीधा रिंकू के घर जाता है। जहां वह उसके घरवालों का व्यवहार और घर में लगी रिंकू और उसके परिवार की तस्वीरों को देखता हैं और अपने किए गलती पर आत्मग्लानि से भर जाता है। घर से निकलकर रास्ते भर वह खुद को चप्पल से मारता है और रोते हुए पश्चाताप करता है। यह दृश्य भी बेहद  ही संवेदनशील है। कुछ दिनों के बाद रिंकू के घरवाले गांव छोड़कर चले जाते है। बिल्लू अपने ठेले पर उदास बैठा रहता है। तेज हवा चलती वह उस खाली पड़े घर में जाता है, जहां उसे गुलाबी रंग का एक कागज हवा में लटका हुआ मिलता हैं। जिसके एक तरफ विज्ञान का कोई चित्र और दूसरी तरफ उसके पान ठेले में खडे़ होने की एक खास मुद्रा का चित्र बना होता हैं। जिससे रिंकू के भी प्रेम में होने का पता चलता है। कुछ दिन बाद फिर उस घर में एक नया परिवार उतरता है। एक स्कूटी ट्रक से उतारी जाती है। बिल्लू फिर अपनी उसी मुद्रा में खड़ा हुआ, उस घर की तरफ देखता रहता हैं।

 

फिल्म फिर एक उम्मीद की तरफ इशारा करते हुए खत्म हो जाती है। लेकिन दर्शक बिल्लू की इस उम्मीद को अपने साथ घर लेकर जाता है कि एक न एक दिन बिल्लू का जीवन संवर जाएगा. इस तरह यह फिल्म प्रेम को उसकी स्वभाविकता के साथ बहुत ही सुंदर व यथार्थ पूर्ण ढंग में प्रस्तुत करती है। जो प्रेम की कई सुंदर कहानियों और बेहतरीन फिल्मों की याद ताजा कर देती है। इसके साथ ही यह फिल्म स्त्री को एक उपभोग की वस्तु के रूप में देखे जाने वाली सामंती और बाजार की मानसिकता का प्रतिरोध भी करती है। इस फिल्म के सभी दृश्यों को कैमरे के माध्यम से बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया हैं। फिल्म में सभी कलाकारों ने बहुत शानदार अभिनय किया है। इसके सारे संवाद रचनात्मक और रोचक है। फिल्म के गानों को भी एक नए ढंग से इस्तेमाल किया गया है उसकी अर्थवत्ता के साथ। फिल्म को इस तरह से बुना गया है कि दर्शक अंत तक इस फिल्म से अपना जुड़ाव बनाए रखता है। यह फिल्म एक क्षेत्र विशेष में फिल्माए जाने के बावजूद देश के हर हिस्से में मौजूद गांव-कस्बे की कहानी बन जाती हैं। इस फिल्म को क्षेत्र विशेष की सीमा में रखकर देखना उचित नहीं है. कुल मिलाकर यह फिल्म इस हिंसक और विद्रूप समय में प्रेम को, सुंदरता को, मानवीय संवेदनाओं को उसकी स्वभाविकता में पुर्नस्थापित करती एक खूबसूरत फिल्म है। जिसमें निर्देशन की एक नई दृष्टि देखने को मिलती जो इस फिल्म को अलग व महत्वपूर्ण बनाती है। यह फिल्म उजड़ते हुए चमन में एक नये बहार की शुरूआत है। संवेदनशील और समझदार दर्शकों को इस नए अनुभव से अवश्य गुजरना चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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हे समीक्षकों... हम दर्शकों से भी तो पूछ लीजिए कि कैसी लगी चमन-बहार

सत्यप्रकाश सिंह

ये तो अपने कांकेर जैसा है यार...जब आपके और हमारे लबों पर ऐसी कोई बात किसी फिल्म को या किसी स्टोरी को पढ़ते- पढते मचल जाये तो समझ लीजिये रचनाकार का पसीना मोती में तब्दील हो रहा है. 

मै बात कर रहा हूँ चमनबहार फिल्म की जिसने मुझे तारूण्य की स्मृतियों के उन लम्हातों  से जोड़ दिया जहाँ कस्बाई जीवन की भावनाएं इसी प्रकार जीवन्त होती है जो परदे पर उतारी गई  है !

मैं एक आम दर्शक हूं

हम पूरी फैमिली के साथ ही कोई मूवी देखते है और जब गृहस्वामिनी ने कहा कि नेटफ्लिक्स पर छत्तीसगढ़ के एक लड़के की मूवी देखनी है तो मेरा पहले मेरा साहस डगमगा गया.दरअसल आजकल नेटफ्लिक्स हो या अमेज़न इन पर सस्ती उत्तेजना का नशीला बाज़ार सजा हुआ है.  बहरहाल बात जब छत्तीसगढ़ की हो तो सारा परिवार था स्क्रीन के सामने था. फिल्म के प्रारंभ होते ही मै उसकी सहजता से जुड़ता चला गया. एक आम दर्शक चाहता है कि स्वस्थ मनोरंजन हो. यही इस फिल्म की बुनियाद है.एक साधारण सी कहानी कैसे असाधारण बन जाती है. यह मुझे चमनबहार में नजर आया. सच कहूं तो मुझे बेहद खुशी हुई अपनी माटी की इस अशेष प्रतिभा के लिए जिसनें मुट्ठी भर लाई को जीवन की सहजताओं के साथ पिरों कर आसमां में बिखेर दिया है.

अप्रतिम अपूर्व ! 

आंचलिकता के नाम पर यहां की छत्तीसगढ़ी फिल्मों में जो फूहड़ता चल रही है अपूर्व ने उस फूहड़ता से अपनी फिल्म के कथानक को बचाकर रखा है.फिल्म को जब हम देखने बैठते है तो ऐसा नहीं कि इसमें कमी नहीं दिखती मगर खूबियां इतनी है कि कमियां नजरअंदाज हो जाती है और वह भी तब  जब निर्देशक की यह प्रथम फिल्म हो. कम से कम संवाद में मुखर संसार का सृजन इस फिल्म की एक ख़ास विशेषता भी है. ग़ौरतलब है नायिका का एक भी संवाद ना होना इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती है.दरअसल निर्देशक ने नायिका की भाव-भंगिमाओं और उसके चेहरे के एक्सप्रेशन को ही संवाद का सेतु बना दिया है. फिल्म के नायक ने अपने कसे हुए अभिनय के साथ कस्बों में या कह ले शहरों के गली-मुहल्लों के उस किरदार को जिंदा कर दिया है जिससे हम और आप अक्सर मिलते रहते है.  इस फिल्म से एक बड़ा दर्शक इसलिए भी जुड़ रहा है क्योंकि ज्यादातर लोगों ने यह यथार्थ भोगा है.

फ़िल्म को लेकर समीक्षकों के बीच बहस का दौर जारी है. कोई आदर्शवाद की दुहाई दे रहा है कोई पितृसत्ता का परचम लहरा रहा है और कोई बस अपने नज़रिए की बात कर रहा है. एक बार जनाब हम दर्शकों से भी तो पूछ लीजिए हमें यह फिल्म क्यों अच्छी लग रही है.क्या चमनबहार की कहानी मेरे और आपके समाज में रोज घटने वाली सच्ची कहानी नही है? कौन इस कहानी को बढ़ावा देना चाहेगा मगर इस सच को छत्तीसगढ़ के अपूर्वधर ने जिन बारीक़ियों के साथ परदे पर उकेरा है वो अद्भुत है. हम सबके लिए गर्व की बात है कि छत्तीसगढ़ के इस युवा को आज पूरे देश में उसकी इस फिल्म के लिए सम्मान मिल रहा है और उसके काम पर बाते हो रही है. हबीब साहब की माटी  पर अपूर्व का यह आगाज़ नयी इबादत रचेगा यह तो तय है.

अगर मेरी तरह आप भी उनचास के है और बीस-तीस बरस पुराने दिनों को एकबार फ़िर से जीना चाहते है तो चमनबहार हाज़िर है. अगर आप जीना नहीं जानते. जीना नहीं चाहते तो सड़ते रहिए. मरते रहिए. मरने से कौन रोकता है.

 

 

 

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किसी शाम प्यार आएगा: अपूर्व का चमनबहार

भुवाल सिंह

अपूर्व निर्देशित 'चमनबहार 'की कहानी छत्तीसगढ़ के लोरमी कस्बे के युवक बिल्लू के इर्द गिर्द घूमती है. बिल्लू पहचान के संकट से गुजर रहा है. अपनी पहचान बनाने के लिए वह वन विभाग की चौकीदारी छोड़कर दिनेश की मदद से लोरमी रोड पर 'चमनबहार' नाम से पानठेला खोलता है. कथा के केंद्र में रिंकू नामक लड़की है जो फ़िल्म में लगभग न के बराबर बोलते हुए भी  फ़िल्म की असल गति है. रिंकू के पिता इंजीनियर है और लोरमी में नए-नए शिफ़्ट हुए हैं. इंजीनियर का आवास ठीक पानठेला के सामने है. मुंगेली जिला बनने के बाद लोरमी का बाजार गड़बड़ा गया है और इससे सबसे ज्यादा प्रभावित चमनबहार  पानठेला है.लेकिन इंजीनियर साहब के आने के बाद यानी रिंकू की उपस्थिति से यह वीरान पान की दुकान चल निकली है.

यहीं से कथानक में गति आती है. पान की दुकान की रंगीनी रिंकू की उपस्थिति से लालिमा धारण कर लेती है. लोरमी के व्यापारी पुत्र शीला और स्थानीय नेता पुत्र आशु की दिलचस्पी भी पान की दुकान में रिंकु को एक नजर देख लेने की है.

अब फ़िल्म को एक पाठ की तरह देखते हैं. यह फ़िल्म जीवन के एकाकी, मां की ममता से वंचित एक युवा की कहानी है. इस युवक को प्रेम की तलाश है. पिता शराब पीता है. बिल्लू  बचपन में  डीएफओ की बेटे की तरह हैप्पी बर्थ डे मनाने का शौक रखता है. उसके पिता इन्हीं सब जिद्द की वजह से बिल्लू को साहब के घर नहीं ले जाते. बचपन जीवन का एक ऐसा दौर है जिसमें वह दुनिया को समान दृष्टि से देखता है. उसे साहब और चपरासी का अंतर पता नहीं होता. बचपन मनुष्य मात्र को समान देखने की सर्जनात्मक नजर का नाम है. बिल्लू की इस नजर का उसके पिता के लिए भी मायने है पर वह मजबूर है. बचपन की उम्मीदें अब युवा काल में रूप बदलने लगती है. पिता के ज़िद्द में बिल्लू वन विभाग की चौकीदारी स्वीकार कर लेता है. पर वह इसे अपनी  इच्छा के विरुद्ध मानकर पहचान बनाने की सोचता है और पिता के विरुद्ध जाकर पान की दुकान खोल लेता है.

चमनबहार का दर्शक होने के लिए प्रेमी मन का होना बेहद जरूरी है. जो भी दर्शक अपने जवानी की रंगीनियत को मन में न मारकर जीवन में उतारा होगा. जवानी को शिद्दत से जिया होगा.अपने सपनों की राजकुमारी के बारे में न सिर्फ सोचा होगा बल्कि उसे पाने के लिए जीवंत प्रयत्न किया होगा वह  'चमनबहार' से निकलने वाली आग और उसकी ठंडक को महसूस कर सकता है. प्रेम अग्नि है तो जलधार भी. बिल्लू का पूरा प्रयास चाहे  वह शीला और आशु के दबंग रूप के सामने भी अपने प्रेम को बचा पाने की सोच हो या दोनों हंसोड़ डैडी के कैरम क्लब को ध्वस्त करवाने की.अंग्रेजी शिक्षक के प्रति रोष हो या डीएफओ के बिच्छू छाप जैकेट पहनने वाले बेटे को पानठेले से हटाने की. हर जगह बिल्लू अपनी सहज बुद्धि से यह कहते दिखता है-" मोहब्बत और जंग में सब जायज़ है!"

हर वह स्थल जहां रिंकू को एक नजर भी देखने का अवसर मिल जाय बिल्लू नहीं छोड़ना चाहता. यह अवसर वह किसी भी कीमत पर सामूहिक नहीं बनने देने की बलवती इच्छा रखता है. इसीलिए कई अवसर पर जब  रिंकू अपने कुत्ते रुबी को घुमाने ले जाती है तब बिल्लू हर तरह से यह प्रयास करता है कि बाकी युवकों का मुख उनके तरफ रहें ताकि वह अकेला रिंकू को निहार सकें. प्रेम का सबसे बड़ा मूल्य एकांत का वैभव है. प्रेमी और प्रेमपात्र के अलावा कोई तीसरा नहीं.

'चमनबहार ' फ़िल्म के हीरो बिल्लू  से लेकर  स्कूली छात्र , आशु,शीला, दोनों डैडी और अनाम लड़के की आंतरिक बनावट और उमंग उन्हें एक धरातल प्रदान करती है. वह धरातल है-प्रेम की तलाश. इन्हें आप आवारा कहें...लफंगा कहें या कोई और सम्बोधन, लेकिन हम सब जीवन के सबसे खूबसूरत एहसास के दौर में  चमनबहार के भाव से गुजरते हैं. जो नहीं गुजरे वे अभागे हैं या झूठे. फिल्म में रिंकु जब-जब इंट्री करती है तब मुझे आलोक धन्वा के शब्द दिखाई देते हैं-

अब भी

छतों पर आती हैं लड़कियाँ

मेरी ज़िंदगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ.

गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिए

जो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैं

नाले के ऊपर बनी सीढियों पर और

फ़ुटपाथ के खुले चायख़ानों की बेंचों पर

चाय पी रहे हैं

उस लड़के को घेर कर

जो बहुत मीठा बजा रहा है माउथ ऑर्गन पर

आवारा और श्री 420 की अमर धुनें

 

पत्रिकाओं की एक ज़मीन पर बिछी दुकान

सामने खड़े-खड़े कुछ नौजवान अख़बार भी पढ़ रहे हैं.

उनमें सभी छात्र नहीं हैं

कुछ बेरोज़गार हैं और कुछ नौकरीपेशा,

और कुछ लफंगे भी

 

लेकिन उन सभी के ख़ून में

इंतज़ार है एक लड़की का !

उन्हें उम्मीद है उन घरों और उन छतों से

किसी शाम प्यार आयेगा !"

प्रेम के आ जाने का इंतजार इस फ़िल्म को विश्वसनीय बनाता है.

स्थानीय राजनीति की दबंगई आशु के चरित्र को आगे बढ़ाती है. हर स्थिति को वे अपनी माँ के साथ मिलकर अवसर में बदलना जानता है. शीला व्यापारी है लेकिन उसकी भी पृष्ठभूमि में राजनीति है. दोनों डैडी अभाव में भी जीवन के मजे लेना जानते हैं. बिल्लू का पिता दुनियादार बुद्धि का मालिक है. वह अपने एक संवाद में प्रशासनिक तंत्र का राज खोलता है. बिल्लू पूछता है क्या फूट डालो और राज करो की नीति प्रासंगिक है. तब उनके पिता कहते हैं- कान भरो और राज करो. प्रशासनिक अमले के पदसोपान के हर स्तर पर यह वाक्य सच दिखता है. प्रामाणिकता और सहजता के लिहाज से बिल्लू के पिता का कोई जवाब नहीं. ये सभी पात्र मानवीय हैं. अनेक पात्रों के साथ दोनों डैडी भाचा, तनतन,पगले ,बे साले जैसे बिलासपुरिया हिंदी में छत्तीसगढ़ी के फ़्यूजन को अपने चरित्र  में दर्शाते हैं. छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत की बानगी के साथ रॉक का फ़्यूजन युवा मन के उमंग को बेहतरीन ढंग से प्रगट करता है.

प्रेम के लिए हर रास्ता अपनाने के लिए तैयार बिल्लू की पान की दुकान और उसके  व्यक्तित्व को इलाके का थानेदार पीटकर रौंद देता है. बेदम पिटाई के बाद कोई बिल्लू को कोई भी आवारा और समाज विरोधी चरित्र कह सकता है. उसे लड़की के इज्जत को नोटों पर लिखकर बेचने वाला कहकर गालियां दे सकता है, बावजूद यह सब विश्वसनीय लगता है क्योंकि वह प्रेम में है. भले ही हम इस प्रेम को एकतरफा कह दें. लेकिन दिल लगाने के लिए कोई नियमावली और अधिकार तंत्र थोड़े ही है. दिल का मामला नैसर्गिक है.

बिल्लू को इंजीनियर साहब  जेल से निकलवाता है. बिल्लू कृतज्ञता ज्ञापित करने इंजीनियर के घर जाता है. वहां दो मार्मिक घटनाएं दृश्य रूप में घटित होती है. प्रथम बिल्लू ध्यान से इंजीनियर साहब और उसके परिवारजनों की तस्वीरों को देखता है. इन तस्वीरों में मां, पिता ,भाई,बहन पूरा भरा- पूरा परिवार  है. आगे एक फोटो रिंकू की दिखती है. इस दृश्य में सहज बुद्धि वाला दर्शक भी महसूस करेगा कि बिल्लू के मन में प्रेम का अभाव है. इसका एक रुप मां है तो दूसरा प्रेमिका है.

दूसरा दृश्य वह है जिसमें रिंकू परदे के पीछे से बिल्लू को समभाव से देख रही है. ऐसा महसूस होता है कि बिल्लू के प्रति उसके मन में प्रेम का उदय हो चुका है. रिंकू चाय लेकर आती है और बिल्लू के सामने रख देती है. बिल्लू पश्चाताप से सिर नीचे कर लेता है. वह रिंकू की प्रिय चॉकलेट डेरी मिल्क टेबल में रखकर हारे हुए सिपाही की तरह बाहर की तरफ भागता है. सड़क पर आने के बाद उसकी मुखाकृति और शारीरिक हाव-भाव प्रेम की असफलता को दर्शाते हैं. माहौल पूरी तरह से दर्द से भर उठता है. यह दृश्य फ़िल्म की जान है जो कस्बाई युवक की ईमानदारी और  उसके निश्चल पश्चताप को प्रकट करता है.यह फ़िल्म यथार्थवादी रूप का परिचायक है.

फ़िल्म में बिल्लू का जीवन यहां उजाड़ से भरा महसूस होने लगता है. फ़िल्म में हीरोइन लोरमी छोड़ चुकी है और दर्शक को लगता है कोई सकारात्मक हो तो बात बनें. कोई अति उत्साही लेखक और निर्देशक होता तो हीरो को बिलासपुर पहुंचा कर मिलन करवा देता. गाना बज उठता और हीरो-हीरोइन के मिलन समारोह में नृत्य भी हो जाता. लेकिन इसी पाइंट पर अपूर्व की दक्षता दिखाई देती है जो अपूर्व है.  

रिंकू के चले जाने के बाद बिल्लू एक बार फिर खाली पड़े बंगले में जाता है. तेज हवा के बीच एक पेज उड़ते हुए आता है जिसके अगले भाग में विषय संबंधी चित्र होता है. अब फ़िल्म का क्लाइमेक्स आता है जब पेज के पिछले हिस्से में बिल्लू सहित पान ठेले का स्केच बना होता है. ये स्केच ही फ़िल्म की आत्मा है. रिंकू कुछ नहीं कहती... लेकिन स्केच सब कुछ कह देता है. प्रेम पर यकीन करते हैं तो फिल्म को अवश्य देखिए.नफरत के इस खौफानाक दौर में आपको अच्छा लगेगा.

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बहस में चमन बहार

आंचलिकता के नाम पर ठूंस दिए जाने वाले सस्ते,फूहड़ नाच-गाने से भी बचा गया है,जिसके खतरे इसमें सबसे ज्यादा थे.सफलता के नाम पर इस नकलीपन,सतहीपन से ज्यादातर छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्देशक अभी-भी से उबर नहीं पाए हैं. इस अर्थ में यह उनसे अपनी बिल्कुल अलग, यथार्थवादी और विश्वसनीय पहचान बनाती है.भविष्य के  सिनेमा का यह एक  सशक्त नाम होने की उम्मीद दिलाता है--अगर बाजारवादी प्रपंचों से बच सकें.

कैलाश बनवासी

नेट फ्लिक्स पर रिलीज हुई इस फिल्म को लेकर बहसों का दौर चल पड़ा है. यह फिल्म जब देखी तो कल्पना भी नहीं की थी कि ऐसी औसत चंद फार्मूले से लैस फिल्म इतनी बहस तलब हो जाएगी. 'नेट फ्लिक्स' या 'अमेज़न प्राइम' जैसे मीडिया समूह आज सिनेमा या सीरिज के नए स्थापित हो चुके कॉर्पोरेट घराने हैं.जिन्हें फिल्म से उतना ही वास्ता है जितना सिनेमाघर के मालिक को मुनाफे से रहता है. इस फिल्म की एक मित्र से प्रसंशा सुनकर भी इसे देखने का मन  इसलिए नहीं हुआ क्योंकि इस माध्यम में हिट करने के लिए जैसी सेंसरहीन नग्नता,अश्लीलता, हिंसा, अपराध की अतिरंजना या अराजकता परोसी जा रही है,वह अपने ही देश की बहुत भयानक और अराजक छवि पेश करती है,जो ऐसी विकृतियों को बढ़ावा देती है,जिसके  प्रेरणास्रोत ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’या ‘बदलापुर’ जैसी घोर आपराधिक,हिंसा और सेक्स और विकृतियों को हाईलाइट करने वाली या बढ़ावा देने वाली हिट’ फ़िल्में रही हैं.

  बहरहाल, ‘चमन-बहार’

  इस फिल्म को देखने के बाद कुछ निराशाओं ने जन्म लिया. इसलिए कुछ ज्यादा कि यह छत्तीसगढ़ के कस्बाई पृष्ठभूमि पर कही गई कहानी है,लेकिन यह उस आंचलिक सौंधेपन  से  वंचित है जो यहाँ की संस्कृति की खासियत रही है.जिसमें प्रसिद्ध नाटककार हबीब तनवीर के ज्यादातर नाटक रचे-बसे-पगे हैं. फिल्म देखकर यह तो समझ आया,कि नए निर्देशक की बहुत सफल हो जाने वाली फिल्म बना लेने के बाद भी उसकी दृष्टि में कितनी ही कमियां हैं. मैं निर्देशक से “पथेर पांचाली’ या ‘पार’ या’ गमन’,’मंथन’ जैसी फिल्म की उम्मीद कतई नहीं कर रहा. यहाँ निर्देशक का लोरमी की जमीन से जुड़ाव उसके महज मुंगेली के नए जिले बन जाने की औचकताओं और रोचकताओं तक ही सीमित है. यदि इन जाने-पहचाने नामों की बात  छोड़ दी जाये तो यह किसी भी सामान्य कसबे की कहानी हो सकती है. यह निर्देशक की इस अंचल की खासियत को न समझ पाने की चूक है. कुछ किरदार बस हलके-फुल्के से आभास कराते हैं इसकी क्षेत्रीयता का.मैं यहाँ क्षेत्रीयता की वकालत नहीं कर रहा,बल्कि उस सादगी भरे‘छत्तीसगढ़ियापन’ की वकालत कर रहा हूँ जो यहाँ के लोगों के संस्कारों में, नैतिकताओं में यह  साँस लेता है, और जिसके सबसे बड़े साहित्यिक प्रतिनिधि कवि-उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल हैं .इसे इस फिल्म को आंचलिकता के नकार के रूप में भी व्याख्यायित की जा सकती है.

फिल्म में बिल्लू एक बहुत सामान्य युवा का किरदार है,जिसकी कोई बहुत महत्वाकांक्षा भी नहीं है. वह नए जिला बने लोरमी के एक मुख्य मार्ग पर अपना पान ठेला खोलता है. इसके पहले वह वन विभाग की नौकरी इसलिए छोड़ चुका है कि एक रात उसका सामना भालू से हो जाता है.वह बेमौत मरना नहीं चाहता.  उसका पान ठेला उस वीराने रास्ते पर है --नितांत अकेली दुकान. सामने पुराना जीर्ण-शीर्ण सा सरकारी क्वार्टर है.दुकान में ग्राहकों का टोटा है. पानठेला यों भी नई उम्र के शोहदों,लफुटों का अड्डा होता है. बिना इनके इनकी दुकानदारी नहीं चल सकती. यह सुयोग तब बनता है जब सामने के क्वार्टर में जल संसाधन विभाग के एक छोटे अधिकारी यहाँ रहने आते हैं.इस परिवार में पति-पत्नी के अलावा एक हाई स्कूल पढने वाली बेटी और प्रायमरी  क्लास पढनेवाला छोटा बेटा है. साथ एक पैमेरियन--’रूबी’.इस परिवार के आने के बाद कैसे यहाँ का माहौल बदलता है,शहर के लफंगों का अड्डा बन जाता है,यह फिल्म की दूसरी मुख्य कथावस्तु है. तो पहली क्या है? फिल्म की पहली मुख्य कथा-वस्तु है--एक साधारण से लड़के का उस अधिकारी की लड़की के प्रति पनपता प्रेम.जबकि ज्यादातर जो वहां लड़के हैं आवारा हैं,जो अपनी दबंगई या रुतबे से उसे ‘फंसाना’ चाहते हैं. फिल्म इन्हीं दो बिन्दुओं पर केन्द्रित है. कसबे के आवारा लडकों के संस्कार कैसे रहेंगे,यह कोई नयी चीज नहीं दिखा रहा है निर्देशक.वे आवारा सैकड़ों मसाला फिल्मों में देखे गए लफंगों से तनिक अलग नहीं है. अब बात यहाँ स्त्री-विमर्श या पितृसत्तात्म्क चरित्र को बढ़ावा देने की की जा रही है. तो मनोविज्ञान  के अनुसार यह आकर्षण कुछ इस वय का है,और कुछ समाज में हावी उन्हीं पतनशील पितृसत्तात्मक सोच का,जो लोगों के दिल-दिमाग में जमाने से बैठा हुआ है,जिसके खिलाफ संघर्ष आज भी जारी है. लेकिन कहानी में चित्रित कस्बा उतना ही आदिम और पिछड़ा है जितना देश में हमारे शिक्षा,स्वास्थ्य,सामाजिक-सुरक्षा के बुनियादी मुद्दे. फिल्म में मुझे यह लड़कों का चरित्र नहीं,बल्कि कस्बे का.उसकी आबो-हवा का चरित्र ज्यदा लगा है,जो बड़े नामालूम ढंग से उनके रूह में,खून में शामिल हो चुका है,और वे लड़की पर अपना कब्जा या एकाधिकार अपनी विजय के रूप में देखते हैं.

 इसे देखते हुए मुझे अपनी 90-91 में लिखी कहानी ‘डायरी खबर और सपने’ का रह-रहकर स्मरण आता रहा. इसलिए कि वह भी ऐसे ही कसबाई मुहल्ले में, ऐसे ही एक निम्नवर्गीय लड़के के एक मध्यवर्गीय घर की खूबसूरत लड़की से पनपते किशोर-प्रेम की कहानी है.यह मेरी बहुत प्रिय कहानियों में से एक है. जब इनके दृश्यों को देखा तो वह कहानी अपनेआप मेरे सामने आ गयी,जिसमें मोहल्ले के लडकों के ऐसे ही चरित्र को उकेरा गया है.   उस कहानी का यह पैराग्राफ देखिये--   

मैं देखता हूँ,तुम जब से इस मुहल्ले में आई हो,यह पिछड़ा और उपेक्षित मोहल्ला रौनकदार हो गया है.नए उम्र के छोकरों की तो छोड़ो,पकी उम्र वाले भी तुम पर नजर जमाये रहते हैं. तुम्हारे घर के सामने लेटेस्ट फ़ैशन का बाज़ार चलता है,जो रोज़-ब रोज़ बदलता है,जिसे तुमने ज़रूर देखा होगा.यहाँ का सब कुछ चमकदार और रंगीन है—जाँघिये से लेकर रुमाल तक!शाम होते ही इन लड़कों का यहाँ मजमा लगता है. उस नीली रोशनी वाले खम्भे के नीचे,जो तुम्हारे मकान से बस इतनी दूरी पर है कि वहाँ से तुम आकर्षक लगती रहो और इधर हम.सबके सब हँसते हैं,गाते हैं,लड़ते हैं. इसलिए कि हम आशिक हैं,और अभी अधीर,उन्मादी और हत्यारे प्रेमी में तब्दील नहीं हुए हैं.फिर भी लड़ाई तो है.हम सबको विश्वास है कि तुम केवल ‘उसी’ पर मरती हो.

 मैं भी उन्हीं में से एक हूँ.

 यह मनीष है,जो सबसे ज्यादा चक्कर लगता है तुम्हारे घर के,कोल्हू के बैल की तरह,और आज तक ऊबा नहीं है.उसने सबको बता रखा है कि तुम उसे रोज़ हंसकर ‘फ्लाइंग किस’ देती हो...

वह राजेन्द्र,जिसने संजय दत्त की हेयर स्टाइल रखी है,कहता है—वो तो रोज़ स्कूल जाते हुए मुझे ‘विश’करके जाती है... 

और मुकेश,जिसके जोड़ का मुहल्ले में कोई डांसर नहीं है,उस साले ने यहाँ तक बता दिया है कि उसने तुम्हें एक बार चूमा है...

 विपिन को यह हिसाब करना मुश्किल है कि उसके साथ ‘यामहा’ पर तुम कितनी बार होटल गयी हो और कितनी बार पिक्चर...

  दरअसल यहाँ इस जमावड़े के बहाने निर्देशक नायक और बाकी लडकों के द्वंद्व को दर्शाया है.जहां बिल्लू उस पर प्रेम की चाह से खींच रहा है,तो बाकी अपने मर्द या लड़के होने के गौरव बोध से. यह जर्रोर है अपनी असफलता से वह उस अपराध को अंजाम दे देता है,जो उसके चरित्र में नहीं है—दीवालों में नोट में ‘रिंकू नानेरिया बेवफा है’ लिखकर.’यह अपराध उसने कुंठित होकर किया है.यह सच है,इस फिल्म में बिल्लू और कुछ लफंगों—शीला,आशु या पुलिस इंस्पेक्टर जैसों को छोड़ किसी चरित्र को निर्देशकीय पकड़ नहीं दी गयी है.सबमें एक ढीला-ढालापन है. कहानी की गति बहुत धीमी है. कितना ज्यादा समय सड़कों पर लड़की को स्कूटी चलाते,या कुत्ता घुमाते दिखाया गया है. नायिका या लड़की को हद से ज्यादा चुप रखा गया है,जो आजकल की बिंदास लड़की से कतई मेल नहीं खाता. इन बरसों में लडकियाँ बहुत सशक्त हुई हैं—हर क्षेत्र में. ज्यादतर इलाकों में उनका यह कस्बाई अबोधपन गायब हो चुका है. इसीलिए इसी बिंदु पर फिल्म की सबसे ज्यादा आलोचना हो रही है. रही बात प्रेम के धीरे-धीरे पनपने की,तो उसका भी यहाँ अवसर नहीं है. उस परिवार के चले जाने के बाद संयोग से लड़के के हाथ लगे एक गुलाबी कागज़ में बना ठेलेवाले बिल्लू का स्केच ही रिंकू की तरफ से इसका  नामालूम-सा संकेत है,जो उस लड़के के लिए सबसे बड़ी आश्वस्ति और सबसे बड़ी पूंजी है. यहाँ युवा निर्देशक ने प्रेम की इस जरा-सी स्वीकृति को जिस कोमलता और खूबसूरती से एक छोटे से क्षण में दर्शाया है,उससे मुझे प्रसिद्ध ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की फिल्म ‘बरान’ ( बारिश) की याद दिला गयी. संयोग देखिये,कि उस पूरी फिल्म में भी किशोर नायिका का एक भी संवाद नहीं है.और बिलकुल इसी तरह सबसे आखिर में विदाई के क्षणों में वह किशोर नायक को अपने प्रेम की धुंधली-सी मौन स्वीकृति देती है—कोई मिनट भर अपनी प्रेममयी आँखों से उसे देखते हुए. प्रेम की ऐसी नामालूम अभिव्यक्ति या स्वीकारोक्ति उस जैसे नामहीन साधारण लड़के के लिए जैसा मूल्यवान है ,वह तो प्रेम में डूबे ऐसे लोग ही जान पायेंगे. जिसे मीरा भी जीवन भर कहती रही है—ए री मैं तो प्रेम दीवानी,मेरो दरद न जाने कोय...

इस बहुत सहज फिल्म में अपूर्वधर बड़गैया की निर्देशकीय प्रतिभा के कुछ दृश्य अविस्मर्णीय हैं. बुलेट भड़भड़ाते पुलिस इंस्पेक्टर भगवान तिवारी घोर विश्वसनीय पुलिसवाले लगे हैं. एक दृश्य को भुला पाना मुश्किल है जो उनके बहुत संभावनाशील निर्देशकीय क्षमता का पता देती है. उसके ठेले को तहस-नहस कर दिए जाने के बाद बिल्लू का अपने ठेले पर वापस आकर उसकी दुर्गति  देखने का दृश्य. उस तबाह ,टूटे-फूटे ठेले और लावारिस पड़े बिखरे सामानों के दृश्य से एक बार फिर सत्ता के निरंकुश चरित्र को बिना कुछ कहे उजागर कर देता है.या कस्बे के हाट-बाजारों,सडकों या तालाबों के पार में टाइटल दिखाना भी बिलकुल अभिनव प्रयोग है. छत्तीसगढ़ के पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म का संगीत यहाँ के मिजाज से बिलकुल मेल नहीं खाता.यह किसी पॉप-कल्चर फिल्म के गीत-संगीत सा लगता है,जो सुनने में भी चुभता है.जबकि इस क्षेत्र में बहुत बढ़िया संभावनाएं थीं.  

अभी प्रचलित फिल्मों  के साथ इस फिल्म को देखने पर यह बिलकुल अलग जोनर की फिल्म बनायी गयी है. यहाँ बात-बात में हत्या,नग्नता,बलात्कार,हिंसा,मानसिक विकृति इत्यादि वेब-सिरिजी फार्मूले से हटकर निर्देशक ने साधारण लोगों के जीवन की साधारण सी कहानी पर एक साफ़-सुथरी फिल्म बनाने की कोशिश की है,जिसके इस पक्ष की प्रसंशा होनी चाहिए.भले ही इसमें आंचलिकता की,लोकेल की वह गंध नदारद है,जिसकी चर्चा ऊपर कर चुका हूँ,लेकिन यह उस  आंचलिकता के नाम पर ठूंस दिए जाने वाले सस्ते,फूहड़ नाच-गाने से भी बचा गया है,जिसके खतरे इसमें सबसे ज्यादा थे.सफलता के नाम पर इस नकलीपन,सतहीपन से ज्यादातर छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्देशक अभी-भी से उबर नहीं पाए हैं. इस अर्थ में यह उनसे अपनी बिल्कुल अलग, यथार्थवादी और विश्वसनीय पहचान बनाती है.भविष्य के  सिनेमा का यह एक  सशक्त नाम होने की उम्मीद दिलाता है--अगर बाजारवादी प्रपंचों से बच सकें।

 

41, मुखर्जी नगर,सिकोला भाठा,दुर्ग

मोबाइल नंबर- 9827993920    

 

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छत्तीसगढ़ के इस लड़के की फिल्म चमन-बहार ने मचाई धूम

शर्म से डूब मरना चाहिए छत्तीसगढ़ के नकलचोर फिल्मकारों को

 

राजकुमार सोनी

छत्तीसगढ़ में कैसी फिल्में बनती है यह बात किसी से छिपी नहीं है. यदि मुंबई का बड़ा पाव, यूपी-बिहार का लिट्टी-चोखा और मद्रास का इडली-दोसा न हो तो शायद यहां के फिल्मकारों की दुकान पूरी तरह से बंद हो जाय. हर इलाके के हिट मसालों को टिपटॉप कर परोस देना ही यहां के फिल्मकारों का शायद श्रेष्ठ सृजन हैं ? यही एक वजह है कि देश-दुनिया में अन्य भाषाओं की क्षेत्रीय फिल्मों को जो सम्मान मिलता है वैसा सम्मान अब तक छत्तीसगढ़ी फिल्मों को नहीं मिल पाया है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि किसी एक दिन छत्तीसगढ़ी फिल्मों और उससे जुड़े लोगों को भी सम्मान मिलेगा. लेकिन यह तब मुमकिन हो पाएगा जब आईलवयू वन-टू-थ्री, टूरा नंबर वन-टू-थ्री, रिक्शावाला वन-टू-थ्री और जितेंद्र- मिथुन-गोविंदा ब्रांड फिल्मों पर ब्रेक लगेगा.

बहरहाल आज मैं एक ऐसी फिल्म के बारे में बात करने जा रहा हूं जिसका निर्माण छत्तीसगढ़ में जन्मे एक होनहार फिल्मकार ने किया है. इस युवा फिल्मकार का नाम है अपूर्वधर बड़गैया. अपूर्व ने सारे-गा-मा के सहयोग से एक बेहतरीन फिल्म चमन-बहार बनाई है. नेट-फिलिक्स में रीलिज हुई इस फिल्म को देश-दुनिया से तारीफ ही तारीफ मिल रही है.

छत्तीसगढ़ में मैंने बहुत से अफसर और उनके पुत्रों को सरकारी सेवा में, जमीन की दलाली अथवा ठेकेदारी के गोरखधंधे में देखा है. अपूर्व प्रदेश के वरिष्ठ वन अफसर एसडी बड़गैया के पुत्र है.अपूर्व भी चाहते तो इस तरह के किसी धंधे-पानी में हाथ आजमा सकते थे, लेकिन पिता ने उन्हें अपना रास्ता चुनने की स्वतंत्रता दी. अपूर्व ने उस रास्ते का चयन किया जहां लोगों का दुख-दर्द, उनकी छोटी-छोटी खुशी और उनके सपनों का संसार शामिल है. कला की दुनिया का चुनाव आसान नहीं होता. यह वह दुनिया है जहां आदमी का सपना पल-पल टूटता और बिखरता है. यह दुनिया प्रतिभा और मौलिकता के साथ-साथ जबरदस्त धैर्य की मांग करती है. अगर आपके भीतर धैर्य और मौलिकता का अभाव है तो फिर आपको यश चोपड़ा का बेटा उदय चोपड़ा बनने में टाइम नहीं लगेगा.

बताते हैं कि अपूर्व ने पूरे धैर्य के साथ लगभग सात साल तक फिल्म चमन-बहार के कान्सेप्ट पर काम किया. यदि वे यह धैर्य नहीं रखते तो निश्चित रुप से चमन-बहार जैसी उम्दा फिल्म हमारे सामने नहीं होती. वैसे तो अपूर्व ने देश के प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक प्रकाश झॉ और रोहित जुगरात के साथ बतौर सहायक निर्देशक कुछ फिल्मों में भी काम किया है, लेकिन उनकी फिल्म में इन निर्माता-निर्देशकों के बजाय संई पराजंपे, ऋषिकेष मुखर्जी और बासु भट्टाचार्य जैसे महान फिल्मकारों का प्रभाव दिखाई देता है.

बहुत छोटी सी जगह, छोटी सी कहानी को संवेदना में गूंथकर देखने लायक बना देना एक बड़ा काम है. अपूर्व ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति को दिखाने के लिए किसी भी तरह का ढोंग नहीं किया. उनकी फिल्म का संगीत और फिल्म का एक-एक दृश्य छत्तीसगढ़ की पहचान बनकर उभरता है. फिल्म में टाइटल को दर्शाने के लिए तालाब की दीवार, बाजार की छत, किलोमीटर दर्शाने वाला बोर्ड, सड़क का जबरदस्त इस्तेमाल किया गया है. वैसे तो फिल्म की शूटिंग नया रायपुर, आरंग और मांढर जैसे इलाके में हुई है, लेकिन पूरी कहानी में एक छोटा सा कस्बा लोरमी है. इसी लोरमी में एक लड़का है जो वन विभाग में काम करता है. अपनी अलग पहचान बनाने के लिए वह पान ठेला चमन-बहार  खोल लेता है. पहले तो उसका पान ठेला ठीक नहीं चलता, लेकिन जैसे ही एक लड़की पान ठेले से थोड़ी दूर पर बने एक घर में रहने आती है वैसे ही धंधा चमक उठता है. लड़कों का जमावड़ा होने लगता है. पान ठेले के बाजू में ही टिन-टप्पर लगाकर एक शेड तैयार कर लिया जाता है जहां दिन-भर कैरम चलता है और रात को बीयर पार्टी. हर कस्बे में रुतबा- सुतबा दिखाने वाले जवान छोकरे मौजूद रहते हैं. इस फिल्म में रुतबा दिखाने वाले लड़कों की आपसी झड़प के कई शानदार दृश्य है. लड़कों के बीच इधर की उधर लगाने वाले दो किरदार भुवन अरोरा और धीरेंद्र तिवारी की मौजूदगी फिल्म में आनंद देती है. फिल्म के सभी युवा पात्र कुत्ता घुमाने वाली एक लड़की के पीछे लगे हैं. इस दौड़ में शीला भैय्या ( आलम खान ) और अश्विनी कुमार भी शामिल है. लड़की की मां की भूमिका में अनुराधा दुबे और पिता की भूमिका में अनिल शर्मा का काम बेहद शानदार है,लेकिन फिल्म में सबसे जानदार भूमिका निभाई है पान ठेला खोलने वाले जितेंद्र कुमार ने. पूरी फिल्म जितेंद्र के आसपास की घूमती है. उनके चेहरे पर बेबसी, लाचारी के साथ-साथ प्रेम और बेचैनी का अदभुत भाव बांधे रखता है. एक कस्बे में रहने वाले युवक भी अमीर और खूबसूरत लड़कियों से प्रेम करना चाहते हैं. गरीब परिस्थितियों के बावजूद ऐन-केन-प्रकारेण उनकी कवायद जारी रहती है. पूरी फिल्म इसी कवायद के आसपास चक्कर तो काटती है, लेकिन महीन और बारीक किस्म के कस्बाई मनोविज्ञान के साथ. एक रोज पान ठेला चलाने वाला जीतू लड़की को ग्रिटिंग कार्ड देने की कोशिश करता है. जब कई दिनों तक कार्ड नहीं दे पाता तो कार्ड को दरवाजे पर फेंककर चला आता है. कार्ड लड़की के पिता के हाथ लग जाता है और फिर पान-ठेले के आसपास रहने वाले सभी लड़कों की पुलिस जमकर धुनाई करती है. पुलिस अफसर बने भगवान तिवारी लड़के का पान-ठेला तोड़ देते हैं तो रुतबा दिखाने वाले युवक थाने का घेराव कर देते हैं. पान ठेले वाले को थाने से छुड़ाने आता है लड़की का पिता. पान ठेले वाले युवक को चिरकुट नेता बनाने की आजमाइश चलती है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता.

पूरी फिल्म की कहानी को यहां बता देने से कोई मतलब इसलिए भी नहीं है क्योंकि यह फिल्म अपने फिल्मांकन, गीत-संगीत और कलाकारों के अभिनय से नए सिनेमा का नया व्याकरण और मुहावरा गढ़ती है.

इस फिल्म का मुख्य पात्र जीतू जब लड़की के मां-बाप से माफी मांगकर वापस लौटता है तो एक बड़े चरित्र में बदल जाता है. यह फिल्म बताती है कि कस्बे में रहने वाले युवाओं के भी सपने है. यह सही है कि वे थोड़े छिछोरे हैं. शराब को लस्सी समझकर चुस्की लेने वालों और समाज की मुख्यधारा में जीने वालों के लिए ऐसे लड़के असभ्य हैं.कीड़े- मकोड़े हैं, लेकिन उनके भीतर भी एक मासूम दिल धड़कता है. चमन-बहार एक छोटे से कस्बे की छोटी सी कहानी है,लेकिन यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हम सबके भीतर एक कस्बा बसता है. देश-दुनिया के लोग इस फिल्म को इसलिए पसन्द कर रहे हैं क्योंकि लोग अपने आसपास के नकलीपन से उब चुके हैं. छत्तीसगढ़ के मठाधीश फिल्मकारों को भी यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि अब खेत में हीरो-हिरोइन से ब्रेक डांस और पीटी करवाने का जमाना चला गया है. पिछले कुछ सालों में एक ऐसा दर्शक वर्ग तैयार हुआ है जो नए शिल्प और नई भाषा में बात करने के तौर-तरीके को पसन्द करता है. ऐसे सभी दर्शक इस फिल्म को खोज-खोजकर देख ही रहे हैं.शर्म से डूबकर मरने से पहले छत्तीसगढ़ के तोपचंद फिल्मकारों को भी यह फिल्म एक बार अवश्य देख लेनी चाहिए.

 

 

 

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गुजर गया सत्यजीत रे की फिल्म में काम करने वाला छत्तीसगढ़ का बलराज साहनी

राजकुमार सोनी

जी... हां... भाइयों और बहनों...लीजिए पेश है आपके सामने भैयालाल हेड़ाऊ.

 मैं बात कर रहा हूं उस भैयालाल की जिन्होंने अपने गाने की प्रैक्टिस बिस्कुट के खाली पीपे और पानी के घड़े में घंटों मुंह डालकर की थीं. भैयालाल बेहद अच्छा गाते थे. वे काफी समय तक शारदा संगीत समिति, मिलन संगीत समिति और राजभारती आर्केस्ट्रा से जुड़े रहे. आर्केस्ट्रा का अमीन सयानी बना उद्घोषक जैसे ही उनके नाम की घोषणा करता था, दर्शक दीर्घा से तेज आवाजें, सीटियां और तालियों का शोर गूंजने लगता था. यह ताली ठीक वैसी ही होती थी जैसे स्काउट एंड गाइड में भाग लेने वाले बच्चे एक-दो-एक-दो यानी लयबद्ध तरीके से बजाते हैं.

भैयालाल जैसे ही गाना शुरू करते- याद किया दिल ने कहां हो तुम... प्यार से पुकार लो जहां हो तुम... एक सन्नाटा छा जाता था. गाने के खत्म होते ही भैयालाल... भैयालाल का शोर सुनाई देने लगता था. लोगों की आत्मा तब तक तृप्त नहीं होती थीं जब तक वे भैयालाल से अपनी पसंद का गाना नहीं सुन लेते थे. युवा दर्शकों की फरमाइश पर भैयालाल रंग बरसे भींगे चुनर वाली की शुरूआत करते तो भूचाल आ जाता था. आर्केस्ट्रा सुनने के लिए आए दर्शकों में से लंबी हाइट के कई अभिताभ बच्चन तुरन्त सामने आ जाते थे. बेलबॉटम पहना हुआ कोई अभिताभ... सोने की ताली में जेवना परोसा... जेवना परोसा कहता हुआ मंच की ओर चढ़ने लगता तो पीछे सैकड़ों अभिताभ... जेवना परोसा... हां जी... जेवना परोसा के कोरस में शामिल हो जाते थे. एक अभिताभ मंच के पास जाकर बाल झटकता तो दूसरा अभिताभ लड़कियों के पास जाकर चिल्लाता- होली है...।  कोई अभद्रता इसलिए भी नहीं होती थीं क्योंकि गीत की दूसरी पंक्ति को ध्यान से सुनने का वक्त आ जाता था

एसएमएस वाले इंडियन आइडिल और माइंड ब्लोइंग के जरिए दिमाग को दही बना देने वाली गदहपचीसी से हर रोज गुजरने वाले दर्शकों को लग सकता है कि एक आर्केस्ट्रा में गाने वाले शख्स में ऐसी क्या बात थीं जो उन्हें अलग करती थीं. आपको बताना चाहूंगा कि उनके पास रजा मुराद, अभिताभ बच्चन और हेमंत कुमार जैसी आवाज थीं. इसके अलावा वे इसलिए भी जुदा थे क्योंकि उन्हें अपनी मिट्टी से प्यार था. उनमें जितनी प्रतिभा थीं उसके मुकाबले चवन्नी छाप टैलेंट लेकर धन्ना सेठों की औलादें मुंबई और छत्तीसगढ़ की फिल्म इंडस्ट्री में कब्जा जमाए बैठी है. नवधनाढ्यों के कला प्रेम के चलते आज हालात यह है कि जिसकी जो समझ में आ रहा है वह परोस रहा है.

जैसे केआसिफ साहब की फिल्म मुगले-आजम को देखने के लिए लोग पंचायतों में योजना बनाते थे. आटा-दाल बांधकर घर से निकल पड़ते थे, ठीक वहीं स्थिति चंदैनी-गौंदा नाम के एक नाटक के प्रदर्शन के दौरान होती थीं. इस नाटक एक मुख्य पात्र भी थे- भैयालाल हेड़ाऊ.

राजनांदगांव के गोलबाजार इलाके में 8 अक्टूबर 1933 को जन्मे भैयालाल को चंदैनी गौंदा में काम करने का अवसर तब ही मिल गया था जब इसकी शुरूआत होने जा रही थीं. वर्ष 1971 में शुरू हुआ यह नाटक वर्ष 1991 के आसपास विसर्जित हुआ. इन वर्षों में इस नाटक के कई हजार शो हुए. एक समय ऐसा भी था जब गांव की चौपाल पर बिसाहू और समारू के बीच इस बात को लेकर झगड़ा हो जाया करता था कि उसने चंदैनी-गौंदा को कितनी बार देखा है. इस नाटक में लंबे समय तक काम करने वाले विजय वर्तमान जो हिंदी के अच्छे कहानीकार भी हैं, कहते हैं-  हर पात्र नाटक की जान था, लेकिन भैयालाल नाटक के दिल थे. नाटक की शुरूआत भी उनसे होती थीं और नाटक का अंत भी उनसे होता था.

वर्ष 1980 की बात है. जब प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक सत्यजीत रे को मुंशी प्रेमचंद की कहानी सद्गगति पर फिल्म बनाने का आइडिया आया तो उन्होंने छत्तीसगढ़ का रुख किया. यहां आकर उन्होंने ढ़ेर सारे स्थानीय कलाकारों के बीच से भैयालाल हेड़ाऊ का चयन किया. ओमपुरी, स्मिता पाटिल और मोहन अगाशे के अभिनय से सजी इस फिल्म में भैयालाल ने एक आदिवासी की भूमिका निभाई थीं. उनके अभिनय को देखकर समानांतर सिनेमा में धूम मचाने वाले कलाकार हक्का-बक्का थे. तब उस फिल्म में काम करने वाले कई कलाकारों ने उनसे कहा था- कहां सड़ रहे हो भैयालाल जी... लेकिन... भैयालाल छत्तीसगढ़ छोड़कर नहीं गए. हिंदी सिनेमा के जानकारों का मानना है कि अगर भैयालाल मुंबई चले गए होते तो शायद काफी हद तक बलराज साहनी की कमी पूरी जाती.

छत्तीसगढ़ के इस बलराज साहनी ने अपने प्रदेश को इसलिए भी नहीं छोड़ा क्योंकि उसे यहां की मिट्टी से प्यार था. इसके अलावा गरीबी भी एक बड़ा कारण थीं. भैयालाल का बचपन बेहद गरीबी में बीता. उनकी मां उमादेवी अक्सर बीमार रहती थीं. मां की बीमारी के चलते उनके पिता की कमाई का एक बड़ा हिस्सा इलाज में ही खर्च हो जाता था. उनका दो मंजिला मकान पहले गिरवी रखा गया और फिर बाद में बिक गया. परिवार का भरण-पोषण करने के लिए भैयालाल को हाट-बाजारों में आलू-प्याज तक बेचना पड़ा. एक मित्र हरिप्रसाद ठाकुर के प्रयास से जब उन्हें शिक्षक की नौकरी मिली तब जाकर दो वक्त का भोजन नसीब हुआ. अन्यथा हालात यह थे कि कभी उन्हें सूखे चने से गुजारा करना पड़ता था कभी सीलन और बदबूदार जमीन पर पानी पीकर ही सोना पड़ता था. भैयालाल के सात बच्चों में से दो का देहांत हो चुका है. अपनी किताब बदनाम गली के लिए जब उन पर केंद्रित एक लेख के सिलसिले में मैंने जब उनसे मुलाकात की थी तब उन्होंने बताया था कि एक लड़का वेल्डिंग का काम जानता है और खाली बैठा है जबकि दूसरा लड़का टेडेसरा की एक प्राइवेट फैक्ट्री में कार्यरत है. यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका गाना- आमार सोनार बंगला देश आकाशवाणी रायपुर से पहली बार तब बजा था जब बंगलादेश आजाद हुआ था.

यहां छत्तीसगढ़ में निर्मित होने वाली फिल्मों में भैयालाल को वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि यहां एक-दो फिल्मों के चल निकलने के बाद ही निर्माता-निर्देशकों और कलाकारों का पारा सातवें आसमान पर आ गया. अधिकांश कलाकार सुपर स्टार हो गए तो निर्माता-निर्देशकों के बीच सुभाष घई और डेविड धवन की आत्मा घुस गई. अब भी कई कलाकार खुद ही अपने नाम के आगे-पीछे सुपर स्टार, लीजेंड स्टार, सुपर विलेन, सुपर शशिकला, सुपर ललिता पवार... अरूणा ईरानी, शो-मैन... राजकपूर, मनमोहन देसाई जैसे तमगे लगाकर घूम रहे हैं. मुंबईयां फिल्मों की एंड-बैंड-मोटर स्टैंड कर देने वाली कहानी को टिपटॉप कर दो कौड़ी की फिल्में बनाना प्रमुख शगल हो गया है.

छत्तीसगढ़ी फिल्मों में ज्यादा काम क्यों नहीं किया पूछने पर भैयालाल ने बताया था- किसी भी निर्माता- निर्देशक ने कभी कोई अच्छा रोल नहीं लिखा. अपनी मुफलिसी के चलते कुछ फिल्मों में काम भी किया तो वह मेहनताना नहीं मिला जो मिलना चाहिए था. उनकी एक आखिरी फिल्म मंदराजी थीं जिसमें उनकी भूमिका छोटी लेकिन दमदार थीं.

भैयालाल से एक रोज उनके पिता ने पूछा था- बताओ युद्ध के दृश्यों से सजी फिल्म सिकन्दर देखोगे या सूरदास. भैयालाल ने तुरन्त कहा- सूरदास देखूंगा क्योंकि मोहल्ले में भी एक सूरदास आता है जो अच्छा गाता है. भैयालाल जी अब इस दुनिया में नहीं है. बताते हैं कि अपने आखिरी दिनों में भी वे याद किया दिल ने कहां हो तुम... प्यार से पुकार लो जहां हो तुम... गुनगुना रहे थे. यहीं गुनगुनाते-गुनगुनाते हुए वे गुजर गए. उनका जाना अखर गया क्योंकि मैंने अपने बचपन में उन्हें बड़ी शालीनता से कठिन से कठिन गाने को धैर्य के साथ गाते हुए देखा और सुना था. उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धाजंलि.

( उन पर लिखा गया यह आर्टिकल बदनाम गली पुस्तक में भी है. यहां थोड़े संशोधन के साथ. )

 

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अब लव के पीछे लट्ठ लेकर पड़ गए हैं छत्तीसगढ़ के फिल्मकार

राजकुमार सोनी

अमीर परिवार से ताल्लुक रखने वाली हीरोइन, गरीब परिवार का हीरो, हीरोइन का तालाब में गिरना, हीरो का उसे बचाना, प्यार का इकरार, फिर दो प्यार करने वालों के बीच छिछोरे किस्म के खलनायक की इंट्री... बेमतलब की बारिश में लपड़-झपड़ और ढिशुंम- ढिशुंम...

हिंदी फिल्मों के ये सारे फार्मूले भले ही मुंबई में बासी पड़ गए हों, लेकिन छत्तीसगढ़ी सिनेमा में अब भी इनकी धूम बरकरार है. छत्तीसगढ़ में हर दूसरे पखवाड़े जेमिनी और एवीएम प्रोडक्शन की मद्रासी तासीर वाली फिल्मों का प्रदर्शन होता है. खेती-खार, आटो-ट्रैक्टर बेचकर और ज्यादा हुआ तो एक-दूसरे को टोपी पहनाकर फिल्म का निर्माण करने वाले फिल्मकार चोरी-चकारी से निर्मित फिल्म को ही अपने जीवन की उपलब्धि मान बैठे हैं और अपनी दुनिया में खुश है. सच तो यह है कि छत्तीसगढ़ का एक भी सुधि दर्शक चोरी-चकारी करने वाले फिल्मकार को गंभीरता से नहीं लेता है. सुधि दर्शक अगर कभी गलती से फिल्म देखने चला गया तो खुद पर हंसता है. खुद को गालियां देता है कि कहां फंस गया. कोसता है. अपने माथे को लहू-लुहान करने के लिए दीवार की तलाश करता है, लेकिन इससे आत्ममुग्ध निर्माता-निर्देशकों को फर्क नहीं पड़ता... उनका अपना संसार है. वे गदगद रहते हैं और निर्बाध गति से मरियल- सड़ियल सी कहानी में सेंध मारने के काम में लगे रहते हैं. अगर गलती से किसी ने उन्हें टोका तो वे लामबंद हो जाते हैं और नारे लगाते हैं-ज्यादा आलोचना करने की खुजली लगी है तो फिल्म बनाकर दिखाओ....?

राज्य निर्माण के बाद यहां लगभग साढ़े तीन-सौ के आसपास फिल्में रिलीज हो चुकी हैं, लेकिन सात-आठ फिल्मों को छोड़कर ज्यादातर फिल्में अपनी लागत तक वसूल नहीं पाई है. किसी निर्माता से पूछो कि भइया... ऐसा क्यों हो रहा है तो वह तुरन्त रटा-रटाया उत्तर देगा- देखिए... छत्तीसगढ़ में सिंगल थियेटर की कमी है. छबिगृह बंद हो रहे हैं. सरकार सब्सिडी नहीं देती, लेकिन कभी नहीं कहेगा कि भाई साहब... हम लोग मौलिक कहानी पर काम नहीं करते.घटिया फिल्में बनाते हैं... हद दर्जें केअलाल है और मेहनत से जी चुराते हैं.

वर्ष 2000 में जब राज्य का निर्माण हो रहा था तब मोर छंइया-भुइंया जैसी एक फिल्म आई थी. एक गांव की पारिवारिक कहानी पर बनी यह फिल्म इसलिए चल निकली क्योंकि जिस दौरान राज्य बना उस समय हर तरफ खुशी का माहौल था. प्रदेश के हर दूसरे व्यक्ति को यह लग रहा था कि अब उसे एक नई पहचान मिलने जा रही है. फिल्म में स्थानीयता की जबरदस्त रंगत और उमंग के वातावरण की वजह से लोग-बाग थियेटर तक खिंचे चले आए. इस फिल्म की सफलता के बाद पंद्रह से बीस लाख लगाकर करोड़ों रुपए कमाने का नुस्खा लोगों को इतना अधिक भा गया कि हर गली-कूचे में आड़े-तेड़े निर्माता-निर्देशकों की फौज दिखाई देने लगी. जिसे देखो वहीं फिल्म बनाने के काम-धंधे में लग गया था.हर निर्माता और निर्देशक अपनी फिल्म के नाम के आगे-पीछे मोर ( मेरा ) शब्द का इस्तेमाल करने लगा- मोर संग मितवा, मोर धरती मैया, मोर संग चलव, मोर गांव- मोर धरम, माटी मोर महतारी, मोर सपना के राजा, मोर गंवई, ए मोर बांटा, अब मोर पारी हे, मोर सैंया, सुंदर मोर छत्तीसगढ़, मोर जोड़ीदार.... ( और भी न जाने कितने मोर ??? )

जब लोग मोर से बोर गए तो प्रेम चंद्राकर फिल्मों में मया ( प्रेम ) की बहार लेकर आए. उनकी फिल्म मया देदे- मया लेले औसत कहानी के बावजूद हिट रही. उसके बाद  परदेसी के मया, मया देदे मयारु, मया ने भी ठीक-ठाक व्यवसाय किया. बस फिर क्या था... मया ब्रांड की फिल्मों की कतार लग गई. मया होगे रे, तोर मया के मारे, मया के बरखा, मया म फूल मया मा कांटे, तोर मया मा जादू हे... और भी न जाने कितनी मया... मगर बाद में किसी भी मया ने टिकट खिड़की पर पानी नहीं मांगा.

अब लव की बारी

वैसे तो छत्तीसगढ़ की हर फिल्मों में एक प्रेम कहानी चलती है, लेकिन पिछले कुछ समय से मया-फया का स्थान अंग्रेजी शब्द लव ने ले लिया है. कुछ समय पहले निर्माता मोहन सुंदरानी ने आईलवयू नाम की फिल्म बनाई थी. इस फिल्म ने टिकट खिड़की पर धमाल मचाया तो उन्होंने आईलवयू टू बना डाली.  बताते हैं कि उनकी दूसरी फिल्म ने पहले जैसा व्यवसाय नहीं किया, बावजूद इसके लागत निकल गई. उनकी इस सफलता के बाद लव ब्रांड फिल्मों का ट्रेंड चल निकला है. अभी छबिगृह में मुंबई के पाव बड़ा और मद्रास के मसाला दोसा का अजीबो-गरीब स्वाद देने वाली फिल्म लव दीवाना चल रही है. इस फिल्म के बाद यह भी प्रचारित हो रहा है कि छत्तीसगढ़ को उनका अपना सलमान खान मिल गया है. ( हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ अपना नायक कुमार गौरव या सलमान खान में नहीं बल्कि गांव के मजदूर और किसान में ही तलाश करता रहा है.)

बहरहाल किसान-मजदूर की समस्याओं से दूर शहर के चौराहें लव-लव से पटे हुए हैं. आने वाले दिनों में भी शायद ऐसा ही हो क्योंकि आ रही है फिल्म- सारी लव यू जान, लव लेटर, लव मैरिज, मोला लव होगें, तोर-मोर लव स्टोरी....... ( और भी न जाने कितने प्रकार के लव )

इतना ज्यादा लव हो गया है कि ट्रैफिक जाम हो गया है.

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दर्शकों के दिल पर निशाना लगा गई सांड की आंख

चंद्रशेखर देवांगन शेखर

दो महिलाएं.... उम्र 60 साल... हाथ में पहली बार पिस्टल... सामने निशानेबाजी का गोल गत्ता.......धांय.......सर्किल के बीचों-बीच..... परफेक्ट निशाना....। आवाज आई-दादी जरा एक बार फिर से’’... ’’तो लो फिर’’...धांय....धांय....धांय।  ’’दादी तूने दे मारा बुल्स आई’’... बुलसाई... ना.. रे... ’’सांड की आंख’’।

    हरियाणा के अति पारंपरिक सामाजिक संरचना वाले छोटे से गांव की विश्व की सबसे बुजुर्ग शार्प शूटर  महिलाओं चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर के निशानेबाजी की विजय गाथा पर हालिया रिलीज़ फिल्म ’’सांड की आंख’’ बायोपिक श्रेणी में एक अलग तरह की फिल्म है।

गांव में निशानेबाजी का एक ट्रेनिंग सेंटर खुलता है। बेटियों को निशानेबाजी की स्पर्धा जीतने पर सरकारी नौकरी मिल सकती ऐसा पता चलने पर अपने बेटियों को निशानेबाजी सीखाने उनका हौसला हफजाई करने चंद्रो और प्रकाशी हाथ में पिस्टल लेते हैं.... जिंदगी में पहली बार...और निशाना सीधे बुल्स आई में....। ट्रेनर ने कोयले में छुपे हीरों को पहचान लिया। अब शुरू होती है असली जंग–ए  आज़ादी। सख्त पाबंदियों के बीच छुपते–छुपाते साठ साल के  चंद्रो और प्रकाशी कैसे निशानेबाजी की बारीकियां सीखते हैं और परिवारिक दंगल के बीच रोज पटखनी खाते चंद्रो और प्रकाशी बुढ़ापे में अपने निशानेबाजी से  कैसे पूरे देश और दुनिया भर में तीस-तीस मेडल अपने नाम कर लेते हैं। 

दिल्ली में एक शूटिंग स्पर्धा में अनपढ़ प्रकाशी तोमर ने पुलिस के डीआईजी को हराया तो डीआईजी साहब ने यह बोलकर प्रकाशी के साथ फोटो खिंचवाने से इंकार कर दिया कि ’’आज उसे एक औरत ने उन्हें अपमानित कर दिया’’। भारत में स्त्री होना तो किसी गुनाह से कम नहीं है. स्वामी विवेकानन्द जब शिकागो से भारत लौटे तो उन्होंने कहा कि पाश्चात्य मुल्कों में औरतों को पुरुषों के पैर की जूती नहीं समझा जाता। भारत में पुरुषों द्वारा अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पाने का बड़ा कारण भी यही रहा कि उन्होंने अपनी क्षमता का आधा हिस्सा तो स्त्रियों को दबाने में लगा दिया। वर्ना हमारा देश आज चंद्रयान क्या, सूर्ययान भेज रहा होता।

           लेखक जगदीप सिद्धू ने बेहतरीन पटकथा लिखी तो तुषार हीरानंदानी का निर्देशन भी कमाल का रहा... हां फिल्म का कलापक्ष थोड़ा कमजोर है। संगीत प्रभावशाली नहीं बन पाया। किसी भी फिल्म का दर्शकों पर  सबसे पहला प्रभाव नाम से पड़ता है, और ’’सांड की आंख" इस मामले में बचकाना प्रभाव डालती है। अन्यथा फिल्म बाक्स आफिस पर थोड़ा और ज्यादा धमाल मचाती. प्रकाश झा अच्छे शोमैन हैं परन्तु अभिनय में कमजोर। तापसी पन्नू और भूमि पेडणेकर इस अति व्यावसायिक दौर में सार्थक कलाकार हैं। तापसी पन्नू तो नए दौर की स्मिता पाटिल है। ओवरआल ’’सांड की आंख" बड़ी ही प्रेरक फिल्म हैं। एक बार अवश्य देखी जानी चाहिए। फिल्म ’’सांड की आंख" कहती हैं, कि ’’जिनकी आंखो में हरदम जुगनू टिमटिमाते हैं, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि दिन का उजाला है या रात का घना अंधेरा’’।

 

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रंगोबती को देखते हुए कुमार गौरव और उनकी फ्लाप फिल्मों की याद हो जाती है ताजा

राजकुमार सोनी

एक निर्माता है अशोक तिवारी. सुना है कि उन्होंने तीन फिल्में बना ली है. पहली फिल्म का तो पता नहीं, लेकिन दूसरी फिल्म रंगरसिया के बारे में यह खबर अवश्य मिली थीं कि उसने बाक्स आफीस पर थोड़ा-बहुत धमाल मचाया था.अब आई है उनकी तीसरी फिल्म-रंगोबती.

रंगोबती ओ रंगोबती... यह ओड़िशा के संबलपुर इलाके के लोक गायक  हरिपाल का बेहद प्रसिद्ध गाना है. यह गाना आज भी इतना ज्यादा पापुलर है कि झुग्गी बस्तियों में होने वाली शादी-ब्याह में अक्सर सुनने को मिल जाता हैं. अब तो इस गाने को पूरे तामझाम के साथ नामचीन कलाकार भी गाते हैं. ( रामसंपत के निर्देशन में इस गाने को सोना महापात्रा की आवाज में यू ट्यूब में सुन सकते हैं. ) ...

...तो फिल्म में इस गाने के नाम ( रंगोबती ) की लोकप्रियता को भुनाने की असफल कोशिश की गई है. लोकगायक हरिपाल की गाने की जो नायिका है वह लाजे.. मोहे लाजे.. लाजे... कहकर शर्माती है. मगर फिल्म वाली रंगोबती... लात-घूंसा चलाती है.

फिल्म के निर्देशक पुष्पेंद्र सिंह रंगमंच से जुड़े हुए एक जानदार अभिनेता है. रंगमंच के अलावा छत्तीसगढ़ की फिल्मों में उनका अभिनय सर चढ़कर बोलता है, मगर एक बासी कहानी और थके हुए कलाकारों के साथ बनाई गई यह फिल्म उनके काम पर सवाल खड़ा करती है. सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या एक अच्छे अभिनेता को सड़ियल और मरियल सी कहानी पर अभिनय के नाम पर खानापूर्ति करने वाले कलाकारों के साथ फिल्म बनाने के बारे में विचार करना चाहिए था ? फिल्म को देखते हुए आपको कमाल हसन की चाची 420, गोविंदा की आंटी नंबर वन और हिंदी की वे सब फिल्में याद आ जाती है जिनमें हीरो ने महिला किरदार निभाया है. अगर यह फिल्म हिंदी की कुछ बेहतरीन फिल्मों का ठीक-ठाक मिश्रण होती तो भी कोई बात बन सकती थीं, लेकिन फिल्म  का हर फ्रेम जाना-पहचाना और बासी है जिसकी वजह से उब होने लगती है. (  मैं इस फिल्म को इंटरवेल के बाद छोड़कर चला गया. )

कल रविवार को जब मैं यह फिल्म देखने गया तब बालकनी में थोड़े-बहुत दर्शक थे. नीचे की अधिकांश सीटें खाली थी. जैसे-तैसे केवल इंटरवेल तक झेल पाया. हाल के बाहर निकला तो निर्देशक पुष्पेंद्र मिल गए. मैंने उन्हें भी बताया कि झेलना थोड़ा कठिन हो रहा है. ( वे मुस्कुराते रहे और फिर उन्होंने कहा- अगर फिल्म खराब है तो खराब लिखिएगा...मैं सुधार करूंगा ताकि अगली बार दर्शकों को निराशा का सामना न करना पड़े. मैं उनकी साफगोई का कायल हूं और इस साफगोई के लिए उन्हें बधाई देता हूं. छत्तीसगढ़ में फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशकों, कलाकारों को केवल चमचागिरी पसन्द है, लेकिन पुष्पेंद्र इससे अलग है. वे अपनी आलोचना को भी सीखने का उपक्रम मानते हैं. )

 

फिल्म में इंटरवेल के बाद की क्या कहानी है इसकी जानकारी मेरे पास उपलब्ध नहीं है. ( फिल्म में इंटरवेल के पहले की भी जो कहानी है वह भी ऐसी नहीं है कि उसे स्मृति का हिस्सा बनाकर रखा जाए. )

फिल्म में कुमार गौरव और उनकी फ्लाप फिल्मों की याद दिलाने वाला एक अभिनेता अनुज है जो शहर से गांव आता है. गांव में वह अपनी पुरानी प्रेमिका जो एक अमीर आदमी ( प्रदीप शर्मा ) की बेटी हैं से मिलता है. दोनों के प्रेम में बाधा उत्पन्न होती है तो कुमार गौरव मतलब अनुज शर्मा लड़की का भेष धारण कर अमीर आदमी के घर भोजन पकाने का काम करने लगता है. रंगोबती पर अमीर आदमी का दिल आ जाता है और उसके मुनीम का भी. फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए एक बंगाली और एक ओड़िशा की महिला पात्र के साथ तीन पुरूष किरदार और है. फिल्म की मरी और लचर कहानी को ये पांच पात्र अपने अभिनय से खींचने का प्रयास करते हैं. हालांकि फिल्म में उनके हास्य प्रधान दृश्यों का कहानी से कोई सीधा रिश्ता नहीं बनता, लेकिन यह भी सच है कि अगर ये पांच पात्र नहीं होते तो मैं पंद्रह मिनट के बाद हॉल छोड़कर चला जाता.

फिल्म में अनुज शर्मा का अभिनय बेहद कमजोर है. महिला के किरदार को जीने के लिए जो मेहनत करनी चाहिए थीं वह  दिखाई नहीं देती. यहां तक आवाज पर भी काम नहीं किया गया. फिल्म के सारे पात्र इंटरवेल तक चीख-चीखकर और खींच-खींचकर संवाद बोलते हैं. अभिनय के नाम पर प्रदीप शर्मा जैसे अभिनेता इन दिनों केवल अपने मुंह को आड़ा-तेड़ा कर रहे हैं. उनकी आड़ी-तेड़ी भाव भंगिमाओं को देखने से बेहतर है कि आप बगल में बैठे हुए दर्शक को देखिए कि वह अंधेरे में क्या कर रहा है. ( दुर्भाग्य से कल कोई आजू-बाजू में भी नहीं था. ) मुनीम बने निशांत उपाध्याय के बारे में यह विख्यात है कि वह छत्तीसगढ़ी फिल्मों का सबसे बेहतरीन कोरियोग्राफर है. लेकिन रंगोबती में न तो ठीक-ठाक कोरियाग्राफी दिखाई दी और न ही मुनीम के रुप में उनका अभिनय. फिल्म की अभिनेत्री को न तो ढंग से हंसने का मौका मिला और न ही ढंग से रोने का.

( नोट- फिल्म पर यह राय केवल इंटरवेल तक है. हो सकता है इंटरवेल के बाद फिल्म अच्छी हो और दर्शकों के लायक हो,लेकिन मेरे लिए यह फिल्म किसी लायक नहीं है. कल इस फिल्म को देखकर मैंने अपना वक्त बरबाद किया. आज लिखकर कर रहा हूं. मुझसे गलती हुई... मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. )

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लेखक अंजन कुमार का कहना है-अगर कला को जिंदा रखना है तो देखी जानी चाहिए मंदराजी

अंजन कुमार पिछले कई वर्षों से छत्तीसगढ़ी सिनेमा संस्कृति के नाम पर बम्बईया छाप फिल्म की नकल ही कर रही है। इन फिल्मों में कुछ नया या मौलिक काम देखने को नहीं मिलता। घोर व्यवसायिक मानसिकता और सस्ती लोकप्रियता की आत्ममुग्धता में लीन यह फिल्में छत्तीसगढ़ी सिनेमा को कोई दिशा या ऊँचाई दे पायेगी फिलहाल ऐसा कुछ दिख नहीं रहा। जबकि छत्तीसगढ़ में अच्छे लेखक, अच्छे कलाकार, अच्छे विषयो और फिल्मों के अच्छे जानकारों की कोई कमी नहीं है। बस कमी है तो उस गंभीरता और बैचेनी की जिससे अच्छी फिल्मों का सृजन होता है और वैश्विक पहचान मिलती है। छत्तीसगढ़ी सिनेमा अपनी इस कूपमंडूकता से बाहर निकलकर कब कोई महत्वपूर्ण फिल्म बना पायेगी और छत्तीसगढ़ को एक पहचान दे पायेगी, फिलहाल इसका इंतजार हैं। लेकिन इसी बीच हाल में ही रिलीज हुई विवेक सारवा द्वारा निर्देशित छत्तीसगढ़ की लोककला नाचा के जनक दाऊ दुलार सिंह मंदराजी पर बनी पहली बायोपिक फिल्म ‘दाऊ मंदराजी’को देखने का अवसर मिला। छत्तीगढ़ के ऐसे फिल्मी माहौल में जब किसी भी सामाजिक सरोकार से परे फिल्म का मतलब कुछ भी परोसकर पैसा कामना हो। ऐसे व्यवसायिक समय में यदि कोई फिल्म निर्देशक बाजारु और चालु टाइप की छत्तीसगढ़ी फिल्म के बरअक्स छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति नाचा के जनक महान कलाकार दाऊ मंदरा जी पर बायोपिक फिल्म बनाने का जोखिम उठाता है तो निश्चित तौर पर यह काबिले तारीफ है। यह अपने आप में एक साहसिक एवं चुनौती पूर्ण कदम है। जिसकी सहराना की जानी चाहिए। और वैसे भी वह कलाकार और फिल्म ही क्या जो जोखिम उठाने का साहस न रखती हो। क्योंकि किसी भी कला को बनने में सदिया लग जाती है, पर उसे खत्म होने में कोई समय नहीं लगता। और कला को सही मायने में बचाने वाले वही लोग होते हैं। जिनका जीवन मंदराजी की तरह कला को रचने, विकसित करने और बचाने के लिए समर्पित होता हैं। कोई सच्चा कलाकार कला के लिए कितना बैचेन और संघर्षरत होता है। उसके भीतर कितनी मानवीय संवेदना होती है। जिसकी चिंता में कला के साथ समाज भी शामिल होता है। वह कला जिसका सीधा संबंध जनता से होता है। और जनता को शिक्षित करना ही कला का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है। इस उद्देश्य को यह फिल्म बहुत अच्छे से दिखाती है। दाऊ मंदरा जी का जीवन संघर्ष वस्तुतः एक सच्चे कलाकार का जीवन संघर्ष है जो कला के लिए सही मायनों में प्रतिबद्ध है। यहाँ जाकर यह कहानी विश्व की उन सभी प्रतिबद्ध कलाकारों के जीवन की कहानी से जुड़ जाती है। जिनके जीवन का अंत कला को जीवित रखने की चिंता और संघर्ष में ऐसी ही विषम व त्रासदपूर्ण स्थितियों में हुआ। यह फिल्म दाऊ मंदराजी के जीवनसंघर्ष के साथ ही छत्तीसगढ़ी नाचा जैसी महत्वपूर्ण लोक कला के संघर्ष और विकास की गाथा को भी दिखाती है। मंदराजी ने रवेली नाचा के माध्यम से नाचा का कैसे विकास किया उसे लोकप्रियता की ऊँचाई तक किस तरह पहुँचाया और उसके बाद कैसे व्यवसायिकता ने लोक कलाकारों को प्रभावित किया और लोककला अपनी सामाजिक भूमिका से कैसे भटक गई। इन सारी स्थितियों-परिस्थितियों के यथार्थ को यह फिल्म बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है। बायोपिक फिल्मों में घटनाओं का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इन्हीं घटनाक्रमों के माध्यम से किसी के चरित्र का निर्माण व विकास दिखाया जाता है। यह फिल्म भी ऐसे ही घटनाक्रम को प्रारंभ से प्रस्तुत करती चलती है। फिल्म के पहले भाग में यह घटनाक्रम कुछ बिखरा-सा जरूर प्रतीत होता है लेकिन दूसरे भाग में घटनाओं का निर्वाह बहुत अच्छे से किया गया है। जिससे दाऊ मंदराजी के सम्पूर्ण व्यकित्व के विकास का पता चलता हैं। नाचा और नाचा के कलाकारों के प्रति उनका जो गहरा लगाव है। उसे इस फिल्म में बहुत ही खूबसूरती और संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है। कला के संबंध में जो उनके संवाद है। वह कहीं-कहीं इतने काव्यात्मक है कि कला का जीवन और जगत के साथ जो गहरा संबंध है, उसे बहुत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त करते है। मंदराजी ने नाचा को केवल मनोरंजन के उद्देश्य तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि कला को उसकी सामाजिकता के साथ जोड़कर देखा और उसका उसी रूप में विकास किया। कोई भी कला अपनी सामाजिकता में ही सार्थक और प्रासंगिक होती है। तथा सामाजिक हित में तथा अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध के रूप में उसका प्रयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए। इसे इस फिल्म में बहुत ही सार्थक ढंग से दिखाया गया हैं। फिल्म का वातावरण समय सापेक्ष दिखाने का प्रयास किया गया हैं। बायोपिक फिल्म की एक बड़ी चुनौती फिल्म के नायक की होती है। जिसे उस व्यक्तित्व को अपने भीतर जीते हुए अपने अभिनय से जीवंत करना होता है। जिस पर पूरी बायोपिक फिल्म केन्द्रित होती हैं। इस दृष्टि से देखा जाये तो फिल्म के नायक करन खान ने निश्चित तौर पर एक चुनौती पूर्ण कार्य किया है और अपने अभिनय की कला से मंदराजी के चरित्र को बहुत अच्छी तरह से जीवंत किया है। उनका अभिनय इस फिल्म में देखने लायक है। फिल्म के अन्य कलाकार अमर सिंह, हेमलाल कौशिक, वेदप्रकाश चंदेल, नरेश यादव आदि बेहतरीन कलाकारों ने काफी अच्छा अभिनय किया है। और फिल्म को बाँधे रखने में सफल रहे हैं। लोक कला का श्रम के साथ गहरा संबंध होता है। क्योंकि यह श्रमजीवी वर्ग के द्वारा ही सृजित और विकसित होता हैं। इस फिल्म में एक लोहार के द्वारा मंदराजी का बचपन से बड़े होने तक तबला बजाने की शिक्षा देना। लोककला और श्रमजीवी वर्ग के इसी संबंध को बहुत खूबसूरती से दिखाता हैं। इस फिल्म में लौहार का किरदार भी दर्शकों को याद रह जाने वाला किरदार है। यह फिल्म अपने अंत तक जाते-जाते मंदराजी के जीवन की उस त्रासदपूर्ण और संवेदनशील स्थितियों को बहुत अच्छे से दिखाता है। जिसमें उनके जीवन का बेहद मार्मिक और दुखद अंत होता है। जहाँ दर्शक का हृदय संवेदना से भर जाता है। जिसे करन खान ने बेहद खूबसूरती से निभाया है। इस फिल्म की एक और बड़ी उपलब्धि इस फिल्म का गीत और संगीत भी है। इसमें लक्ष्मण मस्तुरिया के पाँच गीतों को लिया गया हैं। वे छत्तीसगढ़ के एक ऐसे महान गीतकार है। जिनके गीतों में छत्तीसगढ़ का जीवन अपने सम्पूर्ण यथार्थ की गंभीरता और रचनात्मक सुंदरता के साथ अभिव्यक्त होता हैं। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि खुमान साव और गोंविद साव जैसे गंभीर लोक कलाकारों ने इस फिल्म में संगीत दिया हैं। छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति के महान कलाकारों और रचनाकारों को इस फिल्म में शामिल किया जाना यह बताता है कि इस फिल्म के निर्देशक विवेक सारवा छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के अच्छे कलाकारों के प्रति काफी गंभीर समझ रखते हैं। आज छत्तीसगढ़ी सिनेमा को ऐसे ही समझदार और गंभीर निर्देशकों की जरूरत है। जो इस तरह के विषयों पर फिल्म बनाने का जोखिम उठाये और भविष्य में छत्तीसगढ़ी सिनेमा को अपने सफल निर्देशन में एक दिशा और ऊँचाई दे पाये। क्योंकि किसी भी फिल्म का इतिहास आर्थिक रूप से सफल नहीं, बल्कि सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति में सफल फिल्मों से बनता है। और ऐसे ही फिल्मों को इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज और याद किया जाता हैं। हर फिल्म में कोई न कोई कमी जरूर रह जाती है। इस फिल्म में भी कुछ व्यहारिक तकनीकी कमियां जरूर हैं। बावजूद इसके बम्बईया छाप फिल्मों की बनी-बनाई मानसिकता को थोड़ी देर के लिए छोड़कर इस फिल्म को हर किसी को जरूर देखना चाहिए। क्योकि यह दाऊ मंदराजी के जीवन और नाचा जैसी महत्वपूर्ण लोककला के महत्व और उसके संघर्ष से हमें परिचित कराता है। जिससे छत्तीसगढ़ की वर्तमान पीढ़ी पूरी तरह अछूती है। इस फिल्म का अपना एक सांस्कृतिक महत्व है। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार को भी चाहिए कि इस तरह की फिल्मों को गंभीरता लेते हुए टैक्स फ्री करे ताकि इस तरह की फिल्मों को महत्व मिल सके और इस तरह की अच्छे विषयों पर भविष्य में और भी अच्छी फिल्में बनाने के लिए लोग प्रेरित हों तथा छत्तीसगढ़ी सिनेमा का बेहतर विकास हो पाये। यह प्रयास निरंतर छत्तीसगढ़ सरकार और छत्तीसगढ़ के समस्त गंभीर कलाकारों की तरफ से होते रहना चाहिए। क्योकि यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता का भी प्रश्न है। और कला के प्रति कलाकारों का सच्चा दायित्व भी। जिसे हर हाल बचाये और बनाये रखने की कोशिश बेहद जरूरी हैं। मोबाइल नंबर - 9179385983
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छत्तीसगढ़ी फिल्मों के जनक मनु नायक को पद्मश्री देने की मांग... मुख्यमंत्री से मिला प्रतिनिधिमंडल

रायपुर. गुरूघासीदास सेवादार संघ के अध्यक्ष लखन कुर्रे सुबोध की अगुवाई में शनिवार को सामाजिक कार्यकर्ता लाखन सिंह, फिल्मकार अनुज श्रीवास्तव, अशोक ताम्रकार और पत्रकार राजकुमार सोनी ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात कर छत्तीसगढ़ी फिल्मों के जनक मनु नायक को पद्मश्री देने की मांग की. इस मौके पर विशेष रुप से  फिल्मकार मनु नायक भी मौजूद थे. मुख्यमंत्री ने उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली और विस्तारपूर्वक चर्चा की. मुख्यमंत्री ने कहा कि वे स्वयं मनु नायक जी के प्रशंसक है और फिल्मी दुनिया में उनके संघर्ष और साहसपूर्ण काम से परिचित है.

प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को अवगत कराया कि भाजपा के शासनकाल में भी मनु नायक को पद्मश्री देने की मांग उठी थीं, लेकिन तब कई ऐसे नामों पर विचार किया गया जिन्हें लेकर आज तक सवाल उठ रहे हैं. पूर्ववर्ती सरकार में दो-चार योग्य लोग ही पद्मश्री काबिल थे, लेकिन ऐसे-ऐसे लोग पद्मश्री पाने में सफल हो गए है कि पद्मश्री का मजाक उड़ने लगा. . छत्तीसगढ़ के बहुत से पद्मश्री अब छद्मश्री की उपाधि से भी नवाजे जाते हैं. प्रतिनिधिमंडल की बातों से अवगत होने के बाद मुख्यमंत्री ने भारत शासन को मनु नायक का नाम प्रस्तावित करने एवं पत्र लिखने का निर्देश दिया.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में जन्मे मनु नायक ने वर्ष 1965 में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेश का निर्माण किया था. उन्हें इस फिल्म के निर्माण में काफी कठिनाइयों को सामना करना पड़ा था. छुआछुत, ऊंच-नीच और भेदभाव जैसे विषय पर फिल्म बनाना कोई सरल काम नहीं था. जब फिल्म रीलिज हुई तब एक समुदाय विशेष ने जगह-जगह विरोध जताया. कई जगह पोस्टर फाड़े गए और कुछ छबिगृहों में फिल्म को प्रदर्शित ही नहीं होने दिया गया. एक समुदाय विशेष के लोग जब विरोध करने दिल्ली पहुंचे तब तात्कालिक सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने विज्ञान भवन में फिल्म का विशेष शो देखा. इस फिल्म को देखने के बाद श्रीमती गांधी ने इसे सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने वाली बेहतर फिल्म बताया था.

मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद नुक्कड़ स्टूडियो में सीजी बास्केट के लिए मनु नायक का एक विशेष इंटरव्यूह भी रिकार्ड किया गया. लगभग आधे घंटे की बातचीत में मनु नायक ने कई विषयों पर चर्चा की. उन्होंने छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों से आग्रह किया कि अगर वे सच में नवा छत्तीसगढ़ गढ़ना चाहते हैं तो उन्हें यहां के रीति-रिवाज, परम्परा और समस्याओं को वैज्ञानिक ढंग से अपनी फिल्म में जगह देनी चाहिए. एक नवा छत्तीसगढ़ तब ही बन सकता है जब सांस्कृतिक चेतना को संपन्न करने वाली फिल्मों का निर्माण होगा और यह तभी संभव है जब फिल्मकार केवल मनोरंजन और पैसा कमाने को ही अपना ध्येय नहीं मानेंगे.

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घोर व्यावसायिक और यथास्थितिवादी फिल्म- हंस झन पगली फंस जबे.

देश के प्रसिद्ध कथाकार कैलाश बनवासी बता रहे हैं कि हंस झन पगली फंस जबे... महज एक मुनाफा बटोरने वाली फिल्म है. इसका छत्तीसगढ़ के कठोर यथार्थ से जरा भी लेना-देना नहीं है. यह एक घोर यथास्थितिवादी फिल्म है. फिल्म को लेकर कैलाश बनवासी की यह लंबी टिप्पणी बहुत सारे सवाल खड़ा करती है.

 

कैलाश बनवासी

छोटेलाल साहू द्वारा निर्मित और सतीश जैन द्वारा निर्देशित ‘छत्तीसगढ़ी’(?) फिल्म ‘हंस झन पगली फंस जबे’ को रिलीजिंग दिन ही देखकर पत्रकार राजकुमार सोनी ने अपने वेबसाइट अपना मोर्चा डाट काम में समीक्षा करते हुए टाइटल में लिखा था—‘एक बण्डल फिल्म जो सुपर हिट हो सकती है.तब मैंने सवाल उठाया था कि भला एक बंडल फिल्म कैसे सुपर हिट हो सकती है? लेकिन राजकुमार सोनी का आंकलन बिलकुल सही निकला. यह फिल्म थिएटरों में रिलीज के एक महीने बाद भी बालीवुड की फिल्मों को मात देते हुए जबरदस्त कमाई कर रही है.इसके  इतने ज्यादा हिट होने के कारण इसके वास्तविक कारणों को जानने मैं यह फिल्म देखने गया.और पाया कि राजकुमार सोनी की दोनों बातें सही हैं—फिल्म सुपर हिट हो चुकी है.लेकिन वास्तव में बंडल है. लेकिन मेरी राय उस टिप्पणी से सहमत होते हुए भी कुछ अलग है.

  सतीश जैन मुख्यरूप से सिने व्यवसायी हैं,उन्होंने ऐसी फ़िल्में बनाई जिन्हें दर्शक देखने थिएटर जा रहा है. सिनेमा उद्योग में जिस तरह बड़ी-बड़ी फ़िल्में मुंह के बल गिर रही हैं,तमाम लटकों-झटकों के बाद भी फ्लॉप हो रही हैं,ऐसे में ‘हंस झन पगली फंस जबे’ जैसी फिल्म का हिट होना,मुझे एक सामान्य छत्तीसगढ़ी’ दर्शक की हैसियत से ‘अपील’ तो करता ही है. फिल्म में नया कुछ भी नहीं है. एक प्रेम कहानी और नायक-नायिका के पिताओं की आपसी दुश्मनी की कहानी दर्शक बॉबी’ के समय से देखते आ रहे हैं.फिल्म डेविड धवन मार्का हिट करने- कराने के तमाम फार्मूलों- एक्शन,ड्रामा,कॉमेडी -- से लैस है जो कभी ‘मैंने प्यार किया’ की याद दिलाती है तो कभी ‘फूल और कांटे’ की तो कभी ‘हम आपके हैं कौन’ या ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे ’ की.यानि कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा,भानुमती ने कुनबा जोड़ा’.स्वीकारना होगा,निर्माता-निर्देशक अपने उद्देस्श्य में सफल हैं. प्रश्न मेरे सामने यही है की छत्तीसगढ़ी दर्शकों ने इसे हाथो- हाथ क्यों लिया? हिंदी की हर दूसरी फिल्म की तर्ज पर बनी इस फिल्म में उन्हें ऐसा क्या नया अनोखा मिल गया जो किसी और फिल्म में नहीं था ? इसका जवाब हमारे सांस्कृतिक स्तर पर छिपा है. क्योंकि यहांं फिल्म की भाषा ही सबसे बड़ा आकर्षण है.लोग अपनी बोली-भाषा में हीरो-हिरोइन को बोलते देखना चाहते हैं,इसलिए,जरा-सा क्लिक मिलते ही लोग टूट पड़े हैं जो लोग इसे देखने जा रहे हैं,देखा जाय तो वे कौन लोग हैं? इसके सबसे बड़े दर्शक वे छत्तीसगढ़ी युवक-युवतियां हैं जो गांवों से कट चुके हैं. जिनका समय के साथ बहुत तेजी से शहरीकरण हो चुका है,और जो मनोरंजन के नाम पर सिनेमाई छल-प्रपंचों के गहरे शिकार हैं. ये छोटे-मोटे अस्थायी कामों में लगे लोग हैं,जिन्हें रोज खाना और रोज कमाना है. ज़ाहिर है ये अपनी संस्कृति से जुड़े होने  का भ्रम तो बनाए हुए हैं,जबकि वास्तव में उससे कटते जा रहे हैं.ये वे लोग हैं जिन्हें अपनी भाषा-बोली से बहुत प्यार है लेकिन इस समूह का सांस्कृतिक स्तर अभी भी बीस साल पुराना और पिछड़ा हुआ है. है. दूसरे,इस फिल्म ने अपने केंद्र में छत्तीसगढ़ी जनता या लोगों को तो रखा ही नहीं है! ना यहांं गांव हैं,ना किसान हैं,ना खेतखार,ना बारी-बखरी! ना ही गाय-बैल! कुछ भी तो दूर-दूर तक नहीं है. ना ही उन भीषण समस्याओं की कोई झलक है जिनसे छत्तीसगढ़ आज भी दो-चार है--- किसान या खेती की समस्या, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार,शोषण,,गांवों में आते बदलाव,कुछ भी तो नहीं है. फिर इसे भला छत्तीसगढ़ी फिल्म क्यों कहें? ना ही यहांं की लोक-परम्परा या रीति-रिवाज, ना नाच-गीत हैं ना संस्कृति ! फिर भी सब पसंद कर रहे हैं तो क्या यह नही मान लिया जाय कि लोगों में अपनी स्थानीयता,और संस्कृति के लिए अब वह पहले वाला प्रेम रहा ही नहीं, जो कभी चंदैनी-गोंदा या खुमान साव ने अपने समय में जगाने की कोशिश की थी.इसमें संस्कृति के नाम पर मात्र विवाह के चंद फुटेज हैं. सच तो यह है कि ऐसी फ़िल्में भोजपुरी या पंजाबी किसी भी भाषा में डब की जा सकती है और इससे इसके आंचलिक सौन्दर्य पर कोई खतरा नहीं रहेगा. इस फिल्म में जिसका 40 प्रतिशत हिस्सा बोलेरो-जाइलो-बुलेट जैसी गाड़ियों के दौड़ते रहने,भागमभाग,जबरदस्त हिंसा और नफरत से भरी हुई है,इसमें छत्तीसगढ़ी के नाम पर अगर आप कुछ खोजने निकलेंगे तो सिर्फ निराशा ही हाथ लगेगी.

  फिल्म की असली ताकत इसका लोकप्रिय गीत-संगीत है,जिसमें लोकधुनों की छौंक बघारी गई है. संगीत निर्देशक सुनील सोनी और गीतकार रामेश्वर वैष्णव की इस बात के लिए प्रसंशा की जानी चाहिए. यही बात फिल्म के कोरियोग्राफी के बारे में कही जा सकती है. फिल्म नाटक की तरह एक सामूहिक काम है.इसलिए फिल्म बनाना आर्थिक रूप से मुश्किल तो है ही.अपना पैसा लगाकर डूबाना कोई नहीं चाहता. इसलिए व्यावसायिकता सिनेमा की सबसे पहली शर्त हो जाती है.इसे यों कह सकते हैं,कि इन निर्माता-निर्देशकों को अपना व्यवसाय करना अच्छे से आता है.सतीश जैन जब कहते हैं कि मैं वही फ़िल्में बनता हूँ जो लोग पसंद करते हैं, तो इस कथन में उनकी एजेंडे को बखूबी देखा जा सकता है.

 लेकिन जैसे ही आप इस फिल्म को कला के मानदंडों पर रखने लगेंगे तो यह रेत  की दीवार की तरह भरभराकर गिर जाती है.इसे वस्तुतः छत्तीसगढ़ी मूल्यों-मान्यताओं,संस्कृति या जागृति से कुछ भी लेना-देना नहीं है. अगर होता,तो ऐसी वाहियात फिल्म नहीं बनाते. अपनी विचारधारा में यह फिल्म बहुत हिंसक है और ‘मसल-पावर’ को ही स्थापित करती है. इसमें जिस किस्म की घृणा,घमंड,गुस्सा और नफरत को दिखाया गया है,इससे यह छत्तीसगढ़ी फिल्म कम यूपी-हरियाणा-राजस्थान  के घोर सामंती खाप पंचायतों की याद ज्यादा दिलाती है जो बेटे-बेटियों के प्रेम-विवाह पर अपने कथित सम्मान के लिए ‘ऑनरकिलिंग’ तक चले जाते हैं. यह किसी बदलाव की बात नहीं करती,बस दोनों ठेकेदारों की आपसी व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और खूनी रंजिश को ही उभारती है. एक समय तो लगने लगता है कि यह ‘ऑनरकिलिंग’ की तरफ बढ़ रही है. यही इस घोर फार्मूला फिल्म में परोसा गया है. हीरो प्रेम के लिए लम्पटई का सहारा लेता है. जिसमें दर्शकों को खुश होते देखा जा सकता है.इस फिल्म को यहांं के बड़े परिवारों में प्रचलित दाऊगिरी और दादागिरी के संदर्भ में ही देख सकते हैं जो कि अब पुरानी बात हो गई है.ऐसे माता-पिता को आज के बदले छत्तीसगढ़ की नयी पीढ़ी खुद ही रिजेक्ट कर देती है. फिल्म में ऐसे जालिम पिताओं को याद करके नायिका का उनका चित्र बनाना ही नहीं,बल्कि भगवान् शंकर और विष्णु का रूप दे देना बेहद हास्यास्पद ही नहीं,दयनीय है. लेकिन चूंकि वह पिता है,और दर्शकों की पितृभक्ति की भावनाओं को कैश करना है,इसलिए उन्हें भगवान् का दर्जा देते दिखा दिया गया है.वस्तुतः यही छत्तीसगढ़ की पिछड़ी मानसिकता है,जिसे बदलने की जरूरत है. रिश्ने-नाते के नाम पर भावात्मक रूप दिखाकर जल्लाद जैसे बापों को सम्मान देना कहांं तक न्यायसंगत है?फिल्म में किसी तार्किकता की तो बात ही नहीं की जाए तो अच्छा होगा. अंधाधुंध फायरिंग हो रही है. हत्या हो रही है और पुलिस का नामोनिशान नहीं .यह समाज में प्रचलित पितृसत्ता को ही मजबूत नहीं करती,प्रेम या कॉमेडी के नाम पर लम्पटई  को जगह देती है.इस फिल्म का टाइटल ही लड़की को फंसने-फंसाने के रूप में ही व्यक्त कर रहा है.यह स्त्रीविरोधी भी इस मायने में है कि छत्तीसगढ़ में स्त्रीशक्ति बहुत मजबूत और मुखर है -तीजन बाई,सुरूजबाई खांडे फूलबासन बाई,इत्यादि. लेकिन यहांं नायिका समेत सभी स्त्रियांं दब्बू हैं और महज शो पीस हैं. जो है वह केवल रस्मों को निभाने के लिए. 

  अगर यह फिल्म लोगों को पसंद आ रही है,तो इसमें निर्माता-निर्देशकों से ज्यादा दर्शकों का दोष है,जो सही फिल्म देखने का स्तर नहीं पा सके हैं. यह घोर यथास्थितिवादी फिल्म है,जो किसी बदलाव के लिए नहीं,वरन सिर्फ मनोरंजन के लिए है.जो अच्छे निर्देशक होते हैं,वे अपनी फिल्म के माध्यम से अपने दर्शकों की सोच,चेतना का स्तर उठाने के लिए प्रयास करते हैं.छत्तीसगढ़  में यहांं की पिछड़ी हुई सोच को बदलने के लिए अच्छे निर्माता-निर्देशकों को इस दिशा में अभी बहुत काम करने की जरूरत है.लेकिन यह ऐसे ही व्यावसायिक फार्मूले से घिरे रहें तो इनसे किसी भी तरह की उम्मीद करना बेमानी है. अभी भी यहांं की उच्चतर भावनाओं का संधान कर, प्रगतिशील जीवन मूल्यों को स्थापित करने वाले फिल्मों की बेहद जरूरत है.जो इसे सिर्फ मुनाफा बटोरने का साधन मात्र नहीं समझे. वैसे ही लोगों से कोई उम्मीद की जा सकती है.

 कैलाश बनवासी का दूरभाष नंबर है-  98279 93920 

    

 

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क्या एक लड़की को पगली-सगली और फंस जबे कहना उसके वजूद का अपमान नहीं है...?

रायपुर. गुरू घासीदास सेवादार संघ और लोक समता शिक्षण समिति के बैनर तले राजधानी रायपुर में आयोजित एक विचार गोष्ठी में मंगलवार को प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और फिल्मकार रिनचिन ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति को दरकिनार कर  फिल्म बनाने वाले फिल्मकारों को जमकर आड़े हाथों लिया. रिनचिन ने कहा कि कोई फिल्म बनाए और करोड़ों रुपए कमाए हमें उससे आपत्ति नहीं है, लेकिन किसी भी फिल्मकार को छत्तीसगढ़ की लड़कियों और स्त्रियों को अपमानित करने का अधिकार नहीं है. रिनचिन ने कहा कि जब हम किसी लड़की को हंस मत पगली... फंस जबे कहते हैं तो उसके वजूद को चुनौती देते हैं. क्या किसी लड़की को हंसने का अधिकार नहीं है? और फिर फंस जबे शब्द क्या एक लड़की को अपमानित करने वाला शब्द नहीं है? रिनचिन ने कहा कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति किसी को अपमानित करने की नहीं है.

पत्रकार राजकुमार सोनी ने सवाल उठाया कि क्या छत्तीसगढ़ी फिल्मों में हमें संस्कृति के नाम पर मुंबई का कचरा ही देखने को मिलता रहेगा? क्या छत्तीसगढ़ के फिल्मकार कभी शंकरगुहा नियोगी, तीजनबाई, हबीब तनवीर, लाल श्याम सिंह, रितु वर्मा, सूरुज बाई खांडेकर, झाडूराम देवांगन, बिलासपुर के लाल खदान मस्तूरी के श्रमिक नेता दरसराम साहू जैसे मूर्धन्यों के जीवन संघर्ष और माओवाद की समस्या से निदान के लिए भी कोई फिल्म बनाएंगे ? सोनी ने कहा कि पंडवानी गायिका तीजनबाई बाई पर अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्धकी की पत्नी फिल्म बना रही है, लेकिन छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों ने इस महान शख्सियत पर फिल्म बनाने की जहमत उठाने की जरूरत नहीं समझी है. प्रसिद्ध फिल्मकार सतीश जैन ने कहा कि वे केवल मनोरंजन के लिए फिल्म बनाते है और मनोरंजन को ही अपना ध्येय मानते हैं. उन्होंने कि कहा जनता की पसंद पर किसी भी दूसरी तरह की पसंद को थोपना उचित नहीं है.उन्होंने बताया कि उनकी नई फिल्म हंस झन पगली फंस जबे रिकार्ड तोड़ बिजनेस कर रही है और आगे भी तगड़ा व्यवसाय होगा इसकी पूरी संभावना है.

फिल्मकार अजय टीजी ने कहा कि छत्तीसगढ़ की अधिकांश फिल्मों पर मुंबईयां फिल्मों की छाप देखने को मिलती है. किसी फिल्म से प्रेरणा लेना अलग बात हैं और नकल करना अलग मसला है.उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों को मौलिक विषय पर फिल्म निर्माण करने के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए.

फिल्मकार योग मिश्रा ने कहा कि सब कुछ एकाएक नहीं हो जाता है. बंबई की फिल्म इंडस्ट्री भी धीरे-धीरे खड़ी हुई थीं और छत्तीसगढ़ की इंडस्ट्री भी अपने बूते पर खड़ी हो रही है. 

फिल्मकार संतोष जैन ने कहा कि पहले धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्में बनती थीं. महाराष्ट्र में दादा कोड़के का वर्चस्व रहा...मगर अब जाकर अच्छी फिल्में बनने लगी है. जैन ने कहा कि आज पब्लिक की जेब से पैसा निकालना कठिन हो गया है. छत्तीसगढ़ में लोग अपनी जेब से पैसा लगाकर फिल्म बना रहे हैं. जैन ने कहा कि छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों को भी सरकार की ओर से सब्सिडी मिलनी चाहिए.

पीयूसीएल के पूर्व अध्यक्ष लाखन सिंह ने कहा कि जो फिल्म लोगों के भीतर जागृति पैदा करती है वहीं फिल्म जिंदा भी रहती है. उन्होंने कहा कि फिल्मों में महिलाओं और बच्चों के सम्मान का खास ख्याल रखा जाना चाहिए. प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता दुर्गा झा ने भी अपने वक्तव्य में सामाजिक सरोकार को बढ़ावा देने की बात कही. उन्होंने कहा कि किसी भी टूरी को आइसक्रीम खाकर फरार नहीं होने देना है. यह एक निष्कृष्ट सोच को बढ़ावा देने वाला गाना है.

गोष्ठी में कवियित्री एवं अभिनेत्री नीलू मेघ ने दर्शक दीर्घा से कहा कि छत्तीसगढ़ की माटी कला,संस्कृति और नैसर्गिक कलाकारों से अटी पड़ी है.राज्य बनने के बाद फ़िल्मकारों  ने भली बुरी सब तरह की फ़िल्में बनाई और अपनी तिजोरी को भरने का काम किया है. अफसोस इस बात का है कि यहां के कलाकारों को न यथायोग्य मेहनताना मिलता है न यश .यह कलाकारों का सीधा सीधा अपमान और शोषण है. लाखों करोड़ों  का मुनाफा कमा रहे फिल्मकार छत्तीसगढ़ के भोले भाले कलाकारों को चांस देने के बहाने पारिश्रमिक न देकर आर्थिक शोषण ही करते हैं. फ्री में काम करवा कर करोड़ो रूपये कमाना यह छोटी बात नहीं हैं. छत्तीसगढ़ की फिल्मों का यह स्याह पक्ष है जिस पर संज्ञान लेने के बजाय मुद्दा ही गायब कर दिया जाता है. रंगकर्मी निसार अली ने सवाल उठाया कि हाल के दिनों में धमतरी के एक छबिगृह में फिल्म की टिकट को लेकर चाकूबाजी हो गई थी. इस घटना का जिम्मेदार किसे माना जाना चाहिए.

 

छत्तीसगढ़ी सिनेमा के सामने चुनौतियां और निदान विषय पर आयोजित यह गोष्ठी  वृंदावन हाल में आयोजित की गई थीं. इस गोष्ठी में खास तौर पर छत्तीसगढ़ी सिनेमा के जनक मनु नायक मौजूद थे. इस मौके पर उन्होंने अपने अनुभव से भी जनसमूह को समृद्ध किया. 

सभाकक्ष में कुछ ऐसे तत्वों का भी प्रवेश हो गया था जो विचारहीन सवालों के जरिए गोष्ठी की दशा और दिशा बदलना चाहते थे. ऐसे तत्वों के सवाल साफ तौर पर प्रायोजित लग रहे थे. इन तत्वों ने बेमतलब के सवालों के जरिए हंगामा मचाने की कोशिश भी की, लेकिन गुरूघासीदास सेवादार संघ के केंद्रीय  अध्यक्ष लाखन सुबोध और उनके जिम्मेदार सदस्य तामेश्वर अनंत, एनडी सतनाम, दिनेश सतनाम तथा अपार जनसमूह की वजह माहौल बिगाड़ने वाले तत्वों की कोशिश नाकाम हो गई. सारे विघ्नकारी तत्वों को सभाकक्ष से खदेड़ दिया गया. गोष्ठी के अंत में छत्तीसगढ़ी सिनेमा के जनक मनु नायक को पदमभूषण देने की मांग भी की गई.

   
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छत्तीसगढ़ी सिनेमा को लेकर गंभीर मंथन 16 जुलाई को रायपुर में

रायपुर. क्या छत्तीसगढ़ी फिल्मों में संस्कृति के नाम पर मुंबई का कचरा ही परोसा जाता रहेगा ? क्या छत्तीसगढ़ के फिल्मकार कभी शंकरगुहा नियोगी, तीजनबाई, हबीब तनवीर, लाल श्याम सिंह, रितु वर्मा, सूरुज बाई खांडेकर, झाडूराम देवांगन, बिलासपुर के लाल खदान मस्तूरी के श्रमिक नेता दरसराम साहू जैसे मूर्धन्यों के जीवन संघर्ष को लेकर फिल्म निर्माण करने के बारे में विचार करेंगे ? क्या चुनौतियों के नाम पर फिल्मकार... थियेटर कम है ? संसाधन कम है ? अच्छे कलाकार नहीं मिलते ? तकनीक के लिए मुंबई जाना पड़ता है ?  सरकार मदद नहीं करती ? इसी बात का रोना रोते रहेंगे ? 16 जुलाई मंगलवार को राजधानी रायपुर के वृदांवन हाल में शाम चार बजे से इसी बात को लेकर मंथन होगा कि आखिरकार छत्तीसगढ़ का सिनेमा किस तरह की चुनौतियों से गुजर रहा है?  कोई चुनौती है भी या नहीं ? और अगर कोई चुनौती या दिक्कत है तो उसका समाधान क्या हो सकता है?

 गुरूघासीदास सेवादार संघ और लोक समता शिक्षण समिति के बैनर तले आयोजित किए जाने वाले इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत. कार्यक्रम की अध्यक्षता लखनलाल कुर्रे करेंगे. कार्यक्रम में विशेष रुप से छत्तीसगढ़ी सिनेमा के जनक मनु नायक मौजूद रहेंगे. इस मौके पर छत्तीसगढ़ी सिने एंड  टीवी प्रोग्राम प्रोडयूशर एसोसियेशन के अध्यक्ष संतोष जैन, लेखिका और फिल्मकार रिनचिन, फिल्मकार योग मिश्रा, छत्तीसगढ़ी राज्य निर्माण आंदोलन के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर अशोक ताम्रकार, पीयूसीएल के पूर्व अध्यक्ष लाखन सिंह एवं पत्रकार राजकुमार सोनी अपना वक्तव्य देंगे. छत्तीसगढ़ी सिनेमा की चुनौतियां और निदान विषय पर आयोजित इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का संचालन एमडी सतनाम एवं तामेश्वर अनंत करेंगे. गुरूघासीदास सेवादार संघ के केंद्रीय संयोजक लखनलाल कुर्रे ने छत्तीसगढ़ के सभी सिने प्रेमियों और संस्कृतिकर्मियों से उपस्थिति का अनुरोध किया है.

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अगर- हंस झन पगली फंस जबे के फूहड़पन से दिल भर गया हो तो जाइए देख आइए आर्टिकल-15

क्या आपको पता है कि आपके शहर में एक उम्दा फिल्म लगी है. दिल और दिमाग को झकझोर देने वाली फिल्म, लेकिन माफ करिएगा इस उम्दा फिल्म का नाम हंस झन पगली फंस जबे.... नहीं है. देश और दुनिया का मीडिया जिस फिल्म की बगैर पैसा खाए समीक्षा और तारीफ कर रहा है उस फिल्म का नाम है- आर्टिकल-15 ( अगर आपके भीतर मोदी वाला राष्ट्रवाद मौजूद नहीं है और आप अपने अलावा इस देश के शोषित, पीड़ित और कमजोर लोगों के बारे में थोड़ा-बहुत भी सोचते हैं तो आपको आर्टिकल 15 अवश्य देखनी चाहिए. ) इस फिल्म के बारे देश-दुनिया के तमाम बड़े लेखकों और पत्रकारों ने अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है और अब भी लगातार लिख रहे हैं. फिल्म की कुछ विशेषताओं के बारे में बेहद सरल ढंग से यहां बता रहे हैं- लेखक अंजन कुमार.

अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित एवं गौरव सोलंकी द्वारा लिखित फिल्म ‘आर्टिकल 15’ कई अर्थों में एक महत्वपर्ण फिल्म है. इस फिल्म को देखते हुए कहीं नहीं लगता कि आप फिल्म देख रहें हैं. फिल्म प्रारंभ से ही दर्शक को इस कदर जोड़ लेती है कि दर्शक फिल्म का हिस्सा बनकर भीतर और बाहरी दोनों स्तर पर जीने लगता है.  

इस फिल्म के दृश्य, पात्रों के संवाद, गांव का सारा वातावरण जबरदस्त ढंग की प्रकाश व्यवस्था में इतना वास्तविक प्रतीत होता है कि दर्शक यथार्थ के इस धरातल से सहज ढंग से जुड़ जाता है. यह फिल्म दर्शकों से लगातार संवाद करते हुए भारतीय समाज की वर्णवादी संकीर्ण व्यवस्था, मानसिकता और राजनीति के उस क्रूर, अमानवीय और घृणित यथार्थ को उजागर करती है, जो सदियों से इस भारतीय समाज की व्यवस्था और मानसिकता में आज भी कहीं पैबस्त है. इस फिल्म को देखते हुए लगता है कि हम आजाद भारत के अत्याधुनिक समय के डिजिटल इंडिया के स्मार्ट युग में जी रहें हैं या गुलामी के दौर के भी बहुत पीछे किसी सामंती युग में?

फिल्म को देखकर बरबस ही मुझे धूमिल की कविता याद आती है- ‘‘आजादी का मतलब/क्या तीन रंग है/जिसे एक थका हुआ पहिया ढोता है/या इसका कोई खास मतलब है।’’

पूरी फिल्म मनुष्य की आजादी, समानता और अधिकारों की लड़ाई की कहानी है. जिसमें प्रत्येक पात्र किसी न किसी जाति व वर्ग का प्रतिनिधित्व करता हुआ सामाजिक ताने-बाने को खोलता दिखाई देता है. यह फिल्म परोक्ष और अपरोक्ष रूप से भारतीय सामाजिक, प्रशासनिकऔर राजनीतिक व्यवस्था की उन विसंगतियों और जटिलताओं को परत तर परत खोलती है जिससे पूरा का पूरा समाज आज आक्रांत है. पूरी फिल्म दर्शक को कहीं ठहरने नहीं देती बल्कि घटनाक्रम एवं दृश्यों के सूक्ष्म विश्लेश्षण के साथ-साथ चलने को विवश कर देती है. इस फिल्म के कई दृश्य इतने भयावह, त्रासदीपूर्ण और मार्मिक है कि दर्शक उससे अपने आपको अछूता नहीं रख पाता. ऐसे तमाम दृश्य मन के भीतर किसी कील की तरह गढ़ते हैं और फिर टीस बाकी रह जाती है.

जब इस भयावह समय में संवाद को खत्म करने की पुरजोर कवायद चल रही हो, ऐसे समय में यह फिल्म के संवाद की आवश्यकता बताते हुए विमर्श को जन्म देती है. पूरी फिल्म आर्टिकल 15 के माध्यम से भारतीय संविधान के महत्व को स्थापित करने की जबरदस्त कोशिश है. आर्टिकल 15 प्रत्येक भारतीय नागरिक को समानता और आजादी का अधिकार प्रदान करता है. यह आर्टिकल यह बताता है कि भारतीय संविधान किसी भी सामाजिक जातिगत, धर्मगतव्यवस्था से ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिसे बनाए और बचाए रखना बेहद जरूरी है.

इस फिल्म में नायक-नायिका के छोटे-छोटे संवाद सामाजिक यथार्थ को बहुत ही  सुंदर ढंग से अभिव्यक्त करते हैं. नायिका संवाद के माध्यम से सामंती व्यवस्था के उस महानायक के मिथक को भी तोड़ती है. पुलिस के रोल में मनोज के संवाद के माध्यम से सोशल मीडिया हमारे गुस्से को सड़कों में आने से पहले ही कैसे पी लेता है उस पर करारा व्यंग्य है. फिल्म के नायक आयुष्मान खुराना के द्वारा कहा जाना-‘‘कौन है वे लोग ?’’ हमें सोचने के लिए बाध्य करता है कि सच में कौन हैं वे लोग जिनके साथ हम पशुओं से भी बुरा व्यवहार करते हैं, और उनकी जगह कुत्तों को बिस्कुट खिलाना ज्यादा बेहतर समझते हैं. क्या वे इंसान नहीं है? ऐसे कई प्रश्न इस फिल्म की कहानी में प्रमुखता से उठाए गए हैं। मजदूरी में मात्र तीन रूपए ज्यादा देने की मांग करने पर छोटी-छोटी लड़कियों की उनकी औकात दिखाने के लिए सामूहिक बलात्कार कर बेरहमी से जिंदा पेड़ पर लटका दिया जाता है, और जिसे हमने उनकी यथास्थिति में मरने के लिए छोड़ दिया है वे यह कहते हुए कि - ‘‘ये तो ऐसे ही है साहब!’’

यह फिल्म बाजार के उपभोक्तावादी संस्कृति के फैशनेबल प्रेम के बरअक्स फिल्म के नायक-नायिका तथा निषाद और गौरा के माध्यम से एक ऐसे प्रेम को भी दिखाती है जो सामाजिक हित में संघर्षरत व्यक्ति के लिए बेहद जरूरी है. यह प्रेम विपरीत परिस्थितियों में मनुष्य को ताकत और सहारा देने का काम करता है. यह प्रेम देह से परे भावनात्मक संबंल का परिचायक बनता है. यह प्रेम अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने की ताकत देता है. जीवन के संघर्ष में प्रेम की कितनी अहम भूमिका होती है इसे भी फिल्म में पूरी संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है.

कुल मिलाकर पूरी फिल्म अपनी कहानी और निर्देशन की वजह से बेहद सशक्त बन गई है. जिसमें हर चीज का इतना बखूबी इस्तेमाल किया गया है कि फिल्म पकड़ बनाए रखती है. निर्देशक अनुभव सिन्हा और लेखक गौरव सोलंकी ने कहीं भी फिल्म को लेकर कोई समझौता नहीं किया है.  सबसे बड़ी बात की ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में ऐसी फिल्म का आना और उसे पूरी सफलता मिलना अपने आपमें महत्वपूर्ण है. यह फिल्म हिन्दी सिनेमा और फिल्म को लेकर गंभीर लोगों के भीतर एक आशा जगाती है और हमसे-आपसे-सबसे संवाद की मांग करती है.  

 

 

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