विशेष टिप्पणी

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राष्ट्रीय एकता के नाम पर अश्लीलता !

देश के प्रख्यात कथाकार मनोज रुपड़ा अपनी बेहद छोटी किंतु महत्वपूर्ण टिप्पणी में बता रहे है कि वे अवसाद में क्यों चले गए ? उनका मानना है कि देश में राष्ट्रीय एकता के नाम पर अश्लीलता हावी है.

कुछ दिनों से ऐसा लग रहा है , जैसे मैं कोई वास्तविक जीवन नहीं जी रहा हूं , बल्कि किसी कहानी में  जी रहा हूं. एक ऐसी फैंटेसी में जो ‘’ अंधेरे में ‘’ से भी ज्यादा भयानक और अकल्पनीय है.

इसमें सिर्फ किसी महामारी के संक्रमण का डर नहीं है, बल्कि समूचे भारतीय समाज के सामूहिक अवचेतन को निगलने का उपक्रम ज्यादा नजर आ रहा है. इतने बड़े पैमाने पर समूहिक मूर्खता का प्रदर्शन  मैंने पहले कभी नहीं देखा था. इतना विवेकहीन जन समूह भी कभी नहीं देखा था.

लेकिन याद रहे कि पहले ताली और थाली बजाने  का और अब दीया–बत्ती जलाने का आव्हान सिर्फ उनके लिए है , जिनके पास छत और बालकनी है. किराए का ही सही पक्का मकान है. छप्पर और टप्पर के नीचे जीने वाले निम्न वर्ग के लिए तो ये आव्हान बिल्कुल भी नहीं है ( दिखावे के लिए उनके लिए, लेकिन वास्तविक रूप में उनके लिए  नहीं )क्योंकि साधारण लोग जो टप्पर और छप्पर के नीचे रहते हैं , वे मनुष्य नहीं , कसाई खाने के पशु हैं. वे केवल तब उपयोगी हो सकते हैं , जब वे सत्ता विरोधी शक्तियों को मुश्किल में डालने के काम में आते हैं. यानी उनका उपयोग चुनाव  में वोट देने जुलूस  या चुनावी जन-सभा में भीड़ बढ़ाने तक सीमित है और जब उनका उपयोग नहीं रह जाता तो उनकी बलि चढ़ा दी जाती है.

दिल्ली से पलायन करते मजदूरों को देखकर यही लगा था कि वे कसाईबाड़े  की तरफ बढ़ते पशु हैं या ऐसे अनुपयोगी जानवर जिन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. 

जिस डरावनी फैंटेसी में मैं जी रहा हूं उसमें एक तरफ सड़क पर भटकती भीड़ है और अपने छप्परों और टप्परों में राशन और खाने के पैकेट की भीख का इंतजार करते लाखों लोग हैं और दूसरी तरफ राष्ट्रीय एकता के नाम पर की जाने वाली अश्लीलता. ये वही स्वयंसेवक हैं जो ताली और थाली बजाने के पर्व में शामिल थे और अब खाने के पेकेट बांट रहे हैं. एक तरफ  ये अश्लील तमाशा और दूसरी तरफ़  सड़क पर भटकते हजारों मजदूर और रातों रात भिखारी बना दिए गए लाखों लोग मेरे दुःस्वप्न में गुथ्थम-गुत्था हो रहे हैं इस गुथ्थ्त्म- गुत्थी से कोई बड़ा सामाजिक विस्फोट हो या न हो, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे इस फैटेंसी ने अवसाद में डाल  दिया है.

 

 

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पहले बत्ती बुझानी है या जलानी है... अगर जलानी है तो फिर बुझानी ही क्यों?

रंगकर्मी और फिल्मकार पंकज सुधीर मिश्रा वैसे तो छत्तीसगढ़ के भिलाई के रहने वाले हैं, लेकिन लंबे समय से मुंबई में है. वे विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास नौकर की कमीज पर बनी फिल्म ( निर्देशक मणिकौल ) में काम कर चुके हैं. इसके अलावा रजत कपूर की फिल्म मिथ्या में भी वे थे. इन दिनों वे द कपिल शर्मा शो में क्रियेटिव डायरेक्टर है. यहां प्रस्तुत है उनकी खास टिप्पणी-

पंकज सुधीर मिश्रा

सुबह बड़े उत्साह से उठा...आज प्रकाशउत्सव मनाना है. सोचा तैयारी कर लूं. ढूंढना शुरू किया कि घर पर दिया, तेल, बत्ती, माचिस, मोमबत्ती सब है भी या नहीं. और देखिये कमाल... मेरे घर सब मिल गया. और चीज़ें तो छोड़िए टॉर्च तक निकल आई बताइए भला. जिस मुंबई महानगर में एक मिनट के लिए भी बिजली गुल नहीं होती वहां मैंने टॉर्च खरीद रखी है. मुझे खुद पर हंसी आई की कितना डरता हूं अंधेरे से ! जबकि उस्ताद कहते थे कि अंधेरे से डरना नहीं है... वो उतना ही निर्विकार है जितना उजाला है. रोज़ रात अंधकार होता है फिर रोज़ सुबह उजाला हो जाता है. अंधकार से डरना छोड़ दोगे तो अंधकार के भीतर देखने की दृष्टि पैदा होगी. वे मेरे सिनेमा के उस्ताद थे. 

टॉर्च जल रही थी. दिन के उजाले में टॉर्च को कई बार जलाया बुझाया... फिर बुझाया- जलाया... फिर बुझा दिया और कन्फ्यूज़ हो गया. 

मुझे अब भी समझ में नहीं आ रहा कि पहले बत्ती बुझानी है फिर बत्ती जलानी है? या पहले बत्ती जलानी है फिर बत्ती बुझानी है? जलानी ही है तो फिर बुझानी क्यों है? पहले से जल रही है ? और बुझानी है तो फिर जलानी क्यों है ? 

करना क्या है ?

टॉर्च एक तरफ पड़ी है और सोच रहा हूं कि वो ताली-थाली वाला ही ठीक था. रोज़ कमाने खाने वाले, जिनके घरों में बालकनी-खिड़कियां होती नही हैं और दीया- बत्ती-तेल के पैसे बचे नही हैं, उनके भी खाली पड़े हाथों को थोड़ा काम मिल जाता.  

जो मजदूर किसी तरह अपने घर पहुंच सकें और जो नहीं पहुंच सकें शायद अभी भी रास्तों पर हैं,  और जो खुले आकाश के नीचे बैठे आश्चर्य और निराशा में डूबे सोच रहे हैं कि देश के लोगों की चिंता में और 5 बिलियन वाली महाशक्ति की तैयारी में वे शामिल क्यों नही है ? वे मजदूर भी ताली बजा लेते तो उनकी सदियों की थकान शायद थोड़ी कम हो जाती. 

वे भी जो ना घर पहुंच पाए ना ही रास्तों पर हैं, जो महज़ अपने घर पहुंच पाने की आसभरी यात्रा के बीच किसी और लंबी यात्रा पर निकल गए उनकी आत्माएं भी वहां नर्क के दरवाज़े पर बैठी भूखे पेट ताली बजा ही लेतीं (हमें बताया नहीं था हमारे पूर्वजों ने... भूख से मरने पर मोक्ष नही मिलता )

और हां कुछ बच्चों की आंखें अभी भी कीटनाशक की भीषण जलन महसूस करती होंगी. लाल आंखों वाले वे बच्चे भी ताली पीट के थोड़ी देर के लिए बहल जाएं वैसे ही जैसे देश का मध्यवर्ग भीषण रूप से बहला हुआ है इन दिनों. 

 

 

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भक्तों के लिए आज सेल्फी का दिन

हे...आर्यपुत्रों सादर प्रणाम. खुश तो बहुत होंगे आज. सोच रहे होंगे कि कब रात के नौ बजे और तरह- तरह के पोज़ देते हुए सेल्फी लेने, वीडियो बनाने का मौका मिले. आज आप सबको एक फिर यह साबित करना है कि आप ही सबसे बड़े वाले देशभक्त हो. बाकी सब गदहे के बच्चे और राष्ट्रद्रोही हैं.

आप लोगों की बुद्धि पर मुझे कभी शक नहीं रहा. आप सबकी तादाद इतनी ज्यादा और भंयकर हैं कि कई बार हम मुठ्ठी भर लोग सोच में पड़ जाते हैं कि कौन सी चक्की का आटा खाकर मुकाबला किया जाय ? वैसे मुकाबला शब्द सही नहीं है.आप लोगों का मुकाबला स्वयं प्रभु श्री राम भी नहीं कर पा रहे हैं तो हमारी क्या बिसात. देश महामारी के एक भयावह दौर से गुजर रहा है. हर आदमी की हालत यह सोचकर पस्त है कि न जाने कल क्या होगा ? हर किसी को अपना भविष्य अंधकारमय लग रहा है तब आप लोगों को मस्ती सूझ रही है. ऐसा आप ही लोग कर सकते हैं. फलस्वरूप मुकाबला न केवल मुश्किल है बल्कि नामुमकिन जान पड़ता है.

आप लोगों को लगता है कि मोदी जी सब कुछ ठीक कर देंगे, लेकिन न जाने क्यों मुझे यह लगता है कि कोरोना से लड़ना उनके बस की बात नहीं है. अगर बस में होता तो आप लोगों से ताली-थाली पिटने और दीया-टार्च जलाने के लिए नहीं कहा जाता. जिस रोज आप सब लोगों ने थाली-ताली पिटने का उपक्रम प्रारंभ किया था उस रोज से ही कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. अब तो आप सब लोगों को यह मान लेना चाहिए कि कोरोना सामूहिक मूर्खता से भागने वाला वायरस नहीं है.

फिलहाल हताशा और निराशा के एक भयानक दौर में हम मुट्ठीभर नागरिक सोशल मीडिया पर डटे हुए हैं. हमें कोरोना से भी लड़ना है और अज्ञानता से भी. अखबारों और चैनलों से हमने इसलिए भी उम्मीद छोड़ रखी है क्योंकि हमें यह बात अच्छी तरह से मालूम हैं कि कथित मीडिया अब एक निर्धारित एजेंडे के तहत काम करता है. अभी कथित देशभक्त मीडिया का सबसे बड़ा एजेंडा यहीं है कि कैसे देश के मुसलमानों को कोरोना से भी बड़ा वायरस बना दिया जाय.

अब मेरे एक-दो छोटे-छोटे सवाल है. आपको यह पता ही होगा कि परम आदरणीय मोदी जी ने गरीबों को सम्मानित करने के लिए दीया- टार्च- लाइटर- जलाने के लिए कहा है. क्या अलग-अलग राज्य अलग-अलग दिन प्रकाश फैलाने का काम नहीं कर सकते थे. चलिए 3 अप्रैल की बात छोड़िए... क्या यह काम  4 अप्रैल को नहीं हो सकता था ? आप कहेंगे कि कभी भी हो सकता है... फिर मोदी जी के आदेश और सामूहिकता का क्या मतलब है ? 

इसमें कोई दो मत नहीं है कि एकजुटता का अपना महत्व होता है, लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि आपकी यहीं एकजुटता कई तरह की परेशानियों  का कारण बन रही है. मोदी की घोषणा के बाद बिजली विभाग वालों की हालत खराब है. उन्हें अपील करनी पड़ रही हैं कि सब कुछ करना पर बत्ती मत बुझाना. भक्तों इतना तो जानते ही होंगे कि लॉकडाउन की वजह से ट्रेनें बंद हैं. उद्योग बंद है. जहां- जहां भी बिजली की खपत होती हैं ऐसे सारे संस्थान बंद है. अब ऐसे में देश की एक बड़ी आबादी बत्ती बंद करके बैठ जाएगी तो क्या पावरग्रिड का भठ्ठा नहीं बैठ जाएगा ? बिजली विभाग के जानकार बार- बार यह अपील कर रहे हैं कि भइया... सब कुछ कर लेना, लेकिन बत्ती मत बुझाना. क्या आप लोग उनकी अपील पर गौर करने के बारे में कुछ विचार कर रहे हो? ( अरे... यहां तो अपने दिमाग की बत्ती जला लो. )

हे भक्तों... अगर आप छत्तीसगढ़ से हैं तो आपको अच्छी तरह से याद होगा कि प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तब बस्तर में ब्लैक आउट की स्थिति पैदा हुई थीं. ऊर्जा नगरी कोरबा में बिजली घरों के खराब होने का खामियाजा भी छत्तीसगढ़ को समय- असमय भुगतना पड़ा है. इसलिए हे दानवीरों... मां भारती के लालों...रात को नौ बजे कछुआ छाप मच्छर अगरबत्ती से लेकर कपूर, लोभान, हेलोजन सब कुछ जला लेना... मगर देश को अंधेरे में डूबने से बचा सकते हो तो बचा लेना ? 

गर्मी का मौसम है और लॉकडाउन की वजह से हालत पस्त है. उम्मीद करता हूं कि खुद भी गर्मी में नहीं सड़ोंगे और हम लोगों को भी सड़ने का मौका नहीं दोंगे. और हां... रात को नौ बजकर नौ मिनट के बाद दांतों-तले ऊंगली दबा लेने वाले मुहावरे को चरितार्थ करने वाली तस्वीरें और वीडियो शेयर करना मत भूलना. हम लोगों के मनोरंजन का ख्याल रखना भी आप सबका कर्तव्य है. एक बात और...दीया-बत्ती का खेल खेलने के बाद यह भी चेक कर लेना कि मंगलू, समारू और दुकालू के घर चूल्हा जला था या नहीं ?

- राजकुमार सोनी  पांच अप्रैल 2020

 

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उत्सवधर्मी प्रधानमंत्री

छत्तीसगढ़ सरकार के राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा इस लेख में नरेंद्र मोदी द्वारा मनाए जाने वाले उत्सव के बीच सुगबुगाते हुए कई सवाल खड़े करते हैं.

वे प्रधानमंत्री हैं. देश के कर्ताधर्ता हैं. उन्हें देश चलाना चाहिए. वे जैसे तैसे चला भी रहे हैं. लेकिन साफ़ दिख रहा है कि ऐसे संकट के समय में भी वे राजनीति कर रहे हैं.

 

वे बार बार यह साबित करना चाहते हैं कि लोग उनके कहे पर ताली और थाली बजा सकते हैं. लोग उनके कहने पर पांच अप्रैल को रात नौ बजे दिए और मोमबत्तियां भी जलाएंगे. उनको लगता है कि वे इस तरह के आव्हान से इतिहास में दर्ज होते जाएंगे. गांधी ने कहा, करो या मरो. देश ने माना और आज़ादी का रास्ता खुला. नेहरू जी ने कहा कि आराम हराम है और देश नवनिर्माण में लग गया. शास्त्री ने कहा, जय जवान जय किसान और अपील की कि देश के लिए एक जून उपवास करो तो देश ने लंबे समय तक पालन किया. वे इसी तरह से इतिहास में दर्ज होना चाहते हैं. अपनी समझ भर का प्रयोग वे भी कर रहे हैं. उन्होंने ताली-थाली बजवाकर देख लिया. वे यह जानबूझकर अनदेखा कर गए कि ताली-थाली बजनी तो डॉक्टरों, चिकित्साकर्मियों और कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ रहे लोगों के लिए थी लेकिन भक्तगण मोदी के लिए ताली-थाली बजाते रहे. वह गो कोरोना गो हो गया. हासिल क्या हुआ? कुछ नहीं.

अब पांच अप्रैल को रात नौ बजे सबको अपने घरों में दिया या मोमबत्ती या टॉर्च जलाना है. नौ मिनट तक. मोदी जी की जय-जयकार. उनकी धमक की चर्चा होगी. बार- बार आपको बताया जाएगा कि देखिए उनके एक आव्हान पर देश कैसे एकजुट होता है. हासिल क्या होगा? कुछ नहीं.

कुछ मूर्खों की चर्चा व्हाट्सऐप पर चलती रहेगी कि ध्वनि से कोरोना मरेगा, रोशनी से कोरोना मरेगा. मोदी जी ने सोच समझकर कुछ किया है. नासा के वैज्ञानिक भी ऐसा कह रहे हैं. आदि आदि.

लेकिन कोरोना से लड़ाई में हम कौन सी मंज़िल हासिल कर लेंगे? कुछ नहीं.

आप चतुराई देखिए कि मोदी जी ऐसा कोई आव्हान नहीं करते जिसका असर को आप भांप या नाप सकें. जैसे उन्होंने कभी ये नहीं कहा कि उद्योगपति और व्यावसायी मज़दूरों को लॉक-डाउन के दौरान तनख्वाह देते रहें. मकान मालिकों से नहीं कहा कि वे किराया न मिलने पर भी ग़रीबों और मज़दूरों को न निकालें. उन्होंने ऐसा कोई आव्हान नहीं किया जिसे लोग नहीं मानेंगे. लाखों मज़दूर पैदल अपने घर जाने के लिए निकल पड़ते हैं, वे चुप रहते हैं. एक आयोजन की वजह से (जो कि सिरे से ग़लत था) देश में सांप्रदायिता का ज़हर फैलाया जाता है, वे चुप रहते हैं. देश के अलग अलग हिस्सों से भूख और पीड़ा की कहानियां आती हैं, वे चुप रहते हैं. उन्हें न नोटबंदी के समय ग़रीबों की पीड़ा समझ में आई थी न अब आ रही है. वे किसानों का दर्द महसूस ही नहीं करते.

वे देश को संबोधित करते हुए यह नहीं बताते कि देश में कोरोना से लड़ाई की कितनी तैयारी हो चुकी है. ग़रीबों को भोजन कैसे मिलेगा? बेरोज़गार किस तरह से अपने दिन काटेगा? अस्पतालों का क्या हाल है? 

टेस्ट क्यों नहीं हो रहे हैं? डॉक्टरों को सुरक्षित क्यों नहीं किया जा रहा है? वे चुप रहते हैं.

वे उत्सवजीवी हैं. वे उत्सव का आडंबर खड़ा कर सकते हैं. वे जानते हैं कि भारत की जनता उनकी वही बात मान सकती है जिसमें जेब से एक पैसा न खर्च होता हो. जिससे किसी का हित प्रभावित न होता हो. ताली- थाली भी उत्सव था और दिया जलाना भी उत्सव है. एकजुटता के नाम पर. देशहित के नारे पर. वे एक ऐसे तमाशबीन में बदल चुके हैं जो हर दिन एक नया तमाशा खड़ा कर सकता है और मुद्दे की हर बात को नज़र बचाकर हाशिए पर डाल सकता है.

जैसा नीरो के लिए कहा जाता है कि जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसी बजा रहा था. वैसे ही आने वाले दिनों में लिखा जाएगा कि जब भारत कोरोना से लड़ रहा था तो नरेंद्र मोदी उत्सव मना रहा था.

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हल के फालों को गलाकर तलवार बना लेने का समय

भय और निराशा के खतरनाक दौर में जनसंपर्क विभाग के आयुक्त तारन प्रकाश सिन्हा की यह टिप्पणी कम संसाधनों से भी मुठभेड़ करने की प्रेरणा देती है. इस टिप्पणी को पढ़कर एक गीत बरबस याद आ जाता है- हम लोगों को समझ सको तो समझो दिलबर जॉनी... जितना हमको समझोगे उतनी होगी हैरानी... क्योंकि दिल है हिन्दुस्तानी.

जब युद्ध की परिस्थितियां हों तब हल के फालों को गलाकर तलवारें ढाल लेनी चाहिए.

देश इस समय यही कर रहा है. 

आटो मोबाइल सेक्टर की नामवर कंपनी महिंद्रा और महिंद्रा अब वैंटिलेटर्स के निर्माण के लिए आगे आ रही है. और खबरों के मुताबिक वह चार-पांच लाख रुपए के वैंटिलेटर्स साढ़े 7 हजार रुपए से भी कम कीमत पर उपलब्ध कराने की तैयारी में है.

भारत में कोरोना वायरस को बड़ा खतरा इसलिए भी माना जा रहा था क्योंकि यहां संक्रमितों की संभावित संख्या की तुलना में वेंटिलेटर्स की संख्या बहुत कम है. महिंद्रा की पेशकश ने इस खतरे को न केवल कम कर दिया, बल्कि इस युद्ध को भी आसान कर दिया है.

अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए पलंग से लेकर सैनेटाइजर जैसे सामान कम न पड़े, इसके लिए रेलवे ने भी कमर कस रखी है. रेलवे ने अपने कई प्रोडक्शन इकाइयों को मेडिकल संबंधी सामान बनाने का आदेश जारी कर रखा है. खबर यह भी है कि कई वातानुकूलित ट्रेनों को भी अस्पतालों में तब्दील करने के बारे में विचार किया जा रहा है, यह इनोवेटिव आइडिया रेलवे को आमलोगों से ही मिला था.

कोरोना से रक्षा के लिए जब सेनेटाइजर्स कम पड़ने लगे तब शराब का उत्पादन करने वाली डिस्टिलरियों ने सेनेटाइजर्स का उत्पादन शुरू कर दिया. मास्क की कमी को दूर करने के लिए गांव-गांव में स्व सहायता समूह की महिलाएं अपनी सिलाई मशीनें लेकर जुट गईं.

संक्रमितों की जांच के लिए जब महंगे विदेशी किटों की उपलब्धता रोड़ा बनी तब पुणे के माईलैब डिस्कवरी साल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की देसी संस्था ने सस्ता किट तैयार कर दिखाया. इससे मरीजों की जांच अब एक-डेढ़ हजार रुपए में भी हो सकेगी, जिस पर पहले चार-पांच हजार रुपए तक खर्च हो जाया करते थे. भारत की यह उपलब्धि भी किसी मंगल मिशन से कम नहीं है।

इस तरह के उदाहरणों का लंबा सिलसिला है. 

हम वो लोग हैं जो पुड़ियों के लिए गर्म हो रहे तेल से राकेट साइंस सीख लेने की योग्यता रखते हैं. 

- तारन प्रकाश सिन्हा

 

 

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चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय... चड्डी गैंग परेशान !

राजकुमार सोनी

छत्तीसगढ़ में भाजपा शासनकाल में स्थापित पत्रकारिता विश्वविद्यालय को चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर किए जाने से चड्डी गैंग परेशान हो गया है. इस गैंग से जुड़े कथित राष्ट्रवादी चिंतक अलग-अलग स्तर पर मंथन कर रहे हैं. उनकी कोशिश है कि इस मामले को एक खास तरह का रंग देकर राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बना दिया जाय. गैंग से जुड़े एक सदस्य ने हाल ही में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखा है. यह पत्र वंदन... चंदन... अभिनंदन... शुभ प्रभातम... और विषय है तो विषय क्यों है जैसी प्राचीन भाषा के साथ सोशल मीडिया पर विचरण कर रहा है. ( प्रगतिशील लेखकों का एक बड़ा वर्ग चड्डियों को कुछ इसी तरह की भाषा से जानता-समझता है. जैसे ही मुंह खोले और विषय-सिषय जैसे शब्दों की बौछार हुई तो समझ लीजिए सामने वाला मामूली कार्यकर्ता नहीं बल्कि भक्ति युग का शेयर होल्डर है. )

गैंग के सदस्य ने अपने पत्र में साफ तौर पर यह माना है कि चंदूलाल चंद्राकर छत्तीसगढ़ के माटीपुत्र थे और पत्रकारिता में उनका जबरदस्त योगदान था. गैंग के कर्ताधर्ता ने यह नहीं बताया कि कुशाभाऊ ठाकरे जिनके नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय खोला गया था वे पत्रकार थे भी या नहीं? सदस्य ने लिखा है- कुशाभाऊ ठाकरे एक सात्विक वृत्ति के नेता थे और उन्होंने छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सेवा की थीं. सदस्य ने अपने पत्र के जरिए मुख्यमंत्री को डराने ( चेतावनी भी बोल सकते हैं ) की चेष्टा भी की है. वे फरमाते हैं- सत्ता हमेशा के लिए नहीं होती. काल के प्रवाह में पांच साल कुछ नहीं होते. कल अगर कोई अन्य दल सत्ता में आकर चंदूलाल चंद्राकर का नाम का इस विश्वविद्यालय से हटा देगा तब क्या होगा ? जो विश्वविद्यालय लंबे समय से एक खास दल की राजनीतिक विचारधारा को पोषित करने का केंद्र बना हुआ था उसका नाम बदले जाने से हैरान और परेशान सदस्य ने आगे लिखा है- शिक्षा परिसरों को राजनीति का अखाड़ा बनाना एक तरह का अपराध ही है. ( गोया... अब तक वहां भजन संध्या का कार्यक्रम चल रहा था. ) सदस्य ने कहा है- अगर कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम छत्तीसगढ़ के कुछ पत्रकारों के कहने पर बदला गया है तो वे देशभर के संपादकों से लेटर लिखवाकर भिजवा सकते हैं कि नाम मत बदलिए.

खैर... यह तो हुई गैंग के एक सदस्य की बात जिन्हें नहीं मालूम कि देश में अब संपादक नाम की कोई वैधानिक संस्था बची नहीं है. इधर जब से सोशल मीडिया का दौर आया है तब से यह जानना भी बड़ा आसान हो गया है कि कौन किसका भक्त है. कौन देशभक्त है और कौन अंधभक्त है. मान्यवर को यह बताना ठीक होगा कि अब संस्थानों में गणेशकंर विद्यार्थी नहीं बल्कि पार्टी के कार्यकर्ता काम करते हैं. संपादक... एक दलाल से अधिक कुछ नहीं होते. 

एक मैग्जीन के इस मूर्धन्य संपादक ने यह भी उल्लेखित किया है- चूंकि कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में कुशाभाऊ जी की मूर्ति स्थापित है इसलिए किसी भी कीमत पर विश्वविद्यालय का नाम बदल देना ठीक नहीं होगा. मूर्धन्य संपादक को शायद यह नहीं मालूम है कि छत्तीसगढ़ में यह परिपाटी भाजपा के शासनकाल में ही प्रारंभ हुई थी. भिलाई के खुर्सीपार में राजीव गांधी के नाम एक स्टेडियम बनाया गया था. इस स्टेडियम में राजीव गांधी की प्रतिमा भी स्थापित हो चुकी थीं, लेकिन बावजूद इसके स्टेडियम का नाम दीनदयाल उपाध्याय खेल परिसर कर दिया गया. ऐसे और भी कई उदाहरण है. इसकी सूची काफी लंबी है. संपादक जी को समझना चाहिए कि जब बोया बीज बबूल का तो... फल कहां से होय... मुहावरा इसलिए उपयोग में लाया जाता है.

अब सुनिए गैंग के दूसरे सदस्य की गुहार जो एक वाट्सअप ग्रुप में चल रही है- सदस्य ने लिखा है- कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम बदले जाने पर अगर सोशल मीडिया में कोई मुहिम चलानी है तो हमें संगठित होकर लड़ना होगा. अक्सर देखा गया है कि जब हम लोग ज्वलंत विषय पर लिखते हैं तो न तो हमारी पोस्ट को लोग लाइक करते हैं और न ही कमेंट करते हैं जबकि कांग्रेसी संगठित होकर पूरी पोस्ट पर रायता फैला देते हैं. 

( सदस्य के भीतर यह डर समाया हुआ है कि अगर मुखरता से बात नहीं उठी तो फजीहत हो जाएगी. )

एक तीसरे सदस्य के विचार सर्वोत्तम डाइजेस्ट में छपने वाले विचार की तरह है- अगर हमें इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाना है तो व्यवस्थित होकर भिंड़ना समीचीन होगा. जिन राज्यों में हमारी सरकार है, विरोध की सारी गतिविधि वहीं से शुरू करनी होगी. इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व का दिशा-निर्देश लेना भी समीचीन होगा.

(  बड़े दिनों के बाद यह समीचीन शब्द सुनाई पड़ा. सवाल यह भी है कि कौन सा केंद्रीय नेतृत्व ? पर्दे के पीछे का असली केएन सिंग कौन है ? )

चौथे सदस्य का दर्द देखिए- यह विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर चोट है. बताइए अब सरकार करेगी कुलपति की नियुक्ति और उसको हटाने की कार्रवाई. यह तो हद है.

एक अन्य सदस्य ने खोजी पत्रकारिता को महत्वपूर्ण मानते हुए लिखा है- सबसे पहले हमें कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का अध्यादेश प्राप्त करना चाहिए. इस विश्वविद्यालय का अलग ही अध्यादेश है. विश्वविद्यालय के नाम परिवर्तन का कोई प्रस्ताव विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की अनुमति से ही भेजा जा सकता है. जब उच्च शिक्षा मंत्री संक्षेपिका तैयार कर लेंगे तब मंत्रिपरिषद को भेजा जाएगा. विधानसभा में संशोधन के साथ अध्यादेश लाया जाएगा. हमें डिटेल जानकारी लेनी होगी कि कब क्या-क्या हुआ.

एक महामानव की राय है- हमारे देश में जितने भी विश्वविद्यालय कांग्रेस नेताओं के नाम पर है उसका भी डाटा तैयार करना चाहिए. क्या सरकार बदलते ही नाम बदला जा सकता है ?

एक सदस्य ने कानूनी दांव-पेंच पर जोर देते हुए लिखा है- मुझे पता चला है कि प्रदेश के कुछ पत्रकारों ने मुख्यमंत्री और उच्चशिक्षा मंत्री को विश्वविद्यालय का नाम बदलने के लिए ज्ञापन दिया था. इस ज्ञापन में कहा गया था कि कुशाभाऊ ठाकरे का पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं था. मुझे लगता है हमें इसकी भी तोड़ निकालनी चाहिए. हमें जल्द से जल्द स्टे लेने के बारे में कोई योजना बनानी चाहिए. लिखने वाले ने प्रदेश के पत्रकारों को आड़े हाथों लेते हुए यह भी लिख मारा है कि जिन पत्रकारों ने नाम बदलने के लिए ज्ञापन दिया है उनमें से ज्यादातर वामपंथी होंगे. अगर उन पत्रकारों का नाम मिल जाए तो हम उनका प्रोपगंड़ा भी एक्सपोज कर सकते हैं.

( अगर कल कोई पत्रकार कोरोना को छोड़कर इधर-उधर की अफवाह या साजिश का शिकार होता है तो इसे चड्डी गैंग का ही कारनामा मानना ज्यादा बेहतर होगा. आरोप कुछ भी हो सकते हैं. मसलन पत्रकार चरित्रहीन है. शराब पीता है. खूब कमा रहा है. हेलीकाफ्टर में घुमता ही नहीं... अब तो हेलीकाफ्टर भी खरीद लिया है. किराए पर चलाता है. वगैरह... वगैरह... )

सदस्य की यह भी राय है कि हमें न्यायालय में जनहित याचिका विश्वविद्यालय के किसी पूर्व छात्र या छात्रा से ही लगवानी चाहिए. एक बड़े नेता ने तो यह तक ऐलान कर दिया है कि अगर दोबारा भाजपा की सरकार आई तो छत्तीसगढ़ में किसी भी संस्थान का नाम नेहरू और गांधी के नाम पर नहीं होगा.

राष्ट्रवादी चिंतकों की आगे क्या प्लानिंग है इसका खुलासा हम धीरे-धीरे करते रहेंगे.

बहरहाल सरकार ने पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम जिस चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर किया है उनके बारे में हम अपने पाठकों को बताना चाहेंगे.

छत्तीसगढ़ की माटी में जन्मे चंदूलाल चंद्राकर राजनीति में आने से पहले एक सक्रिय पत्रकार थे. वर्ष 1945 से ही उनकी पहचान एक राष्ट्रीय पत्रकार के तौर पर होने लगी थीं. उनके समाचार हिंदुस्तान टाइम्स में छपा करते थे. उन्होंने कांग्रेस के पहले अधिवेशन की रिपोर्टिंग की थी. यह अधिवेशन बंबई में हुआ था. उन्हें महात्मा गांधी भी बेहद पसंद करते थे. खेलकूद की रिपोर्टिंग में उनकी विशेष रुचि थीं. उन्हें नौ ओलंपिक खेलों और तीन एशियाई खेलों की रिपोर्टिंग का अनुभव रहा है. वे राष्ट्रीय हिंदुस्तान टाइम्स में पहले संवाददाता थे. बाद में इसी अखबार के संपादक बने. एक सम्मानजनक पद पर पहुंचने वाले छत्तीसगढ़ से वे पहले व्यक्ति थे. उन्हें युद्ध की रिपोर्टिंग का भी अच्छा-खासा अनुभव था. एक पत्रकार के रुप में उन्होंने कई देशों की यात्रा भी थी. अगर चंदूलाल चंद्राकर छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण सर्वदलीय मंच का गठन कर आंदोलन नहीं छेड़ते तो शायद ही कभी छत्तीसगढ़ का निर्माण हो पाता.

छत्तीसगढ़ सरकार उनके सम्मान में पत्रकारिता पुरस्कार भी प्रदान करती है. इस खबर के लेखक ने भी वर्ष 2005 में यह पुरस्कार इसलिए स्वीकार किया था कि क्योंकि वह पत्रकारिता के अग्रह, पितामह और स्वतंत्रता सेनानी चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर था. कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम अगर अब चंदूलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय कर दिया गया है तो यह ठीक ही किया गया है. कुछ भूल केवल भूल होती है. इन भूलों को झाड़ते रहने और उनके ऐतिहासिक होने से रोक लगा देने में ही भलाई निहित होती है. ऐसा करना एक अच्छी सरकार का दायित्व भी होता है. अब विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच अगर पत्रकारिता की जिम्मेदारी का बीज रोपा जाएगा तो इसे अच्छी शुरूआत मानकर आगे बढ़ना ठीक होगा. इस मामले में एक तथ्य और है कि जब भाजपा सरकार ने कुशाभाऊ ठाकरे के नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय को खोले जाने की बात की थीं तब संघ की विचारधारा से जुड़े एक मूर्धन्य संपादक ने ही जबरदस्त विरोध किया था. इस संपादक का कहना था- वर्ष 1980-81 में युगधर्म अखबार बंद होने के कगार पर आ गया तो उन्होंने कुशाभाऊ ठाकरे से सहायता के लिए गुहार लगाई थीं, लेकिन ठाकरे ने आर्थिक सहायता देने इंकार कर दिया था. अगर कुशाभाऊ चाहते तो अखबार को बंद होने से बचाया जा सकता था.

अब जरा सोचिए... उन छात्र-छात्राओं के बारे में जो कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं या पढ़ते रहे हैं. विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए आने वाले छात्रों ने क्या यह जानने की कवायद नहीं की होगी कि कुशाभाऊ ठाकरे कौन थे? विश्वविद्यालय में कार्यरत एक प्राध्यापक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा- छात्र-छात्राओं ने कई मर्तबा यह जानने की कवायद की है कि ठाकरे जी का पत्रकारिता में क्या योगदान था ? हम बार-बार यहीं बोलकर खामोश हो जाते हैं- समाज में हर व्यक्ति का योगदान होता है.वे छत्तीसगढ़ के नहीं थे,लेकिन छत्तीसगढ़ आते-जाते रहते थे.

चंदूलाल चंद्राकर छत्तीसगढ़ के ही थे... इसलिए राजनीति के गलियारों में इस बात को लेकर भी बहस प्रारंभ हो गई है कि जब-जब स्थानीय स्तर पर किसी पुरखे या छत्तीसगढ़ी व्यक्ति के सम्मान की बात आती है तो देश को अलग-थलग बांटने लोग विरोध क्यों प्रारंभ कर देते हैं ? ऐसे लोगों को किसी ठेठ छत्तीसगढ़िया को सम्मान देना रास क्यों नहीं आता है? क्या छत्तीसगढ़ में पैदा होना... छत्तीसगढ़िया होना अपराध है? 

 

 

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याद रखिए संपादक जी... क्रांतिकारी कभी बूढ़ा नहीं होता है.... और हां...कभी मरता भी नहीं है.

राजकुमार सोनी

प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और दमन के खिलाफ अनेक जनआंदोलन की अगुवाई करने वाले लाखन सिंह भले ही एक काया के तौर पर इस दुनिया का हिस्सा नहीं है, लेकिन उनकी मौजूदगी हर समय विद्यमान रहने वाली है. कभी वे बिलासपुर के नेहरू चौक में नजर आएंगे तो कभी रायपुर के बूढ़ातालाब के पास... तो कभी बस्तर में आदिवासियों के साथ.निजी तौर पर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि वे इस दुनिया से कूच कर गए हैं. इस देश के तमाम चड्डीधारी लाख कोशिश कर लें, लेकिन न तो वे इतिहास को फांसी पर लटका पाएंगे और न ही उनकी दिली ख्वाहिश से विचारधारा की मौत होने वाली है. दोस्तों... क्रांतिकारियों की मौत कभी नहीं होती. क्रांतिकारी कभी नहीं मरते.

लाखन सिंह...जिन्हें हम सब लाखन भाई कहते थे, उनसे मेरा पहला परिचय कब और किस दिन हुआ यह बताना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन मुझे याद है कि जब तहलका में था तब मैंने एक खबर के सिलसिले में वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल से नंबर लेकर उन्हें फोन किया था. एक खबर के लिए महज एक छोटी सी जानकारी हासिल करने का मामला धीरे-धीरे एक दूसरे तरह के रिश्ते में बदल गया. वे एक पत्रकार की पसन्द बन गए. ( हालांकि वे जनसरोकार से जुड़ी खबरों पर काम करने वाले हर पत्रकार की पहली पसंद थे. ) मुझे किसी भी खबर में कुछ पूछना होता तो उन्हें आवश्यक रुप से याद करता था. सामान्य तौर पर अखबार में काम करने वाले संवाददाताओं को मालिक और उनके द्वारा नियुक्त किए गए चिरकुट संपादक समय-समय पर हिदायत देते रहते हैं- देखिए ज्यादा... रिश्ते मत बनाइए... प्रोफेशनल रहिए... अखबार को जितनी जरूरत है उतनी बात करिए... लेकिन मैं मालिक और चड्डीधारी संपादक की परवाह किए बगैर उनसे बात करता था और लगातार बात करता था.

कथित मुख्यधारा की पत्रकारिता के अंतिम दिनों में संघ की विचारधारा को बीज-खाद और पानी देकर पोषित करने वाले जिस अखबार में फंसा हुआ था वहां एक स्थानीय संपादक को लाखन भाई से खास तरह की चिढ़ थीं. जब भी लाखन भाई का नाम खबर में लेता वे सीधे-सीधे कहते- यार... किस काम का यह वर्शन. अखबार को दो पैसे का फायदा मिले...यह देख-समझकर काम करना चाहिए. इस बूढ़े क्रांतिकारी का पक्ष छापकर क्या मिलेगा. मेरा जवाब होता- बेशक आप उनका पक्ष हटा सकते हैं, लेकिन संपादक जी आपको यह तो पता होना चाहिए कि एक क्रांतिकारी कभी बूढ़ा नहीं होता. आप इस क्रांतिकारी को ठीक से जानते नहीं है. क्या आप एक बार भी पूरे दिन तेज गरमी में तख्ती लेकर किसी चौक में खड़े हो सकते हैं? संपादक कहते- मैं क्यों खड़ा रहूंगा. यह मेरा काम नहीं है. मैं उनसे पूछता- एक अखबार में जनसरोकार से जुड़ी खबरों को पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए... इस सिद्धांत तो आप जानते ही होंगे. अखबार में काम करने वाले संपादक और उसके रिपोर्टर को किसके पक्ष में खड़े रहना है इसकी सामान्य जानकारी भी आपके पास होगी ही, लेकिन क्या आप ऐसा कर पा रहे हैं ? बस... संपादक जी का आखिर वाक्य होता- यार... मुझसे बहस मत करो.

बावजूद इसके लड़-भिंडकर मैं लाखन भाई ( उनके विचारों के लिए ) गुंजाइश निकालता रहा. डाक्टर रमन सिंह के शासनकाल में जब बस्तर एक बड़े हिस्से में निर्दोष आदिवासियों पर अत्याचार बढ़ा तब लाखन भाई शालिनी गेरा, प्रियंका शुक्ला सहित बस्तर की आदिवासी बच्चियों के साथ अक्सर रायपुर आते थे. कभी वे प्रेस कांफ्रेन्स करते तो कभी सीधे मुझसे मिलने अखबार के दफ्तर चले आते. उन्हें देखते ही विचार और कद से ठिगनु स्थानीय संपादक का पारा चढ़ जाता. वे फूं-फां- फूं-फा करने लगते. नाक-भौ सिकुड़ने लगते. ( अब संघ के दफ्तर में तब्दील हो चुके अखबार के दफ्तर में कोई क्रांतिकारी पहुंच जाएगा तो फूं-फां झूं-झा का होना स्वाभाविक ही था. )

धीरे-धीरे लाखन भाई छपना बंद हो गए. मुझे  राजनीति/ प्रशासन/ आदिवासी इलाकों की बीट को देखने से रोक दिया गया. मैं सांस्कृतिक खबरों को कव्हरेज करने लगा था. एक रोज लाखन भाई ने मुझे बताया कि मैं जिस अखबार के लिए काम करता हूं उसके बिलासपुर संस्करण ने भी आंदोलन की खबरों को छापना बंद कर दिया है. मैंने लाखन भाई को बताया वहां का संपादक भी मोदी का परम भक्त है. बात-बात में लघुत्तम-सर्वोत्तम, घटोत्तम-चट्टोत्तम और अतिउत्तम करते रहता है. चिंता करने की कोई बात इसलिए नहीं है क्योंकि ढंग से पढ़ने-लिखने वाला कोई भी शख्स उसे गंभीरता से नहीं लेता है. आप भी मत लीजिए. केवल फिल्मों मेंं ही नहीं पत्रकारिता मेंं भी बहुत से लोग उदय चोपड़ा होते हैं.

ऐसा क्या ? बोलकर लाखन भाई मेरी बात से सहमत हो गए और फिर धीरे से  सीजी बास्केट को लांच करने की योजना बनी. खबरों की इस बास्केट को लांच करने का एक मकसद ही यहीं था कि भाजपा के शासनकाल में जनआंदोलन से जुड़ी खबरों को बुरी तरह से दबाया जा रहा था. अब मेरे द्वारा जो कुछ भी लिखा जाता उसे वे सीजी बास्केट में अवश्य छापते. जब तबादले में कोयम्बटूर भेजा गया तब भी वक्त निकालकर मैं उनके सीजी बास्केट के लिए खबरें लिखता रहा. मेरी खबरों में वे मेरा नाम लिखते थे- विक्रम वरदराजन. विधानसभा चुनाव के रिजल्ट से कुछ पहले मैंने उन्हें खबर भेजी कि भाजपा 15 से 20 सीटों पर सिमट जाएंगी. उन्होंने फोन किया और कारण जानना चाहा. मैंने भी हंसते हुए कहा-क्या लाखन भाई... आज तक विक्रम वरदराजन की कोई रिपोर्ट झूठी निकली है क्या ?

उनसे साथ अपने रिश्तों के सैकड़ों किस्से याद आ रहे हैं. अभी लगभग दो-तीन महीने पहले मैं उनके और जीएसएस के सुबोध भाई के साथ छत्तीसगढ़ी फिल्मों के सामने चुनौतियां विषय पर आयोजित की गई एक गोष्ठी का हिस्सा था. इस गोष्ठी में गरमा-गरम बहस के कुछ दिनों बाद ही वे ही सुबोध जी के साथ मेरे निवास आए. उनके साथ अनुज भी था. हम सब पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म का निर्माण करने वाले मनुनायक जी को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जी से मिलने गए थे. मुख्यमंत्री बघेल एक घरेलू टी-शर्ट पहनकर बैठे थे. उसी टी-शर्ट में उन्होंने फोटो भी खिंचवा ली. उनका ठेठ छत्तीसगढ़ियां अंदाज देखकर वे बहुत खुश हुए और जब लौटे तो आग्रह किया कि कुछ ठेठ अदांज में सीजी बास्केट के लिए मनु नायक जी का एक इंटरव्यूह कर लूं. मैं उनके आदेश और आग्रह को ठुकराने की स्थिति में कभी नहीं रहा. मैंने यह इंटरव्यूह किया. 

बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें देखकर आप खुश हो पाते हैं. जब भी कोई आयोजन हो... आंदोलन हो... लाखन भाई को देखते ही खुश हो जाता था. पतली-दुबली काया... पैरों में मामूली सी चप्पल, सफेद बाल और जानलेवा दमे के बावजूद  हंसता हुआ उनका चेहरा रह-रहकर याद आ रहा है. इस चेहरे के साथ आलोक शुक्ला, प्रियंका, अनुज, रोशनी, ईशा खंडेलवाल, शालिनी गेरा, लता, श्रेया, निकिता सहित उन्हें चाहने वाले हजारों-हजार नौजवानों का साथ भी याद आ रहा है. मुझे नहीं लगता कि उन्हें चाहने वाले उन्हें यूं ही कभी खारिज होने देंगे. नौजवान साथी उन्हें सबसे ज्यादा पसंद करते थे. रात हो बिरात हो... चाय पीनी हो, काफी पीनी हो... कोई बात हो... लाखन भाई... लाखन भाई... लाखन भाई... बस लाखन भाई... । याद रखिए संपादक जी... जो क्रांतिकारी बच्चों और नौजवानों के बीच मौजूद होता है वह कभी बूढ़ा नहीं होता है.... और हां... कभी मरता भी नहीं है. आपके अखबार में जगह नहीं देने से क्या घंटा होता ?

 

 

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अगर लोगों का ध्यान मोदी से हटकर संगीत की तरफ चला गया तब क्या होगा ?

जब हमने सेक्सोफोन की दुनिया कार्यक्रम के बारे में सोचा तब बहुत से पत्रकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों और नवाचार का विरोध करने वाले लकीर के फकीर मठाधीशों को यह लगा था कि ज्यादे से ज्यादा क्या होगा कार्यक्रम में ? नाच- गाना होगा या सेक्सोफोन पर बजने वाली वे सब धुनें सुनाई जाएगी जो शादी और बर्थडे पार्टियों में बजाई जाती है. लेकिन ऐसा नहीं था. इस खास आयोजन में सेक्सोफोन एक नायक था. इस नायक के जरिए यह बताने की कोशिश की गई कि सेक्सोफोन की कहानी दुखभरी है, लेकिन किसी समय इसी सेक्सोफोन ने एक हथियार की शक्ल लेकर बुर्जुआ समाज और खोखले आडंबर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. यहां हम अपने समझदार और सुधि पाठकों की मांग पर देश के सुप्रसिद्ध कथाकार मनोज रुपड़ा का वह लेख पेश कर रहे हैं जिसकी चर्चा अब भी बनी हुई है. इस लेख को मनोज रुपड़ा ने खास तौर पर सेक्सोफोन की दुनिया कार्यक्रम के लिए लिखा था. इस लेख को पढ़ते हुए लगता है कि सेक्सोफोन की दुनिया यूं ही बड़ी नहीं है. इस वाद्ययंत्र में दुनिया के बड़े से बड़े तानाशाह की हुकूमत को चुनौती देने की हिम्मत बरकरार है. 

 

दोस्तों आप सब ने संगीत के कई कार्यक्रमों मे शिरकत की होगी ,जहां गाने –बजाने वाले अपनी प्रस्तुति देते हैं और सुनने वाले संगीत का आनंद लेते हैं, लेकिन  आज पहली बार ये हो रहा है कि हम सिर्फ संगीत सुनने नहीं आए है बल्कि एक वाद्य के बारे मे बात करने और उसकी कहानी सुनने भी आए हैं. मेरे जानते में शायद पहली बार किसी वाद्य पर चर्चा  हो रही है. हमने संगीतकारों को तो सम्मानित होते कई बार देखा है लेकिन आज एक  साज़ का सम्मान हो रहा  है. मैं राजकुमार सोनी का हम सब की तरफ से शुक्रिया अदा करता हूं इस बात के लिए कि उसने पहली बार किसी साज़ को वो इज्जत दी जिस इज्जत और एहतराम का वह साज हकदार था.

 जब राजकुमार के हवाले से सेक्सोफोन की दुनिया का जिक्र आया तो मैं फिर बरसों पुरानी यादों में खो गया कि सेक्सोफोन से मेरा परिचय कब हुआ और सेक्सोफोन की दुनिया कैसी थी. तो यहां दो बातें मैं बताना चाहता हूं. एक बात अपने व्यक्तिगत अनुभव की और दूसरी बात खुद उस सेक्सोफोन की जिसकी दुनिया बहुत बड़ी है और वह दुनिया इसलिए भी इतनी बड़ी है क्योंकि वह कई तत्वों से बनी है और उन तत्वों मे सबसे प्रमुख तत्व है उसकी अभिव्यंयक क्षमता उसके एक्स्प्रेशन की रेंज.

यह साज़ एक साथ कई एक्सप्रेशन की ताकत रखता है इसके स्वरों में कोमलता है उत्तेजना है. जुनून है. उन्मुक्तता और स्व्छंदता है. कामुक उत्तेजना है. आंसू है उदासी है और विद्रोह भी है.  तो ये जो इतने सारे एक्सप्रेशन की एफीनिटी इस साज़ में है , वो कहां से आई ? उसकी एक अलग कहानी है जो मैं आपको सुनाऊंगा.  

 पहले मैं ये बता दूं कि मैं सेक्सोफोन से कैसे जुड़ा. बात उन दिनों की  है जब मैं नौजवान था और अपने दोस्तों के साथ गोवा घूमने गया था. नौजवानी  की उस उम्र में आप जानते ही हैं कि हर किसी को रोमांटिक अनुभवों की तलाश रहती है. तो हम भी मस्ती भरे नाच गाने के लिए इस समुद्र का सफर करते रहे. हम पर गोवा की मदमाती मस्ती छा  गई और हम मस्ती में इतने चूर हो गए कि सब एक दूसरे को भुला बैठे. हमारी टोली बिखर गई. मैंने अपना सूटकेस उठाया और दोस्तों का ग्रुप छोड़कर अकेला निकल गया. मैं पणजी चला  गया और मेरा इरादा पणजी में एक दो दिन रुकने के बाद वापस लौटने का था. लेकिन अचानक एक पोस्टर पर मेरी नजर पड़ी मैंने देखा उस शहर में एक राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव चल रहा था.  मैंने वापसी स्थगित कर दी और नाटक देखने लगा.  वहां हबीब  साहब का नाटक था. कारांत साहब का नाटक था. रतन थियम और तलवार साहब और जालान साहब का नाटक था. तो एक दिन ये हुआ कि मैंने लगातार तीन नाटक देखे और उसका- मिला- जुला जो प्रभाव था वो मेरे अंदर कोई स्थायित्व न पा  सका, चीजें सब गड़बड़ हो गई.

मेरी तबीयत पर इतना बोझ पड़ गया कि थियेटर से निकलकर मैं सीधे समुद्र किनारे चला आया. मैं भटकते हुए एक रॉक  बीच पर चला गया.  वहां समुद्र किनारे चट्टानें थीं और उन चट्टानों की  कटी - फटी  दरारों से लहरें टकरा रही थी. मैं  कुछ देर लहरों के चट्टानों से टकराने की आवाज सुनता रहा.  फिर अचानक मुझे एक धुन सुनाई दी. मैंने सिर उठाकर देखा. एक आदमी एक चट्टान पर बैठा सेक्सोफोन बजा रहा था. मैं उसके पास गया और उस धुन को सुनने लगा. वह एक अमेरिकी हैप्पी था और वह किसी श्रोता को नहीं समुद्र को और डूबते हुए  हुए सूरज को अपनी धुन सुना रहा था. 

उस दिन पहली बार मैंने सेक्सोफोन को देखा , सूरज की डूबती किरणें उस साज़ पर पड़ रही थी. पहली बार मुझे लगा कि इस साज में समुद्र की अतल गहराइयों में उतारने ओर आसमान की बेनाप ऊंचाइयों में ले जाने की बेपनाह कुव्वत है. जब धुन पूरी हुई तो उस हिप्पी ने मुझे और मैंने उसे देखा और कुछ ही देर में मुझे लगा कि इस आदमी के साथ मेरी ट्यूनिंग हो जाएगी. हालांकि न मैं उसकी भाषा जानता था न वह मेरी भाषा लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती है , जहां भाषा की और शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती. संप्रेषणीयता अपना रास्ता खुद बना लेती है. फिर उस हिप्पी ने मुझे बताया कि  जो धुन अभी वह बाजा रहा था वह पेटेटेक्स नमक एक बड़े सेक्सोफोनिस्ट की धुन है । उस धुन का नाम था- डार्क क्लाउड एंड ब्लू सी.   

मैंने नाट्य समारोह में जाना छोड़ दिया.  सेक्सोफोन का नशा मेरे सिर पर सवार हो  गया था. मैं दो दिन तक  उस हिप्पी के साथ रहा. मैं सेक्सोफोन के बारे में बहुत कुछ जानना चाहता था लेकिन मेरे किसी भी सवाल का जवाब देने के बजाय वह सिर्फ  एक ही बात दोहराता था कि इस साज़ की  कहानी बहुत दुख भरी है तुम उसकी कहानी सुनने के बजाय सिर्फ उसकी आवाज सुनो. तो सेक्सोफोन के बारे में मेरी जो जिज्ञासा थी वह अधूरी रह गई.                               

बाद में जब मैं अपने कारोबार के सिलसिले में  बंबई गया तो घाटकोपर में जहां मेरी फैक्ट्री थी , उसके पीछे एक चाल थी और उस चाल में कुछ आर्टिस्ट रहते थे जो फिल्मों में बेकग्राउंड म्यूजिक देते थे. मेरा उनसे संपर्क हुआ तो मालूम हुआ कि उन साजिन्दों को  बहुत  गहरे संकट से गुजरना पड़ रहा है अब उन्हें काम मिलना बंद हो गया है. इसका कारण ये था कि फिल्म इंडस्ट्रीज में इलेक्ट्रानिक सिथेंसाइजर आ गया था और रिकार्डिंग की दुनिया में ऐसी डिजिटल  तकनीकें आ गई थी कि अब किसी भी तरह के जेनुइन म्यूजिकल इंस्टूमेंट की उन्हें जरूरत नहीं रह गई थी. वहां एक सेक्सोफोन प्लेयर भी रहता था और उसकी दुख भरी कहानी सुनने के बाद ही  साज़ –नासाज़ कहानी लिखने का विचार मेरे मन  में आया तो मैंने कहानी लिखी. इस कहानी के जरिए यह बताने की कोशिश कि हिन्दुस्तान की रूह को निखारने वाले और  इस देश की आत्मा को अपनी धुनों से संवारने वाले हमारे इन बेहतरीन कलाकारों की हालत क्या से क्या हो गई है.

 खैर...तो ये तो हो गई सेक्सोफोन से जुड़े मेरे व्यक्तिगत अनुभवों की बात अब सेक्सोफोन की दुनिया में चलते हैं  और उस साज़ के खुद के तर्जुबे की बात करते हैं, तब ये मामला समझ में आएगा कि क्यों वह हिप्पी मुझसे कहता था कि सेक्सोफोन की कहानी बहुत दुख भरी है.                                      

दोस्तों अब उस दुनिया में जाने से पहले हम उस शख्स को याद कर लेते हैं जिसने ये साज़ बनाया था.  इस साज को बेल्जियम के एडोल्फ सेक्स ने बनाया था जिसके पिता खुद वाद्य यंत्रों के निर्माता थे. सेक्स का बचपन बहुत त्रासद और नारकीय स्थितियों में गुजरा , जब वह पांच साल का था तो दूसरी मंजिल से गिर गयाऔर लगा कि अब वह बचेगा नहीं. इस हादसे में उसका पैर टूट गया फिर उसे खसरा हुआ और लंबे समय तक वह कमजोरी का शिकार रहा. उसकी मां ने एक बार ये कह दिया कि वह सिर्फ नाकामियों के लिए पैदा हुआ है. इस बात से दुखी होकर एडाल्फ सेक्स ने सल्फरिक एसिड के साथ खुद को जहर दे दिया. फिर कोमा में कुछ दिन गुजारे और कुछ सालों बाद वह शराब पीने लगा.

शराबनोशी की बेहद संगीन और शर्मनाक गर्त  में गिरने के बाद वह इन सब चीजों से उबरकर बाहर आया और उसके बाद उसने सेक्सोफोन बनाया, लेकिन सेक्सोफोन के इस अविष्कारक और उसके अविष्कार को शुरूआत में कोई मान्यता नहीं मिली.उस साज़ को किसी भी तरह के आरकेस्ट्रा में या सिंफनी में जगह नहीं मिली. अभिजात्य वर्ग ने उसे ठुकरा दिया, लेकिन सेक्सोफोन बजाने वालों ने उसे नहीं ठुकराया. वे उसे सड़कों पर और बदनाम इलाकों के नाइट क्लबों में बजाते रहे और उसे बजाने  वालों में अधिकांश जिप्सी थे और जिप्सियों के बारे में सभ्य समाज की राय बहुत अच्छी नहीं थी.

फिर एक समय ऐसा आया जब लेटिन अमेरिका के एक देश में एक जन विरोधी सरकार के खिलाफ लाखों लोगों का एक मार्च निकला. उस मार्च में पता नहीं कहां से  सेक्सोफोन बजाने वाले दो जिप्सी शामिल हो गए. भीड़ ने उन दोनों को हाथों-हाथ लिया और उन्हें अग्रिम मोर्चे पर भेज दिया. सेक्सोफोन बजाने वालों की अगुवाई में लाखों लोगों की भीड़ जब आगे बढ़ी तो तहलका मच गया. अभिजात्य वर्ग को सेक्सोफोन की असली ताकत तब समझ में आई. फिर तो ये सिलसिला बन गया. हर विरोध प्रदर्शन में जन आक्रोश को स्वर देने और उसकी रहनुमाई करने की जिम्मेदारी को सेक्सोफोन ने बखूबी निभाया. फिर उन्नीसवी सदी के प्रारंभ में जैज संगीत आया. जैज संगीत अफ्रीकी–अमेरिकी समुदायों के बीच से निकला था और उसकी जड़ें नीग्रो ब्लूज़ से जुड़ी हुई थी. जैज ने भी सेक्सोफोन को तहेदिल से अपनाया क्योंकि सेक्सोफोन चर्च की प्रार्थनाओं में ढल जाने वाला वाद्य नहीं था. उसकी आवाज में सत्ता को दहला देने की ताकत थी. खुद जैज अपने आप में एक विस्फोटक कला-रूप था ,  उसने अपनी शुरूआत से ही उग्र रूप अपनाया था. उसने थोपी हुई ईसाई नैतिकता और बुर्जुआ समाज के खोखले आडंबरों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. बहुत जल्द वो समय आ गया जब सत्ता और जैज आमने–सामने आ गए .सत्ता का दमन शुरू हो गया तो यूएसएआर में 1948 में सेक्सोफोन और जैज म्यूजिक पर प्रतिबंध लगा दिया गया. उसके ऊपर अभद्र असामाजिकऔर अराजक होने का आरोप था.

ठीक उसी तरह हिटलर के युग में जर्मनी में भी सेक्सोफोन और जैज पर  प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन हर तरह के दमन और अपमान जनक बेदखलियों के बावजूद सेक्सोफोन ने अपनी जिद नहीं छोड़ी क्योंकि वह एक बहुत हठीला जनवाद्य यंत्र है. आप सब को यह जानकार बहुत आश्चर्य होगा कि एक समय में जब जैज पर प्रतिबंध लगा था तब कुछ कलाकार घने जंगलों में जाकर छुप गए थे और वहां भी उन्होने कंसर्ट की थी. यह कंसर्ट ठीक उसी तरह थीं जैसे छापामार घने जंगलों में अपनी लड़ाई लड़ते हैं.                              

उसी समय की एक बात है. घूरी रंगया के जंगल में एक बार एक गुप्त कंसर्ट चल  रही थी. इस बात की भनक पुलिस को लग गई और वे दलबल के साथ जंगल की तरफ बढ़े लेकिन  वहां हजारों की तादाद में संगीत सुनने वाले मौजूद थे. पुलिस को यह उम्मीद नहीं थी कि शहर से इतनी दूर जंगल में लोग इतनी बड़ी तादाद में संगीत सुनने जाते होंगे. संगीत की लहरों में झूमते हुए लोगों पर हवाई फायर का भी जब कोई असर नहीं हुआ तो उन्हें बल प्रयोग करना पड़ा. भीड़ तितर-बितर हो गई.

संगीत भी बजना बंद हो गया लेकिन तभी एक सेक्सोफोन बजाने वाला एक बहुत ऊंचे पेड़ पर चढ़ गयाऔर वहां पेड़ के ऊपर सेक्सोफोन बजाने लगा. उसके इस बुलंद हौसले को देखकर पूरा जनसमूह फिर से जोश में आ गया. पुलिस ने भले ही पुलिस की वर्दी पहन रखी थी लेकिन आखिरकार तो वे भी इंसान थे.  तो हुआ ये कि उस धुन ने  पुलिस वालों  के दिलों को  भी अपने वश में कर लिया में  कर लिया और वे भी भाव विभोर हो गए.  

अब यहां एक सवाल ये हो सकता है कि  इन साजिंदों के वादन में ऐसी क्या खास बात थी जो सत्ता को नागवार लगती थी ? न तो ये संगीतकार किसी जन आंदोलन से जुड़े थे न ही उनकी कोई राजनैतिक विचारधारा थी. वे तो सिर्फ ऐसी धुनें रचते थे जो लोगों के दिलों पर छा जाती थी. प्रत्यक्ष रूप से वे किसी भी राजसत्ता का विरोध नहीं कर रहे थे , या उन्होने ये सोचकर संगीत नहीं रचा था कि किसी का विरोध करना है. दरअसल उनकी धुनों में ही कुछ ऐसी बात थी कि लोग दूसरी तमाम बातों को भुलाकर उनकी तरफ़ खींचे चले आते थे और बस सत्ता के लिए यही तो सबसे बड़ी दिक्कत थी. सत्ता नहीं चाहती थी कि इतना बाद जन समूह उनके राजनैतिक एजेंडे से विमुख होकर संगीत सुनने चला जाए.  वे यह देखकर जल-भून जाते थे कि उनके नेताओं के भाषण को सुनने के लिए जुटाई गई भीड़ संगीत की तरफ मुड़ गई है.                              

जरा अनुमान लगाइए कि अगर हिटलर पूरे  पूरे जोश-खरोश के साथ कहीं भाषण दे रहा है और लोग उसकी बातों से प्रभावित होकर हिटलर-हिटलर का जयकारा  कर रहे हैं और अचानक कहीं सेक्सोफोन बजने लगे और लोगों का ध्यान हिटलर से हटकर सेक्सोफोन की तरफ़ चला जाए तो क्या होगा ?

अब जरा ये भी अनुमान लगाइए कि आज जब पूरा देश मोदी मोदी- मोदी कर रहा है और हम यहां सेक्सोफोन पर कार्यक्रम कर रहे हैं. अब अगर हमारे इस संगीत कार्यक्रम के बाद  लोगों का ध्यान मोदी से हटकर संगीत की तरफ  चला गया तो क्या होगा ? 

 

मनोज रुपड़ा का दूरभाष नबंर है-   9823434231    

 

 

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अरे...रवीश कुमार ने तो रूला दिया

देश के प्रसिद्ध पत्रकार रवीश कुमार ने रेमन मैग्सेसे अवार्ड पाने के बाद अपने दर्शकों/ पाठकों और चाहने वालों के प्रति आभार जताया है. आभार पढ़कर रुलाई छूट जाती है.
आप भी रो लीजिए...कभी-कभी ऐसा रोना भी अच्छा लगता है.

आपका लिखा हुआ मिटाया नहीं जा रहा है। सहेजा भी नहीं जा रहा है। दो दशक से मेरा हिस्सा आपके बीच जाने किस किस रूप में गया होगा, आज वो सारा कुछ इन संदेशों में लौट कर आ गया है। जैसे महीनों यात्रा के बाद कोई बड़ी सी नाव लौट किनारे लौट आई हो। आपके हज़ारों मेसेज में लगता है कि मेरे कई साल लौट आए हैं। हर मेसेज में प्यार,आभार और ख़्याल भरा है। उनमें ख़ुद को धड़कता देख रहा हूं। जहां आपकी जान हो, वहां आप डिलिट का बटन कैसे दबा सकते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है कि किसी का मेसेज डिलिट नहीं हो रहा है। चाहता हूं मगर सभी को जवाब नहीं दे पा रहा हूं। 

व्हाट्स एप में सात हज़ार से अधिक लोगों ने अपना संदेशा भेजा है। सैंकड़ों ईमेल हैं। एस एम एस हैं। फेसबुक और ट्विटर पर कमेंट हैं। ऐसा लगता है कि आप सभी ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया है। कोई छोड़ ही नहीं रहा है और न मैं छुड़ा रहा हूं। रो नहीं रहा लेकिन कुछ बूंदे बाहर आकर कोर में बैठी हैं। नज़ारा देख रही हैं। बाहर नहीं आती हैं मगर भीतर भी नहीं जाती हैं। आप दर्शकों और पाठकों ने मुझे अपने कोर में इन बूंदों की तरह थामा है। 

आप सभी का प्यार भोर की हवा है। कभी-कभी होता है न, रात जा रही होती है, सुबह आ रही होती है। इसी वक्त में रात की गर्मी में नहाई हवा ठंडी होने लगती है। उसके पास आते ही आप उसके क़रीब जाने लगते हैं। पत्तों और फूलों की ख़ुश्बू को महसूस करने का यह सबसे अच्छा लम्हा होता है। भोर का वक्त बहुत छोटा होता है मगर यात्रा पर निकलने का सबसे मुकम्मल होता है। मैं कल से अपने जीवन के इसी लम्हे में हूं। भोर की हवा की तरह ठंडा हो गया हूं। 

मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। आस-पास मेरे जैसे ही लोग हैं। आपके ही जैसा मैं हूं। मेरी ख़ुशी आपकी है। मेरी ख़ुशियों के इतने पहरेदार हैं। निगेहबान हैं। मैं सलामत हूं आपकी स्मृतियों में। आपकी दुआओं में। आपकी प्रार्थनाओं में। आपने मुझे महफ़ूज़ किया है। आपके मेसेज का, आपकी मोहब्बत का शुक्रिया अदा नहीं किया जा सकता है। बस आपका हो जाया जा सकता है। मैं आप सभी को होकर रह गया हूं। बेख़ुद हूं। संभालिएगा मुझे। मैं आप सभी के पास अमानत की तरह हूं। उन्हें ऐसे किसी लम्हें में लौटाते रहिएगा। 

बधाई का शुक्रिया नहीं हो सकता है। आपने बधाई नहीं दी है, मेरा गाल सहलाया है। मेरे बालों में उंगलियां फेरी हैं। मेरी पीठ थपथपाई है।  मेरी कलाई दबाई है। आपने मुझे प्यार दिया है,मैं आपको प्यार देना चाहता हूं। आप सब बेहद प्यारे हैं। मेरे हैं।

( रवीश कुमार )

 

 

 

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मैं पत्रकार बोलूंगा...तुम रवीश कुमार समझना

रवीश कुमार को रेमन मैग्सेसे अवार्ड की घोषणा के साथ ही जनता को ऐसे लग रहा है जैसा उनका अपना कोई जीत गया है. जो जनता मोदी को उनकी कथित कलाबाजियों की वजह से पराजित नहीं कर पाई थीं वह रवीश कुमार को मैग्सेसे अवार्ड दिए जाने से खुद को जीता हुआ महसूस कर रही है.सोशल मीडिया में रवीश कुमार को बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है. तरह-तरह की प्रतिक्रिया आई है. किसी ने लिखा है- रवीश...तुमने दिल जीत लिया. किसी का कहना है-कमल का फूल पकड़कर पत्रकारिता का गला घोंटने वाले पत्रकारों...अब उस पत्रकार को अवार्ड मिला है जिसने कलम को पकड़कर पत्रकारिता के साथ-साथ हमारी उम्मीदों को जिंदा रखा.एक प्रतिक्रिया यह भी है- मैं पत्रकार बोलूंगा... तुम रवीश कुमार समझना.

रवीश कुमार को रेमन मैग्सेसे अवार्ड के लिए बधाई....मगर पाठकों यह जानना भी जरूरी है कि रवीश कुमार का चयन इस अवार्ड के लिए क्यों किया गया. रेमन मैग्सेसे पुरस्कार देने वाली संस्था ने इस अवार्ड के लिए रवीश कुमार की पत्रकारिता को लेकर जो टिप्पणी की है वह हिंदुस्तान के छह सालों के हालात पर भी टिप्पणी है. आप जान सकें इसलिए इसका हिंदी अनुवाद किया है- मयंक सक्सेना ने.

पिछले कुछ सालों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आज़ाद और ज़िम्मेदार पत्रकारिता के स्पेस को सिकुड़ते देखा है। इसके पीछे कई सारे कारण हैं: नई सूचना प्रोद्योगिकी के कारण बदलता मीडिया का स्वरूप, ख़बर और रायशुमारी का बाज़ारीकरण, सरकार का बढ़ता नियंत्रण और सबसे चिंताजनक है लोकप्रिय अधिनायकवाद और धार्मिक-जातीय-राष्ट्रवादी कट्टरपंथियों का अपने सतत विभाजनकारी, असहिष्णु और हिंसक तरीके से उभार।

इन बढ़ते ख़तरों के विरोध में भारत में एक अहम आवाज़ हैं टीवी पत्रकार रवीश कुमार। हिंदीभाषी राज्य बिहार के जितवापुर गांव में पैदा हुए और पले-बढ़े रवीश ने अपने शुरुआती रुझान के मुताबिक अपनी परास्नातक डिग्री दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास और पब्लिक अफेयर्स में ली। 1996 में उन्होंने एनडीटीवी ज्वाइन किया और एक फील्ड रिपोर्टर के तौर पर शुरुआत की। देश की 42 करोड़ हिंदी भाषी जनता के बीच एनडीटीवी ने जब अपना हिंदी चैनल एनडीटीवी-इंडिया लॉंच किया तो रवीश कुमार का अपना शो शुरु हुआ - प्राइम टाइम। आज एनडीटीवी के सीनियर एक्सीक्यूटिव एडीटर के तौर पर रवीश कुमार, देश के सबसे प्रभावशाली टीवी पत्रकारों में से एक हैं। 

हालांकि उनकी सबसे बड़ी विशेषता वो पत्रकारिता है, जिसका वो प्रतिनिधित्व करते हैं। एक ऐसे मीडिया के माहौल में, जो एक दखलअंदाज़ सत्ता से डरा हुआ है, जो कट्टर राष्ट्रवादी ताकतों और ट्रोल्स से ज़हरीला हो गया है और फ़ेक न्यूज़ से भरता जा रहा है और जहां बाज़ार की रेटिंग्स ने सारा दांव 'मीडिया शख्सियतों', 'पीत पत्रकारिता' और दर्शकों को लुभाने वाली सनसनी पर लगा रखा है, रवीश पत्रकारिता की सभ्य, संतुलित और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग शैली को ही पेशेवर पत्रकारिता बनाए रखने पर अड़े हुए हैं। एनडीटीवी पर उनका कार्यक्रम 'प्राइम टाइम' ताज़ातरीन सामाजिक मुद्दों को उठाता है, गंभीर बैकग्राउंड रिसर्च करता है और मुद्दे को एक या उससे भी अधिक एपीसोड्स में एक बहुआयामी चर्चा के साथ सामने रखता है। इस कार्यक्रम में मुद्दे असल ज़िंदगी में आम लोगों की अनकही दिक्कतों की बात करते हैं - जो सीवर में नंगे हाथ-पैर उतरने वालों और रिक्शाचालकों से लेकर सरकारी कर्मचारियों और किसानों की तक़लीफ़ से अर्थाभाव से जूझते सरकारी स्कूलों और अकर्मण्य रेलवे तंत्र तक हो सकते हैं। रवीश सरलता से गरीब जनता से संवाद करते हैं, खूब यात्राएं करते हैं और अपने दर्शकों से संपर्क में रहने के लिए सोशल मीडिया का खूब इस्तेमाल करते हैं और इसके ज़रिए भी अपने कार्यक्रम के लिए स्टोरीज़ तैयार करते हैं। जन-आधारित पत्रकारिता की लगातार कोशिश करते हुए, वो अपने न्यूज़रूम को जनता का न्यूज़रूम कहते हैं।

रवीश भी कई बार कुछ नाटकीयता का सहारा लेते हैं क्योंकि उनका मानना है कि ये प्रभावी तरीका है। उन्होंने 2016 में एक अनोखे ढंग के शोर में नाटकीय ढंग से बताया था कि कैसे टीवी न्यूज़ शोज़ में बहस का स्तर कितना गिर चुका है। शो की शुरुआत में स्क्रीन पर आते हुए रवीश बताते हैं कि कैसे टीवी न्यूज़ शोज़ गुस्सैल और कानफो़ड़ू आवाज़ों के अंधेरे जगत में बदल गए हैं। उसके बाद स्क्रीन काली हो जाती है और अगले एक घंटे तक स्क्रीन काली रहती है और पीछे से असल टीवी शोज़ के कर्कश ऑडियो, ज़हरीली धमंकियां, बौखलाहट भरी रट, साउंडबाइट्स और दुश्मन का खून बहाने को तत्पर भीड़ का शोर सुनाई देते रहते हैं। रवीश के मुताबिक उनके लिए हमेशा संदेश अहम है, जिसे दिया जाना ही चाहिए।  

एक एंकर के तौर पर रवीश हमेशा भद्र हैं, संतुलित हैं और सूचना से सुसज्जित रहते हैं। वो अपने अतिथि पर हावी नहीं होते बल्कि उनको अपनी बात कहने का मौका देते हैं। वो चिल्लाते नहीं, लेकिन सबसे ऊंचे शक्ति की ज़िम्मेदारी भी गिनाते हैं और देश में सार्वजनिक-विमर्श में भूमिका के लिए मीडिया की भी निंदा कर डालते हैं: इस वजह से उनको लगातार अलग-अलग तरह की कट्टर शक्तियों की धमकिय़ों और ख़तरों का सामना करना पड़ता रहा है। इन सारी मुश्किलों और बाधाओं के बावजूद भी रवीश एक समीक्षात्मक, सामाजिक तौर पर जवाबदेह मीडिया के स्पेस को बढ़ाते रहने के अपने प्रयासों में लगे रहे हैं। एक ऐसी पत्रकारिता में भरोसा रखते हुए, जिसके केंद्र में आम लोग हैं, रवीश पत्रकार के तौर पर अपनी भूमिका को मूलभूत रूप से परिभाषित करते हैं, "अगर आप लोगों की आवाज़ बन सकते हैं, तो ही आप पत्रकार हैं।"  

2019 के रेमन मैगसेसे पुरस्कार के लिए रवीश कुमार का चुनाव करते हुए, बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ उनके उच्चतम कोटि के तिक पत्रकारिता के प्रति अडिग समर्पण को ध्यान में रखता है: उनका नैतिक साहस जिसके दम पर वो सच के लिए खड़े होते हैं, उनकी ईमानदारी, आज़ादी और उनके उस सैद्धांतिक विश्वास को सम्मानित करता है, जिसके मुताबिक पत्रकारिता लोकतंत्र की उन्नति में अपना सबसे आदर्श लक्ष्य तब हासिल करती है, जब वो सच को साहस से बोलती है, बेआवाज़ों की आवाज़ को सत्ता के सामने ताकत देती है, लेकिन अपनी भद्रता नहीं खोती...

 

( मूल साइटेशन - रेमन मैगसेसे पुरस्कार की वेबसाइट से )

 

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छत्तीसगढ़ में अंडे का विरोध... संघी गिरोह की चाल!

राजकुमार सोनी

छत्तीसगढ़ की सरकार आंगनबाड़ी केंद्र और मध्यान्ह भोजन में गर्भवती माताओं और बच्चों को पोषक आहार के रुप में अंडा देना चाहती है. बहुत से लोग सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं और इसे एक अच्छा कदम बता रहे हैं, लेकिन कतिपय संगठन और लोग ( जिसमें कुछ तथाकथित शाकाहारी भाजपाई पत्रकार भी शामिल है.) विरोध जता रहे हैं. कुछ खुलकर विरोध कर रहे हैं तो कुछ का विरोध सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली... मुहावरे को चरितार्थ करने वाली शैली में हैं. इस विरोध को देखकर लग रहा है कि सब असंतुष्ट भूपेश सरकार को पलट देने की हड़बड़ी में हैं. चूंकि भोजन में अंडे देने का समर्थन करने वाले संगठन और उससे जुड़े लोग झंडे-बैनर लेकर सड़कों पर उतर नहीं रहे और केवल प्रेस विज्ञप्ति तक ही सीमित है, इसलिए ऐसा लग रहा है कि अंडे ने प्रदेश की राजनीति में उबाल ला दिया है.

निजी तौर पर अगर आप मुझसे पूछेंगे कि मैं किस तरफ हूं तो कहूंगा कि मैं अंडा खाने वालों के साथ हूं और चाहता हूं कि एक बच्चे को एक या दो नहीं बल्कि खाने में पूरे चार अंडे मिलने चाहिए. जिन लोगों ने कभी गरीब बच्चों को बड़े चाव से अंडा खाते नहीं देखा वे इस बात को कभी नहीं समझ पाएंगे कि अंडा क्या होता है ? मैं एक ऐसे परिवार से हूं जहां अंडा खाने के पहले ख्वाब देखना होता था. जब कभी भी घर में अंडा आता तो हम पांच भाई इस ताक में रहते थे कि कब अंडा उबलेगा और कब हमें खाने को मिलेगा. कई बार तो अंडे के बंटवारे को लेकर भाइयों के बीच झड़प भी हो जाया करती थी. एक अंडे के कई हिस्से हो जाया करते थे. एक उबले हुए अंडे में थोड़ा सा नमक और काली मिर्च छिड़ककर खाने का मजा क्या होता है इसे वही समझ सकता है जो इसे रोज खाता है. जिसके भोजन में काजू-कतली शामिल रहती है वे इस बात को कभी नहीं जान पाएंगे कि अंडे का स्वाद क्या है. मुझे लगता है कि छत्तीसगढ़ के गांवों में अब भी कई घर ऐसे होंगे जहां रहने वाले बच्चों के लिए अंडा एक ख्वाब है. ख्वाब देखने वाले बच्चे अंडे का इंतजार करते हैं. उनका इंतजार हर हाल में खत्म होना चाहिए. अंडे का विरोध करने महान नेताओं से यह भी कहना चाहूंगा कि किसी बच्चे के मुंह से उसकी पसंद का निवाला छीनने की कोशिश भी मत करिए. संभल जाइए... बच्चा आपका वोट बैंक नहीं है, लेकिन देश का भविष्य अवश्य है. कम से कम देश का भविष्य स्वस्थ रहने दीजिए.

वैसे अंडा वितरण योजना के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि सरकार ने इसे लेकर कोई बाध्यता नहीं रखी है. जो बच्चे अंडा खाना चाहेंगे उन्हें अंडा दिया जाएगा जो नहीं चाहेंगे उन्हें उतनी ही कैलोरी का कोई अन्य पोषक तत्व देने की योजना भी बनाई गई है. सरकार ने खानपान की स्वतंत्रता का ख्याल रखा है बावजूद इसके सोमवार को एक विधायक ने विधानसभा में यह आशंका जताई कि अगर कोई शाकाहारी बच्चा अंडे को आलू समझकर खा लेगा तब क्या करिएगा ? अब आशंकाओं का कोई हकीम तो होता नहीं है. ये हो जाएगा... वो हो जाएगा... कहने का हक तो सबको है. वैसे विधायक महोदय ने विधानसभा में खुद को लेकर एक मजेदार बात भी बताई. विधायक ने कहा- मैं मटन खाता हूं. चिकन खाता हूं और अंडा भी खाता हूं, मगर फिर भी चाहता हूं कि बच्चों को भोजन में अंडा न दिया जाय. विधायक का कथन सुनकर बचपन में सुना हुआ एक मुहावर भी याद आया- आप गुरूजी बैगन खाए और दूसरों को ज्ञान सिखाएं. ( बैगन मत खाना... बैगन में कीड़े होते हैं.)

छत्तीसगढ़ में भाजपा के समय से विज्ञप्ति आधारित पत्रकारिता चल रही है अन्यथा पत्रकारों के लिए एक अच्छा विषय यह भी हो सकता था कि कौन-कौन सा जनप्रतिनिधि अंडा खाता है? छुपकर खाता है या सार्वजनिक जीवन में भी खाता है ? अंडे का विरोध करने वाले ठीक-ठाक ढंग से यह नहीं बता पाते हैं कि अगर बच्चों को खाने में अंडा न दिया जाए तो फिर क्या दिया जाय. क्या बच्चों को लड्डू-पेड़ा बांटना चाहिए. किसी संगठन ने सोयाबीन देने की बात कहीं है. पाठकों को याद होगा कि प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तब सरकार ने स्कूलों में सोयाबीन दूध के वितरण की योजना बनाई थीं. इसके लिए मनीष शाह नाम के एक दलाल से अनुबंध भी किया गया था. खूब हो-हल्ला हुआ कि बच्चों को पौष्टिक सोयाबीन का दूध दिया जाएगा, लेकिन हुआ क्या... दलाल शाह कई करोड़ रुपए का भुगतान लेकर बैठ गया. हालांकि यह दलाल अब भी सक्रिय है और इन दिनों इसकी आवाजाही मंत्रालय में भाजपा सरकार के स्वामीभक्त अफसरों के कमरों में देखी जा सकती है.

वैसे काफी पहले अंडे को लेकर फैलाए गए तमाम भ्रम टूट गए हैं. खानपान का अध्ययन करने वाले चिकित्सकों ने  मान लिया है कि अंडा बढ़ते हुए बच्चों के लिए प्रोटीन का एक उत्तम विकल्प है. अंडे में विटामिन सी जैसे एक- दो तत्व छोड़कर सभी तरह के पोषक तत्व मिलते हैं. एक सर्वे यह भी बताता है कि छत्तीसगढ़ के 38 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है और अनुसूचित जनजाति के बच्चों में कुपोषण की यह दर 44 फीसदी है. छत्तीसगढ़ में 83 फीसदी आबादी अंडे का सेवन करती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि देश के 15 से अधिक राज्यों में मध्यान्ह भोजन आंगनबाड़ी केंद्रों में कई सालों से अंडे का वितरण किया जा रहा है. सवाल यह है कि आखिर हम अपने नौनिहालों को क्या कुपोषित ही रहने देना चाहते हैं ? सच तो यह भी है कि शाकाहार या मांसाहार के नाम पर किसी भी समुदाय-विशेष को अन्य लोगों के खानपान पर प्रतिबंध लगाने का कोई अधिकार नहीं है और इसका हमारी संस्कृति से भी कोई लेना-देना भी नहीं है. किसी बच्चे के अंडा खा लेने से संस्कृति नष्ट हो जाएगी और किसी के केला-मौसंबी-संतरा खा लेने से संस्कृति बच जाएगी यह सोचना सिवाए मूर्खता के और कुछ नहीं है. श्रीमान जी प्रदेश की 80 फीसदी आबादी अपने भोजन में मांस का उपयोग करती है. अगर आप शाकाहारी है तो शाकाहारी बने रहिए... आपके शाकाहार होने पर तो कोई विरोध नहीं करता ? चूंकि आप शाकाहार है, इसलिए संस्कृति के रक्षक है यह सोचना ठीक नहीं है. अंडा खा लेने से किसी का धर्म भ्रष्ट नहीं हो जाता है. दरअसल प्रदेश में अंडे का जो विरोध दिख रहा है उसके पीछे संघी गिरोह की कसरत साफ तौर पर दिखाई दे रही है. इस गिरोह को लगता है कि लोग समझ नहीं रहे हैं. सबको पता है कि कौन किस मुद्दे को जरूरत से ज्यादा उछाल रहा है. किसका क्या मकसद है.  संघी गिरोह आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को कुपोषित बनाए रखने की साजिश रचता ही रहा है. इस बार भी यहीं खेल खेला जा रहा है. अफसोस इस बात का है कि इस गिरोह को चारों खाने चित्त कर देने वाला कोई माकूल जवाब अब तक नहीं दिया जा सका है.

अरे... संडे हो या मंडे, हर रोज खाओ अंडे

पर...समझे प्यारे समझो, चड्डियों के हथकंडे

 

 

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अरबन नक्सल का हौव्वा खड़ा करके किनके हित साध रहा है संघ ?

भंवर मेघवंशी, सम्पादक-शून्यकाल

आरएसएस के प्रचार विभाग द्वारा संकलित और विश्व संवाद केंद्र,जयपुर द्वारा प्रकाशित 50 पृष्ठ की एक पुस्तिका "कौन है Urban Naxals"कल ही पढ़ने को मिली।

जैसा कि इसकी प्रस्तावना में ही लिखा गया है कि -' समाज की सतत सजगता हेतु मुख्यधारा के हिंदी समाचार पत्र पत्रिकाओं में "अरबन नक्सल" विषयों पर प्रकाशित आलेखों का संकलन है यह पुस्तिका। इसके लेखकों में अजय सेतिया, विवेक अग्निहोत्री, मनु त्रिपाठी, मकरंद परांजपे, ज्ञानेंद्र भरतिया, आशीष कुमार अंशु,अभिनव प्रकाश,नीलम महेंद्र,हितेश शंकर,अवधेश,शौर्य रंजन,अंजनी झा और यादवेन्द्र सिंह शेखावत जैसे लोग शामिल है। ज्यादातर आलेख पांचजन्य अथवा अन्य दक्षिणपंथी विचार समूह की पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुये है।

पुस्तिका साफ कहती है कि 'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' जैसी फ़िल्म बनाने वाले विवेक अग्निहोत्री की देन है अरबन नक्सल शब्द,जिनकी इसी नाम से एक किताब भी आ चुकी है।इस किताब की भूमिका मकरंद परांजपे द्वारा लिखी गई है,ऐसा परांजपे का खुद कहना है।

किताबें लिखी जाती है,प्रकाशित होती है,वितरित होती है,बिकती है,यह सामान्य बात है,इसमें कोई दिक्कत नहीं है,लोकतांत्रिक देश में हर तरह के विचार का साहित्य छपेगा,बंटेगा और बिकेगा भी,मगर खतरनाक बात यह है कि पढ़ने पर यह प्रचार पुस्तिका पूरी तरह से दुष्प्रचार पुस्तिका जैसी लगती है।

इस पुस्तिका के माध्यम से देश भर में गरीब दलित आदिवासी व अल्पसंख्यक समुदाय के मूलभूत मानवीय अधिकारों के लिए दशकों से लड़ रहे लोगों को द्वेषपूर्ण ढंग से टारगेट करते हुए लांछित किया गया है,इस पुस्तिका की भूमिका में ही यह नफरत उजागर हो जाती है ,जहां साफ तौर पर यह लिख दिया जाता है कि - 'जो अपनी पहचान प्रगतिशील, सिविल सोसायटी या लिबरल के रूप में चाहते हैं,एनजीओ, मानवाधिकार, साहित्यिक व कला मंच जिनके माध्यम है,एक दूसरे को मैग्सेसे व उनके समकक्ष पुरुस्कार दिलाना जिनकी फितरत है,पत्रकारिता,पुस्तक ,फ़िल्म जिनके आतंक फैलाने के हथियार है,असहिष्णुता व अभिव्यक्ति की आज़ादी जिनके प्रिय जुमले हैं,प्राध्यापक, पत्रकार, अधिवक्ता व एक्टिविस्ट होना जिनका पैसा है,जनसुनवाई और आरटीआई जिनके माध्यम है ,प्रधानमंत्री, भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जो अपना शत्रु मानते हैं,जिन्हें वाममार्गी,माओवादी ,कम्युनिस्ट कहा जाता है,परन्तु एक ही शब्द का सम्बोधन देना हो तो वह है- अरबन नक्सल ।

यह प्रचार पुस्तिका सलवा जुडूम की भूरी भूरी प्रशंसा करती है,महेंद्र कर्मा को बार बार उद्धरित करती है ,बस्तर के पूर्व आईजी कल्लूरी के श्रीमुख से कहलवाती है कि -'बस्तर से नक्सली सालाना 1100 करोड़ की वसूली करते हैं,यह पैसा उन माओवादियों को नहीं मिलता है,जो हथियार लेकर जंगल मे आंधी पानी और मलेरिया से जूझ रहे हैं,यह पैसा पहुंचता है नक्सलियों के अरबन नेटवर्क के पास,ये एक छोटा वर्ग है जो गैर सरकारी संगठन व मानव अधिकार के नाम पर ,अध्येता या शोधार्थी के नाम पर इस दावे के साथ बस्तर में मौजूद होता है कि हम वहां काम कर रहे हैं।'

पुस्तिका कईं सामाजिक कार्यकर्ताओं,पत्रकारों,लेखकों,रंगकर्मियों ,प्राध्यापकों को शहरी सफेदपोश नक्सली के रूप में चिन्हित करती है,उनकी नजर में मेधा पाटकर,अरुंधति रॉय,स्वामी अग्निवेश,राहुल पंडिता,अरुणा रॉय ,नंदिनी सुंदर जैसे लोग अरबन नक्सल है ,वरवर राव,सुधा भारद्वाज,अरुण फरेरा, गौतम नवलखा,वेरनन गोंजाल्विस,फादर स्टेन स्वामी,सुसान अब्राहम,आनंद तेलतुंबड़े ,कबीर कला मंच,यलगार परिषद तो है ही।

इन्हें भीमा कोरेगांव का दलित गौरव और आदिवासियों का पत्थलगढ़ी का आंदोलन भयानक नक्सली साज़िश लगती है ,यह जेएनयू को देशद्रोह का अड्डा और टुकड़े टुकड़े गैंग,अवार्ड वापसी गैंग ,पाकिस्तान परस्त,मुस्लिमों के प्रति प्रेम से भरे हुए,भारत विरोधी व हिन्दू विरोधी जैसे विशेषणों से तो सबको नवाजते ही हैं।

इस दुष्प्रचार पुस्तिका के मुताबिक- "वाम विचार प्रेरित आतंकवाद के लिए  बड़े शहरों के साहित्यक,विश्वविद्यालय व अन्य बौद्धिक मंच,कला ,मीडिया ,पत्रकार और यहां तक कि फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े पढ़े लिखे ,किंतु उसी विचार को मानने वाले लोग,जो प्रोपेगैंडा कर जन असंतोष को भड़का कर नक्सलवाद के पक्ष में माहौल बनाते हैं।इन्हीं लोगों को अरबन नक्सल कहा गया है।"

पुस्तिका के अंतिम पृष्ठ पर बॉक्स में एक लघु आलेख किन्ही यादवेन्द्र सिंह द्वारा लिखित प्रकाशित है, जिसका शीर्षक इस प्रकार है-

" राजस्थान के केंद्रीय विश्वविद्यालय में अरबन नक्सल की आहट"

इस आलेख में कहा गया है कि "राजस्थान के एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय को पूर्व योजना के मुताबिक अरबन नक्सल वाद का अड्डा बनाया जा रहा है,यहां का सोशल वर्क डिपार्टमेंट कईं बार निखिल डे को व्याख्यान हेतु बुलाता है,जो कि मजदूर किसान शक्ति संगठन में अरुणा राय के सहयोगी है व अरबन नक्सल को बढ़ावा दे रगे है। कल्चर व मीडिया विभाग से प्रतिवर्ष इंटर्न्स mkss भेजते हैं"। किताब के अंदरूनी मुखपृष्ठ पर एक कार्टून के साथ  "मी टू अरबन नक्सल" वाली फ़ोटो भी छापी गयी है,जिसमें प्रशांत भूषण,अरुंधति रॉय,अरुणा रॉय व जिग्नेश मेवाणी आदि नजर आते है।

कुल जमा इस प्रचार पुस्तिका के ज़रिए राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे देश की सिविल सोसायटी व जन आंदोलन के चेहरों को शहरी माओवादी के रूप में प्रचारित करके उनके विरुद्ध आम जन के मानस में घृणा,विद्वेष फैलाना है,उनके काम पर सवालिया निशान लगाते हुए उनके बारे में दुष्प्रचार करना है,ताकि ये लोग और इनके संगठन गरीब,दलित,मजदूर,किसान ,आदिवासी व पीड़ित अल्पसंख्यकों के साथ एकजुटता में खड़े न हो सके।

यह दुष्प्रचार काफी वक्त से जारी है,जब इस तरह की असत्य बातें एक सुनियोजित षड़यंत्र के तहत लोगों के बीच प्रचारित कर दी जाती है तो उसका परिणाम मॉब लिंचिंग और हमलों व हत्याओं के रूप में सामने आती है।

यह बहुत भयानक स्थिति है,इस उकसाने व भड़काने वाली ,नफरत पैदा करने वाली कार्यवाही की भर्त्सना की जानी चाहिए, ऐसी दुष्प्रचार प्रोपेगैंडा पुस्तिकाओं के प्रकाशकों व लेखकों के ख़िलाफ़ कानून सम्मत कार्यवाही होनी चाहिए,अन्यथा इस प्रकार की प्रवृति बढ़ेगी और सामाजिक न्याय व बदलाव के काम ग्रासरूट पर करना दूभर हो जाएगा। इससे यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि आरएसएस क्यों अपने प्रचार विभाग के ज़रिए इस प्रकार का साहित्य प्रचारित करवा रहा है,उसका क्या हिडन एजेंडा है,वह किसके हित साध रहा है,क्या यह पूंजीवाद और सांप्रदायिकता के गर्भनाल रिश्तों को मजबूती देने की कोशिश है या जीवन लगा देने वाले सेवा भावी सामाजिक कार्यकर्ताओं को जानबूझकर बदनाम करने का प्रयास ?

कुछ न कुछ तो है !

 

 

 

 

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स्वास्थ्य संकट पर रिपोर्टिंग करती पत्रकारिता को टेटेनस हो गया है, टेटभैक का इंजेक्शन चाहिए


रवीश कुमार 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि मुज़फ़्फ़रपुर के श्री कृष्ण मेडिकल कालेज अस्पताल में एक साल के भीतर 1500 बेड जोड़े जाएंगे। जिसे बढ़ा कर 2500 बेड का कर दिया जाएगा। अस्पताल 49 साल पुराना है। इस वक्त 610 बेड है। 

 

उसी अस्पताल के कैंपस में एक सुपर स्पेशियालिटी अस्पताल बन रहा है जो शायद तैयार होने के करीब है। जिसमें 300 बेड होगा। अगर इसे 610 में जोड़ लें तो जल्दी ही 910 बेड बन कर तैयार हो जाएगा। उसके बाद 600 अतिरिक्त बेड इस अस्पताल में बनाने के लिए कम से कम दो अस्पताल बनाने होंगे। फिर 2500 का टारगेट पूरा करने के लिए दो और बनाने होंगे। वैसे हमें नहीं मालूम कि मुख्यमंत्री ने साल भर के भीतर 1500 बेड बनाने का एलान किया है उसमें पहले से बन रहे 300 बेड के अस्पताल का हिसाब शामिल है या नहीं।

 

एक सुपर स्पेशियालिटी अस्पताल के लिए एक बेड की लागत 85 लाख से 1 करोड़ आती है। इस लागत में इमारत और उसमें होने वाली हर चीज़ और डाक्टर की लागत शामिल होती है। अगर 1500 बेड बनेगा तो नीतीश कुमार सरकार को एक साल के भीतर 1500 करोड़ ख़र्च करने होंगे।

 

2017-18 में बिहार सरकार का बजट ही 7002 करोड़ का था। जो 2016-17 की तुलना में 1000 करोड़ कम हो गया था। अस्पतालों के निर्माण का बजट करीब 800 करोड़ था। क्या बिहार से बीमारियां भाग गईं थीं जो हेल्थ का बजट 1000 करोड़ कम किया गया? ये जानकारी पॉलिसी रिसर्च स्टडीज़ की साइट से हमने ली है। 

 

अगर एक यात्रा में नीतीश कुमार अख़बारों में हेडलाइन के लिए 1500 से 2500 करोड़ के बजट के अस्पताल का एलान कर गए तो यह भी बता देते कि पैसा कहां से आएगा। इस बजट में तो पूरे बिहार का बजट ही समाप्त हो जाएगा। 130 बच्चों की मौत की संख्या छोटी करने के लिए 2500 बिस्तरों का एलान घिनौना लगता है। शातिर दिमाग़ का खेल लगता है। सबको पता है कि पत्रकार पूछेंगे नहीं कि पैसा कहां से आएगा। एक ही कैंपस में 5 अस्पताल का एलान क्यों कर गए? 2500 बिस्तर का मतलब आप 500 बेड के हिसाब से देखें तो 5 अस्पताल बन सकते हैं। क्या इन 5 अस्पतालों को आप आस-पास के ज़िले में नहीं बांट सकते थे? जिससे सबको मुज़फ़्फ़रपुर आने की ज़रूरत न होती और लोगों की जान बचती?

 

610 बेड के अस्पताल के लिए तो अभी डॉक्टर नहीं हैं। यही नहीं 49 साल पुराने श्री कृष्ण मेडिकल कालेज अस्पताल में पिडियाट्रिक की पोस्ट ग्रेजुएट पढ़ाई नहीं होती है। अगर यहां पीजी की दस सीट भी होती तो कम से कम 40 जूनियर या सीनियर रेज़िडेंट तो होते ही। बिहार के प्राइवेट कालेज में जो बाद में खुले हैं वहां पीजी की सारी सीटें हैं क्योंकि उनसे करोड़ रुपये की सालाना फीस ली जाती है। 

 

आम तौर पर तीन बेड पर एक डॉक्टर होना चाहिए। अगर 1500 बेड की बात कर रहे हैं तो करीब 200-300 डॉक्टर तो चाहिए ही।बेड बनाकर फोटो खींचाना है या मरीज़ों का उपचार भी करना है। जिस मेडिकल कालेज की बात कर गए हैं वहां मेडिकल की पढ़ाई की मात्र 100 सीट है। 2014 में हर्षवर्धन 250 सीट करने की बात कर गए थे। यहां सीट दे देंगे तो प्राइवेट मेडिकल कालेजों के लिए शिकार कहां से मिलेंगे। गेम समझिए। इसलिए नीतीश कुमार की घोषणा शर्मनाक और मज़ाक है। अस्पताल बनेगा उसकी घोषणा पर मत जाइये। देश में बहुत से अस्पताल बन कर तैयार हैं मगर चल नहीं रहे हैं। गली-गली में खुलने वाले एम्स की भी ऐसी ही हालत है। 

 

2018 में बिहार सरकार ने एक और कमाल का फैसला किया। पटना मेडिकल कालेज में 1700 बेड हैं। इसे बढ़ाकर 5462 कर दिया जाएगा।  ऐसा करने से यह दुनिया का सबसे बड़ा अस्पताल बन जाएगा। इसके लिए 5500 करोड़ का बजट रखा गया। चार-पांच साल में बनकर तैयार हो जाएगा। यह बना तो बेलग्रेड के सबसे बड़े अस्पताल से आगे निकल जाएगा। ज़रूर कोई अफसर रहा होगा जो बी से बेलग्रेड और बी से बिहार समझा गया होगा और सबको मज़ा आया होगा। इसी बेड को अगर आप पूरे बिहार में बांट देते तो कई ज़िलों में एक एक अस्पताल और बन जाते। इसके लिए पटना मेडिकल कालेज की पुरानी ऐतिहासिक इमारतें ढहा दी जाएंगी। 

 

पटना में पीएमसीच के अलावा इंदिरा गांधी मेडिकल कालेज भी है जिसे एम्स कहते हैं। यह आज तक दिल्ली के एम्स का विकल्प नहीं बन सका है। यहां भी नीतीश कुमार ने इसी जून महीने में 500 बेड का उद्घाटन किया था। पटना के लिए पीएमसीएच और एम्स काफी है। रिकार्ड बनाने से अच्छा होता 5462 बेड को पूरे बिहार में बांट देते तो किसी को सहरसा और आरा से पटना नहीं आना पड़ता। लेकिन अस्पताल भी अब 300 फीट की मूर्ति की सनक की तरह बनने लगे हैं।   

 

फिर भी आप यह सवाल पूछ सकते हैं कि 5462 बेड के अस्पताल के लिए 1500 डाक्टर कहां से लाओगे। पीएमसीच में ही 40 परसेंट डाक्टर कम हैं। बिहार में 5000 डाक्टरों की कमी है। क्या इसके लिए नीतीश कुमार सरकारी कालेजों में मेडिकल की सीट बढ़वाने वाले हैं या प्राइवेट मेडिकल कालेज खोल कर कमाने की तैयारी हो रहा है। डॉक्टर सरकारी मेडिकल कालेज क्यों ज्वाइन करेगा। एक एक करोड़ की फीस देकर एम बी बी एस करेगा और दो दो करोड़ में पीजी तो वह सरकारी कालेज में क्यों जाएगा। अपने पैसे को वसूल कहां से करेगा। आप जानते हैं कि जो भी नीट से पास करता है उसे मजबूरन इन प्राइवेट कालेज में जाना पड़ता है। ग़ुलामी का यह अलग चक्र है जिसे समाज ने सहर्ष स्वीकार किया है। प्राइवेट कालेजों का शुक्रिया कि एक करोड़ ही पांच साल का ले रहे हैं वर्ना यह जनता सरकार से सवाल किए बग़ैर पांच करोड़ भी दे सकती थी। 

 

श्री कृष्ण मेडिकल कालेज में जो डाक्टर साढ़े चार साल की पढ़ाई के बाद इंटर्नशिप कर रहे हैं उन्हें ढाई महीने से सैलरी नहीं मिली है। 15000 रुपये मिलते हैं। हो सकता है पूरे बिहार के इंटर्न की यही हालत हो। ज़ाहिर है बिहार सरकार के पास पैसे नहीं होंगे। तो फिर फिलहाल आप सभी जनता 2500 बिस्तर की घोषणा से काम चलाइये। 

 

हरियाणा के झज्जर में नेशनल कैंसर इस्टिट्यूट NCI बन रहा है। इसकी योजना मनमोहन सरकार में बनी थी। मगर चुनाव के समय ही ख़्याल आया और जनवरी 2014 में मनमोहन सिंह ने इसकी आधारशिला रखी। अगले एक साल तक कुछ नहीं हुआ। 2015 के आखिर में स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर जे पी नड्डा भूमि पूजन करते हैं। आधारशिला और भूमिपूजन में आप अंतर कर सकते हैं। 23 अक्तूबर 2016 को जे पी नड्डा ट्वीट करते हैं कि 2018 में अस्पताल चालू हो जाएगा। 710 बेड के इस अस्पताल को एम्स की निगरानी में बनवाया जा रहा है जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय भी मॉनिटर करता है। जब दिसंबर 2018 में इस अस्पताल की ओ पी डी चालू की गई तो 710 बेड का कहीं अता-पता नहीं था। फरवरी 2019 में प्रधानमंत्री मोदी जब इसका उद्घाटन करते हैं तो 20 बेड ही तैयार था। आज भी बेड 20 के ही आस-पास हैं। चुनाव करीब था, हेडलाइन लूटनी थी तो एलान हो गया। 

 

जब यह अस्पताल तीन साल में 20 बेड से आगे नहीं जा सका, 710 बेड नहीं बना सका, कैंसर के कितने ही मरीज़ उपचार के ख़र्चे और कर्ज़े में डूब कर मर जाते हैं, तब नीतीश कुमार 2500 बेड बनवा देंगे। 1500 बेड एक साल में बनवा देंगे।  चार साल में पटना में 5462 बेड का अस्पताल बनवा देंगे। पूरे राज्य का स्वास्थ्य बजट इन दो घोषणाओं को पूरा करने में ही खप जाएगा। 

 

आप इन जानकारियों का क्या कर सकते हैं? इसे लेकर टीवी एंकरिंग क्या ही करेंगे। पत्रकारिता को टेटेनेस हो गया है। टेटभैक का इंजेक्शन भी काम नहीं करेगा। बेहतर है इन तथ्यों को भावुक वाक्य विन्यासों में मिलाकर चीखें। पुकारें लोगों को। स्क्रीन पर दरीदें वगैरह लिखें। मुज़्फ़्फ़रपुर की जनता या बिहार की जनता जब एक कैंपस में 30 से अधिक बच्चियों के साथ हुए बलात्कार पर सड़क पर नहीं आई तो 130 बच्चों की मौत पर क्यों आएगी? हम मौत को भावुकता और आक्रोश में बदल रहे हैं वो भी एक दो लोगों से आगे नहीं बढ़ पा रही है। क्या तथ्यों पर आधारित ये सवाल कुछ बदलाव कर सकते हैं? इसका जवाब मुझे नहीं मालूम। तब तक आप चीखते रहें।

 

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बोलने वाले बोलते क्यों नहीं ?

ओम थानवी

लोग पूछते हैं, राजग को प्रचंड जनादेश मिला है। आप अब भी आलोचक क्यों हैं? कोई बताए कि क्या जनादेश आलोचना का हक़ छीन लेता है? 

मेरा गिला राजनेताओं से उतना नहीं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों की अपनी ही बिरादरी से है। आपको याद होगा, जब पत्रकार मोदी के गिर्द सेल्फ़ी के लिए झूमने लगे, उनकी कितनी फ़ज़ीहत हुई थी। पर आज घर बैठे जयकारे लगाने में भी उन्हें (या साथियों को) कोई झिझक नहीं। 

किसे शक कि मोदी की वक्तृता बहुत लोक-लुभावन है। लिंग-दोष के बावजूद शब्दों और अभिव्यक्ति के हुनर पर उनका अधिकार है। उनका आत्मविश्वास और बढ़ा है। मगर साथ में अहंकार भी: "मोदी ही मोदी का चैलेंजर (चुनौती) है"! 

जो हो, परसों के सुदीर्घ भाषण में "छल को छेदना है" जुमला सुनकर पत्रकार मित्र इतने फ़िदा हुए कि तमाम पुराने वादों की पोल, बड़ी पूँजी के बढ़ावे, कालेधन की मरीचिका, बेक़ाबू महँगाई और बेरोज़गारी, नोटबंदी-जीएसटी के प्रकोप में उद्योग-व्यापार और खेतीबाड़ी के पतन, किसानों के आत्मदाह, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विचलन, शासन में संघ परिवार के दख़ल, रफ़ाल के रहस्य, पुलवामा की विफलता और बालाकोट के रेडार के छल तक को भुला गए।

प्रधानमंत्री ने ग़रीबी और ग़रीबों की बड़ी बात की। संविधान पर श्रद्धा उँडेली। क्या 2014 संविधान न था? या महँगाई, ग़रीबी और बेरोज़गारी? क्या संविधान की शपथ में उसके प्रति आदर और ज़िम्मेदारी का तत्त्व निहित नहीं होता है? फिर यह दिखावा क्यों?

उन्होंने राजग के साढ़े तीन सौ मौजूद सांसदों (और प्रकारान्तर छोटे-बड़े अन्य नेताओं) को "छपास और दिखास" से आगाह किया। पर इसके सबसे आला प्रमाण तो वे ख़ुद हैं। रोज़ कौन बंडी-कुरते बदलता है? कैमरा-क्रू के साथ जाकर कौन केदारनाथ की गुफा में ध्यान लगाता है? बग़ैर मुखारविंद खोले लाइव प्रेस काँफ़्रेंस में और कौन आ बैठता है? कभी मीडिया से बेरुख़ी और कभी साक्षात्कारों की झड़ी कौन लगा देता है? तो, इस एकाधिकार में अपने सहयात्रियों को उनका संदेश आख़िर क्या है? बस यही, कि आप सब परदे में रहें। मैं हूँ ना। 

अपने भाषण में ठीक एक घंटे बाद जाकर उन्होंने अल्पसंख्यकों की बात की। पत्रकार मित्र इस समावेशी पुट पर और लट्टू हुए हैं। मोदी अचानक उनके लिए सर्वधर्मसमभावी हो गए। कितने आराम से पत्रकार भूल गए कि प्रधानमंत्री ही पहले गुजरात के मुख्यमंत्री थे, जब वहाँ क़त्लेआम हुआ। 

पिछले चुनाव में उन्होंने श्मशान-क़ब्रिस्तान का राग छेड़ा था। इस दफ़ा पाकिस्तान (जिसे चुनाव बाद के भाषण में सिरे से छिटका दिया) और सर्जिकल के शोर के पीछे हिंदू राष्ट्रवाद की पुकार थी। और अभी, सेंट्रल हॉल में, उनके सामने बैठे भाजपा के नवनिर्वाचित सांसदों में एक भी मुसलमान नहीं था।

आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, गिरिराज सिंह, संगीत सोम आदि के साथ अब आतंक की मौतों वाले मालेगांव बमकांड की ज़मानतयाफ़्ता साध्वी प्रज्ञासिंह पार्टी की शोभा बढ़ा रही है। गांधीजी के हत्यारे गोडसे को उसने देशभक्त कहा। चुनाव का नाज़ुक दौर था, मोदी ने कहा वे साध्वी को माफ़ नहीं करेंगे। पर पार्टी के मार्गदर्शक आडवाणी ने साध्वी के सर पर हाथ रख दिया है। 

क्या ऐसे क्षुद्र और कट्टर ‘नेताओं’ को साथ रखकर जीतेंगे मोदी अल्पसंख्यकों का विश्वास? इन्हें साथ लेकर घृणा और सांप्रदायिकता की क्या वही हरकतें नहीं होंगी, जो पिछले पाँच दिनों में मुसलमानों के साथ हिंसा की वारदातों में लगभग हर रोज़ हुई हैं?

गाय के नाम पर हत्याएँ जब पहले बढ़ीं तब हिंसक तत्त्वों को प्रधानमंत्री ने देर से सही, पर चेतावनी दी थी। लेकिन उसे उन तत्त्वों ने मानो आशीर्वाद समझा और बेख़ौफ़ अपने मन और (कथित गोरक्षा) मत के वशीभूत सामूहिक हिंसा करते चले गए। उन्होंने मुसलमानों और दलितों पर कायराना नृशंस अत्याचार के वीडियो भी बेख़ौफ़ प्रचारित किए। समाज के ताने-बाने को द्वेष और दुष्प्रचार से उधेड़ने वाला इससे घृणित काम और क्या होगा?

गुज़रे पाँच सालों में दादरी से राजसमंद तक मुसलमानों के साथ इतना ख़ूनख़राबा हो गया है कि देश के नागरिक के नाते मोदी सरकार से उन्हें "भ्रम और भय" के अलावा कोई विश्वास हासिल नहीं हुआ है। अब उन्होंने अगर समावेशी समाज और विश्वास की बात की है तो हमें ज़रूर इसे एक बार उम्मीद की नज़र से देखना चाहिए। 

लेकिन छल-छलावे और संदेह के ऐसे विकट परिवेश में लट्टू पत्रकारिता से किस सरोकारी को कोफ़्त न होगी, जिसका ज़िक्र मैंने शुरू में किया। इसीलिए मुझसे कहे बिना रहा न गया। हालाँकि अब नए काम में टीका करने को वक़्त कहाँ मिलता है। 

राजनीति की दशा जैसी हो, बोलने वालों को ज़रूर बोलना चाहिए। विवेकशील पत्रकार और बुद्धिजीवी अपना मनोबल क्यों खोएँ?

 

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समाचार पत्र में नमो नम: चलेगा तो जनता की सुध कौन लेगा?

शिरीष खरे कभी तहलका में मध्यप्रदेश के प्रभारी थे. तहलका के बाद उन्होंने राजस्थान पत्रिका में अपनी सेवाएं दी और तबादले में छत्तीसगढ़ आ गए. यहां आकर उन्होंने कई मसलों पर गंभीर रिपोर्टिंग की. विशेषकर आदिवासी मामलों पर उनकी कलम खूब चली. इन दिनों वे पुणे में हैं और एक स्वयंसेवी संस्था के लिए कार्यरत हैं. अपनी ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए मशहूर श्री खरे ने अपना मोर्चा डॉट कॉम के लिए यह खास टिप्पणी भेजी है. इस टिप्पणी में उन्होंने माना है कि मीडिया में फिलहाल साष्टांग और दंडवत होने खौफनाक का दौर चल रहा है.

लोकसभा चुनाव में बीजेपी के नरेन्द्र मोदी की जीत ने 'राजस्थान पत्रिका समूह' के स्वामी गुलाब कोठारी का हृदय परिवर्तन कर दिया है। यही वजह है कि टेलीविजन पर मोदी का वक्तव्य सुनने के बाद उन्होंने अपने समाचारपत्र में मोदी के नाम एक भक्तिमय संपादकीय लिखा है। यहां उन्हें मोदी की वाणी में सरदार पटेल और महात्मा गांधी से लेकर विवेकानंद सब साथ-साथ नजर दिखाई दिए। 'राजनीति के समुद्र में क्षीरसागर की थाह नापने' टाइप भावपूर्ण भूमिका बांधने के बाद अचानक ही वे मुद्दे पर आ जाते हैं। कहते हैं कि राजस्थान पत्रिका का मूल क्षेत्र राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ पूर्ण रूप से आपकी भावी योजनाओं के साथ समर्पित है। इस तरह, वे खुद को निसंकोच और बेझिझक मोदीजी के लिए समर्पित कर देते हैं। इस तरह, अगले पांच वर्ष सरकारी विज्ञापन और कारोबार को देखते हुए नई सरकार के सामने साष्टांग दंडवत होने में वे कोई दुविधा महसूस नहीं करते हैं। 

देखा जाए तो मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही लगभग पूरे के पूरे मीडिया के बिकने और मोदी की गोद में बैठकर मोदी के प्रचार में काम करने की यही कहानी है। लेकिन, गुलाब कोठारी की बात दूसरी है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि उन्होंने सरकार की स्तुति में जो घोषणा की है, वैसी घोषणा किसी ने नहीं की है।  

यहां तक कि रिपब्लिक टीवी, जी न्यूज और इंडिया टीवी से लेकर दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे तमाम मीडिया संस्थान जो चुनाव अभियान के दौरान मोदी के प्रचार में बढ़-चढ़कर आगे रहते हैं, उन्होंने भी कभी सीधे-सीधे मोदी के पक्ष में खड़े होने का ऐलान नहीं किया। लेकिन, गुलाब कोठारी ने दूसरी बार मोदी के बहुमत हासिल करने के मौके पर जिस तरह से खुद को प्रोजेक्ट किया है, उससे स्पष्ट कि अब वे मोदी भक्ति की होड़ में सबसे आगे आना चाहते हैं।

चुनाव के दौरान सबने देखा कि किस तरह से मीडिया संस्थानों ने प्रधानमंत्री के साक्षात्कार, भाषण और धार्मिक यात्रा का कवरेज किया और विपक्षी दलों सहित उनके मुद्दों को अदृश्य बनाए रखा। ठीक इसी अंदाज में अब यदि कोठारी अपने समाचारपत्र को मोदी के संकल्प के लिए समर्पित कर देंगे तो सवाल है कि समाचार, प्रचार और प्रोपेगंडा के बीच के अंतर कहां रह जाएगा? इस कार्यकाल में समाचारपत्र सिर्फ 'नमो नम:' करेगा तो जनता की सुध कौन लेगा? 

अंत में कोठारी की यह टिप्पणी अपने संस्थान के सभी कर्मचारी पत्रकारों को यह स्पष्ट संदेश है कि उन्हें अब न मंहगाई देखनी है, न बेकारी, न बदहाल अर्थव्यवस्था और अपराध-आतंकवाद, अब आपको कीबोर्ड की जगह घंटी बजानी है और अपने स्वामी के भी स्वामी की भक्ति में मन रमाना है।

 

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अखबार की पलटीमार परम्परा !!

गिरीश पंकज 

बंदर जैसी गुलाटी मारने की कला कभी-कभी किसी अखबार विशेष से भी सीखी जा  सकती है। राजस्थान से निकलने वाले एक बड़े अखबार को हम ताज़ा उदाहरण के तौर पर देख सकते हैं। इसके मालिक एक तरफ नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करते रहे हैं और दूसरी तरफ उन्हीं के अखबार में निकृष्ट किस्म के अश्लील विज्ञापन भी छपते रहे हैं।  मैं उनके इस पाखंड को देखकर शुरू से चकित रहा हूं कि ईमानदारी और बेईमानी के बीच आखिर  कैसे इतना " सुंदर" संतुलन बनाकर ये पत्रकारिता कर रहे हैं। इस अखबार के पिछले कुछ सालों का ट्रैक- रिकॉर्ड भी जब हम देखते हैं, तो चकित रह जाना पड़ता है। इस अखबार का मालिक हर रविवार को बेहतर मनुष्य बनने के जीवन- दर्शन का मंत्र पढ़ाने की कोशिश करता है और दूसरी तरफ राग दरबारी भी गाता है।  कमाल है। सत्ता के साथ सुर बदलने की कला इस देश में कुछ पत्रकारों  में स्पष्ट नजर आती है। यह अखबार भी इसी परंपरा का अनुगामी है।

 

वर्तमान लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के पहले तक राजस्थान के इस अखबार में कांग्रेस का गुणगान अधिक नजर आता था। पर्याप्त लाभ न मिलने के कारण शायद इनके सेठ मोदी सरकार से कुछ खार भी खाए हुए थे। छत्तीसगढ़ से जब यह अखबार शुरू हुआ, तब भाजपा की सरकार थी। उस वक्त इनको विज्ञापन मिलने में दिक्कत होने लगी, तो उन्होंने भाजपा के खिलाफ मुहिम शुरू कर दी। जितना हो सकता था, भाजपा सरकार को कोसने की पूरी कोशिश कर रहे थे। हमारे जैसे अनेक लोगों को लगता था  कि वाह, क्या अखबार है । इनकी पत्रकारिता के क्या कहने! लेकिन बहुत बाद में पता चला कि मामला कुछ और है। विज्ञापन न मिलने के कारण इनके अंदर की पत्रकारिता उफन कर बाहर आ रही है। लेकिन जैसे ही बाद में इनको सरकार की ओर से विज्ञापनरूपी टुकड़े डाले जाने लगे, तो अखबार ने अपने सुर भी बदलने शुरू कर दिए। और हालत यह हुई कि ईमानदारी से पत्रकारिता करने वाले कुछ लोगों को इसी अखबार ने हटाने का सिलसिला भी शुरू कर दिया क्योंकि ये पत्रकार भाजपा सरकार की गलत हरकतों के विरुद्ध खबरें लिख रहे थे। अखबार की  इस घटिया कार्रवाई के विरुद्ध मैंने उस वक्त भी प्रतिवाद किया था कि यह कौन-सी पत्रकारिता है कि जो सरकार के खिलाफ लिख रहा है, उस रिपोर्टर को आप अपने अखबार से बाहर का रास्ता दिखा दे क्योंकि आपको सरकार के विज्ञापन चाहिए?

 

इसी अखबार ने मोदी सरकार के आने के बाद  तो यकायक यू-टर्न सा ही ले लिया है ।जैसे ही इस चुनाव में मोदी को अप्रत्याशित बहुमत मिला, तो इस अखबार के मालिक ने फौरन पलटी मार ली । 25 मई के अंक में उन्होंने प्रथम पृष्ठ पर बड़ी उदारता के साथ मोदी-वंदना की है। उनकी टिप्पणी की भाषा पढ़ कर सामान्य पाठक भी समझ गया कि अखबार मालिक कितना बड़ा मक्खनबाज़ है,विचारबदलू है । वैसे यह किसी एक अखबार की बात नहीं है। इस देश में समय-समय पर कुछ अखबार सत्ता के अनुसार पाला बदलते रहे हैं। इस अखबार ने भी उसी पलटीमार -परंपरा का निर्वाह किया है। इस अखबार के बारे में पहले से भी लोग यह कहते रहते हैं कि जब जब सरकारें बदलती है इस अखबार के सुर भी बदलते रहते हैं। शायद यह समय-सापेक्ष-पत्रकारिता का नया फंडा है कि जिधर बम,उधर हम। आर्थिक दृष्टि से बम-बम  रहने के लिए मीडिया की यह 'घुटनाटेक पत्रकारिता' अंततः पत्रकारिता का ही नुकसान करेगी। पत्रकार को निष्पक्ष होकर , तटस्थ होकर पत्रकारिता करनी चाहिए, न किसी दल के साथ राग और न किसी दल के साथ द्वेष। यही उस का मूल मंत्र होना चाहिए। अगर इस भावना से पत्रकारिता होगी तो सरकार किसी की भी रहे, अखबार निर्भीक हो कर उसके खिलाफ लिख सकेगा। बिकी हुई पत्रकारिता सत्ता को आईना नहीं दिखा सकती। और जब और राग दरबारी गाने लगती है, तो  बुरी तरह एक्सपोज़ भी हो जाती है। 

वैसे ऐसा नहीं है कि यह इकलौता अखबार है ।अनेक अखबार समय-समय पर सुर बदलते रहते हैं । अब तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पलटीमार-चरित्र भी साफ-साफ नजर आने लगा है । दस दिन पहले तक  जिन चैनलों को लग रहा था कि नरेंद्र मोदी की वापसी संभव नहीं है, तो वे नरेंद्र मोदी को कोसते नजर आ रहे थे। लेकिन जैसे ही नरेंद्र मोदी बहुमत में आए, इन चैनलों के सुर बदल गए। यानी  मोदी शरणम गच्छामि हो गए।  पत्रकारिता तो किसी भी तरह की लाभ हानि  की भावना से उठकर की जाने वाली साधना है लेकिन अब शायद  पत्रकारिता को मिशन  समझने वाला वह दौर ही नहीं रहा। जिस दौर को देखते और जीते हुए कुछ लोग पत्रकारिता किया करते थे ।

 

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