विशेष टिप्पणी

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गुलाब की पत्तियों के बीच दुबका लोकतंत्र

नथमल शर्मा

बिलासपुर। देश में आम चुनाव हो रहे हैं । दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में हम अगले पांच बरस के लिए अपनी सरकार चुन रहे हैं । चार चरण पूरे हो चुके हैं और आधी से ज्यादा (374) लोकसभा क्षेत्रों के जनादेश मुहरबंद हो चुके हैं । इन तीन सौ  चौहत्तर  क्षेत्रों के करोड़ों लोग बाएं हाथ की उंगली पर अमिट स्याही लगाकर खुश हैं  (शायद)। परिणाम आते तक इनकी ऊंगलियों से स्याही के निशान मिट चुके होंगे । वैसे तो इस ये चुनाव कोई निशान ही नहीं छोड़ रहा । देश के आम चुनाव में कोई मुद्दा ही नहीं है । यह सबसे गंभीर और भयावह है । लोगों को किस तरह "चुप समाज" में बदल दिया गया है । 

नोटबंदी की नाकामी ,जीएसटी की उलझनों, पंद्रह लाख रुपये के जुमले (?) से शुरू हुई चर्चा राफेल तक आकर ठहरी और फ़िर कोर्ट-कचहरी में उलझकर रह गई । शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, महंगाई, रोजगारी, खेती-किसानी, काला धन, विकास, पीने का साफ़ पानी, सफ़ाई के लिए तरसते मोहल्ले और गांव-शहर भी । इन सब मुद्दों पर अभी तक तो कोई चर्चा नहीं हुई । देश के आम चुनाव में सारे बिंदु मोदी - मोदी में आकर समाहित हो गए। सिमट कर रह गए । यहां तक कि शहजादा,नामदार, पप्पू भी चर्चा से गायब । चोर से चौकीदार को अलग करते हुए चौकीदार को प्रचार ले उड़ा । और चोर कह रहे देखते ही रह गए । देख भी रहे हैं । पिछली बार चाय वाला कहा तो वही प्रचार ब्रांड हो गया । इस बार चौकीदार । ये है हमारे देश का आम चुनाव । राजनीतिक दलों ने घोषणा पत्र बनाए । चुनाव के दो - चार दिन पहले जारी किए । लेकिन सिवाय दो चार लोक-लुभावन घोषणाओं के किसी भी मुद्दे पर चर्चा नहीं की गई । यानी कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा,तृणमूल, आदि ने भी अपने-अपने घोषणा पत्रों पर पूरी गंभीरता से चर्चा नहीं की । यहां तक इन दलों के कार्यकर्ताओं को तो छोड़िए नेताओं को भी पूरा घोषणा पत्र पता नहीं होगा । जाहिर है इस पर भाषणों में तो बात होती ही नहीं ।और अपने देश में समाज के बौद्धिक वर्ग , पत्रकारों,  सामाजिक कार्यकर्ताओं किसी को भी ये जरूरी ही नहीं लगता कि राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों पर गंभीरता से चर्चा की जाए । 

 इस चुनाव में चर्चा है मोदी- मोदी । यानी अगले पांच बरस के लिए अपनी सरकार चुनने में हमें व्यक्ति को चुनना है । मज़े की बात यह भी कि इस बार तो भाजपा ने खुद को मोदी से छोटा कर लिया है । भाजपा के विज्ञापनों में यही नारा है "अबकी बार मोदी सरकार " । यह नारा "अबकी बार भाजपा सरकार " भी तो हो सकता था । होना ही था । लेकिन नहीं । अब हम अपने लोकतन्त्र को व्यक्ति की गोद में बैठाने तैयार हैं । दुखद यह कि कांग्रेस और बाकी विरोधी दलों ने इस पर एक शब्द नहीं कहा । शायद इसलिए कि इनका कहा बूमरेंग हो जाता  ।कांग्रेस,सपा,बसपा,तृणमूल,बीजद, जैसे दलों से भी तो आंतरिक लोकतंत्र कब का खत्म हो गया । ये सब दल भी तो एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही है । लोकतंत्र का दम भरने वाले हम मतदाताओं, जागरूक नागरिकों ने कहां पहुंचा दिया है लोकतंत्र को । जहां लोक हाशिये पर है और व्यक्ति का तंत्र हावी है । 

 ऐसे माहौल में हो रहे हैं देश में चुनाव । ध्यान देने लायक बात यह भी है कि लोगों में भी इस पर कोई गंभीर बात नहीं होती । हम भारतीय खूब राजनीतिक चर्चा करते हैं । हर व्यक्ति देश के तमाम राज्यों का विश्लेषण कर देता है । चुनावी मुद्दों की गंभीरता समझनी हो तो चुनाव प्रबंधन सम्हाल रहे नेताओं से बात करिये । लगेगा कि बाकी सब बेकार की बातें हैं । सबसे बड़ी बात है जाति । किस क्षेत्र या गांव में किस जाति के लोग कितने है और वह किसे वोट देंगे । बस सारा गणित इसी पर । अब देश के प्रधानमंत्री छत्तीसगढ आए । चुनावी भाषणों में बताया कि गुजरात में तेली ही मोदी है । जैसे छत्तीसगढ़ में साहू वैसे गुजरात में मोदी । यानी यहाँ के साहू हमारे । किसी चुनाव में देश के प्रधानमंत्री को अपनी जात बताना पड़ जाए । गज़ब है । ये तो एक उदाहरण ही है । हर गांव, शहर में चुनावी आकलन इसी के आस-पास ही तो है । कुर्मी किस तरफ़ ज्यादा वोट करेंगे या कि ठाकुर, ब्राह्मण किसे वोट दे रहे हैं । मुस्लिम किसके वोट बैंक हैं तो अन्य जातियां किस किसको वोट कर रही है । ये तो हालात है । और हम लोकतंत्र के जिम्मेदार नागरिक होने का दंभ पाले उंगलियों में निशान लगवा रहे हैं । 

 जाति के अलावा धर्म भी एक अघोषित तौर पर घोषित मुद्दा ही है । तभी तो एक प्रदेश का मुख्यमंत्री अली बली कहने का साहस (दुस्साहस) करता है तो कोई नेत्री बजरंग बली को दलित जाति की बता देतीं हैं । कोई नेता किसी के अंतर्वस्त्रों की निम्न बात भी करता है तो कोई नेत्री अपने क्षेत्र में जूते बांटती है और उसी की प्रतिद्वंद्वी नेत्री इस जूते बांटने को क्षेत्र की जनता का अपमान बताती हैं । 

और हां राष्ट्रवाद भी अघोषित तौर पर घोषित मुद्दा । सैनिकों के नाम पर वोट मांगे जाएं । फिर चुनाव आयोग की फटकार के बाद थोड़ा चुप हो जाएं । पर बात को तो चर्चा में ला ही दिया जाए । जो ज्यादा विरोध करे वो देशद्रोही । 

इस तरह के माहौल में हो रहे हैं चुनाव ।  बुनियादी सवाल गायब है । सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियां बताए तो बेहतर होता और विरोधी दल सत्ता की नाकामी के साथ ही वो खुद क्या करेंगे ये समझा पाते तो कुछ बात होती । पर ऐसा कुछ है नहीं । विरोधियों के लिए मोदी ख़तरा है तो सत्ता दल के लिए मोदी ही जरूरी है । इस सवाल विहीन, विचार विहीन दौर पर लाकर खड़ा कर दिया गया है समाज को । यहां पूछने वाले चुप हैं । बोलने वाले चिल्ला रहे हैं । इस शोर में आम आदमी की आवाज़ कहीं नहीं और गुलाब की पत्तियों की बौछार के बीच लोकतंत्र दुबक कर रह गया है,  वह उन कांटों की चुभन महसूस कर रहा है जिनसे गुलाब तोड़े गये । दुबके लोकतंत्र और चुप समाज की तस्वीर में आम चुनाव हो रहे हैं । फिर भी लोकतंत्र पर भरोसा रखने वालों की ताकत से डर तो रहें हैं ही नेता । हां, भव्य रैलियों और कड़प लगे कुर्तों के साथ खुद के सबसे ताकतवर होने का भ्रम पाले हुए सरकार बना लेने और बन जाने को आतुर वे हाथ हिलाते बढ़ रहें हैं आगे । हम अब भी नहीं चेते तो लोकतंत्र में तटस्थ होने के अपराधी होंगे और इतिहास माफ़ नहीं करेगा हमें । 

यह विडंबना ही है कि इस चुनाव में कोई नारा तक भी नहीं है। पहले सकारात्मक, नकारात्मक मुद्दे नहीं तो नारे तो चर्चित होते ही थे । "जय जवान जय किसान ",  "हरित क्रांति ", "गरीबी हटाओ ",  "कांग्रेस का हाथ सबके साथ ",  "ठाकुर बामन बनिया चोर बाकी के सब डीएस फोर","तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार ", "बोफोर्स के दलालों को जूते मारो सालों को", "अच्छे दिन आएंगे ", "विकास ", "विकास पागल हो गया है "।  लेकिन इस चुनाव में शुरू में भीड़ कहती रही "चौकीदार चोर है " और फिर सिर्फ "मोदी मोदी " । देश के आम चुनाव का नारा मोदी मोदी ??

इतना ही नहीं आधे ज्यादा हो चुके चुनाव में किसी पत्रकार की कोई रिपोर्ट चर्चित नहीं । किसी संपादक के किसी संपादकीय या लेख की चर्चा तक नहीं । चैनलों की चर्चा तो सिर्फ बिके हुए हैं तक ही होकर रह गई । कहा जाता था कि अखबार जनमानस तैयार करते हैं, पर अब ऐसा कुछ नहीं रहा । अब तो चैनल या अखबार सूचनाएं तक नहीं देते, विश्लेषण की तो बात ही छोड़िए । विज्ञापनों से आटे पड़े अखबारों में खबरों के लिए बची जगह में नेताओं के मुद्दे विहीन भाषणों के अंश ही तो होते हैं । अब गावों में जाकर या शहरों के ही मोहल्लों में जाकर लोगों से बात करने की तकलीफ़ कोई पत्रकार नहीं उठाता । उसे पता है कि उसके कार्पोरेट मीडिया मालिक को इसकी ज़रूरत नहीं, उनके पास तो विज्ञापनों के पैकेज के साथ ही खबरों के पुलिंदे भी आ जाया करते हैं ।

यह इस भयावह समय का आम चुनाव है जिसका नारा मोदी मोदी होकर रह गया है । विवेक हीन और उन्मादी भीड़ मोदी मोदी चिल्लाती सड़कों पर है जिसे देखकर आम आदमी डरा हुआ है । डर रहा है । कुछ सौ लेखक, कलाकार अपील जारी कर रहे हैं । इस खतरे को पहचानिए । मोदी को आने से रोकिए। ये कुछ सौ ही हैं । मुट्ठी भर भी नहीं । विचार वान समाज के विचारहीन में बदलते दौर में आज गांधी या प्रेमचंद सा एक भी लेखक तो नहीं दिखता जिसके आव्हान को लोग पढें, विचार करें । खाया- पीया,अघाया मध्य वर्ग मस्त है और मोदी के बिना उद्धार नहीं कहकर ऑनलाइन पिज़्ज़ा आर्डर कर रहा है । वंदे मातरम् भले ही याद न हो पर स्वैगी,  ज़ोमैटो, अमेज़न जैसे शब्द याद है नन्हे - मुन्नों को भी और विडंबना कि इस याद होने पर फेसबुक पर ऐसी ही किसी पोस्ट को लाइक करते हुए मम्मी पापा गर्वित हैं । देश में  आम चुनाव हो रहे हैं ।

 

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कुछ इस तरह से भी तलाशा जा रहा है पुनीत गुप्ता को

मानुष बली  नहीं होत है, समय होत बलवान

भिल्लन लूटी गोपिका वही अर्जुन वही बान

रायपुर. इस कहावत को हम सब बचपन से ही सुनते आ रहे हैं. इसका सीधा सा अर्थ यहीं है कि जब मनुष्य का अच्छा समय होता है तो उसे खुद को बलवान समझने की भूल नहीं करनी चाहिए. क्योंकि जब वक्त खराब होता है तो अर्जुन जैसे धुंरधर का धनुष भी पोंगली बनकर रह जाता है.अगर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह इस कहावत का अर्थ समझ लेते तो हाल-फिलहाल अपमान की जिस तंग गली से वे गुजर रहे हैं उस तंग गली से गुजरने की उन्हें जहमत नहीं उठानी पड़ती. लेकिन शायद... राजनीति में यह धारणा भी कायम है कि क्या सम्मान और कैसा अपमान....।  मगर ऐसा नहीं है. अपनी इमेज को चमकाने के लिए करोड़ों रुपए फूंकने वाले रमन सिंह भी शायद भली-भांति जानते होंगे कि राजनीति गंदी तो होती है, लेकिन उसमें चलता तो वहीं है जिसे जनता साफ-सुथरा मानती है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पन्द्रह साल तक डाक्टर रमन सिंह की इमेज चाउंर वाले बाबा यानी दानदाता की बनी हुई थीं... अगर पूर्व मुख्यमंत्री संविदा में पदस्थ अफसर अमन सिंह और विवादास्पद आईपीएस मुकेश गुप्ता के चक्रव्यूह में नहीं फंसते तो शायद चौथीं बार भी जनता उन पर अपना बेशुमार प्यार लुटाती.अब आलम यह है कि उनके और उनके परिजनों के खिलाफ छोटे-बड़े हर शख्स ने मोर्चा खोल रखा है. ( यहां तक उनकी अपनी पार्टी के लोग भी पीछे नहीं है.)

हाईकोर्ट से राहत पाने के बाद भी मंगलवार को पुनीत गुप्ता अपना बयान दर्ज करवाने के लिए गोलबाजार थाने नहीं पहुंचे. इस बीच एक ऑडियो वायरल हुआ जिसमें यह कहा गया था कि घोटाले के आरोपी पुनीत गुप्ता क्या बीमार पड़ गए हैं. आखिर वे पुलिस को बयान देने से डर क्यों रहे हैं. इस तस्वीर को गौर से देखिए. तस्वीर में पुनीत गुप्ता को मोस्ट वांटेड बताया गया है और पता बताने वाले को 51 रुपए ( 51 हजार नहीं ) ईनाम देने की घोषणा की गई है.

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बघेल ने भेजा आईना तो क्या गलत किया

राजकुमार सोनी

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक आईना क्या भेज दिया सूबे की सियासत में भूचाल आ गया. हालांकि ऑनलाइन आर्डर किया गया आईना अभी प्रधानमंत्री निवास तक पहुंचा भी नहीं होगा, लेकिन उससे पहले भाजपा के छोटे- बड़े स्तर के सभी नेता नाराज हो गए हैं. भाजपा नेताओं को लग रहा है कि भूपेश बघेल को आईना नहीं भेजना चाहिए था. भाजपा नेता इधर-उधर बयान तो दे रहे हैं,लेकिन वे यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि बघेल को आईने की जगह और कौन सा दूसरा सामान भेजना था जिससे लोकतंत्र थोड़े समय के लिए ही सही सुरक्षित और मजबूत रह पाता. ( जिस देश में लेखक/ पत्रकार/ वकील/ संस्कृतिकर्मी/  फिल्मकार भाजपा को वोट न देने की अपील कर रहे हो तो समझ लीजिए लोकतंत्र किस खतरनाक मुहाने पर खड़ा कर दिया गया है. सबको लग रहा है कि अगर दोबारा मोदी आ गए तो देश नफरत की आग में झुलसकर रह जाएगा. यह कुछ वैसा ही है जैसा हाल के विधानसभा चुनाव में डाक्टर रमन सिंह की सरकार को लेकर कायम था. सबको यह लगने लगा था कि लोकतंत्र निलंबित कर दिया गया है. )

 

हालांकि आईना भेज देने से भी लोकतंत्र सुरक्षित रह जाएगा इसकी गारंटी कम है. कब एक बम पड़ोसी देश में जाकर गिर जाएगा और पिल-पिल करते हुए भक्त बिल से निकलकर कहने लगेंगे- मोदी है तो मुमकिन है. फिर भी आईना विरोध का... एक सिबांल तो है ही. जब कोई किसी से चिढ़ जाता है तो कहना नहीं भूलता- जाओ... पहले आईने में अपनी सूरत देख लो. बघेल के आईना भेजने के पीछे भी शायद यहीं भाव काम कर रहा है. बघेल ने कहा है- प्रधानमंत्री जी... मैं आपको आईना भेज रहा हूं. इस आईने को आप ऐसी जगह लगाएंगे जहां से आप सबसे अधिक बार गुजरते हो. हो सकता है कि आप आईने का इस्तेमाल न करें. किसी कूड़ेदान में फेंक दें. लेकिन फिर भी आप आईना देखने से बच नहीं पाएंगे. जनता आपको जल्द ही आईना दिखा देगी.

बहरहाल आईना दिखाने पर नेता प्रतिपक्ष धरम कौशिक ने बघेल को राहुल और सोनिया गांधी को भी आईना भेजने की सलाह दी है. कलक्टरी छोड़कर राजनीति में गए ओपी चौधरी ने भी विनम्रता पूर्वक अपनी बात रखी हैं, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह की प्रतिक्रिया बड़ी अजीब है. उनका कहना है- अभी बघेल महज सत्तर दिन के मुख्यमंत्री है, लेकिन वे पन्द्रह साल के मुख्यमंत्री और पांच साल के प्रधानमंत्री को आईना दिखाने का कृत्य कर रहे हैं. यह एक छोटी मानसिकता है. रमन सिंह के इस कथन के बाद  बघेल ने भी पलटवार करते हुए कहा है- सवाल सत्तर दिन या सत्तर साल का नहीं है. इस देश में हर किसी को सवाल करने का अधिकार है और मैं वहीं कर रहा हूं. बघेल ने आगे कहा है- मैं किसी भी सवालों से कभी नहीं भागता इसलिए तीन अप्रैल को शाम सात बजे सभी सवालों का जवाब देने के लिए फेसबुक पर लाइव भी रहूंगा. वैसे बघेल की बात में दम तो है. रमन सिंह के पन्द्रह साल के कार्यकाल में पत्रकार सवाल पूछने से डरते थे. जो पत्रकार सवाल करता था उस पर सुपर सीएम और उनके गैंग के लोग एफआईआर दर्ज करवा देते थे. असहमति लोकतंत्र की खूबसूरती होती है इसे रमन सिंह कभी समझ ही नहीं पाए. उन्हें और उनको घेरकर रखने वालों को न जाने क्यों लगता था कि असहमति को कुचलकर ही सत्ता पर काबिज रहा जा सकता है.

खैर.. अब जब कल बघेल फेसबुक पर लाइव रहेंगे तब कई सारी बातों का खुलासा हो सकता है. हो सकता है कि कोई कल यह भी पूछ बैठे कि मोदी तो शेविंग करते नहीं है फिर भी आपने उनको फैटेंशी सिल्वर शेविंग एंड मेकअप वाला आईना क्यों भेज दिया.

 

बहरहाल आईना राजनीति पर कुछ शायरी याद आ रही है. कृष्ण बिहारी नूर कहते हैं- धन के हाथों बिके हैं सब क़ानून अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं. चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो, आईना झूठ बोलता ही नहीं.  प्रसिद्ध कवि गुलजार ने लिखा है- आईना देखकर तसल्ली हुई. हमको इस घर में जानता है कोई. अब से कुछ अरसा पहले देशबन्धु अखबार में एक कॉलम घूमता हुआ आईना काफी लोकप्रिय हुआ था. यह आईना इधर-उधर घूमता रहता था और कई बार कई रसूखदार लोग नाराज हो जाया करते थे. इस टिप्पणी को लिखते हुए पंड़ित राजनारायण मिश्र जो इस कॉलम को लिखते थे उनकी याद भी आ रही है. किसी अखबार में अगर घूमता हुआ आईना जैसा कोई दमदार कॉलम होता या मीडिया गोदी मीडिया नहीं होता तो शायद भूपेश बघेल को भी ऑनलाइन आईना भिजवाने की आवश्यकता नहीं होती. लेकिन कंसोल इंडिया के इस युग में यह संभव नहीं हो पाया. 

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युद्ध और उन्माद : मीडिया की नकारात्मक भूमिका

 
 
गिरीश पंकज
 
 किसी भी राष्ट्र को अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए युद्ध की नौबत आने पर युद्ध करना ही चाहिए। दुश्मन अगर हमला करता है तो उसका जवाब देना फर्ज है । देश की आजादी के लिए हमारे अनेक क्रांतिकारियों ने बलिदान किया। अनेक स्वतंत्रता सेनानी जेलों में वर्षों तक कैद रहे । फिरंगियों के अत्याचार भी सहे। तब कहीं जाकर हमें यह आजादी मिली। हालांकि आजादी के बाद से ही हमें पाकिस्तान से जूझना पड़ा । भारत का ही एक टुकड़ा अलग से एक देश बना और आजादी के तत्काल बाद पाकिस्तान ने 1948 में युद्ध किया, तो हमें भी युद्ध करना पड़ा। कुछ वर्षों बाद 1962 में चीन ने आक्रमण किया, तब हमें उससे जूझना पड़ा।  फिर तीन साल बाद पाकिस्तान ने दोबारा आक्रमण किया।  फिर उसका मुकाबला करना पड़ा। उसे हमने पराजित भी  किया। 1971 को फिर पाकिस्तान ने आक्रमण किया और बुरी तरह से पराजित हुआ। और उसी युद्ध ने एक नए देश को जन्म हुआ, जिसका नाम पड़ा  बांग्लादेश।
 
 हम शांति के पक्षधर
 
भारत का इतिहास रहा है कि उसने कभी भी आक्रमण की कोशिश नहीं की। हम शांति प्रिय देश रहे हैं ।शांति के लिए ही समर्पित रहे। लेकिन जब युद्ध होता है तो शांति से काम नहीं चल सकता। तब क्रांति करनी पड़ती है। युद्ध लड़ना पड़ता है। भारत ने मजबूरी में हर युद्ध किया। पिछले दिनों पुलवामा में जब हमारे 40 जवान आतंकी हमले में शहीद हुए, तो भारत को मजबूरी में बालाकोट में हमला करके  आतंकियों के अनेक ठिकानों को तबाह करना पड़ा। और यह जरूरी भी था। लेकिन इस हमले के बाद मीडिया के माध्यम से जो दृश्य सामने आ रहा है, वह बेहद खतरनाक है। चिंताजनक है।
 
युद्ध-उन्माद ठीक नहीं
 
 युद्ध अपनी जगह है लेकिन युद्ध का वातावरण बने, यह चिंता की बात है। किसी भी राष्ट्र के लिए युद्ध कभी भी फायदे का सौदा नहीं हो सकता। युद्ध तो लड़े जाते हैं। कोई देश जीतता है, तो कोई  हारता है । लेकिन इस युद्ध के बाद  देश लगभग टूट जाता है। भारत जैसे देश में मध्यमवर्गीय लोग अधिक हैं ।उससे भी ज्यादा तादाद गरीबों की है। जब जब भारत में युद्ध हुए हैं, हमने देखा है कि महंगाई बढ़ी है। गरीबों को खाने के लाले पड़ गए। मध्यम वर्गीय व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से बेहद परेशान हुआ।
 भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में, जहां भी युद्ध हुए, उस देश में आर्थिक संकट गहराया है। इसलिए किसी भी देश को युद्ध से बचना चाहिए । दुर्भाग्य की बात है कि पाकिस्तान में छुपे आतंकवादी इस सत्य को नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्मादी होकर वे अपने ही देश के लोगों का नुकसान कर रहे हैं। पता नहीं यह कौन- सी मानसिकता है कि निर्दोषों की हत्या कर दो । आतंक फैला दो। खून खराबा करो और फरार हो जाओ। किसी भी देश के खिलाफ इस तरह की बर्बर कार्रवाई मानवता के माथे पर कलंक है । लेकिन समझ में नहीं आता पाकिस्तान में पनप रहे आतंकवादी ऐसा क्यों करते हैं ? भारत की तरह पाकिस्तान के आम नागरिक भी युद्ध नहीं चाहते । सभी आतंकवाद के खिलाफ हैं लेकिन जब कुछ की मानसिकता में ही उन्माद हो, अराजकता हो, तो उसकी कोई दवा नहीं। भारत में भले ही बालाकोट में हमला करके 300 आतंकियों को मार डाला। उनके ठिकाने तबाह कर दिए लेकिन मुझे नहीं लगता कि उसके बाद भी आतंकवादी कोई सबक लेंगे। वह नए उन्माद से लैस होकर फिर भारत पर हमला करने की कोशिश करेंगे। उस हमले के जवाब में फिर भारत सर्जिकल स्ट्राइक करेगा या कुछ और तरीके से देने की कोशिश करेगा । युद्ध का जवाब युद्ध ही हो सकता है। यह संभव नहीं है कि दुश्मन हमला करें और भारत हाथ जोड़कर के कहे कि आपने बहुत अच्छा किया । लेकिन नतीजा ?...तबाही । 
 
युद्ध, उन्माद और मीडिया
 
मेरे जैसे अनेक लोग युद्ध के खिलाफ हैं क्योंकि युद्ध अनेक तरह की विसंगतियों के साथ उपस्थित होता है। इसलिए इससे बचा जाना चाहिए।  किसी भी राष्ट्र के विवेक पर निर्भर करता है कि वह युद्ध की रणनीति बनाए या फिर शांति की परियोजनाएं। अमेरिका जैसे कुछ देश भारत और पाकिस्तान को एक बाजार की तरह देखते हैं। हथियारों का बाजार। भारत और पाकिस्तान दोनों का रक्षा बजट निरंतर बढ़ता जा रहा है । विकास के दूसरे क्षेत्रों में कटौती करके हम रक्षा सौदों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं । यह भारत की मजबूरी भी है क्योंकि जब पाकिस्तान अपना सैन्य बल बढ़ाता जा रहा है तो स्वाभाविक है कि भारत को भी अपनी तैयारी करनी पड़ेगी। एक देश के उन्माद के कारण दूसरे देश को मजबूरी में सावधान होना पड़ रहा है। यह दुखद स्थिति है। ऐसी स्थिति के बीच में मीडिया की मानसिकता पर भी गंभीर चर्चा जरूरी है। पिछले दिनों पुलवामा में आतंकी अटैक के बाद बालाकोट में जब हमारी सेना ने दुश्मन के घर में घुसकर उसके आतंकी ठिकाने तबाह किए, उसके बाद हमारा मीडिया अति उत्साह में आकर जिस तरह की भाषा में डिबेट करता नजर आया, वह काफी खतरनाक रहा । पाकिस्तान के खिलाफ अनेक बार उकसाने वाली शब्दावलियों का प्रयोग करने के कारण उन्माद की स्थिति और ज्यादा सघन होती गई। सीमा पर अभी युद्ध की नौबत नहीं आई है फिर भी मीडिया की हरकत के कारण ऐसा लगने लगा कि सीमा पर भीषण युद्ध हो रहा है। मीडिया, को गंभीरता के साथ देश में शांति का माहौल बनाना चाहिए था, लेकिन उसने अपनी टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में देश को युद्ध की ओर धकेलने की कोशिश की। देश के कोने - कोने में बैठे लोग टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग देखकर उत्तेजित होते रहे और पाकिस्तान से दो - दो हाथ करने के नारे लगाते रहे।  एक टीवी चैनल मैं देख रहा था। उसका एंकर चीख -चीख कर कह रहा था कि 'अब पाकिस्तान पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा।... हमारी सेना पूरी तरह से मुस्तैद है।...वह शत्रु का मुंहतोड़ जवाब देगी और देखते -ही- देखते पाकिस्तान खाक में मिल जाएगा।" लगभग इसी तरह के जुमले अनेक टीवी चैनलों में नजर आते रहे। मैं इस मूर्खता पर हँसता रहा कि भाई मेरे, पाकिस्तान को तबाह करके तुम्हें क्या मिलेगा ? क्या वहां के बाईस करोड़ नागरिकों को जीने का हक नहीं है ? तबाह करना है, तो आतंकवाद को तबाह करो । आतंकियों के अड्डे तबाह करो । खोज -खोज कर उनके बंकरों को नष्ट करो । देश को तबाह करने की बात क्यों करते हो? लेकिन जब मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए नीचे गिर जाए तो उसके पास सिवाय उन्माद बढ़ाने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प ही नहीं रहता। टीवी चैनलों को देख देखकर लोग उत्तेजित होते हैं और देश का माहौल युद्ध के उन्माद से ग्रस्त हो जाता है।
 
मीडिया सकारात्मक बने
 
 यह समय सावधान रहकर विमर्श करने का है उन्मादग्रस्त आतंकियों को हमारी सेना ने मुंह तोड़ जवाब दिया है ।भविष्य में भी वह जवाब देती रहेगी। सेना अपना काम कर रही है । वह सीमा पर राष्ट्र की सुरक्षा के अपने मिशन पर निरंतर लगी हुई है । लेकिन हमें भी अपने मिशन के बारे में सोचना है । यह मिशन है शांति का, सद्भाव का, भाईचारे का। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि कैसे सद्भावना का वातावरण बने। कैसे अमन और चैन की बात की जाए । यह तभी संभव हो सकता है जब रचनाकार और मीडिया वाले सकारात्मक रूप से प्रेम और सद्भावना की रचना करें । मीडिया वाले अति रंजना पूर्ण कार्यक्रमों से बाज आएं । जितना उचित है , उतना ही कार्यक्रम दिखाएं। कई बार टीवी चैनल कुछ ऐसे निकृष्ट लोगों को आमंत्रित करता है जो केवल विष वमन ही करते हैं। अति उत्साह में या अनजाने में ही। इस पर भी विचार होना चाहिए । कुल मिलाकर यह समय चिंता जनक है । मैं कल्पना मात्र से सिहर जाता हूं कि अगर भारत और पाकिस्तान में एक बार फिर युद्ध हुआ तो देश की आर्थिक हालत क्या होगी । अभी भी देश महंगाई की मार से त्रस्त है ।सरकार की निरंतर आलोचना इसी बात के लिए होती है । आम आदमी का बजट गड़बड़ा जा चुका है। ऐसे समय मे अगर युद्ध होगा तो कल्पना कीजिए कि देश की क्या हालत होगी। लोग खाने के लिए तरस जाएंगे। महंगाई बढ़ जाएगी। घर का क्या देश का बजट भी बिगड़ जाएगा। हालांकि कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि युद्ध जरूरी है क्योंकि दुश्मन ने हमला किया है, तो मैं कहूंगा बेशक जरूरी है लेकिन उससे भी जरूरी और  महत्वपूर्ण बात है युद्ध को रोकने की पहल की जाए। भारत जैसे देश को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर के पाकिस्तान के खिलाफ बात करनी चाहिए कि वह आतंकवाद को प्रश्रय न दे। युद्ध के लिए उकसाने की कोशिश ना करे। उधर पाकिस्तान का मीडिया उन्माद फैलाता है और भारत के भी अनेक चैनल उन्माद फैलाने का काम करते हैं । यह सब बंद होना चाहिए। इसके लिए सरकार की ओर से गाइड लाइन जारी होनी चाहिए।  मीडिया अनावश्यक रूप से इस देश की जनता को भड़काने की कोशिश ना करे। जो घटना जितनी हो रही है, उतनी ही बताए। उस में नमक -मिर्ची लगा कर अलग से स्टोरी करने की जरूरत नहीं है । पता नहीं कब हमारा मीडिया रचनात्मक दिशा में सोचने की कोशिश करेगा? मीडिया तो जैसे देखता ही रहता है कि  कोई बड़ी घटना हो और वह लपक कर उसे उठाए, फिर दिन भर उसे ही चलाता रहे । जैसे बिल्ली के भाग से छींका  टूटता है ,उसी तरह से मीडिया के भाग से पहले पुलवामा अटैक हुआ, उसके बाद बालाकोट की घटना हो गई। उसे लेकर टीवी चैनल सुबह से लेकर रात तक चर्चा करते रहे। लोगों को बुलाते रहे। और जो आते रहे, उनमें अधिकतर की भाषा में भयानक उन्माद दिखाई देता रहा। उनकी तनी हुई मुट्ठियाँ, उनके उत्तेजित स्वर देख कर ऐसा लगता रहा, जैसे ये स्टूडियो से सीधे उठेंगे और सीमा पर जाकर बंदूक चलाने लग जाएंगे ।जबकि ऐसा कुछ नहीं है। ऐसे लोग अपनी छवि चमकाने के लिए पाकिस्तान को गालियां देते हैं, सरकार को भी कोसते हैं और घर जाकर कहते हैं,  "आज तो मैंने पाकिस्तान की बजा दी।" यह जो उन्माद है, इसे हवा देने के मामले में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सबसे अधिक जिम्मेदार है । उसे आत्ममंथन करना चाहिए। अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए कैसे देश को युद्ध की ओर धकेल रहा है। भारतीय मीडिया के माध्यम से पाकिस्तान को निरंतर गालियां देने के कारण स्वाभाविक है कि वहां के लोगों के मन में भी भारत के प्रति गुस्सा जागेगा ।बवहां का टीवी चैनल भारत को गाली देगा, तो यहां के नागरिकों के मन में गुस्सा स्वाभाविक है । इसलिए दोनों देशो के मीडिया का दायित्व है कि वह गाली गलौज की भाषा से ऊपर उठकर शांति और सद्भावना का संदेश देने का काम करे। दोनों देश की सेनाएं है। वे अपने-अपने देशों की सुरक्षा के लिए जो कर सकती हैं करेंगी। उसमें मीडिया को बहुत हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। मीडिया का दायित्व है कि वह कैसे एक राष्ट्र को आर्थिक दृष्टि से संपन्न होने की दिशा में काम करें, कैसे देश में अमन कायम हो।।
 
 
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क्या आप इन ढाई महीने के लिए चैनल देखना बंद नहीं कर सकते? कर दीजिए- रवीश कुमार

 
अगर आप अपनी नागरिकता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। अगर आप लोकतंत्र में एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में भूमिका निभाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। अगर आप अपने बच्चों को सांप्रदायिकता से बचाना से बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। अगर आप भारत में पत्रकारिता को बचाना चाहते हैं तो न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दें। न्यूज़ चैनलों को देखना ख़ुद के पतन को देखना है।  मैं आपसे अपील करता हूं कि आप कोई भी न्यूज़ चैनल न देखें। न टीवी सेट पर देखें और न ही मोबाइल पर। अपनी दिनचर्या से चैनलों को देखना हटा दीजिए। बेशक मुझे भी न देखें लेकिन न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कीजिए।
 
मैं यह बात पहले से कहता रहा हूं। मैं जानता हूं कि आप इतनी आसानी से मूर्खता के इस नशे से बाहर नहीं आ सकते लेकिन एक बार फिर अपील करता हूं कि बस इन ढाई महीनों के न्यूज़ चैनलों को देखना बंद कर दीजिए। जो आप इस वक्त चैनलों पर देख रहे हैं, वह सनक का संसार है। उन्माद का संसार है। इनकी यही फितरत हो गई है। पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है। जब पाकिस्तान से तनाव नहीं होता है तब ये चैनल मंदिर को लेकर तनाव पैदा करते हैं, जब मंदिर का तनाव नहीं होता है तो ये चैनल पद्मावति फिल्म को लेकर तनाव पैदा करते हैं जब फिल्म का तनाव नहीं होता है तो ये चैनल कैराना के झूठ को लेकर हिन्दू-मुसलमान में तनाव में पैदा करते हैं। जब कुछ नहीं होता है तो ये फर्ज़ी सर्वे पर घंटों कार्यक्रम करते हैं जिनका कोई मतलब नहीं होता है। 
 
क्या आप समझ पाते हैं कि यह सब क्यों हो रहा है? क्या आप पब्लिक के तौर पर इन चैनलों में पब्लिक को देख पाते हैं? इन चैनलों ने आप पब्लिक को हटा दिया है। कुचल दिया है। पब्लिक के सवाल नहीं हैं। चैनलों के सवाल पब्लिक के सवाल बनाए जा रहे हैं। यह इतनी भी बारीक बात नहीं है कि आप समझ नहीं सकते। लोग परेशान हैं। वे चैनल-चैनल घूम कर लौट जाते हैं मगर उनकी जगह नहीं होती। नौजावनों के तमाम सवालों के लिए जगह नहीं होती मगर चैनल अपना सवाल पकड़ा कर उन्हें मूर्ख बना रहे हैं। चैनलों को ये सवाल कहां से आते हैं, आपको पता होना चाहिए। ये अब जब भी करते हैं, जो कुछ भी करते हैं, उसी तनाव के लिए करते हैं जो एक नेता के लिए रास्ता बनाता है। जिनका नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है। 
 
न्यूज़ चैनलों, सरकार, बीजेपी और मोदी इन सबका विलय हो चुका है। यह विलय इतना बेहतरीन है कि आप फर्क नहीं कर पाएंगे कि पत्रकारिता है या प्रोपेगैंडा है। आप एक नेता को पसंद करते हैं। यह स्वाभाविक है और बहुत हद तक ज़रूरी भी। लेकिन उस पसंद का लाभ उठाकर इन चैनलों के द्वारा जो किया जा रहा है, वो ख़तरनाक है। बीजेपी के भी ज़िम्मेदार समर्थकों को सही सूचना की ज़रूरत होती है। सरकार और मोदी की भक्ति में प्रोपेगैंडा को परोसना उस समर्थक का भी अपमान है। उसे मूर्ख समझना है जबकि वह अपने सामने के विकल्पों की सूचनाओं के आधार पर किसी का समर्थन करता है। आज के न्यूज़ चैनल न सिर्फ सामान्य नागरिक का अपमान करते हैं बल्कि उसके साथ भाजपा के समर्थकों का भी अपमान कर रहे हैं। 
 
मैं भाजपा समर्थकों से भी अपील करता हूं कि आप इन चैनलों को न देखें। आप भारत के लोकतंत्र की बर्बादी में शामिल न हों। क्या आप इन बेहूदा चैनलों के बग़ैर नरेंद्र मोदी का समर्थन नहीं कर सकते? क्या यह ज़रूरी है कि नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के लिए पत्रकारिता के पतन का भी समर्थन किया जाए? फिर आप एक ईमानदार राजनीतिक समर्थक नहीं हैं। क्या श्रेष्ठ पत्रकारिता के मानकों के साथ नरेंद्र मोदी का समर्थन करना असंभव हो चुका है? भाजपा समर्थकों, आपने भाजपा को चुना था, इन चैनलों को नहीं। मीडिया का पतन राजनीति का भी पतन है। एक अच्छे समर्थक का भी पतन है। 
 
चैनल आपकी नागरिकता पर हमला कर रहे हैं। लोकतंत्र में नागरिक हवा में नहीं बनता है। सिर्फ किसी भौगोलिक प्रदेश में पैदा हो जाने से आप नागरिक नहीं होते। सही सूचना और सही सवाल आपकी नागरिकता के लिए ज़रूरी है। इन न्यूज़ चैनलों के पास दोनों नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी पत्रकारिता के इस पतन के अभिभावक हैं। संरक्षक हैं। उनकी भक्ति में चैनलों ने ख़ुद को भांड बना दिया है। वे पहले भी भांड थे मगर अब वे आपको भांड बना रहे हैं। आपका भांड बन जाना लोकतंत्र का मिट जाना होगा। 
 
भारत पाकिस्तान तनाव के बहाने इन्हें राष्ट्रभक्त होने का मौका मिल गया है। इनके पास राष्ट्र को लेकर कोई भक्ति नहीं है। भक्ति होती तो लोकतंत्र के ज़रूरी स्तंभ पत्रकारिता के उच्च मानकों को गढ़ते। चैनलों पर जिस तरह का हिन्दुस्तान गढ़ा जा चुका है, उनके ज़रिए आपके भीतर जिस तरह का हिन्दुस्तान गढ़ा गया है वो हमारा हिन्दुस्तान नहीं है। वो एक नकली हिन्दुस्तान है। देश से प्रेम का मतलब होता है कि हम सब अपना अपना काम उच्च आदर्शों और मानकों के हिसाब से करें। हिम्मत देखिए कि झूठी सूचनाओं और अनाप-शनाप नारों और विश्लेषणों से आपकी देशभक्ति गढ़ी जा रही है। आपके भीतर देशभक्ति के प्राकृतिक चैनल को ख़त्म कर ये न्यूज़ चैनल कृत्रिम चैनल बनाना चाहते हैं। ताकि आप एक मुर्दा रोबोट बन कर रह जाएं। 
 
इस वक्त के अख़बार और चैनल आपकी नागरिकता और नागरिक अधिकारों के ख़ात्मे का एलान कर रहे हैं। आपको सामने से दिख जाना चाहिए कि ये होने वाला नहीं बल्कि हो चुका है। अख़बारों के हाल भी वहीं हैं। हिन्दी के अख़बारों ने तो पाठकों की हत्या की सुपारी ले ली है। ग़लत और कमज़ोर सूचनाओं के आधार पर पाठकों की हत्या ही हो रही है। अखबारों के पन्ने भी ध्यान से देखें। हिन्दी अख़बारों को उठा कर घर से फेंक दें। एक दिन अलार्म लगाकर सो जाइये। उठकर हॉकर से कह दीजिए कि भइया चुनाव बाद अख़बार दे जाना। 
 
यह सरकार नहीं चाहती है कि आप सही सूचनाओं से लैस सक्षम नागरिक बनें। चैनलों ने विपक्ष बनने की हर संभावना को ख़त्म किया है। आपके भीतर अगर सरकार का विपक्ष न बने तो आप सरकार का समर्थक भी नहीं बन सकते। होश में सपोर्ट करना और नशे का इंजेक्शन देकर सपोर्ट करवाना दोनों अलग बातें हैं। पहले में आपका स्वाभिमान झलकता है। दूसरे में आपका अपमान। क्या आप अपमानित होकर इन न्यूज़ चैनलों को देखना चाहते हैं, इनके ज़रिए सरकार को समर्थन करना चाहते हैं?
 
मैं जानता हूं कि मेरी यह बात न करोड़ों लोगों तक पहुंचेगी और न करोड़ों लोग न्यूज़ चैनल देखना छोड़ेंगे। मगर मैं आपको आगाह करता हूं कि अगर यही चैनलों की पत्रकारिता है तो भारत में लोकतंत्र का भविष्य सुंदर नहीं है। न्यूज़ चैनलों ने एक ऐसी पब्लिक गढ़ रही है जो गलत सूचनाओं और सीमित सूचनाओं पर आधारित होगी। चैनल अपनी बनाई हुई इस पब्लिक से उस पब्लिक को हरा देंगे जिसे सूचनाओं की ज़रूरत होती है, जिसके पास सवाल होते हैं। सवाल और सूचना के बग़ैर लोकतंत्र नहीं होता। लोकतंत्र में नागिरक नहीं होता। 
 
सत्य और तथ्य की हर संभावना समाप्त कर दी गई है। मैं हर रोज़ पब्लिक को धेकेले जाते देखता हूं। चैनल पब्लिक को मंझधार में धकेल कर रखना चाहते हैं। जहां राजनीति अपना बंवडर रच रही है। राजनीतिक दलों से बाहर के मसलों की जगह नहीं बची है। न जाने कितने मसले इंतज़ार कर रहे हैं। चैनलों ने अपने संपर्क में आए लोगों को लोगों के खिलाफ तैयार किया है। आपकी हार का एलान है इन चैनलों की बादशाहत। आपकी ग़ुलामी है इनकी जीत। इनके असर से कोई इतनी आसानी से नहीं निकल सकता है। आप एक दर्शक हैं। आप एक नेता का समर्थन करने के लिए पत्रकारिता के पतन का समर्थन मत कीजिए। सिर्फ ढाई महीने की बात है। चैनलों को देखना बंद कर दीजिए।
 
यह लेख फ़ेसबुक पेज @RavishKaPage पर भी है।
 
 
 

 
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जो रमन नहीं कर पाए वो भूपेश ने कर दिखाया

राजकुमार सोनी

अब से कुछ अरसा पहले रामगोपाल वर्मा निर्देशित और नागार्जुन अभिनीत एक फिल्म आई थी-शिवा. इस फिल्म में खलनायक का एक जोरदार संवाद था- गुंडे और मवालियों का धंधा लोगों के भीतर पैदा किए गए डर से ही चलता है. जिस रोज लोग डरना बंद कर देंगे... धंधा बंद हो जाएगा. फिल्म के संवाद का जिक्र मैं यहां इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इसका थोड़ा सा संदर्भ छत्तीसगढ़ से भी जुड़ता है. याद करिए जोगी का कार्यकाल. जब जोगी सत्ता में आए तो उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा के अफसर मुकेश गुप्ता को लाठी भांजने की पूरी छूट दी. प्रदेश में शिवसेना के एक प्रमुख पदाधिकारी धनंजय परिहार से हर अफसर और व्यापारी खौफजदा था. धमकी-चमकी, मारपीट और उगाही के हजारों मामले चल रहे थे.जोगी के कहने पर एक रोज मुकेश गुप्ता ने धनंजय परिहार का जुलूस निकाल दिया तो लोगों ने जमकर तालियां बजाई. लोगों को लगा कि आतंक खत्म हो गया है, लेकिन यह एक भ्रम था. थोड़े दिनों के बाद ही रामावतार जग्गी हत्याकांड हो गया और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, उनके पुत्र अमित जोगी के साथ-साथ मुकेश गुप्ता विवादों में घिर गए. जोगी पर आरोप लगा कि वे राजनीतिज्ञ नहीं ब्लकि तानाशाह के तौर-तरीकों से सरकार चला रहे हैं.उनके प्रिय अफसर मुकेश गुप्ता हर छोटी-मोटी बात पर लाठी चलाने और गोली से भून देने की धमकी देने लगे. प्रदेश का शायद ही कोई ऐसा भाजपाई ( रमन सिंह और उनके समूह से जुड़े लोगों को छोड़कर ) होगा जो उनसे प्रताड़ित न हुआ हो. भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता नंदकुमार साय को लाठी-डंडों से पीटा गया. उनके पैर की हड्डी टूट गई. आज भी जब कभी वे उस मंजर का जिक्र करते हैं तो उनके चेहरे पर अपनी ही सरकार के दोगले रवैये का अफसोस साफ तौर पर दिखाई देता है. सच तो यह है कि जोगी को सत्ता से खदेड़ने के पहले भाजपाई... मुकेश गुप्ता को लूप लाइन में भेजने की बात किया करते थे, लेकिन हुआ इसके उलट. भाजपा ने सरकार बनते ही मुकेश गुप्ता को सिर पर बिठा लिया. नंदकुमार साय, पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर सहित अन्य कई नेता चीखते-चिल्लाते रह गए, लेकिन उनकी चीख नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गई. कुछ दिनों बाद सीएम हाउस में अमन सिंह की इंट्री हो गई. बताते हैं कि उन्हें विक्रम सिंह सिसोदिया यह कहकर लाए थे कि साहब यानि रमन सिंह का कुछ कामकाज संभालना है, लेकिन उन्होंने मुकेश गुप्ता के साथ मिलकर साहब का नहीं बल्कि प्रदेश का कामकाज इस भयावह तरीके से कामकाज संभाला कि साहब की इमेज मटियामेट हो गई. जब कभी भी कोई पत्रकार अमन सिंह से मिलता था तो उनका एक ही डायलॉग सुनता था- यार... काम-काम-काम...। साहब के साथ काम करते-करते पंद्रह साल हो गए. पंद्रह साल से सोया नहीं हूं. पता नहीं आराम कब मिलेगा. शायद उनके पंद्रह साल से जरुरत से ज्यादा जागने का ही नतीजा था कि भाजपा पंद्रह सीटों पर सिमटकर रह गई.

बहरहाल... पंद्रह साल से विराजमान खौफ को भूपेश बघेल अपने देशज अंदाज से धीरे-धीरे खत्म करते जा रहे हैं. उन्हें खौफ को खत्म करने के लिए न तो लाठी चलवाने की जरूरत पड़ रही है और न ही गोली चलवाने की. आतंक का पर्याय बन चुके मुकेश गुप्ता पर कार्रवाई इतनी आसान नहीं थीं. हत्या, साजिश तथा लोगों को झूठे मामले में फंसा देने के आरोपों से घिरे मुकेश गुप्ता पर तगड़ी कार्रवाई के बाद आमजन खुश है तो भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी गदगद है. ( दो-चार बड़े नेताओं को छोड़कर ) पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता भी बघेल की तारीफ करने से नहीं चूक रहे हैं. शनिवार को  भाजपा के एक जिम्मेदार पदाधिकारी से मुलाकात हुई तो उसने कहा- जो काम हमारे रमन सिंह को करना था वो काम भूपेश बघेल ने कर दिखाया है. भूपेश को सैल्यूट.

वैसे इसमें कोई दो मत नहीं कि कंधे पर शॉल ओढ़कर गांव और परिवार के एक मुखिया जैसी उनकी छवि और एक के बाद एक शानदार निर्णय लेने वाले उनके अंदाज को हर कोई पसन्द कर रहा है. भाजपाइयों और कांग्रेसियों को छोड़कर किसी गांव वाले से भी पूछकर देखिएगा तो कहेगा- पहले फास्फोरस वाली भाजी आती थीं, लेकिन अब लाल भाजी खाने का मजा आ रहा है. मेरा किसी जाति विशेष से कोई विरोध नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि गत पंद्रह सालों से प्रदेश में ठकुराई हावी हो गई थीं. ज्यादातर भाजपा नेताओं और अफसरों का रवैया सामंतवादी हो गया था. लगता था कि बस... अब जमींदार आएंगे. गरीब किसान का खेत छीन लेंगे और उसकी फूल जैसी बिटिया को उठाकर ले जाएंगे और होता भी यहीं था.

कहना न होगा कि छत्तीसगढ़ बेहद खूबसूरत है. यह राज्य अपने खांटी देसी स्वाद की वजह से जाना जाता है. जब कभी आप बाहर जाएंगे तो लोग आपसे तीजन बाई के बारे में पूछेंगे. सुरूजबाई खांडे, हबीब तनवीर के बारे में जानना चाहते हैं. यहां के धान और उगने वाली साग-सब्जियों की भी जानकारी लेना चाहते हैं, लेकिन पंद्रह साल से छत्तीसगढ़ का देसी स्वाद गायब हो गया था. दो-चार को छोड़कर अधिकांश नेता छत्तीसगढ़ियों को लुभाने के लिए छत्तीसगढ़ी में बोलते-बतियाते थे लेकिन ज्यादातर की छत्तीसगढ़ी नकली थीं.अब भूपेश बघेल गांव-गांव जा रहे हैं तो गांव का आदमी भी उनसे मिलने के लिए शहर आ रहा है. अभी इसी सात फरवरी को जब उन्होंने गृह प्रवेश किया तो एक खास बात नजर आई. उनकी विधानसभा के हजारों-हजारों ग्रामीण बधाई देने के लिए सीएम हाउस पहुंचे थे. बघेल ने एक-एक ग्रामीण से मुलाकात की. मुख्यमंत्री निवास में कोट-पैंट-टाई में सेन्ट छिड़कर घूमने वाले अफसरों की जमात भी मौजूद थीं, लेकिन ग्रामीण... शहरी आतंक को खूंटी पर टांगकर बगैर कांटा-चम्मच के सुस्वादु भोजन का लुत्फ उठाने में मशगुल थे. हालांकि बहुत से अफसरों को यह लग रहा था कि कहां देहातियों के बीच फंस गए... लेकिन यह दृश्य सचमुच में आतंक से मुक्ति और जीत का दृश्य था.

 

 

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बघेल सरकार का एक माहः आगे-आगे देखिए होता है क्या

दिवाकर मुक्तिबोध 

17 जनवरी को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस-राज की स्थापना को एक माह पूरा हो गया। 17 दिसंबर 2018 को भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। फिलहाल उनकी सरकार को फटाफट काम करने वाली सरकार मानना चाहिए जिसका लक्ष्य स्पष्ट है। पार्टी का घोषणा-पत्र उसके सामने है जिसके सर्वाधिक महत्वपूर्ण वायदों पर सरकारी फऱमान जारी हो चुका है। लेकिन यह एक पहलू है जिसमें लोक-कल्याण की भावना प्रबल है। दूसरा पहलू है - राजनीतिक। लक्ष्य है, पूर्ववर्ती भाजपा शासन के दौरान सतह पर आई गड़बडिय़ों एवम् कुछ महाघोटालों की पुन: जाँच। नए सिरे से जाँच की आवश्यकता क्यों है, यह अलग प्रश्न है। इसका तार्किक आधार भी हो सकता है। यह भी संभव है, नई जाँच से नए तथ्य और छिपे हुए चेहरे भी सामने आएं जो जरूरी है पर इसके पीछे राजनीतिक मंशा को भी बखूबी महसूस किया जा सकता है। मंशा है, आगामी अप्रैल-मई में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव के पूर्व घोटालों में कथित रूप से लिप्त भाजपा नेताओं, मंत्रियों व अफसरों पर फंदा कसना तथा उन्हें जनता की अदालत में खड़े करना। तीन-चार बड़े प्रकरणों, झीरम घाटी नरसंहार, करीब 36 हजार करोड़ का नागरिक आपूर्ति घोटाला, ई-टेंडरिंग में 4 हजार 600 करोड़ की वित्तीय गड़बड़ी व जनसम्पर्क-संवाद विभाग में भारी वित्तीय अनियमितताओं पर जाँच कमेटी बैठा दी गई है। झीरम का मामला एसआईटी को सौंपा गया है जबकि शेष तीनों राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) को। यह बड़ी हैरत की बात है कि पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने नान घोटाले जिसमें चार्ज शीट अदालत में पेश हो चुकी है, की पुन: जाँच का प्रबल विरोध किया। और इसे वे बदले की कार्रवाई मानते हैं। लेकिन यह जाहिर सी बात है कि सत्ता परिवर्तन के साथ ही भ्रष्टाचार के पुराने दबे, अधदबे मामले बाहर निकाले जाते है व सतही जाँच के बाद रूकी हुई फाइलों पर पड़ी धूल साफ की जाती है और जरुरत के हिसाब से फिर से जाँच बैठाई जाती है। यह सामान्य प्रशासनिक-राजनीतिक प्रक्रिया है। इसमें असहज जैसा कुछ भी नहीं। और जब किसी एक पार्टी का शासन 15 सालों तक चलता रहा हो तो इस दौरान भारी-भरकम गड़बडिय़ों की आशंका स्वाभाविक है जो रमन सरकार के दौर में हुई भी है। 

 

नई कांग्रेस सरकार इसी आशंका का समाधान चाहती है। इसलिए रमन सिंह की प्रतिक्रिया घबराहट भरी राजनीतिक प्रतिक्रिया है। यों भी विधासभा चुनाव में भारी पराजय से उनका व पार्टी का मनोबल गिरा हुआ है। सिर्फ 15 विधायक चुनकर आए हैं। पराजय के बाद पार्टी में गुटीय प्रतिद्वंद्विता जो डेढ़ दशक से सत्ता के दबाव की वजह से दबी हुई थी, उभरकर सामने आई है। हाल ही में जिलेवार समीक्षा बैठकों में नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने पराजय के लिए सरकार, अफसरशाही व प्रादेशिक नेतृत्व को दोषी ठहराते हुए अपनी खीज निकाली तथा उसके बाद सार्वजनिक रूप से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है। इसके पूर्व विधानसभा नेता प्रतिपक्ष के चुनाव में भी गुटीय राजनीति का इजहार हो चुका था। बृजमोहन अग्रवाल व ननकीराम कंवर की दावेदारी को ठिकाने लगाकर रमन सिंह अपने समर्थक धरमलाल कौशिक को विपक्ष का नेता बनाने में कामयाब हुए थे। पर पार्टी की हताशा का एक उदाहरण तब सामने आया जब उसके ननकीराम कंवर जैसे सीनियर विधायक ने कांग्रेस सरकार को आवेदन सौंपकर विधानसभा सत्र में ही अपनी ही सरकार के शासनकाल में कुछ आईएएस-आईपीएस अफसरों द्वारा बरती गई अनियमितताओं तथा गड़बडिय़ों की जाँच की माँग की। उनके निशाने पर प्रमुख रूप से सुपर सीएम के रूप में चर्चित निजी प्रमुख सचिव रहे अमन सिंह व पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता थे। राज्य के इतिहास में यह पहली बार है  जब विपक्ष का कोई विधायक जो गृह मंतरी जैसे पद पर रहा हो और जिसके अधीन राज्य का पुलिस महकमा हो, दो वरिष्ठतम अफसरों व अन्य के खिलाफ जाँच बैठाने का अनुरोध करे। इससे स्पष्ट होता है कि रमन सरकार के कार्यकाल में मंत्रियों की क्या स्थिति थी? नौकरशाही के सामने वे कितने असहाय थे। और तो और मुख्यमंत्री रमन सिंह भी जिन्होंने 15 वर्षों तक शासन किया, अपने मंत्रियों, नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के स्वाभिमान की रक्षा नहीं कर पा रहे थे। इसका अर्थ है, मुख्यमंत्री अफसरों के एक गिरोह से घिरे हुए थे और उन्हीं के दिमाग से शासन चला रहे थे। दरअसल उन्हें केवल अपनी छवि की चिंता थी जो आम लोगों के सामने हमेशा पाक-साफ बनी रही। इसीलिए ननकीराम कँवर जैसे धाकड़ आदिवासी नेता की भी एक नहीं सुनी गई जबकि वे रमन सरकार को आवेदन पर आवेदन देते गए। अब उन्हीं ननकीराम को कांग्रेस ने हाथों हाथ लिया और आवेदन पर तुरंत कार्रवाई की। डीजीपी गुप्ता का प्रकरण डीजीपी जेल गिरधारीलाल नायक को सौंपा गया है।

 

यों एक महीना किसी भी सरकार के कामकाज के आकलन का आधार नहीं हो सकता। पर एक संकेत तो मिलता ही है। भूपेश बघेल का शासन वह संकेत दे रहा है, जो सकारात्मक सोच के साथ बहुत उम्मीद भरा है। एक माह के भीतर जनहित व प्रशासन से संबंधित 15-16 फैसले लेना पहली बार शासन का दायित्व संभालने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं हो सकता लेकिन भूपेश बघेल तपे हुए आक्रामक छवि के नेता है जो अवसरों को गढऩे व माकूल समय पर उनका इस्तेमाल करना बखूबी जानते हैं। अजीत जोगी जैसे धुआँधार नेता को उन्होंनेे बाहर का रास्ता दिखाया तथा पार्टी में अपनी राह के लगभग सभी काँटे चुन लिए। बघेल की कर्मठता, दृढ़ प्रशासनिक क्षमता व तेजी से काम करने की प्रवृत्ति सरकार के कामकाज में झलक रही है। दिए हुए समय के भीतर सरकार को रिपोर्ट न सौंपने वाले 13 कलेक्टरों से जवाब तलब करना, उनसे विलंब के लिए स्पष्टीकरण माँगना, यह जाहिर करता है कि यह कोई लुंज-पुंज सरकार नहीं है। लोक-कल्याणकारी कार्यक्रमों के संदर्भ में प्रशासनिक कसावट का यह एक नमूना है। सरकार के खर्चे घटाने की दृष्टि से उन्होंने उन सफेद हाथियों को हटाना शुरू किया है जो राजकोष पर बोझ बने हुए थे। 22 जनवरी को बघेल सरकार ने सुशासन फेलोशिप योजना के तहत नियुक्त किए गए 41 कंसलटेंट की सेवाएँ समाप्त कर दी। इनकी नियुक्तियाँ पिछली सरकार ने की थी जो शैडो कलेक्टर की तरह काम कर रहे थे और जिन्हें शासकीय योजनाओं की मानिटरिंग का जिम्मा सौंपा गया था। इन्हें सवा से ढाई लाख रूपए प्रतिमाह दिए जा रहे थे। सरकार के कामकाज की यदि ऐसी ही गति बनी रही तो जाहिर है वह एक लोकप्रिय सरकार की अवधारणा को स्थापित व परिभाषित करेगी। बस खतरा केवल एक ही है कि आगे चलकर वह भी पुराने रंग में रंग न जाए।

 

बघेल सरकार द्वारा एक माह में लिए गए निर्णयों में केवल एक विवादित रहा। वह था, आईपीएस शिवराम कल्लूरी को पुलिस मुख्यालय से हटाकर राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में पदस्थ करके नई जिम्मेदारियाँ सौंपना जिसकी अक्टूबर 2016 में बर्खास्तगी व गिरफ्तारी की माँग स्वयं भूपेश बघेल ने की थी। तब बघेल विपक्ष के नेता थे। इस नियुक्ति की बड़ी हैरत भरी व स्तब्धकारी प्रतिक्रिया रही। यह बात हजम नहीं हुई कि जो अधिकारी मानवाधिकार का दोषी है, उसे इतने महत्वपूर्ण विभाग में क्योंकर भेजा गया? इसके पीछे कोई खास रणनीति है? बस्तर में पहले एसपी और बाद में आईजी के रूप में कल्लूरी का कार्यकाल काला कार्यकाल माना जाता है। इस दौरान नक्सलियों के खिलाफ मनचाही जंग लडऩे उन्हें शासन की ओर से अघोषित छूट मिली हुई थी जिसका उन्होंने बेजा फायदा उठाया। कल्लूरी पर नक्सलियों की खोजबीन के नाम पर आदिवासियों पर अत्याचार, मानवाधिकारों का हनन, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी, उनका भयादोहन, उनकी तथा पत्रकारों की बिलावजह गिरफ्तारी जैसे अनेक गंभीर आरोप लगे। मार्च 2011 में  सुकमा जिले के ताड़मेटला, मोरपल्ली व तिम्मापुर में कहर बरपाया गया। आदिवासियों के 252 घरों को जला दिया गया। अक्टूबर 2016 में सीबीआई ने उच्चतम न्यायालय में पेश रिपोर्ट में कहा है कि ये घटनाएँ विशेष पुलिस अधिकारियों ने की थी। यही नहीं इस हमले में तीन आदिवासियों की हत्या की गई व महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। कल्लूरी उन दिनों  दंतेवाड़ा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे। उन पर कथित माओवादी रमेश नगेशिया की हत्या का आरोप है। कल्लूरी की तानाशाही की वजह से जब रमन सरकार की देशभर में थू-थू हुई और कांग्रेस ने मोर्चा खोला तब मजबूर होकर राज्य सरकार को इस अधिकारी को वहाँ से हटाना पड़ा। अब ऐसे कुख्यात को ईओडब्ल्यू की कमान देना तथा तीन बड़े घोटालों की जाँच का जिम्मा सौंपने के पीछे क्या कोई राजनीतिक मकसद है? रमन सरकार के प्रिय रहे इस अधिकारी से बघेल सरकार शायद यह उम्मीद कर रही है कि उसने जहर को जहर से काटने का इंतजाम कर दिया है। पर इस नियुक्ति से सरकार पर छींटे पड़े हैं। यहाँ सवाल है कल्लूरी ही क्यों? क्या पुलिस विभाग में कल्लूरी से बढ़कर और कोई काबिल अधिकारी नहीं है?

 

बहरहाल, इस एक मामले को छोड़ दिया जाए तो नई सरकार एक ऐसी कार्यशैली विकसित करने की राह पर है जिसके केन्द्र में गाँव-देहात, गरीब आदिवासी, किसान, मजदूर, छोटे कर्मचारी, ग्रामीण महिलाएँ, पिछड़े व अति पिछड़े वर्ग के लोग, छोटे उद्यमी एवम् युवा बेरोजगार है। 15 वर्षों तक शासन करने के बावजूद भाजपा सरकार कई बड़ी चुनौतियाँ जिन्हें सुलझाने में वह असफल रही, विरासत में छोड़ गई है। नक्सलवाद, निराशाजनक औद्योगिक वातावरण, जनस्वास्थ्य से बुरी तरह खिलवाड़ करता प्रदूषण, भारी भरकम बेरोजगारी, सरकार में नीचे से उपर तक फैला हुआ संगठित भ्रष्टाचार व बेलगाम नौकरशाही जिसने अंतत: भाजपा सरकार की कब्र खोद दी। यह अच्छा संकेत है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पद सम्हालते ही प्रशासनिक सर्जरी शुरू कर दी और कामकाज का हिसाब माँगना शुरू किया। दरअसल पाँच-पाँच साल की लगातार तीन पारियाँ खेल चुकी रमन सरकार के उन तमाम बड़े फैसलों एवम् कार्य योजनाओं की समीक्षा की जानी चाहिए जिन पर अरबों रूपए खर्च हुए हैं। कांग्रेस को बड़ी उम्मीदों के साथ जनता ने राजसत्ता सौंपी है। पाँच साल चुनौतियों से निपटने भले ही नाकाफी हो, पर आमजनों का विश्वास बनाए रखने के लिए यह पर्याप्त है। जरूरी है सरकार पारदर्शिता, संवेदनशीलता एवम् वैचारिकता का आदर करते हुए काम करें। क्या भूपेश बघेल सरकार एक माह में ही दिखाई पड़ी तेज गति की निरंतरता को कायम रख पाएगी? सवाल बड़ा है पर उम्मीद भी कम नहीं।

 

 

 

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पता नहीं रमन सिंह जंगल से कब बाहर निकलेंगे.

राजकुमार सोनी

पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के फेसबुक पेज पर मंगलवार को दंभ से भरी हुई एक अजीब सी तुकबंदी कविता सुनने को मिली. पहले कविता का उल्लेख कर देता हूं फिर आगे कोई बात लिखूंगा. तो महान रचना इस तरह की है-

बदले की जांच से भला, सत्य को कहां आंच आई है

संख्या में अधिक हो जाने से भला

क्या सियारों ने सिंह पर विजय पाई है

गरीबों को चावल देना, तुम्हारी नजर में अपराध है.

मेरे आदिवासी भाइयों का, क्या सरई का बीजा खाना याद है

भूखों को खाना देना अगर मेरे अपराध में गिना जाएगा

तो लाख डिगा ले कदम मेरे, ये अपराध फिर से किया जाएगा

अपने द्वेष के तराजू में मेरे कर्मों को क्या तौलोगे

वर्षों सेवा किया है हमने क्या उस पर भी कुछ बोलोगे

झूठे वादों से तुम पहुंचे हो, अब उन्हें पूरा करने की बारी है

मेरे हौसलों को तोड़ने की चेष्टा न कर

मेरे साथ मेरी छत्तीसगढ़ महतारी है.

 

वाह- वाह... वाह... वाह... धांसू... धांसू... गजब... गजब...कहना तो मुश्किल होगा लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि यह कविता सुरेंद्र दुबे शैली की है. इस तुकबंदी कविता में साफ तौर पर जांच का डर नजर आता है. लगता है कि रमन सिंह जांच से विचलित हो गए हैं और खुद को संभालने के लिए कविता-कहानी का सहारा ले रहे हैं. यह सही है कि गरीबों और भूखों का पेट भरना अपराध नहीं है, लेकिन जरूरत से ज्यादा राशनकार्ड बनाकर गरीबों और भूखों का चावल और उसका पैसा हड़प लेना क्या पराध की श्रेणी में नहींं आता है. कहते हैं कि राजनीतिज्ञ कभी सेवानिवृत नहीं होता. यह बात सौ फीसदी सत्य भी है, मगर जनता द्वारा खारिज किए गए सत्य को भी समय रहते स्वीकार कर लेना समझदारी मानी जाती है.अभी तक रमन सिंह यह मानने को तैयार नहीं है ( शायद ) कि उनके दल को जनता ने खारिज कर दिया है. जनता ने उनके वर्षों की साधना और तपस्या पर जिस तरह का पुरस्कार देने लायक समझा उन्हें उस तरह का पुरस्कार दे दिया है. उनके और उनके कद्दावर अफसरों की अनवरत साधना के चलते ही पार्टी महज पन्द्रह सीटों पर सिमटकर रह गई है.

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सत्ता संभालने के बाद जिस रोज झीरम घाटी की जांच की घोषणा की उसी दिन से रमन सिंह यह कहते आ रहे हैं कि नई सरकार बदलापुर की राजनीति कर रही है. वैसे रमन सिंह ने बदलापुर-बदलापुर कहते-कहते कभी यह नहीं कहा कि आखिर उन्होंने भूपेश बघेल के साथ ऐसा क्या कर दिया था जिसकी वजह से उन्हें बदला लेने की जरूरत पड़ रही है. जहां तक कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से भूपेश बघेल की भूमिका की बात है तो वे काफी पहले से यह कहते रहे हैं कि अगर कांग्रेस की सरकार बन गई तो झीरम घाटी की घटना की जांच होगी. नान घोटाले की जांच होगी. पनामा पेपर में छत्तीसगढ़ के नवाज शरीफ को जेल भेजा जाएगा. अंतागढ़ टेप कांड की जांच की मांग वे कई स्तरों पर कर चुके हैं. फिर भी पूर्व मुख्यमंत्री को अगर लगता है कि भूपेश बघेल उनसे किसी खास बात का बदला ले रहे हैं तो उन्हें जनता को बताना ही चाहिए कि उन्होंने भूपेश बघेल के साथ ऐसा क्या किया था.

बदलापुर-बदलापुर की चीख-चिल्लाहट के पीछे का एक मजेदार वाक्या यह भी है कि यह आवाज सिर्फ और सिर्फ रमन सिंह की तरफ से उठ रही है. एक- दो हारे हुए नेता भी बदलापुर-बदलापुर कर रहे हैं, लेकिन शेष किसी भी बड़े नेता ने यह नहीं कहा कि भूपेश बघेल बदलापुर की राजनीति कर रहे हैं. वैसे पूर्व मुख्यमंत्री को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को चिट्टी-पत्री सौंपकर यह क्यों कहा कि साहब... मुकेश गुप्ता के खिलाफ जांच करवा दीजिए. सुना तो यह भी जा रहा था कि सुपर सीएम की पदवी से विभूषित अमन सिंह केंद्र  में अपनी नौकरी-चाकरी का जुगाड़ बिठाने में सफल हो गए हैं, लेकिन इधर हाल के दिनों में उनके ही खिलाफ प्रधानमंत्री कार्यालय ने जांच के लिए राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिख दिया है. अब अगर पीएमओ के पत्र पर जांच प्रारंभ हो जाएगी तब भी क्या रमन सिंह यहीं कहेंगे कि बदलापुर की राजनीति हो रही है. यह एक यक्ष प्रश्न तो है कि जांच की मांग उनके ही विधायक कर रहे हैं. पीएमओ पत्र लिखकर कह रहा है कि जांच करिए.

सिंह और सियार

कविता में किसी चंद्रवरदाई ने रमन सिंह को सिंह यानि शेर बताया है और कहा है कि संख्या बल में अधिक हो जाने बावजूद सियार कभी भी सिंह पर विजय नहीं पा सकते. हालांकि कविता पढ़ने वाले की आवाज काफी महीन और पतली है जिसे सुनकर सिंघम के आ जाने का अहसास रोमांच के बजाय हास्य में बदल जाता है. पाठकों को याद होगा कि अभी हाल के दिनों में विधानसभा में पूर्व संसदीय मंत्री अजय चंद्राकर ने भूपेश को राजा बताते हुए कहा था कि वे अपने स्वभाव के कारण राजा बने हैं जानवरो के कारण नहीं. उनकी इस टिप्पणी के बाद खूब बवाल मचा था. सत्तापक्ष के विधायकों ने जानवर बताए जाने पर जोरदार आपत्ति जताकर अपना विरोध दर्ज किया था.

अब एक बार फिर संख्या बल में अधिक लोगों को सियार की उपाधि दी गई है. भले ही वह उपाधि कविता में दी गई है. लेकिन जंगल/ सिंह/ शेर/ सियार... इन शब्दों को देखकर लगता है कि रमन सिंह अब भी जंगल से बाहर नहीं निकल पाए हैं. राजनीति के एक बड़े जानकार की टिप्पणी है- जब कोई जनता के दिलों में राज करने के बजाय जंगल में राज करने की फितरत पाल लेता है तो ऐसा शख्स खुद को सिंह बताकर अन्य लोगों को सियार-गीदड़, बंदर-भालू कहने लगता है. पता नहीं रमन सिंह जंगल से कब बाहर निकलेंगे. अब तो रमन सिंह को जंगल से बाहर निकल जाना चाहिए. पन्द्रह सीटों पर सिमटी हुई पार्टी का कोई नेता अगर बहुमत हासिल करने वाली पार्टी के विधायकों को सियार या गीदड़ कहता है तो यह बहुमत के साथ-साथ लोकतंत्र का अपमान भी है. जो कविता रमन सिंह ने पोस्ट की है वैसी कविता तो कोई हारा हुआ पार्षद भी पोस्ट नहीं करता है.

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रमन सिंह-मोगली और बूमरैंग

राजकुमार सोनी

अगर आपने दूरदर्शन पर जंगल बुक धारावाहिक देखा है तो आपको याद होगा कि मोगली के पास एक ऐसा खिलौना था जिसे हवा में फेंकने पर वह घूमकर वापस उसके हाथ में आ जाता था. इस खिलौने को बूमरैंग कहा जाता है. वैसे तो बूमरैंग आस्ट्रेलिया का एक प्रमुख अस्त्र है जिसका उपयोग आदिवासी शिकार के लिए करते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ समय से इसका इस्तेमाल राजनांदगांव के विधायक रमन सिंह ( पूर्व मुख्यमंत्री भी ) जरुरत से ज्यादा कर रहे थे. वे हर बार बूमरैंग फेंकते रहे मगर उनका शस्त्र उनके पास ही लौटकर आता रहा.

लोहा... लोहे को काटता है

भारतीय पुलिस सेवा के अफसर शिवराम कल्लूरी कभी रमन सिंह के सबसे विश्वासपात्र थे. सरगुजा में माओवाद के सफाए के लिए कल्लूरी की पीठ थपथपाई जाती थीं. जब बस्तर में माओवादी गतिविधियों में इजाफा हुआ तो कल्लूरी बस्तर भेज दिए गए. इस बीच कल्लूरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर तस्वीरें खिंचवाते रहे. सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमले के बाद जब कल्लूरी देशभर में बदनाम हुए तब उन्हें यह कहते हुए पुलिस मुख्यालय में अटैच कर दिया गया कि अभी उनका लीवर ठीक से काम नहीं कर रहा है. अभी हाल के दिनों में जब नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कल्लूरी को एसीबी में पदस्थ किया और नान घोटाले की जांच का जिम्मा सौंपा तो पूर्व मुख्यमंत्री ने सवाल दागा- जो कल तक बदनाम था भला उसे महत्वपूर्ण जवाबदारी देने की क्या जरुरत थी.अपने इस सवाल के साथ पूर्व मुख्यमंत्री यह बताना भूल गए कि जब उनकी सरकार थी तब वे शिवराम कल्लूरी को माओवादियों से लड़ने वाला सबसे बड़ा योद्धा समझते थे. जाहिर सी बात है कि कांग्रेस की तरफ से भी जवाब आना था. जवाब आया- रमन के सबसे विश्वासपात्र को ही जवाबदारी दी गई है ताकि शक की कोई गुंजाइश न रहे. कल्लूरी कितने दिनों तक एसीबी में रहेंगे यह बाद की बात है, लेकिन राजनीति के जानकार यह मानकर चल रहे हैं कि भूपेश बघेल का फैसला रणनीतिक तौर पर बेहद सधा हुआ है. उनके इस फैसले को देखकर फिल्म शोले का वह चर्चित संवाद बरबस याद आ जाता है. संवाद है- लोहा... लोहे को काटता है.

जब मौत से डर नहीं लगा

रमन सिंह ने दूसरा बूमरैंग पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी की तैनाती को लेकर फेंका था. उनका आरोप था कि नए पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति के दौरान सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन का पालन नहीं किया गया. उनका यह भी कहना था कि किसी भी पुलिस महानिदेशक को हटाने के पहले यह जाननाअनिवार्य है कि उस पर किस तरह के गंभीर आरोप लगे हैं. अपने इस बयान के दौरान रमन सिंह यह बताना भूल गए कि उनकी सरकार ने भी 18 जुलाई 2011 को अचानक विश्वरंजन को हटा दिया था.शुक्रवार को मुख्यमंत्री ने एक पत्रकार के सवाल के जवाब में कहा- पूर्व मुख्यमंत्री को पुराना संदर्भ और उदाहरण अवश्य देख लेना चाहिए था. रमन सिंह का तीसरा बूमरैंग यह है कि उन्होंने प्रदेश में सीबीआई की इंट्री रोके जाने को लेकर भूपेश बघेल को आड़े हाथों लिया. उनका कहना था कि बघेल सीबीआई से डरते हैं. जवाब मिला- जब मौत से डर नहीं लगा तो सीबीआई से क्यों लगेगा. इस जवाब के साथ मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को यह भी बताया कि रमन सिंह की सरकार के कुछ जिम्मेदार अफसरों ने भी छत्तीसगढ़ में सीबीआई की इंट्री को रोकने के लिए पत्र लिखा था तो फिर आज आपत्ति क्यों. वैसे तो बूमरैंग कई हैं. रमन सरकार के एक पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने दस दिनों के भीतर किसानों का कर्ज माफ किए जाने की दशा में इस्तीफा देने की बात कहीं थीं. कर्ज माफ हो गया, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं  दिया. अब शस्त्र उनके आसपास घूम रहा है. सच तो यह है कि रमन सिंह 20-25 दिन पहले बनी नई सरकार पर जितनी ऊंगलियां उठा रहे हैं उससे कहीं ज्यादा ऊंगलियां उनकी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रही है. नियंत्रक महालेखा परीक्षक की ताजा रिपोर्ट ने उनके सरकार की कार्यप्रणाली को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है. नई रिपोर्ट ने तो उनके चहेते सुपर सीएम की भी पोल खोलकर रख दी है.

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घमंड में डूबे नेताओं... मानुष बली न होत है समय होत बलवान

राजकुमार सोनी

रायपुर. सोमवार को छत्तीसगढ़ की विधानसभा का नजारा थोड़ा अलग था. पिछले सत्र तक रमन सिंह और संसदीय कार्यमंत्री अजय चंद्राकर राज्यपाल की अगवानी करने परिसर तक जाते थे, लेकिन इस बार रमन सिंह सदन में बैठे रहे. विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत के साथ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल संसदीय कार्यमंत्री रविंद्र चौबे और नेता प्रतिपक्ष की हैसियत से धरमलाल कौशिक बाहर गए तो यह उक्ति चरितार्थ होते हुए नजर आई- मानुष बली न होत है समय होत बलवान... भिल्लन लूटी गोपिका वही अर्जुन वहीं बाण.

भाजपा की सरकार रहने के दौरान देश-दुनिया के भगवाधारी, बाबा, कीर्तनकार और प्रवचन देने वाले प्रायः छत्तीसगढ़ आया करते थे. अमूमन जितने भी संत और बाबा छत्तीसगढ़ पधारे उन सबने बड़े-बड़े पंडालों के नीचे यही दोहराया कि मनुष्य को अहंकार नहीं करना चाहिए. मनुष्य समय का दास होता है, लेकिन यह बात सत्ता के नशे में चूर भाजपाइयों को समझ में नहीं आई. पांचवी विधानसभा के पहले अधिवेशन में सोमवार सात जनवरी को भाजपा के मुट्ठी भर सदस्यों ने धारा 144 लागू होने के बाद भी विधानसभा गेट पर प्रदर्शन को लेकर हंगामा मचाया भी तो उनकी आवाज फीकी पड़ गई. भाजपा के वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल ने मोर्चा संभाला तो लगा कि अगर वे नेता प्रतिपक्ष होते तो शायद ज्यादा बेहतर होता. रमन सिंह ज्यादातर समय खामोश बैठकर अपनी उंगलियों के नाखूनों को देखते रहे. नेता प्रतिपक्ष धरम कौशिक ने दो बार टोका-टाकी की, लेकिन लग रहा था कि वे विपक्ष के नेता नहीं ब्लकि अब भी खुद को विधानसभा का अध्यक्ष मानकर चल रहे हैं.

सदन के बाहर भी कट लो... 

यह तो हुआ सदन का नजारा. कमोबेश यही स्थिति सदन के बाहर की भी थी.प्रायः सभी अफसर भाजपा के नेताओं से दूरी बनाकर चल रहे थे. वे पत्रकार भी छिटक गए हैं जो कल तक डाक्टर रमन सिंह के लिए चालीसा लिखा करते थे और चालीसा पढ़ा करते थे. हालांकि कंसोल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से लाभान्वित दरबारी अब भी इंटरव्यूह वगैरह के चक्कर में पड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन ज्यादातर का रुख बदल गया है. रमन सिंह के कतिपय कर्मठ कर्मचारी अवश्य उनके आसपास है. इनमें से एक ओपी गुप्ता है जिन पर भी तरह-तरह के आरोप लग रहे हैं. कहा जा रहा है कि उन्होंने अपना एक निजी मकान सरकारी खर्च पर किराए पर चढ़ा रखा है. एक दूसरे ओएसडी अरुण बिसेन है जिनका नाम सेक्स सीडी कांड में उछला है. हाल के दिनों में कांड से जुड़े एक प्रमुख आरोपी कैलाश मुरारका ने कोर्ट में शपथपत्र देकर कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के निर्देश के बाद अरुण बिसेन ने मंत्रियों की सेक्स सीडी देखने के लिए मुंबई के होटल सहारा में उनसे मुलाकात की थी. इधर यह भी चर्चा है कि बिसेन अब धरम कौशिक के निज सहायक बनने की कवायद कर रहे हैं. विधानसभा परिसर में यदा-कदा सुपर सीएम को लेकर भी चर्चा होती रहती है. चर्चा में यह बात भी सामने आई है कि सुपर सीएम के राजधानी में ही पांच-छह मकान है. हर बार वे मकान बदल-बदलकर रहते हैं और इन दिनों केंद्र में जमने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं.

जनकल्याण फैसले

बहरहाल पांचवी विधानसभा के प्रथम अधिवेशन में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने अपने अभिभाषण में हाल के दिनों में सरकार के लिए गए फैसलों को जनकल्याणकारी ठहराया. राज्यपाल ने कहा कि नई सरकार ने गठन के पहले दिन यानि 17 दिसम्बर को 16 लाख 65 हजार से अधिक किसानों का 6 हजार सौ करोड़ से अधिक का कर्ज माफ कर दिया गया है. राज्यपाल ने कहा कि कर्ज माफी के निर्णय को अमलीजामा पहनाने के क्रम के प्रथम चरण में दस दिनों के भीतर, लिकिंग के तहत की गई धान खरीदी के एवज में 12 सौ 48 करोड़ रुपए की राशि 3 लाख 57  हजार किसानों के खाते में जमा कर दी गई. उन्होंने सदन को बताया कि राष्ट्रीयकृत बैंकों से संबंधित अल्पकालीन कृषि कर्ज को भी परीक्षण के दायरे में ले लिया गया है.

राज्यपाल ने कहा कि किसानों की आर्थिक उन्नति से ही ग्रामीण जन-जीवन में खुशहाली और विकास का रास्ता खुलेगा इसलिए नई सरकार ने 2018-19 में 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी का निर्णय भी लिया है. राज्यपाल ने वर्ष 2013 की झीरम घाटी की घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा इस घटना की वजह से लोकतांत्रिक मूल्यों और कानून व्यवस्था के प्रति आस्था गहरा धक्का पहुंचा था फलस्वरुप झीरम घाटी की घटना के विभिन्न पहलुओं की एसआईटी से जांच का निर्णय भी एक बेहतर कदम है. राज्यपाल आनंदी बेन ने सदन में बताया कि दस साल पहले बस्तर के लोहाण्डीगुड़ा इलाके के कई गांवों की जमीन अधिग्रहीत कर ली गई थी. नई सरकार ने जमीन अधिग्रहण से प्रभावित किसानों की भूमि लौटाने का जो फैसला लिया है उससे बस्तर के जनजीवन में व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा हुआ है. राज्यपाल ने पांच डिसमिल से कम रकबे की खरीदी-बिक्री, नामांतरण-पंजीयन से रोक हटाने को भी राहत भरा कदम बताया. उन्होंने कहा कि नई सरकार के इस फैसले से छोटे भूखंडधारक और कमजोर तबके के लोग राहत का अनुभव कर रहे हैं. राज्यपाल ने सदन में जानकारी दी कि नई सरकार गांवों के नालों का क्रमबद्ध संरक्षण करेगी. पशुधन के संवर्धन के लिए  नस्ल सुधार कार्यक्रम चलाएंगी और जैविक खाद की लघु उत्पादक ईकाईयों का निर्माण करेगी. उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में हर किसान के पास छोटी-बड़ी बाड़ियां है. सरकार बाड़ियों को नया जीवन देने के लिए हर संभव प्रयास करेगी ताकि ग्रामीण किसानों की आमदानी में भी इजाफा हो सकें. राज्यपाल ने बताया कि सरकार औद्योगिक विकास की पक्षधर है, लेकिन सामाजिक सरोकार की घनिष्ठता भी बरकरार रखना चाहती है, इसलिए छोटी पूंजी वाली इकाईयों की स्थापना विशेष रुप से जोर दिया जाएगा. उन्होंने कहा कि खाद्य सुरक्षा, लोगों को अच्छा मकान, अच्छी शिक्षा और ग्रामीणों को जल-जंगल-जमीन पर अधिकार की बात अब केवल कानून की किताबों में ही नहीं रहेगी ब्लकि इसे मूर्तरुप  दिया जाएगा.

माओवादी समस्या से निपटने होगी पीड़ित पक्षों से चर्चा

राज्यपाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ में सरकार सामाजिक समरसता और सौहार्द कायम रखना चाहती है सो माओवाद प्रभावित इलाकों में शांति के लिए विशेष प्रयास करेगी और शांति बहाल करने के लिए पीड़ित पक्षों से चर्चा करेगी. राज्यपाल के अभिभाषण के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सदन में अपने मंत्रियों का परिचय दिया और दस हजार 395 करोड़ से अधिक का अनुपूरक बजट पेश किया. अब इस बजट पर 8 जनवरी को पक्ष और विपक्ष के सदस्य चर्चा करेंगे. सदन में थोड़े समय के लिए विपक्षी सदस्यों ने इस बात को लेकर अवरोध पैदा किया कि विधानसभा और उसके आसपास धारा 144 लागू होने के बाद भी कतिपय लोग विधानसभा के गेट के सामने प्रदर्शन कर रहे हैं. विपक्ष ने प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की मांग की तो मुख्यमंत्री बघेल ने सदन में जानकारी दी कि सभी प्रदर्शनकारी हटा दिए गए हैं.

 

 

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