विशेष टिप्पणी

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अंबेडकर जयंती पर मिला छत्तीसगढ़ के बच्चों को शानदार तोहफा

रायपुर. छत्तीसगढ़ में जगह-जगह स्थापित स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल अब हर बड़े महंगी फीस वाले स्वनामधारी प्राइवेट स्कूलों को टक्कर दे रहे हैं.इन स्कूलों में प्रवेश के लिए होड़ मच रही हैं. इधर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक अच्छा काम यह किया है कि पालकों की मांग पर स्कूल की कक्षाओं में विद्यार्थियों की क्षमता बढ़ा दी हैं.पहले किसी भी कक्षा में 40 बच्चों को प्रवेश मिलता था.अब 50 बच्चों को प्रवेश मिलेगा. वैसे तो आज सरकारी अवकाश था लेकिन छत्तीसगढ़ की सरकार ने अपने इस निर्णय को अंबेडकर जयंती यानी 14 अप्रैल के दिन ही लागू किया है. सार्वजनिक अवकाश होने के बावजूद आज यह आदेश जारी कर दिया गया है. बाबा साहेब अंबेडकर जीवन में शिक्षा और समानता को बहुत महत्वपूर्ण मानते थे. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की सरकार अगर शिक्षा पर जोर दे रही हैं तो यह अच्छी बात है. शिक्षा और ज्ञान के विस्तार से समाज का चहुंमुखी विकास होता है. जो नेतृत्वकर्ता अपने राज्य और देश के नौनिहालों के भविष्य की चिंता करता है उसका काम इतिहास में दर्ज होता है. राज्य के गरीब-आदिवासी और अन्य समाज के बच्चों के शैक्षणिक विकास के लिए छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार का यह काम प्रशंसनीय है. छत्तीसगढ़ में इसके पहले भाजपा की सरकार थीं.यह सरकार कभी नक्सलियों पर आरोप लगाकर स्कूल बंद कर देती थीं तो कभी संसाधनों का रोना रोकर. शायद इस सरकार की सोच में शामिल था कि अनपढ़-गंवार लोग अच्छे किस्म के भक्त और वोटबैंक होते हैं.
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हरदिल अज़ीज डाक्टर सुभाष पांडे की स्मृति पर विशेष

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रोफेसर जय नारायण पांडे के सुपुत्र, राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों के राज्य स्तरीय विवेकशील संचालन तथा गुणवत्ताधारी सेवाओं को उच्चतम मापदंडों के अनुरूप प्रतिस्थापित करने में शीर्षस्थ, पूर्व राज्य टीकाकरण व परिवार कल्याण अधिकारी, छत्तीसगढ़ अंचल में स्वास्थ्य सुविधाओं को शीर्ष स्थान पर पहुंचाने वाले संभाग के पूर्व संयुक्त संचालक स्वास्थ्य सेवाएं डॉक्टर सुभाष पांडे जी ने कोरोना काल में कोविड-19 से जूझते हुए जनमानस की सेवा में अपनी जान गवाई. ऑल राउंडर फनकार, गीत संगीत के प्रेमी, भविष्यवेत्ता, समाजवादी चिंतक, राष्ट्रवादी जज्बे से परिपूर्ण, ईश्वरीय शिल्पशाला में गढे हुए एकमात्र नायक डॉ. सुभाष पांडे जी 14 अप्रैल 2021 को दिवंगत हो गए. यूं तो 2020-2021 संपूर्ण जनमानस के लिए शोकाकुल था. शोकग्रस्तता का आलम रायपुर में निहायत ही संगीन किस्म का था. डॉ. सुभाष के निधन का समाचार उस दिन पूरे देश में प्रसारित किया जा रहा था. उनकी चिरस्थायी छवि सभी के मस्तिष्क में संस्मरण बन कर रह गई. डॉ. पांडेजी को अंततः धरा पर अवतरित होने वाले “नायक”, “कर्मनिष्ठ”, “कर्तव्यपरायण” उपाधियों से आलोकित किया गया. हो सकता है कि प्रस्तुत संस्मरण नाचीज़ का निजी अनुभव हो, परंतु मेरे दृष्टिकोण से वे असाधारण एवं अद्वितीय देवपुरुष थे जिनके उदात्त मूल्यों तथा सिद्धांतों के सानिध्य में मुझे उनके अखंड स्वरूप को जीवित रखना है. 13 अप्रैल 2021 की वह रात रहस्यमई रह गई. चट्टानी इरादों, खुशनुमा एहसास देने वाले व्यक्तित्व, अपने सगे साथी के साथ गीत से उपजे आनंद के चरमोत्कर्ष, जीवन की सार्थकता का एहसास एवं जीने की तलब का दहन कर, दिलकश नज़ारों के साथ डॉ. सुभाष पांडेजी ने अपनी आंखें बंद कर ली. सुखों को तिलांजलि दे देश के लिए धड़कने वाले दिल की हृदयगति रुक गई. बाल्यावस्था से लेकर 64 वर्ष की आयु तक अपनी श्रेष्ठतम प्रस्तुति देने वाले सुभाष जी की मासूमियत, शरारती चेहरा, कोमल हृदय एवं निर्भीक स्वभाव अतुलनीय है. उनका जीवन दिलकश फिल्मी सपने के अंत की भाँति है, जिसकी दिव्यता के विषय में चर्चा की जा सकती है परंतु उस स्वप्न का फिल्मी चित्रण करके नहीं दिखाया जा सकता. बनारस के गंगा घाटों में, बाबा विश्वनाथ दरबार के करीब अनंत बरसों तक सुभाष बाबू अपनी स्नेहांजलि बाँटते रहेंगे. दशाश्वमेध घाट पर पाप नाशिनी गंगा में विलीन डॉ. पांडे विश्वव्यापी आस्था व उत्कृष्टता का हिस्सा रहेंगे. उनकी सुरीली यादें, लोगों के प्रति आत्मीयता, मिलनसार, नटखट स्वभाव एवं कर्तव्य के प्रति समर्पण की भावना उनके व्यक्तित्व को मंत्रमुग्ध बनाती रहेगी. डॉ. पांडे जी अपने जीवन रूपी पटकथा के लेखक निर्देशक एवं अदाकार स्वयं ही रहे इसलिए उनकी विदाई भी शानदार होनी चाहिए. मैं प्यार का दीवाना सबसे मुझे उल्फत है हर फूल मेरा दिल है हर दिल में मोहब्बत है....... इसी विचारधारा के साथ अपने कर्तव्यों के निर्वहन उपरांत डॉक्टर साहब अनंत लोक की यात्रा पर निकल पड़े हैं. डॉ. यशस्वी पांडेय
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अगर आप शादी करने जा रहे हैं तो आपको मिल सकता हैं डिस्काउंट, बस...आपको दिखानी होगी कश्मीर फाइल्स की टिकट

रायपुर. अब इसमें कोई दो मत नहीं कि देश अजीब तरह की बेवकूफियों से घिर गया है. कोई बड़ी बात नहीं कि एक रोज आप किसी मजबूत सी दीवाल की खोज में निकलेंगे और वहां अपना सिर पटककर खुद को रक्त रंजित कर लेंगे. जब हर रोज नई-नई तरह की मूर्खताएं सामने आ रही है तो लगता है कि अब खुद का बलिदान ही हमारी बेचैन आत्मा को मोक्ष प्रदान कर सकता है.

अभी थोड़ी देर पहले ही फेसबुक पर एक पोस्टर देखा. वही पोस्टर जो आप इस खबर में देख रहे हैं. इस पोस्टर में लिखा हुआ था- जो लोग फिल्म कश्मीर फाइल्स देख चुके हैं अगर वे शादी करते हैं तो उन्हें 50 प्रतिशत की छूट दी जाएगी. पोस्टर में छूट देने वाले का फोन नंबर भी दिया हुआ था. मुझे लगा कि दिए गए नंबर पर बातचीत कर लेनी चाहिए क्योंकि कई बार पोस्टर में झूठ भी चस्पा होता है. मैंने फोन लगाया तो पंड़ित रवींद्र कुमार शास्त्री ने फोन उठाया. उन्होंने बताया कि पोस्टर में जो कुछ लिखा हुआ है वह पूरी तरह से सच है. यह छूट उन लोगों को ही दी जा रही है जो कश्मीर फाइल्स देख चुके हैं. उन्हें छूट हासिल करने के लिए फिल्म की टिकट दिखानी पड़ेगी. मैंने कहा- क्या आरआरआर की टिकट से काम नहीं चलेगा ? पंड़ित जी ने कहा- आरआरआर भी अच्छी फिल्म है, लेकिन अभी हमारे लिए कश्मीरी फाइल्स जरूरी है. हमें ही नहीं मालूम था कि पंड़ितों के साथ कितना अत्याचार हुआ है. जब फिल्म देखी तब पता चला कि बहुत बुरा हुआ है. हमने तय किया है कि फिल्म के प्रमोशन के लिए हम शादी-ब्याह के अलावा हवन, जन्मकुंडली बनाने और गाड़ी पूजन में 50 प्रतिशत की छूट प्रदान करेंगे. शादी में पूजन के लिए हम 11 हजार रुपए लेते हैं लेकिन कश्मीर फाइल्स देखने वाले जोड़ों की शादी मात्र 5 हजार पांच सौ रुपए में कर दी जाएगी.

कश्मीर फाइलस के प्रमोशन का यह कोई पहला मामला नहीं है. इसके पहले भी सोशल मीडिया में एक राष्ट्रभक्त अनिल शर्मा का पोस्टर वायरल हुआ था. उस पोस्टर में लिखा था कि जो कोई भी कश्मीर फाइल्स की टिकट दिखाएगा उसे गाय के दूध में डिस्काउंट दिया जाएगा. पोस्टर में यह भी उल्लेखित था कि जो दूध 44 रुपए लीटर में बेचा जाता है उसे 35 रुपए लीटर में बेचा जाएगा. कश्मीर फाइल्स के प्रमोशन को लेकर संघ, बजरंग दल, विद्यार्थी परिषद और भाजपा के लोग किस ढंग से सक्रिय रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है. बकायदा झुंड बनाकर... उत्तेजक और भड़काऊ नारा लगाकर यह सिनेमा देखा और दिखाया गया है. संघियों ने हाल के भीतर नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे...प्रार्थना गायी है और उसका वीडियो वायरल किया है. मैं पहले भी लिख चुका हूं. एक बार फिर से लिख रहा हूं कि कश्मीर फाइल्स ने भले ही अपने उपायों से दो-ढ़ाई सौ करोड़ का बिजनेस कर लिया है, लेकिन यह फिल्म निहायत ही  गंदे मकसद से बनी इतिहास के कूड़ेदान में फेंकी जाने वाली एक घटिया फिल्म है.

और हां... इस घटिया फिल्म के प्रमोशन के लिए फिल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री और उनकी पत्नी पल्लवी जोशी इन दिनों बैंकाक-पटाया में हैं. पति-पत्नी का हंसता हुआ वीडियो भी सोशल मीडिया में जमकर वायरल हो रहा है. लोग उनकी इस यात्रा पर लिख रहे हैं-देश जल रहा है... वो बैंकाक में हंस रहा है. राधेश्वर शर्मा नाम के एक यूजर ने लिखा है- बैंकाक की मौज तो जनेऊधारी ब्राम्हण के अलावा और कोई दूसरा ब्राम्हण नहीं ले सकता है. यदुवंश नाम के एक यूजर की टिप्पणी है- ये लोग भारत में आग लगाकर बैंकाक में मौज-मस्ती कर रहे हैं.

 

राजकुमार सोनी

9826895207

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जिस पत्रकार को थाने में नंगा खड़ा किया गया उसकी बेटी आंखों में आंसू लेकर पूछ रही है सवाल ?

मध्यप्रदेश के सीधी जिले में पत्रकार कनिष्क तिवारी को पुलिस ने जिस तरह से थाने में नंगा खड़ा कर तस्वीरों को वायरल किया वह बेहद शर्मनाक है. पढ़े-लिखे और समझदार लोग मान रहे हैं कि थाने में पत्रकार को नहीं बल्कि लोकतंत्र को नंगा किया गया है. शिवराज सिंह की पुलिस ने लोकतंत्र की पीठ पर चमड़े की बेल्ट से वार भी किया है. पत्रकार ने खुद एक वीडियो जारी कर बताया है कि उसे और उसके साथियों को पुलिस ने किस निर्ममता से मारा-पीटा है. इधर खबर और तस्वीरों के वायरल होने के बाद जब पत्रकार की बेटी ने एक अखबार में अपने पिता की तस्वीर देखी तो वह रो पड़ी. बेटी के आंसूओं में कुछ सवाल उमड़ रहे थे जिसे कनिष्क तिवारी ने महसूस कर फेसबुक पर शेयर किया है.

 

मैं कनिष्क तिवारी सच्चे मन से सामाजिक मुद्दे को उठाता हूं उठाता रहूंगा. मरते दम तक लडूंगा और लड़ता रहूंगा. लेकिन मेरी कुछ पारिवारिक जिम्मेदारी भी है. मेरी 10 साल की एक बेटी है. उसे यह सब नहीं मालूम है कि  पत्रकार किन परिस्थितियों में सामाजिक मुद्दों को उठाते हैं ? क्या परिस्थितियां होती हैं ? क्या हालात होते हैं?  जब कई बार लगता रहा है कि यह सब छोड़ के कुछ और किया जाए. बीते दिन ऐसा ही कुछ हुआ. जब प्रताड़ना की पराकाष्ठा को पार कर दिया गया. मेरे सामाजिक सम्मान को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया गया. आज अखबारों में जब यह खबर छपी और साथ में वह तस्वीर भी छपी जिसे पुलिस के द्वारा विधायक के कहने पर खींचकर वायरल किया गया था तब शायद विधायक और उसके पुत्र खूब खुश हुए हो. उन्हें अपनी जीत का एहसास भी हुआ हो, लेकिन एक पत्रकार समाज का आईना है. उस सामाजिक आईने को कैसे चूर चूर किया गया. उसका हौसला तोड़ा गया उसे मजबूर किया गया. साथ ही मान सम्मान को ऐसी ठेस पहुंचाई गई कि कल्पना मात्र से ही आंखों से आंसू निकल आते हैं.

आज सुबह 8 तारीख को जब अखबार घर आया तो मेरी 10 साल की बेटी ने अखबार में मेरी अर्धनग्न तस्वीर देखी तो रोते हुए पूछा कि पापा यह क्या है ? मेरे आंखों से आंसू छलक आए और मैंने सिर्फ यही कहा कि बेटा यह आपके पापा के द्वारा पत्रकारिता के रूप में किए गए काम का इनाम है. मैंने यह भी समझाया जब सच की लड़ाई लड़ी जाती है तो इंसान अकेले होता हैं, लेकिन यदि सच के साथ हमेशा खड़ा रहा जाए तो धीरे-धीरे कारवां बढ़ता जाता है.

धन्यवाद राष्ट्रीय मीडिया. धन्यवाद प्रादेशिक मीडिया. धन्यवाद सभी शुभचिंतकों को जिन्होंने मेरे अपमान को अपना अपमान समझा. यह एक पत्रकार का अपमान नहीं था बल्कि पत्रकार बिरादरी का अपमान था. यदि न्याय नहीं मिलता तो कभी पत्रकार किसी गरीब और दबे कुचले की आवाज ही नहीं उठा पाएंगे. बेटी धीरे-धीरे बड़ी होगी तब शायद उसे सब कुछ पता चल जाएगा, लेकिन शायद जो जख्म मुझे मिला है वह कभी नहीं भर सकता. बहुत कुछ लिखना चाहता हूं मगर आंखों से आंसू निकल रहे हैं. आंसू लिखने की हिम्मत तोड़ देते हैं. फिर भी मैं वादा करता हूं कि आखिरी दम तक इस लड़ाई को लड़ता रहूंगा ताकि हर पत्रकार के मान और सम्मान की रक्षा हो सकें. फिर किसी दूसरे कनिष्क तिवारी इस तरह से बेइज्जत ना होना पड़े.

 

 

 

 

 

 

 

 

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कश्मीर फाइल्स को लेकर पढ़िए उस आईपीएस अफसर का नजरिया जो कश्मीर में पदस्थ था

देश के नामचीन लेखक विभूति नारायण राय  के उपन्यास घर, शहर में कर्फ्यू, किस्सा लोकतंत्र, तबादला और प्रेम की भूतकथा से हर कोई वाकिफ है. भारतीय समाज में व्याप्त सांप्रदायिक हिंसा को समझने के क्रम में उनकी दो पुस्तक सांप्रदायिक दंगे और पुलिस तथा हाशिमपुरा को भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. कश्मीर पर लिखे उनके एक लेख- अंधी सुरंग में कश्मीर को पढ़कर भी बहुत कुछ जाना समझा जा सकता है. यहां हम फिल्म द कश्मीर फाइल्स पर लिखी उनकी टिप्पणी को अपने पाठकों के लिए शेयर कर रहे हैं.

विभूति नारायण राय

दुनिया की सबसे खूबसूरत फिल्में नरसंहार और उससे उपजे विस्थापन को लेकर बनी हैं। विस्थापन है भी ऐसा विषय, जो कहानी, कविता, नाटक, फिल्म- गरज यह कि रचनात्मकता की हर विधा के सर्जक के समक्ष चुनौती की तरह आता है। इस चुनौती को स्वीकार करने में अपने कुछ जोखिम भी हैं। बहुत कम रचनाकार, जिनमें फिल्म निर्माता भी शामिल हैं, इस परीक्षा में खरे उतरते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण नि:संगता का अभाव है, जिसकी अपेक्षा इस संवेदनशील विषय को रहती है। द कश्मीर फाइल्स, जो इन दिनों विवादों के घेरे में है, इसी नि:संगता की कमी के कारण एक औसत मुंबइया फिल्म बनकर रह गई है।

व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए 1993-94 के दौरान कश्मीर घाटी में नियुक्ति एक बड़ा सीखने वाला अनुभव था। जनवरी 1993 में जब मैं वहां पहुँचा, तब आतंकवाद अपने चरम पर था। दिसंबर 1989 में शुरू हुए पृथकतावादी आंदोलन ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। भारतीय राज्य का इतने बडे़ शहरी आतंकवाद से पहला साक्षात्कार था और कई बार लगता कि नीतिकारों की समझ में भी नहीं आ रहा है कि उसका मुकाबला कैसे करें? कश्मीरी पंडितों के पलायन का बड़ा भाग संपन्न हो चुका था, पर अभी भी पुराने शहर के कुछ हिस्सों में इक्का-दुक्का पंडित परिवार जाने और रुकने के ऊहापोह में झूल रहे थे। 

मेरी एक परिचिता अपने पिता के साथ इसी तरह के एक घनी आबादी और पतली गलियों वाले इलाके में रहती थीं। हिंदी की इस महत्वपूर्ण कथा लेखिका के पिता वामपंथी राजनीति से जुडे़ थे और उनका जीवट देखने लायक था। इस झंझावात में भी, जब उनके कई करीबी मारे जा चुके थे और उन्हें भी तरह-तरह की धमकियां मिल रही थीं, उन्होंने हब्बा कदल का अपना घर न छोड़ने की जिद-सी ठान रखी थी। उन्होंने कश्मीर की साझा संस्कृति, चुनाव में राज्य द्वारा की गई धांधलियों और कश्मीरी राजनीति में घुन की तरह लगे भ्रष्टाचार पर विस्तार से मुझे समझाया था। मुझसे मिलने आने में जोखिम था, इसलिए वे छिपकर मेरे पास आते, बेटी बुर्के में होती और दोनों एक लंबा रास्ता लेकर मुझ तक पहुंचते। 

पिछले दिनों जब द कश्मीर फाइल्स देख रहा था, तब मुझे उस बहादुर और सचेत बुजुर्ग कश्मीरी पंडित द्वारा साझा की गई जानकारियां याद आईं। ऊपरी तौर से तो सब कुछ वैसा ही लगा, जैसा उन्होंने बताया था, लेकिन दिमाग पर थोड़ा जोर देते ही लगता कि कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है। मसलन, वे सब सूचनाएं गायब थीं, जिनमें मोहल्ले के पड़ोसी मुसलमानों ने पंडित को झूठ बोलकर भी बचाया था। वे अनगिनत कथाएं भी इस फिल्म की पटकथा का हिस्सा नहीं बन पाईं, जिनमें घर छोड़कर भाग चुके पंडित परिवार का कोई सदस्य अगर कभी अपनी संपत्ति की खोज-खबर लेने आता, तो उसका मुसलमान पड़ोसी उसे होटल से जबर्दस्ती लाकर अपने घर ठहराता। उन्होंने एक दर्जन से अधिक किस्से सुनाए थे, जिनमें पंडितों के सेब के बागान की देखभाल करने वाले मुसलमान काश्तकार हर साल फसल बेचकर जम्मू के शरणार्थी कैंपों में रहने वाले उनके मालिकों को पैसा देने जाते और अपनी आंखें पोंछते हुए लौटते। पर ये प्रसंग तो फिल्म में कहीं दिखे ही नहीं। शायद जिस एजेंडे के तहत यह फिल्म बन रही थी, उसमें ये सकारात्मक प्रसंग कहीं फिट नहीं बैठते थे।

उन दिनों अचानक शहर की जामा मस्जिद में जुमे की नमाज के बाद एक अपरिचित सा चेहरा खुतबे के लिए खड़ा होता और स्थानीय नमाजियों को कोसने लगता कि वे दरगाहों पर इबादत के लिए जाते हैं या कश्मीरियत के नाम पर बहुत सी गैर-इस्लामी परंपराओं में मुब्तला हैं। उसी जैसा कोई व्यक्ति मोहल्ले की मस्जिद पर भी काबिज था और वहां के माइक से पंडितों को घर छोड़कर भाग जाने को कह रहा था। इस व्यक्ति को स्थानीय लोग पहचानते तो नहीं थे, पर उसके उच्चारण और पोशाक से अनुमान लगा लेते कि वह पाकिस्तानी पंजाब या सरहदी इलाकों से आया है। इस फिल्म में पीढ़ियों से पड़ोस में रह रहे और सूबा सरहद से आए मुसलमान के बीच के फर्क को खत्म कर दिया गया है।

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की जो कहानी फिल्म में सुनाई गई है, वह तथ्यात्मक रूप से काफी हद तक सही होते हुए फिल्म को प्रचार से अधिक कुछ नहीं बना पाती है। इसमें आतंकवाद के फौरी कारण उन आम चुनावों का तो जिक्र ही गायब है, जो जनता को अपनी पसंद के प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से वंचित करते थे। अब यह छिपा तथ्य नहीं है कि 1987 के आम चुनाव की धांधलियों ने 1989 के विस्फोट में उत्प्रेरक की भूमिका निभाई थी। इस रहस्य पर किसी का ध्यान नहीं गया कि मोरारजी देसाई घाटी के सबसे लोकप्रिय भारतीय प्रधानमंत्री सिर्फ इसलिए हैं, क्योंकि उनकी सरकार ने वहां के सबसे निष्पक्ष चुनाव कराए थे। फिल्म ने पंडितों के निष्कासन के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे वी पी सिंह, जगमोहन, मुफ्ती मोहम्मद सईद या फारूख अब्दुल्ला के चरित्र का तटस्थ अवलोकन नहीं किया। यह कहना ज्यादा सही होगा कि सिर्फ इन पात्रों के चित्रण में नहीं, फिल्म की पूरी पटकथा में ही इस तटस्थ रचनात्मकता का अभाव है।

फिल्म के निर्माता भूल गए कि युद्ध या घृणा पर बड़ी रचना वही हो सकती है, जो अंतत: इनके विरुद्ध अरुचि पैदा कर सके। यहूदियों के नरसंहार या होलोकास्ट पर बहुत-सी फिल्में बनी हैं, पर सम्मान से जिक्र उन्हीं का होता है, जो नस्लवादी संहार के विरुद्ध दर्शकों को खड़ा करती हैं। द कश्मीर फाइल्स  तो प्रतिशोध की फिल्म है, इससे जुडे़ लोगों को द पियानिस्ट  या लाइफ इज ब्यूटीफुल  जैसी फिल्में देखनी चाहिए। इन फिल्मों को देखकर कभी भी उस पूरी जाति के प्रति आक्रोश नहीं पैदा होता, जिसके कुछ सदस्य होलोकास्ट से जुडे़ थे। लाइफ इज ब्यूटीफुल  की तो आलोचना भी इसलिए की गई कि उसने यातना और पीड़ा के उन बोझिल क्षणों में कुछ हल्के-फुल्के प्रसंगों के लिए भी गुंजाइश निकाल ली थी। इन बड़ी कृतियों के बरक्स द कश्मीर फाइल्स  में सिर्फ घृणा है, आक्रोश है और इनसे उपजने वाली प्रतिशोध की भावना है। मानो एक फिल्म ने देश को विभक्त कर दिया है। कुछ लोगों ने मांग की है कि देश में मुस्लिम संहार की घटनाओं पर भी फिल्में बनें। वे भूल जाते हैं कि बदले की भावना से निर्मित कोई भी कृति साधारण ही होगी। 

 

 

 

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निहायत ही गंदे मकसद से बनाई गई फिल्म का नाम हैं कश्मीर फाइल्स

राजकुमार सोनी

अभी थोड़ी देर पहले ही कश्मीर फाइल्स को देखकर लौटा हूं. यकीन मानिए इस फिल्म को लेकर इतना अधिक पढ़ चुका था कि इसे देखने का कोई इरादा नहीं बन पा रहा था, लेकिन 16 मार्च की शाम जैसे-तैसे इस फिल्म को देखने का मन बन ही गया. सीधे शब्दों में कहूं तो कश्मीर फाइल्स निहायत ही गंदे मकसद से बनाई गई एक कचरा फिल्म हैं. यह फिल्म उन लोगों को ही अच्छी लग सकती हैं जो अपने भगवान मोदी को आगे रखते हैं और देश को पीछे.

यह फिल्म युद्ध के उदघोष की तरह जय-जय श्रीराम का नारा लगाकर रोजी-रोटी चलाने वाले लपंट समुदाय की भावनाओं को भुनाने और निकट चुनाव में उनकी दोयम दर्जे की ऊर्जा का उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करती है.कश्मीर में कश्मीरी पंड़ितों के साथ जो कुछ घटित हुआ वह पूरी तरह से शर्मनाक है. उस पर कोई किंतु-परन्तु नहीं होना चाहिए, लेकिन फिल्म का भीतरी और खुला स्वर यहीं हैं कि मुसलमान कौम पूरी तरह से हत्यारी है और हर मुसलमान गद्दार है.

फिल्म के प्रारंभ में जब फिल्म को प्रोजेक्ट करने वाली कंपनियों के विज्ञापन छपते हैं तब छोटे अक्षरों में यह भी छपता हैं कि यह फिल्म विश्व के समस्त पीड़ित समुदाय को समर्पित हैं, लेकिन फिल्म को देखकर कहीं से भी यह नहीं लगता है कि यह फिल्म पीड़ित मानवता की बात करती हैं. फिल्म को देखकर यह साफ-साफ झलकता है कि मुसलमानों और आजादी-आजादी का गीत गाने वाले नौजवानों के खिलाफ नफरत को कैसे जिंदा रखना है ? फिल्म यह नैरेटिव सेट करती हैं कि देश में राजनीतिक तौर पर जो कुछ भी घट रहा है वह ठीक है और जब तक केंद्र की वर्तमान सरकार है तब तक ही हिन्दुओं की रक्षा हो सकती हैं ? अगर मुसलमानों को ठीक करना है तो हिन्दुओं को एकजुट होना होगा. यह फिल्म कश्मीर की महिमा और देश को विश्वगुरू बनाने के नाम पर ऋषि-मुनियों के सानिध्य में गुफाओं-कंदराओं में लौटकर खुद को गौरान्वित करने की जोरदार ढंग से वकालत भी करती हैं. पूरी फिल्म में जिसे देखो वहीं लेक्चर झाड़ते मिलता हैं.

आईटीसेल के लिए काम करने वाले घोषितऔर अघोषित लंपट समुदाय ने इस फिल्म को चिल्ला-चिल्लाकर हिट बना दिया है. यकीन मानिए यह फिल्म अभी और अधिक धन कमाएगी और फिल्मफेयर अवार्ड तथा राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीतेगी. जिस फिल्म का प्रमोशन स्वयं प्रधानमंत्री ने ( हालांकि वे सबके प्रधानमंत्री होते तो शायद ऐसा नहीं करते ) कर दिया हो उसे तो आस्कर के लिए भी भेजा जा सकता है. अभी कल ही कश्मीर फाइल्स बनाने वाली राष्ट्रवादियों की फौज ने देश के गृहमंत्री अमित शाह के दर्शन का लाभ भी प्राप्त कर लिया है. टीम के सदस्यों ने बढ़िया फोटो-शोटो खिंचवाकर फेसबुक व सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों में चस्पा कर दिया है. विवेक अग्निहोत्री की धुंआधार पैंतरेबाजी को देखकर तो यह भी लग रहा है कि बंदे को जल्द ही पद्मश्री और पद्मभूषण भी थमा दिया जाएगा.

 

अब आने वाले दिनों में चाहे जो हो...लेकिन मेरी नज़र में यह फिल्म दो कौड़ी से अधिक की नहीं है. एक अच्छी और मील का पत्थर साबित होने वाली कोई भी फिल्म अगर घटनाओं को जस का तस रखती भी हैं तो एक कदम आगे बढ़कर मार्ग सुझाती है. दिशा दिखाती है. एक अच्छी फिल्म हमारे भीतर नफरत का पहाड़ खड़ा नहीं करती. वह मनुष्य को और अधिक संवेदनशील बनाने का काम करती है. कश्मीर फाइल्स के भीतर ऐसा कोई भी तत्व मौजूद नहीं है जिसे देखकर कुछ बेहतर करने की भीतरी उष्मा प्राप्त हो. यहीं एक वजह है कि फिल्म की बंपर कमाई के बावजूद अंधभक्त केंद्र की मोदी सरकार से यह सवाल करने की स्थिति में नहीं है कि धारा 370 खत्म होने के बावजूद भी कश्मीरी पंड़ितों के पुर्नवास और बेहतरी के लिए क्या प्रयास हो रहा है ? यह सब तब होता जब यह फिल्म संघियों का टूल बनने के बजाय शाश्वत सृजन होती ? सब जानते हैं कि कश्मीरी पंड़ितों के साथ जो कुछ भी घट रहा था तब केंद्र की वीपी सिंह की सरकार को भाजपा का समर्थन हासिल था.तब भी भाजपा की सरकार ने कश्मीरी पंड़ितों के लिए कुछ नहीं किया.अब जबकि मोदी सरकार हैं तब भी कश्मीरी पंड़ितों के पुनर्वास के लिए कुछ होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है.

फिल्म का एक पात्र ( मिथुन चक्रवर्ती ) जो जम्मू-कश्मीर में पदस्थ एक अफसर हैं... वह बार-बार इस बात को कहता है कि कश्मीरी पंड़ित मर रहे हैं. शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं. कीड़े- मकोड़ों सा जीवन जी रहे हैं..मगर सरकार कुछ नहीं कर रही हैं. आखिरकार वह कौन सी सरकार हैं ? सरकार कश्मीरी पंड़ितों की रक्षा क्यों नहीं कर पा रही हैं ? सरकार क्यों फेल हुई ? यह सारे सवाल फिल्म से नदारद हैं. बस...फिल्म का पात्र सरकार को कोसते रहता है. वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि तब केंद्र की सरकार भाजपा के समर्थन से चल रही थीं. अगर फिल्म में यह तथ्य प्रमुखता से उभर जाता तो पोल खुल जाती और वे राजनीतिज्ञ बेनकाब हो जाते जो इसके लिए दोषी है.

फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती तीन-चार तरह की फाइल रखता है. सभी फाइलों में अखबारों की कटिंग चस्पा है. फिल्म के इस पात्र को अखबार की कतरनों पर तो भरोसा भी है, लेकिन मीडिया को रखैल बताते हुए एक पात्र यह भी कहता है कि कोई भी मीडिया कश्मीर का सच नहीं बता रहा है ? खैर...फिल्मकार के लाख बचाव के बावजूद परत-दर-परत पोल खुलती चलती हैं. फिल्म में हिंसा के इतने भयावह दृश्य हैं कि सेंसर बोर्ड की पोल खुल जाती हैं. छविगृह में बैठा दर्शक खुद से सवाल करने लगता है कि यार...फिल्म के क्रूरतम से क्रूरतम दृश्यों पर कैची क्यों नहीं चलाई गई ? सेंसर बोर्ड किसके दबाव में था ? दर्शक को खुद के भीतर से यह जवाब भी मिलता है कि जब आयकर विभाग, सीबीआई और चुनाव आयोग सहित देश की कई संवैधानिक संस्थाओं की हैसियत दो कौड़ी की कर दी गई हैं तो फिर सेंसरबोर्ड की क्या औकात ?

फिल्म में आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का उल्लेख कर फिल्मकार यह भी बता देता है कि वह किस खेमे का है ? और उसका इरादा क्या है ? वह क्या चाहता है ? वैसे भी ब्राह्मणों के लिए एक अलग देश की मांग करने वाले विवेक अग्निहोत्री का दक्षिणपंथी झुकाव किसी से छिपा हुआ नहीं है. एक बूढ़ी काया पर गोली चलाने वाले गोड़से और माफी वीर सावरकर की गैंग का कोई सदस्य जब कभी भी फिल्म बनाएगा तो क्या वह फिल्म के साथ न्याय करेगा ? यह फिल्म देश को दो भागों में बांटने का काम करती है. एक भाग में नफरती चिन्टूओं की जमात हैं तो दूसरे भाग में भाई-चारे और मोहब्बत पर यकीन करने वाले लोग. इस फिल्म को देखने वाले सवर्ण समुदाय को भी यह सोचना चाहिए कि क्या फिल्मकार ने उन्हें सहानुभूति का पात्र बनाकर देश के अन्य समुदायों के बीच कहीं घृणा का पात्र तो नहीं बना दिया है. फिल्म में यह स्वर छिपा हुआ है जिसके चलते यह आवाज भी उठ रही है कि क्या देश में सिर्फ पंड़ित ही रहते हैं? क्या देश में शोषित-पीड़ित दलित और आदिवासियों का कोई वजूद नहीं है ?

सुधि व समझदार दर्शकों को इस फिल्म का एजेंडा साफ-साफ समझ में आ रहा है. देश के बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जन सरोकार से जुड़े संस्कृतिकर्मियों को इस फिल्म और इसके फिल्मकार के खतरनाक इरादों की पोल खोलनी ही चाहिए. अगर हमने अभी प्रतिरोध दर्ज नहीं किया तो अभी एक फाइल बनी हैं...आगे और कई ऐसी संघी फाइलें सामने आएगी. हर फाइल से नफरत बाहर निकलेगी. नफरत... नफरत...नफरत और केवल नफरत. यह देश वैसे भी अंधभक्ति और अंधभक्तों से परेशान चल रहा है.कश्मीर फाइल्स अंधभक्तों की नई खेप पैदा करने वाली फैक्ट्री के तौर पर खुद को स्थापित करने का घिनौना प्रयास करती है.

अब आप पूछ सकते हैं कि फिल्म की कहानी क्या है ? फिल्म में किसका अभिनय अच्छा है ? सच तो यह है कि फिल्म की कोई कहानी नहीं है. फिल्म में सिर्फ घटिया और खतरनाक इरादा है. फिल्म में किसी भी अभिनेता की भूमिका जानदार नहीं है. फिल्म में बिट्टा कराटे ( खलनायक )  की भूमिका निभाने वाले मराठी अभिनेता चिन्मय दीपक मंडेलकर की आंखों का सूरमा, उसका पलक झपकाना और संवाद बोलने का अंदाज एक कौम विशेष के हर चेहरे पर जाकर चस्पा हो जाता है और यहीं दुर्भाग्यजनक है.

 

 

 

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इन टिप्पणियों को पढ़ लीजिए...साफ हो जाएगा कि कश्मीर फाइल्स देखनी चाहिए या नहीं ?

कोई एक विवेक अग्निहोत्री है.सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों से पता चला है कि वे कान्यकुब्ज ब्राम्हण परिवार से हैं और मुंबई में सेटल होने के बाद वे ताशकंद फाइल्स और क्राइम थ्रिलर फिल्म चाकलेट भी बना चुके हैं. सोशल मीडिया बता रहा है कि वे एक खूबसूरत टीवी अभिनेत्री पल्लवी जोशी के हसबैंड भी है. विवेक अग्निहोत्री की हालिया रीलिज फिल्म कश्मीर फाइल्स को लेकर कई तरह की बातें हो रही है. एक वर्ग कह रहा है कि हर सच्चे भारतीय को यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए तो दूसरे वर्ग का कहना है कि मोहब्बत... इंसानियत और भाई-चारे पर यकीन करने वाले किसी भी शख्स को यह फिल्म नहीं देखनी चाहिए. वैसे अच्छी फिल्मों को देख-समझकर टिप्पणी करने वाले अधिकांश सुधि दर्शक मान रहे हैं कि फिल्म का निर्माण एक समुदाय विशेष के साथ नफरत के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है. सोशल मीडिया में बहुत से लोगों ने लिखा है कि कश्मीर फाइल्स से ज्यादा जरूरी गुजरात की फाइल्स है. कश्मीर फाइल्स के साथ गुजरात के दंगों पर बनी फिल्म परजानिया का भी जिक्र हो रहा है. लोग कह रहे हैं कि परजानिया को टैक्स फ्री तो दूर सही ढंग से थियेटरों में रीलिज भी नहीं होने दिया गया था. कश्मीर फाइल्स से पहले शुद्र द राइजिंग जैसी फिल्म बन चुकी है. जो लोग कश्मीर फाइल्स देखकर रो रहे हैं अगर वे शुद्र द राइजिंग देख लेंगे तो शायद उनका कलेजा फट जाएगा. कोई जज लोया फाइल्स बनाने का सुझाव दे रहा है तो कोई नारी उत्पीड़न जैसे विषय पर जशोदा फाइल्स बनाने की बात कर रहा है. कश्मीर फाइल्स पर हम यहां कुछ ऐसी टिप्पणियों को प्रकाशित कर रहे हैं जो हाल के दिनों में लिखी गई है. इन टिप्पणियों के आलोक में यह साफ हो जाएगा कि फिल्म को देखा जाना चाहिए या नहीं ? वैसे आज सुबह से सोशल मीडिया में विवेक रंजन अग्निहोत्री की उस तस्वीर को लेकर बवाल मच गया है जिसमें वे जामा मस्जिद के सामने नमाज अदा करते हुए दिखाई दे रहे हैं. विवेक रंजन अग्निहोत्री ने यह तस्वीर 25 नवंबर 2012 को टिव्हटर पर जारी की थी. तब केंद्र में भाजपा की सरकार नहीं थीं. इस फोटो के वायरल होते ही सवालों का पहाड़ खड़ा हो गया है. लोग कह रहे हैं-क्यों मियां सरकार बदलते ही इरादा बदल गया ? ऊपर दी गई तस्वीर विवेक अग्निहोत्री की है. 

कश्मीर फाइल्स को लेकर देश के एक प्रमुख अखबार देशबन्धु ने अपने संपादकीय में लिखा है-

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ सिनेमाघरों में रिलीज़ हो चुकी है और उम्मीद से ज्यादा कमाई कर रही है। गौरतलब है कि 90 के दशक में जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई थी और बड़ी संख्या में उन्हें अपने घर और ज़मीन से बेदखल होना पड़ा था। इसके पीछे बहुत से राजनैतिक, सामाजिक कारण थे, लेकिन इस मसले की जड़ पर ध्यान देने की जगह इसे सीधे सांप्रदायिक मसला बना दिया गया। इस फ़िल्म में भी समस्या के हर पहलू को परखने की जगह इसे एकतरफा नजरिए से बनाया गया है। शायद फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक की मंशा भी यही हो। वैसे भी फ़िल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की राजनैतिक विचारधारा किसी से छिपी नहीं है। अर्बन नक्सल शब्द भी उन्हीं की देन है।

बहरहाल, कश्मीर हमेशा से भारतीय राजनीति का एक संवेदनशील विषय रहा है। और इस विषय को समझने के लिए व्यापक नज़रिए की ज़रूरत है। इसे काला या सफ़ेद यानी या तो इस पार या उस पार वाले व्यवहार से समझा नहीं जा सकता। यह फिल्म गुजरात और मप्र सहित कई राज्यों में टैक्स फ़्री भी की गई है। इस का प्रचार भी नामी-गिरामी लोग कर रहे हैं और ये बता रहे हैं कि अगर आप भारतीय हैं तो यह फ़िल्म आपको ज़रूर देखनी चाहिए।हालांकि अपनी राष्ट्रीयता और देशप्रेम साबित करने के लिए जनता किसी फिल्म की मोहताज नहीं है।

द कश्मीर फ़ाइल्स 1990 के दौर के उस भयावह समय पर केन्द्रित है, जब आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों की हत्याएं कीं और उन्हें कश्मीर छोड़ने पर मजबूर किया गया। हज़ारों कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रहने पर मजबूर हो गए। ‘द कश्मीर फाइल्स’ का मुख्य पात्र कृष्णा पंडित नाम का लड़का है, जो दिल्ली में ईएनयू नाम के मशहूर कॉलेज में पढ़ता है। कृष्णा छात्र राजनीति में भी सक्रिय है। कृष्णा के दादा पुष्कर नाथ को 1990 में कश्मीर छोड़ना पड़ा था। वो खुद आतंकियों के अत्याचार के भुक्तभोगी हैं। उनका सपना है कि वो एक बार वापस अपने घर जा सकें। हालात ऐसे बनते हैं कि कृष्णा खुद कश्मीर जाकर देखता है कि वहां क्या चल रहा है। 

इस दौरान उसके अतीत के राज उसके सामने खुलते हैं, जो कश्मीर और उसके अपने जीवन को लेकर उसका नज़रिया बदल देते हैं। फ़िल्म में आतंकवाद के दृश्यों को काफी विस्तार से फिल्माया गया है, जिस वजह से उसका असर दर्शकों पर गहरा पड़ता है। इस फिल्म में अनुपम खेर, दर्शन कुमार, पल्लवी जोशी और मिथुन चक्रवर्ती मुख्य भूमिकाओं में हैं। सभी मंजे हुए कलाकार हैं, इसलिए उनकी अदाकारी में कोई कमी नहीं है। लेकिन बेहतर होता अगर फिल्म में सभी पहलुओं को बराबरी से उठाया जाता।

कश्मीरी पंडितों का विस्थापन भारत की गंगा-जमुनी सभ्यता के माथे पर एक और दाग था, जिसे जल्द से जल्द मिटाया जाना था। लेकिन एक बार फिर लोगों की जान को राजनैतिक फ़ायदे के लिए भुनाया गया। 90 से लेकर 2022 तक देश में कई सरकारें आईं और गईं। देश में कांग्रेस का भी शासन रहा और भाजपा का भी। मगर ये समस्या पूरी तरह हल नहीं हुई और अब इसे पूरी तरह सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई है। बताया जाता है कि कश्मीरी पंडितों पर जुल्म और दर्द की कहानी को पर्दे पर दिखाने के लिए विवेक अग्निहोत्री ने ख़ूब शोध किया। पीड़ितों के बारे में जानकारी जुटाई। लेकिन यह मेहनत कहीं न कहीं इकतरफा ही रही, क्योंकि इसमें तथ्यों को कसौटी पर नहीं परखा गया। 

हाल ही में भारतीय वायु सेना के शहीद ‘रवि खन्ना’ की पत्नी निर्मला ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ के खिलाफ अदालत में याचिका दायर की थी। स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना की पत्नी ने अदालत से अपील की है कि फिल्म में उनके पति को दर्शाने वाले दृश्यों को हटाया जाए। उन्होंने दावा किया कि फिल्म में दिखाए गए तथ्य उनके पति के साथ हुई घटनाओं के विपरीत हैं। गौरतलब है कि स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना 25 जनवरी, 1990 को श्रीनगर में शहीद हुए चार वायुसेना कर्मियों में से एक थे। इस याचिका पर अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीश दीपक सेठी ने आदेश दिया है कि ‘रवि खन्ना की पत्नी द्वारा बताए गए तथ्यों को देखते हुए, फिल्म में से शहीद स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना से संबंधित कार्यों को दर्शाने वाले दृश्य दिखाने पर रोक लगाई जाए।’ अदालत का ये आदेश बताता है कि विवेक अग्निहोत्री ने पूरा सच बयां नहीं किया है।

बहरहाल, फिल्म में दिखलाई कहानी पूरा सच नहीं है, क्योंकि इतिहास आधे-अधूरे तथ्यों के साथ पढ़ा नहीं जा सकता। यह याद रखना होगा कि कश्मीर में जिस वक्त नरसंहार और पलायन की घटनाएं हुईं, उस वक्त  केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी, जो भाजपा के समर्थन से बनी थी। वीपी सिंह सरकार दिसंबर 1989 में सत्ता में आई। पंडितों का पलायन उसके ठीक एक महीने बाद से शुरू हो गया। साल 1990 से लेकर 2007 के बीच के 17 सालों में आतंकवादी हमलों में 399 पंडितों की हत्या की गई। इसी दौरान आतंकवादियों ने 15 हजार मुसलमानों की हत्या कर दी। 

और सबसे बड़ी बात ये कि 90 से पहले देश में अधिकांश समय  कांग्रेस का ही शासन रहा। इस दौरान कभी ऐसी नौबत नहीं आई कि कश्मीरी पंडितों को पलायन करना पड़े, लेकिन राम मंदिर के लिए रथयात्रा निकाल कर सत्ता में आने की भाजपा के कोशिशों के बीच यह दुखद अध्याय भी जम्मू-कश्मीर में जुड़ ही गया। आख़िरी बात ये कि इस फिल्म को आपदा की तरह देखना चाहिए, और इस आपदा में अवसर देखने वालों को करारा जवाब जनता को देना चाहिए।

वृषभ दुबे की टिप्पणी है-

 

द कश्मीर फाइल्स को देखते हुए मुझे Mathieu Kassovitz की फ़िल्म La Haine का एक डायलॉग बार बार याद आता रहा - "Hate Breeds Hate"

ख़ैर … 

मैं हर कहानी को पर्दे पर उतारने का समर्थक हूँ। यदि कहानी ब्रूटल है, तो उसे वैसा ही दिखाया जाना चाहिए। 

जब टैरंटीनो और गैस्पर नोए, फ़िक्शन में इतने क्रूर दृश्य दिखा सकते हैं तो रियल स्टोरीज़ पर आधारित फ़िल्मों में ऐसी सिनेमेटोग्राफ़ी से क्या गुरेज़ करना।

और वैसे भी, तमाम क्रूर कहानियाँ, पूरी नग्नता के साथ पहले भी सिनेमा के ज़रिए दुनिया को सुनाई और दिखाई जाती रही हैं। 

रोमन पोलांसकी की "दा पियानिस्ट" ऐसी ही एक फ़िल्म है। .. 

जलियांवाला बाग़ हत्याकांड की क्रूरता को पूरी ऑथेंटिसिटी के साथ शूजीत सरकार की "सरदार ऊधम" में फ़िल्माया गया है।

मगर आख़िर ऐसा क्या है कि पोलांसकी की "दा पियानिस्ट" देखने के बाद आप जर्मनी के ग़ैर यहूदियों के प्रति हिंसा के भाव से नहीं भरते? और शूजीत सरकार की "सरदार ऊधम" देखने के बाद आपको हर अंग्रेज़ अपना दुश्मन नज़र नहीं आने लगता. 

पर कश्मीर फ़ाइल्स देखने के बाद मुसलमान आपको बर्बर और आतंकी नज़र आता है. ऐसा क्यों?

मुझे इस "क्यों" का जवाब अनुप्रास अलंकार से सुसज्जित इस पंक्ति में नज़र आता है - "कहानी को कहने का ढंग"

अच्छे फ़िल्ममेकर्स अपनी बात कहने के ढंग पर ध्यान देते हैं. कहानी से पूरी ईमानदारी करते हुए, अपनी ज़िम्मेदारी नहीं भूलते.

चलिए मैं बात साफ़ करता हूँ - जैसे लिंकन ने डेमोक्रेसी की एक यूनिवर्सल डेफ़िनिशन दी है - "औफ़ दा पीपल, बाई दा पीपल एंड फ़ॉर दा पीपल"। वैसी ही कोई परिभाषा विवेक अग्निहोत्री की फ़िल्मों के लिए भी गढ़ी जा सकती है … मसलन "एक विशेष वर्ग द्वारा, एक विशेष वर्ग के लिए और एक विशेष वर्ग के ख़िलाफ़" ..

आप ख़ुद सोचिए कि पूरी 170 मिनट की फ़िल्म में किसी लिबरल मुस्लिम कैरेक्टर की आधे मिनट की भी स्क्रीन प्रेज़ेन्स नहीं है. लिट्रली निल! 

मुस्लिम औरतों से ले कर, मस्जिद के ईमाम तक सब विलन क़रार दिए गए हैं, मगर उस कम्यूनिटी से एक शख़्स को भी वाइट शेड में दिखाने की कोशिश नहीं की. 

आप कहेंगे कि जब कोई वाइट शेड में था ही नहीं तो दिखा कैसे देते. मैं कहूँगा कि बकवास बंद करिए.

क्यूँकि उसी exodus के वक़्त, कश्मीर के मुस्लिम पोलिटिकल फ़िगर्स से लेकर इस्लामिक धर्मगुरुओं की हत्या इस आरोप का जवाब है कि लोग उन पीड़ित कश्मीरी पंडितों के लिए बोले थे, आतंकवाद के ख़िलाफ़  खड़े हुए थे.

मगर उन्हें स्क्रीन पर दिखा कर शायद आपका नैरेटिव माइल्ड हो जाता. और वही तो नहीं होने देना था …. क्यूँकि ख़ून जितना खौले उतना बेहतर, गाली जितनी भद्दी निकले उतनी अच्छी .. नारा जितना तेज़ गूंजे उतना बढ़िया … वोट जितना पड़ें ….. है ना?

फ़िल्म बढ़ती जाती है और एक के बाद एक प्रॉपगैंडा सामने आता जाता है :

"सेल्यूलर अस्ल में सिकुलर हैं, यानी बीमार हैं"

"संघवाद से आज़ादी, मनुवाद से आज़ादी … जैसे नारे लगाना देश से ग़द्दारी करना है।" 

"कश्मीर में औरतों और लोगों के साथ जो भी ग़लत होता है वो वहाँ के मिलिटेंट्स, फ़ौज की वर्दी पहनकर करते हैं ताकि फ़ौज को निशाना बनाया जा सके।"

"मुसलमान आपका कितना भी ख़ास क्यों ना हो, मगर वक़्त आने पर वो अपना मज़हब ही चुनेगा।" … वग़ैरह वग़ैरह।

मगर इस सब के बावजूद मैं आपसे कहूँगा कि इस फ़िल्म को थिएटर में जा कर देखिए. ताकि आप फ़िल्म के साथ साथ फ़िल्म का असर भी देख सकें.

ताकि आप अपनी रो के पीछे बैठे लोगों से कांग्रेस को माँ बहन की गालियाँ देते सुन पाएँ और ख़ुद ये बताने में डर महसूस करें कि तब केंद्र में कांग्रेस नहीं जनता दल की सरकार थीं. ताकि आप बेमतलब में जय श्री राम के नारे से हॉल गूँजता देखें. ताकि निर्देशक द्वारा एक तस्वीर को एक झूठे और बेहूदे ढंग से पेश होते हुए देखें और बगल वाले शख़्स से उस तस्वीर में मौजूद औरत के लिए "रखैल …" जैसे जुमले सुन सकें। ताकि फ़िल्म ख़त्म होने के बाद बाहर निकलती औरतों को ये कहते पाएँ कि "कुछ बातें ऐसी होती हैं जो खुल के बोल भी नहीं सकते", और मर्दों को ये बड़बड़ाते सुनें कि "हिंदुओं का एक होना बहुत ज़रूरी है वरना ये साले हमें भी काट देंगे।" 

फ़िल्म इन्हीं लोगों के लिए बनाई गयी है और जो लोग न्यूट्रल हैं, उन्हें इन जैसा बनाने के लिए।

बाक़ी, मोहब्बत ज़िंदाबाद! 

 

प्रेमसिंह सियाग ने लिखा है-

 

कश्मीर फाइल्स के नाम पर बनी फिल्म आजकल चर्चाओं में है।

मेरे आज तक यह समझ नहीं आया कि कोई बिना संघर्ष के कैसे  अपनी विरासत छोड़कर भाग सकता है!

किसानों की जमीनों पर आंच आई तो 13 महीने तक सब कुछ त्यागकर दिल्ली के बॉर्डर पर पड़े रहे।

कश्मीर घाटी में आज भी जाट-गुर्जर खेती कर रहे है।पीड़ित होने का रोना-धोना आजतक दिल्ली जंतर/मंतर आकर नहीं किया है. 

1967 के बाद देश के बारह राज्यों में आदिवासियों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है और कारण इतना ही बताया जाता है कि विकास के रास्ते में रोड़ा बनने वाले नक्सली लोगों को निपटाया जा रहा है

आदिवासियों का नरसंहार कभी चर्चा का विषय नहीं बनता है. उनके विस्थापन का दर्द,पुनर्वास की योजनाओं पर कोई विमर्श नहीं होता.

सुविधा के लिए बता दूँ कि 1989 तक कश्मीरी पंडित बहुत खुश थे और हर क्षेत्र में महाजन बने हुए थे.

अचानक दिल्ली में बीजेपी समर्थित सरकार आती है और राज्य सरकार को बर्खास्त करके जगमोहन को राज्यपाल बना दिया जाता है.

कश्मीरी पंडितों पर जुल्म हुए और दिल्ली की तरफ प्रस्थान किया गया.

उसके बाद बीजेपी ने कश्मीरी पंडितों का मुद्दा मुसलमानों को विलेन साबित करने के लिए राष्ट्रीय मुद्दा बना लिया.

कांग्रेस सरकार ने जमकर इस मुद्दे को निपटाने के लिए सालाना खरबों के पैकेज दिए और जितने भी कश्मीरी पंडित पलायन करके आये उनको एलीट क्लास में स्थापित कर दिया.

साल में एक बार जंतर-मंतर पर आते,बीजेपी के सहयोग से ब्लैकमेल करते और हफ्ता वसूली लेकर निकल लेते थे.

8 साल से केंद्र में बीजेपी की प्रचंड बहुमत की सरकार है व कश्मीर से धारा 370 हटा चुके है लेकिन कश्मीरी पंडित वापिस कश्मीर में स्थापित नहीं हो पा रहे है.

धरने-प्रदर्शन से निकलकर हफ्तावसूली की गैंग फिल्में बनाकर पूरे देश को इमोशनल ब्लैकमेल करके वसूली का नया तरीका ईजाद कर चुकी है!

आदिवासी रोज अपनी विरासत को बचाने के लिए चूहों की तरह मारे जा रहे है लेकिन कभी संज्ञान नहीं लिया जाता।आज किसान कौमों को विभिन्न तरीकों से मारा जा रहा है लेकिन कोई चर्चा नहीं होती.

1995 के बाद आज तक तकरीबन 4 लाख किसान व्यवस्था की दरिंदगी से तंग आकर आत्महत्या कर चुके है लेकिन पिछले 25 सालों में एक भी बार जंतर-मंतर पर कोई धरना नहीं हुआ,राष्ट्रीय मीडिया में विमर्श का विषय नहीं बना और केंद्र सरकार की तरफ से चवन्नी भी राहत पैकेज के रूप में नहीं मिली. 

भागलपुर,पूर्णिया,गोधरा के दंगों से भी पलायन हुआ व देश के सैंकड़ों नागरिक मारे गए।मुजफरनगर नगर फाइल्स या हरियाणा जाट आरक्षण पर हरियाणा फाइल्स भी बननी चाहिए. 

हर नागरिक की मौत का संज्ञान लिया जाना चाहिए. एक नागरिक की जान अडानी-अंबानी की संपदा से 100 गुणा कीमती है. हफ्ता-वसूली की यह मंडी अब खत्म होनी चाहिए. भावुक अत्याचारों का धंधा कब तक चलाया जाएगा?

किसान कौम के बच्चे बंदूक लेकर इनके घरों की सुरक्षा के लिए खड़े हो तब ये लोग बंगलों में जाएंगे. क्यों देश इनका नहीं है क्या? ये नागरिक के बजाय राष्ट्रीय दामाद क्यों बनना चाहते है?

भारत सरकार संसाधन दे रही है आर्मी तैनात है तो डर किससे है?जिससे खतरा है उनके खिलाफ लड़ो!जाट-गुज्जर कश्मीर घाटी में आज भी रह-रहे है उन्होंने कभी असुरक्षा को लेकर रोना-धोना नहीं किया है.

 

 रजत कलसन ने लिखा है-

क्यों नहीं बनती दलित फाइल्स

आजकल बॉलीवुड फिल्म कश्मीर फाइल्स की चर्चा हो रही है जिसमें कथित तौर पर कश्मीरी पंडितों के साथ अत्याचार हुआ था जिसके चलते उन्हें वहां से पलायन करना पड़ा था. 

मेरे पास हरियाणा के दलित समाज के पिछले 12 साल में हुए अत्याचार के मामले जिनमे कत्ल, सामूहिक कत्ल, रेप, गैंगरेप, सामाजिक बहिष्कार, जाति के आधार पर किए जाने वाले अपमान की घटनाएं, दलित महिलाओं के साथ छेड़खानी व अन्य दिल दहला देने वाली घटनाओं की फाइल्स है. 

सुना है जब दर्शक कश्मीर फाइल्स देखकर रो कर रहे थे ,अगर कोई फिल्मकार हरियाणा में दलितों पर हुए अत्याचार की घटनाओं पर फिल्म बनाये तो हरियाणा का राजनीतिक परिदृश्य बदल जाएगा।

सिनेमाघरों में तहलका मच जाएगा जब दर्शकों को दिखाया जाएगा कि

कैसे मिर्चपुर में जातिवादी गुंडों की भीड़ ने वाल्मीकि समाज के एक पिता पुत्री को कमरे में बंद कर जिंदा जला दिया था और पूरी दलित बस्ती को आग के हवाले कर दिया था।

जब हिसार के गांव में एक दलित लड़की चीखती चिल्लाती रही तथा जातिवादी गुंडे गैंगरेप कर उसे फिल्माते रहे। पीड़िता के पिता ने इसके बाद आत्महत्या कर ली थी।

झज्जर के एक गांव में तथाकथित गोरक्षकों की भीड़ ने मरी गाय की खाल उतारने के आरोप में पांच दलितों की बेहरहमी से पीट पीट कर नृशंस हत्या कर दी थी।

गोहाना में पूरी दलित बस्ती को आग के हवाले कर दिया गया था।

एक दलित युवक ने जब कुरुक्षेत्र के पबनावा गांव में लव मैरिज की तो सवर्ण समुदाय ने गुस्से में पूरी दलित बस्ती में आगजनी और तोड़फोड़ कर दी थी।

रोहतक के गांव मदीना में दलित परिवार खेत से काम करके वापस लौट रहा था तो जातिवादी गुंडों ने फायरिंग कर दो दलितों को मौत के घाट उतार दिया था।

रोहतक के ही मोखरा गांव में दलित समाज के व्यक्ति के शव का जातिवादी गुंडों ने सार्वजनिक श्मशान घाट में संस्कार नहीं होने दिया था।

कैथल में मछली चोरी के आरोप में दो वाल्मीकि युवकों की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी न्याय के लिए  कैथल के सरकारी अस्पताल में 11 दिन शवों के साथ समाज ने आंदोलन किया था।

हिसार के मीरकां गांव में जातिवादी गुंडों ने दलित समाज के युवकों को चोरी के शक में भरी पंचायत में पिटवाया था जिसमें एक दलित युवक की मौके पर ही मौत हो गई थी।

हिसार के गांव भाटला में दलित बच्चों के साथ मारपीट के मामले में एफआईआर दर्ज करने की रंजिश में मुनादी करवाकर दलित समाज का सामाजिक बहिष्कार किया गया जिसके चलते गांव के दलित समाज बर्बादी के कगार पर आ गए हैं।

गांव छातर में पहले दलित युवकों को पीटा गया जब एफआईआर दर्ज कराई तो जातिवादी गुंडों ने पंचायत की और दलित समाज का सामाजिक बहिष्कार कर दिया यहां से लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा ।

गांव खापड में दलित समाज के नाबालिग बच्चे को चोरी के शक में जातिवादी गुंडों द्वारा सार्वजनिक जगह पर जगह-जगह पीटा गया जब मुकदमा दर्ज कराया तो इन्होंने भी दलित समाज का समाजिक बहिष्कार कर दिया।

हरियाणा तथा भारत में जितने भी हिरासत में मोतें होती हैं, उनमे 80 फ़ीसदी दलित समाज के लोग होते हैं । इस पर कौन फिल्म बनाएगा?

भारत में महिलाओं के खिलाफ जितने भी रेप व गैंग रेप की घटनाएं होती हैं उनमें से 75 फ़ीसदी दलित महिलाएं होती हैं।

 इस पर कौन डॉक्यूमेंट्री बनाएगा?

खाप पंचायत के गुंडों द्वारा सम्मान के नाम पर जितनी हत्या की जाती हैं उसमें से ज्यादातर दलित युवक और युवतियां इन गुंडों का शिकार बनते हैं इसको कोन नोटिस करेगा?

भारत के दलित राष्ट्रपति, दलित कैबिनेट मंत्री को हिंदू मंदिरों में नहीं घुसने दिया इस पर भी जरूर एक फिल्म बननी चाहिए ।

दलित समाज की छात्राओं के साथ गैंगरेप करने के बाद उन्हें कत्ल कर नहरों के किनारों पर फेंक दिया गया । इस तरह के केस हरियाणा के कई जिलों के गांवों में हुए । अगर इस तरह की घटनाएं इन लोगों के साथ होती तो यह लोग पूरे देश में आंदोलन खड़ा कर देते और अभी तक विशेष कानून और कई फिल्में बन जाती।

दलित अत्याचार के मामलों में समाज की पैरवी करने वाले वकीलों व दलित समाजिक अधिकार कार्यकर्ताओं के ऊपर संगीन धाराओं में मुकदमें दर्ज किए गए तथा उन्हें प्रताड़ित किया गया। उनकी लाइफ स्टोरी पर भी फिल्म बननी चाहिए

यह तो कुछ फाइल्स है अगर सारी फाइल्स खोल दें तो फिल्मकारों के कैमरे कम पड़ जाएंगे।

हमारे समाज के लोग जो यूट्यूब पर चैंनल चला रहे हैं, वह तो इस दिशा में पहल कर सकते हैं।

 

रीवा एस सिंग ने लिखा है-

कुछ बातें गाँठ बाँधकर रख लेनी हैं ताकि भारत, भारत ही रहे: 

 

1. सन् 1990 में कश्मीरियों संग जो हुआ उसे बिना लाग-लपेट ग़लत कहें. ब्रह्माण्ड में व्याप्त किसी भी तर्क के आधार पर उसका बचाव करने की चेष्टा न करें.  

2. समूचे भारतवर्ष के मुसलमानों को उस क़त्लेआम पर तर्क-वितर्क करने की ज़रूरत नहीं है. आप वहाँ नहीं थे, न आपसे सफ़ाई माँगी जा सकती है, न आपको सफ़ाई देनी चाहिए. वकालत करने की कोशिश न करें. आप कटघरे में नहीं हैं इसलिए बेकार के तर्क देकर बचाव का प्रयास भी न करें. ऐसी मारकाट का बचाव किसी सूरत में नहीं किया जाना चाहिए. 

3. कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ वह मुसलमानों ने किया लेकिन भटिंडा, बाराबंकी, बिलासपुर के मुसलमानों ने नहीं किया. कश्मीर के लोगों ने किया इसलिए जब यह विषय उठे तो धर्म के आधार पर चिह्नित कर नफ़रत फैलाने की रवायत न शुरू हो. कश्मीर के कृत्य के लिए समूचे भारत के मुसलमानों को कटघरे में नहीं रखा जा सकता है. 

4. फ़िल्म देखकर आ रहे लोग उन्मादी हो रहे हैं. इस ऊर्जा को सही जगह लगाए. धार्मिक लड़ाई समाधान नहीं हो सकता. उन शरणार्थियों के हित में कदम उठायें, किसी के अहित में नहीं. 

5. देश के वो तमाम कश्मीरी पंडित जो तीन दशक से अपनी ही मिट्टी में शरणार्थी बने हुए हैं, उनके पुनर्वास की बात हो और यह बात बिना किन्तु-परन्तु की जाए. अपना सब कुछ उजड़ते हुए देखना और वहाँ कभी न लौट पाने की पीड़ा आप चाहकर भी नहीं समझ सकते. फ़िल्म देखकर दहाड़ लगाने से बेहतर है उचित कदम उठाना. फ़िल्म देखकर द्वेष न फैलाए. पीड़ितों के हित में कुछ कर सकें तो करें. ज़रूरत उन्हें इसी की है. 

 

आशुतोष कुमार ने लिखा है-

उस कौम के बारे में सोचिए, जिसे रोने और उबलने के लिए भी एक के बाद एक फेंक कहानियों की जरूरत होती. गर्व करने के लिए तो सभी को होती है. जीवन में सब झूठ भी हो, कहीं एक आंसू तो सच्चा होना चाहिए. साफ और तरल.

आरपी सिंह ने लिखा है-

अगर जज लोया फाइल्स फिल्म बनाकर रीलिज कर दी जाय तो क्या भाजपाई उसे टैक्स फ्री करने की मांग करेंगे.

फिल्म को लेकर भाजपा के एक विचारक पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ का एक ट्विवट भी जबरस्त ढंग से वायरल रो रहा है. पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने लिखा है- एक बार कश्मीर फाइल्स देखिए... फिर आपके व्यापार, शिक्षा, नौकरी, विकास, बेरोजगारी, मंहगाई, जातिवाद और अपंग धर्मनिरपेक्षता के सारे भूत मात्र दो घंटे पचास मिनट में उतर जाएंगे. द कश्मीर फाइल्स....हर-हर महादेव.

 

 

 

 

 

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10 मार्च को उतर जाएगा फर्जी राष्ट्रवाद का चोला

यूपी में कांग्रेस के कोर वोटर ब्राह्मण, मुसलमान और दलित हुआ करते थे। सपा-बसपा के आने से दलित-मुस्लिम वोट कांग्रेस से दूर चला गया, नरसिम्हा राव के गठबंधन के फ़ैसले ने कांग्रेस को और दूर भेज दिया। मन्दिर आंदोलन के बाद भाजपा ने ब्राह्मण वोटों पर कब्ज़ा कर लिया। 2017 में सपा-कांग्रेस साथ आई, लेकिन एक दूसरे को वोट ट्रांसफर नहीं करवा पाई, यादवों ने कांग्रेसी उम्मीदवार को वोट नहीं दिया, ब्राह्मणों ने सपा उम्मीदवार को वोट नहीं दिया। 2019 में सपा-बसपा साथ आई, गैर-जाटव दलितों ने भाजपा को वोट दे दिया। यह गठबंधन भी असफल रह गया, साथ में गैर-यादव ओबीसी भी भाजपा के साथ गोलबन्द हो गए। अब तय है कि चुनाव से पहले ये तीनों कभी साथ नहीं आयेंगे. साथ आयेंगे तो नुकसान झेलेंगे, भाजपा को फायदा पहुंचाएंगे। मोदी लहर के अलावा भाजपा जातीय समीकरण के वजह से भी जीतती रही। इसकी एक वजह संजय निषाद, राजभर, अनुप्रिया, केशव और स्वामी प्रसाद मौर्य थे। इस चुनाव में कांग्रेस नई पहचान पर लड़ रही है, शून्य जनाधार के बावजूद मजबूत दिख रही है। योगी के ठाकुरवाद के कारण ब्राह्मणों के वोट में भारी फूट, कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम कर रही है। 12 फीसदी ब्राह्मणों में 60:40 के अनुपात में वोटों का बिखराव हुआ है। यहां अखिलेश नहीं पहुंच पाते, सपा-कांग्रेस गठबंधन भी इस किले को नहीं भेद पाई थी। अखिलेश के लिए यह चुनाव शुरू से मुश्किल था। लेकिन किसान आंदोलन ने आसान कर दिया। जयंत की अगुआई में जाट-किसानों का बड़ा जत्था अखिलेश के पाले में आया, मुस्लिम वोट में बिखराव नहीं हो पाया। शिवपाल साथ आएं, सपा गठबंधन ने पहले पश्चिम फतेह किया, छोटे दलों के साथ गठबन्धन ने अवध, बुंदेल में बढ़त दिलवाई... अब राजभर, स्वामी के नेतृत्व में पूर्वांचल का किला भेदा जा रहा है। अखिलेश की सोसल इंजीनियरिंग ने भाजपा के बड़े बड़े चाणक्यों को पछाड़ दिया है। यह चुनाव अब सपा की पिच पर हो रहा है। सपा लार्जेस्ट पार्टी बनने जा रही है, भाजपा दो नंबर पर रहेगी। पश्चिम में रालोद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। रालोद और कांग्रेस नई पहचान के साथ प्रदेश में उभरने जा रही है। भाजपा को करारा तमाचा लगा है, इसकी गूंज उसे 24 तक सुनाई देगी। कई जिले ऐसे है जहां भाजपा खाता नहीं खोल पाएगी। फर्जी राष्ट्रवाद का चोला उतरने वाला है, कई बड़े मंत्री चुनाव हार रहें है। आप चाहें तो स्क्रीनशॉट ले लीजिए..! सपा गठबंधन की सीटें 200 से ज्यादा रहेंगी, एनडीए की सीटें 200 से कम रहेंगी। योगी आदित्यनाथ का राजनैतिक करियर खत्म हो चुका है, 10 मार्च को अखिलेश आ रहे हैं। प्रियांशु की फेसबुक वॉल से
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अभी तो दुनिया गोदी मीडिया पर हँस रही है जल्दी ही थूकने लगेगी

देश के प्रख्यात पत्रकार रवीश कुमार ने अपने फेसबुक वॉल पर एक खुला पत्र चस्पा किया है.

इस पत्र के जरिए उन्होंने एक बार फिर गोदी मीडिया को आड़े हाथों लिया है.

 

सेवा में,

संघ प्रमुख, बीजेपी नेतृत्व , सामान्य कार्यकर्ता, समर्थक और आम जनता

मेरी बात ध्यान से सुनें। प्रधानमंत्री मोदी की खुशामद में भारत का मीडिया इतना गिर चुका है कि एक दिन इसके कारण इस देश में और दुनिया भर में आप लज्जित होने वाले हैं। बल्कि आज ही हो रहे हैं। आप गोदी मीडिया के कारण दुनिया में सर उठाने के लायक़ नहीं रहेंगे। अगर आप गटर के पानी को गंगा समझने पर अड़े रहेंगे तो यह माँ गंगा के साथ न्याय नहीं होगा। गंगा की पवित्रता होते हुए आपको गोदी मीडिया नाम के गटर की आदत लगती जा रही है। बेशक बीजेपी के लिए काम करते रहें, पार्टी को सपोर्ट करते रहें लेकिन इस गोदी मीडिया से दूर रहें। अभी तो दुनिया गोदी मीडिया पर हँस रही है जल्दी ही थूकने वाली है। 

मैं मान कर चलता हूँ कि आप भारत से इतना प्यार तो करते ही होंगे कि गोदी मीडिया के गटर को गंगा नहीं कहेंगे। समय रहते संभल जाएँ वरना आने वाले दौर में जिन कार्यकर्ताओं ने बीजेपी के लिए जीवन दिया उन्हें भी गोदी मीडिया के कारण लज्जित जीवन जीना पड़ेगा। आप इस गोदी मीडिया से कहें कि वह आपकी राजनीति का प्रोपेगैंडा छोड़ दे। आपके पास शानदार कार्यकर्ता हैं वो यह काम खुद करते रहे हैं और कर लेंगे। 

भारत के सभी नागरिकों से अपील करता हूँ कि गोदी मीडिया से दूरी बनाएँ। गोदी मीडिया को हज़ारों करोड़ों का विज्ञापन देने वाली कंपनियों से अपील करें कि इन्हें विज्ञापन न दें। वरना एक दिन ये कंपनियाँ जब आपका लेवल समझ जाएँगी तो साबुन में लाल मिर्च का बुरादा डाल कर बेच देंगी। कहेंगी कि जब न्यूज़ इतना घटिया देखते हो तो साबुन क्यों बढ़िया माँगते हो। आपसे पैसे लेकर आपको दुत्कार देंगी। नहाते समय इतना परपराएगा कि उस समय आप रो रो कर रवीश कुमार को याद करेंगे। मैं हाथ जोड़ कर विनती कर रहा हूँ। 

मेरे पत्र की यह प्रति मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी को संलग्न समझी जाए। बीजेपी के हर कार्यकर्ता और समर्थक के घर भेजी जाए। 

 

रवीश कुमार 

दुनिया का पहला ज़ीरो टीआरपी ऐंकर

 

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यूपी के लाइव शो में जूता खाते-खाते बचे अमिश देवगन उर्फ हिंदी के अर्णब गोस्वामी

अमिश देवगन...

पहली बार नाम सुनकर यहीं लगा था कि यह देवगन फिल्म स्टार अजय देवगन का कोई भाई-वाई होगा, लेकिन कांग्रेस के एक लीडर राजीव त्यागी ने जब उन्हें खुलेआम टीवी पर भड़वा और दल्ला कहा तो पता चला कि ये वाले देवगन साहब हिंदी के टॉमी मतलब सस्ते किस्म के अर्णब गोस्वामी है.

तो भाइयों...खबर यह है कि हिंदी के इस गोस्वामी को कल जनता ने बुरी तरह लताड़ा और फटकारा है. हिंदी के सस्ते गोस्वामी साहब 2 मार्च को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में लाइव शो कर रहे थे. सब जानते हैं कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने की थीं. इस विश्वविद्यालय में लंबी-लंबी फेंकने वाले कभी नहीं चल पाए हैं. यूपी चुनाव में कव्हरेज के लिए पहुंचे देवगन साहब भी लंबी-लंबी फेंक रहे थे, लेकिन उनकी फेंकम-फाकी ज्यादा चल नहीं पाई. कार्यक्रम के दौरान मौजूद दर्शकों ने उन्हें जमकर लताड़ा. बताते हैं कि अगर अमिश देवगन अपना शो बंद नहीं करते तो जनता की तरफ से जूता चल जाता. उन्हें जैसे-तैसे जान बचाकर भागना पड़ा.

अमिश देवगन को अंधभक्त एक राष्ट्रवादी पत्रकार के  तौर पर देखते-समझते हैं, लेकिन निजी तौर पर मैं इस महान पत्रकार को लोकतंत्र का मर्सिया पढ़ने वाले शख्स के तौर पर ही जानता हूं. इनके कार्यक्रम आर-पार में शामिल अगर कोई शख्स सत्ता से सवाल करता है तो जवाब अमिश देवगन की तरफ से ही सुनने को मिलता है. एक मर्तबा चैनल पर डिबेट के दौरान समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने इनको गोदी मीडिया का सरताज कह दिया था. भाटी का कहना था कि एंकर के तौर पर अमिश ने चाटुकारिता की सारी सीमा पार कर ली है. भाटी ने अमिश को गोदी मीडिया के पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित करने की सिफारिश भी की थीं.

अमिश देवगन न्यूज़ 18 के प्रबंध संपादक है. एक बार एक खबर में उन्होंने यह झूठा दावा किया था कि कुर्ला, मुम्बई में मस्जिद के बाहर नमाज़ के बाद पुलिस के साथ बदसुलूकी की गई. असल में जो झड़प हुई थी उसमें किसी भी मस्जिद और किसी भी नमाज़ का कोई सन्दर्भ ही नहीं था. बाद में इस खबर के लिए अमिश को सफाई देनी पड़ी.

अपने शो आर-पार में उन्होंने पूजा स्थल के विशेष प्रावधान अधिनियम के संबंध में जनहित याचिका पर बहस की मेजबानी करते हुए ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को हमलावर और लुटेरा निरुपित कर दिया था. उनके इस कृत्य के बाद देशभर में उनके खिलाफ शिकायतें हुई और एफआईआर तक दर्ज की गई.

बहरहाल नौकरी-चाकरी कर रहे पत्रकार शायद इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं होंगे कि भगवा बिग्रेड और गोदी में बैठी हुई मीडिया के खिलाफ जनता का गुस्सा फूट रहा है, लेकिन सच्चाई यही है कि जनता भाजपाइयों और उनकी तारीफ में कसीदें पढ़ने वाले मीडियाकर्मियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीट रही है. किसान आंदोलन के दौरान हम  सबने मीडियाकर्मियों की कुत्तागति देखी हैं.कल यूपी में बीएचयू से लाइव शो में भी यहीं हुआ है.

लोगों ने देखा कि डिबेट के दौरान एंकर युवक के पास जाता है और उससे अपना सवाल करने को कहता है. युवक एंकर को ईमानदार पत्रकार कहने लगता हैं. इतना सुनते ही अमिश देवगन आगे बढ़ जाते हैं. जैसे ही अमिश देवगन आगे बढ़ते हैं कार्यक्रम में मौजूद अन्य लोग हंगामा करने लगते हैं. जमकर नारेबाजी भी होती है.

बहरहाल इस कार्यक्रम के बंद होने के बाद लोग तरह-तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं. पूर्व आईएएस सूर्य प्रताप सिंह ने इस वीडियो को शेयर करते हुए तंज कसा है. पुनीत कुमार सिंह नाम के एक टि्वटर हैंडल से एंकर पर चुटकी लेते हुए लिखा है कि जैसे ही ईमानदार बोला अमिश देवगन का माइक डोला. सूरज नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा है- अगर थोड़ी देर और माइक लड़के के पास रहता तो लाइव में फजीहत हो जाती.

राजा पाल नाम के यूजर ने कमेंट किया – बीएचयू के नौजवान बहुत गुस्से में दिख रहे हैं? सात मार्च को अगर यह गुस्सा वोट के जरिए ईवीएम पर निकल गया तो ? विजय नाम के ट्विटर यूजर लिखते हैं कि कुछ तो मर्यादा रखनी चाहिए. नीरज नाम के ट्विटर यूजर कमेंट करते हैं कि बनारस के युवाओं ने तय किया है कि अब डिबेट हिंदू – मुसलमान, मंदिर – मस्जिद के बजाय रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ पर होगी. जब इन मुद्दों पर डिबेट होगी तो नेताओं को भागना ही पड़ेगा.

राजकुमार सोनी 

 

 

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400 करोड़ का फंड होकर भी मोदी सरकार सोती रही, यूक्रेन में छात्र अपनी जान को रोते रहे

क्या आप यह बात जानते हैं कि 2009 में भारत के विदेश मंत्रालय ने आपदा और युद्ध की स्थिति में फंसे भारतीयों को निकालने के लिए एक फंड बनाया था? इस फंड का नाम है इंडियन कम्युनिटी वेलफेयर फंड ICWF, यह फंड भारतीयों के लिए ही है.जब आप दूतावास या पासपोर्ट कार्यालय से दस्तावेज़ बनाते हैं तो इस फंड के लिए शुल्क लिया जाता है. यानी विदेशों में रहने वाली भारत की जनता के पैसे से ही यह फंड बना है. जिसके लिए वह दो या तीन डॉलर देती है...तो उसका हक बनता है कि इस पैसे से आपदा या युद्ध की स्थित में सरकार किराए पर विमान लेकर मुफ्त में सुविधा दे, नहीं तो यह पैसा किस काम का है.  इसका इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ? कोविड के समय 44 करोड़ खर्च कर वाहवाही क्यों लूटी गई थी, अब जब देरी हुई है और सरकार सोती हुई पकड़ी गई है तो छात्रों पर ही हमला किया जा रहा है. 

पिछले साल दिसंबर में लोकसभा में भारत सरकार ने बताया है कि ICWF के पास 474 करोड़ का फंड है. कोविड के समय से लेकर अक्तूबर 2021 तक सरकार ने इस फंड से 44 करोड़ खर्च किया है. चार सौ करोड़ का फंड होते हुए भी इसका इस्तेमाल समय से नहीं हुआ.  इस पैसे से ज्यादा विमानों का इंतज़ाम हो सकता था और छात्रों के टिकट पर सब्सिडी दे गई होती तो वे दोहा और दुबई होते हुए भारत पहुंच जाते. इन सब जानकारियों को छिपा कर इन छात्रों पर ही हमला किया गया कि विदेश क्यों गए पढ़ने. छात्रों ने कभी नहीं कहा कि मुफ्त विमान भेजें. उन्होंने एयर इंडिया का टिकट तो कटाया ही था जिसका दाम भी काफी महंगा था. डेढ़ लाख से पौने दो लाख.

आई टी सेल अपनी सरकार से पूछ कर बताए कि पहले जो उड़ाने यूक्रेन जाती थीं उनका क्या हुआ. क्या सीधी उड़ान नहीं थी, थी तो क्यों बंद हुई? जब एयर इंडिया ने विमान भेजने का फैसला किया तब भी टिकट काफी महंगा था. छात्रों ने चालीस से पचास हज़ार का टिकट कटाया ही. तो साफ रहना चाहिए कि विमान नहीं था और टिकट बहुत महंगा था. 25 जनवरी से ही छात्र ट्विटर पर गुहार लगाने लगे थे कि यूक्रेन की क्या हालत है, हमारे लिए क्या एडवाइज़री है, कमर्शियल फ्लाइट नहीं है, टिकट महंगे हैं, कुछ कीजिए. साफ है कि सरकार ने देरी की. 18 फरवरी को एयर इंडिया ने ट्विट किया कि एयर इंडिया 22, 24 26 फरवरी को तीन विमान चलाएगा. 18 फरवरी को ट्विट हो रहा है कि चार दिन बाद 22 फरवरी को विमान जाएगा? वो भी एक दिन एक विमान? फिर दो-दो दिनों के अंतर पर एक विमान? ये थी भारत की गंभीरता? सरकार ने 22, 24, 26 फरवरी के लिए एयर इंडिया के तीन विमान भेजने की घोषणा की थी. यह भी फ्री नहीं था. 25 फरवरी को सरकार ने कहा कि विमान सेवा मुफ्त होगी, लेकिन तब तक उस सेवा का खास मतलब नहीं रह गया था. और ज़रा दिमाग़ भी लगाएं.  क्या तीन विमान से 20,000 छात्र आ जाते? इन तीन विमानों से तो 900 छात्र ही आ पाते. देर से जागने के बाद भी सरकार का यह हाल था. 22 फरवरी को ही अगर कई विमान यूक्रेन और आस-पास के देशों में भेज दिए जाते और छात्रों से कहा जाता कि वे सीमाओं तक पहुंचे तो इसे कहा जाता कि सरकार ने रणनीति बनाकर इंतज़ाम किया है. अभी तो छात्र खुद अपनी जान जोखिम में डालकर, पचास पचास किलोमीटर पैदल चल कर सीमाओं की तरफ पहुंच रहे हैं. क्या यह बात झूठ है?

अब आते उस सवाल पर कि क्या यह evacuation है? क्या भारत सरकार यूक्रेन में फंसे छात्रों को निकाल रही है? Evacuation का यही मतलब होता है कि किसी आपात स्थिति में फंसे लोगों को उस जगह से निकालना. तो क्या भारत सरकार यूक्रेन में फंसे छात्रों को यूक्रेन के भीतर से निकाल रही है? जवाब है नहीं. सोमवार तक छह विमानों से कुल 1200 छात्रों को भारत लाया गया लेकिन वो evacuation नहीं है. ये वो छात्र हैं जो अपनी जान जोखिम में डाल कर यूक्रेन के सीमावर्ती देशों में पहुंचे हैं और वहां से इन्हें सीमा पार कराया गया है. यानी सारा काम छात्रों ने किया है. मगर प्रचार हो रहा है कि भारत सरकार बचा कर ला रही है. तब फिर खारकीव, लविव, कीव में जहां युद्ध हो रहा है. जहां हज़ारों छात्र बंकर में छिपे हैं... उनको क्यों नहीं बचा कर ला सकी ? वहां से भी छात्रों का समूह चार से पांच लाख रुपए जमा कर खुद से बस किराये पर ले रहा है. हज़ार से पंद्रह सौ किमी की यात्रा पर निकल चुका है. यानी छात्र ख़ुद को evacuate कर रहे हैं. हंगरी, पोलैंड से इन छात्रों को लाना evacuation नहीं है.

रुस के राष्ट्रपति से बातचीत को लेकर हंगामा मच गया जैसे यही एक बड़ी बात हो गई है ग्लोबल लेवल पर लेकिन इस बातचीत का क्या नतीजा निकला ? क्या रुस से कोई मदद मिल गई ? गोदी मीडिया यूक्रेन के छात्रों के बयानों को दिखाने से कतरा रहा है. जब तक उसका कैमरा हटता है वहां फंसे छात्र बोल ही देते हैं कि सरकार ने कुछ नहीं किया है. दूतावास ने कुछ नहीं किया है. ऐसी आवाज़ों को अब रणनीति बना कर गोदी मीडिया और अर्ध गोदी मीडिया के चैनलों पर कम किया जा रहा है. छात्रों से ज़बरन बुलवाया जा रहा है कि मोदी सरकार का धन्यवाद करें. जबकि इस मामले में सरकार सोती रही.  गनीमत है कि अभी तक जान माल का नुकसान नहीं हुआ है लेकिन साफ है कि सरकार ने इतना कुछ नहीं किया जितना वह प्रचार के ज़रिए हासिल करना चाहती है.

इस तरह की कोशिश से वह अपनी छवि की रक्षा की चिन्ता ज़्यादा कर रही है, बच्चों की कम. सरकार बताए कि भारतीय दूतावास ने कब सरकार को अलर्ट किया या सरकार ने क्या पहल की? यूक्रेन पर हमला होने वाला था, वहाँ शहर शहर में हज़ारों छात्र फँसे हुए थे. उनकी जान की चिन्ता किस तरह से की गई? क्या तब पता नहीं था कि इतने छात्रों को निकालना असंभव हो जाएगा? कम से कम इन्हें सीमावर्ती इलाक़ों में ही पहुँचने के लिए कह दिया जाता? जो एडवाइज़री जारी की उसमें कुछ भी ठोस नहीं था. आप पढ़ें. अगर ठोस होता तो लिखा होता कि पूर्वी क्षेत्र में रहने वाले भारतीय ही कम से कम अपना ठिकाना बदल लें. पूर्वी क्षेत्र से ही रुस ने हमला किया है. जिस तरह से भारत सरकार ने 25-26 के बाद यूक्रेन से सटे देशों के दूतावास को अलर्ट किया है उससे साफ है कि किसी भी आपात स्थिति की कल्पना पहले से नहीं की गई थी. कोई तैयारी नहीं थी कि इन दूतावासों की क्या भूमिका होने जा रहा ही है. अब जब बम गिरने लगे और भारतीय छात्रों ने अपनी हालत का वीडियो बनाकर भारत भेजना शुरू किया तब सरकार की सांस फूल गई. सब कुछ ऐसा किया जाने लगा जिससे सबसे पहले यही लगे कि सरकार कर रही है.  विमान से आने वाले छात्रों के स्वागत में मंत्री एयरपोर्ट पहुंचने लगे. इन्हीं की फोटो चलने लगी. तब भी हाहाकार नहीं रुका. यह बात सामने आने लगी कि हज़ारों छात्र खुले आसमान के नीचे माइनस दस डिग्री सेल्सियस में रात गुज़ार रहे हैं.  उनकी हालत कभी भी बिगड़ सकती है. तब सारी ताकत इस बात पर लगा दी गई है कि प्रोपेगैंडा करो कि मोदी सरकार महान है. वह छात्रों की चिन्ता में बैठक कर रही है।

प्रख्यात पत्रकार रवीश कुमार की फेसबुक वॉल से 

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रतलामी सेव...आपकी लैग्वेज बहुत ही खराब है भाई साहब...जरा इसको सुधारिए वर्ना जेल हो जाएगी ?

जो लोग छत्तीसगढ़ के सामाजिक ताने-बाने से वाकिफ हैं वे जानते हैं कि यहां हर तरह की कला-संस्कृति और खानपान का जबरदस्त सम्मान किया जाता है. यहां के लोग रतलामी सेव को भी बड़े चाव से खाते रहे हैं, लेकिन हाल के दिनों में जब रतलामी सेव ने कुंठा से भरे हुए अपने तीखेपन को दिखाया है तब से इस सेव के प्रति लोगों में वितृष्णा पैदा हो गई है.

आप सोच रहे होंगे कि ये रतलामी सेव है कौन ? माजरा क्या है ? हमें भी अभी थोड़ी देर पहले ही सोशल मीडिया में चस्पा हुई एक पोस्ट के जरिए पता चला कि छत्तीसगढ़ के एक भाजपा नेता और पूर्व मंत्री को रतलामी सेव कहा जाता है. यह वहीं नेता है जिसने दो दिन पहले राहुल गांधी के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया था और वीडियो में मां-बहन की गंदी-गंदी गालियां देते हुए खुद को सूरमा साबित करने की कवायद करता हुआ नजर आया था.

नेताजी के मुंह से फूल तो झर गए लेकिन इन फूलों के झरने के साथ ही छत्तीसगढ़ का आम नागरिक बुरी तरह आहत हो गया. ऐसा भी नहीं है कि छत्तीसगढ़ के लोग गाली-गलौच नहीं करते, लेकिन जो मूल रुप से छत्तीसगढ़ी हैं अगर कभी आप उनकी गालियों को सुनेंगे तो आनंद से भर उठेंगे. मूल छत्तीसगढ़िया की गाली में आनंद और प्रेम का भाव हमेशा विद्यमान रहता है.

इसमें कोई दो मत नहीं है कि छत्तीसगढ़ के लोग बेहद सीधे-सादे और सरल हैं, लेकिन वे इतने भी सरल नहीं होते हैं कि प्रेम और नफरत की भाषा नहीं समझते. जो लोग भी रतलामी सेव को जानते हैं वे इस बात को जानते हैं कि उनकी पूरी शारीरिक भाषा में अकड़ है. उनको देखकर ही लगता है कि उन्होंने अपने शरीर के हर हिस्से को किसी नट-बोल्ट से कस रखा है. लेकिन यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि जब ऐंठन की चूड़ी आवश्यकता से अधिक टाइट हो जाती है तो छत्तीसगढ़िया उसे अपने ढंग की पाना-पेन्चिस से ठीक कर देता है.

यहां के लोगों को आप मोहब्बत के जरिए ही अपना बना सकते हैं. अगर आप छतीसगढ़ियों से नफरत की भाषा में बात करेंगे तो फिर वह आपको कब घोलकर पी जाएगा...पता भी नहीं चलेगा. कल एक छत्तीसगढ़ी ने फेसबुक पर लिखा- रतलामी सेव को जिस पुलिस वाले ने कूटा है उसको गाड़ा-गाड़ा बधाई. हम पुलिस वाले भाई से निवेदन करते हैं कि सेव को गाठिया बनते तक कूटा जाय ताकि जब हम लोग दारू पीने बैठे तो गाठिया भी खा सकें.

जो हालात बन रहे हैं उसे देखकर लग रहा है कि दो-चार दिनों के बाद रतलामी सेव की मुसीबत बढ़ सकती है. रतलामी सेव और बारीक सेव ( मतलब समर्थकों ) ने जिन दो युवकों को पीटा है उनमें से एक सतनामी समाज से संबंधित है जबकि दूसरा आदिवासी वर्ग से है. दोनों युवकों ने पुलिस के पास अपनी शिकायत दे दी है. युवकों का कहना है कि नेताजी के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निरोधक अधिनियम के तहत भी मामला पंजीबद्ध कर कार्रवाई की जाय. कुछ पुलिस वालों ने भी नेताजी के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई हैं.

इधर मुसीबत को बढ़ता देखकर पार्टी के जिम्मेदार और समझदार नेताओं ने किनारा करना प्रारंभ कर दिया है. पार्टी के एक बड़े नेता की राय है कि हम धरना-प्रदर्शन करने की रणनीति तो बना रहे हैं, लेकिन नेताजी ने जिस ढंग से अपशब्दों का प्रयोग किया हैं उसे हम जस्टिफाई नहीं कर पा रहे हैं. हर तरफ से लोग यहीं पूछ रहे हैं कि जो गाली दी गई है क्या वह जायज़ है ? संस्कारी पार्टी में नेटफिलिक्स के पाकेट एडिशन को आखिरकार किसका संरक्षण हासिल हैं ?

जो भी हो रतलामी सेव जी...आपकी लैग्वेज बहुते ही खराब है भाई साहब...जरा सुधारिए इसको...वर्ना किसी दिन आपको जेल हो जाएगी. अगर आपको जेल हो गई तो फिर... कालीचरण महाराज और जीपी सिंह की बैरक के बाजू वाली बैरक में रहना पड़ेगा. वैसे बहुत से लोग इस बात की दुआ मांग रहे हैं कि ऐसा हो जाय. जो लोग दुआ मांग रहे हैं उसमें आपकी पार्टी के लोग ही सबसे ज्यादा शामिल हैं. आपकी जुब़ान से आहत छत्तीसगढ़ की बड़ी आबादी तो खुश होगी ही. बस...आपको और आपकी पार्टी के दो-चार-दस लोगों को ही थोड़ा खराब लग सकता है. ओपी गुप्ता को तो जानते हैं न आप ? अरे भाई साहब... वहीं ओपी गुप्ता जो दुष्कर्म के आरोप में जेल में बंद थे अब जाकर जैसे-तैसे जमानत पर बाहर आ पाए हैं. गुप्ता जी लगभग दो साल तक जेल के भीतर सफेद छत को ताकते हुए-नीला आसमां खो गया जैसा मार्मिक गीत गाया करते थे. आपके भी आसार गीत गाने लायक बनते हुए दिखाई दे रहे हैं.

9826895207

राजकुमार सोनी

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ललिता पवार के फुस्सी बम बजट को एटम बम साबित करने के लिए छत्तीसगढ़ आ रहे हैं केंद्रीय मंत्री

सोशल मीडिया भी बड़ी अजीब जगह है.अभी-अभी पता चला कि बजट पेश करने वाली एक नेत्री को जनता ने ललिता पवार की उपाधि दे रखी हैं. कुछ लोग उनमें बाहुबली फिल्म की शिवगामी भी देखते हैं जो बार-बार कहती हैं-मेरा फरमान ही मेरा शासन है. हुआ बस इतना सा है कि ललिता पवार ने जो बजट पेश किया है वह किसी को समझ में नहीं आ रहा है...तो इसे समझाने के लिए पांच फरवरी को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक केंद्रीय मंत्री का आगमन हो रहा है. 

मंत्री जी एक गोष्ठी में भाग लेंगे और वहां मौजूद कार्यकर्ताओं को बताएंगे कि भाइयों...जब हमारे पापा जी ने बजट पेश करवाया हैं तो कुछ सोच-समझकर करवाया होगा. क्योंकि वे जो कुछ भी करते हैं काफी सोच-समझकर करते हैं. जब तक वे हैं तब तक हर हाथ में नैपकिन है. जो बजट पेश किया गया है वह देश का बजट है. अगर हम राष्ट्रभक्त है तो हमें पहले देश देखना है.देश बचेगा तो लोग बचेंगे... वगैरह-वगैरह...

अब एक राजनीतिक दल की गोष्ठी है तो जाहिर सी बात है कि गोष्ठी में कई तरह की और भी बातें होगी, लेकिन मुख्य एजेंडा यहीं है कि मायूस जनता को समझाना है कि बजट बहुत ही शानदार और जानदार है. जबकि हकीकत यह है कि बजट से पहली बार देश के आम नागरिक को घनघोर किस्म की निराशा हाथ लगी है. मध्यवर्ग तकरीबन 8 साल से टैक्स स्लैब में बदलाव की उम्मीद लगाए बैठा था, लेकिन उसे भी राहत नहीं मिल पाई. जबकि खाया-पीया-अघाया वर्ग हर बार किसी न किसी तरीके से खुश हो जाता था और चिल्लाते रहता था कि सत्तर साल में क्या मिला... क्या मिला... ? बहरहाल बजट के पेश होने के साथ ही इस वर्ग का मुंह सूखी हुई सेम की फल्लियों की तरह लटक गया है. बजट पेश करने के दौरान महाभारत के एक श्लोक के जरिए उदाहरण दिया गया कि किसी भी राजा को किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए और धर्म के मुताबिक करों का संग्रहण करना चाहिए.

लोगों में सबसे ज्यादा मायूसी टैक्स कम न होने को लेकर दिख रही है. देश के एक बड़े अखबार ने सर्वे करवाया तो मालूम हुआ कि 72 प्रतिशत लोग टैक्स में राहत नहीं मिल पाने से नाखुश है. लगभग 58 फीसदी लोगों को तो यह लगा ही नहीं कि बजट में कुछ उनके काम का भी है. जबकि 55 फीसदी लोगों ने यह माना कि अब महंगाई और ज्यादा बढ़ने वाली है. कांग्रेस के नेता राहुल गांधी बजट को जीरो बजट बता चुके हैं. जबकि शशि थरूर का कहना है कि बजट गीले पटाखे जैसा है जिसमें कुछ भी नहीं है. इसमें मनरेगा, डिफेंस जैसी चीजों के बारे में कुछ नहीं बताया गया है. आम लोगों के लिए कोई टैक्स रिलीफ नहीं दी गई है. आखिर इसमें जनता के लिए क्या है. खैर...बजट तो पेश हो गया लेकिन यह दुर्भाग्य है कि बड़े नेताओं इस बजट का फायदा समझाने के लिए दौरा करना पड़ रहा है. नेताजी के दौरे को देखकर सोशल मीडिया में तैरती हुई एक टिप्पणी याद आ गई. टिप्पणी कुछ इस तरह की है- भाइयों...और बहनों...आज हमने बजट पेश कर दिया है. बजट में आपको कुछ समझ में आया ? नहीं आया न ? अगर समझ में नहीं आया भाइयोंऔर बहनों... तब भी आपको समझने का नाटक करना है. अगर आपने ऐसा नहीं किया तो हम इसको समझाने के लिए विज्ञापन पर ही 20 हजार करोड़ रुपए खर्च कर देंगे. 

 

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बलात्कारी आसुमल...उर्फ आसाराम और मातृ-पितृ पूजन दिवस

हो सकता है कि बहुत से लोग वेलेंटाइन डे से चिढ़ते हो और 14 फरवरी को मातृ-पितृ दिवस के रुप में मनाते हो, लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कई जगहों पर अपने ही आश्रम की एक नाबालिग लड़की से बलात्कार के मामले में सजा काट रहे आसुमल थाउमल हरपलानी उर्फ आसाराम बापू के पोस्टर जगह-जगह पर चस्पा हैं. इन पोस्टरों में उल्लेखित हैं कि असली प्रेम दिवस मनाइए. असली प्रेम हासिल होता है-मातृ-पितृ के पूजन से.

हमने बचपन से तुलसी-आंवला और पीपल के पूजन को देखा है. और भी कई तरह के पूजन को जानने-समझने का अवसर मिलता रहा है, लेकिन आसुमल मार्का पूजन का अलग ही ढिढोरा पीटा जाता है. अगर कभी आपने आसाराम बापू के समर्थकों के द्वारा मनाए जाने वाले आयोजन में शिरकत नहीं की है तो आपको दूर से ही सही आउट साइडर बनकर शिरकत अवश्य करनी चाहिए. अगर आप वैज्ञानिक सोच के मालिक हैं तो आपको यह देखकर ही आनंद आ जाएगा कि साला...हो क्या चुतियापा हो रहा है ? मैं तो इनके आयोजन में मनोरंजन के लिहाज से जाता हूं. गर्मी के दिनों में भी आसुमल के समर्थक कई जगहों पर प्याऊ घर खोलते हैं तब भी रुककर पानी पीता हूं. पानी पीने के दौरान पानी पिलाने वाले से कहता हूं- आप लोग बहुत पुण्य का काम कर रहे हो... देखना एक दिन आसुमल जेल से बाहर आ जाएंगे और देशवासियों की समस्त पीड़ाओं को हर लेंगे.

लेकिन... मेरे बार-बार पानी पीने के बाद भी आसुमल उर्फ आसाराम बापू जेल से बाहर नहीं आ पाए हैं. लगता है पानी में ही कुछ प्राब्बलम हैं. मैंने नरेंद्र मोदी सहित देश के बहुत सारे दिग्गजों को उनके मंच पर शिरकत करने वाला वीडियो भी देखा है, फिर भी आसाराम जेल के अंदर ही है. उनके बारे में कई तरह की खबरें छपते रहती है. कोई कहता है कि वे अत्यंत जीर्ण-शीर्ण हो गए हैं. जेल में तबीयत खराब रहती है. जेल में उन्हें धीमा जहर देकर मारने की कोशिश की जा रही है आदि-आदि. अभी एक रोज पहले हिन्द राष्ट्र सेना के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष धनंजय देसाई ने उन्हें जेल से शीघ्र छोड़ने की मांग को लेकर नोएडा में एक पत्रवार्ता की थीं. धनंजय का कहना था कि भाई... इस देश में साधु-संतों का बहुत ही जबरदस्त ढंग से अपमान हो रहा है. ( अरे किसी और दल की सरकार रहती तो बात समझ में आती है कि अपमान-सपमान हो रहा होगा... अब तो हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को लेकर चलने वाली सनातनी सरकार है तो फिर अपमान क्यों हो रहा है ???? यह तो शर्म से डूब मरने वाली बात है. )

छत्तीसगढ़ में भी बहुत से लोग आसुमल के गुजरात स्थित आश्रम में जाकर होली खेला करते थे. पता नहीं वहां वे किस तरह की होली खेलते थे लेकिन लौटकर बड़े गर्व से बताते थे कि बापू के साथ होली खेलकर बहुत मजा आया. जब से आसाराम जेल गए हैं तब से बहुत से समर्थकों की छत्तीसगढ़ में ही होली में आनंद आने लगा है.

कोर्ट में दोषी करार दिए गए आसाराम पर नाबालिग लड़की से रेप के अलावा नरबलि और हत्या जैसे कई गंभीर आरोप हैं. एक समय था जब इस शख्स के दरबार में कई बड़ी हस्तियों का आना-जाना लगे रहता था, लेकिन 2013 में रेप कांड में फंसने के बाद से ही आसुमल के बुरे दिन शुरू हो गए और वर्ष 2014 में जब अच्छे दिन का नारा देने वाली सरकार आई तब भी आसुमल के दिन लौटकर नहीं आए.

बहुत से लोग शायद ना जानते हो कि आसुमल विभाजन के बाद पाकिस्तान के सिंध प्रांत से गुजरात के अहमदाबाद पहुंचे थे. प्रारंभ में वे एक साइकिल की दुकान में मरम्मत का काम किया करते थे. बाद में उन्होंने तांगा भी चलाया. बताते हैं कि कभी उन्होंने कच्छ के एक बड़े सिंधी संत लीला शाह बाबा का अनुयायी बनने की कोशिश थीं लेकिन उनके रंग-ढंग को देखकर संत ने कभी उन्हें स्वीकार नहीं किया. वर्ष 2016 में जब आयकर विभाग की टीम ने जब उनके आश्रम सहित कई ठिकानों पर दबिश दी तब 2300 करोड़ रुपए की अघोषित संपत्ति का पता चला था. आसाराम के तकरीबन चार सौ से ज्यादा आश्रम दुनिया भर में मौजूद थे. कुछ आश्रम तो लीगल थे लेकिन ज्यादातर आश्रमों के बारे में यह तथ्य भी सामने आया था कि उनके साधकों ने असली मालिकों से जोर-जबरदस्ती या ब्लैकमेल करके हड़पे थे. अभी भी कई आश्रमों पर भूमि विवाद चल रहा है. आध्यमिकता और जनसेवा की आड़ में आसाराम कई तरह की दवाईयां, गौ-मूत्र, साबुन, शैंपू, अगरबत्ती वगैरह बेच दिया करते थे. हर साल गुरु पूर्णिमा पर गुरु दक्षिणा कार्यक्रम किया जाता था और जमकर दक्षिणा ऐंठी जाती थीं.

बहरहाल आसाराम के चेले-चपाटे और अनुयायी मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने के लिए जबरदस्त तैयारी कर रहे हैं. उनकी तैयारियों को देखकर लग रहा है कि जैसे राष्ट्रहित में कोई बहुत बड़ा इवेंट होने वाला है.

अपने को किसी भी तरह के पूजन-सूजन से कोई तकलीफ नहीं है. बस पूजन के पोस्टरों पर आसुमल उर्फ आसाराम की तस्वीरें देखकर पुरानी कथा-कहानी याद आ जाती है. दिलचस्प यह है कि जब तक आसाराम जेल नहीं गए थे इस दिवस का दायरा बहुत सीमित था.आमतौर पर आसाराम के भक्त ही इसे अपनी संस्थाओं में मनाया करते थे लेकिन जबसे वे जेल गए हैं तब से एक दिन के लिए सही पूरे सोशल मीडिया पर कब्जे की कवायद दिखाई देती है. खबरें बताती है कि मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने वालों को बड़े पैमाने पर सहयोग भी मिलता है. यह सहयोग वे लोग करते हैं जो विदेशी संस्कृति के नाम पर अल्पसंख्यकों के विरुद्ध नफ़रत फैलाने की राजनीति में संलग्न रहते हैं.

 

राजकुमार सोनी

9826895207

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क्या मोदी सरकार माफी मांगेगी ?

न्यूयॉर्क टाइम्स कह रहा है कि मोदी सरकार ने पांच साल पहले 2017 मे 15 हजार करोड़ रुपये का जो रक्षा सौदा इस्राइल से किया था, उसमें पेगासस स्पाईवेयर की खरीद भी शामिल थी.अखबार ने अपनी सालभर लंबी चली जांच के बाद यह खुलासा किया है. ऐसे खुलासे के बाद एक देश के रूप में हमारा सिर शर्म से झुक जाता है. दूसरी तरफ बेशर्म मोदी सरकार को अपनी घटिया हरकतों पर गर्व होता दिखाई देता हैं. पेगासस एक ऐसा स्पायवेयर है, जो इसे संचालित करने वालों को दूर से ही किसी स्मार्टफोन को हैक करने के साथ ही उसके माइक्रोफोन और कैमरा सहित, इसके कंटेंट और इस्तेमाल तक पहुंच देता है. इस तरह के सॉफ्टवेयर आतंकवाद का मुकाबला करने के एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं लेकिन भारत में मोदी सरकार ने इससे विपक्ष के नेताओ, पत्रकारो, मानव अधिकार कार्यकर्ताओ, आएएस अफसरों, जजों, और भाजपा में मोदी के सहयोगियों की जासूसी करवा रही थीं. 1972 में अमेरिका में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के कार्यालयों पर जासूसी कराने की कोशिश की थी, जिसे वॉटरगेट स्कैंडल के नाम से जाना जाता है. इसके कारण बाद में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. आज तो हम इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि मोदी सरकार इस इस्तीफा देना तो दूर रहा इस कृत्य पर माफी भी मांगेंगी. Girish Malviya की पोस्ट
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क्या आप बसील की मां को जानते हैं ?

मुझे इस मां का नाम नहीं मालूम. नाम को जानकर करूंगा भी क्या ? दुनिया की हर मां का नाम सिर्फ़ मां ही होता है. चित्र में नज़र आने वाली यह महिला बसील टोप्पो की मां है.बसील छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके के एक गांव परेवाआरा में रहता था. एक रोज़ उसने तय किया कि या तो वह सेना में भर्ती हो जाएगा या फिर पुलिस में. ठोस इरादों और कठिन संघर्ष के चलते बसील को बस्तर के जिला पुलिस बल में नौकरी भी मिल गई. लेकिन वर्ष 2011 में नक्सलियों ने उस गाड़ी को अपना शिकार बनाया जिसमें बसील सवार होकर आ रहा था. बसील शहीद हो गया. बसील के गुज़र जाने के बाद उसकी मां ने परेवाआरा के स्कूल चौक पर अपने बेटे की प्रतिमा स्थापित की है. इस प्रतिमा को बनवाने के लिए उसने कोलकाता और ओडिशा के कलाकारों की भी सहायता ली है. बसील की मां अब हर सुबह अपने बेटे की प्रतिमा को नहलाती है. उसे साफ कपड़ों से पौंछती है. वैसे तो बचपन में हर मां अपने बेटे को नहला-धुलाकर तैयार करती है. दुनिया की बुरी नज़रों से बचाने के लिए गाल और आंखों पर काजल का टीका लगाती हैं. लेकिन बसील की मां को यह सब तब करना पड़ रहा है जब उसका जवान बेटा इस दुनिया में नहीं है. ना जाने इस दुनिया में कितनी मां...बसील की मां जैसी है. जब तक युद्ध है. नफरत और घृणा है तब तक बसील की मां प्रतिमा को पौंछती रहेगी. देश के हर हिस्से में बसील की मां जैसी एक मां रहती है जो अपने जवान बेटे के आदमकद चित्र को निहारती रहती है. क्या हम लोग बसील की मां की पीड़ा को कभी समझ पाएंगे ? सचमुच क्या दुनिया बना दी है हम इंसानों ने ? राजकुमार सोनी 9826895207
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