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क्या बस्तर के ईसाई नक्सली है

बस्तर में ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों पर हमले तेज होते जा रहे हैं. जब कभी ईसाई धर्मावलंबी अपनी शिकायत लेकर थाने जाते हैं तो उन्हें नक्सली बोलकर डराया जाता है. पुलिस कहती है- ज्यादा तीन-पांच करोगे तो नक्सली बनाकर अंदर कर देंगे.

रायपुर. छत्तीसगढ़ में ईसाई समुदाय को प्रताड़ित किए जाने के मामले में एक बार फिर इजाफा हो रहा है. हालांकि प्रताड़ना की सबसे अधिक घटनाएं भाजपा के शासनकाल में हुई थी,लेकिन घटना को अंजाम देने वाले तत्व अब भी अलग-अलग ढंग से हमले कर रहे हैं.

अभी हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ क्रिश्यन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल और महासचिव अंकुश बेरियेकर ने बस्तर इलाके का दौरा कर इस खौफनाक सच को उजागर किया. फोरम के जिम्मेदार पदाधिकारियों ने बताया कि इसी साल 23 मई 2019 को सुकमा जिले के ग्राम बोडिगुडडा में बोडडी कन्ना, पदाम कोना, बोड्डी बाजार, बोड्डी लच्छा, सरियम, देशा, दुल्ला और उनके साथियों ने करम्मू पूरम, देशा पंडा, सुब्बा और हिरमा सरियम के घरों में बलात प्रवेश किया और अनाज तथा अन्य घरेलू समान को लूट लिया. महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की और साड़ी पकड़कर खींचा. गाली-गलौच करते हुए जान से मारने की धमकी दी. हमले के दौरान आक्रामणकारी साफ-साफ कह रहे थे कि अगर गांव के लोग मसीह धर्म को मानना नहीं छोड़ेंगे तो उन्हें जान से हाथ धोना पड़ेगा.

अरुण पन्नालाल और अंकुश बेरियेकर ने बताया कि जब  इस मामले की शिकायत वहां के पास्टर फिलिप ने थाने जाकर की तो थानेदार ने शिकायत लेने से इंकार कर दिया और कहा कि चाहे कुछ भी हो जाय... एफआईआर दर्ज नहीं करूंगा. थानेदार ने घटना स्थल पर जाकर निरीक्षण करने से भी इंकार कर दिया और आदिवासी ग्रामीणों की सहायता के लिए  फोर्स भी नहीं भेजी. पुलिस का संरक्षण मिलने से हमलावरों ने दूसरे दिन यानी 24 मई को भी दोबारा घटना को अंजाम दिया. इसी साल 25 मई को मसीही समाज से जुड़े लोगों ने सुकमा कलक्टर को ज्ञापन सौंपकर जान-ओ-माल की सुरक्षा की गुहार लगाई. अरुण पन्नालाल ने बताया उन्होंने छत्तीसगढ़ क्रिश्यन फोरम के बैनर तले एक प्रतिनिधि मंडल के साथ स्वयं पुलिस अधीक्षक को एफआईआर दर्ज करने का ज्ञापन सौंपकर निवेदन किया लेकिन पुलिस अधीक्षक ने भी किसी तरह की कोई सहायता नहीं की.

पन्नालाल और बेरियेकर ने बताया कि हर कोई अपने-अपने धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र है. सुकमा जिले में गत तीन सालों में ईसाई धर्मावलंबियों पर हमले की घटनाओं में लगातार इजाफा देखने को मिला है. इस घटना से पहले भी 19 नवम्बर 2017 और 8 फरवरी 2019 को हमलावरों ने गांव वालों को पीटा था. उन्होंने बताया कि जब कभी भी ईसाई धर्म को मानने वाले अपनी शिकायत लेकर थाने जाते हैं तो उन्हें नक्सली बोलकर डराया जाता है. पुलिस कहती है- ज्यादा तीन-पांच करोगे तो नक्सली बनाकर अंदर कर देंगे. पन्नालाल ने बताया कि अगर कभी पुलिस गांव में जाती है तो समझौते का खेल करती है. क्या बलात प्रवेश करने, महिलाओं से छेड़छाड़ करने और उनकी इज्जत से खेलने पर किसी तरह का समझौता हो सकती है, लेकिन सुकमा की पुलिस न्यायालय के काम में लगी रहती है. अगर अपराधी थाने से छूट जाएंगे तो फिर न्यायालय की आवश्यकता किसलिए है. अरुण पन्नालाल ने बताया कि बस्तर में कुछ दलाल किस्म के लोग सक्रिय है जो आदिवासियों की जिंदगी से खिलवाड़ करने में लगे रहते हैं. जब गांव में ईसाई धर्म को मानने-समझने वाले लोगों पर हमला होता है कुछ लोग समझौते के खेल में जुट जाते हैं. पुलिस भी ऐसे दलालों से मिली-भगत कर आदिवासियों को लूटने के खेल में लगी रहती है. दोरनापाल के थानेदार सत्येंद्र कुमार ने अपना मोर्चा डॉट कॉम से यह स्वीकारा कि कुछ लोग अक्सर समझौते के लिए थाने में आते रहते हैं. हालांकि थानेदार ने माना कि पुलिस का काम समझौता करवाना नहीं है, लेकिन कई बार दबाव के चलते यह काम भी करना होता है.

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भूपेश बघेल ने नहीं होने दिया एक और किरन्दुल गोलीकांड

राजकुमार सोनी

रायपुर. देश की राजधानी दिल्ली और हैदराबाद में पदस्थ दो अफसरों की दिली ख्वाहिश थीं कि बस्तर के किरन्दुल में आंदोलनरत आदिवासियों पर किसी भी तरह से गोली चालान हो जाए ताकि सरकार की धज्जियां उड़ाई जा सकें, लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सर्तकता ने ऐसा नहीं होने दिया.

जो लोग बस्तर के आंदोलन से जुड़े रहे हैं वे जानते हैं कि 31 मार्च 1978 में बैलाडीला इलाके में कार्यरत अशोका माइनिंग नाम की एक कंपनी ने ठेका समाप्त होने का बहाना कर लगभग चार हजार मजदूरों को छंटनी का नोटिस थमा दिया था. कंपनी की इस नोटिस के बाद जब मजदूर परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट गहराया तो उन्होंने आंदोलन प्रारंभ किया. यह आंदोलन कई दिनों तक चला और अततः 5 अप्रैल 1978 को पुलिस प्रशासन ने निहत्थे आदिवासियों पर गोलियां बरसाई. तब इस घटना में एक पुलिस जवान कोमल सिंह सहित कुल 10 मजदूर मारे गए थे. हालांकि मरने वाले मजदूरों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थीं.

इधर बस्तर के किरन्दुल में आयरन ओर डिपाजिट क्रमांक 13 के साथ-साथ अपने देवी-देवताओं के पहाड़ को बचाने के लिए जब आदिवासी लामबंद हुए तब दिल्ली में जा बसे एक अफसर और हैदराबाद में तैनात एक दूसरे अफसर ने आंदोलन को छिन्न-भिन्न करने की योजना पर मंथन किया था. अफसरों की दिली ख्वाहिश थी कि ऐन-केन-प्रकारेण आंदोलन टूट जाए, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया. सूत्र बताते हैं कि इस आंदोलन को कमजोर करने के लिए कुछ ऐसे तत्वों को भी सक्रिय किया गया था जो बिचौलिए की भूमिका अदा कर रहे थे. आंदोलन के दौरान दंतेवाड़ा में तैनात एक पुलिस अफसर को यह कहते हुए भी सुना गया किआंदोलन के पीछे नक्सलियों का दिमाग काम कर रहा है. वे बार-बार यही बात कह रहे थे कि आंदोलन से कैसे निपटा जाता है उन्हें मालूम है... आंदोलनकारियों से अच्छी तरह से निपटना आता है आदि-आदि. यहां यह बताना लाजिमी है कि बस्तर का माड़िया आदिवासी अन्य आदिवासियों से थोड़ा आक्रामक होता है. आंदोलन में शरीक ज्यादातर आदिवासी माड़िया ही थे, लेकिन पुलिस प्रशासन उस आक्रामकता को ध्यान में रखने के बजाय अपनी आक्रामकता को जाहिर करने में लगा हुआ था. जब इस बात की भनक पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी को लगी तो उन्होंने पूरे मामले में बेहद संतुलन के साथ सावधानी बरतने का निर्देश दिया और साफ-साफ कहा कि कुछ भी अप्रिय घटित नहीं होना चाहिए. दंतेवाड़ा के कलक्टर टोपेश्वर वर्मा भी पूरे समय हालात पर नजर रखे हुए थे. सिचुवेश्चन को संभालने में कांग्रेस के वरिष्ठ अरविंद नेताम, दीपक बैच, मोहन मरकाम और रेखचंद जैन सहित कुछ अन्य लोग भी सक्रिय थे, लेकिन कतिपय तत्व यह भी चाहते थे कि इलाके में हिंसा से अप्रिय स्थिति पैदा हो जाय.

रमन सरकार ने बेचा पहाड़

बस्तर के दंतेवाड़ा जिले के बैलाडीला में जिस डिपाजिट क्रमांक 13 को लेकर आदिवासी आंदोलन करने को मजबूर हुए वहां बेशकीमती आयरन ओर के साथ-साथ नंदराज ( देव )  और पित्तोड़रानी ( देवी ) का स्थान भी है. इस पहाड़ को उद्योगपति गौतम अडानी को सौंपने का फैसला डाक्टर रमन सिंह की सरकार के समय ही कर लिया गया था. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं- पहाड़ को सौंपने के लिए आसपास के 85 गांवों में से किसी भी एक गांव ने अपनी सहमति प्रदान नहीं की थीं बल्कि विरोध में सात प्रस्ताव दिए थे, लेकिन रमन सिंह की सरकार ने फर्जी ढंग से यह दर्शा दिया कि सभी गांवों ने सहमति दे दी है. शुक्ला कहते हैं- बघेल की सरकार ने पहले भी आदिवासियों की जमीन लौटाकर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया है सो उनसे अपेक्षा है कि वे पहाड़ को बचाने के लिए अनुबंध को निरस्त करने की दिशा में लगातार सक्रिय रहेंगे. शुक्ला का कहना है कि अगर कोई गलत जानकारी के आधार पर पर्यावरण व अन्य स्वीकृतियां हासिल कर लेता है तो राज्य सरकार को अनुबंध निरस्त करने के लिए कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है. सरकार को इस बात की भी जांच करनी चाहिए कि डिपाजिट 13 के लिए ग्राम सभाओं में फर्जी ढंग से प्रस्ताव बनाने के खेल में कौन-कौन लोग शामिल थे.  

वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम कहते हैं- वर्ष 1960 के आसपास जब बैलाडीला की खदानों को खोदने का काम प्रारंभ किया गया तब बाहर से आए हुए लोगों ने आदिवासी संस्कृति और सभ्यता को छिन्न-भिन्न करने का काम किया था. इसी वर्ष यह बात भी सामने आई थी कि बाहरी लोग आदिवासी बालाओं को अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं और वे उनकी संतानों को पालने के लिए मजबूर हैं. नेताम कहते हैं- सभ्यता और संस्कृति को विनाश करने की यह प्रवृति अब आदिवासियों के देवी-देवताओं के साथ-साथ उनके विश्वास को नष्ट करने तक आ पहुंची है. नेताम ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री को सारी बातों और चिंताओं से अवगत कराया है. उनकी चिंता में यह बात भी शामिल है कि हालात से निपटने में अक्षम फायरिंग जैसी सिचुश्वेशन पैदा करने वाले अफसरों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए.

 

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बसेगा या उजड़ेगा जिंदल का ऊर्जा नगर

रमेश अग्रवाल रायगढ़

महाजेनको को आबंटित गारे पेलमा सेक्टर में कोल ब्लॉक के माइनिंग क्षेत्र के अंदर जिदल पावर लिमिटेड तमनार का विशाल उर्जानगर भी आ रहा है. लगभग १५० एकड़ में बनी इस पाश कालोनी में ५५५ फ्लैट व बंगले हैं. इसके साथ ही सी.बी.एस.ई मान्यता प्राप्त शानदार सीनियर सेकेंडरी स्कूल भी इसी कालोनी में संचालित है जहां जिंदल के अधिकारियों और कर्मचारियों के बच्चे पढ़ते हैं. इसके अलावा इस पाश कालोनी में बड़े बड़े पार्क व मंदिर भी हैं.  

वर्ष २००६ में बने इस उर्जानगर के अस्तित्व पर अब सवाल उठने लगे हैं. यद्यपि महाजेनको ने जन सुनवाई के लिये तैयार की गई ई.आई.ए. रिपोर्ट में इसका जिक्र तक नहीं किया है, लेकिन ई.आई.ए. रिपोर्ट में माइनिंग क्षेत्र के दिये गये नक़्शे को गूगल अर्थ में बड़ा कर देखा जाए तो उर्जानगर साफ साफ दिखता है. ( देखें नक्शा  ) 

क्या लगभग १५० एकड़ में बनी इस पाश कालोनी को महाजेनको अधिग्रहण करेगा ? यदि करता है तो उसके लिए यह काम आसान नहीं होगा. ये कोई निरीह आदिवासी की जमीन–मकान नहीं है जिसे भूअर्जन से आसानी से लिया जा सकेगा. जिंदल जैसी बड़ी व ताकतवर कंपनी आसानी से इसे अपने हाथों से नहीं जाने देगी. चाहे इसके लिये उसे सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़े. कारण साफ है हजारों की संख्या में इस कालोनी में रहने वाले जिंदल की अधिकारी कर्मचारियों के लिए दूसरी कालोनी तमनार में जगह मिलना ही मुश्किल है. सवाल स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य का भी है.

दूसरी तरफ यदि महाजेनको उर्जानगर को छोड़ कर माइनिंग करता है तो उसे इसके लिए कम से कम २०० एकड़ जमीन  तो छोडनी ही पड़ेगी और इतने बड़े क्षेत्र से निकलने वाले लाखों टन कोयले से हाथ धोना पड़ेगा. जिसकी कीमत अरबों, खरबों में अनुमानित है.  

ताज्जुब की बात है कि जन सुनवाई के लिये ई.आई.ए. रिपोर्ट पर्यावरण विभाग के पास साल भर पहले से आ चुकी थी लेकिन उसने जिला प्रशासन को इस महत्वपूर्ण तथ्य से अवगत नहीं करवाया और आनन- फानन में जन सुनवाई की तिथि निर्धारित करवा ली. यदि रायगढ़ कलेक्टर के संज्ञान में यह बात आई होती तो शायद वे कंपनी से इस बारे में सवाल जरुर करते और हो सकता है माइनिंग प्लान दोबारा बनाने के लिए कहा जाता. बहरहाल उर्जानगर का भविष्य आने वाला समय ही तय करेगा.

विशेष- प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल के इस महत्वपूर्ण आलेख पर जिंदल के जनसंपर्क विभाग का कामकाज देख रहे सुयश शुक्ला ने मंगलवार 4 जून को अपना मोर्चा डॉट कॉम से दूरभाष पर चर्चा की. उनकी आपत्ति थी कि लेख में कोई भी बात सही ढंग से नहीं रखी गई है. हमने श्री शुक्ला से विस्तारपूर्वक उनका पक्ष रखने का आग्रह किया जिस पर वे सहमत नहीं हुए. उनका कहना था कि लेख को वेबसाइट या पोर्टल में जगह ही नहीं मिलनी चाहिए थीं. उन्होंने लेख को पोर्टल से हटाने का आग्रह किया. बहरहाल अब भी श्री शुक्ला इस लेख पर जिंदल कंपनी का कोई पक्ष रखना चाहते हैं तो उसे जस का तस प्रकाशित कर दिया जाएगा. इधर सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने अपने आलेख में जो सवाल उठाए हैं वह पूरी तरह से सही है. अग्रवाल ने बताया कि माइनिंग क्षेत्र में पाश कालोनी बना ली गई है. अब जबकि खदान किसी दूसरे के पास चली गई है तब खनन कैसे संभव होगा.

 

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यह तस्वीर बदलापुर की नहीं... रायपुर की है

राजकुमार सोनी

इस तस्वीर को देखकर कई तरह के कयास लगाए जा सकते हैं और कई तरह का कैप्शन लिखा जा सकता है. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बंपर जीत और लोकसभा में हार के बाद यह तस्वीर बहुत कुछ बयां करती है.

बुधवार को प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी आमंत्रित थे. ( प्रेस क्लब वालों ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और रमन सिंह को आमंत्रित किया या नहीं इसकी जानकारी नहीं है.) कार्यक्रम दोपहर तीन बजे प्रारंभ होना था, लेकिन शाम हो गई. पत्रकार साथी थक गए तो इस  बीच बृजमोहन अग्रवाल प्रेस क्लब पहुंच गए. यहां आकर उन्होंने सभी कनिष्ठ और वरिष्ठ पत्रकारों के बीच लंबा वक्त गुजारा और बताया कि अब उन्होंने हर कार्यक्रम में देर से पहुंचने की अपनी आदत में सुधार कर लिया है. उन्होंने जानकारी दी कि पहले वे हर कार्यक्रम में दो घंटे देर से पहुंचते थे, लेकिन अब एक घंटा देर से पहुंचते है.

देर शाम मुख्यमंत्री पहुंचे तो बृजमोहन अग्रवाल को देखते ही चहक उठे. दोनों के बीच पहले गर्मजोशी से मुलाकात हुई. दोनों ने कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया और मंच पर जा बैठे. कैमरे की आंख दोनों नेताओं पर जाकर टिक गई. दोनों नेता लंबे समय तक एक-दूसरे के कान में ही कुछ कहते रहे.

वैसे लोग राजनीति को कव्हर करते हैं वे जानते हैं कि दोनों के बीच क्या बात हुई होगी. प्रेस कल्ब में मौजूद एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना था कि एक-दूसरे के कान में कोई बात तभी कहीं जाती है जब वह बेहद महत्वपूर्ण होती है. अब यह महत्वपूर्ण बात कौन सी है यह पता लगाने का काम पत्रकारों का है. वैसे वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल के बारे में एक बात प्रसिद्ध है कि देश-प्रदेश के एक-दो भाजपा नेताओं को छोड़करअमूमन सभी से उनके रिश्ते बेहतर हैं. पत्रकार भी उन्हें अपना करीबी मानते हैं. यहीं स्थिति मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ भी है. अलग-अलग दलों में रहने के बावजूद विधानसभा में दोनों नेताओं का प्रतिरोध देखते ही बनता है, लेकिन जब मिलते हैं तो कुछ अंदाज में... जैसा तस्वीर में दिख रहा है. वैसे इस तस्वीर की एक खास बात यह है कि यह बदलापुर की नहीं... रायपुर की है.

 

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भूपेश बघेल ने बताया सावरकर और जिन्ना को देश के विभाजन का जिम्मेदार तो बिलबिला उठे भाजपाई

रायपुर. भले ही पंडित जवाहर लाल नेहरू को कोस-कोसकर केंद्र में मोदी की सरकार बन गई है, लेकिन अब भी भाजपाइयों को यह रास नहीं आ रहा है कि कोई नेहरू को नए संदर्भों के साथ याद करें. सोमवार को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नेहरू की पुण्यतिथि के मौके पर उन्हें याद किया तो भाजपाई बिलबिला उठे. राजधानी के राजीव भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में बघेल ने कहा कि अब भी कतिपय लोग देश के बंटवारे के लिए नेहरू को दोषी मानते हैं, लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि देश के बंटवारे की कल्पना सबसे पहले सावरकर ने की थी और उसे अंजाम तक जिन्ना ने पहुंचाया था. बघेल के इस बयान के बाद भाजपाई ताबड़तोड़ ढंग से सक्रिय हुए. भाजपा समर्थकों ने सोशल मीडिया में एक के बाद एक कई पोस्ट लिखी. किसी ने सावरकर को माटी का सच्चा सपूत बताया तो किसी ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने नेहरू भक्ति का नया दौर प्रारंभ किया है. पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह ने एक निजी चैनल से कहा कि इतिहास को लेकर कांग्रेस का ज्ञान अधूरा है. लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद कांग्रेस सदमे में हैं. आयोजन में देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला ने पुष्पाजंलि अर्पित करने के दौरान पंडित जवाहरलाल नेहरू अमर रहे का नारा लगाकर सबको चौंकाया.

कट्टरता नुकसानदायक

मुख्यमंत्री ने कहा कि जब हम नेहरू की किताब भारत एक खोज पढ़ते हैं तो उनके ज्ञान को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं. नेहरू जी ने बहुत स्पष्ट कहा था कि कट्टरता चाहे कैसी भी हो वह देश के लिए नुकसानदायक होती है. बघेल ने कहा कि नेहरू सवाल पूछे जाने के पक्षधर थे और यह मानते थे कि आजादी में कालर पकड़कर सवाल पूछने का अधिकार केवल लोकतंत्र ने दिया है. उन्होंने कहा कि आज देश के प्रधानमंत्री से आपको सवाल पूछने का अधिकार नहीं है. मुख्यमंत्री ने कहा कि नेहरू की कल्पना में संकुचित राष्ट्रवाद का स्थान नहीं था. उनके भीतर सभी को साथ लेकर चलने की सोच विद्यमान थी. उन्होंने कहा कि नेहरू पोंगापंथ और दकियानूसी विचारों के खिलाफ थे, लेकिन आज पोंगापंथ को बढ़ावा दिया जा रहा है. बघेल ने साफ कहा कि देश के विभाजन की योजना सावरकर ने बनाई थी और जिन्ना भी यही चाहते थे, लेकिन आज आवाम के सामने झूठे तथ्य पेश किए जाते हैं.

कार्यक्रम में लेखक व विचारक पुरषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि वे कांग्रेसी नहीं है, लेकिन नेहरू को सबसे ज्यादा करीब पाते हैं. उन्होंने बताया कि जिस दिन जवाहर लाल नेहरू का निधन हुआ था तब उनकी उम्र महज नौ साल की थी और उस रोज उनके घर खाना नहीं बना था. उन्होंने बताया कि निधन के दिन उनकी मां और पिता खूब रोए थे. वे जिस मठ में जाते थे वहां के महंत को भी रोते हुए देखा था. अग्रवाल ने कहा कि आज कुछ लोग नेहरू को गरियाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि अगर नेहरू नहीं होते तो वे कहीं नहीं होते. उन्होंने कहा कि आज झूठ को इतनी बार बोला जाता है कि वह सच लगने लगता है. लोग कहते है कि झूठ के पैर नहें होते जबकि वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया के इस भयावह दौर में झूठ के पैर नहीं पर होते है.जिस वक्त सच पैर में जूते के फीते बांध रहा होता है, उस वक़्त झूठ दुनिया का चक्कर लगा चुका होता है. कबीर और नेहरू पर अपने बड़े काम की वजह से चर्चित विचारक पुरूषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि नेहरू और पटेल दोनों जानते थे कि एक न एक दिन उनके बीच मतभेद की बात प्रचारित की जाएगी और हुआ भी वहीं लेकिन बावजूद इसके सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को न सिर्फ नेता स्वीकार किया था बल्कि दोनों ने देश के लिए मिलकर काम किया था. पुरूषोत्तम अग्रवाल ने सभागार में मौजूद कांग्रेसजनों के सवालों का जवाब भी दिया. उन्होंने कहा कि अब चुनौतियां ज्यादा बड़ी हो गई है क्योंकि इतिहास के साथ खिलवाड़ करने वाले लोग ज्यादा मजबूती से सक्रिय हैं. उन्होंने कहा कि इतिहास को गलत ढंग से प्रस्तुत करने वाले लोगों का हर स्तर पर जवाब देना होगा. घर बैठने से काम नहीं चलेगा. कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कांग्रेसी राजेश तिवारी ने और आभार प्रदर्शन महामंत्री गिरीश देवांगन ने किया. आयोजन में विशेष रुप से वरिष्ठ संपादक ललित सुरजन, गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू, शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह, सांसद दीपक बैज, पूर्व शिक्षा मंत्री सत्यनारायण शर्मा, राज्यसभा सांसद छाया वर्मा, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजेंद्र तिवारी सहित अन्य कई दिग्गज कांग्रेसी नेता मौजूद थे.

गुनाहों को छिपाने की साजिश

इधर कांग्रेस के इस आयोजन के बाद जब भाजपा सक्रिय हुई तो प्रदेश कमेटी के महामंत्री और संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने भी पलटवार किया. एक बयान में उन्होंने कहा कि भारत के विभाजन के लिए आरएसएस और मुस्लिम लीग जैसी सांप्रदायिक ताकतें सक्रिय थी. यह ताकतें अंग्रेजों की फूट डालो राज करो नीति में सहयोग करती थी. भाजपा आज भी अपने पूर्वजों के गुनाहों पर पर्दा डालने का काम करती हैऔर इसका दोष महात्मा गांधी और नेहरू पर मढ़ने की साजिश करती रहती है. शैलेश ने कहा कि अगर संघी सही ढंग से भारत का इतिहास बांच ले तो उन्हें पता चल जाएगा कि वर्ष 1937 में हिन्दू महासभा के उन्नीसवें अधिवेशन सावरकर ने द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत का खुला समर्थन किया था.

 

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मोदी की जीत के साथ ही अखबारों में बाबा आदम जमाने के शब्दों की घुसपैठ

राजकुमार सोनी

जब मैं अखबार की दुनिया में था तब हर दूसरे- तीसरे दिन मालिक और मूर्धन्य संपादक यही ज्ञान बघारा करते थे कि समाचार की भाषा बेहद सरल होनी चाहिए क्योंकि अखबार रिक्शा चलाने वाला भी पढ़ता है और चाय बेचने वाला भी. लेकिन पिछले कुछ दिनों से अखबार की भाषा बेहद प्राचीन और कठिन हो गई है. विशेषकर नरेंद्र मोदी के चुनाव जीतने के बाद से अखबारों को बांचकर यह लग रहा है कि हर तरफ हवन हो रहा है. हर अखबार वाले का अपना एक निजी हवनकुंड है. जबरदस्त ढंग से हवन चल रहा है. लोग बड़ी संख्या में हवन में शामिल होने के लिए आ रहे हैं और स्वाहा...स्वाहा की आहुति के साथ पंजरी ग्रहण करते जा रहे हैं. चारों तरफ एक अजीब तरह की खूशबू उड़ रही है. इस खूशबू से यह ख्याल ( ख्याल उर्दू का शब्द है... ध्यान लिखना ठीक होगा अन्यथा देशद्रोही घोषित कर दिया जाऊंगा. ) भी आ रहा है कि कहीं अखबारों में स्याही की जगह गंगाजल का इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है. बहरहाल यहां दो दिनों के अखबारों में इस्तेमाल किए गए कुछ प्राचीन शब्दों का उल्लेख कर रहा हूं. मैं यह नहीं कहता कि प्राचीन शब्द खराब होते हैं, लेकिन ये वहीं शब्द हैं जो यह बताने के लिए काफी है कि देश में आने वाले पांच सालों में क्या होने वाला है अर्थात क्या घटने वाला है. यकीन मानिए देश की मीडिया, राजनीति और नौकरशाही इन्हीं शब्दों से चिपककर काम करने वाली है. शनिवार को एक बड़े अखबार ने बकायदा पांच साल का एजेंडा भी बता दिया. अखबार के मालिक ने खुलकर अपनी टिप्पणी में लिखा है कि उसके अखबार के सारे संस्करण नरेंद्र भाई की भावी योजनाओं के साथ रहेंगे. मालिक ने साष्टांग तो नहीं लिखा.... लेकिन पूरी टिप्पणी को पढ़ने के बाद साष्टांग शब्द कई बार उचक-उचककर दर्शन देता हुआ नजर आया.

चाटुकार मीडिया आपको किन शब्दों में उलझाकर पटकना चाहता है जरा उसकी बानगी तो देखिए...

अश्वमेघ का घोड़ा,  राष्ट्रवाद की सवारी, हिंदू सुरक्षा, हिंदू हृदय सम्राट, हिंदू गौरव, खूब लड़ी मर्दानी,क्षीर सागर, शंहनशाह, प्रज्ञा का जागरण बनाम माता का जगराता, आधिदैविक, उद्घोष, अव्यय, आत्मा, पुण्य आत्मा, शौर्य, विजय तिलक, कालिया मर्दन, भभूत, अवधूत, प्रचंड, अखंड, पांव पखारन, ध्यान-साधना, तस्मैं श्री, नौ रत्न, संत शिरोमणी, साधु, मनस्वी, तपस्वी, ऋषि- मुनि, कर्मयोगी, विश्वयोगी, यत्र-तत्र- सर्वत्र, यज्ञ, महायज्ञ, समीधा, विविधा, अतुल्य, स्तुत्य और स्तुत्य, पांडित्य, छंद, निषेधादेश, मोक्ष. तत्यनिष्ठ, देश की रामायण के राम, महाभारत के कृष्ण, असली अर्जुन मोदी, असली चाणक्य शाह, एकात्म मानववाद पर मुहर और महामानव बने मोदी.

आंधी से सुनामी तक

हो सकता है कुछ और शब्द हो जिन पर नजर नहीं पड़ी. अगर आपको कुछ शब्द नजर आए को कृपया अवगत कराइए... उन शब्दों को जोड़ लिया जाएगा. दो दिनों के अखबार में एक खास बात यह भी है कि वर्ष 2014 में जिन अखबार वालों ने मोदी को आंधी बताया था उन्होंने अब सुनामी बताया है. किसी भी अखबार वाले ने अपने सुधि पाठकों को यह जानकारी नहीं दी है कि एक गरीब इंसान की झोपड़ी न तो आंधी में टिकती है और न हीं सुनामी में. जरूरत से ज्यादा आंधी और सुनामी बरबादी का कारण बनती है. एक अखबार वाले ने तो यहां तक लिखा है- छत्तीसगढ़ में भाजपा ने छह महीने के भीतर ही भूपेश बघेल से अपना बदला चुका लिया. नप गए... चप गए शब्दों की तो भरमार है. इन दिनों अखबार वालों के बीच खतरनाक शब्दों की जुगाली का काम्पीटिशन चल रहा है. मजे लीजिए आप भी... बहुत कुछ झेलना है अभी आपको. 

 

( अपना मोर्चा डॉट कॉम की प्रत्येक खबर को आप प्रकाशित करने के लिए स्वतंत्र है. बस... आपको साभार... अपना मोर्चा डॉट कॉम लिखना होगा. खबरों को जस का तस कापी पेस्ट करने वालों से यह एक निवेदन मात्र है. ) 

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इधर चेला गया जेल और उधर आका पर लगा यौन शोषण का आरोप... रमन सिंह भी निशाने पर

रायपुर. सुपर सीएम के नाम से चर्चित अमन सिंह, वर्दी वाले गुंडे के तौर पर विख्यात मुकेश गुप्ता और भ्रष्टाचार में लिप्त पुनीत गुप्ता के कारनामों की वजह से बदनाम हुए रमन सिंह एक बार फिर निशाने पर है. इस बार उनके अत्यंत करीबी धरम कौशिक पर एक महिला ने गंभीर आरोप लगाया है. जाहिर सी बात है कि जब कोई चेला फंसता है तो बदनामी गुरुजी की होती है. महिला के आरोप के बाद राजनीतिक गलियारों में दिनभर यही चर्चा चलती रही है कि भाजपा में एक से बढ़कर एक नगीने है और सारे नगीनों का कारनामा अब जाकर बाहर आ रहा है. गौरतलब है कि हाल के दिनों में एक महिला किरण मगर ने प्रकाश बजाज पर लाखों रुपया हड़पने और छेड़खानी का आरोप लगाया है. प्रकाश बजाज नेता प्रतिपक्ष धरम कौशिक के काफी करीबी है और उन्हें आका कहते हैं. इधर जिस महिला ने प्रकाश बजाज को लपेटे में लिया है उसी महिला का यह भी आरोप है कि वर्ष 2017 में धरम कौशिक ने भी उसे गलत इरादे से छुआ था. यह बताना लाजिमी है कि कौशिक पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को सब कुछ मानते हैं. कहा जाता है कि उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाने में पूर्व मुख्यमंत्री की बड़ी अहम भूमिका रही है. इधर इस घटना के बाद यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या पार्टी अपने होनगार नगीनों को बाहर का रास्ता दिखाएगी. क्या नेता प्रतिपक्ष को नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने के लिए कहा जाएगा.

पूरी मांग में भर दिया रंग... और बाहों में भरना चाहते थे

अंवति विहार में रहने वाली महिला किरण मगर के आरोप बेहद सनसनीखेज और गंभीर है. किरण ने मंगलवार को एक प्रेस कान्प्रेंस में कहा कि वर्ष 2017 में जब वह अपनी दीदी के साथ होली मिलन समारोह में शिकरत करने के लिए धरम कौशिक के निवास पर पहुंची थी तब कौशिक ने गलत इरादे से शरीर का स्पर्श किया था. इतना ही नहीं रंग लगाने के बहाने उसकी पूरी मांग में रंग भर दिया था. बाद में रंग को पोछने के लिए अपना गमछा भी दिया. जब वह मोबाइल व पर्स उठाने के लिए तत्पर हुई तब कौशिक ने उसे बाहों में भरने के लिए इशारों से अपने पास बुलाया, लेकिन वह भाग खड़ी हुई. इस घटना का जिक्र दो साल बाद क्यों किया गया... यह पूछने पर किरण ने बताया कि उसे इस घटना का जिक्र करने के लिए रोका गया था.

आपको बता दें कि किरण वहीं महिला है जिसने दो दिन पहले कौशिक को आका कहने वाले प्रकाश बजाज पर पैसा हड़पने और छेड़खानी करने का आरोप लगाया था. प्रकाश बजाज ने विधानसभा चुनाव से पहले अचानक पुलिस में एक शिकायत की थी और कहा था कि पत्रकार विनोद वर्मा उनके आका को सीडी बनाकर फंसाने का काम कर रहे हैं. हालांकि तब पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए यह जानने की कोशिश ही नहीं की थी कि बजाज का आका कौन है. बहरहाल प्रकाश बजाज के जेल जाने और कौशिक के लपेटे में आने से यह तो साफ हो गया कि सीडी प्रकरण में बहुत कुछ फर्जी था. हालांकि इस मामले में एक स्थानीय टीवी चैनल के मालिक का नाम भी जोरशोर से उछलता रहा,लेकिन उस पर अब तक शिकंजा कसा नहीं जा सका है.  

यह भी गौरतलब है कि जब पुलिस ने प्रकाश बजाज को गिरफ्तार किया तो भाजपा के किसी भी नेता ने उसके पक्ष में बयान नहीं दिया सिवाय नेता प्रतिपक्ष धरम कौशिक के. कौशिक ने प्रेस को बयान दिया कि भूपेश सरकार बदलापुर की कार्रवाई कर रही है. कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में फंसाया जा रहा है. उनके बयान के बाद महिला किरण मगर ने प्रेस काफ्रेंस लेकर कहा कि जो बदलापुर की बात कर रहे हैं वे खुद छेड़छाड़ की कार्रवाई में लिप्त थे...। बहरहाल महिला के आरोप के बाद प्रदेश की राजनीतिक फिजा गर्म हो गई  है. इधर महिला के आरोप को नेता प्रतिपक्ष कौशिक ने बुनियाद और निराधार बताया है. कौशिक का कहना है कि उनके यहां होली मिलन के दौरान सैकड़ों कार्यकर्ता आते रहते हैं. जो महिला आरोप लगा रही है वे तो उन्हें जानते भी नहीं है. महिला उन्हें बदनाम करने की नीयत से आरोप लगा रही है. यह एक साजिश है.

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सीजीएमएससी ने माना- मल्टी विटामिन सिरप खरीदी में हुआ बड़ा घोटाला

रायपुर. आखिरकाल सीजीएमएससी ( छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन लिमिटेड )  ने यह मान लिया है कि मल्टी विटामिन सिरप की खरीदी में बड़ा घोटाला हुआ था. कांग्रेस नेता नितिन भंसाली की शिकायत के बाद सीजीएमएससी ने अपनी एक रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग की सचिव को सौंपी है. इस रिपोर्ट में यह उल्लेखित है कि भाजपा के शासनकाल में सिरप की खरीदी के दौरान भण्डार क्रय नियमों का पालन नहीं किया गया जिसके चलते गंभीर किस्म किस्म की आर्थिक अनियमितता हुई है.सीजीएमएस ने मान लिया है कि अगर महालेखाकार के अवलोकन के अनुसार संशोधित क्रय आदेश निकाला जाता को शासन को 1.02 करोड़ रुपए की बचत होती.सीजीएमएस ने गड़बडी में शामिल अफसर और ठेकेदार पर कार्रवाई की अनुशंसा भी की है. इधर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने भले मल्टी विटामिन सिरप घोटाले की जांच प्रारंभ की है तो यह माना जा रहा है कि सीजीएमसी के पूर्व प्रबंध संचालक रामाराव और नाहर मेडिकल एजेंसी के कर्ताधर्ता हत्थे चढ़ सकते हैं.

यह है मामला

दिनांक 23 फरवरी 2016 को डायरेक्टर हेल्थ ऑफ सर्विसेस ने छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन लिमिटेड को 441 दवाईयों की खरीदी के लिए एक पत्र लिखा था. इस पत्र के आधार पर 11 अगस्त 2016 को आनलाइन टेंडर जारी किया गया, लेकिन थोड़े ही दिनों यह कहा जाने लगा कि टेंडर निकालने में देरी हो गई है इसलिए 23 जरूरी दवाईयां ( ब्यूरो ऑफ फार्मा पीएसवीएस ऑफ इंडिया ) बीपीपीआई के माध्यम से अनुमोदित की दरों पर खरीद ली जाए. इसके बाद डायरेक्टर हेल्थ ने बगैर टेंडर के दवाईयां खरीदने की अनुमति मांगी थी. पत्र में सिरप की संख्या थी 1,99,75,780 अर्थात एक करोड़ निनयानबे लाख पचहत्तर हजार सात सौ अस्सी.

मल्टीविटामिन का चक्कर

डायरेक्टर हेल्थ लगभग पचास लाख अठावन हजार पांच सौ चालीस मल्टीविटामिन बोतल ( प्रत्येक बोतल 100 एमएल ) की खरीदी करना चाहता था, लेकिन छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन ने जानकारी दी कि दवा सप्लायरों के पास 200 एमएल की बोतल ही उपलब्ध है जिसकी कीमत 27 रुपए 64 पैसे हैं. इस बारे में डायरेक्टर हेल्थ और छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन लिमिटेड के बीच पत्र व्यवहार चलता रहा. डायरेक्टर हेल्थ ने दिनांक 27 मार्च 2017 को एक पत्र के जरिए अवगत कराया कि उसे अब सीरप की जरुरत नहीं होगी. सीरप के बजाय मल्ली विटामिन टेबलेट ( ड्रग कोड डी-63 ) खरीद लिया जाय.... और तब..........

बताते हैं कि डायरेक्टर हेल्थ और मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन के बीच चले पत्र व्यवहार के बाद पूर्व मुख्यमंत्री के एक नजदीक के रिश्तेदार ने दबाव देना प्रारंभ किया.उनके दबाव के बाद अचानक 100 एमएल वाली मल्टीविटामिन वाली सीरप की बोतल भी मिल गई. डायरेक्टर हेल्थ महज पचास लाख अठावन हजार पांच सौ चालीस बोतल चाहता था, लेकिन मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन ने 73 लाख 94 हजार पांच सौ बोतल खरीद ली. इस पूरे मामले का सबसे संदिग्ध पक्ष यह है कि जब डायरेक्टर हेल्थ सीरप चाहता था तो सीरप की बोतल नहीं मिल रही थी और जब डायरेक्टर हेल्थ ने कहा कि चलिए बोतल नहीं मिल रही है तो टेबलेट खरीद लीजिए तब अचानक बोतल मिल गई. डायरेक्टर हेल्थ जितनी संख्या में बोतल चाहता था उससे कहीं ज्यादा संख्या में सीरप की खरीदी हो गई. बताते हैं कि सप्लाई का सारा काम धमतरी की नाहर नाम की एक मेडिकल एजेंसी को दिया गया था. इस एजेंसी को भी 90 दिनों के भीतर सप्लाई करनी थी, लेकिन इस सप्लायर ने 75 दिन देरी से सीरप की सप्लाई की. खबर है कि इस मामले में छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन के प्रमुख रामाराव को वही पदस्थ कुछ अधिकारियों ने समझाइश दी थी कि वे नियम-कानून से परे जाकर सिरप की खरीदी न करें, लेकिन वे नहीं माने.

मंहगे दर पर खरीदी

खबर है कि बीपीपीआई ( ब्यूरो ऑफ फार्मा पीएसवीएस ऑफ इंडिया ) की अधिकृत वेबसाइट में 100 एमएल मल्टीविटामिन सिरप सूची में शामिल नहीं है. बावजूद इसके छत्तीसगढ़ मेडिकल कार्पोरेशन लिमिटेड ने सिरप की खरीदी की. जिस सिरप को खरीदा गया उसमें बीपीपीआई का लोगो भी लगा है. यह संदेह भी व्यक्त किया जा रहा है कि या लोगो को नाहर मेडिकल एजेंसी ने तैयार किया है या फिर इस खेल में बीपीपीआई के अधिकारी भी शामिल है. सूत्र बताते है कि नाहर एजेंसी ने हिमाचल प्रदेश की जिस CIAN FARMA से सिरप की खरीदी कर छत्तीसगढ़ मेडिकल कार्पोरेशन को सप्लाई की वह बीपीपीआई की अधिकारिक वेबसाइट में सूचीबद्ध ही नहीं है. सूत्रों का दावा है कि CIAN FARMA ने नाहर मेडिकल एजेंसी को सिरप आठ रुपए प्रति बोतल की दर से विक्रय किया है जबकि नाहर एजेंसी ने छत्तीसगढ़ मेडिकल कार्पोरेशन को 18 रुपए 90 पैसे प्रति बोतल का बिल थमाया है. छत्तीसगढ़ मेडिकल कार्पोरेशन ने यह भुगतान किस मद से किया यह भी साफ नहीं है. 

 

 

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मल्टी विटामिन सिरप घोटालाः ईओडब्लू से बचने के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं नाहर बंधु

रायपुर. छत्तीसगढ़ के आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने भले मल्टी विटामिन सिरप घोटाले की जांच प्रारंभ कर दी है, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी हवा में तैर रहा है कि क्या सच में धमतरी की नाहर मेडिकल एजेंसी पर शिकंजा कस पाएगा. खबर है कि नाहर मेडिकल एजेंसी के रसूखदार कर्ता-धर्ता अपने बचाव के लिए इधर-उधर हाथ-पांव मार रहे हैं. इधर स्वास्थ्य विभाग के आयुक्त भुवनेश यादव का कहना है कि अगर किसी ने गलत किया है तो उसे बख्शा नहीं जाएगा. उन्होंने अपना मोर्चा डॉट कॉम से कहा कि एक शिकायत के बाद छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन ने सिरप खरीदी की नए सिरे से छानबीन की है जिसकी रिपोर्ट शासन को सौंप दी है. गौरतलब है कि भाजपा शासनकाल में छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन ने एमल्टी विटामिन सिरप की खरीदी कर धमतरी की नाहर मेडिकल एजेंसी को लगभग 13 करोड़ सात लाख रुपए का लाभ पहुंचाया था. इस मामले में कांग्रेस नेता नितिन भंसाली की शिकायत के बाद ईओडब्लू ने प्रारंभिक जांच प्रारंभ तो कर दी है, लेकिन सूत्रों का दावा है कि एजेंसी के कर्ता-धर्ता  प्रशासनिक व अन्य स्तर पर मामले को रफा-दफा करने के खेल में लग गए हैं. यहां यह बताना लाजिमी है कि नाहर मेडिकल एजेंसी नाम तब भी सुर्खियों में आया था जब प्रदेश में कलर डाप्लर और मलेरिया किट खरीदी घोटाला हुआ था. इस एजेंसी के कर्ता-धर्ता बंसत-जितेंद्र नाहर को पूर्व सरकार के एक स्वास्थ्य मंत्री एवं पूर्व विधानसभा अध्यक्ष का सरंक्षण प्राप्त था. बताते हैं कि इस परिवार के एक सदस्य को भाजपा शासनकाल में ही छत्तीसगढ़ फार्मेसी काउंसिल का सदस्य भी नामित किया गया था. इस एजेंसी के साथ निखिल डागा नाम के एक व्यक्ति की संलिप्तता भी बताई जा रही है. सूत्र कहते हैं कि इस एजेंसी के एक कर्ताधर्ता की अच्छी-खासी जमीन भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय कुशाभाऊ ठाकरे परिसर के पास भी है. सूत्रों का दावा है कि दवा सप्लायर ने पार्टी कार्यालय को आने-जाने के लिए जगह भी मुहैय्या करवाई है. जानकार बताते हैं कि फिलहाल एजेंसी के कर्ता-धर्ता राजनांदगांव जिले के एक अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के माध्यम से ईओडब्लू में पैठ बनाकर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की जोड़-तोड़ में लगे हैं. एजेंसी के कर्ताधर्ता यह कहते फिर रहे हैं- सीबीआई से निपट लिए हैं तो ईओडब्लू से भी निपट लेंगे.

यह है पूरा मामला

दिनांक 23 फरवरी 2016 को डायरेक्टर हेल्थ ऑफ सर्विसेस ने छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन लिमिटेड को 441 दवाईयों की खरीदी के लिए एक पत्र लिखा था. इस पत्र के आधार पर 11 अगस्त 2016 को आनलाइन टेंडर जारी किया गया, लेकिन थोड़े ही दिनों यह कहा जाने लगा कि टेंडर निकालने में देरी हो गई है इसलिए 23 जरूरी दवाईयां ( ब्यूरो ऑफ फार्मा पीएसवीएस ऑफ इंडिया ) बीपीपीआई के माध्यम से अनुमोदित की दरों पर खरीद ली जाए. इसके बाद डायरेक्टर हेल्थ ने बगैर टेंडर के दवाईयां खरीदने की अनुमति मांगी थी.

मल्टीविटामिन सीरप का चक्कर

डायरेक्टर हेल्थ लगभग पचास लाख अठावन हजार पांच सौ चालीस मल्टीविटामिन बोतल ( प्रत्येक बोतल 100 एमएल ) की खरीदी करना चाहता था, लेकिन छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन ने जानकारी दी कि दवा सप्लायरों के पास 200 एमएल की बोतल ही उपलब्ध है जिसकी कीमत 27 रुपए 64 पैसे हैं. इस बारे में डायरेक्टर हेल्थ और छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन लिमिटेड के बीच पत्र व्यवहार चलता रहा. डायरेक्टर हेल्थ ने दिनांक 27 मार्च 2017 को एक पत्र के जरिए अवगत कराया कि उसे अब सीरप की जरुरत नहीं होगी. सीरप के बजाय मल्ली विटामिन टेबलेट ( ड्रग कोड डी-63 ) खरीद लिया जाय.... और तब..........

बताते हैं कि डायरेक्टर हेल्थ और मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन के बीच चले पत्र व्यवहार के बाद पूर्व मुख्यमंत्री के एक नजदीक के रिश्तेदार ने दबाव देना प्रारंभ किया.उनके दबाव के बाद अचानक 100 एमएल वाली मल्टीविटामिन वाली सीरप की बोतल भी मिल गई. डायरेक्टर हेल्थ महज पचास लाख अठावन हजार पांच सौ चालीस बोतल चाहता था, लेकिन मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन ने 73 लाख 94 हजार पांच सौ बोतल खरीद ली. इस पूरे मामले का सबसे संदिग्ध पक्ष यह है कि जब डायरेक्टर हेल्थ सीरप चाहता था तो सीरप की बोतल नहीं मिल रही थी और जब डायरेक्टर हेल्थ ने कहा कि चलिए बोतल नहीं मिल रही है तो टेबलेट खरीद लीजिए तब अचानक बोतल मिल गई. डायरेक्टर हेल्थ जितनी संख्या में बोतल चाहता था उससे कहीं ज्यादा संख्या में सीरप की खरीदी हो गई. बताते हैं कि सप्लाई का सारा काम धमतरी की नाहर नाम की एक मेडिकल एजेंसी को दिया गया था. इस एजेंसी को भी 90 दिनों के भीतर सप्लाई करनी थी, लेकिन इस सप्लायर ने 75 दिन देरी से सीरप की सप्लाई की. भंसाली का आरोप है कि बाजार से अधिक दर पर मल्टीविटामिन सीरप की खरीदी कर शासन को करोड़ों रुपए का नुकसान पहुंचाया गया है जबकि नाहर नाम की मेडिकल एजेंसी 13 करोड़ सात रुपए अतिरिक्त भुगतान हासिल करने में सफल रही. खबर है कि इस मामले में छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन के प्रमुख रामाराव को वही पदस्थ कुछ अधिकारियों ने समझाइश दी थी कि वे नियम-कानून से परे जाकर सिरप की खरीदी न करें, लेकिन वे नहीं माने. जिन अफसरों से समझाइश दी थी बाद में उनका तबादला अन्यत्र कर दिया गया.

इधर कुछ नए तथ्य भी जुड़े

खबर है कि कांग्रेस नेता नितिन भंसाली 15 मई को ईओडब्लू के समक्ष अपना पहला बयान दर्ज करवाया है. प्रारंभिक बयान के बाद ईओडब्लूू ने यह मान लिया है कि सिरप की खरीदी में जमकर गड़बड़झाला हुआ है.भंसाली के बयान के बाद अब ईओडब्लू इस मामले की विस्तृत जानकारी स्वास्थ्य महकमे से मांगेगा. इधर सूत्र कहते हैं कि विभाग ने पहले से अपनी तैयारी कर रखी है. भंसाली के बयान के बाद कुछ और नए तथ्य सामने आए हैं. बताया जाता है कि बीपीपीआई ( ब्यूरो ऑफ फार्मा पीएसवीएस ऑफ इंडिया ) की अधिकृत वेबसाइट में 100 एमएल मल्टीविटामिन सिरप सूची में शामिल नहीं है. बावजूद इसके छत्तीसगढ़ मेडिकल कार्पोरेशन लिमिटेड ने सिरप की खरीदी की थी. जिस सिरप को खरीदा गया उसमें बीपीपीआई का लोगो भी लगा है. यह संदेह भी व्यक्त किया जा रहा है कि या लोगो को नाहर मेडिकल एजेंसी ने तैयार किया है या फिर इस खेल में बीपीपीआई के अधिकारी भी शामिल है. सूत्र बताते है कि नाहर एजेंसी ने हिमाचल प्रदेश की जिस CIAN FARMA से सिरप की खरीदी कर छत्तीसगढ़ मेडिकल कार्पोरेशन को सप्लाई की वह बीपीपीआई की अधिकारिक वेबसाइट में सूचीबद्ध ही नहीं है. सूत्रों का दावा है कि CIAN FARMA ने नाहर मेडिकल एजेंसी को सिरप आठ रुपए प्रति बोतल की दर से विक्रय किया है जबकि नाहर एजेंसी ने छत्तीसगढ़ मेडिकल कार्पोरेशन को 18 रुपए प्रति बोतल का बिल थमाया है. छत्तीसगढ़ मेडिकल कार्पोरेशन ने 13 करोड़ सात लाख रुपए का भुगतान किस मद से किया यह भी साफ नहीं है.

 

 

 

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छत्तीसगढ़ की जेलों में बंद चार हजार से ज्यादा आदिवासी जल्द ही होंगे रिहा

राजकुमार सोनी

रायपुर. छत्तीसगढ़ के आठ जिलों में लगभग दस हजार से ज्यादा आदिवासी जेलों में बंद है. सरकार ने फिलहाल चार हजार से ज्यादा आदिवासियों की रिहाई का सैद्धांतिक फैसला कर लिया है. इस फैसले पर आचार संहिता हटने के बाद पक्की मुहर लग जाएगी.गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने बेकसूर आदिवासियों को रिहा करने करने की बात कही थीं. नई सरकार के गठन के साथ ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने महाधिवक्ता कनक तिवारी और राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा को आदिवासियों की रिहाई को लेकर ठोस योजना पर विचार करने को कहा था. महाधिवक्ता कनक तिवारी और राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत न्यायमूर्ति  एके पटनायक से प्रारंभिक चर्चा की थी. चूंकि श्री पटनायक छत्तीसगढ़ बिलासपुर उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस भी थे सो उन्होंने आदिवासियों की रिहाई के लिए बनाई गई कमेटी का अध्यक्ष बनना स्वीकार कर लिया. सोमवार 13 मई को इस कमेटी की पहली बैठक स्थानीय सर्किट हाउस में रखी गई. बैठक में कुल 1141 प्रकरणों के चार हजार सात आदिवासियों की रिहाई को लेकर विचार-विमर्श किया गया. बैठक में माओवादी होने के झूठे आरोप में फंसाए गए  340 प्रकरण के 1552 आदिवासी भी जल्द ही रिहा कर दिए जाएंगे.

इन जिलों के आदिवासी होंगे रिहा

फिलहाल कमेटी ने बस्तर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, कांकेर, सुकमा, कोंडागांव और राजनांदगांव की जेलों में बंद आदिवासियों की रिहाई को लेकर विचार-विमर्श किया है. कमेटी के सदस्य पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी, आदिम जाति विभाग के सचिव डीडी सिंह, जेल महानिदेशक गिरधारी नायक, बस्तर आईजी पी सुंदराज, बस्तर आयुक्त ने यह माना है छत्तीसगढ़ की जेलों में कही जंगल से जलाऊ लकड़ी बीनने के आरोप में आदिवासी सजा काट रहे हैं तो कही अत्यधिक मात्रा में शराब निर्माण करने की सजा भुगत रहे हैं. कई बेकसूर आदिवासी माओवादी होने के आरोप में लंबे समय से बंद है. उनके आगे-पीछे कोई नहीं है तो वे जमानत भी  नहीं ले पा रहे हैं. फिलहाल कमेटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एके पटनायक ने सोमवार को सभी सदस्यों को जिम्मेदारी सौंपी. महाधिवक्ता कनक तिवारी को रिहाई के मसले पर कानूनी नोट्स तैयार करने को कहा गया है. कमेटी के सभी सदस्यों को 15 जून तक रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया है. कमेटी की अगली बैठक 22 जून को होगी.

इधर बैठक उधर इस्तीफे की खबर

इधर आदिवासियों की रिहाई के लिए बनी कमेटी की सर्किट हाउस में बैठक चल रही थीं उधर कुछ चुनिंदा पत्रकारों को कतिपय लोग फोन कर यह जानने का प्रयास कर रहे थे कि क्या महाधिवक्ता कनक तिवारी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. प्रदेश में पिछली सरकार के कतिपय बड़े रसूखदारों लोगों को उच्च न्यायालय से मिली राहत के बाद सूबे में यह चर्चा कायम हो चली है कि आखिरकार घाघ आरोपियों को कोर्ट से राहत कैसे मिल रही है. क्या पुलिस की कार्रवाई या कागज-पत्री में कोई कमी है. या फिर अधिवक्ताओं की लंबी-चौड़ी फौज के बीच किसी तरह का मनमुटाव है. कौन किसको राहत दिलाने में जुटा है इसे लेकर अलग-अलग तरह की अलग कहानियां हवा में तैर रही है जनसामान्य के बीच यह चर्चा कायम है कि पुलिस अफसरों और कानून के जानकारों का एक गुट अब भी पुरानी सरकार की चाकरी में लगा हुआ है. अब तक एक भी रसूखदार की गिरफ्तारी न होने से जनता के बीच यह चर्चा भी चल रही है कि पैसों में बड़ी ताकत होती है. कानून सिर्फ गरीब आदमी के लिए होता है. चर्चा में यह बात भी शामिल है कि दिल्ली में बैठे हुए दो अफसर रिमोट कंट्रोल के जरिए सब कुछ मैनेज कर रहे हैं. घाघ लोग मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को फेल करने की साजिश रच रहे हैं. इधर अपना मोर्चा डॉट कॉम ने महाधिवक्ता श्री तिवारी के इस्तीफे के संबंध में पतासाजी की तो ज्ञात हुआ कि कानून के जानकारों के बीच आपसी टकराव के चलते अफवाह उड़ाई गई थी. 

( अपना मोर्चा डॉट कॉम की प्रत्येक खबर को आप प्रकाशित करने के लिए स्वतंत्र है. बस... आपको साभार... अपना मोर्चा डॉट कॉम लिखना होगा. खबरों को जस का तस यानी कापी पेस्ट करने वालों से यह निवेदन मात्र है. ) 

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भाजपा सरकार में अमन सिंह की बीवी को बैठे-बिठाए मिलता था एक लाख रुपए महीना...नृत्य का मानदेय भी लाखों में

रायपुर. विवादास्पद आईपीएस मुकेश गुप्ता, स्टेनो रेखा नायर और पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता पर शिकंजा कसने के बाद पुलिस अब पूर्व मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव अमन सिंह और उनकी पत्नी यास्मीन सिंह पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रही है.  इधर अमन सिंह की पत्नी यास्मीन सिंह पर भी यह आरोप लगा है कि वे बगैर किसी योग्यता के लंबे समय तक संविदा में पदस्थ रही और बैठे-बिठाए एक लाख रुपए महीना हासिल करती रही.गौरतलब है कि पिछले महीने 12 अप्रैल को प्रदेश कांग्रेस के सचिव विकास तिवारी ने राज्य के मुख्य सचिव सुनील कुजूर को अमन सिंह और उनकी पत्नी के खिलाफ शिकायत की थी.  फिलहाल सरकार यास्मीन सिंह के खिलाफ नियम-कानून की पक्की और अब तक विवादों से दूर रही भारतीय प्रशासनिक सेवा की तेज-तर्रार अफसर रेणु पिल्ले को जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया है. श्रीमती पिल्ले को तीन माह के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया है. 

यास्मीन पर लगे कई गंभीर आरोप

सामान्य प्रशासन विभाग की सचिव रीता शांडिल्य 10 मई को जारी आदेश में कहा है कि यास्मीन सिंह एक नृत्यांगना है. उनकी प्रोफाइल में भी यही उल्लेखित है कि उन्होंने देश के कई हिस्सों में अपनी प्रस्तुति दी है. यास्मीन ने कभी किसी तरह का शासकीय कार्य नहीं किया बावजूद इसके उन्हें नवम्बर 2005 में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में संचालक, संचार, क्षमता विकास इकाई ( सीसीडीयू ) बना दिया गया. वे लंबे समय तक पदस्थ रही.इतना ही नहीं उनकी संविदा नियुक्ति हर बार बढ़ाई जाती रही. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि वे अमन सिंह की पत्नी है. नियुक्ति के दौरान उन्हें केवल 35 हजार रुपए का वेतनमान दिया जाना तय हुआ था जिसे बाद में गुपचुप ढंग से बढ़ाकर एक लाख रुपए कर दिया  गया. यास्मीन सिंह 14 साल तक संविदा में पदस्थ रही,लेकिन उनका ज्यादातर कार्य नृत्यांगना के रुप में ही प्रचारित होता था. उन्हें सरकार की ओर से आयोजित समारोह में नृत्य करने के लिए  अत्यधिक मानदेय पर आमंत्रित किया जाता था जबकि छत्तीसगढ़ के कलाकार काम के लिए तरसते थे. यास्मीन सिंह को एक कार्यक्रम के लिए एक से डेढ़ लाख का भुगतान किया जाता था. रीता शांडिल्य ने जांच के बिन्दुओं में यह सवाल भी शामिल किया है कि लंबे समय तक पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग तथा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में पदस्थ रहने के बावजूद इनके कार्य, अवकाश, नृत्य प्रदर्शन के लिए विभागीय अनुमति की कोई जानकारी संधारित क्यों नहीं है. इन सारे बिन्दुओं पर रेणु पिल्ले को जांच करने के लिए कहा गया है. सूत्र बताते हैं कि इस मामले में जांच के बाद यास्मीन सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी. पूरे प्रकरण में दोनों विभागों के कई अधिकारियों के फंसने के भी संभावना है. इधर यास्मीन सिंह ने अपने ऊपर लगे तमाम आरोपों को निराधार और असत्य बताया है. उनका कहना है कि उनकी नियुक्ति सारे नियमों के हवाले से  सक्षम अधिकारी की मंजूरी के साथ पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए की गई है. किसी भी मामले में उन्होंने अपनी नियुक्त स्वयं नहीं की. इसलिए यदि राज्य सरकार को उनकी नियुक्ति में कोई चिंता दिखती है तो वह अधिकारियों से पूछताछ कर सकती है जो नियुक्ति के लिए जिम्मेदार है. यह आरोप गलता है कि मैंने ( यास्मीन सिंह ) राज्य सरकार से कोई अनुचित लाभ लिया है. उन्होंने कहा कि उनका चयन पूरी योग्यता के आधार पर हुआ है. ऐसा लगता है कि राज्य सरकार के मामलों की देख-रेख करने वाले अब तक के प्रशासन और उनके परिवार वालों को राजनीतिक विद्वेष साधने के लिए टारगेट कर रहे हैं. यास्मीन सिंह ने कहा कि वे सारे लोग जो मुझे बदनाम करना चाहते हैं उनके खिलाफ तो मुकदमा करेगी साथ ही जांच के संबंध में भी समुचित कदम उठाएंगी.

अमन सिंह पर भी गंभीर आरोप 

विकास तिवारी ने अपनी शिकायत में कहा है कि अमन सिंह भारतीय राजस्व सेवा के एक कनिष्ठ अधिकारी थे. वर्ष 2004 में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के संयुक्त सचिव बनाए गए थे. उनके पिता वाईएन सिंह मध्यप्रदेश  सरकार में संयुक्त पंजीयक थे. एक मध्यवर्गीय परिवार से होने के नाते उनके परिवार के नाम पर कोई बड़ी भारी संपत्ति नहीं थी, लेकिन अमन सिंह के छत्तीसगढ़ में पदस्थ होने के साथ उनके परिजनों की संपत्ति में इजाफा होने लगा. शिकायत में आगे कहा है कि अमन सिंह ने शासन को करोड़ों का चूना लगाकर भ्रष्टाचार किया है. उनके हर भ्रष्टाचार की जानकारी पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को मालूम थीं लेकिन वे खामोश बने रहे. तिवारी ने मुख्य सचिव को जो शिकायत सौंपी है उसमें अमन सिंह की संपत्ति के ब्यौरे के साथ दस्तावेज भी दिए हैं. शिकायत में बताया गया है कि अमन सिंह ने दिल्ली के महारानी बाग में 12 करोड़ का मकान खरीदा है. लगभग एक साल पहले एक अंतराष्ट्रीय कंपनी कारगिल एमएनसी ने शिमला में एक महंगा गेस्ट हाउस बेचा था. इस गेस्ट हाउस को भी अमन सिंह ने खरीदा है. शिकायत में कहा गया है कि राजनांदगांव के ग्राम ढेलकाढीह और खैरागढ़ रोड से 15 किलोमीटर दूर पर स्थित एक गांव में भी अमन सिंह ने अपनी पत्नी यास्मीन सिंह के रिश्तेदारों के नाम पर लगभग पांच सौ एकड़ बेनामी संपत्ति खरीदी है. अमन सिंह के विदेश में कनेक्शन को लेकर काफी बातें लंबे समय से कही जाती रही है. शिकायत में कहा गया है कि अमन सिंह ने अपनी अकूत दौलत का एक बड़ा हिस्सा अपनी पत्नी के नाम से दुबई के बैंकों में जमा कर रखा है. शिकायतकर्ता ने एक बैंक का आईडी नंबर भी दिया है. इसके अलावा भोपाल में औद्योगिक भूमि खरीदने, विधानसभा रोड़ पर जमीन खरीदने का जिक्र भी है. 

 

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मोदी जी... क्या रमन का प्यारा दामाद पुनीत गुप्ता भी नीरव मोदी बनकर हो जाएगा फरार

रायपुर. जो काम छत्तीसगढ़ की पुलिस को करना चाहिए वह काम नागरिक कर रहे हैं. कई गंभीर मामलों में अपराध दर्ज होने के बावजूद भी पुलिस अब तक पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता पर हाथ नहीं डाल पाई है. सार्वजनिक स्थलों और गाड़ियों पर पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के दामाद का मोस्ट वांटेड पोस्टर चस्पा करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता कुणाल शुक्ला ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पंजाब नेशनल बैंक के जोनल हेड ( भोपाल ) को खत लिखा है. अपने खत में कुणाल ने कहा है कि मोदी जी... आप खाऊंगा न खाने दूंगा की बात करते हैं तो खुशी होती है, लेकिन क्या आपको पता है कि आपकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता डाक्टर रमन सिंह के दामाद ने करोड़ों रुपए का फ्राड किया है…क्या आप उसे भी नीरव मोदी तरह विदेश भागने का मौका देना चाहते हैं.

रमन को सब पता था

गौरतलब है कि डाक्टर पुनीत गुप्ता ने राजधानी रायपुर के सरकारी अस्पताल  भीमराव अंबेडकर मेमोरियल हॉस्पिटल  को सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में तब्दील करने के लिए 99 करोड़ का प्रोजेक्ट तैयार किया था। वर्ष 2016-17 में जब यह प्रोजेक्ट तैयार किया गया तब राज्य सरकार के पास बजट नहीं था. लिहाज़ा, अस्पताल के लिए मशीनों और उपकरण की ख़रीदी के लिए पंजाब नेशनल बैंक से लोन लेने का फ़ैसला लिया गया. लोन के लिए पूरी प्रक्रिया डॉ. पुनीत गुप्ता के निर्देश पर हुई थी. सूत्र बताते हैं कि पुनीत गुप्ता की इस तमाम तरह की कार्रवाई की जानकारी पूर्व मुख्यमंत्री को थी. इस मामले में सरकार ने स्वास्थ्य विभाग के अवर सचिव सुनील विजयवर्गीय को गारंटर बनाकर पीएनबी से 64 करोड़ रुपए का टर्म लोन और 5 करोड़ रुपये के कैश क्रेडिट की मंजूरी करवाई गई थीं.

फर्जी हस्ताक्षर से लिया लोन

बैंक से रकम जारी होने के बाद डॉ. पुनीत गुप्ता ने मनमाने तरीके़ से अस्पताल की मशीनें और उपकरण ख़रीदे। इसकी ख़रीद में उन्हीं कंपनियों को टेंडर में प्राथमिकता दी गई, जिनका चयन पुनीत गुप्ता ने किया था. नियमानुसार किसी भी प्रोजेक्ट के लिये लोन जारी करने से पहले बैंक, आवेदन पत्र के साथ उस संस्थान की ऑडिट रिपोर्ट अनिवार्य रूप से जमा करवाता है. एक शिकायत के बाद पुलिस को पता चला कि जो ऑडिट रिपोर्ट जमा की गई है उसमें चार्टर्ड एकाउंटेंट (सीए) प्रकाश के हस्ताक्षर फर्जी है. सीए प्रकाश देशमुख ने पुलिस को दिए अपने बयान में भी मान लिया है कि पंजाब नेशलन बैंक को भेजी गई ऑडिट रिपोर्ट में उसने किसी तरह का कोई हस्ताक्षर नहीं किया है. सामाजिक कार्यकर्ता कुणाल शुक्ला का कहना है कि क्या जब पुनीत गुप्ता विदेश फरार हो जाएगा तब कार्रवाई होगी. यहां यह बताना लाजिमी है कि करोड़ों रुपए की चपत लगाने वाले नीरव मोदी को भी पंजाब नेशनल बैंक ने कर्ज दिया था. कुणाल ने बैंक के जोनल हेड को भेजी शिकायत में पूछा है कि अब तक बैंक की तरफ से पुनीत गुप्ता के खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज नहीं करवाई गई. क्या पंजाब नेशनल बैंक भी पुनीत गुप्ता के फरार होने का इंतजार कर रहा है. क्या बैंक एक और नीरव मोदी की फरारी के बाद ही एफआईआर दर्ज करवाएगा.

 

 

 

 

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अब अडानी के विज्ञापन में प्रधानमंत्री की फोटो

रायपुर. अब अडानी कंपनी के एक विज्ञापन में भी प्रधानमंत्री की तस्वीर का इस्तेमाल किया गया है.मंगलवार 30 अप्रैल को प्रधानमंत्री की तस्वीर वाला यह विज्ञापन दैनिक भास्कर के पृष्ठ क्रमांक 9 में प्रकाशित हुआ है. यह भी संभव है कि अलग-अलग संस्करण में विज्ञापन की जगह बदल गई हो, लेकिन इस विज्ञापन में प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ दावा किया गया है कि कंपनी भारत सरकार से मान्यता प्राप्त है और पूरे भारत में पांच हजार बायो डीजल पंप निर्माण का लक्ष्य पूरा करने जा रही है. विज्ञापन में कंपनी के कुछ फोन नंबर और सूरत ( गुजरात ) का पता दिया गया है. विज्ञापन के ठीक बाजू में बायोडीजल को ईंधन का बेहतरीन विकल्प बताते हुए एक आर्टिकल भी छापा गया है. ( शायद यह भी विज्ञापन का अंश हो. ) लेकिन इस विज्ञापन को देखकर छत्तीसगढ़ की पूर्ववर्ती रमन सरकार का वह नारा भी याद आता है- डीजल नहीं अब खाड़ी से... डीजल मिलेगा बाड़ी से. जब छत्तीसगढ़ में रतनजोत से बायोडीजल बनाने की योजना फ्लाप हो गई तब कांग्रेस के मोहम्मद अकबर का नारा था- न झाड़ी में न बाड़ी में.... क्या वापस जाय खाड़ी में.

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या है इस विज्ञापन में जिसका जिक्र हो रहा है. सबसे बड़ी बात तो यही है कि पूरे देश में पिछले पांच सालों में अगर प्रधानमंत्री के रिश्तों को अगर किसी तरह की कोई चर्चा हुई है तो वह अंबानी और अडानी ही है. प्रधान सेवक पर यह आरोप लगता रहा है कि वे अंबानी और अडानी को उपकृत करने का काम करते रहे हैं. गौरतलब है कि वर्ष 2016 में मुकेश अंबानी की रिलायंस कंपनी ने अपने एक विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर का इस्तेमाल किया था तब फेसबुक, ट्विटर सहित अन्य माध्यमों में मोदी की जमकर आलोचना देखने को मिली थीं. भले ही रिलायंस इंडस्ट्री ने अपने विज्ञापन डिजिटल इंडिया को आधार बनाया था लेकिन तब यह सवाल उठा था कि क्या एक प्रधानमंत्री को किसी निजी कंपनी का ब्रांड एम्बेसडर बनना चाहिए था.जब इस मामले की गूंज संसद में सुनाई दी तब सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने यह माना था कि जियो के विज्ञापन में प्रधानमंत्री की तस्‍वीर छापने और दिखाने के लिए कंपनी की ओर से किसी भी प्रकार की अनुमति नहीं ली गयी थीं. उन्होंने इस मामले में उचित कार्रवाई के संकेत भी दिए थे. बाद में यह बात भी सार्वजनिक हुई कि जियो कंपनी को पांच सौ रुपए का जुर्माना लगाया गया है.

कंपनी नहीं कर सकती व्यावसायिक इस्तेमाल

राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों और नामों के गलत इस्तेमाल को लेकर 1950 में बने कानून के सेक्शन-3 के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपने व्यापारिक या कारोबारी उद्देश्य के लिए राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों और नामों का केंद्र सरकार या सक्षम अधिकारी से अनुमति लिए बगैर इस्तेमाल नहीं कर सकता. इस कानून के तहत करीब तीन दर्जन नामों और चिह्नों की सूची तैयार की गयी है, जिनका कोई व्यक्ति सरकारी अनुमति के बिना अपने कारोबारी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता. इनमें देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्य के गवर्नर, भारत सरकार या कोई राज्‍य सरकार, महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, संयुक्त राष्ट्र संघ, अशोक चक्र और धर्म चक्र शामिल हैं. अब अडानी को प्रधानमंत्री की तस्वीर के उपयोग के लिए अनुमति दी गई है या नहीं यह अभी साफ नहीं है.

 

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छत्तीसगढ़ में गोदी मीडिया के खिलाफ सड़कों पर नारे और... डोला यात्रा

राजकुमार सोनी

चापलूस मीडिया को जितनी जल्दी यह बात समझ जाए उतना अच्छा होगा...अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब जनता या तो चापलूस मीडियाकर्मियों को दफ्तरों में घुसकर पीटेगी या फिर सड़कों पर दौड़ा-दौड़ाकर मारेगी. यह बात मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि छत्तीसगढ़ के बेमेतरा-नवागढ़ और मुंगेली में गोदी मीडिया के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई है. सामाजिक कार्यकर्ता लाखन सिंह और गुरुघासीदास सेवादार संघ के केंद्रीय संयोजक लखनलाल कुर्रे के निमंत्रण पर इसी महीने 28 अप्रैल को डोला यात्रा में शामिल होने का अवसर मिला तब सड़कों पर पूंजीवाद, मनुवाद, जातिवाद, मोहन भागवत, संघवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ नारेबाजी के बीच गोदी मीडिया से आजादी का नारा भी जोरदार ढंग से गूंजा. हालांकि यात्रा में स्वाभिमानी, मेहनतकश और समय और समाज के लिए प्रतिबद्ध मीडियाकर्मियों के सम्मान की रक्षा के लिए भी नारे लगे. 

आगे यह अवश्य बताना चाहूंगा कि डोला यात्रा क्या है और गत 12 साल से क्यों निकाली जा रही है, लेकिन सबसे पहले इस बात पर थोड़ी चर्चा आवश्यक है कि गोदी मीडिया के खिलाफ नारेबाजी क्यों हुई. यात्रा में शामिल लोगों ने चर्चा में बताया कि पहले मीडिया का जबरदस्त सम्मान हुआ करता था, लेकिन अब वह स्थिति नहीं है. टीवी हो अखबार... हर जगह से गांव और खलिहान की खबरें गायब है. जैसे ही कोई टीवी खोलता है सबसे पहले मोदी दिखाई देता है. हर चैनल में केवल मोदी... मोदी... ऐसा लगता है कि मोदी के अलावा कोई दूसरा जीव इस देश में रहता ही नहीं है. यात्रा में शामिल एक नौजवान का कहना था- छत्तीसगढ़ में भी जब रमन सिंह की सरकार थीं तब सारी मीडिया उनकी जय-जयकार में लगी थीं. विज्ञापन में जय-जय. खबरों में जय-जय. हर अखबार और चैनल वाले जनता को झूठी सूचनाएं परोसते थे. नौजवान का कहना था कि चाहे दिल्ली हो या छत्तीसगढ़... मीडिया के लोग संगठित गिरोह की तरह काम कर रहे हैं, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. एक दिन सबक सीखा दिया जाएगा. मैं छत्तीसगढ़ के लोगों को थोड़ा-बहुत जानता हूं. वे जो बोलते हैं वे करते हैं. जो नहीं बोलते वे नहीं करते. अब यह मीडिया को तय करना है कि उसे चापलूसी का क्रम जारी रखना है  या फिर जनता की खबरों से रिश्ता बरकरार रखना है.

यात्रा में शामिल होने के दौरान ही मुझे पता चला कि लखनलाल कुर्रे सुबोध जी ने अपने कुछ जाबांज साथियों के मिलकर गुरुघासीदास विचार शोध संस्था का निर्माण किया और गुरुघासीदास जी के सामाजिक न्याय और वैज्ञानिक ढंग से किए गए कामों को लेकर अब भी संघर्षरत है. पहले तो मुझे यह लगा था कि डोला यात्रा एक सामान्य यात्रा होगी, लेकिन मेरा यह भ्रम उस वक्त दूर हो गया जब यात्रा में मार्क्स, लेनिन, भीम राव अंबेडकर और फुले को बार-बार याद किया गया. यात्रा में सामाजिक न्याय ( बराबरी ) को महत्वपूर्ण मानने वाला हर विचार शामिल था. यात्रा में लोग चल रहे थे, लेकिन उससे कहीं ज्यादा विचार चल रहा था. अपनी बात कहने के लिए किसी को भी डीजे लगाकर नाचने-कूदने की जरूरत नहीं पड़ी.

इसलिए निकाली जाती है डोला यात्रा

वर्ष 1882 में नवलपुर पंडरिया के पास महंत भुजबल रहा करते थे. एक बार वे अपने बेटे के विवाह के लिए घोड़े पर सवार होकर चिरहुला गांव जा रहे थे. रास्ते में अमोली सिंह राजपूत ने उन्हें पायलागी महाराज कह दिया. जवाब में मुजबल महंत ने सतनाम साहेब कहा. अमोली को यह बात अखर गई. वह समझ गया कि घोड़े पर सवार शख्स ठाकुर नहीं बल्कि सतनामी है. अमोली ने तुरन्त प्रतिक्रिया में कहा- केवल ऊंची जाति के लोग ही घोड़े पर बैठ सकते हैं. पगड़ी पहन सकते हैं. उसने भुजबल महंत से घोड़ा छोड़कर... पगड़ी- पनही उतारकर सिर पर जूते को रखकर माफी मांगने को कहा. प्रत्युतर में भुजबल महंत ने कहा- हम मनुष्य है. हम किसी के गुलाम नहीं है. बाद में जब भुजबल चिरहुला पहुंचे तो सबको यह जानकारी दी कि किसी ठाकुर ने उनके घोड़े को रोका है. इधर अमोली सिंह ने अपने समाज के लोगों से मिलकर यह योजना बनाई कि अब भुजबल को अकेले नहीं बल्कि तब लूटा जाएगा जब वह अपने बेटे की शादी करेगा और बहु लेकर आएगा. और जब  वह दिन आया तब सतनामियों के आगे अमोली सिंह और उसके आदमियों को मात खानी पड़ी. लखनलाल कुर्रे और गुरूघासीदास सेवादार संघ के साथी इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में गत 12 साल से डोला यात्रा निकालते हैं. इस यात्रा के जरिए वे यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि हम सभी मनुष्य है. जाति-पांति का बंधन तोड़कर मनुष्य को मनुष्य समझने की कवायद जारी रखो. यात्रा बेमेतरा नवलपुर से नवागढ़ होकर मुंगेली तक गई. रास्ते में जगह- जगह ग्रामीणों ने यात्रा का स्वागत किया. मुंगेली के एक सभागृह में दलितों के लिए लगातार कार्यरत गोल्डी जार्ज, कसम के संयोजक और लेखक तुहिन देव महिला अधिकार मंच की रिनचिन, सामाजिक कार्यकर्ता दुर्गा झा, छत्तीसगढ़ मुक्तिमोर्चा की श्रेया, बामसेफ के स्थापना सदस्य बीसी जाटव,मजदुर नेता कलादास डेहरिया, पीयूसीएल छत्तीसगढ़ के डा. लाखन  सिंह, लखनलाल कुर्रे ने संबोधित किया .सभा का संचालन एमडी सतनाम ने किया.पूरे आयोजन को सफल बनाने के लिए दिनेश सतनाम ,तामेश्वर, अनंत,मनमोहन बांधे ,चंन्द्र प्रकाश टंडन ,राजेश जांगडे,भाग चंद ,गुलाब चंद ,देवा बघेल ,अर्जुन जांगडे,ईश्वर खांडे ,रूप दास टंडन ,नेत राम खांडे ,कल्प आर्या ,राजेश आर्या,एम डी सतनाम ,गुलाब अनंत ,मिरही लाल खांडे,भूपेंद्र कौशल ,राधे लाल ,गजेश शांडे ,भगवान दास मोहले ,भानू धारिया ,श्याम चंन्द मिरी , बेनी राम बंजारे,दिनेश सतनाम ,केशव सतनाम ,दौलत धारिया ,किशोर सोनवानी ,राकेश टंडन ,सुरेश ,राम नारायण भारती ,गोपाल ,संतराम ,आत्मा राम ,गोल्डी खांडे ,सुरेश ,चंन्द्र कुमार चतुर्वेदी ,नयन दास अनंत ने विशेष सहयोग दिया.

 

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अब थ्री स्टार वाली सरकारी गाड़ी से ठसनबाजी नहीं कर पाएंगे मुकेश गुप्ता

रायपुर. देश के सबसे विवादास्पद पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता अब थ्री स्टार वाली सरकारी गाड़ी में ठसनबाजी नहीं कर पाएंगे. सरकार ने वाहन क्रमांक सीजी 03/ 6494 को वापस करने का निर्देश दिया है. पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी ने इस बाबत योजना एवं प्रबंध के विशेष महानिदेशक को आवश्यक कार्रवाई करने के लिए आदेश जारी कर दिया है. इतना ही नहीं पुलिस महानिदेशक ने गुप्तवार्ता के विशेष महानिदेशक संजय पिल्लै एवं रायपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शेख आरिफ हुसैन को एक पत्र लिखकर मुकेश गुप्ता को प्रदाय की जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने के निर्देश भी दिए हैं. अवस्थी ने पत्र में लिखा है- जितना बल आवश्यक हो, उतना ही दिया जाय... शेष बल तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया जाय.  

अवस्थी ने बताया कि शासन स्तर पर एक सुरक्षा समिति होती है जो श्रेणी के आधार पर यह तय करती है कि किसे कितनी सुरक्षा की आवश्यकता है. अगर प्रोटेक्शन रिव्यू कमेटी ने यह मान लिया कि मुकेश गुप्ता को सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है तो फिर उनके साथ एक भी गनमैन नहीं रहेगा. वैसे निलंबित मुकेश गुप्ता एक असफल खुफिया चीफ रहे और  माओवादी क्षेत्र में सीधे कभी पदस्थ नहीं रहे. उनका ज्यादातर कार्यकाल शहरी क्षेत्र का है. निलंबन के दौरान भी उन्हें पुलिस मुख्यालय में आमद देने को कहा गया है, निलंबन के बाद से वे एक भी बार पुलिस मुख्यालय नहीं पहुंचे. माना जा रहा है कि गुप्ता को सुरक्षा की वैसी आवश्यकता नहीं है इसलिए सभी गनमैन जल्द ही वापस ले लिए जाएंगे.

सरकारी गाड़ी में पहुंचकर दिखाया था रौब

गौरतलब है कि अपना मोर्चा डॉट कॉम ने शुक्रवार को इस आश्य की खबर दी थी कि निलंबित होकर भी मुकेश गुप्ता सरकारी गाड़ी और गनमैन का उपयोग कर रहे हैं. नियमानुसार एक निलंबित अफसर को केवल जीवन निर्वाह भत्ता लेने की पात्रता होती है, लेकिन गुप्ता जब गुरुवार को ईओडब्लू के दफ्तर में बयान दर्ज करने के लिए पहुंचे तब सरकारी गाड़ी का दरवाजा उनके गनमैन ने खोला था. गुप्ता ने गाड़ी से उतरकर फिल्मी अंदाज में फोटो खिंचवाई थीं और रौब झाड़ते हुए कहा था- आप लोगों ने मेरा काम देखा है... और अब देखिए क्या हो रहा है. 

 

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निलंबित होकर भी मुकेश गुप्ता दौड़ा रहे हैं सरकारी गाड़ी

रायपुर. क्या एक निलंबित अफसर सरकारी गनमैन और सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल कर सकता है. नियम तो यही कहता है कि निलंबित अफसर को केवल जीवन निर्वाह भत्ता लेने की पात्रता होती है, लेकिन विवादास्पद पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता के साथ ऐसा नहीं है. वे अब भी सरकारी गाड़ी में गनमैन को साथ लेकर चल रहे हैं. गुरुवार को जब वे ईओडब्लू के दफ्तर में बयान दर्ज करने के लिए पहुंचे तब सरकारी गाड़ी का दरवाजा उनके गनमैन ने ही खोला था. गुप्ता ने गाड़ी से उतरकर फिल्मी अंदाज में फोटो खिंचवाई और कहा- आप लोगों ने मेरा काम देखा है... और अब देखिए क्या हो रहा है.

बंगले में भी तैनात है गनमैन

मुकेश गुप्ता के पास कुल कितनी संपत्ति है. वे कितने वैध-अवैध प्लाट और मकानों के मालिक है इसकी जानकारी ईओडब्लू ने जुटा ली है. उनका एक सरकारी आवास मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निवास के पास ही है. मुकेश गुप्ता के घर के बाजू में देवती कर्मा का मकान है और थोड़ी ही दूरी पर पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को आवास आवंटित किया गया है. फिलहाल मुकेश गुप्ता के सरकारी आवास पर दो गनमैन तैनात है. उनकी गाड़ी में भी एक गनमैन रहता ही है. नियमानुसार निलंबित आईपीएस गुप्ता के पास से गनमैन और वाहन की सुविधा हटा ली जानी चाहिए थीं, लेकिन वे अब भी इसका लाभ ले रहे हैं. पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी का कहना है कि पहले चार गनमैन थे, लेकिन निलंबित होते ही दो गनमैन हटा लिए गए हैं. सरकारी गाड़ी के इस्तेमाल के संबंध में उन्होंने कहा कि वे शुक्रवार को इसकी पूरी नियमावली देखकर आवश्यक कार्रवाई करेंगे. पुलिस विभाग के एक सेवानिवृत अफसर जो इन दिनों दिल्ली में हैं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि निलंबित अफसर को राज्य स्तरीय सुरक्षा समिति के निर्देश के बाद ही सरकारी वाहन और गनमैन की सुविधा दी जा सकती है, लेकिन पुलिस विभाग ने मुकेश गुप्ता को गनमैन की सुविधा शायद इसलिए दे रखी है ताकि वे स्वयं होकर यह आरोप न लगा दें कि सरकार उनकी जान लेना चाहती है. नक्सलियों ने अटैक कर दिया आदि-आदि.

राजेश टोप्पो ने भी नहीं लौटाई गाड़ी

इधर पत्रकारों की सेक्स सीडी बनाने के खेल में लगे राजेश सुकुमार टोप्पो पर भले ही ईओडब्लू ने मामला दर्ज कर लिया है, लेकिन खबर है कि उन्होंने भी गाड़ी क्रमांक सीजी 02- 9333 जनसंपर्क विभाग को वापस नहीं लौटाई है. टोप्पो अभी मंत्रालय में अटैच है और उनके पास कोई विभाग भी नहीं है बावजूद इसके वे सरकारी गाड़ी लेकर घूम रहे हैं. इतना ही नहीं विभाग के दो वाहन चालकों की सेवाएं भी वे ले रहे हैं.

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