संस्कृति

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भिलाई में आया... पेड़ा नहीं खाया

छत्तीसगढ़ के भिलाई में एक पेड़ा बेचने वाला बूढ़ा था. सफेद पैन्ट-सफेद शर्ट, सफेद जूता, सिर पर सफेद टोपी. बिल्कुल राजकपूर वाली. हाथ में छड़ी और कंधे पर टिन का डिब्बा. डिब्बे में लगा सुंदर सा कांच और कांच के भीतर  से झांकते और मन को लालच से भर देने वाले पेड़े.यह बूढ़ा जब भी सड़क से गुजरता तो तुकबंदी करता-

भिलाई में आया... पेड़ा नहीं खाया. भिलाई में कायकू आया... अगर पेड़ा नहीं खाया.

अगर कोई बच्चा पेड़े वाले को छेड़ दे तो फिर जवाब मिलता था- क्यों मां-बाप ने यहीं सिखाया. दुनिया में काय को आया? बच्चे फिर छेड़ते- पेड़े में आटा मिलाया... जवाब मिलता- कौन भौ....... ड़ी वाला चुगली लगाया.

बूढ़ा कौन था? क्या था ? इस बारे में मुझे कुछ भी नहीं मालूम...। जब भी इधर-उधर से कुछ मालूम करने की कवायद करता तो बस इतना पता चलता कि बूढ़ा केम्प वन भिलाई की एक झोपड़ी में रहता है.शायद बाल-बच्चों ने घर से निकाल दिया था. बूढ़े की झकाझक सफेद ड्रेस और वाइट कलर की हेट देखकर कुछ लोग उसे दूसरे देश का जासूस भी बताते थे? भले ही राजन- इकबाल और नन्हा जासूस बबलू दिलो-दिमाग पर हावी थे, लेकिन मुझे नहीं लगता था बूढ़ा कोई जासूस होगा? और भी जासूस पेड़ा क्यों बेचेगा? 

भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उस समय मोदी हमारे मुखिया जी नहीं थे अन्यथा तय था कि गरीब पेड़े वाले को पाकिस्तान का जासूस ठहरा दिया जाता. हर रोज गरीबी और मुफलिसी में मर-मरकर जीने और ड्रेस कोड को मेन्टेन करने वाला बूढ़ा सही में जासूसी के आरोप में जेल की सलाखों के पीछे होता और अपमानित होकर दुनिया से कूच कर गया होता? 

वैसे जो लोग भिलाई के रहने वाले हैं वे एक गूंगे लड़के भी वाकिफ होंगे. दुबला- पतला बिल्कुल रंगकर्मी सुप्रियो सेन जैसा नजर आने वाला यह लड़का हर जगह दिखाई देता था. कहीं कोई घटना घटी... और अगर आप उस जगह से गुजर रहे हैं तो गूंगा आपको ऊं आ... ऊं आ करते हुए मिल जाएगा. बताते हैं कि यह गूंगा पुलिस के लिए मुखबिरी का काम का करता था. हर थाने में उसकी दखल थीं. थानेदार और पुलिस वाले उसे अपने साथ लेकर चलते थे. गूंगे को अभिताभ बच्चन की फिल्मों का शौक था. जब भी अमिताभ की फिल्म लगती वह बिल्कुल अभिताभ स्टाइल वाली बेलबाटम पहनकर टाकीज पहुंच जाया करता था. अच्छी-खासी भीड़ को चीरकर वह सीधे गेटकीपर या मैंनेजर से मिलता और ऊं आ... ऊं आ करके फिल्म देखने बैठ जाता और इंटरवेल में समोसा भी खाता.

यूं तो भिलाई में एक बेर बेचने वाला भी गाना गाते हुए सड़क से गुजरता था- बेर लो...बेर लो...बेर लो... तेरे- मेरे नसीबों का? हम सबके नसीबों का ? छिटकना भई छिटकना... बाबू भैया छिटकना... चले आव-चले आव. 

एक मरियल- खपियल सी साइकिल में दो बड़े से झोले में नड्डा लेकर एक शख्स और नजर आता था. नड्डे को ऊंगली में फंसाकर खाने का मजा ही कुछ और था. वैसे भिलाई में एक बहुत ही शानदार रंगकर्मी का नाम नड्डा है. एक किसी बड़े नेता जी का सरनेम भी नड्डा है, लेकिन मुझे नड्डे का पीला कलर और नेताजी की पार्टी के झंडे का कलर पंसद नहीं हैं इसलिए नड्डा खाना बंद कर दिया है. गांव और कस्बों के बाजारों में नड्डा अब भी मिलता है. अब भी बहुत से प्रगतिशील और जनवादी लोग चखने में नड्डे का उपयोग करते हैं. जो लेखक मित्र दारू के साथ नड्डे का प्रयोग करते हैं, उन्हें देखकर गाने का मन करता है- समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई.

राजकुमार सोनी की फेसबुक वाल से 
 

 

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जय संतोषी मां

1975 को जय संतोषी मां नाम की एक फिल्म भी रीलिज़ हुई थीं. पिताजी कहते थे संतोषी मां के नाम वाली किसी देवी का पुराण में उल्लेख नहीं है. यह सही भी है क्योंकि फिल्म के प्रारंभ में ही फिल्म बनाने वाले ने यह बता दिया था कि संतोषी मां का शास्त्रों में उल्लेख नहीं है, लेकिन मां यह मानने को तैयार नहीं थीं. इस फिल्म को मां तीन-चार बार देख चुकी थी और उनकी आस्था इतनी ज्यादा गहरी हो गई थीं कि हर शुक्रवार को व्रत रखने लगी थीं. घर के प्रत्येक सदस्य को हिदायत थीं कि शुक्रवार को कोई भी खटाई नहीं खाएगा.  चीनी मिट्टी से निर्मित आचार की बड़ी सी बरनी को छिपा कर रख दिया जाता था.शुक्रवार आने के एक दिन पहले यानी गुरुवार को मां फरमान जारी कर देती- कल शुक्रवार है. मेरा उपवास है. कोई आचार- नींबू नहीं खाएगा.अगर किसी ने खाया तो समझ लेना. मेरा उपवास भरबन्ट ( शायद भरबन्ट का मतलब तहस- नहस होता हो. ) हुआ तो फिर तुम जानो ?

अब घर में कुछ भी ऊपर- नीचे जो कुछ भी होता तो मां आरोप लगाती- जरूर किसी ने आचार खाया है. सिर में दर्द उठा... तूने आचार खाया? भाई को चोट लगी... आचार खाया है? छोटा भाई अर्धवार्षिक परीक्षा में फेल हो गया... उसने भी आचार खाया? ड्यूटी जाने के पहले पिताजी की साइकिल पंचर हो गई.... आचार ?

हर शुक्रवार को मां संतोषी मां की पूजा करती. मैं अपनी मां का स्थायी पंड़ित बेटा था. मतलब जैसे सत्यनारायण की कथा वाली किताब होती थीं ठीक वैसे ही जय संतोषी मां की कथा को पुस्तक से बांचकर सुनाना होता था. पूरी कथा का सार यही था कि एक महिला को उसके परिवार के लोग खूब यातना देते हैं. वह महिला यातना से बचने के लिए संतोषी मां का उपवास प्रारंभ करती है और संतोषी माता प्रकट होकर उसके दुःख दूर कर देती है. महिला के सामने झूठे बर्तनों का अंबार लगाया जाता है. माता प्रकट होती है और सारे बर्तन एकदम चकाचक हो जाते है. इससे पहले कि पीड़ित महिला के चेहरे पर मुस्कान आए... जलनखोर लोग महिला के सामने गंदे कपड़ों का ढ़ेर लगा देते हैं... लेकिन ठहरिए... संतोषी मां यहां भी प्रकट होकर  सारे कपड़ों को साफ कर देती थीं. कपड़े इतने सफेद कि सुपर रिन की चमकार भी फेल. अब जलनखोर लोग परेशान... करें तो क्या करें? 

मुझे कथा बांचने के पहले नहाना होता था. कथा को बांच- बांचकर इतना ज्यादा अभ्यस्त हो चुका था कि उठते- बैठते और  कई बार सोते- सोते भी कथा बांच दिया करता था. मां पूजा में लीन रहती. अंत में आरती होती तो उसी धुन पर होती- मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की... जय- जय संतोषी माता जय-जय मां. जय संतोषी मां... जैसी फिल्म क्यों हिट रही इसके कई कारण है. अब जाकर सोचता हूं तो लगता है हिन्दुस्तान की जनता बेहद भावुक है. खासकर जो हिंदी पट्टी है वहां अशिक्षा ने लोगों को चमत्कार पर भरोसा करने के लिए मजबूर कर रखा है. मेहनतकश जनता को भी यह लगता है कि उनके कष्टों का निवारण किसी अदृश्य शक्ति के जरिए ही हो सकता है. जब किसी दुखी आदमी के जीवन में खुशियां आती है तो वह खुशी देने वाले को भी भगवान मानने लगता हैं.  जय संतोषी मां ने उस जमाने में पीड़ित-प्रताड़ित महिलाओं के जीवन में खुशियां लौटाई थीं. जो चमत्कार रुपहले परदे भी होता था उसे महिलाएं अपने जीवन में महसूस करती थीं. सोलह शुक्रवार तक उपवास करती और फिर उध्यापन करके खुश हो जाती थीं कि अब उनके जीवन में सब कुछ बदल जाएगा.

फिल्म वाले ने पूजा के लिए बड़ी चालाकी से गुड़ और चने के प्रसाद का प्रावधान तय कर दिया था. यह प्रसाद हर जगह मौजूद था सो संतोषी मां भी हर जगह विद्यमान हो गई. याद रखिए प्रसाद की उपलब्धता जितनी सरल होती है... धर्म उतनी तेजी से हमारे भीतर प्रवेश कर जाता है. टाकीजों में हर शुक्रवार को गुड़ और चने के प्रसाद का वितरण भी इसलिए होता था क्योंकि यह गरीब आदमी की पहुंच में होता था. अगर फिल्म बनाने वाला यह बताता कि संतोषी मां को काजू- कतली पसंद है तो यकीन मानिए फिल्म कभी हिट नहीं होती.

अब यह कितना सच है यह नहीं मालूम लेकिन बताते कि फिल्म देखने के पहले बहुत से दर्शक दरवाजे के बाहर ही जूते-चप्पल भी उतार दिया करते थे. अमूमन लड़के ही फिल्म की स्टोरियां सुनाते रहे हैं, लेकिन जय संतोषी मां की स्टोरी जब लड़कियां सुनाती थीं तो गजब सुनाती थीं. हां रे... ऊं रे...कितनी कमीनी थीं न उसकी सास...देवरानी....वगैरह-वगैरह...। यह संतोषी मां का ही प्रभाव था कि सुभाष घई की एक फिल्म कालीचरण जो वर्ष 1976 में रीलिज हुई थीं उसमें डैनी लंगडा रहता है और जय संतोषी मां,,, बोल-बोलकर ढिशुंम-ढिशुंम करता है.

 

इस फिल्म के साथ कई तरह की खूबसूरत यादें जुड़ी हुई हैं. तर्क और विज्ञान की अवधारणा को खंडित करने वाली यह फिल्म मुझे अब भी पसंद है. इस फिल्म को पसंद करने का यह मतलब नहीं है कि मैं अंधविश्वासी हूं. इस फिल्म को पंसद करने के पीछे मेरी वजह सिर्फ़ मां थीं. मैं लंबे समय तक मां के विश्वास के साथ था. कई शुक्रवार उपवास रहने के बाद भी पिता बेमतलब बरस पड़ते थे. मैं छोटा था तो मां के कष्ट हर नहीं सकता है. बस...इतना चाहता था कि यार... कम से कम संतोषी मां हर लें. भोली मां की बहुत सी दर्दनाक यादें जुड़ी हुई है. मां इस दुनिया न होते भी साथ है तो फिर मां की जो पूजा वाली मां है वह जेहन से कैसे गायब हो सकती है? मैं इस मां के सामने कोई अगरबत्ती नहीं जलाता, लेकिन संतोषी मां के बारेे में सोचता हूं तो गांव-कस्बों की बहुत सी माताएं याद आ जाती है. चमत्कार सी भरी हुई धैर्यवान. उम्मीद से ज्यादा देने वाली लबालब जय संतोषी मां.

मैं अब भी जय संतोषी मां के साथ हूं. 

होने को तो मैं साध्वी प्रज्ञा और राधे मां साथ भी हो सकता था, लेकिन जरा सोचकर बताइए क्या इनके साथ कभी कोई गीतकार प्रदीप हो सकता था? फिल्म जय संतोषी मां के सारे गीत असली राष्ट्रवादी कवि / गीतकार प्रदीप ने लिखे थे. प्रज्ञा ठाकुर और राधे मां की प्रशंसा में गीत लिखने वालों की आज कोई कमी नहीं है, अगर कवि प्रदीप जिंदा होते और वे राधे मां और प्रजा ठाकुर के लिए गीत लिखने से इंकार कर देते तो उन्हें राष्ट्रद्रोही ठहरा दिया जाता? अगर उन्हें गीत लिखने के लिए ज्यादा मजबूर किया जाता तो बहुत संभव है कि वे आत्महत्या भी कर लेते. इस पोस्ट में एक चित्र फिल्म जय संतोषी मां का है दूसरा चित्र उस मंदिर का है जो कोरबा के पाली इलाके में मौजूद है. यह मंदिर मैंने तब देखा जब मैं कोरबा से लौट रहा था.

राजकुमार सोनी के फेसबुक वॉल से

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डिस्को डांसर

अगर आप इस पोस्ट को पढ़ने की ताकत और हिम्मत जुटा रहे हैं तो प्लीज वक्त निकालकर मिथुन पर फिल्माए गए आईएमए डिस्को डांसर जैसे गीत को देखने की कोशिश भी करिएगा. यह गीत यू ट्यूब पर मौजूद है. हमारे जमाने में- मौसम है गाने का...गाने का बजाने का... हंसने का हंसाने का...ये जीवन ये दुनिया सपना है दीवाने का...यानी गन मास्टर जी 9 मतलब डिस्को डांसर मिथुन चक्रवर्ती का उदय हो चुका था. थोड़ा बहुत नाचना-गाना तो हम भी जानते थे, लेकिन मिथुन के आने के बाद ही पहली बार यह पता चला कि कोई डिस्को डांस भी होता है. अब इसे मिथुन का प्रभाव कहे या कुछ और... लेकिन उनकी आत्मा हर लड़के में घुसी हुई दिखती थीं. जिसे देखो वहीं डिस्को और कराटे वाला पोज देते हुए मिलता था.

मां ने कहा- सब्जी ले आ. तुरंत कराटे वाला पोज. कमर का झटका....लाओ झोला. बाप ने कहा- दाढ़ी बनाने वाला ब्लेड नहीं है. जा रे...ब्लेड ले आ... फिर कराटे वाला पोज. कमर का जोरदार झटका... लाओ आठ आना. सेक्टर छह भिलाई के बाद जब हमारा परिवार रिसाली सेक्टर में शिफ्ट हुआ तब अचानक एक रोज एक रिक्शा घर के सामने से गुजरा. रिक्शे में बैठा एक शख्स अमीन सयानी का बाप बनकर अनाउंसमेंट कर रहा था-जी हां...भाइयों और बहनों आज नवयुवक गणेश पंडाल पर देखिए दानी का डिस्को डांस... ऐसा डांस जो आपने कभी नहीं देखा होगा. एलाउंसर बकते जा रहा था- रहस्य और रोमांच से भरपूर डांस.... जी हां... भाइयों और बहनों दानी को कई गणेश पूजा पंडालों में बेस्ट डांसर का अवार्ड मिल चुका है. आइए-आइए... अवश्य आइए.

रात आठ बजे ही मैं अपने एक दोस्त के साथ दानी का डिस्को डांस देखने के लिए पहुंच गया था, लेकिन यह क्या... वहां सबसे ज्यादा भीड़ लड़कियों और महिलाओं की थीं. बस... प्रोग्राम शुरू होते ही दानी ने वैसे ही इंट्री मारी जैसे मिथुन ने फिल्म डिस्को डांसर के गाने- आई एम ए डिस्को डांसर में मारी थीं. दानी मिथुन बनकर नाच रहा था और लड़कियां चीख रही थीं. चिल्ला रही थीं. मैं अपने दोस्त के साथ लड़कियों के पास ही खड़ा था. जैसे ही एक गाना खत्म होता, पैसों की बौछार हो जाती.

उधर दूसरे गाने की तैयारी होती और इधर लड़कियों की प्रतिक्रिया होती- 1- हाय राम...कितना मस्त नाचता है न? 2- मेरी सहेली का भाई है. 3- कभी मिलवाना न? 4- नहीं कमीनी तू पटा लेगी तो ? 5-तूने पटा लिया है क्या ? 6- नहीं... रे... उसको तो उषा आंटी लाइन मार रही है. ... तो मेहरबान... कदरदान पेश है डिस्को के बादशाह दानी का अगला डांस- तू मुझे जान से भी प्यारा है... तेरे लिए सूना जग सारा है. फिल्म का नाम है वारदात...और गायिका है उषा उथुप और हरदिल अजीज बप्पी लहरी......ईईई.....ईईई. ( अब डिस्को प्रोग्राम में माइक तो इको होगा न ? ) अब यह तो ठीक-ठाक पता नहीं कि डिस्को की वजह से दानी ने कितनी लड़कियों से प्यार किया ? और कितनी लड़कियों ने दानी की प्रतिभा पर भरोसा जताकर अपना सब कुछ नयौछावर करने पर विचार किया? लेकिन यह तय था कि हम सभी दोस्त दानी से जलते थे. पता नहीं हमारी जलन स्वाभाविक थीं या गैर स्वाभाविक... लेकिन हम सोचते थे- पता नहीं लड़कियों को क्या हो गया है? लडकियां कब समझेगी कि सच्चा प्यार डिस्को में नहीं... अभिताभ के डांस में कहीं छिपा है.

एक दिन यह सूचना अवश्य मिली कि किसी मामूली से छोकरे ने दानी को धो दिया है. सूत्रों के अनुसार महान डिस्को डांसर दानी देश- दुनिया की लड़कियों के प्यार के आमंत्रण को लगातार ठुकराकर अपने डिस्को वाले जूते के नीचे कुचल रहे थे. एक रोज एक मामूली से छोकरे ने उसे शास्त्रीय तरीक़े से इसलिए धो दिया था क्योंकि दानी ने उस गरीब के प्यार का रास्ता रोककर यह बताने की धृष्टता कर दी थीं कि वह भिलाई का बेस्ट डिस्को डांसर है.

आपके मोहल्ले में भी एक न एक डिस्को डांसर अवश्य पैदा हुआ होगा? एक बार बड़े भैया गणेश पूजा आयोजन के अध्यक्ष बने थे. हर सुबह उनसे मिलने के लिए एक न एक डिस्को डांसर घर पर आता था. एक मर्तबा एक डांसर माथे पर पट्टी, जलने-बुझने वाली ड्रेस और हाथ में लकड़ी वाली गिटार थामकर घर आ गया था. डिस्को डांसर की दिली ख्वाहिश थीं कि एक बार... बस... एक बार उसे सार्वजनिक मंच पर प्रतिभा दिखाने का मौका दे दिया जाय. शाम को उसकी ख्वाहिश पूरी हो गई लेकिन वह दानी जैसा जलवा नहीं बिखेर पाया.

 

राजकुमार सोनी की फेसबुक वाल से

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बैलबाटम की दुनिया...

क्या आपने कभी बैलबाटम को पहना है. यह फैशन भारत में कब आया इस बारे में कोई एक राय नहीं है. कोई कहता है कि हिप्पियों की वजह से यह फैशन भारत पहुंचा था तो किसी का कहना है देवानंद, राजेश खन्ना और अभिताभ बच्चन ने बैलबाटम को लोकप्रिय बनाया. अब सही क्या है इस बारे एक पाठक की हैसियत से आप सब भी रोशनी डाल सकते हैं. बहरहाल जब मैं कक्षा तीसरी में था तब बैलबाटम मार्केट में चुका था. सेक्टर छह भिलाई के ए और बी मार्केट में इक्का-दुक्का टेलर मास्टर थे, लेकिन सभी के सभी बैलबाटम स्पेशलिस्ट थे. एक दुकान में यह भी लिखा था-यहां आर्डर देने पर लड़कियों के लिए भी बैलबाटम तैयार किया जाता है.

हमारे समय के पिताजी यह मानते थे कि जो भी बच्चें स्कूल में पढ़ते हैं उन्हें सिर्फ़ हाफ पैट पहनने का ही हक है. उन दिनों- यह आराम का मामला है जैसा कोई विज्ञापन लोकप्रिय नहीं हुआ था इसलिए हमारी अंदरूनी तकलीफों से कोई भी वाकिफ नहीं था.केवल लड़कियों को ही नहीं हम लोगों को भी अपनी इज्जत बेहद प्यारी थीं और हम लोग अपनी इज्जत का खास ख्याल भी रखते थे. बैलबाटम और पूरे बांह वाली शर्ट पहनने का अधिकार उन बच्चों को ही मिल पाता था, जो कक्षा ग्यारहवीं यानी मैट्रिक पास कर लेते थे. पड़ोस में एक बिहारी परिवार रहता था. उस परिवार में एक ही लड़का था जो दिन- रात पढ़ता रहता था. लड़का गणित में तेज था और उस परिवार की बस एक ही चाहत थीं कि लड़के को किसी भी तरह से भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी मिल जाय. लड़के के पिता अपने बेटे की हर चाहत पूरी करते थे.एक रोज लड़के ने बैलबाटम की फरमाइश की तो उसके पिताजी उसे साइकिल के डंडे पर बिठाकर ले गए. वापस लौटकर उन्होंने पूरे ब्लाक वालों को बताया कि टेलर मास्टर ने कहा है- अभी बच्चा छोटा है. आठवीं में पढ़ता है... बैलबाटम अच्छा नहीं लगेगा, लेकिन अब कौन समझाए. एक हफ्ते बाद बैलबाटम आ जाएगा.

एक हफ्ते के बाद जब बैलबाटम आया तो हम सबने उसे प्रत्याशा में देखा. हमें लगा एक न एक दिन हम सब भी बैलबाटम पहनेंगे. अब लड़का एक निश्चित समय में शाम को ही बैलबाटम पहनकर स्ट्रीट के दो चक्कर मारता. शायद उसका मकसद यहीं था कि सबको पता चल जाए उसके पास बैलबाटम है. लड़का सड़क के छोर पर मौजूद एक खंभे के पास जाता. फिल्म कभी-कभी में जैसे अभिताभ बच्चन पेड़ पर टिककर गाता है- कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है... ठीक वैसे ही वह भी खंबे पर टिक जाता. कुछ बुदबुदाता और फिर लौट जाता. एक रोज मैंने उससे पूछा कि खंबे के पास जाकर क्या करते हो? उसने बताया गणित का फार्मूला याद करता हूं. बहुत बाद में हमारी स्ट्रीट में कई लोगों के पास बैलबाटम आ गया था. इतनी लंबी इंची वाले बैलबाटम थे कि पूछिए मत. जब नीचे से पैंट घिसने की शिकायत में इजाफा हुआ तो हील वाले जूतें आ गए और जो चेन पोस्ट आफीस बंद करने के काम में आती थीं उसका उपयोग बैलबाटम के नीचे होने लगा. बैलबाटम को पहनकर साइकिल चलाना थोड़ा जोखिम भरा होता था.अक्सर साइकिल की चेन में फंसकर बैलबाटम का काम तमाम हो जाता था. फिर भी उन दिनों बहुत से होशियार चंद थे जो पैरों को आड़ा-तेड़ा करके सायकिल चलाना जानते थे और सिनेमा हाल तक पहुंच जाया करते थे. जब बैलबाटम का फैशन खत्म हुआ तो उसका झोला बनने लगा. मैंने खुद अपनी आंखों से कई तरह के बैलबाटम में सब्जियों को घर में आते देखा है.

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ठोला नहीं... अभिताभ कट चाहिए ?

राजेश खन्ना के ढलान और अभिताभ बच्चन के उठान युग में धीरे-धीरे मेरी हाइट बढ़ रही थी. अक्सर दोस्तों और भाइयों के बीच इस बात को लेकर झगड़ा हो जाता था कि कौन श्रेष्ठ है.बहुत से लोग राजेश खन्ना को श्रेष्ठ मानते थे और कुछ दोस्तों का कहना था कि अमिताभ का कोई मुकाबला नहीं. जो मुझसे छोटा भाई था उसे विनोद खन्ना पसंद था.

निजी तौर पर मैं अभिताभ का मुरीद था. अभिताभ पर फिदा होने के कई कारण है, लेकिन सबसे बड़ा कारण अमिताभ की हेयर स्टाइल थीं. दोनों तरफ फुग्गे वाली कली रहती थीं और पूरे कान ढंके रहते थे. मैं अभिताभ जैसी हेयरस्टाइल रखना चाहता था. इसके लिए खूब मेहनत भी करता था, लेकिन मेरी सारी मेहनत पर पिता जी पानी फेर देते थे. हर महीने किसी एक रविवार मेरे बालों का काम तमाम कर दिया जाता था. बाकी भाइयों को केश सज्जा का महत्व पता नहीं था इसलिए वे पिताजी के सामने सरेंडर हो जाते थे और जैसा पिताजी चाहते थे वैसा ही बाल कटवा लेते थे, लेकिन मैं नाई की दुकान में जाते-जाते तक प्रतिरोध करता था.जैसे ही नाई की दुकान पहुंचता वैसे ही नाई भी खुश हो जाता. शायद वह मुझे बकरा समझता था. कई बार तो यह भी लगता था नाई पिताजी से मिला हुआ है और उनकी ही सुनता था. मेरे हाट सीट पर बैठते ही पिताजी डायरेक्शन दे देते थे और नाई भी उनके कहे अनुसार कैची चला-चला कर खुश होते रहता था. मैं अभिताभ...अभिताभ चिल्लाते रहता और पिताजी कहते-कोई अभिताभ नहीं... ठोला कट काट दो. बाल कटाई के दौरान ही यह पता चल गया था जो पुलिस वाले छोटे-छोटे बाल रखते थे उन्हें ठोला कहा जाता था.कई बार तो नाई सिर पर सीधे कटोरा रखकर बाल काट देता था और डबल ठोला बनाकर छोड़ता था.

आप सबके साथ भी शायद ऐसा हुआ होगा. कोई राजेश खन्ना हेयरस्टाइल के लिए परेशान रहा होगा तो कोई विनोद खन्ना जैसी स्टाइल रखना चाहता होगा. मैं जिस स्कूल में पढ़ता था वहां सारी लड़कियों को सख्त हिदायत थीं कि वे दो चोटी में लाल रिबन बांधकर आएगी.उन्हें शनिवार को सफेद रिबन बांधना होता है. उन दिनों लड़कियों के बीच फिल्म अभिनेत्री साधना की हेयर स्टाइल का जलवा बरकरार था. लड़कियां साधना कट भी रखती थीं तो भी दो चोटी डालनी होती थीं. कक्षा में लड़कियों के सिर पर अच्छे-खासे बाल देखकर जलन होती थीं. एक बार मैंने चंद्राकर गुरुजी से डरते-सहमते कह ही दिया- गुरुजी... आप कभी लड़कियों को बाल कटवाने के लिए नहीं कहते हैं? हम लोग ही कब तक बलिदान देते रहेंगे? गुरुजी ने कहा- ठीक है तुम बाल बढ़ा लो...लेकिन फिर चोटी भी बांधकर आना पड़ेगा.

हमारी हेयरस्टाइल का युग राजेश खन्ना, अभिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और थोड़े समय के लिए मिथुन चक्रवर्ती से गुजरकर समाप्त हो गया है. अब शायद लड़कों के बीच विराट कोहली वाली हेयर स्टाइल चल रही है? लड़कियों के बीच कौन सी हेयर स्टाइल चल रही है इसकी जानकारी नहीं है. पहले मन ही मन में लड़कियों की तारीफ करने लिए ज्यादा सोचना नहीं पड़ता था. तस्वीर एकदम साफ रहती थी. कौन सी लड़की में साधना मौजूद है? कौन लड़की हेमामालिनी है? कौन दो चोटी डालने वाली रेखा है? कौन जीनत अमान है और कौन परवीन बाबी? अब पहचान थोड़ी मुश्किल हो गई है. अब पता ही नहीं चलता क्योंकि सारी लड़कियां एक जैसी दिखती है. जिसे देखता हूं वह मुंह को आड़ा-तेड़ा करके सेल्फी लेते मिलती है और हर रोज मिलती है.

राजकुमार सोनी की फेसबुक वाल से

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रुमाल में फूल... स्वेटर और घरों में कैद तोते

क्या आपको कभी किसी लड़की ने फूल से कढ़ा रुमाल तोहफे में दिया है. चलिए रुमाल न सही... क्या आपको कभी प्रेमिका या पत्नी ने पलट जाने को कहकर स्वेटर का नाप लिया है? यदि ऐसा नहीं भी हुआ तो कोई बात नहीं...? क्या पहली बार जब आप शादी के लिए किसी लड़की को देखने गए तब लड़की की मां ने आपको दो तोते वाली तस्वीर दिखाकर यह कहा है- अमाई संगीता ने बनाई हे जे पेन्टिंग. खाना तो बहुते बढ़िया बनाती है. पेन्टिंग भी कमाल का बनाती है. अगर आपके साथ तीन घटनाओं में से कोई भी एक घटना नहीं हुई तो आपका जीवन बेकार है.

स्कूल और कालेज की किताबों में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं थीं इसलिए हमारा सारा ध्यान जन और उसकी संस्कृति की तरफ ज्यादा रहता था. अब भी रहता है. एक रोज स्कूल में अलीवर जेकब ने बताया कि उसे शोभा डे नाम की लड़की से प्यार हो गया है तो सुनकर अच्छा लगा क्योंकि शोभा डे लड़की ही ऐसी थीं कि हर कोई उससे प्यार कर सकता था. सिर पर नारियल का तेल चुपड़कर आती थीं और बेमतलब की बात पर रो देती थीं. मगर जब भी रोती थीं तो और प्यारी लगती थीं. बिल्कुल गीत गाता चल फिल्म की हिरोइन सारिका की तरह. अलीवर ने मुझसे मदद मांगी. अलीवर ने बताया कि उसने अपनी सिस्टर से शोभा के नाम का एक रुमाल बनवाया है. मैंने अंचभित होकर कहा- दीदी ने ऐसे कैसे बना दिया ? अली ने बताया कि उसने कहा है कि मुझे अपने दोस्त सोनी को देना है. अबे.... लेकिन मेरा नाम तो र... से आता है. अली ने तर्क दिया- आखिरी में स भी तो आता है न ?

तय हुआ कि मुझे अलीवर रुमाल देगा और शोभा के नाम का पहला अक्षर स...वाला रुमाल मैं शोभा को दूंगा. अपने प्रिय दोस्त के लिए इतना तो कर सकता था. मैंने शोभा को रुमाल दिया और शोभा ने उसे अपनी मां तक पहुंचा दिया. पाठक अब तक चंद्राकर गुरुजी के बारे में जा चुके है. तो मित्रों चंद्राकर गुरुजी ने कक्षा के बाहर मुर्गा बना दिया. मुर्गा मतलब जानते हैं न ? आज भी मुर्गा बनना तो याद आता है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा रुमाल की याद आती हैं. क्या ऐसे किसी रुमाल को कभी देखा है आपने? जीवन में एक न एक बार तो ऐसा रुमाल आपको मिला ही होगा जिससे देखकर आपने नाक पौछने का इरादा अवश्य ही स्थगित कर दिया होगा.स्कूल में शोभा के अलावा एक दूसरी लड़की भी थीं जो रुमाल लाती थीं... मगर उस रुमाल में पाउडर की खूशबू भी रहती थीं.

दूसरी घटना भी रोचक है. हमारे बड़े भैया को शादी की बहुत जल्दी थीं. वहीं भैया जो छत पर - लाइफबाय है जहां तंदुरुस्ती. हैं वहां गाया करते थे. पिता की बगैर अनुमति के भी वे लड़की देखने के लिए चले जाया करते थे. एक रोज वे मुझे भी ले गए. लड़की वाले के घर पहुंच कर उन्होंने अपना मकसद बताया तो लड़की की मां ने खुश होकर कहा- अमाई लड़की को देखने के पहले यह तो देख लो कि लड़की क्या-क्या बनाती है? हमें कई तरह की पेंटिंग दिखाई गई. अमूमन हर पेंटिंग में दो तोते थे. बहुत बाद में भैया की शादी लखनादौन में हो गई लेकिन कई घरों में तोतों को कैद देखा. हर बार इन तोतों को देखकर सोचता रहा... न जाने कितनी लड़कियों को कितनी बार अंजान लोगों के सामने यह बताना पड़ा होगा कि इन महान तोतों को उन्होंने बनाया है. न जाने कितनी लड़कियों की मां ने अपनी लड़कियों का घर बसाने के लिए पड़ोसी से कप और बसी उधार मांगी होगी. न जाने कितने घरों में अब भी ये तोतें कैद है? न जाने ये तोते कब उड़ेंगे ? कुछ घरों में बटन वाली बत्तख तैर रही है. कुछ घरों में मोर नाच रहे हैं. पता नहीं बत्तख कब भागेंगी? मोर कब जंगल में नाचेंगे ?

अब थोड़ी सी बात उस स्वेटर की भी कर लेता हूं जिसे अमूमन हर महिला बनाना पंसद करती थीं. स्कूल में आधी छुट्टी के दौरान मैडम अपने बैग से ऊन का बड़ा गोला निकाल लेती थीं. स्कूल के बाहर भी यहीं दृश्य देखने को मिलता था. उन दिनों हर हाथ में ऊन का गोला देखकर यहीं महसूस होता था कि मैं एक ठंडे देश में रहता हूं. यह सही भी है उन दिनों ठंड भी कड़ाके की पड़ती थीं. जब छोटे थे तब किसी ने स्वेटर नहीं बनाया. एक रोज सोनू ( पत्नी ) ने पीछे पलट जाने को कहा और स्वेटर बनाने के लिए नाप लिया. मेरी पसंद के रंग का स्वेटर था. सूर्ख लाल. काफी दिनों तक चला भी यह स्वेटर.अब स्वेटर की जगह जैकेट ने ले ली है. अब सोनू अपनी पंसद की शर्ट लाने के लिए पलट जाने को कहती है. पलट तो जाता हूं लेकिन सामने लाल रंग का स्वेटर मुस्कुराते हुए नजर आता हैं.

राजकुमार सोनी की फेसबुक वाल से

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बिटको-बिनाका और...

अब आपसे कोई नहीं कहता होगा कि बेटा सुबह हो गई है चलो मंजन कर लो, लेकिन किसी वक्त मां चिल्लाती थीं और हाथों में बिटको का काला दंतमंजन थमा देती थी. मंजन काला अवश्य होता था मगर दांत सफेद हो जाते थे. अब बाजार में बिटको पहले आया या बिनाका टूथपेस्ट...इस बारे में कोई पुख्ता जानकारी मेरे पास नहीं है लेकिन दांतों को चमकाने के लिए इन दो ब्रांडों का इस्तेमाल खूब किया है. बीच में थोड़े समय के लिए फोरहेंस टूथपेस्ट भी आया था. यह पेस्ट बाजार से कब गायब हुआ पता ही नहीं चला.

बिनाका के बाद सिबाका ने भी अपनी जगह बनाई थीं. अब मंजन में शायद डाबर का लाल दंतमंजन ज्यादा लोकप्रिय है. इस मंजन को लोकप्रिय बनाने में टीपी जैन नाम के एक कलाकार का भी बड़ा योगदान है. टीपी जैन ब्लैक एंड वाइट टीवी में मंजन का विज्ञापन करते हुए नजर आते थे.उनका एक फेमस विज्ञापन यह भी था- भाड़ा नहीं देना है तो मकान खाली कर दो. मंजनों में बंदर छाप, विठोबा और वज्रदंती का भी बोलबाला रहा. फिल्मी परदे पर एक बूढ़ा अब भी अपने मजबूत दांतों से अखरोट तोड़ते रहता है. हालांकि काला दंतमंजन करने वालों को जब हिकारत की नजर से देखा जाने लगा तब बिनाका मेरी जिंदगी का हिस्सा बना.उन दिनों रेडियो पर अमीन सयानी बिनाका गीत माला प्रस्तुत करते थे. इस पेस्ट की लोकप्रियता शायद इस वजह से भी ज्यादा हो गई थीं. मुझे भी लगता था कि यार जिस पेस्ट को मैं इस्तेमाल करता हूं उस पेस्ट से हेमा मालिनी भी मुंह धोती है.उन दिनों अफवाह फैलाने वाले तंत्र नहीं थे. जैसे-तैसे यह सूचना मिल ही जाती थीं कि कौन हीरो क्या कर रहा है और कौन सी हिरोइन किस गुंताडे में हैं.ज्यादातर सूचनाएं सच के करीब होती थीं.

मुझे याद है कि जब घर में पहली बार बिनाका पेस्ट आया था तब हम पांचों भाई लाइन से अपनी-अपनी उंगली लेकर खड़े हो गए थे. पिता भी नाप-जोखकर सबकी उंगली में पेस्ट लगाया करते थे.पेस्ट को बड़े जतन से किसी ऊंची सी जगह पर संभालकर रख दिया जाता था.एक बड़ा सा बिनाका पेस्ट महीने भर चलता था, लेकिन एक रोज पिता ने जल्दी-जल्दी खत्म हो रहे पेस्ट को लेकर चिंता जताई तो चुगलखोर भाई ने उन्हें बता दिया कि राजू यानी मैं पेस्ट को खाता हूं. बात तो सही थीं. चुगलखोर भाई की वजह से मैं कई बार पीटा गया. हालांकि जब मेरी कुटाई हो जाती थीं तब चुपके से रात में भाई ही रोटी भी खिलाता था. रोटी खिलाने का उसका अंदाज बहुत ही शानदार था. उसे पता होता था कि रसोईघर में रोटी और सब्जी कहां रहती थीं.रात के अंधेरे में रोटी-सब्जी लाकर वह गाता था- जो खाने की चीज है लोग उसे खाते नहीं है...पेस्ट खाकर जूते खाते हैं और जरा भी शर्माते नहीं हैं. रात के अंधेरे में गाना सुनाने के लिए पिताजी उसे भी डांटते थे लेकिन मुझे लगता था कि एक तरह से वह मख्खनबाजी करके पिताजी को खुश कर लेता था और मुझे भूखा सोने भी नहीं देता था. उन दिनों मैं यह भी सोचता था कि यार...कोई ऐसा पेस्ट बनना चाहिए जिसे रोटी पर चुपड़कर खाया जा सकें. रोटी भी खा लेंगे और मुंह भी धुल जाएगा.

राजकुमार सोनी की फेसबुक वॉल से

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केवल गब्बर का नहीं जनाब...मेरा अपना बिस्कुट भी है यह

जब डाकू गब्बर सिंह की पहली पसंद ग्लूकोज़ बिस्किट हो सकती थीं तो हमारी तो होनी ही थीं. शोले के अमजद खान उर्फ गब्बर को कौन नहीं जानता.फिल्मी खबरों पर रुचि रखने वाले लोगों का कहना हैं कि आम तौर पर हीरो या हिरोइन ही विज्ञापन किया करते थे. किसी कंपनी ने पहली बार एक खलनायक को विज्ञापन में लिया था, गब्बर सिंह से पहले शायद प्रेम चोपड़ा वैसलीन का विज्ञापन कर चुके थे, लेकिन किसी ने उन्हें नोटिस में नहीं लिया. गब्बर को नोटिस में लेने की एक वजह यह थीं कि उनका डायलॉग- कितने आदमी थे ? तेरा क्या होगा कालिया घर-घर पहुंच चुका था. बचपन में जो भी चीजें मिलती थीं उसका महत्व होता था. किसी ने मां को बता दिया था कि अगर बच्चों को ग्लूकोज़ बिस्किट खिलाया जाय तो उनमें ताकत बनी रहती है. बस... चावल के डिब्बे में, भगवान की फोटो के नीचे, या फिर आंचल में जहां कहीं भी चार आना-आठ आना होता बिस्किट खरीद लिया जाता था.

इस बिस्किट के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि इसे छोटा- बड़ा हर कोई खाता था. अब तो चाय के साथ काले-पीले और जीवन स्तर को ऊंचा दिखाने वाले कई तरह के बिस्किट परोसे जाते हैं, लेकिन पहले ग्लूकोज़ बिस्कुट ही दिया जाता था.अमीर हो गरीब... हर आदमी को पसंद था यह बिस्कुट. एक बार छोटे भाई के सिर में दर्द उठा. मां ने मुझे एनासिन लाने के मार्केट भेजा. सेक्टर छह भिलाई में तब मनोहर मेड़िकल स्टोर ही फेमस था. वहां पहुंचकर जैसे ही मैंने एनासिन मांगा, बंदर टोपी पहनकर बैठे हुए बूढ़े ने कहा- थोड़ा ठहरो...नाश्ता करने के बाद देता हूं. हम तो जब भी भूख लगती थीं शक्कर और रोटी खा लिया करते थे. पहली बार नाश्ते में किसी को बिस्किट खाते देख रहा था. एक छोटे से गिलास में चाय थीं और बूढ़ा एक-एक बिस्कुट को डूबा-डूबाकर खा रहा था. ग्लूकोज़ बिस्किट को खाने का अंदाज इतना प्यारा था कि पूछिए मत. बूढ़ा बिस्किट को आधा गीला करता और आधा हिस्सा सूखा रहने देता... और फिर झट से मुंह में डालकर मेरी तरफ ऐसे देखता जैसे मैं उसका बिस्किट लेकर भाग जाने वाला हूं. उसके चेहरे का भाव कुछ सवालिया भी था-क्यों बेटा कभी बाप जनम में बिस्किट खाया है ? नहीं खाया न ? बिस्किट का पूरा एक बड़ा पैकेट खत्म करने के बाद बूढ़े ने पूछा- अब बोलो क्या चाहिए. मैंने कहा- वहीं दे दो जो खा रहे थे.

घर आकर मैंने मां से कहा-एनासिन नहीं थीं, लेकिन मेडिकल वाले ने बताया कि ज्यादा भूखा रहने से भी सिर में दर्द उठता है.उसने बिस्किट खाने को कहा है. भाई को बिस्किट दे दे और दो बिस्किट मुझे भी देना...मेरे सिर में भी दर्द हो रहा है. दोस्तों... सब कुछ भूल सकता हूं लेकिन इस बिस्किट को नहीं भूल सकता. इस बिस्किट को खरीदने में मां के आंचल में बंधा हुआ चार आना-आठ आना काम आता रहा है. यह गब्बर का नहीं... मेरा अपना बिस्कुट है.

राजकुमार सोनी की फेसबुक वॉल से

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एल्युमिनियम वाली स्कूल की पेटी

एल्युमिनियम वाली स्कूल की पेटी अब तो स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए एक से बढ़कर बस्ते आ गए हैं लेकिन जब मैं स्कूल में था तब कुछ ठीक-ठाक कमाई-धमाई करने वाले पालक अपने बच्चों को एल्युमिनियम वाली पेटी देकर ही स्कूल भेजा करते थे. मेरे पास ऐसी पेटी नहीं थीं. यह पेटी हमेशा से गरीब बच्चों के बीच काम्पलेक्स पैदा करती रही है. जो बच्चा एल्युमिनियम वाली पेटी लेकर आता था सब उसकी इज्ज़त करते थे. उस बच्चे की पेटी में कुछ न अनोखा अवश्य होता था. पेटी खोलते ही भगवान की फोटो देखने को मिलती थीं.भगवान को प्रणाम करके ही पढ़ाई चालू होती थीं. हमें भी लगता कि साला... जब तक एल्युमिनियम वाली पेटी में कापी किताब को सुरक्षित नहीं रखा जाएगा तब तक होशियार नहीं बन सकते.

इस पेटी में और भी कई तरह की खासियत थीं.पेटी खूबसूरत दिखती थीं. पेटी में किताब और कापी को बरसात से बचाया जा सकता था. उन दिनों ठीक-ठाक बारिश होती थीं. पेटी को लेकर आने वाला बच्चा बाल कलाकार सचिन लगता था. अगर कोई लड़की पेटी लेकर आती थीं तो फिल्म दो कलिया की नीतू सिंह नजर आती थीं. हमारे पास पेटी नहीं थीं इसलिए हम खुद को मुकंदर का सिकंदर वाला मास्टर मयूर समझते थे और हर पेटी वाले को साब... और पेटी वाली को मेमसाब कहते थे.

तो भैया एक रोज आधी छुट्टी में एक पेटी वाले साब और पेटी वाली मेमसाब के बीच राड़ा हो गया. मतलब झगड़ा हो गया. दोनों भिंड गए. झगड़े की वजह बेहद छोटी थीं. किसी मास्टर राजू टाइप के बाल कलाकार ने नीतू सिंह और मास्टर सचिन की पेटी की जगह बदल दी थीं. दोनों ने पहले एक-दूसरे का बाल खींचा और फिर पेटी लेकर टूट पड़े. पेटियां आपस में टकराती रही. खूब टकराई.किसी ने जाकर गुरुजी को बता दिया. वे भागते हुए आए.भारत के हस्तक्षेप के बाद युद्ध थम गया लेकिन पहली बार पता चला कि पेटी युद्ध से सिर पर गुमड़ निकल जाता है और जिसके सिर पर गुमड़ निकल जाता है वह हारकर भी जीत जाता है और हारकर जीतने वाला बाजीगर कहलाता है.

इस युद्ध में मास्टर सचिन हार गए थे लेकिन दूसरे दिन वे अपनी झगडालू मां को लेकर स्कूल पहुंच गए तो जीत गए. सचिन की मां अपने साथ अपनी बड़ी बेटी को लेकर स्कूल पहुंची थीं.मां-बेटी ने स्कूल में जमकर कोहराम मचाया. सचिन की मां ने चंद्राकर गुरुजी से साफ-साफ कहा-अगर उसके बेटे को कुछ हुआ तो पूरे स्कूल की चटनी बनाकर रख देगी.

तीसरे दिन डरते-सहमते नीतू सिंह की मां माला सिन्हा ( फिल्म दो कलिया में नीतू सिंह की मां माला सिन्हा ही थी. )  पहुंची. सचमुच बहुत खूबसूरत थीं माला सिन्हा. अपने को लगा यार... जिसकी मां खूबसूरत है उसकी बेटी तो खूबसूरत होगी ही. बेटी खूबसूरत होगी तो बेटी की पेटी कैसे बेकार हो सकती है.

...... लेकिन बेटी के युद्ध में सक्रिय ढंग से भाग लेने और मास्टर सचिन के सिर पर गुमड़ निकाल देने की शिकायत के बाद बाद माला सिन्हा ने नीतू सिंह को झोला थमा दिया था.

हालांकि झोला भी खूबसूरत था , लेकिन पेटी...पेटी थीं.

राजकुमार सोनी की फेसबुक वॉल से 

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मरफी का रेडियो और ग्रामोफोन पर गाना सुनने वाला कुत्ता

इस पोस्ट के साथ जिन दो चित्रों को आप देख रहे हैं उन चित्रों से मुझे अब भी प्यार हैं. खुर्शीपार भिलाई के मुर्गी छाप मकान में रहने के दौरान पहली बार ग्रामोफोन को देखने का अवसर मिला था. मेरे पिता गाना सुनने और गाने के शौकीन थे सो बंबई जाकर ग्रामोफोन ले आए थे. सुबह नींद भी नहीं खुली थीं कि घर में गाना बजने लगा. जो गाना बजा उसके रिकार्ड पर खूबसूरत कुत्ते का चित्र था. गाने के बोल थे-चुन-चुन करती आई चिड़िया... दाल का दाना लाई चिड़िया..। बहुत बाद में जाकर पता चला कि इस गाने को रफी साहब ने फिल्म अब दिल्ली दूर नहीं के लिए गाया था.

पिताजी अल-सुबह घर के बाहर ग्रामोफोन में गाना लगा दिया करते थे. आसपास के लोग भी हमारे घर गाना सुनने के लिए इकट्ठे हो जाया करते थे. ग्रामोफोन पर गाना सुनने के लिए हाथ से घुमाकर चाबी भरनी पड़ती थीं और एक नुकीली पिन का भी इस्तेमाल करना होता था. जब रिकार्ड घूमता था तो तेजी के साथ कुत्ता भी घूमने लगता था. अब जरा गौर से इस कुत्ते के चेहरे का भाव देखिए. लगता है कि जैसे गाना सुनकर वह तृप्त हो उठा है.वैसे कई बार इस चित्र को देखकर यह ख्याल भी आता रहा हैं कि जब एक कुत्ता संगीत से प्रेम कर सकता है तो फिर मनुष्य कैसे भागता है. सचमुच वे लोग कैसे होते हैं जिनके जीवन में संगीत नहीं होता.

बहरहाल चित्र में ग्रामोफोन के साथ जो कुत्ता नजर आ रहा है उसका असली नाम निप्पर था.यह कुत्ता मुफलिसी में दिन गुजारने वाले चित्रकार फ्रासिंस बरोड़ का दोस्त था. एक रोज जैसे-तैसे वे भी ग्रामोफोन ले आए. वे जब भी ग्रामोफोन बजाते थे कुत्ता सामने आकर बैठ जाता था. अपने कुत्ते की इस आदत को उन्होंने चित्र बनाकर कैद कर लिया. थोड़े दिनों बाद इसी चित्र ने फ्रासिंस की मुफलिसी दूर की. चित्र को अच्छे-खासे पैसे देकर रिकार्ड बनाने वाली कंपनी एचएमवी ने खरीदा था. जो कुत्ता लंदन में फ्रासिंस के साथ रहता था वह देश-दुनिया के करोड़ों लोगों के बीच पहुंच गया था.

दूसरा चित्र उस बच्चे का है जो मरफी के रेड़ियो पर अंकित था. मरफी भी एक विदेशी कंपनी थी. जब मरफी का रेड़ियो बाजार में आया तो इसने रातों-रात धमाल मचा दिया था. हर कोई मरफी का रेडियो खरीदना चाहता था. बताते है कि पहली बार भारत में फिल्म अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने इस रेडियो के लिए विज्ञापन किया था. इस विज्ञापन में शर्मिला ने कहा था- अगर आप दीवाली मनाने जा रहे हैं तो अपने घर में मरफी रेडियो ले आइए. अभी हाल के दिनों में यह जानकारी मिली कि मरफी रेडियो पर जिस बच्चे का चित्र अंकित था उसका नाम डॉ. कग्यूर टी रिनपोचे ठाकुर है. रिनपोचे लंबे समय तक बौद्ध भिक्षु भी रहे और फिर एक रोज उन्होंने राम तेरी गंगा मैली में काम करने वाली फिल्म अभिनेत्री मंदाकिनी से शादी कर ली है. इस मरफी बच्चे की दो संतान है. एक पुत्र राबिल ठाकुर का सड़क हादसे में निधन हो गया जबकि पुत्री राबजी इनाया साथ में रहती है.

वैसे जब मरफी रेडियो बाजार में आया तब सभी लोग कहते थे कि रेडियो में जिस बच्चे का चित्र अंकित है वहीं असली मरफी है, लेकिन सच्चाई यह है कि इस रेडियो के जन्मदाता का नाम फ्रैंक मरफी था. एक बार किसी ने मुझे बता दिया कि मरफी बेबी और उसके बाप का पूरा पता रेडियो के अंदर ही मौजूद रहता है. बस...फिर क्या था हमने चाकू-छुरा लेकर  रेडियो का पुर्जा-पुर्जा खोल दिया. बड़े-बड़े वाल्ब देखकर दिमाग घूम गया. हमारी भयानक किस्म की छानबीन की जानकारी चुगलखोर भाई को लग गई और उसने होशियारी झाड़ते हुए पिता जी को अवैज्ञानिक ढंग से की गई पड़ताल की पूरी जानकारी दे दी. अब आप समझ ही गए होंगे कि मेरे साथ क्या हुआ होगा?

 राजकुमार सोनी की फेसबुक वॉल से 

 

 

 

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विद्या सिन्हा- अमोल पालेकर और... मैं

प्रोग्राम कृषि दर्शन के बाद अच्छी-खासी फिल्म चल रही थीं.फीचर फिल्म का शेष भाग प्रस्तुत होने ही वाला था, लेकिन ये क्या साला...तमाशा हो गया. टीवी पर झिलमिल-झिलमिल नजर आने लगा. आवाज सुनाई दे रही है मगर चेहरा नहीं दिख रहा है. थोड़ी देर में फिल्म के सभी पात्र हिलने भी लगे. जिस घर में टीवी देख रहा था वहां रहने वाली महिला ने अपने पति से कहा- सुबह चित्रहार के समय भी ऐसा हो गया था. लगता है फिर से एंटीना हिल गया है.पता नहीं कौन है बार-बार हमारा एंटीना हिला देता है. महिला के पति ने कहा- कोई नहीं हिलाता हैं.आंधी-तूफान से ऐसा हो जाता है.

ब्लैक एंड वाइट टीवी के जमाने में ऐसा हर घर में हुआ है. आज मैं आपको कोई नई कहानी बताने नहीं जा रहा बस...याद दिला रहा हूं. वैसे आप सबको यह किस्सा याद होगा ही.

सेक्टर छह भिलाई में रहने के दौरान हमारे ब्लाक में रहने वाले माथुर साहब पहली बार एक टीवी लेकर आए थे.जाहिर सी बात है माथुर साहब हमारी नजर में तोपचंद थे.वैसे उनके तोपचंद होने की एक वजह यह भी थीं कि उनकी सबसे बड़ी बेटी खूबसूरत थीं और वहीं एक लड़की थीं जो कालेज में पढ़ती थीं.

माथुर साहब की बेटी के साथ सबसे अच्छी बात यह थीं कि वह विद्या सिन्हा जैसी दिखती थीं और अपने बगीचे में घूम-घूमकर पढ़ती थीं.उन्हें इस तरह रटा मारते हुए देखकर हमारी स्ट्रीट का हर लड़का छत पर घूम-घूमकर रटा मारता था. जिस छत पर देखो रटामार लड़के नजर आते थे. कुछ तो ऐसे थे जो रहते दूसरी स्ट्रीट पर थे और रटा हमारे ब्लाक की छत पर आकर मारते थे. सच तो यह है कि साले रटा कम मारते थे और रटा मारने का एक्शन ज्यादा करते थे. हर कोई माथुर साहब की बेटी को इंप्रेस करने में लगे रहता था.

रटामार लड़कों से परेशान होकर माथुर साहब की लड़की ने जब घर से बाहर निकलना बंद कर दिया तब मेरी इंट्री हुई थीं. मैं माथुर साहब की लड़की से बहुत-बहुत छोटा था और राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर का ऋषि कपूर बनना भी नहीं चाहता था. मुझे नहाने का शौक है लेकिन किसी को नहाते हुए देखने का शौक कभी नहीं रहा. मैं तो अब भी कई बार नहाने के दौरान यह सोचने लगता हूं कि क्या मैं सचमुच नहाने के लिए ही इस दुनिया में आया हू. अगर ऐसा है तो मुझे सच में नहा लेना चाहिए.नहाते-नहाते खुद को गुम कर लेता हूं. दूसरों को कहां खोज पाता?

अपनी इंट्री का एक छोटा सा मकसद यही था कि यार किसी तरह रविवार को माथुर साहब के घर पर टीवी देखने का जुगाड़ जम जाए. एक रोज मामला जम गया. मुझे शरीफ समझकर माथुर साहब की लड़की ने बुलवाया. मैं भागते हुए पहुंचा तो खुले बाल वाली बड़ी सी लड़की ने कहा-सुनो...मेरा एक काम कर दोगे. मैंने कहा- सब कर दूंगा... बस आप मुझे टीवी देखने देना. मामला जम गया. अब हर रविवार को मैं माथुर साहब के घर का खास मेहमान होता था. इस खास मेहमान को हर रविवार एक लव लैटर मिलता था. यह लव लैटर जहां पहुंचाना होता था वहां पहुंचा दिया करता था. अब कहां पहुंचाता था यह मत पूछिए. बस...इतना जान लीजिए कि विद्या सिन्हा ने अपना अमोल पालेकर ढूढ़ लिया था. जिस अमोल पालेकर को हमारी विद्या सिन्हा ने पंसद किया था वह भी एक रटामार था, लेकिन जब मोहल्ले के सारे लड़के रटा मारकर निकल जाते थे तब साला अमोल पालेकर रटा मारने छत पर आया करता था. कई बार तो रात-रात भर रटा मारते रहता था. अब कोई दिन-रात मेहनत करेगा तो उसे विद्या नहीं तो क्या ललिता पवार मिलेगी? बंदे को मेहनत का फल मिला और मैं लैटर पहुंचाने की एवज में कुछ अच्छी फिल्में देख पाया. 

अब एक सस्पेंस और खोलता हूं. जब कभी भी माथुर साहब के घर टीवी झिलमिलाता तो एंटीना ठीक करने के लिए अमोल पालेकर ही आया करता था. बाकी जिन घरों में एंटीना हिल जाता था वहां शायद रुड़की विश्वविद्यालय के इंजीनियर आया करते थे. उनके आते ही तीन लोग सक्रिय हो जाते थे. एक घर के अंदर रहता था जो चिल्लाते रहता था- नहीं आया... नहीं आया...। छत के ऊपर कौवों को भगाने वाला- आया क्या... आया क्या...कहते रहता था. और दोनों के काम पर नजर रखने वाला एक तीसरा शख्स मात्र डायरेक्शन देते रहता था. हां इधर....हां उधर....। रुड़की विश्वविद्यालय के ये महान इंजीनियर जंग में फतह हासिल करने के बाद बकायदा चाय- नाश्ता भी करते थे और फिर जानी लीवर की तरह पतली गली पकड़कर निकल जाते थे.

( राजकुमार सोनी की फेसबुक वॉल से )

 

 

 

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लाइफबॉय हैं जहां तदुरुस्ती है वहां....

आज एक पोस्ट लाइफबॉय साबुन पर ( लेकिन इस पोस्ट के साथ हीे यह न समझा जाय कि मैंने मनियारी की कोई दुकान खोल ली है.) दरअसल यह सब बचपन की स्मृतियां हैं जिनसे गुजरना अच्छा लग रहा है.हो सकता है आप सबके भी कुछ अनुभव हो. अपने अनुभवों को यहां शेयर करना मत भूलिएगा. 

तो बात करते हैं लाइफबॉय साबुन की. जैसे ही फिल्म के परदे पर-लाइफबॉय है जहां तदुरुस्ती है वहां गीत बजता था...दिल खुशी से झूम उठता था. उन दिनों जो कोई भी लाइफबॉय से नहाता था उसके बारे में यह माना जाता था कि वह अमीर खानदान से है. लाइफबॉय से नहाने वाला अपना प्रचार भी खुद ही करता था. नहाने वाला सबको बताते रहता था-लाइफबॉय से नहाया हूं.... लाइफबॉय से नहाया हूं. जैसे लाइफबॉय से नहाकर कोई महान काम कर लिया हो.

हम पांच भाई थे तो पिताजी सभी भाइयों को हर पंद्रह दिन में आधा-आधा लाइफबॉय काटकर दे दिया करते थे. पता नहीं लाइफबॉय से तदुरुस्ती की रक्षा होती थीं या नहीं लेकिन हर भाई अपने हिस्से के लाइफबॉय की रक्षा अवश्य करता था. हर भाई एक-दूसरे की नजरों से अपने लाइफबॉय को छिपाकर रखता था. कोई जूतें के डिब्बे में छिपाता था तो कोई कनस्तर के नीचे. 

बड़े भइया नहाने के बाद एक घटिया से गमछे से बदन पौछते हुए छत पर चले जाते थे और वहां साबुन छिपाने के बाद सामने के ब्लाक में रहने वाली लड़की को देखकर जोर-जोर से गाते थे- तदुरुस्ती की रक्षा करता लाइफबॉय.लाइफबॉय है जहां तदुरुस्ती हैं वहां. उनके गाने को सुनकर कभी-कभी यह सोचने लगता था कि एक न एक दिन सामने वाली लड़की  हमारी छत पर दौड़ते हुए आएगी और भैया से गले लगकर बोलेंगी- मुझे तुम्हारे बदन की खूशबू परेशान कर देती है. मुझे नहीं मालूम था तुम भी लाइफबॉय से नहाते हो.     

मैं सोचता था दोनों अपने-अपने घर से भाग जाय और जहां कहीं भी रहे अपने-अपने लाइफबॉय से ही नहाए. अगर सचमुच ऐसा हो जाता तो मुझे नहाने के लिए भैया के हिस्से का भी लाइफबॉय मिल जाता. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया. भैया के रगड़-रगड़कर नहाने के बाद भी लड़की कभी हमारी छत पर नहीं आई. लगभग दो-तीन साल तक छत पर गायन विधा का कठिन अम्यास के बाद भी भैया सफल नहीं हुए. एक रोज पता चला कि लड़की कहीं चली गई हैं.शायद कम उम्र उसकी शादी कर दी गई थीं. भैया ने गाना बंद कर दिया था-लाइफबॉय हैं जहां तदुरुस्ती हैं वहां. लेकिन यह भी सच था कि भैया कुछ दिनों तक तदुरुस्त नहीं रहे.एक रोज मैंने उन्हें छत पर नया गाना गाते हुए सुना- जो ओके से नहाए...कमल सा खिल जाय...ओके नहाने का बड़ा साबुन.सामने के ब्लाक पर एक नई लड़की आ चुकी थीं. मुझे लगा कि भैया की जिंदगी पटरी पर आ जाएगी, लेकिन लड़की जब भी छत पर जाती तो सिर से जुएं निकालकर उनका काम-तमाम करते रहती.

इस पोस्ट के चित्र में जो सज्जन नहा रहे हैं उनका नाम मजहर खान है. मजहर खान लंबे समय तक जीनत अमान के पति थे. इस चित्र को देखकर यह भी याद आया कि पति-पत्नी दोनों को नहाने में मास्टरी हासिल थीं. दोनों ने हमें यह समझाया है कि चाहे झरने में नहाओ या तालाब में....। नहाने से शरीर स्वस्थ्य रहता है. अगर आप अब तक नहाने नहीं गए है तो जाइए और जाकर नहा लीजिए. और हां साबुन जो भी लगाइए....मगर गाकर देखिए- लाइफबॉय हैं जहां तदुरुस्ती है वहां....अच्छा लगेगा आपको.

(  राजकुमार सोनी की फेसबुक वॉल से )

 

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आई लव यू अफगान स्नो

बचपन में हम बोरीलीन चुपड़ते थे तो सेक्टर छह भिलाई के सड़क नंबर 22 के पड़ोस में रहने वाली एक लड़की अफगान स्नो चुपड़ती थीं. मेरे और उस लड़की के बीच इस बात को लेकर ही काम्पीटिशन चलते रहता था कि अफगान स्नो बेहतर है या बोरीलीन?

एक दिन लड़की जीत गई और यह साबित करने में सफल हो गई कि अफगान स्नो का कोई मुकाबला नहीं है. एक रोज लड़की दौड़ते हुए घर आई और आते ही उसने कहा- छूकर देख...छूकर देख...। वह मेरे दोनों हाथों को अपने गाल तक ले गई. मैंने कहा- अरे....हां...बाप रे...एकदम ठंडा है. काफी दिनों तक मैं उसके गाल छूकर यही चेक करते रहता था उसने अफगान स्नो लगाया है या नहीं. मैंने अपनी मां को भी बताया था कि लड़की के गाल ठंडे रहते हैं. मां ने हिदायत देते हुए कहा- जिस रोज तेरे बाप का जूता पड़ेगा न...सारी ठंडक निकल जाएगी. पिता के जूतों से बड़ा डर लगता था. उनका निशाना अचूक था. जहां से भी फेंकते थे साला...सिर पर ही लगता था. फिर भी मैं बच-बचाकर यह चेक कर लिया करता था कि लड़की ने अफगान स्नो लगाया है या नहीं? एक रोज मैंने लड़की से रिकवेस्ट की थीं कि वह मेरी बोरीलीन लगा लें और मैं उसका स्नो.मैं उसे बोरीलीन देता रहा और वह स्नो. इस तरह लंबे समय तक वस्तु विनिमय का क्रम चलता रहा. बीच-बीच में लड़की भी यह चेक करती थीं कि अफगान स्नो लगाने से मेरे गालों को ठंडक पहुंच रही है या नहीं ? बहुत बाद में जाकर पता चला कि अफगान स्नो एक फेमस स्नो था. उस जमाने में इस स्नो का विज्ञापन कई मशहूर हिरोइनों ने किया था. शायद आखिरी बार इस स्नो का विज्ञापन पदमिनी कोल्हापुरे ने किया था.

(  राजकुमार सोनी की फेसबुक वॉल से  )

 

 

 

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हल्बी- गोंडी तथा दोरली को भी राजभाषा बनाने चलेगा अभियान

रायपुर. हल्बी  गोंडी तथा दोरली  को भी छत्तीसगढ़ में  राजभाषा का दर्जा दिलाए जाने के लिए विगत कुछ दशकों से प्रयासरत  जनजातीय सरोकारों  की  मासिक पत्रिका के संपादक तथा आदिवासी शोध एवं कल्याण परिषद  के अध्यक्ष डॉ राजाराम त्रिपाठी का कहना है कि बस्तर क्षेत्र विश्व के कई देशों से बड़ा है, हम बस्तरिया लोगों की बोली भाषा परंपराएं ही हमारी पहचान है.हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा से द्वेष और आपत्ति नहीं है. हम तो छत्तीसगढ़ी भाषा को फलते फूलते देखकर खुश हैं, लेकिन हल्बी , गोंडी तथा दोरली  प्रदेश के एक बहुत बड़े भू- भाग में बोली जाने वाली मूल भाषा है इसलिए इन बोलियों को भी राजभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए.

राजाराम ने कहा कि इन दिनों यह तीनों  बोलियां बहुत ही तेजी से विलुप्त हो रही है और इसके साथ ही विलुप्त हो रहा है ,इन बोलियों में सन्निहित मानवजाति का कई सदियों का संजोया हुआ संचित विविध- ज्ञान, परंपरा संस्कृति ,साहित्य, लोक कथाएं, लोक गीत ,वनऔषधियों का ज्ञान, परंपरागत चिकित्सा ज्ञान ज्योतिषी ज्ञान तथा जलवायु , वनस्पतियों एवं जीव जंतुओं से संबंधित अनुभवजन्य ज्ञान. डॉक्टर त्रिपाठी ने कहा कि हम बस्तरिया , हर हाल में हल्बी , गोंडी तथा दोरली  बोलियों को इनका वास्तविक अधिकार दिला कर ही रहेंगे. जिस तरह झारखंड में 5 जनजातीय बोलियों को राजभाषा का दर्जा दिया गया है उसी प्रकार छत्तीसगढ़ में भी हल्बी तथा गोंडी एवं दोरली को भी राजभाषा का दर्जा दिया ही जाना चाहिए. उन्होंने बताया कि इसके लिए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित सभी उचित मंचों पर निवेदन पत्र भेजने का क्रम जारी है.  उन्होंने बताया कि आदिवासी शोध तथा कल्याण परिषद इस मुद्दे को लेकर हर स्तर पर जागरूकता फैलाने के काम में लगी हुई है। राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि वे लोगों से सहायता एवं सक्रिय सहयोग देने के लिए बस्तर तथा इन भाषा-भाषी क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों से भी अपील कर रहे हैं, कि वे अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से ऊपर उठकर बस्तर की जनजातीय परंपराओं ,बोली- भाषा आदि हमारी मूल पहचान की रक्षा के लिए आगे आएं तथा हमारा साथ दें. 

 

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मां ने की दूसरी शादी तो बेटे ने खुश होकर लिखी दिल को छू लेने वाली पोस्ट

 

तिरुअनंतपुरम अब तक तो मां और बाप ही बेटे-बेटियों की शादियों में शामिल होकर खुश होते रहे हैं लेकिन हाल के दिनों में केरल के तिरुअनंतपुरम के श्रीधर ने अपनी मां की दूसरी शादी पर एक भावुक पोस्ट लिखकर लोगों का दिल जीत लिया है.

 सोशल मीडिया पर इन दिनों एक पोस्ट जबरदस्त ढंग से वायरल हो रही है, अब तक इस पोस्ट को कई हजार लोग शेयर कर चुके हैं. यह पोस्ट एक बेटे ने अपनी मां की दूसरी शादी से खुश होकर लिखी है. लोगबाग बेटे के साथ—साथ उसकी मां के संघर्ष को भी सलाम कर रहे हैं.

मलयालम भाषा में फेसबुक पर गोकुल श्रीधर नाम के युवक ने यह पोस्ट लिखी है। मूल रूप से केरल के तिरुअनंतपुरम के श्रीधर ने लिखा है, ‘यह पोस्ट मेरी मां की दूसरी शादी के बारे में है। मैं यह पोस्ट एक ऐसे समय में लिख रहा हूं जबकि किसी महिला की दूसरी शादी की बात लोगों के गले में उतरती नहीं है. जबकि यह सोचने का बहुत अच्छा समय है और लोगों को इसे खुले मन से स्वीकार करना चाहिए. ’

गोकुल श्रीधर ने भावुकता से भरी इस पोस्ट में लिखा है, ‘मेरी मां ने अपनी पहली शादी के दौरान बहुत दुख झेले थे। उन्हें घोर शारीरिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। उन्होंने ये सब सिर्फ मेरी परवरिश के लिए सहा था, लेकिन अब वक्त आ गया मां अपने पुराने दुख दर्द को भूलकर नई जिंदगी की शुरूआत करे।’

गोकुल ने अपनी मां की दूसरी शादी पर खुशी व्यक्त करते हुए लिखा है“आज मेरे लिए बड़ा खुशी का दिन है और इससे बड़ी खुशी उसके लिए कोई नहीं हो सकती। एक महिला जिसने अपनी जिंदगी मेरे लिए कुर्बान कर दी। मेरे लिए उसने हर दर्द बर्दाश्त किया। कई बार मैंने उन्हें शारीरिक हिंसा के बाद उसके माथे पर से खून गिरते हुए देखा था। जब मैंने उनसे पूछा कि वह यह सब क्यों बर्दाश्त कर रही हैं, तो उनका जवाब होता था कि वह मेरे लिए सबकुछ सहन कर सकती हैं।”

गोकुल श्रीधर आगे लिखते हैं, ‘मेरी मां ने अपनी पूरी जवानी मेरे लिए कुर्बान कर दी, मगर अब उनके अपने बहुत सारे सपने हैं, जिन्हें पूरे करने का अवसर है। मेरे पास कहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि यह कुछ ऐसा है जिसे मुझे किसी से छुपाने की जरूरत नहीं है। मां! आपकी ये शादीशुदा दूसरी जिंदगी बहुत खुशहाल रहे।’

गोकुल श्रीधन के मुताबिक सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को लिखने से पहले उनके मन में एक झिझक थी, क्योंकि उन्हें लगता था कि लोग अपनी मां की दूसरी शादी के बारे में लिखी इस पोस्ट को सही तरीके से नहीं लेंगे, बल्कि अपमानित करेंगे। मगर लोगों ने गोकुल श्रीधर की इस पोस्ट को बहुत सराहा है और उनकी हिम्मत को दाद दी है कि उन्होंने अपनी मां की हिम्मत बढ़ाने का काम किया है।

गोकुल श्रीधर ने मां की दूसरी शादी के बारे में लिखी अपनी इस पोस्ट के साथ—साथ अपनी मां के दूसरे पति की फोटो भी शेयर की है। गोकुल ने भविष्य के लिए मां को बधाई देते हुए लिखा है, ‘मैं दुआ करता हूं कि आपकी वैवाहिक जिंदगी बहुत खुशहाल रहे।’

 

 

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'कानपूर वाले खुरानाज' के साथ नया कॉमेडी शो लेकर आ रहे हैं सुनील ग्रोवर

नई दिल्ली: लंबे समय से टीवी से कॉमेडी शो गायब थे लेकिन अब एक साथ दो शो लोगों को गुदगुदाने के लिए तैयार हैं. जहां कपिल शर्मा अपने शो का नया सीजन लेकर तैयार हैं. तो वहीं उनके पिछले शो के रिश्तेदार ही उन्हें टक्कर देने के लिए खड़े हो चुके हैं. जी हां अब कपिल की ऑन स्क्रीन दादी और बुआ के साथ सुनील ग्रोवर नया शो 

'कानपुर वाले खुरानाज' लेकर आ रहे हैं. सुनील और शो की टीम ने शूटिंग की तस्वीरों के साथ शो की जानकारी दी है. जाने माने कॉमेडियन और कपिल शर्मा के शो में डॉ. मशहूर गुलाटी का रोल करने वाले सुनील ग्रोवर नया शो लेकर आ रहे हैं. सुनील ग्रोवर ‘स्टार प्लस’ के नए शो ‘कानपुर वाले खुराना’ के साथ छोटे पर्दे पर वापसी करने को तैयार हैं. जबकि कुछ दिन पहले ही खबर आई थी कि वह कपिल के शो में एक बार फिर से नजर आने वाले हैं. लेकिन यह बात बाद में गलत साबित हुई थी. कॉमेडियन कीकू शारदा ने बताया था कि सुनील और कपिल की सुलह नहीं हुई है. 

जानकारी देते हुए सुनील ग्रोवर ने कहा कि शो के नये कॉन्सेप्ट ने उन्हें इसे करने के लिए प्रेरित किया. ग्रोवर ने एक बयान में कहा, 'मैं नए कॉन्सेप्ट के साथ छोटे पर्दे पर वापसी करने को लेकर खुश हूं. यह किरदार मेरे द्वारा पहले निभाए किरदारों से अलग है और मैं दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए इस सफर को शुरू करने को तैयार हूं.' वहीं अपने सोशल मीडिया एकाउंट से भी सुनील ग्रोवर ने इस शो के जल्द स्क्रीन पर आने की घोषणा की है. यह शो स्टार प्लस पर आएगा वहीं कपिल का शो सोनी एंटरटेनमेंट पर आने के लिए तैयार है हाल ही में सुनील ने सलमान खान की फिल्म 'भारत' की शूटिंग पूरी की है. इस शो में उनके साथ छोटे पर्दे पर नागिन के रोल से सुर्खियां बटोरने वाली अदा खान भी नजर आ सकती हैं. सुनील ग्रोवर के साथ जो कॉमेडी के स्टार्स नजर आने वाले हैं वह हैं अली असगर, सुगंधा मिश्रा, उपासना सिंह. इस शो का प्रसारण शनिवार को रविवार को होगा.

ऐसा होगा कंसेप्‍ट
इस टीवी शो के सेट से पहली फोटो भी सामने आ गई हैं. इस शो का कंसेप्‍ट कपिल शर्मा के शो से पूरी तरह अलग होगा. यह जीजा साली के कंसेप्‍ट पर आधारित शो होगा. इंस्‍टाग्राम पर जो तस्वीर आई है उसमें पूरी टीम काफी उत्साहित नजर आ रही है. तो अब देखना होगा कि दो कॉमेडी शो जब एक साथ दर्शकों के सामने आएंगे तो दर्शक किसे ज्यादा पसंद करते हैं. 

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