साहित्य

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नथमल शर्मा की तीन कविताएं

चिड़िया

 

देखो बहेलिया 

फिर आया है 

और

दाना डाल कर 

जाल बिछाया है 

पर इस बार तुम

दाने के लालच में न आओ 

और

सारा का सारा 

जाल लेकर ही उड़ जाओ ।

         

सफर

 

चारों तरफ हरियाली 

झरनों के बहने का शोर 

दूर तक दिखता 

बेहद साफ़ चमकता रास्ता 

पर सारा रास्ता 

और सारा जंगल बिलकुल सूनसान 

ख़त्म हो चुके 

जानवरों के अस्थि पंजर 

पांवों के निशान 

छोड़ते चले जा रहा था इंसान 

यह रास्ता कहां जाता है ?

 

इस प्यारी दुनिया में मगर

 

एक दिन जब

इस बहुत प्यारी दुनिया में 

बहुत प्यार करने वाले

नहीं रह जाएंगे 

तब तुम करोगे क्या 

प्यार करने की बात 

और प्यार न करने की चिंता 

मित्र रामकुमार की बात

जल में मगर के डर से

ज़्यादा भयावह है 

जल में मगर के न होने का डर

कहते तो ठीक है 

मित्र रामकुमार 

लेकिन सच कहना 

अब जल में मगर से 

डरते हैं क्या लोग  ?

अब तो लोग खुद ही 

मगर के और ज़्यादा 

करीब हो गए हैं 

और

दोस्ती के स्वांग से 

शुरू हुई दोस्ती को ही 

दोस्ती मान बैठे हैं 

पर

स्वांग तो कुछ देर ही सुहाता है 

और फ़िर 

दोस्ती का स्वांग करने वाले 

ये क्यों भूल रहे हैं कि 

मगर भी तो 

भूलने का स्वांग कर सकता है 

यानी

मित्र रामकुमार के

मगर के न होने के डर के साथ ही 

चिंता अब मगर को 

पहचानने की भी है ।

 - नथमल शर्मा  ( यहां प्रस्तुत कविताएं उनके संग्रह "उसकी आंखों में समुद्र ढूंढता रहा " से )

 -सप्रतिः बिलासपुर  मोबाइल- 9617166655

 

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अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पर भी कुछ डालो अरे ओ रोशनी वालों

अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रोशनी वालों 
बुरे हम हैं नहीं इतने, ज़रा देखो हमें भालो 
अरे ओ रोशनी वालों ... 

कफ़न से ओढ़ कर बैठे हैं, हम सपनों की लाशों को 
जो किस्मत ने दिखाए, देखते हैं उन तमाशों को 
हमें नफ़रत से मत देखो, ज़रा हम पर रहम खालो 
अरे ओ रोशनी वालों ... 

हमारे भी थे कुछ साथी, हमारे भी थे कुछ सपने 
सभी वो राह में छूटे, वो सब रूठे जो थे अपने 
जो रोते हैं कई दिन से, ज़रा उनको भी समझा लो 
अरे ओ रोशनी वालों ...

गीतकार- प्रदीप 

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पोस्टमार्टम की रिपोर्ट

गोली खाकर

एक के मुंह से निकला-
'राम'।

दूसरे के मुंह से निकला-
'माओ'

लेकिन
तीसरे के मुंह से निकला-
'आलू'

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे.

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

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कोरोना काल में प्रेम कविताएं

 विनोद विट्ठल 

(1)

बताया नहीं जा सकता 

कब हुआ 

कैसे हुआ 

किस छुअन से 

किस सांस से 

प्रेम से 

कितना मिलता-जुलता है यह ! 

 

(2) 

कितने ही लोग हैं 

जो हज़ारों साल से चल रहे हैं क्वॉरंटीन 

 

किसी स्पर्श के इंतज़ार में 

आख़िरी हग और चुम्बन के इंतज़ार में 

बराबर बंटी दुनिया के इंतज़ार में ! 

 

(3)

क्या कहूं इसे 

फ़िल्म की तरह वह लड़की मिली आख़िरी दृश्य में 

कोरोना की तरह 

ज़िंदगी में आई लड़की 

फिर मिली उस दिन 

जिस दिन सबसे ज़्यादा कोरोना के पेशेंट दर्ज हुए थे इस फ़ानी दुनिया में ! 

 

(4)

दो हिस्सों में बांटूंगा  दुनिया 

कोरोना से पहले और बाद की 

कितनी-कितनी चीज़ें आईं 

और फैलती चली गईं 

इसके संक्रमण की तरह :

हिंसा, लालच, घृणा , ईर्ष्या 

लेकिन प्रेम भी तो आया था इसी तरह 

चुपचाप, बेआवाज़ 

और अभी तक दुनिया संक्रमित भी है इससे ! 

(5) 

तज़ुर्बेकार कह रहे हैं -

कई-कई महामारियों और प्रलयों से बचा है मनुष्य 

इस बार भी बचेगा 

कैसे कहूं

ज़िंदा रहने के लिए केवल सांस नहीं साथ भी चाहिए 

उस सांवली लड़की का 

जो धरती पर आई थी कोरोना की ही तरह 

कोरोना से पहले ! 

(6)

छेद के बाहर से देखो 

कोरोना समेत लाखों वायरस कह रहे हैं -

मनुष्य भी एक ख़तरनाक वायरस है ! 

(7)

भीतर रहना बचाव है ,

अपनी स्कैच-बुक में 

सितार का स्कैच बनाता लड़का 

बरसों से जानता है ! 

(8)

सब-कुछ साफ़ हो जाए 

सारा कुछ निर्मल 

धरती न जाने कब से चाह रही है 

वायरसों से मुक्ति ! 

(9)

वेंटीलेटर और दवाइयां ही नहीं 

दिल भी बाँटो दुनिया में;

कहता जा रहा है कोरोना 

जिसे कोई नहीं सुन रहा है ! 

(10)

तीस साल पहले 

मैंने लगा दिया था मास्क कि न लूं कोई ख़ुशबू तुम्हारे सिवा 

न मिलाऊं किसी से हाथ तुम्हारे बाद 

भीतर रहते 

इतना सन्यस्त हो गया हूं  मैं 

कि दुनिया को देखे बिना जी रहा हूं.

इतने लम्बे क्वॉरंटीन के बाद भी 

नहीं मर रहा है ढाई अक्षर का वायरस ! 

 

 

 

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देश काग़ज़ पर बना नक़्शा नहीं होता!

यदि तुम्हारे घर के

 

एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।

देश काग़ज़ पर बना नक़्शा नहीं होता

कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाक़ी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है।

इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा कुछ भी नहीं है

न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
काग़ज़ पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और ज़मीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।

जो विवेक 

खड़ा हो लाशों को टेक

वह अंधा है
जो शासन
चल रहा हो बंदूक की नली से
हत्यारों का धंधा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है।

 

याद रखो 

एक बच्चे की हत्या

एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।

 

ऐसा ख़ून बहकर
धरती में जज़्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है।
जिस धरती पर
फ़ौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे ख़ून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो-
तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।

आख़िरी बात

बिल्कुल साफ़
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ़
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार।

- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 

 

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टार्च बेचने वाला !

- हरिशंकर परसाई

वह पहले चौराहों पर बिजली के टार्च बेचा करता था । बीच में कुछ दिन वह नहीं दिखा । कल फिर दिखा । मगर इस बार उसने दाढी बढा ली थी और लंबा कुरता पहन रखा था ।

मैंने पूछा, ” कहाँ रहे? और यह दाढी क्यों बढा रखी है? ”
उसने जवाब दिया, ” बाहर गया था । ”

दाढीवाले सवाल का उसने जवाब यह दिया कि दाढी पर हाथ फेरने लगा । मैंने कहा, ” आज तुम टार्च नहीं बेच रहे हो? ”
उसने कहा, ” वह काम बंद कर दिया । अब तो आत्मा के भीतर टार्च जल उठा है । ये ‘ सूरजछाप ‘ टार्च अब व्यर्थ मालूम होते हैं । ”

मैंने कहा, ” तुम शायद संन्यास ले रहे हो । जिसकी आत्मा में प्रकाश फैल जाता है, वह इसी तरह हरामखोरी पर उतर आता है । किससे दीक्षा ले आए? ”

मेरी बात से उसे पीडा हुई । उसने कहा, ” ऐसे कठोर वचन मत बोलिए । आत्मा सबकी एक है । मेरी आत्मा को चोट पहुँचाकर आप अपनी ही आत्मा को घायल कर रहे हैं । ”

मैंने कहा, ” यह सब तो ठीक है । मगर यह बताओ कि तुम एकाएक ऐसे कैसे हो गए? क्या बीवी ने तुम्हें त्याग दिया? क्या उधार मिलना बंद हो गया? क्या
हूकारों ने ज्यादा तंग करना शुरू कर दिया? क्या चोरी के मामले में फँस गए हो? आखिर बाहर का टार्च भीतर आत्मा में कैसे घुस गया? ”

उसने कहा, ” आपके सब अंदाज गलत हैं । ऐसा कुछ नहीं हुआ । एक घटना हो गई है, जिसने जीवन बदल दिया । उसे मैं गुप्त रखना चाहता हूँ । पर क्योंकि मैं आज ही यहाँ से दूर जा रहा हूँ, इसलिए आपको सारा किस्सा सुना देता हूँ । ” उसने बयान शुरू किया पाँच साल पहले की बात है । मैं अपने एक दोस्त के साथ हताश एक जगह बैठा था । हमारे सामने आसमान को छूता हुआ एक सवाल खड़ा था । वह सवाल था – ‘ पैसा कैसे पैदा करें?’ हम दोनों ने उस सवाल की एक-एक टाँग पकड़ी और उसे हटाने की कोशिश करने लगे । हमें पसीना आ गया, पर सवाल हिला भी नहीं । दोस्त ने कहा – ” यार, इस सवाल के पाँव जमीन में गहरे गड़े हैं । यह उखडेगा नहीं । इसे टाल जाएँ । ”
हमने दूसरी तरफ मुँह कर लिया । पर वह सवाल फिर हमारे सामने आकर खडा हो गया । तब मैंने कहा – ” यार, यह सवाल टलेगा नहीं । चलो, इसे हल ही कर दें । पैसा पैदा करने के लिए कुछ काम- धंधा करें । हम इसी वक्त अलग- अलग दिशाओं में अपनी- अपनी किस्मत आजमाने निकल पड़े । पाँच साल बाद ठीक इसी तारीख को इसी वक्त हम यहाँ मिलें । ”

दोस्त ने कहा – ” यार, साथ ही क्यों न चलें? ”
मैंने कहा – ” नहीं । किस्मत आजमानेवालों की जितनी पुरानी कथाएँ मैंने पढ़ी हैं, सबमें वे अलग अलग दिशा में जाते हैं । साथ जाने में किस्मतों के टकराकर टूटने का डर रहता है । ”

तो साहब, हम अलग-अलग चल पडे । मैंने टार्च बेचने का धंधा शुरू कर दिया । चौराहे पर या मैदान में लोगों को इकु कर लेता और बहुत नाटकीय ढंग से कहता – ” आजकल सब जगह अँधेरा छाया रहता है । रातें बेहद काली होती हैं। अपना ही हाथ नहीं सूझता । आदमी को रास्ता नहीं दिखता । वह भटक जाता है । उसके पाँव काँटों से बिंध जाते हैं, वह गिरता है और उसके घुटने लहूलुहान हो जाते हैं। उसके आसपास भयानक अँधेराहै । शेर और चीते चारों तरफ धूम रहे हैं, साँप जमीन पर रेंग रहे हैं । अँधेरा सबको निगल रहा है । अँधेरा घर में भी है । आदमी रात को पेशाब करने उठता है और साँप पर उसका पाँव पड़ जाता है । साँप उसे डँस लेता है और वह मर जाता है। ” आपने तो देखा ही है साहब, कि लोग मेरी बातें सुनकर कैसे डर जाते थे । भरदोपहर में वे अँधेरे के डर से काँपने लगते थे । आदमी को डराना कितना आसान है!
लोग डर जाते, तब मैं कहता – ” भाइयों, यह सही है कि अँधेरा है, मगर प्रकाश भी है । वही प्रकाश मैं आपको देने आया हूँ । हमारी ‘ सूरज छाप ‘ टार्च में वह प्रकाश है, जो अंधकार को दूर भगा देता है । इसी वक्त ‘ सूरज छाप ‘ टार्च खरीदो और अँधेरे को दूर करो । जिन भाइयों को चाहिए, हाथ ऊँचा करें । ”

साहब, मेरे टार्च बिक जाते और मैं मजे में जिंदगी गुजरने लगा ।

वायदे के मुताबिक ठीक पाँच साल बाद मैं उस जगह पहुँचा, जहाँ मुझे दोस्त से मिलना था । वहाँ दिन भर मैंने उसकी राह देखी, वह नहीं आया । क्या हुआ? क्या वह भूल गया? या अब वह इस असार संसार में ही नहीं है?मैं उसे ढूंढ़ने निकल पडा ।

एक शाम जब मैं एक शहर की सडक पर चला जा रहा था, मैंने देखा कि पास के मैदान में खुब रोशनी है और एक तरफ मंच सजा है । लाउडस्पीकर लगे हैं । मैदान में हजारों नर-नारी श्रद्धा से झुके बैठे हैं । मंच पर सुंदर रेशमी वस्त्रों से सजे एक भव्य पुरुष बैठे हैं । वे खुब पुष्ट हैं, सँवारी हुई लंबी दाढी है और पीठ पर लहराते लंबे केश हैं ।
मैं भीड के एक कोने में जाकर बैठ गया ।

भव्य पुरुष फिल्मों के संत लग रहे थे । उन्होंने गुरुगभीर वाणी में प्रवचन शुरू किया । वे इस तरह बोल रहे थे जैसे आकाश के किसी कोने से कोई रहस्यमय संदेश उनके कान में सुनाई पड़ रहा है जिसे वे भाषण दे रहे हैं ।

वे कह रहे थे – ” मैं आज मनुष्य को एक घने अंधकार में देख रहा हूँ । उसके भीतर कुछ बुझ गया है । यह युग ही अंधकारमय है । यह सर्वग्राही अंधकार संपूर्ण विश्व को अपने उदर में छिपाए है । आज मनुष्य इस अंधकार से घबरा उठा है । वहपथभ्रष्ट हो गया है । आज आत्मा में भी अंधकार है । अंतर की आँखें ज्योतिहीन हो गई हैं । वे उसे भेद नहीं पातीं । मानव- आत्मा अंधकार में घुटती है । मैं देख रहा हूँ, मनुष्य की आत्मा भय और पीड़ा से त्रस्त है । ”
इसी तरह वे बोलते गए और लोग स्तव्य सुनते गए ।

मुझे हँसी छूट रही थी । एकदो बार दबातेदबाते भी हँसी फूट गई और पास के श्रोताओं ने मुझे डाँटा ।

भव्य पुरुष प्रवचन के अंत पर पहुँचते हुए कहने लगे – ” भाइयों और बहनों, डरो मत । जहाँ अंधकार है, वहीं प्रकाश है । अंधकार में प्रकाश की किरण है, जैसे प्रकाश में अंधकार की किंचित कालिमा है । प्रकाश भी है । प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो । अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ । मैं तुम सबका उस ज्योति को जगाने के लिए आहान करता हूँ । मैं तुम्हारे भीतर वही शाश्वत ज्योति को जगाना चाहता हूँ । हमारे ‘ साधना मंदिर ‘ में आकर उस ज्योति को अपने भीतर जगाओ । ” साहब, अब तो मैं खिलखिलाकर हँस पडा । पास के लोगों ने मुझे धक्का देकर भगा दिया । मैं मंच के पास जाकर खडा हो गया ।

भव्य पुरुष मंच से उतरकर कार पर चढ रहे थे । मैंने उन्हें ध्यान से पास से देखा । उनकी दाढी बढी हुई थी, इसलिए मैं थोडा झिझका । पर मेरी तो दाढी नहीं थी । मैं तो उसी मौलिक रूप में था । उन्होंने मुझे पहचान लिया । बोले – ” अरे तुम! ” मैं पहचानकर बोलने ही वाला था कि उन्होंने मुझे हाथ पकड़कर कार में बिठा लिया । मैं फिर कुछ बोलने लगा तो उन्होंने कहा – ” बँगले तक कोई बातचीत नहीं होगी । वहीं ज्ञानचर्चा होगी । ”
मुझे याद आ गया कि वहाँ ड्राइवर है ।

बँगले पर पहुँचकर मैंने उसका ठाठ देखा । उस वैभव को देखकर मैं थोडा झिझका, पर तुरंत ही मैंने अपने उस दोस्त से खुलकर बातें शुरू कर दीं ।
मैंने कहा – ” यार, तू तो बिलकुल बदल गया । ”

उसने गंभीरता से कहा – ” परिवर्तन जीवन का अनंत क्रम है । ”
मैंने कहा – ” साले, फिलासफी मत बघार यह बता कि तूने इतनी दौलत कैसे कमा ली पाँच सालों में? ”
उसने पूछा – ” तुम इन सालों में क्या करते रहे? ”
मैंने कहा ” मैं तो धूममूमकर टार्च बेचता रहा । सच बता, क्या तू भी टार्च का व्यापारी है? ”
उसने कहा – ” तुझे क्या ऐसा ही लगता है? क्यों लगता है? ”

मैंने उसे बताया कि जो बातें मैं कहता हूँ; वही तू कह रहा था मैं सीधे ढंग से कहता हूँ, तू उन्हीं बातों को रहस्यमय ढंग से कहता है । अँधेरे का डर दिखाकर लोगों को टार्च बेचता हूँ । तू भी अभी लोगों को अँधेरे का डर दिखा रहा था, तू भी जरूर टार्च बेचता है ।

उसने कहा – ” तुम मुझे नहीं जानते, मैं टार्च क्यों बेचूगा! मैं साधु, दार्शनिक और संत कहलाता हूँ । ”

मैंने कहा ” तुम कुछ भी कहलाओ, बेचते तुम टार्च हो । तुम्हारे और मेरे प्रवचन एक जैसे हैं । चाहे कोई दार्शनिक बने, संत बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अँधेरे का डर दिखाता है, तो जरूर अपनी कंपनी का टार्च बेचना चाहता है । तुम जैसे लोगों के लिए हमेशा ही अंधकार छाया रहता है । बताओ, तुम्हारे जैसे किसी आदमी ने हजारों में कभी भी यह कहा है कि आज दुनिया में प्रकाश फैला है? कभी नहीं कहा । क्यों? इसलिए कि उन्हें अपनी कंपनी का टार्च बेचना है । मैं खुद भरदोपहर में लोगों से कहता हूँ कि अंधकार छाया है । बता किस कंपनी का टार्च बेचता है? ”

मेरी बातों ने उसे ठिकाने पर ला दिया था । उसने सहज ढंग से कहा – ” तेरी बात ठीक ही है । मेरी कंपनी नयी नहीं है, सनातन है । ”
मैंने पूछा – ” कहाँ है तेरी दुकान? नमूने के लिए एकाध टार्च तो दिखा । ‘ सूरज छाप ‘ टार्च से बहुत ज्यादा बिक्री है उसकी ।

उसने कहा – ” उस टार्च की कोई दुकान बाजार में नहीं है । वह बहुत सूक्ष्म है । मगर कीमत उसकी बहुत मिल जाती है । तू एक-दो दिन रह, तो मैं तुझे सब समझा देता हूँ । ”
” तो साहब मैं दो दिन उसके पास रहा । तीसरे दिन ‘ सूरज छाप ‘ टार्च की पेटी को नदी में फेंककर नया काम शुरू कर दिया । ”
वह अपनी दाढी पर हाथ फेरने लगा । बोला – ” बस, एक महीने की देर और है। ” मैंने पूछा -‘ तो अब कौन-सा धंधा करोगे? ”
उसने कहा – ” धंधा वही करूँगा, यानी टार्च बेचूँगा । बस कंपनी बदल रहा हूँ । ”

 

 

 

 

 

 

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योगिनी राउल की कविता- जमूरे

जमूरे..

जमूरे खाना खायेगा?

खायेगा

कब खायेगा?

दो दिन के बाद कोई खिलायेगा तो खायेगा !

जमूरे दवा पियेगा?

पियेगा

कब पियेगा?

लाइन में नंबर आयेगा, तब पियेगा !

 

जमूरे आज पानी पिया?

पियेगा

कब पियेगा?

रात को टंकर आयेगा, 

भर के पानी लायेगा,

टंकी में डालेगा,

घर का बाल्टी भरेगा,

बूढ़े को पिलायेगा

बच्चे को पिलायेगा...

तब मैं पानी पियेगा !

बहोत खूब जमूरे !

 

जमूरे

तेरा पेट दिखा...

देख लो !

अरेरे... खाली है !

भरेगा, आज नहीं तो कल !

बहोत खूब जमुरे !

 

अब सीना दिखा....

देख लो

फूला के दिखा...

देख लो

और फूलाओ

ये लो

लंबी सांस ले कर फूला...

प्राणायाम कर के फूला...

अब देखो, जमूरे का सीना !

छप्पन इंच से थोडा कम.

जमूरे पेट भूल जा,

सीना तान के चल !

बहोत खूब जमूरे !

 

जमूरे नया खेल खेलेगा?

खेलेगा !

पुलिस को फंसायेगा?

फंसायेगा !

हकीम को मारेगा?

मारेगा !

दुश्मन को गाली देगा?

जोर से देगा !

सीना तान के गाली देगा?

सीना तान के देगा !

 

चल जमूरे

बजा ताली, दे दे गाली

बजा ढोलक, बजा थाली....

बजाव घंटा, दिखाव ठेंगा !

सब बजायेगा, ढोल पिटेगा!

बहोत खूब !

 

जमूरे... दीया जलायेगा?

जलायेगा !

कहां जलायेगा?

घर में जलायेगा !

अरे अकल के कच्चे...

घर में नहीं,

फिर???

घर को बंद कर के 

और कहां जलायेगा?

सब के मुंह पे जलायेगा

सब का मुंह लाल करेगा

जग में मुंह काला करेगा !

 

शाबाश जमूरे...

तू ही मेरा असली पंटर है....

मैं नचावू

तू नाचेगा?

 

नाचेगा... अभी नाचेगा !

इतवार को नाचेगा

सोमवार को नाचेगा !

नंगा नाचेगा, चंगा नाचेगा !

जमूरा तो रोज नाचेगा !

 

- योगिनी राउल

 

 

 

 

 

 

 

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हे राम ! और दूसरा बनवास

हे राम !

हे राम,

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकाव्य !
तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर - लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है।

इससे बड़ा क्या हो सकता है

हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
'मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं
चुनाव का डंका है !

हे राम, कहां यह समय

कहां  तुम्हारा त्रेता युग,
कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
और कहां यह नेता-युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुराण - किसी धर्मग्रंथ में
सकुशल सपत्नीक...
अबके जंगल वो जंगल नहीं

 जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक ! 

- कुंवरनारायण

 

दूसरा बनवास

बनवास से जब लौटकर घर में आये

याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये
रक्से-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये

धर्म क्या उनका है, क्या जात है ये जानता कौन
घर ना जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये

शाकाहारी हैं मेरे दोस्त, तुम्हारे ख़ंजर
तुमने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आये

पांव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे
कि नज़र आये वहां ख़ून के गहरे धब्बे
पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फज़ा आई नहीं रास मुझे
छह दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे

- कैफी आजमी 

 

 

 

 

 

 

 

 

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नरेश सक्सेना की कविता- भूख

भूख

भूख सबसे पहले दिमाग़ खाती है
उसके बाद आँखें
फिर जिस्म में बाक़ी बची चीज़ों को

छोड़ती कुछ भी नहीं है भूख
वह रिश्तों को खाती है
माँ का हो बहन या बच्चों का

बच्चे तो उसे बेहद पसन्द हैं
जिन्हें वह सबसे पहले
और बड़ी तेज़ी से खाती है

बच्चों के बाद फिर बचता ही क्या है?

 
नरेश सक्सेना
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भात दे हरामजादे

बांग्ला देश के कवि रफीक आजाद ने यह कविता तब लिखी थीं जब अकाल पड़ा था. इस कविता को लेकर कई नाटक खेले गए हैं. जब-जब यहां-वहां किसी भी देश में कोई गरीब भूख का शिकार होता है तब-तब यह कविता सड़ी-गली व्यवस्था का सीना चीरने के लिए बाहर आ जाती है. फिलहाल सोशल मीडिया में लोग इस कविता को खूब वायरल कर रहे हैं. अपनी सुविधाओं की रजाई को महत्वपूर्ण मानने वाले लोग कृपया इस कविता को न पढ़े.

 

बेहद भूखा हूं

पेट में , शरीर की पूरी परिधि में

महसूसता हूं हर पल ,सब कुछ निगल जाने वाली एक भूख .

बिना बरसात के ज्यों चैत की फसलों वाली खेतों में

जल उठती है भयानक आग

ठीक वैसी ही आग से जलता है पूरा शरीर .

महज दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिले , बस और कोई मांग नहीं है मेरी .

लोग तो न जाने क्या क्या मांग लेते हैं . वैसे सभी मांगते है

मकान गाड़ी , रूपए पैसे , कुछेक में प्रसिद्धि का लोभ भी है.

पर मेरी तो बस एक छोटी सी मांग है , भूख से जला जाता है पेट का प्रांतर

भात चाहिए , यह मेरी सीधी सरल सी मांग है , ठंडा हो या गरम

महीन हो या खासा मोटा या राशन में मिलने वाले लाल चावल का बना भात ,

कोई शिकायत नहीं होगी मुझे ,एक मिटटी का सकोरा भरा भात चाहिए मुझे .

 

दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिल जाय तो मैं अपनी समस्त मांगों से मुंह फ़ेर लूंगा.

अकारण मुझे किसी चीज़ का लालच नहीं है, यहां तक की यौन क्षुधा भी नहीं है मुझ में

मैं तो नहीं चाहता नाभि के नीचे साड़ी बाधने वाली साड़ी की मालकिन को

उसे जो चाहते है ले जाएं. जिसे मर्ज़ी उसे दे दो .

ये जान लो कि मुझे इन सब की कोई जरुरत नहीं

पर अगर पूरी न कर सको मेरी इत्ती सी मांग

तुम्हारे पूरे मुल्क में बवाल मच जाएगा.

भूखे के पास नहीं होता है कुछ भला बुरा कायदा कानून

सामने जो कुछ मिलेगा खा जाऊंगा बिना किसी रोक-टोक के

बचेगा कुछ भी नहीं , सब कुछ स्वाहा हो जायेगा निवालों के साथ

और मान लो गर पड़ जाओ तुम मेरे सामने

राक्षसी भूख के लिए परम स्वादिष्ट भोज्य बन जाओगे तुम .

सब कुछ निगल लेने वाली महज़ भात की भूख

खतरनाक नतीजों को साथ लेकर आने को न्योतती है

दृश्य से द्रष्टा तक की प्रवहमानता को चट कर जाती है .

और अंत में सिलसिलेवार मैं खाऊंगा पेड़ पौधें , नदी नालें

गांव-देहात , फुटपाथ, गंदे नाली का बहाव

सड़क पर चलते राहगीरों , नितम्बिनी नारियों

झंडा ऊंचा किए खाद्य मंत्री और मंत्री की गाड़ी

आज मेरी भूख के सामने कुछ भी न खाने लायक नहीं

भात दे हरामजादे... वर्ना मैं चबा जाऊंगा समूचा मानचित्र

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आलोक वर्मा की कविता- चले- चलो...

चले- चलो

चले-चलो
चले-चलो
पच्चास मील चलो
सौ मील चलो
दो सौ मील चलो
पांच सौ मील चलो
अंतहीन चलो
चले-चलो...

चले-चलो
भूखे पेट चलो
पानी पीकर चलो
बिन पानी प्यासे चलो
धूल पीकर चलो
चले-चलो... चले-चलो.....

थक जाओ तो चलो
सड़कों पर तपती दुपहरी
थोड़ा सुस्ताकर चलो
नींद में उनींदे चलो
सिर चकराए तो चलो
गिर जाओ तो उठकर चलो
खांसी-बुखार में चलो
चले-चलो...चले-चलो.....

बोझे उठाकर चलो
रोते बच्चों के साथ चलो
गुजर जाए अपना बीच राह
तो छोड़कर रोते हुए चलो
चले चलो... चले चलो.....

चले चलो कि अभी
प्रधानजी ने चलवाया है
चले-चलो कि नगरों में नहीं है
तुम्हारे लिए कोई जगह
चले-चलो कि ये जमीं
तुम्हारी नहीं है.

ये आसमा भी तुम्हारा नहीं है
नहीं हैं यहां तुम्हारे कोई सपने न अपने
तो यहां उदास होकर भी रोते चलो
जी जरा सम्भालकर चलो
चले-चलो...चले-चलो.....

चले-चलो कि
अब भी तुम्हारे हैं दोनों पांव
दोनों हाथ भी तुम्हारे हैं
खोदना है इन्ही हाथों से कुआं और
पाना है मीठा पानी
उगानी हैं हरी सब्जियां और अन्न
फिर उठाकर इन्ही हाथों को
मांगने हैं इसी दुनिया मे                  
न मिले सवालों के जवाब
अभी फिलहाल बस चले-चलो
कि मंजिल अभी बहुत दूर है         
मेरे अपनो मेरे लोगों
चले-चलो... चले-चलो....

संपर्क- 98266 74614

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रात आठ वाला मूरख

पूरी दुनिया जब कोरोना का टेस्ट कर रही थी तब हिंदू राष्ट्र में मजदूरों का सामूहिक सैनिटाइजर स्नान करवाया जा रहा था. आदमी आदमी नहीं रहा चूहा बिल्ली बना दिया गया था कि डीडीटी का छिडकाव कर दो तब घर में आ पाएंगे.

जो लोग शुद्धता के इस स्नान से बच पाए उनके माथे पर लिख दिया गया कि मैंने लॉकडाउन तोड़ा है. माथे पर ये तमगा लेकर जब मज़दूर घर को लौटे तो उन्हें डियर लीडर के मन की बात सुननी पड़ी ताकि शुद्धिकरण पूरा हो सके. अमिताभ बच्चन के हाथ पर जब किसी ने लिख दिया था कि मेरा बाप चोर है तो अमिताभ बच्चन ने सोने के बिस्कुटों की तस्करी थी. जिनके माथे पर कोरोना लिखा गया वो बंबई दिल्ली से तस्करी कर के पोटलियों में आटा चावल ला रहे थे जो सैनिटाइजर में भीग कर खाने लायक नहीं रहा था.

ये सब हमारे और हम सब के प्रिय द ग्रेट लीडर के नेतृत्व में ही संभव था.

यूं तो उनके नेतृ्त्व में क्या क्या कमाल नहीं हुए और हम अगर जी गए तो आगे भी देखते ही रहेंगे. मसलन महान पार्टी के एक छुठभैये से सांसद ने कहा कि जो लॉकडाउन को न माने उसे गोली मार दी जाए. मेरा मानना है कि इस नेता को भारत रत्न दिया जाना चाहिए.

उधर गुजरात के नवादा में फंसे कुछ मजदूरों ने एसपी को फोन कर के गालियां दी ताकि वो जेल भेजे जाएं तो वहां खाना पानी मिल सके.आवश्यकता को आविष्कार की जननी ऐसे ही नहीं कहा गया है शास्त्रों में.

शास्त्रों से याद आया कि ब्राम्हणों ने घोषणा की है कि छूआछूत को पुनश्च लागू किया जाए क्योंकि कोरोना के खिलाफ एकमात्र रामबाण दवा हिंदू बामनों को ही पता थी वो भी तीन हजार साल पहले और इसी क्रम में छूआछूत की परंपरा शुरू हुई थी.

इस तरह से लॉकडाउन के तीसरे या चौथे दिन जब लाखों लोग पलायन करने लगे तो उनसे पूछा गया कि तुम सब लोग ऐसे क्यों जा रहे हो तो एक बुद्धिमान मजदूर ने बताया कि चूंकि अब तो रामायण में राम भी सीता को लेकर जंगल जाने ही वाले होंगे तो हम लोगों ने भी सोचा कि जंगल में भगवान राम से मिलने के लिए हम लोग थोड़ा पहले ही अपने घरों से निकल जाएं.

इस बीच भगवान राम टीवी पर अपने महल से निकले औऱ रास्ते में एक योगी महाराज ने उन्हें मंदिर में बिठा दिया और कहा कि अब यही आपका घर है जहां भव्य मंदिर बनेगा. राम कहते रह गए कि सीरियल आगे बढ़ना है लेकिन योगी महाराज माने नहीं.

आगे रामायण में क्या हुआ ये मुझे पता नहीं क्योंकि पता चला है कि दिल्ली की सड़कों पर मनुष्यों को नदारद पाकर सारी वानर सेना लंका से लौट कर दिल्ली के मंत्रालयों पर कब्जा कर चुकी है. वानरों ने शासन अपने हाथ में ले लिया है. उनकी टेबलों पर पेन और पैड देखे जा सकते हैं जहां वो एक डायनासोर से निर्देश प्राप्त कर रहे हैं.

निर्देश मिलने के बाद उन्होंने विभिन्न माध्यमों पर सबसे पहला काम दिल्ली की सरकार को गरियाने का किया जो लाजिमी था. इन गालियों के जवाब में केजरीवाल ने गीता पाठ करने की सलाह दी और कहा कि वो खुद भी यही कर रहे हैं.

गीता से याद आया कि गीता में लिखा हुआ है कि कर्म करते रहो फल की चिंता मत करो. इसलिए मैंने इसे मानते हुए लिखने का अपना कर्म किया. अब इस पर गाली आएगी तो मैं उसकी चिंता नहीं करूंगा. उन्हें बिना पढ़े डिलीट करूंगा.

Jey Sushil की वाल से...

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हरिओम राजोरिया की तीन कविता- आठ बजे, लाठी और अपरिचय

हरिओम राजोरिया

 

।। आठ बजे ।।

आठ बजने का मतलब क्या है

रोज ही बजते हैं आठ

अभी रात के तीन बजे है 

अभी सुबह के आठ बज जाएंगे.

 

एक रोग के वायरस की पूर्व पीठिका को 

प्रतीदिन आठ बजे याद कीजिये

ठीक से सावधानियों का पालन कीजिये

माननीय को पूरी गम्भीरता से लीजिये

आठ बजे का इंतजार कीजिये 

और

धीरे से आठ को बज ही जाने दीजिये

 

नींद न आये तो आठ बजे से ही

नींद का इंतजार कीजिये

रात के आठ और दिन के आठ का

फर्क करना भूल जाइये

कांख में दबीं घोषणाओं का 

आदर कीजिये तनिक सम्मान दीजिये

आठ बजे की स्मृति में कोई गीत लिखिए

आठ को आठ की तरह देखने का

प्रतिदिन सघन अभ्यास कीजिये

 

चाहो तो आप भी अपने

मन की बात मन में कर सकते हो

आठ बजे अपना पक्ष रखिये

सुबह आठ तक कल्पनाओं के पंख फैलाइये

सिर दर्द को मत रोइये

लाल-लाल आंखों को पानी से धोइये

रात आठ से सोचना शुरू कीजिये

सुबह आठ तक सो जाइये

बाकी अपना ध्यान रखिये

 

मेहनत-मजूरी करने वाले लाखों लोग 

अभी रास्ते में हैं 

उन्हें रास्ते में ही रहने दीजिये

शुक्र मनाइये ऊपर वाले का 

आप रास्ते में नहीं  घर में हैं

आपके पैरों में छाले नहीं 

न पिंडलियों पर पुलिस की लाठियों के नील 

इतने छोटे जीवन में सुबह आठ बजे

आप अपने हाथ की बनी चाय पी रहे हैं

आपके सामने न पहाड़ सा रास्ता है

न ही पहाड़ सा इंतजार

चैन से आठ को बज ही जाने दीजिये

 

सुबह आठ के बाद अब 

रात के आठ की तो बात ही मत कीजिये ।

 

 

 

।। लाठी ।।

 

लाठियां बजाने पर भी 

कविता होनी चाहिए

कहाँ-कहाँ बजी लाठी

किस-किस पर बजी 

देश भर में बजी 

गरीब-गुरबों पर बजती आई है

गरीब -गुरबों पर ही बजी 

 

दौड़ा-दौड़ा कर बजी

मुर्गा बनाकर बजी

जमीन पर लिटाकर बजी

देखने वाले तक की रूह कांप गई

ऐसी जबर लहरा के बजी

 

पीटने वाले को सम्मान मिला

पिटने वाले को बदले में ज्ञान मिला

धीरे-धीरे हुआ इस परंपरा का विकास 

देश भर में हुआ लाठी का प्रकाश 

विश्वविद्यलय लाठियो पर जाकर टंग गए

रोग से लड़ रहे नागरिकों के

रास्ते में आ गईं लाठियां

निर्दोष नागरिकों की पीठ पर जब बरसीं 

तो इतिहास बन गईं लाठिया

 

नागरिक समाज लाठियों के नीचे दबा था

लठ्ठम लट्ठ का हुआ नाच 

लाठियां स्वर लहरियों पर थिरकीं

कला - संस्कृति के रास्तों पर 

लगा दिया गया लाठियों का पहरा 

पिटाई की प्रस्तुतियों का हुआ भव्य आयोजन 

हास्य अभिनेताओं की भी विषयवस्तु बनीं लाठियां

 

देश भर में हुआ लाठी युग का आगाज

नागरिक होने का जमकर हुआ उपहास

चालाकी से लाठी को मिला सम्मान

सत्ता की मक्कारी का 

लाठी ही थी एक बड़ा प्रमाण 

साधारण घरों के लोग थे पीटने वाले

साधारण घरों के नागरिक थे पिटने वाले

 

लाठियों की मार ने रच दिया इतिहास 

लाठियों की कलंक कथाओं पर

मीडिया हाऊसों का रहा बायकाट

सरकार में कुछ लोग बोले कि

जरूरी हो जाता है ऐसा करना

मजबूर और परेशान लोगों को पीटकर ही

व्यावस्था बनाई जाती है

जो कुछ भी हुआ देशहित में हुआ

 

देशहित में देश के पक्ष में

इस नए लाठी युग का स्वागत है ।

 

 

।। अपरिचय ।।

 

सुबह रास्ते में कुछ स्त्रियों को देखा

छोटे-छोटे झुंडों में 

होने को सब अलग-अलग 

पर एक ही तरह से

एक ही रास्ते पर

एक ही काम को जातीं 

हाथ में पुराने कपड़ों के सिले

एक जैसे झोले कांख में दबाये

 

अज्ञात भय लिए सड़क पर मैं भी

और वे भय रहित

महामारी वाले वायरस से परे

जिससे भयभीत दिग-दिगन्त

दूर घर में बैठे परिजनों से आंख बचा

टेबुल पर फेंक आया चलित फोन

निकल आया सड़क पर

जो माने जैसा मानने को स्वतंत्र

भला कोई कब तक

बन्द रह सकता दीवारों से घिरा

 

उनके चेहरों पर नहीं उदासी का भाव

न थकन आंखों में

श्रम करने को तैयार 

काम की हुक और हुलस भीतर

पहिये भले ही रुक गए हों देश में

पर चल रहे इन स्त्रियों के पाँव

 

किसी के पास नही जा सकता 

रोककर पूछ नहीं सकता कुछ बात

मज़दूर स्त्रियों के सापेक्ष

सड़क पर खड़े बिजली के खंभे के 

होने की तरह ही मेरा होना 

अपने इस तरह होने से एकबारगी

कोई भी हो सकता भयभीत

कि आपका होना भी उसी तरह 

जैसे अकेली एक सड़क 

बबूल का एक पेड़ 

आराम पसंद काम करने वालों और 

कठोर श्रम के बीच 

अपरिचय की इतनी बड़ी दीवार

 

डर था मेरे भीतर

और सुबह का सूरज निकल रहा था

चलता चला जाता आगे और आगे

छोटे छोटे झुंडों में मिलते जाते 

स्त्रियों के और नए समूह

अलग-अलग दबे रंगों के झोलों के साथ

एक स्त्री झोले के साथ

हाथ में टूटी चप्पल लिए चल रही 

 

खेतों में खड़ी फसलों के स्वभाव

खेत , हँसिया , गेहूं की सूखी बाल

और इन स्त्रियों के बारे मे

कितना कम जानता 

जबकि अज्ञात वायरस के बारे में 

कितना कुछ जान गया हूँ 

जिसका भय लिए चल रहा रास्ते पर

इस समय क्या बात कर रही होंगी 

दुनिया रुक सी गई है

पर ये कहां जा रही हैं रोटी बांधकर

 

चैत काटने निकली इन स्त्रियों से

कितना कम परिचय एक कवि का

कैसे झिझकते हुए कविता में प्रवेश

इन स्त्रियों के बारे में 

दुख-दुख जीवन का 

कितना कम ज्ञान 

इनके लिए कितने कम शब्द

एक कवि के शब्दकोश में

 

कहने को कहता रहता हूँ

कि कितना प्यार हमे वतन से

पर कितना कम जानते हम वतन को

और वतन में रहने वाले बहुसंख्यक

श्रमशील स्त्री समाज को.

 

संपर्क- 94251 34462

 

 

 

 

 

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कुमार विकल की कविता-पहचान

यह जो सड़क पर खून बह रहा है

इसे सूंघकर तो देखो
और पहचानने की कोशिश करो
यह हिंदू का है या मुसलमान का
किसी सिख का या ईसाई का

किसी बहन का है या भाई का.

सडक पर इधर-उधर पड़े पत्थर के बीच दबे
टिफिन कैरियर से जो रोटी की गंध आ रही है
वह किस जा‍ति की है ?

क्या तुम मुझे बता सकते हो
इन रक्त सने कपडों,फटे जूतों,टूटी साइकिलों
किताबों और खिलौनों की कौम क्या है.

क्या तुम बता सकते हो
स्कूल से कभी न लौटने वाली बच्ची की प्रतीक्षा में खड़ी
मां के आंसुओं का धर्म क्‍या है
और अस्पताल में दाखिल
जख़्मियों की चीख़ों का मर्म क्या है.

हां मैं बता सकता हूं यह ख़ून उस आदमी का है
जिसके टिफ़िन में बंद रोटी की गंध उस जाति की है
जो घर और दफ़्तर के बीच साइकिल चलाती है
और जिसके सपनों की उम्र फाइलों में बीत जाती है.

ये रक्त सने कपड़े उस आदमी के हैं
जिसके हाथ मिलों का कपडा बनाते हैं
कारखानों में जूते बनाते हैं,खेतों में बीज डालते हैं
पुस्तकें लिखते हैं,खिलौने बनाते हैं
और शहरों की अंधेरी सड़कों के लैंपपोस्ट जलाते हैं.

लैंपपोस्ट तो मैं भी जला सकता हूं लेकिन
स्कूल से कभी न लौटने वाली बच्ची की
मां के आंसुओं का धर्म नहीं बता सकता.
जैसे जख़्मियों के घावों पर
मरहम तो लगा सकता हूँ
लेकिन उनकी चीख़ों का मर्म नहीं बता सकता.

- कुमार विकल 

 

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अगर रोज कर्फ्यू के दिन हों

अगर रोज कर्फ्यू के दिन हों

तो कोई अपनी मौत नहीं मरेगा
कोई किसी को मार देगा
पर मैं स्वाभाविक मौत मरने तक
जिन्दा रहना चाहता हूं.
दूसरों के मारने तक नहीं

और रोज की तरह अपना शहर
रोज घूमना चाहता हूं.


शहर घूमना मेरी आदत है
ऐसी आदत कि कर्फ्यू के दिन भी
किसी तरह दरवाजे खटखटा कर
सबके हालचाल पूछूं.


हो सकता है हत्यारे का
दरवाजा भी खटखटाऊं
अगर वह हिन्दू हुआ
तो अपनी जान
हिन्दू कह कर न बचाऊं
मुसलमान कहूं.


अगर मुसलमान हुआ
तो अपनी जान
मुसलमान कह कर न बचाऊं
हिन्दू कहूं.


हो सकता है इसके बाद भी
मेरी जान बच जाय
तो मैं दूसरों के मारने तक नहीं
अपने मरने तक जिन्दा रहूं

 

विनोद कुमार शुक्ल

 

 

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बस्तर के धुर माओवाद प्रभावित इलाके बीजापुर में रहने वाली पूनम वासम की कविताओं ने मचाई धूम

कार्ल मार्क्स, संविधान, फाड़ पोलका तुम हमारा, आग जैसी कविताएं लिखने वाली दोपदी सिंघार के बारे में यह कहा गया था वह बस्तर में ही कहीं रहती है और खुद को व्यवस्था के भेड़ियों से बचाने के लिए छिपकर कविताएं लिखती है. साहित्य के बहुत से जानकारों ने दोपदी की खोजबीन की, लेकिन कोई भी यह पता नहीं लगा पाया कि वास्तव में कोई दोपदी है भी या नही ? कवियित्री पूनम वासम भी बस्तर के धुर माओवाद प्रभावित इलाके बीजापुर से आती है. पूनम के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि उन्होंने सृजन को सामने लाने के लिए अपनी पहचान नहीं छिपाई. पूनम इन दिनों आदिवासी विमर्श की कविताएं लिख रही है और खूब लिख रही है. पूनम की कविताएं बस्तर में जो कुछ मौजूद है. जो कुछ घट रहा है... उसका दस्तावेज है. यहां प्रस्तुत है उनकी पांच कविताएं-

 

 

( एक ) बारूद पानी पानी हो जाये

तुम्हारा हाथ थामे बैठी हूँ मैं नम्बी जलप्रपात की गोद में जहाँ तितलियाँ  मेरे खोसे में लगे कनकमराल के फूलों से बतिया रही हैं

 

तुम हौले से मीठे पान का एक टुकड़ा धर देते हो, मेरी जीभ पर 

और मैं अपनी मोतियों की माला को भींचकर दबोच लेती हूँ मुठ्ठी में

 

तुम कहते हो कानों के करीब आ कर 

चाँद को हथेलियों के बीच रखकर वक्त आ गया है 

मन्नत माँगने का 

 

टोरा तेल से चिपड़े बालों के कालेपन को देखकर 

तुम मुस्कुरा देते हो 

मेरे खोसे से पड़िया निकालकर प्लास्टिक की कंघी खोंच

प्रेम का इज़हार करते तुम्हें देखकर

मैं दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में खोजती हूँ अपना नाम 

 

खुशी के मारे मेरे हाथ 

गुड़ाखू की डिबिया से निकाल बैठते हैं 

अपने हिस्से का सुकून  

पानी की तेज धार से तुम झोंकते हो अपनी हथेलियों में

मेरा चेहरा धोने लायक ठंडा पानी 

 

ठीक उसी वक्त 

तुम चाहते हो मेरे साथ मांदर की थाप पर  

कुछ इस तरह नृत्य करना  

कि पिछले महीने न्यूनरेन्द्र टॉकीज की बालकनी में बैठकर देखी गई शाहरुख, काजोल की फ़िल्म का कोई हिस्सा लगे

 

तुम्हारे चेहरे को पढ़ रही हूँ ऐसे 

जैसे ब्लैकबोर्ड पर इमरोज़ की अमृता के लिए लिखी कोई कविता 

 

तुम हँसते हो जब 

पगडंडियों की जगह मैं दिखाती हूँ तुम्हें

डामर की सड़कों पर दौड़ती कुशवाहा की बसें 

 

तुम गुनगुनाने लगते हो तब

तुम-सा कोई प्यारा, कोई मासूम नहीं है 

कि तुम जान हो मेरी तुम्हें मालूम नहीं है

 

और खिलखिलाहट के साथ लाल हो उठता है मेरा चेहरा शर्म से 

 

तुम कसकर मुझे बाँहों में धर लेते हो कि

तभी बारूद की तीखी गंध से मेरा सिर चकराने लगता है 

घनी झाड़ियों ऊँचे पहाड़ों को चीरती 

एक गोली तुम्हारे सीने के उस हिस्से को भेदती हुई गुजर जाती है 

स्वप्न की उसी टेक पर जहाँ अभी -अभी मैंने अपना सिर टिकाया था 

 

यह स्वप्न है या दुःस्वप्न कहना मुश्किल है 

 

मैं चीख -चीख कर तुम्हें पुकारती हूँ तुम कहीँ नहीं हो 

 

मैं चाहती हूँ लौट आओ तुम पाकलू

किसी ऐसे मंतर जादू- टोने के साथ 

कि तमाम बंदूकों का बारूद पानी-पानी हो जाये 

 

( दो ) मछलियों का शोक गीत

झपटकर धर नही लेती कुटुमसर की गुफा में दुबक कर बैठी अंधी मछलियां अपनी जीभ पर

समुद्र के खारे पानी का स्वाद

इनकी गलफड़ों पर अब भी चिपका है वहीं

हजारों वर्ष पूर्व का इतिहास!

 

कि कांगेर घाटी में उड़ने वाली गिलहरी के पंखों पर 

अक्सर उड़ेल आती हैं मछलियां,

संकेत की भाषा में लिखी अपनी दर्द भरी पाती की स्याही ताकि बचा रहे गिलहरी के पंखों का चितकबरापन

 

बोलने वाली मैना को सुबक-सुबक कर सुनाती हैं

काली पुतलियों की तलाश में भटकती अपनी नस्लों के  संघर्ष की कहानी.

ताकि मैना का बोलना जारी रहे पलाश की सबसे ऊंची टहनी से  

 

मछलियां तो अंधी हैं पर,

लम्बी पूँछ वाला झींगुर भी नही जान पाया अब तक कुटुमसर गुफा के बाहर ऐसी किसी दुनिया के होने का रहस्य 

कि जहाँ बिना पूँछ वाले झींगुर चूमते हैं सुबह की उजली धूप 

और टर्र टर्र करते हुये गुजर जाते है 

कई कई मेढकों के झुंड 

 

गुफा के भीतर 

शुभ्र धवल चूने के पत्थरों से बने झूमरों का संगीत सुनकर

अंधी मछलियां भी कभी-कभी गाने लगती है 

घोटुल में गाया जाने वाला 

कोई प्रेम गीत!

गुफा के सारे पत्थर तब किसी वाद्ययंत्र में बदल उठते है 

हाथी की सूंड की तरह बनी हुई 

पत्थर की सरंचना भी झूम उठती है

 

संगीत कितना ही मनमोहक क्यों न हो 

पर एक समय के बाद 

उसकी प्रतिध्वनियां कर्कशता में बदल जाती है 

 

मछलियां अंधी हैं 

बहरी नही, 

कि मछलियां जानती है सब कुछ 

सुनती है सैलानियों के पदचाप 

सुनती हैं उनकी हँसी ठिठोली  

जब कोई कहता है 

देखो-देखो यहां छुपकर बैठी है 

ब्रम्हाण्ड की इकलौती रंग-बिरंगी मछली.

 

तब भले ही कुटुमसर गुफा का मान बढ़ जाता हो

अमेरिका की कार्ल्सवार गुफा से तुलना पर कुटुमसर फूला नही समाता हो 

तब भी कोई नहीं जानना चाहता 

इन अंधी मछलियों का इतिहास 

कि

जब कभी होती है एकान्त में 

तब दहाड़े मार कर रोती है मछलियां 

इनकी आंखों से टपकते आँसुओं की बूंद से चमकता है गुफ़ा का बेजान सा शिवलिंग!

 

कोई नही जानता पीढ़ियों से घुप्प अंधेरों में छटपटाती

अंधी मछलियों का दर्द 

 

कि 

 

लिंगोपेन से मांग आई अपनी आजादी की मन्नतें 

कई-कई अर्जियां भी लगा आई बूढ़ादेव के दरबार में 

 

अंधी मछलियां जानती हैं 

उनकी आजादी को हजारों वर्ष का सफर तय करना 

अभी बाकी है 

इसलिए भारी उदासी के दिनों में भी 

कुटुमसर की मछलियां 

सायरेलो-सायरेलो जैसे गीत गाती हैं।

 

( तीन ) जंगल है हमारी पहली पाठशाला

माँ नही सिखाती उंगली पकड़कर चलना 

सुलाती नही गोद में उठाकर लोरिया गाकर 

चार माह के बाद भी दाल का पानी सेरेलेक्स ज़रूरी नही होता हमारे लिए 

 

जॉन्सन बेबी तेल की मालिश और साबुन के बिना भी

हड्डियां मज़बूत होती है हमारी

 

हम नही सीखते माँ की पाठशाला में ऐसा कुछ भी 

जो साबित कर सके कि हम गुजर रहे हैं 

बेहतर इंसान बनने की प्रक्रिया से!

 

स्कूल भी नही सिखा पाता हमे 'अ से अनार' या 'आ से आम' के अलावा कोई दूसरा सबक

 

ऐसा नही है कि हममें सीखने की ललक नही, या हमे सीखना अच्छा नही लगता 

 

हम सीखते है 

हमारी पाठशाला में सबकुछ प्रयोगिक रूप में 

'नम्बी जलप्रपात' की सबसे ऊंची चोटी से गिरती तेज पानी की धार 

हमे सिखाती है संगीत की महीन धुन,

'चापड़ा' की चटपटी चटनी सिखाती है 

विज्ञान के किसी एसिड अम्ल की परिभाषा!

 

अबूझमाड़ के जंगल सबकुछ खोकर भी 

दे देते हैं अपनी जड़ों से जुड़े रहने के 'सुख का गुण-मंत्र'

 

तीर के आखरी छोर पर लगे खून के कुछ धब्बे सुनाते है 'ताड़-झोंकनी' के दर्दनाक क़िस्से!

 

बैलाडीला के पहाड़ संभाले हुए हैं 

अपनी हथेलियों पर आदिम हो चुके संस्कारों की एक पोटली 

धरोहर के नाम पर पुचकारना, सहेजना, संभालना और तन कर खड़े रहना 

सीखते है हम बस्तर की इन ऊँची ऊंची पहाड़ियो से!

 

कुटुम्बसर की गुफा में,

हजारों साल से छुपकर बैठी अंधी मछलियों को देखकर  

जान पाएं हम गोंड आदिवासी अपने होने का गुण-रहस्य!

 

माँ जानती थी सब कुछ 

किसी इतिहासवेत्ता की तरह 

 

शायद इसलिए 

माँ हो ही नही सकती थी हमारी पहली पाठशाला 

जंगल के होते हुए!

 

जंगल समझता है हमारी जंगली भाषा माँ की तरह

 

 

( चार ) तूम्बा गेला फूटी, देवा गेला उठी

 

पूजा घर मे रखे ताँबे और काँसे के पात्र से

कहीं ज्यादा, यूँ कहे कि

रसोईघर के बर्तनों से भी ज्यादा प्रिय है

हमारे लिए तूम्बा

पेज, ताड़ी, महुआ और दारू

यहाँ तक की पीने का पानी रखने का सबसे सुगम व सुरक्षित पात्र के रूप में चिन्हाकित है तूम्बा!

तूम्बा का होना हमारी धरती पर जीवन का संकेत है

जब हवा नहीं थी, मिट्टी भी नहीं थी

तब पानी पर तैरते एकमात्र तूम्बे को

भीमादेव ने खींच कर थाम लिया था

अपनी हथेलियों पर

नागर चला कर पृथ्वी की उत्पत्ति का

बीज बोया भीमादेव ने

तब से पेड़-पौधे, जड़ी-बूटियां, घास-फूस

इस धरती पर लहलहा रहे है

वैसे ही तूम्बा हम गोंड आदिवासियों के जीवन में

हवा और पानी की तरह शामिल है

तूम्बा मात्र पात्र नही, हमारी आस्था का केंद्रबिंदु भी है

जब तक तूम्बा सही-सलामत

ताड़ी ,सल्फ़ी, छिंद-रस से लबालब भरा हुआ

हमारे कांधे पर लटक रहा है

तब तक हमारा कोई कुछ नही बिगाड़ सकता.

 

बचा रहेगा तूम्बा, तो कह सकते हैं

कि बची रहेगी आदि-जातियाँ

गोंड-भतरा, मुरिया

और वजूद में रहेगी जमीन और जंगल की संस्कृति

खड़ा ही रहेगा अमानवीयता के विरुद्ध बना मोर्चा

तूम्बा किसी अभेदी दीवार तरह

कि तूम्बा का खड़ा रहना प्रतीक है मानवीय सभ्यता का

दुनिया भले ही चाँद-तारों तक पहुँचने के लिए

लाख हाथ-पैर मार ले

पर हमारे लिए सबसे ज्यादा जरूरी है

तूम्बे को बचायें रखना

हर हाल में, हर परिस्थिति में

क्योकि तूम्बा का फूटना

अपशुकुन है हम सबके लिए!

 

 

 

( पांच ) गमपुर के लोग 

हम तलाश रहे हैं 

मंगल ग्रह पर पानी के बड़े-बड़े तालाब.

हम ढूँढ रहे हैं वर्षो से एलियन होने के सबूत!

 

दुःखी हैं हम 

धरती से डायनासोर की प्रजाति के विलुप्त होने पर

हमने ब्रह्मांड के चप्पे-चप्पे पर किसी न किसी रूप में 

दर्ज करवाई है अपनी उपस्थिति.

 

हमने साधा है विज्ञान को 

कुछ इस तरह कि जरूरत के वक्त 

पूरी धरती विस्थापित कर सके किसी अन्य ग्रह पर  

वो भी बिना किसी खरोंच के  

 

खुश हैं दुनिया के तमाम लोग 

अंतरिक्ष से चीन की दीवार देखकर

मोहित हैं पृथ्वी के नीले रंग पर 

 

हरे रंग का मोह अब नहीं रहा पहले जैसा!

 

ऐसी किसी दूरबीन का अविष्कार क्यों नहीं किया तुमने गैलेलियो.

जिसमें दिखाई देता 

गमपुर भी देश के नक्शे पर!

 

लोग जान पाते 

एक गाँव की आत्महत्या की कहानी.

 

अरे मैं सच कह रही हूँ  गाँव भी आत्महत्या करते है भई

ऐसे ही जैसे गमपुर ने ले ली है जंगल-समाधि.

 

गमपुर को कोई नहीं जानता 

और गमपुर भी किसी को नहीं जानता.

 

गमपुर के लोगो की प्यास नदिया बुझा देती हैं.

भूख जंगल का हरापन देखकर मिट जाता है .

 

जीने के लिए 

इन्हें कुछ और चीजों की जरूरत ही नहीं 

 

गमपुर के लोगो को सूरज के चमकने और बुझने के विषय में कोई जानकारी नहीं.

इन्हें लगता है दुनिया इतनी ही बड़ी है 

जितनी उनकी जरूरतें.

 

कभी-कभी लगता है 

इनका नामकरण कोई सोची-समझी साज़िश तो नहीं!

 

न राशन-कार्ड 

न आधार-कार्ड 

न अक्षर-ज्ञान

उनके कहकहों के बीच पता नहीं कहाँ से आकर  गिर पड़ती है मूक उदासियां!

 

ये लोग हवा में उच्छ्वास छोड़ते हैं और देखते हैं 

आकाश की ओर

 

इन्हें लगता है कि आकाश की आँखे हैं.

आकाश अपनी आँखों से निहारता है गमपुर को 

ऐसे जैसे एक वही जानता हो गमपुर को!

 

इस बीच जब कोई उन्हें हिलाता है तो वह चौक पड़ते है और हँस देते हैं

 

चूँकि उन्हें कठिन दिनों में हँसने के सिवा कुछ नही आता

इसलिए वह बहुत बार 

कुछ भी न कह कर बस हँस देते हैं.

 

हँसी उनकी भाषा का सबसे सुंदर शब्द है जिसके लिए बहुत बार उन्हें जरूरत नही पड़ती  संसार की किसी भी भाषा की.

 

गमपुर के लोग अ-परिचय को पछाड़ कर 

ढूंढ लेते हैं परिचय से भरा हुआ

एक ब्रह्माण्ड!

 

वह ढूंढने की तमाम प्रक्रियाओं में बार-बार ढूंढ लेते हैं 'खुद' को

और तब एक बहुत बड़ी दुनिया बेहद मामूली हो जाती है उनके लिए

 

उच्छ्वासों और हँसी की भाषा से वह बार-बार हरा देते हैं उस राजकीय अभिलेख को,

जिसमे एक भाषा थोड़ी बेहया होते हुए बहुत कठोरता से कहती है

कि उदंड हैं गमपुर के लोग!

 

( गमपुर बीजापुर से 65 किलोमीटर दूर एक गांव हैं. जहाँ  किसी भी तरह का विकास नही हुआ है सरकार ने उस गाँव को उसकी किस्मत पर छोड़ दिया है. ) 

 

नाम  - पूनम  वासम

शिक्षा -एम. ए .   (समाजशास्त्र,अर्थशास्त्र ) वर्तमान में बस्तर विश्वविद्यालय से शोध कार्य.

सम्प्रति - शासकीय शिक्षिका  बीजापुर

निवास - बीजापुर   बस्तर (छत्तीसगढ़)

मूलतः आदिवासी विमर्श की कविताओं का  लेखन,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित,

युवा कवि संगम 2017 बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रतिभागी,लिटरेरिया कोलकाता 2017 के कार्यक्रम में शामिल,भारत भवन भोपाल में कविता पाठ, रज़ा फाउंडेशन के कार्यक्रम युवा 2018 में शामिल, बिटिया उत्सव ग्वालियर में कविता पाठ साहित्य अकादेमी में कविता पाठ. 

 

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