साहित्य

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भूमण्डल की स्वप्नहीन रात में मुक्तिबोध

छत्तीसगढ़ के शासकीय महाविद्यालय उतई में प्रोफेसर की हैसियत से कार्यरत सियाराम शर्मा की गिनती देश के शीर्षस्थ आलोचकों में की जाती है. सोवियत संघ के विघटन के बाद उन्होंने समाजवाद का संकट और मार्क्सवाद जैसी पुस्तक लिखकर खासी हलचल मचाई थीं. तब उनकी इस किताब का प्रकाशन पल-प्रतिपल जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका ने किया था. कवि आलोक धन्वा, गोरख पांडे, कुमार विकल और वीरेंद्र डंगवाल की कविताओं को केंद्र में रखकर लिखी गई उनकी दूसरी पुस्तक समकालीन कविता का तीसरा संसार का प्रकाशन पहल जैसी ख्यातिलब्ध पत्रिका ने किया तब वे और ज्यादा चर्चा में आए. वर्ष 2014 में साम्य ने  उनकी तीसरी किताब भारत का गहराता कृषि संकट और किसान आत्महत्याएं प्रकाशित की है. यह पुस्तक भी मौजूदा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है. बहरहाल गजानन माधव मुक्तिबोध की जंयती ( 13 नवम्बर )  के मौके पर उन्होंने अपना मोर्चा डॉट कॉम के लिए एक खास आलेख भेजा है. हम उनके आभारी है. 

सियाराम शर्मा

हम चाँद और तारों से रहित स्याह अँधेरी रात के हिंस्र और बर्बर समय में रहते हैं, जहाँ नींद की जगह आँखों में शीशे की किरचें चुभती हैं। दुःस्वप्न शिकारी बाज की तरह हमारा पीछा करते हैं। आत्महत्या कर चुके लाखों किसानों की विधवा स्त्रियों और बच्चों के विलाप हमें बेचैन करते हैं। अपने जल, जंगल और जमीन से विस्थापित आदिवासियों के बहते हुए रक्त से मेरे वस्त्र भीगने लगते हैं। असंख्य मजदूरों के खून और पसीने की बहती नदी को हर क्षण कोई तपती मरुभूमि लील जाती है। असमय बूढ़े हो चुके बेरोजगार नौजवानों की भविष्यहीन आँखें मुझे उदास कर जाती हैं। रातों की नीरवता में उभरती कई निर्भया की एक साथ चीखें, हृदय मेंं तीखी बरछी की तरह चुभती है। दूसरी तरफ लाखों मनुष्यों की कुर्बानियों से पिछली सदी में प्राप्त किये गये सारे मानवीय मूल्य, आदर्श और अधिकार बर्फीले पानी में डूबो दिये गये हैं। दुनिया बड़ी बाजार हो गयी है और मनुष्य को उपभोक्ता मात्र में निःशेष कर देने की साजिशें चल रही हैं। समाजवाद के समक्ष उत्पन्न कुछ समस्याओं के बाद इतिहास और विचारधारा के अंत की घोषणाओं के साथ पूँजी की बर्बर लूट और शोषण को ही मानवीय सभ्यता की अंतिम नियति कहा जा रहा है। आज दुनिया में वर्ग संघर्ष नहीं, सभ्यताओं के संघर्ष की दुहाई दी जा रही है। उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद से हम ठीक से आज़ाद भी नहीं हुए थे कि नवसाम्राज्यवादी गुलामी की अदृश्य बेड़ियों ने हमें जकड़ लिया है। लोकतंत्र के रास्ते घुसकर आज फासीवाद हमारी छाती पर बैठा है। एक-एक कर लोकतांत्रिक संस्थाओं की बलि दी जा रही है। ऐसे में अपने ही निर्दोष नागरिकों का क्रूर हत्यारा टेलीविजन के पर्दे पर फूहड़ स्वाँग रच रहा है। इस उत्तर सत्य के दौर में सत्ता झूठ उगलने की मशीन बन गयी है और जनता को हत्यारी भीड़ में तब्दील कर दिया गया है।

इस क्रूर, हिंस्र, जटिल और बर्बर समय में मुक्तिबोध की कविताओं के भयावह बिम्ब, अन्तः और वाह्य का उनका व्यापक सर्वेक्षण, ईमानदार आत्मालोचन, समझौताहीन संघर्ष और सत्ता से जुड़ाव रखने वाले स्वार्थी बुद्धिजीवियों, कवियों और कलाकारों के प्रति उनकी तीव्र और असमाप्त घृणा, हमेशा सचेत और सक्रिय वर्ग दृष्टि,सामान्य जन के प्रति अगाध विश्वास और उससे जुड़ाव की अदम्य आकांक्षा तथा जनक्रांति का सुन्दर स्वप्न हमारे लिए संजीवनी की तरह है। मुक्तिबोध ने बहुत बेचैनी और तड़प के साथ अपने समय में बहुत गहरे धँसकर कविता को जिया और रचा है। अतः उनकी कविताओं में ऐसी अनुगूँज है, जिसमें हमारे समय की स्पष्ट धड़कन सुनाई देती है। अपने समय में गहरे डूबकर जीने और रचने वाले कवि में न सिर्फ उसका समय बोलता है बल्कि अपनी संभाव्य चेतना के कारण वह आगे आने वाले युगों की संभावनाएँ भी व्यक्त करता है। मुक्तिबोध समयबिद्ध, संभाव्य चेतना से लैस एक ऐसे ही कवि हैं। इसलिए किसी भी समकालीन कवि से हमारे समय का सबसे ज्यादा स्पष्ट बिम्ब मुक्तिबोध की कविता के भीतर से उभरता है। इसमें न सिर्फ हमारे समय के बिम्ब हैं बल्कि ये कविताएँ हमारे समय को समझने की दृष्टि भी प्रदान करती है।

हर बड़े कवि के लिए उसका समय कठिन और चुनौतीपूर्ण होता है। वह समय की अँधेरी शक्तियों से टकराकर और जूझकर ही अपने काव्य व्यक्तित्व का विकास करता है। उसकी संवेदना तीक्ष्ण होती है और कल्पना उर्वर। अपनी विश्वदृष्टि से वह भविष्य की संकटपूर्ण स्थितियों को समय से पूर्व पहचान लेता है। इसीलिए कबीर सारी दुनिया से अलग रात भर ’जागते और रोते हैं’ और तुलसी ’कभी नींद भर सो नहीं पाते’। सारी रात बिस्तर बिछाते ही बीत जाती है। मुक्तिबोध के काव्य में यह बेचैनी और छटपटाहट दोनों पुरखे कवियों से ज्यादा और व्यापक है। उनका काव्य नायक सारी रात बेचैन और भयभीत भागता फिरता है। तरह-तरह की यातनाओं और डरावने अनुभवों से गुजरता है। मुक्तिबोध के समय का अँधेरा जितना सघन है, उनकी विश्वदृष्टि उतनी ही व्यापक है। उनकी विश्वदृष्टि में समस्त मानवीय सभ्यता के विकास के साथ-साथ उसका समस्त ज्ञान-विज्ञान, इतिहास और वर्तमान शामिल है। अतः वे अंधकार को तार-तार कर उसके भीतर की एक-एक वास्तविकता को पहचान पाते हैं। अँधेरे में भी साफ-साफ देख पाने की दृष्टि मुक्तिबोध को एक विलक्षण कवि बनाती है।

मुक्तिबोध के काव्य का गहन अंधकार नेहरु युग के मोहभंग से उपजा पूँजीवादी व्यवस्था का अंधकार है, जहाँ आज़ादी के हवामहल टूटकर बिखर और जल रहे हैं। इस अंधकार में पूँजीवादी जनतंत्र के भीतर से उभरे फासीवादी अंधकार की स्याही भी शामिल है। अतः उसमें फौजी टापें सुनाई देती है। स्वार्थ और निर्बन्ध उपभोग उस अँधेरे की चालक शक्ति है, जहाँ विचार और बौद्धिकता का अभाव है। अतः सिर्फ पेट और उदर के साथ मस्तक विहीन मनुष्यों के चलते-फिरते धड़ का अत्यन्त ही डरावना चित्र मुक्तिबोध ने प्रस्तुत किया है- “इस नगरी में चाँद नहीं है, सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है/सिर्फ धुएँ के बादल-दल हैं/और धुँआते हुए पुराने हवा महल हैं/....... इस नगरी के प्रहरी पहने हैं धुएँ के लम्बे चोगे़/साज़िश के कुहरे में डूबी/ब्रह्मराक्षसों की छायाएँ/गाँधीजी की चप्पल पहने घूम रही हैं/छिपे-छिपे कुछ फ़ौजी टापें/बूटों की भी गूँज रही हैं/..... बुद्धि ख़त्मकर, शीश काटकर/मात्र उदर ले, सिर्फ पेट ले/मस्तकहीन कबन्ध घूमते हैं राहों पर/बड़े ठाठ से बटन-होल में फूल लगाकर/अपने मालिक के ये चाकर/घर बैठे आदर्श घोखते” (मुक्तिबोध/’एक प्रदीर्घ कविता’/मुक्तिबोध रचनावलीः दो/राजकमल प्रकाशन/संस्करण 1985, पृ0-295, 96, 97)। मुक्तिबोध के समय की छिपी-छिपी ये फौजी टापें और बूटों की गूँजें आज खुलेआम हमारे देश के बहुत बड़े हिस्से को रौंद रही हैं। भारत की आज़ादी के बाद से ही साम्राज्यवाद की चाकरी में लगे भारतीय पूँजीवाद से आज के पूँजीपतियों की नव साम्राज्यवाद की दलाली अलग नहीं है। उसे पूर्व की निरंतरता में ही देखने की ज़रूरत है। यह निरंतरता दो युग कवियों की कविता में भी है। निराला ने जिस तरह नेहरु के वर्ग चरित्र को बखूबी पहचाना था, मुक्तिबोध भी वैसा ही पहचानते हैं। ’इस गगन में नहीं दिनकर/नहीं शशधर, नहीं तारा’की ’इस नगरी में चाँद नहीं है, सूर्य नहीं है, से कितनी समानता है!

 

मुक्तिबोध के अँधेरे समय में से छिटकती हुई कुछ रोशनी की किरणें भी हैं। वहाँ नीली झील है, जिसमें  ’प्रतिपल काँपता अरुण कमल है, विक्षोभ की मणियाँ हैं, विवेक रत्न हैं, स्वर्णिम कमल की पंखुरियों जैसी धधकती ज्वालाएँ हैं और जनक्रांति का एक स्वप्न सही सलामत है। लेकिन आज हम भूमण्डल की स्वप्नहीन रात में हैं। समाजवाद का चमकता सितारा डूब चुका है। बर्बर पशु की तरह पूँजीवाद सभ्यता के जंगल में पुनः लौट चुका है। वह अपने सारे आदर्शों और मूल्यों का नकाब उलटकर आज बहुत ही नग्न, विकृत और आक्रामक स्वरूप में हमारे समक्ष उपस्थित है। सोवियत समाजवाद के साथ जिन श्रमिकों ने दुनिया में अपनी सत्ता स्थापित की, पूँजीवादी देशों में भी कार्य के आठ घंटे लागू करवाये और पारिवारिक, सामाजिक सुरक्षा प्राप्त की; आज वे श्रम की चक्की में अनवरत पिस रहे हैं। बेरोजगारी की विशाल फौज ने श्रम को मूल्यहीन बना दिया है। पूरी दुनिया भर में गरीबी और अमीरी के बीच अलंध्य खाई बढ़ती जा रही है। गरीबी को ख़त्म करने की जगह अमीरी को बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है। एक तरफ अरबपतियों, खरबपतियों और उपभोग से अघाये लोगों की सीमित चमचमाती दुनिया है तो दूसरी तरफ शोषितों, वंचितों और विस्थापितों का फैलता साम्राज्य। पहले हम अँधेरे से लड़ते थे पर आज अँधेरा हमें अपने रंग में रंगता जा रहा है। पहले अँधेरा सुबह के साथ छँट जाता था पर आज वह दिन के उजाले में भी कायम है-“ इसीलिए आजकल दिन के उजाले में भी अँधेरे की साख़ है/इसीलिए संस्कृति के मुख पर/मनुष्य की अस्थियों की राख है/जमाने के चेहरे पर/गरीबों की छातियों का ख़ाक है”(मुक्तिबोध/’चाँद का मुँह टेढ़ा है/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-279)!! ऐसे श्रम विरोधी, जन विरोधी, मनुष्य विरोधी भयावह समय में जब अच्छे दिनों के छलावे से हमें कोई भी छल जाता है तब हमारे समय के क्रांतिकारी कवि नवारूण भट्टाचार्य का यह पूछना कितना सही लगता है कि “आज यहाँ तक कि अंधे भी/ब्रेल अक्षरों को छूकर समझ रहे हैं कि/प्रलय आ रहा है/पर तुम क्या कर रहे हो”?

मुक्तिबोध ने 1940-42 के आस-पास लिखित और ’तारसप्तक में संकलित ’पूँजीवादी समाज के प्रति’ कविता में पूँजीवाद की भोगवादी, सौन्दर्यवादी, प्रदर्शन तथा दिखावे की सजावटी और यथार्थ विरोधी संस्कृति की तीखी और तीव्र भर्त्सना करते हुए उसके प्रति अपार घृणा को ज़ाहिर किया था। लेकिन आज हम सामंती और पूँजीवादी संस्कृति के घालमेल से निर्मित एक ख़तरनाक कॉक्टेल संस्कृति के दौर में हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के इस दौर में हमारी समावेशी संस्कृति की समृद्ध विरासत पर झाड़ू फेरकर एक संकीर्ण और विभाजनकारी राष्ट्रवादी विमर्श पैदा किया जा रहा है और राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को गंभीर खतरे में डाल दिया गया है। इस राष्ट्रवाद में दलितों, आदिवासियों, चेतना सम्पन्न स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के लिए कोई जगह नहीं है। उस पर तुर्रा यह है कि यह अपने-आप को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी और देशप्रेमी कहने की अश्लील हिमाकत करता है। पिछड़ी हुई विचारधारा वाला, गाँधीजी की हत्या के लिए जिम्मेवार यह सहस्रमुखी संगठन आज इतना ताकतवर हो चुका है कि संविधान को चुनौती देने लगा है। उसके इशारे पर सारी लोकतांत्रित संस्थाओं को नष्ट-भ्रष्ट किया जा रहा है। भारतीय आज़ादी की लड़ाई और भारतीय राजनीति के हाशिए पर खड़े इस संगठन के ताकतवर होकर सत्ता के केन्द्र में आने के कारणों की समझ हमें मुक्तिबोध की कविताओं से मिलती है।

भारतीय समाज के आधुनिकीकरण की जिम्मेवारी जिन कन्धों पर थी, उन्होंने ईमानदारी से अपने दायित्व का निर्वहन नहीं किया। बुद्ध से लेकर कबीर और आज़ादी की लड़ाई तक भारतीय समाज को आधुनिक बनाने की जो कोशिशें हुईं, उसे आज़ादी के बाद मुल्तवी कर दिया गया। आज़ादी के बाद के शासक वर्ग ने जनता की पिछड़ी हुई चेतना को उन्नत बनाने की अपेक्षा उसे अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भारतीय संस्कृति की जो तर्कमूलक, बौद्धिक व्याख्याएँ की उसे जन-जन तक पहुँचाया नहीं जा सका। किसी भी जीवंत संस्कृति में प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी दोनों तरह के तत्त्व मौजूद होते हैं। आवश्यकता यह होती है कि प्रतिक्रियावादी तत्त्वों की तीखी और निर्मम आलोचना की जाये और प्रगतिशील तत्त्वों को लेकर आगे बढ़ा जाये। स्वाधीनता आन्दोलन के समय से ही भारतीय समाज में एक पुनरूत्थानवादी, भाववादी, बुद्धि विरोधी विचारधारा सक्रिय रही, जो अतीत की सीमाओं, कमजोरियों और रूढ़ियों को नजरअंदाज करती थी और अविवेकी ढंग से भारतीय इतिहास की महानता का गुणगान गाती थी। वर्ण, जाति, धर्म और लिंग सम्बन्धी संकीर्णताओं को उसने अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल किया। बुद्धि की जगह आस्था को, विज्ञान की जगह अंधविश्वास को और मानवीय गुणों की जगह वर्ण और धर्म को महत्त्व दिया। कहा जाता है कि अतीत के जिन प्रश्नों की हम उपेक्षा करते हैं, वे वर्तमान में दूनी शक्ति के साथ हम पर आक्रमण करते हैं। भारत की महान् संस्कृति के जिन अन्तर्विरोधों की हमने उपेक्षा की, आज वही हमारे लिए घातक सिद्ध हो रहे हैं। अतीत की उन्हीं कंदराओं के अंधकार से निकलकर ये गिद्ध आज भारतीय जनता को दृष्टिहीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं-“प्रतिष्ठित राज्य-संस्कृति के प्रभावी दृश्य/सुन्दर सभ्यता के तुंग स्वर्ण-कलश/सब आदर्श/उनके भाष्यकर्ता ज्ञानवान् महर्षि/ज्योतिर्विद्, गणितशास्त्री, विचारक, कवि,/सभी वे याद आते हैं।/प्रतापी सूर्य हैं वे सब प्रखर जाज्वल्य/पर, यह क्या/अँधेरे स्याह धब्बे सूर्य के भीतर बहुत विकराल/ धब्बों के अँधेरे विवर-तल में से/उभरकर उमड़कर दल बाँध/उड़ते आ रहे हैं गिद्ध/पृथ्वी पर झपटते हैं!/कि खायेंगे हमारी दृष्टियाँ ही वे (मुक्तिबोध/’अन्तःकरण का आयतन’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-146)”!

अपनी द्वन्द्वात्मक दृष्टि के कारण मुक्तिबोध भारत के महान सांस्कृतिक सूर्य के भीतर उन विकराल धब्बों को समय से बहुत पहले देख पा रहे थे, जो साम्प्रदायिक फासीवादी-ताकतों की शरणस्थली है। ये पुरातन पंथी, इतिहासग्रस्त ताकतें उसी के सहारे जनता की विवेक, बुद्धि को नष्ट कर रही हैं। यह आकस्मिक नहीं है कि नये ज्ञान-विज्ञान के पाठ्यक्रमों की जगह आज विश्वविद्यालयों में वैदिक गणित, ज्योतिष और कर्मकाण्ड पढ़ाने की वकालत की जा रही है। हमारे यहाँ अतीत में टेस्ट ट्यूब बेबी, प्लास्टिक सर्जरी और महाभारत में इन्टरनेट के होने की अनर्गल बातें प्रचारित-प्रसारित की जा रही है। यह सब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की ओर से हो रहा है। इन सबका उद्देश्य जनता की चेतना और दृष्टि को धुँधला बनाकर समय और समाज की वास्तविकता से उन्हें अनजान बनाये रखना है ताकि वे निर्बाध रूप से अपने शोषण और दमन का चक्र जारी रख सकें। ऐसे में जनता से जुड़े बुद्धिजीवी जो उनके षडयंत्र को उजागर करने की प्रक्रिया में शामिल हैं; उन्हें देशद्रोही, राष्ट्रद्रोही सिद्ध कर उनके चरित्र हनन का प्रयास किया जा रहा है। उन्हें नक्सल समर्थक या ’अरबन नक्सल’ कह कर जेल की सलाखों के भीतर डाला जा रहा है। यह बुद्धिविरोध अपने चरम पर तब पहुँच जाता है जब तर्कवादियों, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मुकाबला न कर उनकी सुनियोजित हत्याएँ की जाती हैं। इस सब से विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटकर समाज में डर और दहशत का माहौल पैदा किया जा रहा है। गुण्डागर्दी, जेल और हत्याओं का सिलसिला यह सिद्ध करता है कि लोकतंत्र विरोधी ये फासीवादी ताकतें वैचारिक रूप से कितनी दरिद्र हैं। मुक्तिबोध ने समय से पहले इन फासीवादी ताकतों की भयावहता को अच्छी तरह से पहचान लिया था-“रामू जानता है कि पूँजीवादी शक्तियाँ/जन-जन की छाती पर बैठकर/शासन के चाकू से/विद्रोहिणी बुद्धि की त्रिकालदर्शी आँखों को काटकर/निकाल लेना चाहती है।/....पूँजीवादी शक्तियाँ भयंकर/जन-जन को दमन की फ़ासिस्ती भट्ठी में झोंककर/बनाया चाहती हैं वे/उनकी अस्थियों से श्वेत/आराम का फर्नीचर”,(मुक्तिबोध/’ज़िन्दगी का रास्ता’/मुक्तिबोध रचनावली : एक/पृ0-268, 269)।

मुक्तिबोध सिर्फ ’अँधेरे में’ ही नहीं, बल्कि अपनी दूसरी कविताओं में भी फासिज्म के खतरे के प्रति सचेत थे और उसके प्रति गंभीर रूप से चिंताग्रस्त भी। उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध में मानवीय आदर्शों, मूल्यों, सम्बन्धों को इन फासिस्ट शक्तियों के हाथों तार-तार होते हुए देखा था। फासिज्म की आक्रामकता से भारत उस समय अछूता नहीं था। हमारे देश की फासिस्ट शक्तियाँ उस समय भी हिटलर से प्रेरणा ले रही थीं। कुछ ने तो उससे मिलने का प्रयास भी किया था। जिन्ना ने तो बाद में देश को बाँटने का अभियान चलाया पर ये शक्तियाँ तो पूर्व से ही द्विराष्ट्रवाद के सिद्धान्त पर चल रही थीं। मुक्तिबोध ने मानवीय सभ्यता के शुभ, सुन्दर, कोमल और उज्ज्वल पक्ष को इन शक्तियों के कारण पराजित और संकटग्रस्त होते हुए देखा था। वे यह भी समझ रहे थे कि यह मनुष्य के शोषण, दमन का सबसे बर्बरतम् रूप है। इसके मूल में पूँजीवादी व्यक्तिवादिता के अहं का चरमोत्कर्ष है। दुर्भाग्यवश पूँजीवाद के बर्बर स्वरूप की वापसी के साथ आज भारत सहित पूरी दुनिया में अत्यन्त आक्रामकता के साथ दक्षिणपंथ फिर से सिर उठा रहा है। समस्त मानवीय सभ्यता के लिए यह खतरे की घंटी है। ऐसे समय में मुक्तिबोध के इन पंक्तियों के पुनर्पाठ की ज़रूरत है-“नव स्नेह का, सौन्दर्य का, विश्वास का/नीला समुन्दर लाँघकर/इस द्वीप में/काला पुराना दैत्य गुपचुप आ गया/यह ध्वंस का सहचर, बभुक्षित है अहं/जो शोषणों की सभ्यता का भूप है/मैं जानता हूँ,/आज के धुएँ भरे आकाश में/हैं स्याह ताकत के हवाई घूमते/मैं जानता हूँ यह सभी/मेरी पराजय याद है।/चारों तरफ फैली हुई इस सभ्यता की भी पराजय याद है। जिसमें कि स्वार्थों के बाँधे तालाब में/काले कमल काले अहं के खिल रहे/प्रतिपल विषैली रश्मियों के तेज में” (मुक्तिबोध/’पराजित हो चलूँ’/’आलोचना’/ सहस्राब्दी अंक 55/जुलाई-सितम्बर 2015/पृ0-22)। गरीबी, बेरोजगारी, विस्थापन, धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, घृणा, भीड़ की हिंसा की विषैली रश्मियों के तेज में काले कमल का खिलना हमारे समय की भयावह वास्तविकता है।

मुक्तिबोध ने अपनी एक महत्त्वपूर्ण कविता ’जमाने का चेहरा’ में फासीवाद का अत्यन्त ही डरावना चित्र खींचा है। इस कविता में बिजली की प्रचण्ड शक्ति के साथ फासीवादी ताकतें पूरी पृथ्वी का गरदन दबोचने को तत्पर हैं और शोषण, दमन से परेशान जनगण के चेहरे पर उसके राक्षसी दाँत गड़े हैं। उसकी संस्कृति हत्या, हिंसा और ख़ूनख़राबा की संस्कृति है-“अजीब उतरते हुए पैराशूट-पैराट्रूप/क्षितिज के चेहरे पर उभरा काला भाव एक/.....आँखों में उभरी है स्टेनगन/आसमानी बिजली का पीला प्रचण्ड/हाथ/बढ़ गया, बढ़ गया/धरती की गरदन को/मुट्ठी में भींचने,/जहरीली घनघोर लपटों की छाती पर/मृत्यु की गोद में/पृथ्वी को खींचने!!/......जनता के चेहरे पर/नात्सी मशीनी दाँत गड़ गये थे/संस्कृति के मुख पर/रूधिर की धाराओं का/गिर गया परदा” (मुक्तिबोध/’ज़माने का चेहरा’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-57, 58,59)!!

फासिज्म का मूल आधार कॉरपोरेटिज्म है। सत्ता जब आँख मूँदकर कॉरपोरेट शक्तियों के पक्ष में खड़ी हो जाती है तो स्वाभाविक है कि वह जन विरोधी फैसले लेगी। इससे जनसाधारण में गरीबी-बेरोजगारी फैलती है। सार्वजनिक सम्पत्तियों के साथ प्राकृतिक संसाधनों और जनता की सम्पत्तियों की भी लूट-खसोट शुरू हो जाती है। पिछले दिनों बड़े पैमाने पर सार्वजनिक उद्योगों का निजीकरण, किसानों की खेतिहर जमीनों का अधिग्रहण, आदिवासियों का विस्थापन इन्हीं कॉरपोरेट नीतियों का परिणाम था। इसके फलस्वरूप जनता में गुस्सा, आक्रोश बढ़ता है और जनप्रतिरोध की कारर्वाइयाँ शुरू होती हैं। फासिस्ट सत्ता इस जनप्रतिरोध को कुचलने के लिए एक ओर साम्प्रदायिकता, जातिवाद, गौ हत्या, मंदिर-मस्जिद को मुद्दा बनाकर जन एकता को तोड़ती है और जनता को मूल मुद्दों से भरमाती-भटकाती है तो दूसरी तरफ दमन के लिए सेना और अर्द्धसैनिक बलों का सहारा लेती है। आज पूरा का पूरा कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत के साथ बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आन्ध्रप्रदेश का बहुत बड़ा आदिवासी इलाका सेना और अर्द्धसैनिक बलों के हवाले है। मुक्तिबोध ने ’अँधेरे में’ कविता में जिस सैन्य दमन और मार्शल लॉ का चित्र खींचा है वह आज हमारे देश की वास्तविकता है-“एकाएक मुझे भान होता है जग का/अख़बारी दुनिया का फैलाव,/फँसाव, घिराव, तनाव है सब ओर,/पत्ते न खड़कें/सेना ने घेर ली हैं सड़कें।/बुद्धि की मेरी रग/गिनती है समय की धकधक!/यह सब क्या है?/किसी जन-क्रांति के दमन-निमित्त यह/मार्शल लॉ है” (मुक्तिबोध/’अँधेरे में’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-331)!! कुछ लोगों को ’अँधेरे में’ के सैन्य दमन और मार्शल लॉ का यह चित्र अतिरंजित लगता है पर हमें नहीं भूलना चाहिए कि आज़ाद भारत की नेहरु सरकार ने पहली बार सेना का इस्तेमाल तेलंगाना के किसानों के संघर्ष को दबाने के लिए किया था। आज भी पूर्वोत्तर भारत मंद ’अफस्पा’ (आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट) जैसा जनविरोधी कानून लागू है। इसे समाप्त करने के लिए इरोम शर्मिला सोलह वर्षों तक ऐतिहासिक भूख हड़ताल करती रहीं। हाल-फिलहाल बड़े-बड़े सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी टेलीविजन की सार्वजनिक बहसों में हिस्सा लेकर अपने अंधराष्ट्रवादी रूझान से सरकारी नीतियों को प्रभावित करने लगे हैं। सरकारें अपने संकटों को टालने के लिए सेना का राजनीतिक इस्तेमाल करने लगी हैं। यह सब देश के लोकतंत्र के हित में नहीं है। 

आज हम नव साम्राज्यवाद के आक्रामक दौर में हैं। पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में सोवियत संघ की चुनौती और शक्तियों का संतुलन समाप्त होते ही अमेरिकी नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों ने संगठित और अधिक आक्रामक होकर तीसरी दुनिया के स्वाभाविक विकास को अवरूद्ध कर दिया। तीसरी दुनिया के अधिकांश देश राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्षों के बल पर, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद से मुक्त होकर अपने स्वतंत्र विकास का मार्ग तलाश ही रहे थे कि भूमण्डलीकरण के नाम पर राष्ट्रीय राज्य की सीमाओं को बेमानी कर वहाँ के शासक वर्ग ने साम्राज्यवादी पूँजी के बेरोक-टोक प्रवेश की इजाजत दे दी। गैट समझौतों के तहत असमान व्यापार की शर्तें इन देशों पर लाद दी गईं। विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के दिशा-निर्देशों के अनुरूप इन देशों के विकास को नियंत्रित और दिशा निर्देशित किया जाने लगा। बड़ी-बड़ी दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का प्रवेश इन देशों में शुरू हुआ। पहले किसी देश में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित साम्राज्यवादी शक्तियाँ जिस तरह उस देश की जनता और संसाधनों को लूटने का जो कार्य करती थी, आज वही कार्य वह अपनी पूँजी के निर्यात के माध्यम से कर रही हैं।

भारत जैसे देश का दब्बू और कमजोर पूँजीपति वर्ग अकेले इस देश को लूटने में सक्षम नहीं था। अतः वह स्वेच्छा से साम्राज्यवादी पूँजी के साथ गठबंधन कर उसकी दलाली में जुट गया। तथाकथित राष्ट्रीय पूँजीपतियों में से आज कोई भी ऐसा नहीं है, जिसने साम्राज्यवादी पूँजी के साथ गठजोड़ न किया हो!  हमारे देश की हर रंग की सरकारों ने साम्राज्यवादी पूँजी को बढ़ावा देने में उसके एजेन्ट की भूमिका का निर्वाह किया। आज यह खेल जितना खुला और स्पष्ट है, मुक्तिबोध के समय उतना स्पष्ट नहीं था, फिर भी उनकी भविष्योन्मुख दृष्टि भारतीय और साम्राज्यवादी पूँजी के गठजोड़ को बखूबी देख रही थी। वे भारतीय जननायकों को उनके हितरक्षक एजेन्ट और कुली-खलासी के रूप में देख रहे थे-,“साम्राज्यवादियों के/पैसों की संस्कृति/भारतीय आकृति में बँधकर/दिल्ली को/वाशिंगटन व लन्दन का उपनगर/बनाने पर तुली है!!/भारतीय धनतन्त्री/जनतन्त्री बुद्धिवादी/स्वेच्छा से उसी का कुली है!!/.....जन-राष्ट्र-लोकायन/जन-मुक्ति-आन्दोलन/के सिद्धहस्त विरोधी/ये साम्राज्यवादियों की पाँत में ही बैठे हैं,/शान्ति के शत्रुओं का प्राणायाम साधकर/जनता के विरूद्ध घोर अपराध कर,/फाँसी के फन्दे की रस्सी-से ऐंठें हैं (मुक्तिबोध/’ज़माने का चेहरा’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-77)!! 

मुक्तिबोध 1950-57 में ही साम्राज्यवादी और भारतीय पूँजी के इस अपवित्र गठजोड़ को साफ-साफ देख रहे थे। वे यह भी देख रहे थे कि भारतीय नेतृत्व वर्ग किस तरह से उन्हें प्रश्रय दे रहा है। इस वास्तविकता को वक्त रहते अगर समझा और भारतीय जनता को समझाया गया होता तो नब्बे के दशक के बाद के साम्राज्यवाद की आक्रामकता के प्रति उसे सचेत किया जा सकता था। इस साम्राज्यवाद की सफलता का राज यही है कि उसने हमारे बीच के ही मनमोहन सिंह, चिदम्बरम, रघुराम राजन या इन्दिरा नूई को अपनी ही जनता के विरूद्ध खड़ा कर दिया -“हमीं में से विदेशी-सा/हमारे बीच का ही एक/नव-साम्राज्यवादी.../लोभ के आवेश में आकर/उजाड़े जा रहा है ज़िन्दगी की बस्तियाँॅ/पददलित मानव- मूल्य/हैं आक्रान्त आत्माएँ/तुम्हें क्या चाहिए/पिस्तौल या वायलिन” (मुक्तिबोध/’उस दिन’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0,पृ0-388)!!

भारत में जब से भूमण्डलीकरण की नीतियाँ लागू हुई हैं, देश की सार्वजनिक सम्पत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट और डाकेजनी से भारत के बड़े पूँजीपतियों और कॉरपोरेट घरानों की पूँजी में असाधारण वृद्धि हुई है। लूट का कुछ टुकड़ा पाकर उच्च मध्यवर्ग का एक हिस्सा भी समृद्धि के चारागाह में अघाया फिरता है। उसे हर तरफ हरा-भरा ही दिखता है। दूसरी तरफ जन साधारण की स्थिति बद से बदतर हुई है। चमचमाते और जगमगाते हुए विश्व बाजार से उसे निष्कासित कर दिया गया है। लाखों किसानों, आदिवासियों की उपजाऊ जमीन का जबरन अधिग्रहण कर हमारी चुनी हुई सरकारों के द्वारा कॉरपोरेट घरानों को दे दिया गया। पिछले पन्द्रह-बीस वर्षों में विश्व बाजार के दुश्चक्र में फँसकर चार लाख किसानों ने भूमण्डलीकरण की बलि बेदी पर अपनी कुर्बानी दी। मजदूरों से जुड़े सारे श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ायी गयी। वेतन जाम, छँटनी की असह्य पीड़ा के लम्बे दौर से उन्हें गुजरना पड़ा। ज़रूरत के अनुसार उन्हें काम पर रखा गया और ज़रूरत खत्म होते ही इस्तेमाल की गयी वस्तुओं के खोखे की तरह फेंक दिया गया। नौकरीपेशा लोगों से बुढ़ापे का पेंशन छीना गया। स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के कारण बीमार होने पर गरीबों के पास मरने के सिवा और कोई चारा नहीं है। शिक्षा खरीद-फरोख्त और मुनाफे का व्यवसाय बन गया है। डीजल, पेट्रोल और बिजली की बढ़ती कीमतों और मँहगाई की मार से जनता त्रस्त रहती है। वस्तुओं और सेवाओं पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ उसके कंधों पर ही डाला जाता है। यह त्रस्त दीन-हीन जनता उब कर सरकारें तो बदल देती हैं पर जनविरोधी नीतियाँ पूर्ववत् जारी रहती हैं। उनके जीवन में कोई तब्दीली नहीं आती। असह्य है इस जनसाधारण की वेदना। खून की आखिरी बून्द तक उसे निचोड़ा जाता है। इस निरीह, दयनीय जन का जैसा करुण और त्रासद बिम्ब मुक्तिबोध की कविता में मिलता है, वैसा समकालीन कविता में अन्यत्र दुर्लभ है-“जनता को ढोर समझ/ढोरों की पीठ भरे/घावों में चोंच मार/रक्त-भोज, मांस-भोज/करते हुए गर्दन मटकाते दर्प भरे कौओं- सा/भूखी अस्थि-पंजर शेष/नित्य मार खाती-सी/रँभाती हुई अकुलाती दर्दभरी/दीन मलिन गौओं-सा/शब्दों का अर्थ जब।/दुनिया को हाट समझ जन-जन के जीवन का /मांस काट,/रक्त-मांस विक्रय के/प्रदर्शन की प्रतिभा का/नया ठाठ/शब्दों का अर्थ जब/नोच-खसोट, लूट-पाट” (मुक्तिबोध/’शब्दों का अर्थ जब’/मुक्तिबोध रचनावली : दो, वही0, पृ0-39) यह किसी जीवंत देश का नहीं विस्तीर्ण कत्लगा़ह का घृणित बिम्ब है, जहाँ कसाई सत्ता अपने समस्त कौशल से भरे बाजार में अपनी ही जनता के रक्त, मांस का व्यापार करती है। इसलिए इसके आकाश में मुक्तिबोध को उड़ते हुए चील और गिद्ध दिखाई देते हैं-“देखता हूँ, जीवन का यह दृश्य कि वही/उभर आती है, मरी हुई गाय की, गिद्धों की,/उड़ती चीलों की/वीरानी की तसवीर” (मुक्तिबोध/’कहते हैं लोग-बाग’/ मुक्तिबोध रचनावली : एक/वही0, पृ0-284)।

हमारे वर्तमान समय में बौद्धिक ऊष्मा, प्रखरता और तेजस्विता की कमी अखरती है। एक खास तरह का बौद्धिक ठंडापन समाज की जड़ता को भंग कर पाने में अक्षम है। ज्ञान और बुद्धि की गरिमा जन मन से तम, भ्रम, भय को दूर कर उसे मुक्ति के मार्ग की ओर प्रेरित करने में है। वह किसी कर्महीन, निष्क्रिय और शून्य वातावरण में पैदा नहीं होता। वह जूझते, लड़ते और संघर्ष करते हुए विकसित होता है। यह किसी गहरी पीड़ा और उद्विग्न कर देने वाली चिन्ता की कोख से जन्म लेता है। सूर्य के प्रकाश की तरह झूठ और असत्य के कुहरे को छिन्न-भिन्न कर यह दबे-छुपे सत्य को अनावृत कर देता है। स्वार्थ इसके तेज को ख़त्म कर देता है और भय से इसकी धार कुंद हो जाती है। एक तरफ ज्ञान हमारी संवेदना को व्यापक बनाता है तो दूसरी तरफ संवेदना से रहित ज्ञान शुष्क और नीरस होकर मात्र बुद्धिविलास बन जाता है। मुक्तिबोध इसीलिए ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान की अवधारणा विकसित करते हैं।

भारतीय समाज के पिछड़ेपन का बहुत बड़ा कारण यह है कि यहाँ ज्ञानियों और बुद्धिजीवियों का जीवन और कर्म से कोई वास्ता नहीं है। जन-जीवन से आवयवयिक रूप से जुड़ाव नहीं है। इसीलिए उनमें बौद्धिक मौलिकता का तेज न होकर उधार के विचारां का बासीपन है। यहाँ बुद्धि जन-जीवन की भट्ठी से तपकर निकलने की जगह स्वार्थ और सत्ता सुख की चाहत में शोषक, शासक वर्ग से नाभि-नाल बद्ध है। ऐसे बुद्धिजीवियों का न तो जन-जीवन के समक्ष उत्पन्न गंभीर प्रश्नों से कोई सम्बन्ध होता है और न ही उनके समक्ष उत्पन्न चुनौतियों से। ऐसे मूढ़ सिर्फ ज्ञानी और बुद्धिजीवी होने का भ्रम रचते हैं। ऐसे बुद्धिजीवियों के प्रति मुक्तिबोध ने ठीक ही कहा है-“रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग/नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे,/प्रश्न की उथली-सी पहचान/राह से अनजान/वाक् रूदन्ती”। ऐसे बुद्धिजीवियों की बुद्धि जनता को मुक्त करने की जगह उसे उत्पीड़ित करने का साधन बन जाती है। सत्ता के हाथों अपनी बुद्धि को बेच देने वाले ऐसे बुद्धिजीवियों के प्रति मुक्तिबोध की कविता के भीतर अपार गुस्सा और घृणा का भाव है। उन्होंने इन्हें कृतदास कहा है। इनकी तुलना गटर में रहने वाले केंकड़े, जंगल के सियारों और उद्धवस्त मुहल्लों में जमीन सूँघने वाले श्वानों से की है-“जंगली श्रृगाल सौ बुद्धि-भ्रष्ट/निर्बोध प्राणियों को खा जाते या देते हैं महाकष्ट/विश्वास-स्नेह अभिशापग्रस्त/स्वार्थान्ध सभ्यता की प्राचीरों के पथरीले तल समीप/की भूमि खोद/औ’ नरम-नरम मिट्टी निकालकर एक ओर/गह्वर-गह्वर में करते हैं आराम श्वान/ये रोज शाम/उद्धवस्त मुहल्लों की जमीन सूँघते हुए/फिरते रहते चिर- उदरम्भरि ये कामचोर-/अवसरवादी ये बुद्धिमान” (मुक्तिबोध/’साँझ रँगी ऊँची लहरों में’/मुक्तिबोध रचनावली : एक/वही0, पृ0-336)!!

मुक्तिबोध अपने दौर के और आज के समकालीन कवियों से इसलिए भिन्न हैं कि उनमें बौद्धिक तटस्थता और ठण्डेपन की जगह ज्ञान का गहरा तनाव है। उनका हृदय समुद्र की लहरों की तरह उद्वेलित होकर पछाड़ खाता है। अन्तर्मन किसी ज्वालामुखी की तरह धधकता है। जनवेदना इतनी प्रचण्ड और वेगवान है कि उसके आगे कोई अवरोध टिक नहीं पाता। हर ज्ञानात्मक और बौद्धिक निष्कर्ष को उनमें अपने चरित्र में उतारने की विकलता है। हमारे दौर के तथाकथित ज्ञानियों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों को मुक्तिबोध के इस ज्ञानात्मक तनाव, आन्तरिक उद्वेलन, जनवेदना की प्रचण्डता और व्यक्तित्व की विकलता से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है।

अस्मिताओं और सभ्यताओं के संघर्ष पर बल देकर वर्ग संघर्ष को वैश्विक स्तर पर झुठलाने के प्रयत्न जारी हैं। ऐसे में मुक्तिबोध के सचेत, सक्रिय और तीक्ष्ण वर्गीय बोध से जुड़ना आश्वस्तकारी है। यह वर्गीय बोध ही हमारी प्रतिबद्धता को तय करता है। इसलिए उन्होंने अपनी कविता में सीधे-सीधे पूछा था-“किस ओर हो तुम, अब/सुनहले उर्ध्व-आसन के/निपीड़क पक्ष में, अथवा/कहीं उससे लूटी-टूटी/अँधेरी निम्न-कक्षा में तुम्हारा मन,/कहाँ हो तुम” (मुक्तिबोध/’चकमक की चिनगारियाँ’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-237)? उसका जवाब भी वे अपनी कविता में ही देते हैं। संसार के महान प्रतिभाओं की तरह उन्होंने भी साधारण में असाधारणता को देखते हुए स्वीकार किया कि “पेटों की आँतों में न्यूनों की पीड़ा है/छाती के कोषों में रहितों की बीड़ा है” (मुक्तिबोध/’मैं तुम लोगों से दूर हूँ’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-219)। एक बुर्जुआ समाज में जिन शोषित, उत्पीड़ित और वंचित लोगों से घृणा की जाती है, मुक्तिबोध की आत्मा में उनके लिए अपार स्नेह है। उनकी विश्वदृष्टि को यह शोषित और सर्वहारा वर्ग ही तय करता है। उसी के नजरिये से वे दुनिया को देखते हैं और अपने सम्बन्धों की प्राथमिकता तय करते हैं-“उनका जो तुम्हारे द्वारा गर्हित हैं/किन्तु वे मेरी व्याकुल आत्मा में बिम्बित हैं, पुरस्कृत हैं/इसीलिए, तुम्हारा मुझ पर सतत आघात है” (वही0, पृ0-219)!! उन्हें पता था कि ये प्राथमिकताएँ, प्रतिबद्धताएँ और आस्थाएँ उन्हें दरिद्र बनायेंगी और दुःख-दैन्य ही देगी पर उन्होंने उन्हें त्यागा नहीं।

मुक्तिबोध के समग्र लेखन के मूल में मार्क्सवाद की गहरी समझ है। उन्होंने मार्क्सवाद को आत्मसात् किया था। वे जानते थे कि पूँजीवादी शोषण के केन्द्र में व्यक्ति का स्वार्थ है। यह स्वार्थकेन्द्रित शोषण मनुष्य को अमानवीय और आत्महीन बनाता है। शोषण की अतिशयता ही किसी सभ्यता के विनाश का कारण बनती है-“शोषण की अति मात्रा/स्वार्थों की सुख- यात्रा,/जब-जब सम्पन्न हुई,/आत्मा से अर्थ गया, मर गयी सभ्यता,” (मुक्तिबोध/’एक स्वप्न कथा’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-268)। वर्गीय शोषण पर आधारित व्यवस्था को समाप्त करना ही क्रांति है। इस क्रांति को जनता ही संभव बनाती है। सरल-सहज, भोली-भाली जनता ही सचेत और संगठित होकर भावी समाज को जन्म देती है-“मिट्टी के लोंदे में किरणीले कण-कण/गुण हैं,/जनता के गुणों से ही संभव/भावी का उद्भव”। पूँजीपति वर्ग समाज के इस आमूल परिवर्तन का घोर विरोधी होता है। मध्यवर्ग का चरित्र प्रायः ढुलमुल होता है। स्वार्थ और समझौता इसे रीढ़हीन बना देता है। हमेशा शोषित, उत्पीड़ित, पददलित लोग ही आगामी समाज के सच्चे शिल्पकार होते हैं। मुक्तिबोध ने साफ-साफ कहा है,“ ज़िन्दगी का रास्ता/पूँजीवादी दानवों औ’ मध्यवर्गी नपुंसक मानवों/की वंचना-नगरी से छिटक कर/टूटे-फूटे घरोंवाली सील खायी/गलियों के अँधेरे में/रहनेवाले आगामी युगों के स्रष्टाओं/के चौराहों पर मिलता है,” (मुक्तिबोध/’ज़िन्दगी का रास्ता’/मुक्तिबोध रचनावली : एक/पृ0-277)। लेकिन इन साधारण जनों, सर्वहारा लोगों को सचेत बनाने में चेतनशील मध्यवर्ग की भी बहुत जरूरत होती है। इसलिए मुक्तिबोध गहरे आत्म संघर्ष के बल पर खुद को व्यक्त्विन्तरित कर निम्न वर्ग से अपने-आपको जोड़ते हुए स्वीकार करते हैं, “मैं कनफटा हूँ हेठा हूँ,/शेब्रेलेट डाज के नीचे लेटा हूँ/तेलिया लिवास में पुरजे सुधारता हूँ,” (मुक्तिबोध/’मैं तुम लोगों से दूर हूँ’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-220)। जन जीवन से जुड़ाव की यह तीव्र और सघन आकांक्षा एवं वर्गान्तरण का प्रयास ही मुक्तिबोध की कविता को विलक्षण बनाता है। अपनी एक अन्य कविता में भी वे स्वीकार करते हैं कि मध्यवर्ग की मुक्ति निम्न वर्ग के लक्ष्यों से जुड़कर ही होगी। एकीकृत लक्ष्यों को पाने के क्रम में ही उसके भीतर गुणों का विकास होगा-“तुम्हारी मुक्ति उनके प्रेम से होगी।/कि तद्गत लक्ष्य में से ही/हृदय के नेत्र जागेंगे,/व जीवन लक्ष्य उनके प्राप्त/ करने की क्रिया में से/उभर ऊपर/विकसते जायेंगे निज के/तुम्हारे गुण/कि अपनी मुक्ति के रास्ते/अकेले में नहीं मिलते,” (मुक्तिबोध/’चकमक की चिनगारियाँ’/मुक्तिबोध रचनावली :दो/वही0, पृ0-235)। मुक्तिबोध जब भारत की साधारण जनता को सम्बोधित करते हैं तो उसके लिए उनके भीतर से गहरा प्रेम, स्नेह और अपनापा का भाव उमड़ता है। उनकी कविताओं में जनसाधारण के लिए गहरी आत्मीयता का भाव है।

मुक्तिबोध जैसे ईमानदार व्यक्ति के लिए समाजवाद का संघर्ष दुहरा संघर्ष था, अपने-आप से भी और समाज से भी। यह लड़ाई दुतरफा है। बिना अपने-आप को बदले समाज को बदलने का प्रयास अधूरा होगा। इसलिए मुक्तिबोध के यहाँ आत्म संघर्ष और आत्मालोचना का स्वर प्रबल हैं। विवेक के तीखे रन्दे और वसूला से वे निरन्तर अपने-आप को छीलते हैं। अपनी कमज़ोरियों और सीमाओं को स्वीकार करते हैं। खुद अपने-आप से खिन्न और अप्रसन्न रहते हैं। अपने-आप से खिन्नता और अप्रसन्नता ही हमें आन्तरिक बदलाव के लिए मजबूर करता है। वे कहते हैं-,“फिर भी, मैं अपनी सार्थकता में खिन्न हूँ/ निज से अप्रसन्न हूँ/इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए/पूरी दुनिया साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए/वह मेहतर मैं हो नहीं पाता“ (मुक्तिबोध/’मैं तुम लोगों से दूर हूँ,’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0,पृ0-219)। अपनी कमियों का स्वीकार और आत्मालोचन की यह प्रवृत्ति आज दुर्लभ है। व्यक्तिगत स्तर पर भी और राजनीतिक, सामाजिक स्तर पर भी। हमारी वामपंथी पार्टियों ने भी अतीत और वर्तमान में कई गंभीर भूलें की हैं पर आज भी वे आत्मालोचन के लिए तैयार नहीं हैं। मुक्तिबोध हमें इसके लिए तैयार करते हैं।

भूमण्डल की इस स्वप्नहीन रात में मुक्तिबोध की कविताओं में रचे गये मानवीय मुक्ति के महास्वप्न के सक्रिय और विराट बिम्ब हमें बेहद आकर्षित और प्रेरित करते हैं। मुक्तिबोध का समय समाजवाद के सपने का समय था लेकिन आज वह स्वप्न टूटकर विखर चुका है। यह सच है कि आज भी समाजवाद मानवीय सभ्यता का आगामी भविष्य है पर मुक्तिबोध के लिए वह स्वप्न जितना करीब रहा होगा, आज हमारे लिए उतना ही दूर है। किसी भी व्यक्ति, जाति या राष्ट्र के लिए स्वप्न का होना बहुत जरूरी है। सपने हमें बन्धन से मुक्ति और सीमा से असीम की ओर उछालते हैं। पाश ने ठीक ही कहा था-’सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना’। आज हम इसी खतरनाक दौर में हैं। मुक्तिबोध और हमारे सपनों के बहुत सारे संगी-साथी आज दुःस्वप्नों की स्थिति को अंगीकार कर चुके हैं। वर्तमान के कीचड़ में वे इस तरह से धँसे हैं कि मानवता का सुन्दर भविष्य उनकी आँखों से ओझल है। हमारे समय के बहुत सारे हमारे अपने लोग आज दुश्मनों के खेमे के सिपहसालार हैं। उनकी प्राथमिकताएँ और प्रतिबद्धताएँ बदल चुकी हैं। ऐसे में मुक्तिबोध की ये पंक्तियाँ पढ़कर लगता है कि उन्होंने अपने समय के लिए नहीं, हमारे समय की पीड़ाओं को आत्मसात कर लिखा था-“लोगों, एक जमाने में/तुम मेरे ही थे/बहुत स्वप्नद्रष्टा चिन्तक थे कवि थे/क्रांतिकारी रवि थे!!/अब कहाँ गये वे स्वप्न/उन्हें किस कचरे के ढीह में/यत्नपूर्वक जला दिया/उदरम्भरि बुद्धि के मलिन तेल में/स्वयं को गला दिया धातु-सा।/इस विषम जगत्/के शोषित पथ/की करुणाओं से जब आत्मा/में गर्भधारण हुई/व सत्य-भ्रूण उन्मुक्त विकसने लगा/कि तब,/तुम लज्जित थे।/तुम भ्रूण अवैधानिक समझ/उसको इरादतन गिरा दिया,” (मुक्तिबोध/’भविष्य-धारा’/ मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-115, 16)। दुनिया भर के शोषितों, उत्पीड़तों की आह से समाजवाद के स्वप्न ने आकार लिया था। लेकिन व्यक्तिगत स्वार्थ और निर्बन्ध उपभोग की स्याह इच्छाओं ने मानवीय सभ्यता के भविष्य की भू्रण हत्या कर दी। इसका अभिशाप आज विश्व जनगण के सिर के ऊपर शैतान की तरह मँडरा रहा है।

मुक्तिबोध इस सत्य से परिचित थे कि ’कभी अकेले में मुक्ति नहीं मिलती, यदि वह है तो सबके साथ है’। इसलिए उन्होंने सामूहिक, समग्र जनक्रांति का सुन्दर और क्रियाशील बिम्ब रचा। वे अपनी भुजाओं के आयुध से जन शत्रुओं से लगातार लड़ना चाहते हैं। क्रांति उनके लिए कोई छोटा-मोटा क्षुब्ध परिवर्तन न होकर व्यक्ति और समाज का सम्पूर्ण रूपान्तरण है। यह व्यक्ति और समाज को आमूल-चूल बदल देने वाली परिघटना है। ’क्रांति पूरी एक परिणति का नाम’ है। यह बाह्य और आन्तरिक दारिद्र से एक साथ मुक्ति का प्रयास है। हृदय पर इसका प्रभाव बहुत गहरा होता है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो ’तेज धार गहरे धँसते लोहे के हल चल पड़ते हैं, हृदय की धरित्री पर’। यह कुछ लोगों, बुद्धिजीवियों और नेताओं के वश की बात नहीं। सम्पूर्ण जनता क्षुब्ध, संगठित और सक्रिय होकर इसमें अपनी भूमिका निभाती है। इसमें सत्य की ज्वाला, बुद्धि का तेज, आत्मा की तड़प, हृदय से उठती गहरी वेदना, नये जीवन का स्वप्न और संकल्प एक साथ घुलमिल जाते हैं। छोटे से छोटे, साधारण और महत्त्वहीन लोग भी क्रांति की आभा से चमकने लगते हैं। युगों-युगों से बहती वेदना की नदियों का जल पीकर वे खुद को व्यक्त्विन्तरित करते हैं। बच्चे, बड़े, बूढ़े सभी एक साथ दुश्मन पर टूट पड़ते हैं-“राह के पत्थर-ढोकों के अन्दर/पहाड़ों के झरने/तड़पने लग गये/मिट्टी के लोंदे के भीतर/भक्ति की अग्नि का उद्रेक/भड़कने लग गया।/धूल के कण में/अनहद नाद का कम्पन/ख़तरनाक!!/मकानों की छत से/गाडर कूद पड़े/धम से!/घूम उठे खम्भे/भयानक वेग से चल पड़े हवा में।/दादा का सोंटा भी करता है दाव-पेंच,/गगन में नाच रही कक्का की लाठी।/यहाँ तक कि बच्चे की पेमें भी उड़तीं,/तेजी से लहराती घूमती/मुन्ने का सलेट-पट्टी!/एक-एक वस्तु या एक-एक प्राणाग्नि-बम है,/ये परमास्त्र हैं, यम हैं।/शून्याकाश में से होते हुए वे/अरे, अरि पर ही टूट पड़े अनिवार” (मुक्तिबोध/’अँधेरे में’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-352)।

एक अन्यायी, अत्याचारी शासक वर्ग कभी स्वेच्छा से अपनी सत्ता का परित्याग नहीं करता। वह ताकत के बल पर जन विद्रोह और जनक्रांति के दमन का हर संभव प्रयत्न करता है। अतः जनता को भी मजबूर होकर शस्त्र उठाना पड़ता है। इसलिए उपर्युक्त पंक्तियों की तरह अपनी अन्य कई कविताओं में मुक्तिबोध ने जनता के सशस्त्र संघर्ष का उत्साहजनक चित्र खींचा है-“मुझे मालूम,/अनगिन सागरों के क्षुब्ध कूलों पर/पहाड़ों-जंगलों में मुक्तिकामी लोक-सेनाएँॅ/भयानक वार करतीं शत्रु-मूलों पर/व मेरे स्याह बालों में उलझता और/चेहरे पर लहरता है/उन्हीं का अग्नि-क्षोभी धूम” (मुक्तिबोध/’चकमक की चिनगारियाँ/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-239)!! मुक्तिबोध के कलावादी प्रशंसक उनके सशस्त्र संघर्ष में विश्वास और समाजवाद के स्वप्न के बारे में चर्चा करने से कतराते हैं। वे आधे मुक्तिबोध को स्वीकार करते हैं और आधे के बारे में चुप्पी साध लेते हैं।

युगों-युगों से पीड़ा और दर्द के समुन्दर में डूबते-उतराते लोगों की वेदना और बेचैनी को आत्मसात करने के बाद मुक्तिबोध के अन्तर्मन में एक सुन्दर समाज का स्वप्न पलता है। उनका समस्त द्वन्द्व, तनाव, बेकली और संघर्ष इसी स्वप्न को साकार करने के लिए है। उन्हें उस दिन की प्रतीक्षा है जब शोषण के विकराल बोझ के भीतर दबे तमाम व्याकुल और बेचैन लोग अपनी समस्त जीवनी शक्ति को संचित कर उसे उलटकर गर्व के साथ उठ खड़े होंगे। शताब्दियों के दुखों के अंधकार के भीतर से क्रांति की आग भड़केगी। जन-मन के अतल में उमड़ता-घुमड़ता क्षोभ बेहिसाब दबावों को ध्वस्त करता हुआ ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ेगा-“मेरे देश भारत में,/पुरानी हाय में से/किस तरह से आग भभकेगी,/उड़ेंगी किस तरह भक् से/हमारे वक्ष पर लेटी हुई/विकराल चट्टानें/व इस पूरी क्रिया में से/उभरकर भव्य होंगे, कौन मानव गुण?/....... समस्या एक-/मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में/सभी मानव/सुखी, सुन्दर व शोषण-मुक्त/कब होंगे” (मुक्तिबोध/’चकमक की चिनगारियाँ’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-240, 43)?

मुक्तिबोध के द्वारा उठाया गया यह मौलिक प्रश्न कि ’मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में/सभी मानव/सुखी, सुन्दर व शोषण मुक्त कब होंगे’?-आज भी हमारे समक्ष मुँह बाये खड़ा है। उनके समतामूलक समाज का स्वप्न अभी साकार किया जाना शेष है। हम मानवीय सभ्यता के अत्यन्त ही संकटग्रस्त समय में हैं, जहाँ मनुष्य विरोधी ताकतें मानवीय सभ्यता के रथ के चक्के को विपरीत दिशा में ठेल रही है। जो भी सुखद, शुभ और सुन्दर है, उसे दानवी शक्तियाँ अपने खूनी पंजे में जकड़ती जा रही हैं। संघर्ष की जगह सहनशीलता और समर्पण बढ़ा है। क्रांतिकारी ताकतें असंगठित हैं और प्रतिक्रियावादी ताकतें एकजुट और आक्रामक। हमारे असंख्य लोगों के जीवन में दुःख जड़ होकर ठहर गया है लेकिन कुछ उपभोग से अघाये हुए लोग अट्टाहास कर रहे हैं। ऐसे समय में हमें अपनी भूमिका तय करनी है। जनविरोधी, मनुष्यविरोधी बाढ़ में बहने से अपने को रोके रखना है। बुद्धि की तीक्ष्णता और धार को कुंद होने से बचाना है। हृदय का दायरा संकुचित न होने देना है। इस संकट के दौर में यही हमारे साधन और हथियार हैं-“तुम्हारे पास, हमारे पास,/सिर्फ़ एक चीज है-/ईमान का डण्डा है,/बुद्धि का बल्लम है,/’अभय की गेंती है/हृदय की तगारी है-तसला है/नये-नये बनाने के लिए भवन/आत्मा के,/मनुष्य के,” (मुक्तिबोध/’कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-289)। इसके साथ ही हमें अपनी कमजोरियों को स्वीकार करना है। अपनी आत्मालोचना की पीड़ा से गुजरना है। अपने विश्लेषणों, निष्कर्षों, कार्यनीतियों और रणनीतियों पर पुनर्विचार करना है। मानवीय सभ्यता को अगले पड़ाव तक ले जाने की जिम्मेवारी जिन मार्क्सवादी और समाजवादी लोगां के कंधों पर थी, उनकी भूमिका के संदर्भ में मुक्तिबोध की ये पंक्तियाँ आत्मालोचन का अवसर प्रदान करती है-“ठीक है कि हम भी तो दब गये,/हम जो विरोधी थे/कुओं-तहखानों में कैद-बन्द,/लेकिन, हम इसलिए/मरे कि ज़रूरत से/ज्यादा नहीं, बहुत-बहुत कम/हम बाग़ी थे” (मुक्तिबोध/’एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्म-कथन’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-137)!!

देश और समाज में आमूल-चूल परिवर्तन और क्रांतिकारी बदलाव हमेशा सचेत और सक्रिय जनता के माध्यम से ही संभव है पर जनसाधारण में भी कई तरह की कमजोरियाँ और बुराईयाँ होती हैं। ऊँच-नीच, जाति, वर्ण, धर्म, सम्प्रदाय कई तरह के दुर्गुणों से वह लिथड़ी होती है। छद्म चेतना और अंधविश्वास से घिरी होती है। इस जन जीवन में गहरे पैठकर इन तमाम गंदगियों और कचरों को साफ किये बिना, उनमें फँसे मनुष्यों को उससे बाहर निकाले बिना, किसी सभ्य और सुन्दर समाज का निर्माण संभव नहीं है। मुक्तिबोध इसीलिए अपनी कई कविताओं में मेहतर की भूमिका अपनाना चाहते हैं। सचेत मध्यवर्ग को यह भूमिका अपनानी ही होगी। दूसरी तरफ अन्याय और अत्याचार पर आधारित सभ्यता की अपनी बंदिशें, क्रूरताएँ, यातनाएँ और मकड़जाल हैं। इनसे भी मुक्ति के लिए उन्हें प्रेरित करना है। यह संघर्ष दुतरफा है। जनता की कमजोरियों से भी और सत्ता के शोषण, दमन और यातनाओं से भी। इस संघर्ष के लिए सचेत और प्रतिबद्ध मध्य वर्ग को अपने जीवन को समिधा बनाना होगा। अपने समस्त मध्यवर्गीय संस्कारों से मुक्त होकर जन-जीवन के गहरे अंधकार में उतरकर उन्हें चेतना से दीप्त करना होगा-“बीच सड़क में खुला है एक अँधेरा छेद,/एक अँधेरा गोल-गोल/वह निचला-निचला भेद,/जिसके गहरे-गहरे तल में/गहरा गन्दा कीच।/उनमें फँसे मनुष्य...../घुसो अँधेरे जल में/-गन्दे जल की गैल/स्याह भूत से बनो, सनो तुम/मेन होल से मनों निकालो मैल/काल अग्नि के बनो प्रचण्ड हविष्य/जबकि सभ्यता एक अँधेरी/भीम भयानक जेल-/तोडो़ जेल, भगाओ सबको, भागो खुद भी,” (मुक्तिबोध/’भविष्यधारा’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-123)!! यह संक्रमण का काल है। संवेदनशील चिन्ता-ग्रस्त और बेचैन लोगों को धीरज रखने की जरूरत है। पक्षियों द्वारा अंडों को सेने की तरह। भविष्य के गर्भस्थ चूजे अभी काल के कड़े और कठोर खोल में कैद हैं। ऐसे समय में मुक्तिबोध की कविताएँ हमें सीख देती हैं कि हम धैर्य के साथ व्यापक और उपेक्षित जन-जीवन से अपना सम्बन्ध और सम्पर्क बनायें रखें। हमें जीवन के चमकते रत्न वहीं मिलेंगे। उन्हीं के भीतर और बाहर का सम्पूर्ण सर्वेक्षण कर हम अपनी बुद्धि और ज्ञान को सम्पन्न करें, जिसके आलोक में भविष्य के सचेत, सकर्मक और दृढ़ प्रतिज्ञ लोग आगे बढ़ेंगे-“ओ नागात्मन्/ संक्रमण-काल में धीर धरो,/ईमान न जाने दो!!/तुम भटक चलो,/इन अन्धकार- मैदानों में सर-सर करते!!/शत उपेक्षिता भूमि में फिँके/चुपचाप छिपाये गये/शुक्र, गुरु, बुध, मंगल/कचरे की परतों-ढँके तुम्हें मिल जायेंगे!!/खोदो, जड़ मिट्टी को खोदो!/ओ भू-गर्भशास्त्री,/भीतर का बाहर का/व्यापक सर्वेक्षण कर डालो,” (मुक्तिबोध/’ओ काव्यात्मन् फणिधर’/मुक्तिबोध रचनावली : दो/वही0, पृ0-184)।

कुल मिलाकर मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो उनकी कविताएँ ज़िन्दगी की कोख से जनमा हुआ नया इस्पात है, जिससे बेहतर इन्सान और एक सुन्दर समाज का ढाँचा खड़ा किया जा सकता है। आज झूठ के इस फैलते साम्राज्य में ’सत्य से सत्ता के युद्ध’ के विरूद्ध उनकी कविता में चमचमाते आयुधों की कमी नहीं है। उन्हें विश्वास है कि ’ज़िन्दगी बुरादा है तो बारूद बनेगी ही’। इस अँधेरी रात के जंगल में आग के फूल अवश्य खिलेंगे। उनकी कविताओं में युगों से बहती मनुष्य की वेदना नदियों की एक-एक लहरों का लेखा-जोखा होने के साथ-साथ मानव मुक्ति के शिलालेख भी हैं। धरती के भीतर बहती धारा के तल में चमकते पत्थरों और द्युतिमान मणियों से लेकर जंगल, पठार, पहाड़, समुद्र से लेकर ब्रह्माण्ड के नेब्युलाओं तक उनकी कविता का प्रसार है। उन सबके भीतर और बाहर का व्यापक सर्वेक्षण है।

समकालीन कविताएँ अपने शिल्प में पुनः नई कविता की कटी-छँटी, बनी-सँवरी कविताओं की ओर लौट रही हैं। उनमें जीवन द्रव्य और जीवन राग की कमी है। मुक्तिबोध ने नई कविता को जिस तरह मध्यवर्गीय और नगरीय बोध के दायरे से बाहर निकाला और लम्बी कविता के जटिल शिल्प को विकसित किया, उससे प्रेरणा लेकर समकालीन कविताएँ अपनी जड़ता को भंग कर सकती हैं। मुक्तिबोध की भाषा वजनदार पत्थर की तरह है जो चोट करती है, दिल की गहराई में उतरती है, खुद को और विरोधियों को लहूलुहान करती है और आकाश के सघन अंधकार में रोशनी की सूराख बनाती है। उनके गैर पारंपरिक बिम्ब धरती के गर्भ से निकले अनगढ़ तप्त रत्नों की तरह रश्मियाँ बिखेरते हैं। उनकी कविता में यथार्थ के विकट अनुभव, तीक्ष्ण और धारदार विचार, विकल जनवेदना, दिमाग की नसों को दरका देने वाला तनाव, जन साधारण के प्रति गहरी श्रद्धा और आस्था एवं रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा देने वाले स्वप्न आपसी अन्तर्क्रिया से एक ऐसा सान्द्र जीवन द्रव्य तैयार करते हैं जो हमें पूरी तरह रूपान्तरित कर देता है। हमारी दुनिया बहुत बड़ी हो जाती है। ये कविताएँ हमारी आन्तरिक शान्ति को विनष्ट कर हमें गहरे रूप में उद्वेलित करती हैं। वह धोबी के कपड़े की तरह हमें भिगोती है, पछीटती है और सत्य की रोशनी में वक्त की रस्सी पर सूखने को डाल देती है।

 

सियाराम शर्मा का पता है-

7 / 35 इस्पात नगर रिसाली सेक्टर

भिलाई नगर जिला दुर्ग छत्तीसगढ़

मोबाइल नम्बर- 09329511024

 

 

 

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दारू के अड्डे में लेखक किशनलाल की किताब का विमोचन

रायपुर. देश-प्रदेश के आत्ममुग्ध लेखकों और साहित्यकारों को यह खबर थोड़ी खराब लग सकती है, लेकिन यह हकीकत है कि छत्तीसगढ़ के एक लेखक किशनलाल ने अपनी तीसरी किताब चीटियों की वापसी का विमोचन दारू के अड्डे (अहाते ) पर किया. इस जगह का चयन  क्यों किया गया...? इस बारे में स्वयं किशनलाल कहते हैं- उपन्यास में जो मजदूर पात्र शामिल है वे यहीं आसपास रहते हैं. जिनके लिए लिखा गया है वहीं लोग इसका विमोचन करें... यह उनकी हार्दिक इच्छा थीं.

 

सामान्य तौर पर सभ्य लोग जिनमें साहित्यकार भी शामिल है वे शराब दुकान जाने से हिचकिचाते हैं. कभी जाना भी हुआ तो मुंह पर कपड़ा बांधकर बचते-बचाते पहुंचते हैं और चुपके से बोतल लेकर घर का रूख कर लेते हैं. हालांकि जब हरिवंश राय बच्चन ने मधुशाला लिखी थी तब शराब ठिकानों का एक क्रेज हुआ करता था... धीरे-धीरे साहित्यकार सिर्फ बेवड़े होकर रह गए और साहित्य पीछे छूट गया. अब साहित्यकार या तो बंद कमरे में लिखते हैं या फिर सरकारी खर्चें पर विश्वविद्यालयों में लेक्चर देते हुए नजर आते हैं. लेखक किशनलाल कहते हैं- मैं जब शराब ठिकाने के अहाते में आयोजन के बारे में सोच रहा था तब यह सवाल भी सामने आया कि शराबखाना या आहाता पवित्र नहीं है, लेकिन मेरे लिए हर जगह पवित्र है. दूसरी एक बात यह भी है कि ऐसी जगहों पर कार्यक्रम करने पर किराया नहीं देना पड़ता है. लेखक ने कहा कि अधिकांश साहित्यकार संकीर्ण, पूर्वाग्रही और दोहरा चरित्र रखकर जीते हैं. तथाकथित मुख्यधारा के साहित्यकार दलित साहित्य को हेय और उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं जबकि गुणवत्ता की दृष्टि से हमारा लेखन भी किसी से कम नहीं है.    

आपको बता दें कि कार्यक्रम राजधानी के आमा सिवनी स्थित शराब दुकान के अहाते में किया गया. कार्यक्रम को देखने-सुनने के लिए बड़ी संख्या में ऑटो-रिक्शा चालक, बढ़ई, मिल-कारखानों के मजदूर व भवन निर्माण करने वाले कामगार मौजूद थे. कार्यक्रम के अतिथि के रूप में रूपचंद रात्रे, तुलेश्वर सोनवानी, जितेन्द्र चेलक और छोटू जोशी मौजूद थे. ये सभी मजदूर राजधानी के डॉ. भीमराव अंबेडकर वार्ड के मोवा निवासी हैं जो कि उपन्यास के पात्र हैं. अतिथियों के स्वागत व कृति के विमोचन के बाद लेखक किशनलाल ने उपन्यास के महत्वपूर्ण हिस्से का पाठ किया. कार्यक्रम इतना दिलचस्प हो गया था कि लोग कुछ देर के लिए शराब पीना छोड़कर बड़े ध्यान से रचनाकार के पाठ को सुनने लगे थे.

नवभारत में छपी थी पहली कविता

किशनलाल नाम छत्तीसगढ़ के साहित्य-पाठकों के लिए कोई नया नहीं है. इनकी कई कविताएं, कहानियां, व्यंग्य, लेख आदि रायपुर से प्रकाशित विभिन्न समाचार पत्रों के अलावा राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं. साथ ही दर्जनों कविताएं और कहानियां आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित हो चुकी हैं. किशनलाल ने बताया कि उनकी कविता पहली बार नवभारत में ही प्रकाशित हुई थी. जब वे बीए में पढ़ रहे थे तभी पहली बार आकाशवाणी रायपुर में उनकी कविताएं प्रसारित हुई थीं। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिकाएं सूत्र, ककसाड़, वागर्थ, बया सहित अन्य में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी है.

कई अखबारों में कर चुके हैं काम

केंद्रीय विद्यालय, जवाहर नवोदय विद्यालय सहित विभिन्न हायर सेकंडरी स्कूलों में हिन्दी अध्यापन कर चुके  उपन्यासकार किशनलाल एक बेहतर पत्रकार भी हैं. वे प्रखर समाचार, देशबंधु, जनसत्ता, नवभारत, पत्रिका और पायनियर जैसे अखबारों में उप संपादक की हैसियत से कार्य कर चुके हैं.  वर्तमान में वे राजधानी के एक वेब न्यूज चैनल में वरिष्ठ उपसंपादक के तौर पर कार्यरत है.

कविता से ही हुई थी शुरूआत

छत्तीसगढ़ के एकमात्र दलित उपन्यासकार के रूप में ख्यात किशनलाल ने अपने लेखन की शुरुआत कविताओं से की थी। इनका पहला काव्यसंग्रह 'जहां कवि होगा' उद्भावना प्रकाशन गाजियाबाद से प्रकाशित हुआ है. दूसरी कृति के रूप में इन्होंने दलित चेतना पर केंद्रित अपना पहला उपन्यास 'किधर जाऊं' लिखा. इस उपन्यास से किशनलाल को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली. इसी कृति पर उन्हें लखनऊ से प्रथम लोकोदय नवलेखन सम्मान प्राप्त हुआ. इसके अलावा उन्हें  स्व. बंशीलाल भारद्वाज साहित्य व पत्रकारिता सम्मान भी मिल चुका है. 'चींटियों की वापसी' एक उपन्यास है जो पूरी तरह रायपुर शहर पर केंद्रित है.

( किशनलाल को इस मोबाइल नंबर पर बधाई दी जा सकती है- 7389714155 ) 

 

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आज हिंदी दिवस पर विशेषः राजभाषा को जनभाषा बनाने के लिए करना होगा आंदोलन

अम्बरीश त्रिपाठी

भारत को प्राचीनतम गणतंत्र-जनतंत्र होने का गौरव प्राप्त है लेकिन  दो- ढाई हजार सालों  तक के इतिहास में जनता या जनगण की भाषा राजभाषा नहीं रही। जब जनता  पाली, प्राकृत ,अपभ्रंश और बोलियों के समूह के रूप में हिंदी का प्रयोग कर रही थी तो शासन क्रमशः संस्कृत, पाली, अरबी, फ़ारसी ,अंग्रेजी को राजभाषा के रूप में व्यवहृत कर रहे थे। इस बड़ी सांस्कृतिक और भाषिक विरोधाभास की पृष्ठभूमि में 14 सितंबर 1949 में स्वतंत्र भारत की संविधान ने जनभाषा हिंदी को इतिहास में पहली बार राजभाषा का दर्जा दिया।

 राजभाषा का मतलब है राज-काज की भाषा,अर्थात शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा अर्थात सरकार और जनता  के बीच होने वाली संवाद की भाषा। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में भी गणतंत्र का मतलब जनता का,जनता द्वारा जनता के लिए ही शासन होता है।यहाँ पर राजभाषा का उद्देश्य भी जनता के कल्याण में ही निहित होना चाहिए। पर ऐसी बात है नहीं। क्योंकि हम शीघ्र ही भूल गए कि अरबी ,फारसी और अंग्रेजी आदि भाषाओं को ही राजभाषा बनाकर  भारतीय जनता के बहुविधि शोषण का मार्गप्रशस्त किया जाता रहा।और आज आज़ादी के70 से अधिक सालों बाद भी राजभाषा हिंदी जनभाषा हिंदी से कोसों दूर है,अलग है।

 हिंदी की अनेक बोलियों और उनके समृद्ध साहित्य ने हिंदी को राजभाषा बनने का आत्मविश्वास दिया।विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी, जायसी और मीरा सरीखे रचनाकारों ने देश के कोने कोने तक हिंदी की मधुर तान पहुंचाई।" निज भाषा उन्नति अहै ,सब उन्नत को मूल । बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को शूल।। " आजादी के नारों का मूल स्वर बन गया था।आज़ादी का सूरज उगने की लालिमा के साथ ही भारत के बहुसंख्यक समुदाय द्वारा समझी बोली जाने वाली जनभाषा हिंदी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की मांग प्रखर होती चली गई। अंततः राजभाषा के रूप में हिंदी को संवैधानिक दर्जा दे दी गई। और इस तरह जनभाषा हिंदी को राजभाषा बनाने का संघर्ष सफल हुआ। तो क्या अब हम कह सकते हैं कि राजभाषा  हिंदी ही भारत की जनभाषा है? नहीं।

राजभाषा के लिए पारिभाषिक शब्दों का निर्माण मुख्य रूप से- सृजन, ग्रहण,संचयन एवं अनुकूलन जैसी चार प्रक्रियाओं द्वारा हुआ।अँग्रेजियत से प्रभावित कुछ विद्वानों ने अंग्रेजी रूप या उसके निर्जीव अनुवाद /पर्याय के रूप में अधिकाधिक पारिभाषिक शब्दों का गठन किया।इस प्रक्रिया पर गुरुदेव टैगोर ने कड़ी टिप्पणी की थी" हमने अपनी आँखें खोकर चश्मे लगा लिए हैं "। दरअसल हिंदी राजभाषा तो बनी पर अकबर इलाहाबादी के शब्दों में कहूँ तो -"उन्हीं के मतलब की कह रहा हूँ , ज़बान मेरी है बात उनकी।" 

दरअसल  हिंदी को राजभाषा के रूप में गढ़ने वाले लोग अधिकांशतः उच्च शिक्षित अभिजात्य वर्ग के लोग थे।जिनके खुद की उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही रहा।उस समय की बड़ी जरूरत भी थी अंग्रेजी की प्रचलित परंपरा के बरक्स हिंदी को खड़ी करने की। संविधान में इसके लिए 15 वर्ष का समय भी निर्धारित किया गया। 15 वर्षों बाद भी अंग्रेजी तो हटी नहीं और खुद राजभाषा भी अंग्रेजीदां हो गई। विडंबना यह भी हुई कि जो राजभाषा तैयार हुई वो न जनता की भाषा थी, न ही महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली भाषा। सात दशकों बाद भी आज संघ लोक सेवा और राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं सहित लगभग सभी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में  विवाद की स्थिति में प्रश्नपत्र का अंग्रेजी रूप ही क्यों मान्य है। हम आज तक राजभाषा हिंदी में कोई मौलिक प्रश्नपत्र क्यों नहीं तैयार कर सके। समानता के नाम पर अंग्रेजी के स्टील प्लांट को इस्पाती पौधा अनूदित करना कौन सा न्याय है , इंडिविजुअल की हिंदी व्यष्टिक करना और मॉडिफिकेशन को आपरिवर्तन कर कौन सा उद्देश्य पूरा किया जा रहा है वह भी संघ लोक सेवा जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में। क्या ये हिंदी माध्यम को हतोत्साहित करने का उपक्रम नहीं है। क्या अंग्रेजी की तरह ही राजभाषा हिंदी भी आम जनता को डराने वाली भाषा के रूप में आज भी नहीं व्यवहृत हो रही है।एक आम आदमी से अपेक्षा की जाती है कि वो जीएसटी जाने , इंटरप्रेनुरेशिप बोले ,प्रोटोकॉल फॉलो करे पर वही अधिकारी लोक में बहुप्रचलित शब्दों नरवा,गरवा, घुरवा और बाड़ी को बोलना ,जानना नहीं सीख पाता या सीखने से कतराता है।

हमारे देश के सफल लोकतंत्र में जब एक चायवाला व्यक्ति प्रधानमंत्री बन सकता है तो चाय के दुकानों पर बोली जाने वाली समझी जाने वाली भाषा के शब्द राजभाषा में क्यों नहीं शामिल हो सकते। जिस गरीब वंचित तबके के लिए उज्ज्वला गैस योजना लागू किया गया क्या वो लोग उज्ज्वला बोल लिख और समझ पाते हैं। अनुपम मिश्र ने राजभाषा हिंदी पर चुटकी लेते हुए एक बार कहा था कि 'सामाजिक वानिकी' पद रचने वाले जरा ये समझायेंगे कि असामाजिक वानिकी भी कोई शै होती है क्या ? वानिकी अपने आप में सामाजिक नहीं है क्या? 

हमें इस बात का सदैव स्मरण रखना चाहिए कि जिस हिंदी को राजभाषा बनाने के लिए बहुत लड़ाइयां लड़ी गई वही राजभाषा हिंदी अब आम जन से बहुत दूर हो गई है। राजभाषा में राज शब्द राजा या विशेष वर्ग के लिए नहीं अपितु शासन को सुचारू रूप से चलाए जाने के लिए प्रयुक्त हुआ है। और शासन भी जनता के कल्याण  के लिए। इसलिए राज को जनता के करीब लाने के लिए, राजभाषा हिंदी को जनभाषा बनाने के लिए आज पुनः एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ी करने की जरूरत है। एक ऐसी राजभाषा जो जड़ या निर्जीव न रहे अपितु ऐसी भाषा जो समय और परिवेश के अनुरूप जनता के सुख-दुःख, आवश्यकताओं को स्वर दे सके।सरकार और जनता के बीच संवाद सेतु के रूप में सदैव गतिशील रहे।

सहायक प्राध्यापक हिंदी, शासकीय महाविद्यालय, मचांदुर दुर्ग ( मोबाइल- 7489164100 ) 

 

 

 

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एकता नाहर की कविता- सपाट सीने वाली लड़कियां

मध्यप्रदेश के दतिया जिले की रहने वाली एकता नाहर पत्रकारिता और लेखन से जुड़ी हुई हैं. उनका एक कविता संग्रह सूली पर समाज’ आ चुका है. उनकी कविता- सपाट सीने वाली लड़कियां.... सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. यह कविता मरद नामक जात पर करारा तमाचा है.

 

सपाट सीने वाली लड़कियां हर जगह से ठुकराई गयीं

 

रिश्ते की बात करने आए लड़के वालों ने 

जब नजर भर के उसे देखा तो फिर 

उसका कोई और हुनर मायने न रहा 

 

पुलिस की नौकरी में आवेदन करने से भी, 

लोक सेवा आयोग ने शर्तों में लिखा है

कि कितने इंच का होना चाहिए सीना

 

किसी चित्रकार ने अपने खूबसूरत चित्रों में

जगह नहीं दी उस स्त्री को

जिसके सीने पे उभार न था

चित्र बनाने के लिए सुडौल शरीर का बिम्ब सबसे आकर्षक था.

 

आए दिन देखा तिरस्कार 

सहेलियों की बातों में, पति की नज़रों में 

अंतरंग क्षणों में भी वो प्रेमी के सामने सहमी-सहमी सी रही

कभी खुद को ही आइने में देख हुई शर्मिंदा 

कभी पैडेड ब्रा में छिपाती रही खुद से खुद को ही 

 

उसके लिए छाती पर दुपट्टा डालना

भरे बदन वाली लड़की जितना ही जरूरी था 

ताकि वो बचा सके खुद को उस पर हंसती हुई लालची नज़रों से 

हां...भरे बदन का मतलब भरी हुई छातियों से ही है शायद. 

 

ये लोग नहीं कर सके उन्हें पूरा प्रेम 

लेकिन इन सबने चुटकुले बना कर हंसा उन पर खूब 

क्योंकि हम बड़े हुनर बाज हैं 

हर चीज को अपने चुटकुलों में जगह देते हैं.

 

 

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चाय पर शत्रु सैनिक... कविता लिखकर हलचल मचा देने वाले युवा कवि विहाग को दिया जाएगा भारत भूषण पुरस्कार

नई दिल्ली. युवा कवि विहाग वैभव को वर्ष 2018 का भारत भूषण पुरस्कार देने की घोषणा हुई है. तारसप्तक के कवि भारत भूषण  की स्मृति में दिया जाने वाला यह पुरस्कार वाराणसी के युवा कवि विहाग वैभव को 'तद्भव' पत्रिका में प्रकाशित उनकी कविता 'चाय पर शत्रु-सैनिक' के लिए दिया गया है. इस बार निर्णायक प्रसिद्ध कवि अरूण कमल थे. कहते हैं कि चाय की ईज़ाद एक बौद्ध संत ने की थी. बौद्ध यानी अहिंसा का धर्म. जीवन-राग को बढ़ाने, उसमें मिठास घोलने में चाय महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन यह भी सत्य है कि चाय पर चर्चा कूटनीति और राजनीति का एक हथियार भी है. कवि विहाग वैभव ने शत्रु खेमे में घुसकर जिस तरह चाय को 'अमन-राग' में बदला है उस वजह से कविता बेहद महत्वपूर्ण हो गई है. आइए यहां उनकी कविता पढ़ते हैं-

 

चाय पर शत्रु सैनिक 

उस शाम हमारे बीच किसी युद्ध का रिश्ता नही था

मैनें उसे पुकार दिया –

आओ भीतर चले आओ बेधड़क

अपनी बंदूक और असलहे वहीं बाहर रख दो

आस-पड़ोस के बच्चे खेलेंगे उससे

यह बंदूकों के भविष्य के लिए अच्छा होगा

 

वह एक बहादुर सैनिक की तरह

मेरे सामने की कुर्सी पर आ बैठा

और मेरे आग्रह पर होंठों को चाय का स्वाद भेंट किया

मैंने कहा –

कहो कहाँ से शुरुआत करें ?

 

उसने एक गहरी साँस ली , जैसे वह बेहद थका हुआ हो

और बोला – उसके बारे में कुछ बताओ

मैंनें उसके चेहरे पर एक भय लटका हुआ पाया

पर नजरअंदाज किया और बोला –

उसका नाम समसारा है

उसकी बातें मजबूत इरादों से भरी होती हैं

उसकी आँखों में महान करुणा का अथाह जल छलकता रहता है

जब भी मैं उसे देखता हूँ

मुझे अपने पेशे से घृणा होने लगती है

वह जिंदगी के हर लम्हे में इतनी मुलायम होती है कि

जब भी धूप भरी छत पर वह निकल जाती है नंगे पाँव

तो सूरज को गुदगुदी होने लगती है

धूप खिलखिलाने लगती है

वह दुनिया की सबसे खूबसूरत पत्नियों में से एक है

 

मैंने उससे पलट पूछा

और तुम्हारी अपनी के बारे में कुछ बताओ ..

वह अचकचा-सा गया और उदास भी हुआ

उसने कुछ शब्दों को जोड़ने की कोशिश की –

मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता

वह बेहद बेहूदा औरत है , और बदचलन भी

जीवन का दूसरा युद्ध जीतकर जब मैं घर लौटा था

तब मैंने पाया कि मैं उसे हार गया हूँ

वह किसी अनजाने मर्द की बाँहों में थी

यह दृश्य देखकर मेरे जंग के घाव में अचानक दर्द उठने लगा

मैं हारा हुआ और हताश महसूस करने लगा

मेरी आत्मा किसी अदृश्य आग में झुलसने लगी

युद्ध अचानक मुझे अच्छा लगने लगा था

 

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और और बोला –

नहीं मेरे दुश्मन ऐसे तो ठीक नहीं है

ऐसे तो वह बदचलन नहीं हो जाती

जैसे तुम्हारे  सैनिक होने के लिए युद्ध जरूरी है

वैसे ही उसके स्त्री होने के लिए वह अनजाना लड़का

उसने मेरे तर्क के आगे समर्पण कर दिया

और किसी भारी दुख में सिर झुका दिया

मैंने विषय बदल दिया ताकि उसके सीने में

जो एक जहरीली गोली अभी घुसी है

उसकी कोई काट मिले –

 

मैं तो विकल्पहीनता की राह चलते यहाँ पहुँचा

पर तुम सैनिक कैसे बने ?

क्या तुम बचपन से देशभक्त थे ?

वह इस मुलाकात में पहली बार हँसा

मेरे इस देशभक्त वाले प्रश्न पर

और स्मृतियों को टटोलते हुए बोला –

 

मैं एक रोज भूख से बेहाल अपने शहर में भटक रहा था

तभी उधर से कुछ सिपाही गुजरे

उन्होंने मुझे कुछ अच्छे खाने और पहनने का लालच दिया

और अपने साथ उठा ले गए

उन्होंने मुझे हत्या करने का प्रशिक्षण दिया

हत्यारा बनाया

हमला करने का प्रशिक्षण दिया

आततायी बनाया

उन्होंने बताया कि कैसे मैं तुम्हारे जैसे दुश्मनों का सिर

उनके धड़ से उतार लूँ

पर मेरा मन दया और करुणा से न भरने पाए

उन्होंने मेरे चेहरे पर खून पोत दिया

कहा कि यही तुम्हारी आत्मा का रंग है

मेरे कानों में हृदयविदारक चीख भर दी

कहा कि यही तुम्हारे कर्तव्यों की आवाज है

मेरी पुतलियों पर टाँग दी लाशों से पटी युद्ध-भूमि

और कहा कि यही तुम्हारी आँखों का आदर्श दृश्य है

उन्होंने मुझे क्रूर होने में ही मेरे अस्तित्व की जानकारी दी

यह सब कहते हुए वह लगभग रो रहा था

 

आवाज में संयम लाते हुए उसने मुझसे पूछा –

और तुम किसके लिए लड़ते हो ?

मैं इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं था

पर खुद को स्थिर और मजबूत करते हुए कहा –

 

हम दोनों अपने राजा की हवस के लिए लड़ते हैं

हम लड़ते हैं क्योंकि हमें लड़ना ही सिखाया गया है

हम लड़ते हैं कि लड़ना हमारा रोजगार है

वह हल्की हँसी मुस्कुराते मेरी बात को पूरा किया –

दुनियाँ का हर सैनिक इसी लिए लड़ता है मेरे भाई

वह चाय के लिए शुक्रिया कहते हुए उठा

और दरवाजे का रुख किया

 

उसे अपने बंदूक का खयाल न रहा

या शायद वह जानबूझकर वहाँ छोड़ गया

बच्चों के खिलौने के लिए

बंदूक के भविष्य के लिए

उसने आखिरी बार मुड़कर देखा तब मैंने कहा –

मैं तुम्हें कल युद्ध में मार दूँगा

वह मुस्कुराया और जवाब दिया –

यही तो हमें सिखाया गया है ।

विहाग वैभव

 

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छत्तीसगढ़ के देमार गांव के कुमेश्वर कुमार ने लिखी मुंशी प्रेमचंद को चिट्ठी

प्रिय प्रेमचंद जी

मैं स्वस्थ प्रसन्न नहीं हूं. सांस्कृतिक भौगोलिक भिन्नताओं के बावजूद मेरी गति, धुन, गंध, सादगी और निश्छलता हिन्दुस्तान के किसी भी गांव की तरह है.  लमही हो या कोई भी गांव. हमारा एक ही पेट हैं और हमारी एक ही पीड़ा है.

आपसे पहले किसी अदीब ने हमारी इतनी सुध नहीं ली. आपने हमें मान सम्मान दिया. हमारे सुख दुःख, आस निराश, जीवन मरण को महसूस किया. किसानों मज़दूरों की दशा गिनाई. हमारे शरीर में उभरी साम्प्रदायिकता, जातिवाद, छुआ छूत, भूख, गरीबी, अज्ञानता, अन्धविश्वास, शोषण जैसे घावों की ओर संकेत किया. नैतिकता की दुहाई दी.

लेकिन आज ग्लोबल विलेज के नाटक में आपके लिखित नाटक मुंह बाए खड़े हैं. हम गांव को खदेड़ कर शहर चले आ रहे हैं. किसानों के खेतों पर मिल और कारखाने अट्टहास कर रहे हैं. श्रमिकों की कराहती कोठरियों पर दुकानें खिलखिला रही हैं. चारागाह के अभाव में पशुओं के झुण्ड गौठान में दुबराते खड़े हैं. हर तरफ बाजार का हल्ला है. तुम्हारे उपन्यास और कहानी के पात्र आज सिर्फ उपभोक्ता हैं. तुम्हारे विचित्र पात्र इतने सालों बाद यथावत कैसे रह सकते हैं? सब काइयां और कपटी हो गए हैं। इन चरित्रों के मनोविज्ञान बड़े जटिल हो गए हैं. उनका ब्लैक एंड व्हाइट सरलीकरण असंभव है। 

अलगू चौधरी और जुम्मन शेख अलग अलग राजनीतिक दलों के मॉडल हो गए हैं. पंच परमेश्वरों के नेतृत्व में सारे गांव दो फाड़ हो गए हैं. पंचायती राज का झुनझुना बजा रहे गंवार चुनावों में मांस मदिरा से लहालोट हैं. बड़े घर की बेटी हो या सोना रूपा, सुहानी प्रत्येक वर्ग की महिलाएं असुरक्षित हो गई हैं. बताते हैं, 'बूढी काकी' को वृद्धावस्था पेंशन मिलता है फिर वह भीख मांगती घूमती है ? और होरी की तो मत पूछो... वे बीज, रासायनिक खाद, ट्रैक्टर किराया और कीटनाशक दवाओं के कर्ज में डूबकर आत्महत्याएं कर रहे हैं...! धनियाओं की चूड़ी उतर रही है. गोबर ईंट भट्ठे में बंधुवा है. किसान अब मज़दूर हो रहे हैं और मज़दूर फाकों में दिन काट रहे हैं. हामिद और जानकीनाथ पढ़ना- लिखना भूलकर व्हाट्स एप्प पर गंदे जोक और नफरतों के सन्देश भेज रहे हैं... मोबाइल पर पोर्न देख रहे हैं.

ग्रामीण ढांचा पूरी तरह डांवांडोल है. हमें शहर बनाने पर तुले मतलबपरस्तों की शैली, सोच और व्यवहार में भारी तब्दीली आ गई है. आपके उपन्यास और कहानी के पात्र वहां की आपाधापी से तंग आकर हम गांव की गोद में गुजर बसर करते थे. कथा साहित्य का यह सुखान्त अब भयानक लगता है.

ज्यादा क्या लिखूं ... आप खुद समझदार हो. कम लिखे को ज्यादा समझना...

आपका

कुमेश्वर

देमार, थाना- अर्जुनी, जिला- धमतरी, पटवारी हल्का नंबर 19, छत्तीसगढ़

 

 

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अरे वो हत्यारों... खून के प्यासे भेड़ियों ...जानते भी हो कि प्रेमचंद कौन थे ?

अंजन कुमार

वर्तमान भारतीय समाज सांप्रदायिक दौर से गुजर रहा है. ऐसे समय जब सांप्रदायिक शक्तियां धर्म, जाति और भाषा के नाम पर देश की एकता अखण्डता और समरसता को नष्ट करने पर तुली हुई है तब प्रेमचंद को याद करना और अधिक प्रासंगिक हो जाता है. इसकी एक वजह यह भी है कि प्रेमचंद का सारा संघर्ष भाई-चारे को तोड़ने वाली ताकतों के खिलाफ ही था.अपनी कालजयी रचनाओं में प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता की जड़ों का, उसे पल्वित और पुष्पित करने वाली शक्तियों का, उसके विभिन्न छद्म रूपों तथा इन रुपों से किसके हित सधते हैं उसका बेहद बारीकी से विश्लेषण किया है.

उनकी दृष्टि इस विषय पर बिल्कुल साफ थी. वे प्रारंभ से ही सांप्रदायिकता और उसके आर्थिक स्वार्थ के संबंधों को समझ रहे थे. यही कारण है कि प्रेमचंद के साहित्य का अधिकांश हिस्सा खुले तौर पर सांप्रदायिक ताकतों से विद्रोह करता हुआ दिखाई देता है. उन्होंने सेवासदन, कायाकल्प, प्रेमाश्रम,  कर्मभूमि,  रंगभूमि, गबन, गोदान जैसे उपन्यास तथा पंच परमेश्वर, विचित्र होली, जुलूस, मुक्तिधन, क्षमा, डिक्री के रूपए, मंदिर मस्जिद, लैला, न्याय, दो कब्रें, ईदगाह, जिहाद, तगादा, दिल की रानी, बौड़म जैसी कहानियों में पूरी शिद्दत के साथ सांप्रदायिकता पर करारा प्रहार किया है. उनकी रचनाओं के अधिकांश पात्र धर्म की संकुचित मानसिकता के दायरे से मुक्त होकर अपने-अपने धर्म पर आस्था रखते हुए  दूसरे धर्म तथा उसको मानने वालों के प्रति उदार नजरिया रखते हैं.

प्रेमचंद धर्म के बारे लिखते हैं- धर्म का संबंध मनुष्य से और ईश्वर से है. उसके बीच में देश, जाति और राष्ट्र किसी को भी दखल देने का अधिकार नहीं हैं. हम इस विषय में स्वाधीन हैं. हम मस्जिद में जाए या मंदिर में. हिन्दी पढ़ें या ऊर्दू. धोती बांधे या पाजामा पहनें हम स्वाधीन हैं. धर्म के नाम पर राष्ट्र को भिन्न- भिन्न दलों में विभक्त करना ईश्वर और मनुष्य के संबंधों को राष्ट्रीय मामलों में घसीटकर लाना  भारत कभी गंवारा नहीं करेगा.

उन्होंने आगे यहां तक लिखा है- अगर आपके धर्म में कुछ ऐसी बातें हैं जो राष्ट्रीयता की परीक्षा में पूरी नहीं उतरती. सभी के हितों में बाधक होती हैं तो उन्हें त्याज्य समझिए. उनके अनुसार समाज में जितनी अनीति है. उसमें सबसे घृणित धार्मिक पाखण्ड है.

वे बहुत अच्छी तरह जानते थे कि सांप्रदायिकता कभी संस्कृति, कभी इतिहास, कभी भाषा तो कभी क्षेत्रीयता का लबादा ओढ़कर आती है. उन्होंने अपने एक लेख में साफ तौर पर लिखा है- सांप्रदायिकता को अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है. इसलिए वह गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल के जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति की खाल ओढ़कर आती है. हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहता है. मुसलमान अपनी संस्कृति को. मगर अब न मुस्लिम संस्कृति है न हिन्दू. अब संसार में केवल एक संस्कृति है-आर्थिक संस्कृति. मगर हम आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोए जा रहे हैं. वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है. निरा पाखंड. और इसके जन्मदाता भी वही लोग हैं जो सांप्रदायिकता की शीतल छाया में बैठकर विहार करते हैं. संस्कृति अमीरों का, पेट भरे हुए लोगों का, बेफिक्रों का व्यसन है. द्ररिद्रों के लिए प्राण रक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है.

उन्होंने 1934 में ज्योतिप्रसाद निर्मल के एक निबंध के उत्तर में लिखा है- यह हमारा दृढ़ विश्वास है कि जब तक यह सांप्रदायिकता और अंधविश्वास हमसे दूर न होगा. जब तक समाज को पाखण्ड से मुक्त न कर लेंगे तब तक हमारा उद्धार नहीं होगा. प्रेमचंद अपने पूरे साहित्य में सांप्रदायिकता की लड़ाई इसी वैचारिक धरातल में लड़ते हैं. उनकी कहानी के पात्र न तो हिन्दू हैं न मुसलमान और न ही इसाई. वे सही मायने में सिर्फ इंसान हैं. ऐसे इंसान जो अपने अधिकारों के संघर्ष में धर्म को बीच में आने नहीं देते.

कर्मभूमि का गजनबी कहता है- यह दौलत का जमाना है.अब कौम में अमीर और गरीब, जायदाद वाले और मरभूखे अपनी-अपनी जमात बनाएंगे. उनमें कहीं ज्यादा खूंरेजी होगी. आखिर एक दो सदी के बाद दुनिया में एक सल्तनत हो जाएगी. सबका कानून एक होगा. एक निजाम होगा, कौम के खादिम कौम पर हुकूमत करेंगे. मजहब शख्सी चीज होगी. इसी उपन्यास की पठानिन कहती है- धनी लोग हम गरीबों की बात क्या पूछेंगे. हालांकि हमारे नबी का हुक्म है कि शादी ब्याह में अमीर-गरीब का ख्याल न होना चाहिए. पर हुक्म को कौन मानता है... नाम के मुसलमान.

प्रेमचंद अच्छी तरह जानते थे अधिकांश जनता अनपढ़ और पिछड़ी हुई है. उसे सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा बहकाया जा सकता है. इसलिए उन्होंने आम जनता को शिक्षित करने के साथ-साथ इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित भी किया. अब यह काम आज के साहित्यकार कहां कर पाते हैं.उन्होंने कर्बला नाम का एक नाटक हिन्दू- मुस्लिम एकता को मजबूत करने के उद्देश्य से ही लिखा था.

उन्होंने कायाकल्प तथा अन्य कहानियों में सांप्रदायिक के बीच आपसी सौहार्द को बेहद खूबसूरत ढंग से प्रदर्शित किया है. बहुत से लोग मानते हैं कि प्रेमचंद  केवल हिन्दूओं का विरोध करते थे जबकि वे बेहद मारक ढंग से मुस्लिम संप्रदायवाद के खिलाफ भी चोट करते थे. देखा जाय तो वे किसी भी वर्ग, वर्ण, जाति, धर्म, संप्रदाय के खिलाफ नहीं थे. बल्कि उनका विरोध टुच्चेपन से, अमीरी और गरीबी के फर्क से और फरेब से था.

आज जबकि देश भयावह संकट के दौर से गुजर रहा है. हर तरफ से यही आवाज आ रही है कि हम सबसे अंधेरे समय में जीने को मजबूर है तब प्रेमचंद का साहित्य हमारे भीतर उम्मीद की लौ जलाता है. भाईचारे की साझा संस्कृति और परंपरा पर चलने वाले संवेदनशील लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि मशाल कैसे जलानी है. हत्यारें और खून के प्यासे भेड़िए तो कभी नहीं जान पाएंगे कि प्रेमचंद कौन थे?

 

 मोबाइल नंबर- 9179385983

 

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किशनलाल की सात कविताएं

1. तीसरा विकल्प

 

इस मुगालते में मत रहो

कि जंगल तुम्हारा है

या पेड़ तुम्हारे हैं

 

जितनी देर तक

तुम हंडिय़ा में

सल्फी तक नहीं ढार सके थे

उतनी देर में तो

खरीदी-बिक्री के

सारे कारोबार हो चुके थे

 

तुम्हारा कोई हक नहीं

नदियों के पानी पर

इनकी लहरों पर

कब के हो चुके हैं हस्ताक्षर

 

पहले तुम कौतूहल थे

इसलिए खूबसूरत थे

निश्छलता के पर्याय

और भोलेपन के मूरत थे

 

अब तुम अबूझ नहीं

बोझ हो

बांस जितने सोझ हो

इसलिए तुम्हें कटना है

 

तुम क्या समझते हो

कि तीरथगढ़ या चित्रकोट के जलप्रपात

तुम्हारे इतिहास का गौरवगान करते हैं?

नहीं

ये झरने

अब मर्सिया पढ़ते हैं

इंद्रावती में कलकल नहीं

ए. के. 47 की गोलियों की तड़तड़ है

 

तुम्हारी चीखें

बस्तानार की घाटी में

घुटकर रह जाएंगी

कभी नहीं पहुंच पाएंगी

बचेली के हिलटॉप तक

 

इस धोखे में मत रहो

कि ये तुम्हारे रखवार हैं

गौर से देखो

इनके हाथों में तलवार है

 

इनके और तुम्हारे बीच

रायपुर से दंतेवाड़ा तक की दूरी है

तुम्हारी संस्कृति के गर्दन पर

इनकी सभ्यता की छुरी है

 

इनकी ऐयाशी के लिए

जितने मॉल, होटलें

पांच-पांच, सात-सात मंजिल हैं

तुम्हारे लिए

विकास, मुख्यधारा जैसे शब्द

उतने ही अश्लील हैं

 

अपने घर की महिलाओं से कहो

कुछ ढंकना भी सीखें

इतना खुलापन ठीक नहीं

क्योंकि खुलापन

सोवियत संघ के लिए जितना ग्लासनोश्त था

इनके लिए जिंदा गोश्त हैं

 

रखवाले तो ये भी नहीं हैं

जो तुम्हारे हितैषी बनकर

तुम्हारे ही घर में घुसपैठ जमाए हैं

तुम्हारा ही मांस खाते हैं

और तुम्हारे ही खून से अचोते हैं

 

कुआं और खाई के

घिसे-पिटे मुहावरे से बाहर निकलो

और देखो

एक तरफ शेर

दूसरी तरफ भेडि़ए हैं

तुम्हें खाने से पहले

अपने नुकीले दांतों से

तुम्हें वालीबाल की तरह फेंकते हैं

एक-दूसरे के पाले मेें

 

बारसूर-कुटुमसर की

अंधेरी गुफाओं से बाहर निकलो

और बीच का

रास्ता तलाशना छोड़कर

सोचो कि

जीने के लिए

कोई तीसरा विकल्प है क्या?

 

2. लोकतांत्रिक व्यवस्था

 

धूप और बारिश से

कन्नी काटकर

चलते हैं लोग यहां

 

आम को आम

और इमली को इमली

नहीं कह सकते

उनकी भावनाओं को

 लग जाती है ठेस

पता नहीं

बाबा कबीर

कैसे कह गए

इतने ठेठ?

 

चलते-चलते

कहीं हो जाए रात

तो उस शहर के कोतवाल से

रुकने के लिए

लेनी पड़ती है इजाजत

 

क्या पढ़ें और क्या न पढ़ें

यह सरकार ही तय करती है

कुछ किताबों को

घर में रखना

राष्ट्रदोह के बराबर अपराध

 

पहले से निर्धारित

नियम-कानून, धर्म-आस्था

यह है मेरे महादेश की

महान् लोकतांत्रिक व्यवस्था!

---------------

3. मारे जाएंगे सभी आदिवासी

 

कथन-

कुछ आदिवासी, नक्सली हैं

कुछ आदिवासी, पुलिस के मुखबिर हैं

 

 निष्कर्ष-

एक-सभी आदिवासी नक्सली हैं

 

दो-आदिवासी न नक्सली हैं

और न ही पुलिस के मुखबिर

 

तीन-आदिवासी नक्सलियों का साथ देते हैं

 

चार-पुलिस के मुखबिर हैं आदिवासी

 

दोस्तो!

उलझ गए न!

बहुत आसान निष्कर्ष है-

मारे जाएंगे

सारे के सारे आदिवासी.

---------------

 

4. एक पल के लिए

 

एक पल के लिए

यह मान भी लूं

 कि मैं हिन्दू हूं

तो भी कैसे भूल जाऊं

रविशंकर के सितार-प्रेम में

बिस्मिल्ला खां को

जिनकी शहनाई की आवाज से

होती है मेरी सुबह

 

प्रेमचंद और निराला के बीच

कैसे विस्मृत कर दूं

गुलशेर खान शानी को

रजा, मंटो और फैज को

जिन्होंने मुझे

संस्कार दिया बराबर का

 

ओमपुरी और स्मिता पाटिल

बेशक बढिय़ा कलाकार सही

लेकिन शबाना और नसीरुद्दीन शाह

उनसे कमतर तो अदाकार नहीं

 

चंद्रशेखर आजाद, मंगल पांडे

और तमाम बलिदानियों के बीच

कैसे बिसरा दूं

अशफाक उल्ला खां

और अब्दुल हमीद की

शहादत को

 

अपने खास मित्रों के जिक्र में

बसंत त्रिपाठी और कुमेश्वर कुमार के बीच

कैसे भूला दूं

फरहत, सलीम और

नासिर अहमद सिकन्दर को

 

एक पल के लिए

यह मान भी लूं

कि मैं हिन्दू हूं

तो भी.........

 

5. बच्चों के होंठों पर

 

बहुत कुछ

बचाया जा सकता है

बावजूद इसके

कि खत्म हो रही है

एक-एक करके

बहुत सारी चीजें

 

जैसे बचाया जा सकता है

चकमक पत्थर की आग को

रगों में दौड़ रहे

खून को गरमाने के लिए

 

बचाया जा सकता है

धरती के दूध को

जो जड़ों से होकर

खुशबू का रूप

ले रहा है

 

उन सपनों को

बचाया जा सकता है

जो टूटकर

बिखर भले गए हों

फिर भी है जिनमें

जीवन की बहुत कुछ संभावनाएं

 

हम बचा सकते हैं

मॉं की ममता

पड़ोसियों का प्यार

प्रेमिका के चुंबन

और दोस्तों की गाली को

 

जब दिन-ब-दिन

कम होती जा रही है

हमारी हॅंसी

हम सहेजकर

रख सकते हैं उसे

बच्चों के होंठों पर.

 

6. नक्शे के बीच

 

क्षयग्रस्त बूढ़े के

खखार-सा निकलता है सूरज

और मरहा बैल की तरह

घिसटता है धीरे-धीरे

 

बैलों के उगले पुआल-सी

बदरंग झोपडिय़ां

जहां जंग खाते नांगर हैं

और भोथरी कुल्हाड़ी-हॅंसिया

वहां मल-मूत्र से लिथड़े

भिनभिनाती मक्खियों के बीच

रोते-बिलखते बच्चे

जैसे दीवारों पर टंगे

कुपोषण के शिकार

परिवार नियोजन के

डरावने ईश्तहार

 

खेतों की दरारों से

जो बच गए हैं

वे शहर में हैं

या दोजख में

बचा-खुचा सुख

साहूकार का बंधुआ मजदूर है

मुट्ठीभर अनाज के लिए

शांति अस्मत खोने को म•ाबूर है

 

रात के भयानक अंधेरे में

अभिशप्त पीपल

जब उल्लुओं के

डैनों में फडफ़ड़ाता है

बेचैनी और लाचारी के

दो पाटों के बीच

पिसती हुई बूढ़ी औरतें

मृत्यु के दिन गिनती हैं

 

नक्शे के बीच

मगर विकास से दूर

इस अकालग्रस्त गांव में

राहत कार्य जैसे शब्द

बेमानी है

लगता है गांव का

नरक से लागमानी है.

 

7. राजधानी में पगली औरत

 

 कस्बा नहीं, अब यह महानगर है

यहां चोरी

शराफत समझी जाती है

और लूट रोमांचकारी आदत

जहां कत्ल कर

सरेआम घूमते हैं कातिल

छह साल की बच्ची

और सत्तर वर्षीया बुढिय़ा में

कोई फर्क नहीं

बलात्कार इसकी

दिनचर्या में शामिल

 

उम्र के सोलहवें बरस में

जब लड़कियां

देखती हैं सपने

घोड़े पर चढ़कर

आते राजकुमारों के

वह किसी मनहूस ऋषि से शापित

मानो मुक्ति के लिए

लड़ रही थी-भूख से,

 

बीड़ी कारखाने का

कसैला धुआं पीती

जगह-जगह से पैबंद लगी

साड़ी से लिपटी

पिछवाड़े राज मंदिर के

सराय में सोती

 

सुबह-सुबह

तालाब में नहाती हुई

वह जान गई

कि खुले स्तन को देखने में

बच्चे, बूढ़े और जवान

किसी की भी नीयत में

कोई अंतर नहीं होता

 

और एक दिन

पुजारी के

रोज-रोज के पापोच्चार से

वह पागल हो गई

 

वह नंगी देह

घूमती है महानगर में

यहां-वहां

लोग उपयोग करते हैं उसका

मूत्रालय-सा

पल भर देखते हैं

इधर-उधर

और चले जाते हैं मूतकर

 

गड्ढा भर चुका है-

वह गर्भिणी है

एक शिशु महानगर

 पल रहा उसकी कोख में

और प्रसव-पीड़ा से

व्याकुल वह

छटपटा रही है

 

सुनो! सुनो ओ महानगर!

पल रहा है तुम्हारा वंश

उसकी कोख में

प्रसव हेतु जगह चाहिए

वह तड़प रही है

पीड़ा से

उसे जगह चाहिए

क्योंकि एक कुतिया का भी

हक बनता है

नर्म-नर्म पुआल पर

प्रसव के पहले

यह तो फिर भी औरत है

लेकिन हाय!

पगली है बेचारी

 

ओ! ऊंची अट्टालिकाओं में

रहने वाले महानगर!

उसे कम से कम

किसी पेड़ की

छाया तो दो

छाया तो दो......

 

 

 

 

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गुनाहों की देवी निर्मला

मुंशी प्रेमचंद के एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण उपन्यास का सारांश बता रहे हैं लेखक चंद्रशेखर देवांगन. लेखक का कहना है कि अगर धर्मवीर भारती के उपन्यास में चंदर गुनाहों का देवता है तो मुंशी प्रेमंचद के उपन्यास में निर्मला गुनाहों की देवी है. इस सारांश को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए.

 

 ‘‘मुहल्ले के लोग जमा हो गए। लाश बाहर निकाली गई। कौन दाह करेगा, यह प्रश्न उठा। लोग इसी चिंता में थे कि सहसा एक बूढ़ा पथिक बकुचा लटकाये आकर खड़ा हो गया। यह मुंशी तोताराम थे (निर्मला के पति)।’’

निर्मला के पिता की अकाल मौत के बाद दहेज लोभी रिश्ते वालों नें निर्मला से सगाई तोड दी। आर्थिक बोझ से परेशान मॉ ने निर्मला का विवाह दहेज नहीं लेने वाले अधेड़ उम्र के विधुर किंतु धनी वकील मुंशी तोताराम से कर दी। जिसके पूर्व से ही तीन बेटे थे और वकील साहब की विधवा बहन भी साथ रहती थी। वकील साहब और निर्मला के साथ हंसने-बोलने से अधेड उम्र के तोताराम के मन में शक पैदा हो गया। शक से परेशान तोताराम ने बेटे को घर से दूर छात्रावास में रखवाने का उपाय खोजने लगे। मंशाराम जैसे-तैसे घर से दूर तो हुआ परंतु सौतेली मॉ को लेकर पिता के शक को ताड़ गया। मंशाराम पढ़ाई में होश्यार, सुंदर, स्वस्थ और आदर्शवादी बालक था। पिता के ऐसे घिनौने विचारों से मंशाराम इतना क्षुब्ध हुआ कि खाना-पीना छोड अपना शरीर ही त्याग दिया। मरते-मरते उसने निर्मला के चरणों में दण्डवत् प्रणाम कर पिता को अपने और निर्मला के मध्य माता और पुत्र के बीच पवित्र रिश्ते का विश्वास दिला गया। तोताराम इस अपराध बोध से भर गये कि उनके निराधार शक ने उनके जवान बेटे की जान ले ली। 

अपराध बोध से ग्रसित तोताराम का स्वास्थ्य दिन-ब-दिन गिरता गया, वकालत भी ठप्प हो गई। तोताराम के युवा मित्र डॉ. साहब की पत्नी सुधा, निर्मला की सहेली बन गई थी। बातों ही बातों में सुधा को ज्ञात हुआ कि सुंदर-सुशील-गुणी निर्मला से सगाई तोडने वाला उसका पति डॉ. साहब ही थे। जब सुधा ने यह बात डॉ. साहब को बताई तो डॉ. साहब ने इसका प्रायश्चित बिना दहेज लिये अपने छोटे भाई के साथ निर्मला की छोटी बहन का विवाह करवाकर किया। निर्मला के रूप-गुण को देख-देख अब डॉ. साहब को निर्मला से विवाह नहीं हो पाने का बड़ा मलाल होने लगा।

इस बीच निर्मला की भी एक लड़की हो गई। अब तक वकील साहब के पुत्रशोक ने परिवार की आर्थिक संपन्नता को भी छिन लिया था। ऐसी स्थिति में निर्मला के गहने जेवर ही बेटी का भविष्य थे। वकील साहब का दूसरा बेटा जियाराम कुसंगत में पड़ गया था। जियाराम ने इन गहनों को चुरा लिया। चोर को जानते हुए भी कलंक के डर से निर्मला चुप थी परंतु वकील साहब ने तैश में पुलिस को बुला लिया। पुलिस ने वकील साहब को आरोपी का नाम बता दिया। पकडे जाने के भय से जियाराम सदा के लिये घर से भाग निकला। 

 

बेटी के भविष्य की अतिशय चिंता और गरीबी ने निर्मला को कंजुस बना दिया था। वकील साहब का तीसरा बेटा सियाराम बड़ा सीधा-साधा, आज्ञाकारी था। नासमझी में निर्मला की बातों से एक दिन सियाराम बड़ा खिन्न हो गया और किसी साधु के बहकावे में आकर वह भी हमेशा के लिये घर छोड़कर चला गया। वकील साहब इसका सारा दोष निर्मला पे मड़ने लगे और सियाराम को खोजने दुखी मन से वह भी घर से निकल पडे। 

अब घर में केवल निर्मला, उसकी नन्ही बिटिया और वकील साहब की विधवा बहन रह गये। 

बीच-बीच में निर्मला मन बहलाने अपनी सहेली सुधा के पति डॉ. साहब के हृदय में निर्मला के लिये दबा प्रेम होठों पर आ गया। निर्मला के लिये ये उसकी पवित्रता पर आघात जैसा था। निगाह नीची किये निर्मला बड़ी तेजी से सुधा के घर से निकली, तभी सुधा घर पहुंची शायद सुधा ने निर्मला की आखों में कुछ पढ़ लिया। पीछे-पीछे सुधा भी निर्मला के घर आ गई और निर्मला के बिना कहे भी सच्चाई समझ के अपने घर आई और क्रोध में आग बबूला सुधा ने इस चरित्रहीनता के लिये डॉ. साहब को जमकर धिक्कारा। इस अपराधबोध में डॉ. साहब ने जहर खा कर आत्महत्या कर लिया। 

यद्यपि सुधा के मन में अपने दुश्चरित्र पति के प्रति क्रोध और निर्मला के प्रति श्रद्धा अभी भी यथावत् थी। 

अब तो निर्मला जीवन में हर तरफ से स्वयं को अपराधिन ही मानने लग गयी। जीवन से हताश हो निर्मला ने खाना-पीना ही छोड़ दिया और तीन दिनों तक रोते-रोते अपना जीवन त्याग दिया।

 

 

 

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पढ़िए...इंदौर वाले बल्लेबाज के लिए क्या लिख गए थे परसाई

देश के प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का यह व्यंग्य आज भी प्रासंगिक है. लगता है जैसे अभी-अभी उन्होंने इंदौर में बल्ला चलाने वाले बाहुबली के लिए कुछ लिखा हो.
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दिल की बात दिल से...चंद्रशेखर देवांगन की रचनाएं

शायद ही कोई ऐसा हो जो छत्तीसगढ़ शासन के आबकारी मंत्री कवासी लखमा को पसंद न करता हो. राजनीति के जानकार कहते हैं कि अगर लखमा मंत्री नहीं भी होते तो भी उनकी सरलता और सहजता उनकी लोकप्रियता को कम नहीं करती. मंत्री लखमा के विशेष सहायक चंद्रशेखर देवांगन भी कुछ इसी तरह से है. उनका मिलनसार व्यवहार सबको अचंभे में डाल देता है और आकर्षित करता है. यकीन न हो तो कभी मिलकर देखिए... आपको निराशा नहीं होगी. दरअसल इस व्यवहार के पीछे चंद्रशेखर देवांगन की साहित्यिक अभिरुचि है. वे जब भी वक्त मिलता है लिखते-पढ़ते हैं. किसी ने सच ही कहा है कि साहित्य एक मनुष्य के भीतर मनुष्यता को जीवित रखने में मददगार होता है. यहां अपना मोर्चा डॉट कॉम की तरफ से प्रस्तुत है उनकी पांच रचनाएं. इन रचनाओं में ज्यादातर बात दिल की है, मगर दिल से हैं.

 

( एक )

कभी प्यार तो कभी परिवार की खातिर 

मर मर के जी रहे हैं सरकार की खातिर.

ये जिन्दगी सहरा है कभी प्यास ना बुझेगी

जब तक ना जीयेंगे मरेंगे यार की खातिर.

अपनों  के हुए हम ना  गैरों  के  हो  सके

क्या खूब हम जीये परवरदिगार की खातिर.

दिन तो किसी को दे दिए रात आई ही नहीं

रूत कोई ना आई मुझ गुनाहगार की खातिर.

बीपी शुगर दिल का भी रोग क्या कहें

लाखों मरज़ पाले दिन चार की खातिर.

प्रशस्ति से प्रेरित कभी सो-काज़ के  चक्कर में 

दिल अपना दुखाया महल औ दरबार की खातिर.

 

( दो )

हां...

मुझे भी करनी है ,

ढेर सारी गुफ्तगू.

कहना है हाल-ए दिल

सुनना है दर्द-ए दिल.

उलझनें

ना जाने कितनी

मन में ही उलझी हैं.

दो पल की फुरसत का 

कर रहा

इन्तेज़ार मुद्दत से.

जाने कब कर पाऊंगा 

ढेर सारी बातें

खुद से.

 

( तीन )

तुम ना मिलो ना चांद दिखे, 

वो रात बेरहमी लगती है.

तुम क्या जानो तुम बिन सांसें 

सहमी-सहमी लगती हैं.  

तेरी आंखों की गहराई में

मैं ना जाऊं डूब कहीं 

अब मेरे हाथों की लकीरें 

बदली-बदली लगती हैं.

( चार )

भटकता ढूंढता रहा मैं

जिस गुलशन में रात भर.

वो सुबह सिराहने मिली 

ओस की बूंद बनकर.

पूनम का चांद आया था 

चुपके से रात मेरे घर

सुबह गया सूरज की

रोशनी बिखेरकर

 

( पांच )          

तुम बिन

आंखों ने कोई ख्व़ाब ना देखा

तेरे जाने के बाद.

प्यार ने परवाज़ ना देखा

तेरे जाने के बाद.

 

मैंने तुमको टूटकर  चाहा

उसका क्या अंजाम बताओ.

जीने का नहीं तो मौत सही

कुछ मेरे लिए सामान सजाओ.

अश्क़ों से अशआर लिखा

 तेरे जाने के बाद.

आंखों ने कोई ख्व़ाब ना देखा

 तेरे जाने के बाद.

 

खत ना लिखे ना तार किया

कोई तेरा सन्देश ना लाता

तुममें कुछ मेरा प्रेम बचा हो

कोई मुझको यकीन दिलाता.

तेरा कोई इश्तहार ना देखा

तेरे जाने के बाद.

आंखों ने कोई ख्व़ाब ना देखा

तेरे जाने के बाद.

 

 

 

 

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हरिशंकर परसाई के किताबों की रायल्टी अब परिवार के बीच बंटेगी

बिलासपुर. प्रख्यात साहित्यकार हरिशंकर परसाई की रचनाओं पर मिलने वाली रायल्टी को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला न्यायालय से हुआ है. न्यायालय के आदेश के अनुसार रायल्टी की राशि अब परसाई परिवार के वैध उत्तराधिकारियों के बीच बराबर - बराबर बंटेगी । इसके लिए परसाई की भतीजी अमिता शर्मा ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी. अमिता परसाई के सगे भाई गौरीशंकर परसाई की बेटी है जो इन दिनों बिलासपुर में अपने पति सुशील शर्मा के साथ रहती है.

साहित्यकार हरिशंकर परसाई अविवाहित थे. उनकी बहन सीता दुबे का पुत्र यानी भानजा  प्रकाश चंद्र दुबे एक वसीयत के आधार पर पिछले कई वर्षों से अकेले ही रायल्टी प्राप्त कर रहा था. परिजनों का कहना था कि स्व.परसाई ने ऐसी कोई वसीयत नहीं की थी, और जो वसीयत बताई जा रही है वह फर्जी है ,लेकिन प्रकाश दुबे ने किसी की बात नहीं मानी और न ही किसी की समझाइश का कोई असर ही हुआ. वह निर्बाध रूप से रायल्टी की राशि प्राप्त करते रहा.

ज्ञातव्य है कि हरिशंकर परसाई ख्यातिलब्ध साहित्यकार रहे हैं । खासकर व्यंग्य विधा को उन्होंने नया स्वरूप दिया. उन्होंने कहा कि जिस व्यंग्य से करूणा न उपजे वह व्यंग्य बेकार है. वे विसंगतियों के खिलाफ़ लगातार लिखते रहे . उन्हें सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार माना जाता है और उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक और चर्चित हैं. परसाई की मृत्यु 10 अगस्त 1995 को हुई.  उनकी रचनावली भी छप चुकी है साथ ही अनेक किताबें भी. उनकी रचनाओं पर नाटक भी तैयार हुए और इप्टा तथा अन्य नाट्य संस्थाओं ने उनका मंचन भी किया. उनकी रचनाओं पर प्रकाशकों द्वारा रायल्टी दी जाती है और रायल्टी सिर्फ उनके भांजे प्रकाश चंद्र दुबे को ही मिल रही थीं.प्रकाश का कहना था कि वह आखिरी दिनों तक परसाई जी की सेवा करते रहा है. जब तक परसाई जीवित रहे वे ही रायल्टी प्राप्त करते रहे क्योंकि आय का उनके पास और कोई साधन नहीं था. अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने वसीयत की जिसमें मुझे (प्रकाश दुबे ) को उत्तराधिकारी बनाते हुए रायल्टी राशि प्राप्त करने का अधिकार दिया. वसीयत की यह बात उसने परसाई की मृत्यु के बाद बताई. इस पर किसी को विश्वास नहीं हुआ. उनकी भतीजी अमिता शर्मा ने आपत्ति की और कहा कि रायल्टी राशि पर उसका भी हक बनता है. अमिता ने सोलह वर्ष पहले 2003 में जिला न्यायालय बिलासपुर में एक मामला प्रस्तुत किया. इसमें उन्होंने कहा कि हरिशंकर परसाई को उनकी रचनाओं की रायल्टी से आय प्राप्त होती थी. वे नि:संतान थे. इसीलिए उनकी मिलने वाली रायल्टी राशि पर मेरा भी हक बनता है. साथ ही उन्होंने परसाई की वंशावली प्रस्तुत की. जिसके अनुसार वे दो भाई व तीन बहन थे. अमिता ने कहा कि प्राप्त होने वाली रायल्टी राशि पर इन सभी का हक बनता है. जबकि अभी उनका भांजा प्रकाश चंद्र दुबे ही समस्त राशि ले रहा है.

प्रकाश ने न्यायालय में एक वसीयत प्रस्तुत की और कहा कि उनके मामा हरिशंकर परसाई ने रायल्टी की संपूर्ण राशि प्राप्त करने का अधिकार उसे दिया है. अमिता ने इसे गलत बताया और कहा कि ऐसी कोई वसीयत मेरे बड़े पिता हरिशंकर परसाई ने नहीं की थी. प्रकाश दुबे इस बाबत न्यायालय में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका और विद्वान न्यायाधीश ने वसीयत को शून्य घोषित कर दिया. साथ ही आदेश में कहा कि वादी अमिता स्व.हरिशंकर परसाई के भाई की पुत्री है. शेष प्रतिवादीगण स्व.हरिशंकर परसाई की बहनों के बच्चे हैं. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार बिना वसीयत किए मृत्यु होने पर भाई, बहन व भाई बहनों के बच्चों को संपत्ति में अधिकार मिलता है. इस प्रकार परसाई के भाई गौरी शंकर परसाई, एवं बहनें श्रीमती रुक्मणी दुबे , श्रीमती सीता दुबे और श्रीमती मोहिनी दीवान को स्व.हरिशंकर परसाई की संपत्ति में बराबर - बराबर का अंश प्राप्त होगा.

ज्ञात हो कि यह मामला 30 सितम्बर 2003 को जिला न्यायालय बिलासपुर में प्रस्तुत किया गया था. फिर उच्च न्यायालय के आदेश पर 28 मार्च 2011 को यह जिला न्यायालय जबलपुर में प्रस्तुत किया गया. इस मामले में अमिता शर्मा की ओर से बिलासपुर के अधिवक्त डी.दत्ता, जी पी कौशिक, संदीप द्विवेदी , देवेश वर्मा, कृष्णा राव , जमीर अख्तर लोहानी तथा जबलपुर के रजनीश पांडेय, संजय शर्मा और आशीष सिंघई ने पैरवी की ।

भारत में कम्प्यूटर और परसाई की वसीयत

इस मामले में वसीयत को लेकर एक बहुत महत्वपूर्ण और रोचक बात भी सामने आई. जिला न्यायालय में यह भी सवाल आया कि भारत में 1995 में लेजर प्रिंटर आ गया था या नहीं ? हालांकि प्रकाश दुबे ने कहा कि उसे इसकी जानकारी नहीं है. उसने यह स्वीकार किया कि वह भारतीय खाद्य निगम में प्रबंधक था. उसके कार्यालय में वर्ष 2000 के बाद कम्प्यूटर आया तो उसमें डाटमेट्रिक्स प्रिंटर था. जबकि वसीयत नामा लेज़र प्रिंटर से प्रिंट हुआ था. आदेश में विद्वान न्यायाधीश ने लिखा है कि प्रतिवादी एक बड़े पद पर पदस्थ था और उसके कार्यालय में कम्प्यूटर वर्ष 2000 के बाद आया है तो ऐसी दशा में भारत में 10 जुलाई 1995 की स्थिति में लेज़र प्रिंटर से वसीयत प्रिंट करने की बात के संबंध में आशंका पैदा होती है और प्रकाश दुबे की बात बिलकुल विश्वास करने योग्य नहीं लगती. अतः ऐसी दशा में वसीयत नामा शून्य और निष्प्रभावी है ।

 

 

 

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हरिओम राजोरिया की पांच कविताएं

मध्यप्रदेश के अशोक नगर में रहने वाले हरिओम राजोरिया हिंदी के एक बड़े कवि है. राजोरिया भारतीय जननाट्य संघ इप्टा से भी संबंद्ध है. कई सालों से वे बच्चों के लिए नाट्य कार्यशाला का आयोजन भी कर रहे हैं. यहां अपना मोर्चा डॉट कॉम की तरफ से पेश है उनकी पांच कविताएं.

 

लिखना

 

हर हाथ पर काम लिखना

हर रोटी पर नाम लिखना

झूठ-मूठ कुछ न लिखना

और जो लिखता हो

उसे बदनाम लिखना

 

पैसा लिखना

अहसान लिखना

परेशान को परेशान लिखना

ख़ामोश जो रहता हो

उसे ख़ामोशी का अंजाम लिखना

 

सुबह को सुबह लिखना

शाम को शाम लिखना

राम-राम करके जो गुज़र गया

थोड़ा तफ़सील से ठहरकर

उस वक़्त का कुछ हाल लिखना

 

पहले लिखना आंसू

फिर लिखना पसीना

लड़कर जो हार गया

हार कर भी जो लड़ता हो

उस आदमी का मेरा सलाम लिखना।

                         

मनुष्य

 

एक शब्द ' हिन्दू ' लिखते-लिखते

अचानक हाथ रुक जाता है

 

अब मैं 'मनुष्य ' लिखना चाहता हूं

होने को मेरा नाम हरिओम है

और मैं हिन्दू हूं

पर अब इससे ज़्यादा

और हिन्दू होने की 

आकांक्षा नहीं है मेरे भीतर

 

ज़्यादा हिन्दू होने के लिए

किसी से नफ़रत करनी पड़ेगी

इसलिए इतिहास के

पचड़े में ही नहीं पड़ना चाहता

 

हुंकार , विहान , स्वाभिमान , राष्ट्र , दहाड़

जैसी शब्दाबली डराने लगी है

भाषा और संस्कृति के पेंच में फंसाकर

आप एक

आभासी भय की संरचना करेंगे

और एक दिन 

दंगाई बना देंगे मुझे ।

               

मैं गायक बनना चाहता था

 

शुरू किया जो बेटे ने गाने का अभ्यास

मेरे भीतर भी कुछ बजने लगा

काश ! मैं भी गा पाता

ओंठों तक आकर 

ठहर गए शब्द

 

तन-मन में सिहरन सी दौड़ गई

एक लहर सी आई

भिगो कर चली गई

शब्द रहित लय तैर गई स्मृति में

समय को ठेलकर 

चालीस साल पीछे लौट गया

छन-छन कर सुनाई पड़ी

एक बूढ़ी स्त्री की बुझी हुई आवाज़

तनिक जलकर बुझ गई

हवा में हिलती

टाँड़ पर धरी चिमनी की लौ

 

सुन्दर स्वप्न की तरह था एक गान

जो अकेले हो जाने की असहायता

और भीड़ में खो जाने से बचाता था

जो भीतर रह-रह कर कुरेदता रहता 

और बाहर आते ही

हवा में कहीं बिखर जाता

जिसे गा ही न पाया कभी ठीक से

 

कैसी बिडम्बना रही कि मुझे पता ही नहीं

मैं गायक बनना चाहता हूँ

न गला , न वैसा अभ्यास

न कोई बाजा ही मेरे पास

गायक हो जाने का भरम भी नहीं

आज बेटे ने गाया तो

गाने का भरम आया

एक सपना आया

और बगल कम्बल में आकर दुबक गया

 

कोई बनाना चाहता अगर

हो न हो मैँ भी बन गया होता गायक

उस समय में भी इस देश में

लोग बनाये जा रहे थे जाने क्या-क्या

कुछ जो गायक बनना चाह रहे थे

बाद में तोता ही बनकर रह गये

कुछ बनते-बनते लोगों को बनाना सीख गये

कुछ एक बार जो कौआ बने तो

फिर उससे आगे कुछ बन ही न सके

 

कोई व्यवस्था में फिट होकर कुछ  बन गया

कोई अव्यवस्थाओं की बजह से कुछ न बन सका

कोई बनते-बनते तनिक रह गया

कोई बनते-बनते पूरा ही बन गया

कोई अभावों से हारकर चुप बैठ गया

कोई अभावों से लड़कर कुछ बन गया 

पर मैं न बन सका गायक

उन बहुत सारे लोगों की तरह मुझे भी

बिलकुल भी पता न था

कि मैं गायक भी हो सकता हूँ

 

 निज गौरव के लिए नहीं थी

 मुझमें गायक हो जाने की आकांक्षा

 पहले यूं ही गाता था

 गाता तो गाता ही चला जाता

 कभी पिता की घुड़की रोक देती

 कभी बहिनों की न रुकने वाली हंसी

 कभी कनारी के मुंह से मुंह मिलाकर गाता

 कभी दरबाजे पर देर तक

 उंगलियों से तीन ताल बजाता

 देर तक गणित का सवाल अधूरा छोड़

 टेबल ठोक-ठोक कर चिल्लाता

 पर गाना मेरा कभी

 गाने जैसा तो नहीं ही हो पाता

 

आज बेटे ने जब गाया तो 

एक गीत बर्फ़ की तरह

पिघलने लगा भीतर ही भीतर

और चालीस साल बाद आंख की कोर से

आंसू बनकर रिस गया ।

 

वह लड़की

 

कहां चली गई वह लड़की

कोई नहीं करता उसका ज़िक्र

गीत भी चले गए उसके साथ 

चला गया गांव का जस

 

सौदा करने गई थी हाट में

कोई खुद उसे

खरीद ले गया शायद

अबकी ऐसी गई

लौटकर नहीं आई

 

ऐसी परी तो नहीं थी 

फूल सा नहीं था उसका शरीर

बड़ी - बड़ी आंखों

और पतली कमर वाली

वह सांवली-सी लड़की 

काले-काले खेतों में खड़ी 

गेंहू की हरी बाल थी

 

पहले भी जाती थी कई बार

चैत काटने

या मजूरी को दूर देश 

गांव सोचता था

अबकी न फिरेगी

मर-खप जाएगी कहीं

उठा ले जाएगा जिनावर

या घास काटते वक़्त

डस लेगा उसे सांप

 

हुलसकर गाते हुए

वह लौट आती थी हर बार 

चढ़ती नदी में कूदकर 

निकल आती थी साबुत

 

फूले हैं टेसू

कुहुक-कुहुक उठती है कोयल

लौट आया बसंत

लौटकर नहीं आई वह लड़की ।

 

                 

लक्ष्मी

 

स्कूल तो चली ही जाना 

पहले भजियन डारी कड़ी बनाओ

लाल धधकते दिये से 

कड़ी में बघार लगाओ

फिर रोटियों की जेठ बनाओ

खाना परसो 

जाओ ! थोड़ा नमक ले आओ

चूल्हे के पास धरी 

दियासलाई उठा लाओ

हैंडपम्प से चार डिब्बा पानी भर दो

काम निपट जाए फिर जी भर कर पढो

 

अब किताबें धर दो , झाड़ू उठा लो

दाल बीनो , दूध जमा दो                              डलिया भरी राख , घूरे पर फेंक आओ

देहरी पर बैठे कुत्ते को भगाओ

तुम्हारे होने से घर का होना है

सीना , पिरोना , लीपना , ढिग देना है 

झटकारना , बुहारना ,फटकारना

छोटे भाई-बहिनों को पुचकारना

तेज धार में बहते चले जाना

कीक मारकर नहीं

धीरे-धीरे सुबकना

समय मिलते ही पाठ याद करना

 

दो-दो घरों में उजियारा जो करना है

रोना , झींकना , गिड़गिड़ाना है

मन की बात मन में छुपाना है

उपवास करके आरती गाना है

होम लगाकर टुनटुनी हिलाना है

एक सुकोमल सुंदर स्त्री

जैसे रंगीन केलेण्डर में

मंद-मंद मुस्काते

भगवान विष्णु के पैर दबाती है

और पैर दबाते - दबाते एक दिन

तस्बीर में तब्दील हो जाती है ।

 

 

 

 

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कवितानुमा कुछ...

छत्तीसगढ़ के दुर्ग में रहने वाले कैलाश बनवासी मूलतः कथाकार है, लेकिन इसी महीने 11 जून 2019 को उन्होंने एक कविता लिखी और फिर उसे कविता मानने से इंकार भी कर दिया. सच भी है. जो कुछ भी उन्होंने लिखा है वह सिर्फ कविता नहीं बल्कि हमारे भयावह समय का भयावह सच है.

यहां एक हत्या हुई है

--सरासर हत्या!

 खून से लिथड़ी लाश आंगन में पड़ी है

 मौके पर चीख-पुकार मची है

 (टीवी स्क्रीन पर लाइव रिपोर्ट) 

 लेकिन अंदाजा लगाना मुश्किल है

 कितना है आक्रोश और कितनी है खुशी

 क्योंकि अभी-अभी मकतूल और क़ातिल के धर्मों की पहचान हो गई है

 और यह खोज फरार हत्यारे की खोज से कहीं ज़्यादा बड़ी है

  और ज़रूरी

  यहां तक कि उसे सज़ा दिलाने से भी ज़्यादा ज़रूरी!

 

 मृतक के पास एक दल का झंडा मिला है

  हत्यारे के घर पर दूसरे दल का

  दोनों जगहों के प्रत्यक्ष गवाह कैमरे में कह रहे   हैं--यह साजिश है!

  भरोसा किस पर करना है- यह आप तय करें

  भीड़ अपना फैसला तय कर चुकी है।

 

- कैलाश बनवासी

 

                 

 

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मुंबई में गूंज उठी बस्तर की दास्तां

रायपुर. उदारीकरण के इस दौर में जहां हर कहीं पैसा बोलता है, वैसे में मुंबई जैसे महानगरों में भौतिक संसाधन के लिए मची होड़ के बीच विकास के क्रम में पिछले पायदान पर अबतक रहने वाले बस्तर की दास्तां गूंज उठी. दरअसल, बीते दिनों मुंबई प्रेस क्लब में श्रुति संवाद कला अकादमी की ओर से आयोजित सम्मान समारोह में बस्तर के रहने वाले देश के प्रसिद्ध प्रगतिशील किसान व संवेदनशील जनकवि डॉ राजाराम त्रिपाठी ने अपनी कविता ‘मैं बस्तर बोल रहा हूं’ के माध्यम से बस्तर की दशा-दिशा से लोगों को परिचित कराया. कविता मानों शब्दचित्र गढ़ रही हो. डॉ त्रिपाठी ने इसके इतर कई अन्य कविताओं का भी पाठ किया. कविता की पंक्ति – ‘हां मै बस्तर बोल रहा हूं., अपने जलते जख्मों की कुछ परतें खोल रहा हूं...जल जंगल जमीन के बदले, मुफ्त का चावल तौल रहा हूं, हां मैं बस्तर बोल रहा हूं.../  लोगों को बस्तर की दर्द के साथ एकाकार कर दिया. 

सम्मान समारोह में डॉ. त्रिपाठी को साहित्य व पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान के लिए प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया गया. डॉ त्रिपाठी के सम्मान में प्रशस्ति-पत्र डॉ मेधा श्रीमाली ने पढ़ा. उल्लेखनीय है कि डॉ त्रिपाठी की ‘मैं बस्तर बोल रहा हूं’ प्रतिनिधि  कविता है, डॉक्टर त्रिपाठी की इस कविता के बाद ही रचनाकारों में बस्तर की व्यथा कथा को कविता इस तेवर में ढालने का चलन चल निकला है. इसके अलावा उन्होंने पद्य और गद्य में भी काफी लेखन किया है. जनजातीय समुदाय पर केंद्रित साहित्यिक व समाचार पत्रिका ‘ककसाड़’ व वैश्विक मामलों की अंग्रेजी पत्रिका ‘कल्ट करंट’ का संपादन करते हुए देश-विदेश के पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन करते रहे हैं. समारोह में श्रुति संवाद कला अकादमी के अध्यक्ष अरविंद राही ने डॉ. त्रिपाठी के साहित्यिक उपलब्धियों से लोगों को रू-ब-रू कराया. 

डॉ. त्रिपाठी ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि कविता अनुभवों के झंझावात से छन कर स्वतः बहती है. कोई भी कविता आस-पड़ोस, गांव-समाज, रिश्ते-भावनाओं के नम धरातल पर अंकुरित होती  है. मैं बस्तर के सुदूर गांव कहें या जंगल, मैं वहीं रहता हूं. आस पास जो चीजें घटित होती हैं, वह मुझे संवेदित करती है. मेरी कविताएं या अन्य लेखन का विषय ज्यादातर गांव-खेती-किसानी से संवंधित है. मैं स्वयं एक किसान हूं. 

उन्होंने आगे कहा कि अगर देश की कृषि के बारे में बात की जाए, तो यह भारत के कृषि का कृष्णपक्ष है. कृषि आईसीयू में है. इसके उद्धार के लिए संजीदा इलाज की जरुरत है. उन्होंने कहा कि उनके नेतृत्व अकिल भारतीय किसान महासंघ ने किसानों की आर्थिक स्थिति में बेहतरी के लिए किसानों के पेंशन के लिए सरकार को सुझाव दी थी, जिसे सरकार ने मान लिया और किसान पेंशन योजना की शुरुआत हुई है. इसके लिए उन्होंने सरकार को बधाई तो दी लेकिन उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र को आईसीयू से निकालने के लिए नीतिगत स्तर पर बड़े फैसले लेने की आवश्यकता है. इसके बगैर हम भारतीय कृषि के शुक्लपक्ष की कल्पना नहीं कर सकते.

सम्मान समारोह के पश्चात आयोजित कवि गोष्ठी में वरिष्ठ कवि पं. किरण मिश्र ‘अयोध्यावासी’, चित्रा देसाई, नीलम दीक्षित, रासबिहारी पांडे, अरविंद राही, अलका पाण्डे, रीता दास, सुरेश शुक्ल ने काव्य पाठ किया. हिंदी पत्रकार संघ के महासचिव विजय सिंह ने डॉ त्रिपाठी की कृषि क्षेत्र की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला. अतिथियों का स्वागत सुरेश शर्मा तथा डॉ रश्मि पटेल ने किया।

 

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नीरज मनजीत की कविताएं

नीरज मनजीत की कविताएं चिलचिलाती धूप, जोरदार बारिश, बादलों के शामियाने और पहाड़ के आशियाने से टकराकर अपनी बात कहती है. मनजीत अपनी कविताओं में प्रकृति को बेहद सम्मान देते हैं और उसके साथ चलना पसन्द करते हैं. जीवन के संघर्ष के दौरान मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता कितना खूबसूरत होता है यह मनजीत की कविताओं को पढ़कर समझा जा सकता है. मूलतः कवर्धा के रहने वाले मनजीत का लंबा वक्त पत्रकारिता में गुजरा है. वे घुमक्कड़ भी है, इसलिए उनकी कविताएं हमें पहाड़ पर छलांग मारने और नदियों को फलांगने काआमंत्रण देती है. अपना मोर्चा डॉट कॉम की तरफ से पेश हैं उनकी चार कविताएं.

 

            
         ( एक )  

         राग - ज़िंदगी 

        ज़िंदगी रोज़ लिखी जा रही
         किताब की तरह खुलती है
                 हमारे नज़दीक ,
     क्योंकि वो पहले से लिखा जा चुका
           सिलसिलेवार उपन्यास नहीं है 
            हमने रचे हैं पात्र जिसके
        और जिसका अंतिम अध्याय वही है 
                 जो हमने लिखा है ।

           ज़िंदगी किताब से निकलकर
        खुशबू में लिपटी हवाओं की तरह
                     फ़ैल जाती है
                   गाँवों में शहरों में ,
      पठारों पहाड़ों बाग़-बग़ीचे जंगलों में ,
                बर्फ़ से ढँकी वादियों में ,
                    नदियों के जल में
            महासागरों की उत्ताल तरंगों में ,
                     मरुस्थल से उठती
                     रेत की आँधियों में ।
                           विचरती है
                   अंतरिक्ष के विस्तार में ।

                  ज़िंदगी चली जाती है
            चाय बागानों में पत्तियाँ तोड़ती
       टोकरियाँ पीठ से बाँधे औरतों के बीच ,
                   खेतों में बीज बो रहे
                     किसानों के बीच ,
              सड़कों पर हाथ ठेला खींच रहे
                       मजूरों के बीच ,
               फैक्टरियों में मशीनें चला रहे
                    कामगारों के बीच ,
        कतारों में खड़े आम आदमी के साथ
                     खड़ी हो जाती है ,
               अभावों की मस्ती में जी रहे
              लोगों की बस्तियों में जाती है
                   उनसे बातें करती है
                 उनका हाथ पकड़ती है
                  उन्हें दिलासा देती है
                  और उन्हें सौंपती है
                 बेहतर कल के सपने ।

                   और लौट आती है
              कुछ अनुभव लेकर ज़िंदगी
               फिर से हमारी कविताओं में
                      कहानियों में
                 और उस किताब में
                  जिसे अभी-अभी
            हमने लिखना शुरू किया है ।
                    

                               ( दो )   ॉ

                         बारिश का पानी
                                         
                              कल रात
                      खिड़की के शीशे पर
                  बारिश की बौछार पड़ी थी, 
                   उसकी कुछ बूँदें समेटकर मैंने
                   अपनी डायरी के पन्नों में
                            रख ली हैं।

                        डायरी खोली थी
                         कुछ रोज़ पहले,
                             देखा कि
                           उसमें लिखी
                       बहुत-सी कविताएँ
                                मेरी
                         बहुत-सी नज़्में
                        गरमी की धूप में
                        खुश्क हो गयी हैं
                     और फ़ीके पड़ गए हैं
                           उनके चेहरे।

                          उनके अक्षर
                           उनके शब्द
                         उनकी पंक्तियाँ,
                  दिल को तसल्ली देनेवाले
                         उनके जज़्बात,
                     नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़
                     तनकर खड़ी होने की
                        उनकी हिम्मत--
                            सबकुछ
                        कुम्हला गया है।

                     सावन के बादलों से
                   कुछ टुकड़े काट लिये हैं
                               और
                   एक शामियाना बनाकर
                          उनके ऊपर
                          तान दिया है,
                ताकि बहता रहे उनके भीतर
                        बारिश का पानी।
                        


                                      ( तीन )  

                                      तुम्हारे भीतर
                                    
                                       वे सारे समुन्दर
                                      जो तुम्हारे भीतर
                                       तरंगित होते थे,
                               तुमने उन्हें चित्रों में बाँधकर
                                  दीवार से टाँग दिया है।

                                         वो नदियाँ
                                  जो तुम्हारे अंतर्मन में
                                    प्रवाहित होती थीं,
                                           वे अब
                                    तुम्हारी किताबों में
                                          बहती हैं।

                                 लेकिन तुम रीते नहीं हो
                                         मेरे मित्र!
                                       तुम खुद हो
                                      अपने भीतर,
                                 और वे सारी नदियाँ
                                 और वे सारे समुन्दर
                        और सद्यस्क सृजन की संभावना।
                                  ***********
                             
( चार )

काँच की किताब

वो जो कहानियाँ
वो जो कविताएँ
लिखी गई हैं
लिखी जा रही हैं
प्यार की,
वो काँच के शब्दों से
काँच के सफ़हों पे
लिखी जा रही हैं।

प्यार के लिए
काँच की एक किताब
लिखी जा रही है,
काँच के शब्दों से।
इसे आँखों के सामने रखकर देखो
तो वो सबकुछ दिखता है
जो हम देख सकते हैं।
लेकिन इसे
पढ़ नहीं सकते।

अंतर्मन में महसूस करो
इसके शब्दों का स्पर्श।

वो जो किताब
लिखी जा रही है
प्यार की,
उसके कुछ सफ़हे
कुछ पाठ गिरकर टूट चुके हैं।

फिर भी वो किताब 
लिखी जा रही है
लिखी जाती रहेगी सदा।
नए वरक़ जुड़ते रहेंगे उसमें
नए पाठ लिखे जाएँगे
प्यार के।

काँच के शब्दों से।

 

परिचय

नीरज मनजीत

साहित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार


जन्म-- 26 मई 1952, कवर्धा में।


नियमित लेखन 1970 से।

आकाशवाणी रायपुर से रचनाओं का नियमित प्रसारण 1975 से।

पाँच बार रेडियो साहित्य पत्रिका पल्लवी का संपादन।

1985 से पत्रकारिता में।


सम-सामयिक राजनीति, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय घटनाचक्र, साहित्य, अध्यात्म, खेल, सिनेमा,

कारोबार तथा अन्य कई विषयों पर एक हजार से अधिक लेख प्रकाशित। कॉलम राइटिंग भी।

एक कविता संग्रह तथा संपादन में एक यात्रा-वृत्तांत संग्रह प्रकाशित।


फिलहाल स्वतंत्र लेखन और व्यवसाय।


संपर्क-- हैप्पीनेस प्लाजा, नवीन मार्केट, कवर्धा 491995
मोबाइल -- 96694 10338
ईमेल --- neerajmanjeet@gmail.com

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