साहित्य

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जन संस्कृति मंच की भिलाई ईकाई का पुर्नगठन... अभिषेक पटेल अध्यक्ष और सुरेश वाहने सचिव बने

भिलाई. देश में लेखकों और संस्कृतिकर्मियों के सबसे महत्वपूर्ण संगठन जन संस्कृति मंच जसम  की भिलाई ईकाई का पुर्नगठन मंगलवार को कल्याण कालेज स्थित डिजिटल सभागार में किया गया. अब भिलाई ईकाई के अध्यक्ष अभिषेक पटेल और सचिव सुरेश वाहने होंगे. देश के जाने-माने कवि घनश्याम त्रिपाठी और संस्कृतिकर्मी एन पापा राव को उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गई है. सह-सचिव अशोक तिवारी और विद्याभूषण बनाए गए हैं. जबकि संस्कृतिकर्मी सुलेमान खान को कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है.

ईकाई में नाटक का प्रभार हरजिन्दर सिंह संभालेंगे. चित्रकला और संगीत प्रभाग में सर्वज्ञ और समीक्षा नायर को जवाबदारी दी गई है. कार्यकारिणी सदस्यों में कवि कमलेश्वर साहू, आभा दुबे, पूनम साहू, विनोद शर्मा, बृजेंद्र तिवारी, अंबरीश त्रिपाठी, दिनेश सोलंकी, डाक्टर गिरिधर चंद्रा, नदीम, जय प्रकाश नायर और अंजन कुमार शामिल किए गए हैं. ईकाई के संरक्षकों में देश के नामचीन आलोचक सियाराम शर्मा, कवि बीएल पाल, वासुकि प्रसाद उन्मत, विद्या गुप्ता, मीता दास और कैलाश वनवासी का नाम शामिल है. ईकाई के पुर्नगठन के दौरान सभी प्रमुखजनों ने 8-9 अक्टूबर को रायपुर में संपन्न होने जा रहे जसम के राष्ट्रीय सम्मेलन को सफल बनाने का संकल्प लिया.

 

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जन संस्कृति मंच का आयोजनः खौफनाक समय से मुठभेड़ करती हुई कविताओं का पाठ किया छत्तीसगढ़ के उर्वर कवियों ने

रायपुर. विगत दिनों जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई ने शब्द प्रसंग के तहत छत्तीसगढ़ के दस बेहद उर्वर कवियों को लेकर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया. यह काव्य गोष्ठी कई मायनों में इसलिए भी अलग थीं कि सभी कवियों ने समकाल की चुनौतियों के मद्देनजर खौफनाक समय से मुठभेड़ करती हुई कविताओं का पाठ किया. कार्यक्रम में कवियों की कविताओं पर केंद्रित आधार लेख का समीक्षक इंद्र कुमार राठौर ने वाचन किया जबकि कार्यक्रम का कुशल संचालन लेखिका कल्पना मिश्रा ने किया.

इस मौके पर स्त्री मन की पीड़ा को गहन अनुभूतियों के साथ अभिव्यक्त करने वाली कवियित्री जया जादवानी ने बेचेहरा शीर्षक से कविता पढ़ी-

एक सवाल का जवाब हमेशा ढूंढती हूं

इतना क्यों हंसती हैं

हमारे मुल्क की बेचेहरा औरतें

आखिर कहां चली जाती हैं

खुद से गुम हुई औरतें ?

 

कवि कमलेश्वर साहू ने अपनी कविता में कहा-

'उनकी तृष्णा तक होती है चांदी की

वे पसंद करते हैं

चांदी के जूतों की मार

वे हमेशा चांदी नहीं बोते

मगर फसल चांदी की काटते हैं'

 

बेहद कम उम्र में ही अपनी परिपक्व कविताओं के लिए देशव्यापी पहचान बनाने वाली कवि वसु गंधर्व ने कहा-

"मैं एक हज़ार आइनों के अपने प्रतिबिम्बों में

एक हज़ार बार हो चुका हूँ उम्रदराज़

और अपने भीतर दौड़ती एक हज़ारवें पुरखे की नवजात दृष्टि में

समाई बूंद भर रोशनी के उजास से टटोल चुका हूँ

अपनी आगामी पीढ़ियों के हिस्से की रातों का अंधकार।" 

 

कवि विनोद वर्मा ने अपनी कविताओं के जरिए कुछ जरूरी सवाल छोड़े. उन्होंने अपनी कविताओं में कहा-

जब लौटना हो

तब लौटना

जहां मन हो

वहां लौटना

 

हर जाने वाला

लौटना ही चाहता है एक दिन

 

लौटना तुम्हारा सपना हो सकता है

पर कोई नहीं लौट सकता

सपनों में

 

लौटना होता है सच के पास ही

भले नीम अंधेरा हो इस समय

आस रखना रोशनी की

अंधेरे से अंधेरे में मत लौटना.

 

कवि बुद्धिलाल पाल ने राजा की दुनिया को लेकर कई यक्ष प्रश्न खड़े किए-

"राजा कदम कदम पर 

बहुत चौकन्ना होता है"

जबकि वस्तुत:

"यह उसका स्वभाव नहीं होता" 

अलबत्ता

"उसकी आंखों में 

पट्टी बांधी जाती है इसकी' 

कि वह चौकन्ना है ,  घिरा है मक्कार चाटूकारों से।

"राजा अदृश्य होकर 

वार करने की कला में  माहिर होता है"

"वह अदृश्य ही रहता है

 परंतु जब भी दृश्य में होता है 

तो प्रकट होता है 

ईश्वर की तरह 

पीतांबर धारण किए होता है

मुद्रा तथास्तु की होती है !"

 

स्त्री विमर्श को अपने तीखे तेवर से नया आयाम देने वाली कवियित्री सुमेधा अग्रश्री ने पुरौनी शीर्षक से कविता पढ़कर सबका दिल जीत लिया.

गोरी, तीखी, नाजुक, सुड़ौल नही होती जो

वो भी होती तो लड़कियां ही हैं

पर इनके बनने की प्रक्रिया अलग है.

धीरे-धीरे पकती है ये तानों, उलाहनों, तिरस्कार

अवहेलना की भट्ठी पर

जो झुलस जाती है

वो लड़की ही रह जाती है

जो तप जाती है

वो ईश्वर द्वारा धरती को दी गई पुरौनी है.

 

अज़ीम शायर ज़िया हैदरी ने व्यंग्य भरी शायरी से माहौल में गर्मजोशी भर दी-

हमारे बच्चों को सच बोलना सिखाए कौन

जो हैं कबीले के सरदार झूठ बोलते हैं

वे बात करते हैं हर बार साफ गोई की

वो साफ गोई से हर बार झूठ बोलते हैं.

 

जन संस्कृति मंच की भिलाई ईकाई से संबंद्ध कवि विनोद शर्मा ने सामाजिक अंतर्विरोधों और लोकतंत्र की विडंबनाओं को उजागर करने वाली कविताएं पढ़ी. उन्होंने अपनी कविता में कहा-

"धरती के गर्भ में भरा होता है नेह

कोमल और मुलायम जीने की लालसा जगाता हुआ 

दौड़ने का दम भरता हुआ 

कि थकी हुई पलकों पर उंगलियां फेरता हुआ" 

धरती कभी बांझ नहीं होती !

 

 

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जसम का आयोजनः खौफनाक समय से मुठभेड़ करती कविताओं का पाठ

अभी हाल के दिनों में जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई ने शब्द प्रसंग के तहत छत्तीसगढ़ के दस बेहद उर्वर कवियों को लेकर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया था. यह काव्य गोष्ठी कई मायनों में इसलिए भी अलग थीं कि सभी कवियों ने समकाल की चुनौतियों के मद्देनजर खौफनाक समय से मुठभेड़ करती हुई कविताओं का पाठ किया. इस मौके पर युवा समीक्षक इंद्र कुमार राठौर ने कवि विनोद वर्मा, जया जादवानी, जिया हैदरी, वसु गंधर्व, सुमेधा अग्रश्री, बुद्धिलाल पाल, कमलेश्वर साहू और विनोद शर्मा की कविताओं पर केंद्रित जिस महत्वपूर्ण आधार लेख का वाचन किया उसे हम यहां जस का तस प्रस्तुत कर रहे हैं.

 

जैसा कि ज्ञात हो कि जसम रायपुर ईकाई अपनी, कुछ नया और बेहतर की मुहिम के साथ आगे बढ़ी है ,  उस पर गौर किया जा रहा है । यह आयोजन भी उसी तय मुहिम का हिस्सा था । इस तारतम्य में हमने अपने पहले आयोजन में रामजी राय की कृति 'मुक्तिबोध : स्वदेश की खोज' पर गंभीर विमर्श किया। उसके बाद जसम की सहयोगी संस्था अपना मोर्चा डाट काम के बैनर तले युवा  उपन्यासकार किशन लाल के उपन्यास पर भी गंभीर मंत्रणा की । फिर हमने प्रेमचंद जयंती मनाई  जिसके अंतर्गत 'प्रेमचंद : कल आज और कल' विषय पर युवा आलोचक भुवाल सिंह का व्याख्यान हुआ , तथा देश के दो शीर्ष कहानीकार हरि भटनागर व जया जादवानी ने अपनी कहानियों का पाठ किया । उन पर चर्चित आलोचक जयप्रकाश और सियाराम शर्मा के साथ कथाकार आनंद बहादुर ने भी अति महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कहना न होगा कि इन महत्वपूर्ण आयोजनों की अनुगूंज देश भर में सुनी गई । देशभर की साहित्यिक बिरादरी का ध्यान हमारी ओर गया। यह बेहद प्रसन्नता का विषय है कि अनेक वर्षों के बाद होने वाले जसम के राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन भी रायपुर के हिस्से मेॅ आया है, जो आगामी 8 व 9 अक्टूबर को होगा। 

 

बहरहाल, मैं आज के इस आयोजन में जो साथी कवि काव्य पाठ करने वाले हैं, उनके संदर्भ में चंद बातें आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। वे अपनी कविताओं से कहना क्या चाह रहे हैं? क्या राय और विचार रखते हैं समकाल की चुनौतियों पर, उनकी कविताओं से गुजरते हुए जो एक समझ बन , विकसित होती है उसे लेकर मैं आपके सम्मुख उपस्थित हूं। 

 

जया जादवानी की गतिशीलता कहानी और कविता की विधा में समान रूप से है । वे एक महत्वपूर्ण कथाकार और उपन्यासकार होने के साथ कवि के रूप में भी ख्यात हैं । उनकी कविताएं स्त्री मन की पीड़ा और गहन अनुभूतियों की कविताएं है । उनकी एक कविता में यह पंक्ति आई है- 

 

"कहते हैं वह एक अच्छी औरत थी

उसके मुंह में जबान नहीं थी" 

 

यह हमारा आज का कवि कह रहा है , और मैं कह रहा हूं कि यह प्रत्यय कोई चुटकुला नहीं है ; और न कोई गल्प । मैं तो कहूंगा कि कविता कम इतिहास अधिक है । स्त्री जीवन के संघर्ष और संकट के सच का इतिहास है । जो कि उनके सुख-दुख , मार्मिक सवालों और पीड़ाओं का एक जीवंत दस्तावेज है । यद्यपि स्त्री ताकतवर पितृसत्ता के चंगुल में कराह रही है अब भी । तो मानो इसलिए कि वह बच्चा जनने की मशीन ही हो , अभी भी । बहरहाल, अभी बहुत बाकी है ।  समय करवट ले रहा है । दादी की स्थिति को मैं बदलाव में देख प्रसन्न हूं कि उनकी ही थाती हैं जया जादवानी । जो हमें आश्वस्ति से भरती हैं । हमारे भीतर के विविध रंगों और पहलुओं के बीच , मानवीय जिजीविषाओं के साथ हमें और अधिक मनुष्य बनाने की प्रबल इच्छाओं , आकांक्षाओं का एक पूरा कोलाज खड़े करती हैं ।

 

जया जादवानी के यहां जो यथार्थ है वह नंगा यथार्थ है , खुला है । अदृश्य-सा या भुलावे में रख देने जैसा , कि कुछ भी बचाकर रख दें ; यह संभव नहीं है । उनकी अधिकांश कविताओं के केन्द्र में स्त्री है । जो फ़ौरी तौर पर एक खुद्दार , सेल्फ आईडेंटिटी से लैस दिखती है ; कि लगता है , उनका घर है , परिवार है । हालांकि , यह आधा भी सच नहीं है । इस पर मुझे ओमप्रकाश वाल्मीकि इसलिए याद आ रहे हैं कि दशा

 

"चूल्‍हा मिट्टी का

मिट्टी तालाब की

तालाब ठाकुर का ।

 

भूख रोटी की

रोटी बाजरे की

बाजरा खेत का

खेत ठाकुर का ।

 

बैल ठाकुर का

हल ठाकुर का

हल की मूठ पर हथेली अपनी

फ़सल ठाकुर की ।

 

कुआँ ठाकुर का

पानी ठाकुर का

खेत-खलिहान ठाकुर के

गली-मुहल्‍ले ठाकुर के

फिर अपना क्‍या ?

 

कुछ इसी तरह की ही  , भाव भूमि और मनोदशा है स्त्री के जीवन में । जो किन्हीं मायनों में उन दलित समाज की पीड़ाओं से भी अधिक ज्यादतियों के साथ उनके भीतर मौजूद है । यह कहते और इस बिंदु पर आते-आते कभी कभी मुझे लगता है कि स्त्री सर्वाधिक शोषित उत्पीड़ित और दलित है । जिसे जया जादवानी अभिव्यक्त भी करतीं हैं कि

 

"भोर से रात तक घर की चक्की घूमते 

उसके तमाम एहसास पिस-पिसा कर आटा हो गए

जिसकी रोटी वह रोज़ पकाती है और खाती है"

 

जया जादवानी के यहां बिम्बात्मक प्रयोग की महीन परतों में कुछ ऐसा भी अनकहा अनछुआ सच है , जब झांकने लगता है और खदबदाने लगता है तब ज्ञात होता है कि विडंबनाओं का स्त्री जीवन और जाति में कितना गहरा विरोधाभास ; भरा पड़ा है  ।

 

"वह आंसुओं के पर्वत पर खड़ी हंसती थी 

पर कभी-कभी पानी के टब में देर तक 

देखती न जाने क्या ढूंढती थी। 

 

जया जादवानी की अनेक प्रकाशित कृतियों के बीच तीन हिंदी के कविता संग्रह हैं । 'मैं शब्द हूं' 'अनंत संभावनाओं के बाद' 'उठाता है कोई एक मुट्ठी ऐश्वर्य' कम बात नहीं है

 

'चांदी की दुनिया' , 'पानी का पता पूछ रही थी मछली' , 'किताब के समान खुलेंगी यदि आपके घर की खिड़कियां' ; यह ही क्यों ?

'कच्चा दूध' , 'गर्भवती स्त्री' , 'ममता दादुरिया दहेज कांड' ,  'खिलौनों से खेलने की उम्र में खिलौने बेचता बच्चा' , 'स्वाति अग्निहोत्री के बहाने सात प्रेम कविताएं' जैसी मार्मिक , मानवीय तथा उदात्त प्रेम और जीवन की कविताएं , फिर 'जूते' , 'बीस व्यक्तियों का संघर्ष गीत' , या 'बस्तर सप्ताह के सात दिन' का क्रमवार उल्लेख की कविता 'रविवार'  'सोमवार'  'मंगलवार' 'बुधवार'  'गुरुवार' 'शुक्रवार'  'शनिवार' और 'रविवार' के मार्फत , बस्तर के पुरा वैभव वैशिष्ट्य  को अपने में समेटे , उसकी वैविधता इत्यादि को झांक , आज के नक्सलवाद को अपनी यात्रा में शामिल करने  जिसने कम जद्दोजहद नहीं की ; फिर स्त्री पुरुष संबंध को पूरी एक श्रृंखला में सामने लाने वाले अंतिम दशक के प्रिय कवि , जिनके अब तक कि पांच संग्रह , 'यदि लिखने को कहा जाए' , 'पानी का पता पूछ रही थी मछली' , 'कारीगर के हाथ सोने के नहीं होते' , 'सत्य कथा असत्य कथा' जैसी अविस्मरणीय संग्रह के कवि कमलेश्वर साहू को भी हमें सुनना है । कमलेश्वर साहू छत्तीसगढ़ से आने वाले वे महत्वपूर्ण कवि हैं जिनके यहां चीजों का प्रायोगिक विज्ञान व कक्ष है । संवेदना जीवंत और मार्मिक हैं । वायवीय उथल-पुथल नहीं है । जो भी है सीधी साफ़ और सच बात है । पक्ष के चुनाव को लेकर कमलेश्वर विचारधारा के परस्पर ही मनुष्यता को कसौटी का आधार बनाते हैं । भेद रहित जीवन व्यवहार को प्राथमिक बनाते हैं । वर्ग विभाजन को डिक्लास करने की मुहिम में उस वर्ग के साथ होते हैं जो शोषित हैं उत्पीड़ित है । भेद रहित दुनिया के लिए उन्हें आड़े हाथ लेते हैं जो इस विषाद को बड़ा कर रहे होते हैं ।

 

कहते हैं

 

'उनकी तृष्णा तक होती है चांदी की

वे पसंद करते हैं

चांदी के जूतों की मार

वे हमेशा चांदी नहीं बोते

मगर फसल चांदी की काटते हैं'

 

समाज में व्याप्त भेद को कमलेश्वर एक भाजक में रख , देखते हैं और उन चरित्रों की ख़ूब खैर लेते हैं । कि यह सिर्फ अधनंगा प्रदर्शन हैं

 

"बाहर से खूबसूरत दिखने वाली चांदी की दुनिया 

भीतर  से बेहद खोखली , भयानक क्रूर और यातनामयी है"

 

कमलेश्वर के यहां फैंटेसी का प्रयोग और उसका आधार समकालीन यथार्थ है । जादुई सौंदर्य का रचाव कि काले जादू के अविश्वसनीय चमत्कार जैसा नहीं है ।  चूंकि वह अपच्य हो जाता है

 

"जिस वक्त मैं 

चांदी की दुनिया के अंधेरे यातना त्रासदी

और वहां के रहने वाले प्राणियों के बारे में

बता रहा था

एक आदमी आया

जैसे किसी फंतासी का कथा नायक

और मेरे देखते ही देखते 

लगाया छलांग "

 

खैर , कमलेश्वर साहू को हम साथी कवियों के संग सुनने आए हैं । जरूर सुनेंगे ।

 

कवि भविष्यवेत्ता नहीं है । न कोई खगोल विज्ञानी ही । परन्तु वह जिस समय , समाज और अपने परिवेश तथा उसके प्राप्य में जो धारण करता है , उससे , उसके अनुभव का आकाश विस्तृत होता जाता है । वह दीर्घ जीवन अनुभव को  हासिल करता है ; प्रौढ़ता को पा लेता । तो मैं वसु गंधर्व की बात कर रहा हूं वसु गंधर्व इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में आए उन नवोदित कवियों में हैं , जिनके यहां यह दीर्घ जीवन अनुभव व प्रौढ़ता उनमें पहले आ समायी है । वे कहते हैं

 

"मैं एक हज़ार आइनों के अपने प्रतिबिम्बों में

एक हज़ार बार हो चुका हूँ उम्रदराज़

और अपने भीतर दौड़ती एक हज़ारवें पुरखे की नवजात दृष्टि में

समाई बूंद भर रोशनी के उजास से टटोल चुका हूँ

अपनी आगामी पीढ़ियों के हिस्से की रातों का अंधकार।" 

 

यह दृष्टि संपन्न चेतना है , कोई वायवीय घटना नहीं है । अनुभवों से अर्जित किए हुए हैं । देखें हुए हैं खुली आंखों से मंजर कि

 

"नींद में अक्षुण्ण गिरती है कथाओं में जली

लकड़ियों की राख

सपनों में कुनमुनाती है आगामी मिथकों को जन्मने वाली

हवा, और पानी, और घास की सनसनाहटें"

 

यह कवि भी मुक्तिबोध के मार्ग का कवि जान पड़ता है । ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि इनके यहां भी वही बेचैनी व्यग्रता और जद्दोजहद अपने गंभीर मंतव्य में जी उठे हैं । हालांकि उन्हें अभी , उनके मार्ग और उत्तराधिकार के लिए एक दीर्घ व लंबी यात्रा भी करनी होगी । कहना न होगा मुक्तिबोध वामधारा के अपने समकालीनों में जिस तरह से एक उबाऊ राजनैतिक घेरे में बंद इस देह की उदास सिलवटों 

सभ्यताओं के क्रंदन देख सके थे , वही यह अनुज कवि भी देख रहा है कि

 

"सीले पर पटक कर, घिस कर, चमका कर साफ

सुखाकर तपती धूप में हर रोज़

इसे गीदम के बाजार में ले जाता हूँ

दस रुपए में दाँव पर लगाने"

 

और साँझ होते

निंदुआई, उबासियों से भरी इस की आकृति को ढोकर

लौट आता हूँ घर वापस"

 

कह क्या रहा है यह वसु ?देखने की बात यह है कि 

 

"कथाओं में रिसता रहता है वर्षाजल।"

 

इन अर्थों में वसु प्रागैतिहासिकता से  समकालीनता तक की यात्रा का कोलम्बस है। वसु के काव्य में मौजूद बिम्ब विधान बेहद अलहदा प्रकार के हैं  । बेहद विलक्षण भाव तथा विचार की चित्रावलियों की यात्रा कराने में समर्थ हैं। 

वसु गंधर्व ने बहुत कम समय में देश के बहुत सारे जाने-माने लेखकों और आलोचकों का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया है। हरि भटनागर के अनुसार प्रथम दृष्टि में वसु की कविताएं अमूर्तन का भ्रम देती हैं, लेकिन इनके तल में जाने पर बात साफ होती है कि कवि अमूर्तन के बहाने , समय की पदचाप को, उसके द्वंद को काफी गहरे धंसकर , सुनता है , रूप देता है। जिसमें हिंदी काव्य परंपरा के स्फुलिंग , आंखें मीचे मौन रूप में विद्यमान हैं। वहीं महेश वर्मा के अनुसार वसु की कविताएं एक सधी हुई भाषा में लिखी हुई सधी हुई कविताएं हैं, जो इन दिनों दुर्लभ मितकथन को सहज धर्म की तरह बरतती हैं । ये सादगी, चुप्पी और उम्मीद की कविताएं हैं।

वसु के काव्य में जो बिम्ब विधान हैं उससे वे ओरांग ऊटांग की गह्वर गुफ़ा से बातें कराते हैं कि   

 

"तुम्हारी नींद में

पृथ्वी की नींद के गोशे हैं

वनस्पतियों का धीमे डोलना है

निविड़ एकांत में साँप सा सरसराता

धीमे से गुज़रता एक स्पर्श है

ऊँघते शहरों की तंद्रा है

जैसे एक बंदूक की खामोशी"

 

या कि देखें इस नवयुवा कवि की यह पंक्तियां

 

"अंतिम अलविदा का अनुगूँज हो सके ख़त्म

इसके पहले मैं लौट आऊँ घर

बुझी न हो दरवाज़े के पास जलती बत्ती

ख़त्म न हुआ हो मेरे हिस्से का भात।"

 

 भात न सिर्फ हमारी जरूरत है । सनद रहे अधिकार भी है  

 

 साथियों! हमें वसु को भी सुनना है , फिर

_

केदारनाथ सिंह के शब्दों में कहूं तो "जाना एक खौफनाक क्रिया है"

यह इन अर्थों में है कि

 

"कोई कहीं जाता है

तो पूरी तरह कहां लौट पाता है?"

 

सवाल विनोद वर्मा के कहन में जो विद्यमान है , उसे देखने के लिए दृष्टि चाहिए , होता है । हमारे आस-पास की दुनियावी दुनिया में जो कुछ घट रहा है , वह घटता ही जा रहा है किसी खौफनाक क्रिया की तरह । सिमट रहा है लगातार , छोटा होता जा रहा है शनै: शनै : । अर्थात्

 

"वह थोड़ा बह जाता है

अंजुरी से झरते पानी के साथ

नदी में

थोड़ा

किसी जंगली फूल की पंखुड़ियों के साथ

जंगल में अटक जाता है

पहाड़ के शिखर पर

किसी पेड़ की शाख पर

टंगा रह जाता है थोड़ा"

 

यह कि हमारी व्यवहारिकी से इतर भी छूटने लगा है अनगिन कारवां इन दिनों । कि

 

"रह जाता है

शहर में सड़क के किनारे बैठे

बूढ़े की दयनीय आंखों में

ठहरे हुए पानी सा कभी

तो कभी किसी दुकान में सजे

कपड़ों के रंगों में"

 

जाने से चीजों के भीतर वीरानी छाई जाती है । छूटने लगते हैं स्पर्श अहसासात , इसलिए यह एक खौफनाक क्रिया है । और विनोद वर्मा उस खौफनाक क्रिया को महसूस कर सकें हैं कि कहते हैं

 

"लौटता हुआ व्यक्ति

कभी अशोक की तरह लौटता है

अपनी हिंसा छोड़कर

पश्चाताप से भरा

तो कभी

दुनियावी माया को छोड़कर

बुद्ध की तरह"

 

फिर भी जो रिक्ति बची रह जाती है, चकित करता है , चकित करता है

 

"तुम्हारा पूछना

कि कब लौटोगे"

 

 जाने की प्रक्रिया में हमेशा , छूटा रह जाता है साथ किसी सवाल की तरह।

 

विनोद वर्मा की कविताओं में जो अटैचमेंट है वह अचीवमेंट में है । संभाव्य तथा प्राप्य में हैं । स्वायत्त ,स्वशासी को बल देने के साथ यथार्थ से रूबरू कराने में हैं । मसलन देखें कि

 

"हर जाने वाला

लौटना ही चाहता है एक दिन"

 

उनके यहां नवीन जीवन बोध , चाह के बरक्स में है कि

 

"इतिहास से सीखना ज़रूर पर

उसके काले पन्नों को

वर्तमान से मत जोड़ना"

 

चूंकि जीवन एक संभावना है । सप्रमाण भी कि

 

"जीवन न चिता की राख में होता है

न कब्रों में दफ़्न"

 

अर्थात्

 

"कितनी भी महान यात्रा हो इतिहास की

वह भविष्य का पथ प्रदर्शक नहीं हो सकती"

 

चूंकि

 

यही वर्तमान

यही समय, देश और काल

हमारा तुम्हारा सच है"

 

और कि कहा जा सकता है

 

"लौटना तुम्हारा सपना हो सकता है

पर कोई नहीं लौट सकता

सपनों में" 

 

विनोद वर्मा एक अचर्चित कवि हैं,  किन्तु उनकी कविताओं से गुजरना एक अलग ही तरह के अनुभवों से गुजरना है । चूंकि उनके यहां यथार्थ का उद्घाटन जैसा सरल और सहज शब्दों में अखबारी रपटों की तरह हुआ है वह काव्यात्मकता में हुई है ,संतोष से भरता है ।   अपनी कविताओं में वे बिल्कुल सूक्ष्म, अनुभूतिपरक संवेदनाओं के साथ साक्ष्य में आते हैं । उनकी कविता विदा और मिलन की ऐसी कड़ी है जहां अहसासात भरे हुए हैं  उनकी प्रतीक्षा श्रृंखला की कविताएं प्रतीक्षा के इतने नानाविध रूपों को सामने रखती हैं जिनको पढ़ते हुए बरबस केदारनाथ अग्रवाल की हे मेरी तुम श्रृंखला की कविताओं की याद आ जाती है। कवि के रूप में आज विनोद वर्मा को पढ़ना , सुनना  निस्संदेह स्मरणीय होता है।

ना राजा रहे और न रजवाड़े । फिर भी राजा की दुनिया का तिलिस्म कायम रहा ।  एक भी दिन नहीं बीता कि उसके तिलस्मी अस्तित्व से हम कभी ऊबर भी पाए हों । कुछ ऐसा ही ठोस दावा कर बीसवीं सदी के नवें दशक की हिंदी कविता में अपने स्थान को सुनिश्चित किए , कवि बुद्धि लाल पाल ने जो भी कहा है , बात मार्के की ; की है । और यह तभी कहा गया जब राजा का चारित्रिक स्तर ही अपनी पतनशीलता की गाथा बन गई ‌। यह हमारे लिए काफ़ी निराशा की बात है । नहीं तो भला ऐसा भी क्या था ? कि देश में प्रधान तक को कहा जा रहा

 

"राजा कदम कदम पर 

बहुत चौकन्ना होता है"

 

जबकि वस्तुत:

 

"यह उसका स्वभाव नहीं होता" 

 

अलबत्ता

 

"उसकी आंखों में 

पट्टी बांधी जाती है इसकी' 

 

कि वह चौकन्ना है ,  घिरा है मक्कार चाटूकारों से। इस पर बसंत त्रिपाठी ठीक कहते हैं इतिहास और वर्तमान के घेरे में राजा की उपस्थिति एक ऐसा यथार्थ है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती ।  इस प्रजातांत्रिक देश में राजा और उसकी रुचियां धर्म , ईश्वर , कर्मकांड , चाटुकार , दरबारी भय का विस्तार , आर्थिक नाकेबंदी जनता की निरीहता और उसका द्वंद राजतंत्र की ऐसी छवियां हैं जिसे रोजमर्रा की जिंदगी में हम अक्सर देखते हैं और भोगते भी हैं । यह प्रजातांत्रिक देश में परंपराओं और मुहावरों के मैनेरिज्म के , टूटने का काल है ।  राजा लगातार नंगा हो रहा है कि उसकी व्यवस्थाएं रीति नीति का केंद्र शीर्ष है , सत्तासीन होना है  । राजा का न्याय , मायाजाल , अदृश्यता , जैसी एक समग्र कविता के मार्फत क‌ई क‌ई दिशाओं और कोणों से बुद्धि लाल पाल वे सारी बातें कविताओं में दर्ज किए हुए हैं जिससे हमारे देश के राजनेताओं के राजनीतिक चरित्र की खासी समझ हम विकसित कर सकते हैं । राजा की दुनिया में सब अचरज है , अचंभा है । मुद्रा, विस्मयकारी है कि

 

"राजा अदृश्य होकर 

वार करने की कला में  माहिर होता है"

 

"वह अदृश्य ही रहता है

 

 परंतु जब भी दृश्य में होता है 

तो प्रकट होता है 

ईश्वर की तरह 

 

पीतांबर धारण किए होता है

 

मुद्रा तथास्तु की होती है !"

 

बुद्धिलाल पाल अपने तीन कविता संग्रहों के साथ अपनी आरंभिक उपस्थिति को बनाए हुए हैं । चांद जमीन पर , एक आकाश छोटा-सा , और राजा की दुनिया काफी चर्चित रही ।

 

 

"बेशक पत्थरों पर कालजयी ईबारतें लिखी जा सकती है

 

लेकिन

 मैं छेनी नहीं , कलम हूं

 

मुझे जानने के लिए

तुम्हें कागज होना पड़ेगा

 

यह ठोस दावा , आग्रह सुमेधा अग्रश्री करती हैं । स्त्री विमर्श को एक न‌ए आयाम दे वे नस्लभेद की तंगी को जैसे उजागर करतीं हैं वह उनमें नि:सृत अति मानवीय दृष्टि का परिणाम है । रूप सौंदर्य और आर्थिक सबलता ने हमारे भीतर की मनुष्यता को मारकर जो नैरेटिव ईर्ष्या पैदा की है , उनकी कविताओं में देखा जा सकता है

 

'धीरे धीरे पकती है ये

 तानों उलाहनों तिरस्कार  अवहेलना की भट्टी पर'

 

अब तक "पुरौनी" और "नवदीप" दो कविता संग्रह के अलावा एक नाटक "तीन लघु नाटक" संग्रह प्रकाशित हैं । 

कहने सुनने की इस कड़ी में हमारे बीच एक मंझा हुआ , बेहद अज़ीम शायर मौजूद हैं । जिनकी उपस्थिति  एक अलग ही डायमेंशन देते हैं । ये शायर है जनाब ज़िया हैदरी । जिया साहब ने शायरी विधा के मन मिजाज को खूब टटोल लिया है और बेहद कामयाब अशआर निकाले हैं। मुझे ऐसा लगता है कि उर्दू शायरी में रूमानियत की सबसे ज्यादा मजबूत उपस्थिति होती है , लेकिन ज़िया के अशआर रूमानियत से मुक्त होते हैं । बावजूद इसके कि वे उर्दू शायरी के ट्रेडीशन से पूरी तरह वाकिफ हैं। बल्कि उनके एहसास में एक नवीनता है, वे अपने जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले शायर हैं। उनकी भाषा बिल्कुल स्पष्ट और सादगी भरी हुई होती है उनमें क्लिष्ट क्लासिक शब्दों की वह भरमार नहीं है जिसके चलते उर्दू शायरी हिंदी जाने वालों के लिए अपरिचित होकर रह जाती है। बल्कि वे हिंदुस्तानी आम फहम जुबान में शायरी करने वाले शायर हैं, रायपुर में शायरी की एक बहुत ही स्वस्थ है और पुरजोर परंपरा रही है , उस परंपरा के सबसे बेहतरीन नुमाइंदे के रूप में ज़िया हैदरी साहब हमारे सामने हैं उनकी शायरी का एक अंदाज है जो शायरों के सफे में उन्हें एक अलग पहचान देती है। एक नमूना देखिए देखिए-   वे कहते हैं कि

"मैं कि अब उम्र की ढलान में हूँ 

फिर भी लगता है इक उड़ान में हूँ" 

 

बावजूद कि

 

"कोई आता है और न जाता है 

मैं मोहब्बत के जिस मकान में हूँ"

 

क्या हुआ हूँ अगर अकेला मैं 

यही काफी है तेरे ध्यान में हूँ 

 

अर्थात् जीवन को चाहिए ही क्या ? सूफियाना शायरी के इस कद्रदान शायर ने जता ही दिया कि बकौल नफ़स अम्बालवी

 

"उसे गुमां है कि मेरी उड़ान कुछ कम है

 

मुझे यकीं है कि ये आसमां कुछ कम है"

 

 जिया साहब उन पुराने और मंझे हुए शायरों में हैं जिनके यहां उदात्त जीवन अनुभव व आत्मविश्वास अपने लबरेज़ में है ।

वरिष्ठ आलोचक सियाराम शर्मा के अनुसार धरती और स्त्री अपने सौंदर्य के समस्त वैभव सृजनशीलता की बेचैनी और स्नेह की आद्रता के साथ विनोद शर्मा की कविताओं में उपस्थित है और उन शक्तियों की शिनाख्त करती हैं जो प्रेम प्रकृति और स्त्री की विरोधी हैं। विनोद प्रेम के महीन बारीक नरम और मुलायम एहसासों के कवि हैं। विनोद शर्मा की कविताएं सामाजिक अंतर्विरोधों और लोकतंत्र की विडंबनाओं को उजागर करती प्रगति और विकास के तमाम दावों को झुठलाती व्यवस्था विरोध की कविताएं हैं। इनके काव्यात्मक औजार बिंब, प्रतीक और उपमान प्रायः लोक जीवन से उठाए गए हैं। अनाम एहसासों को मूर्त करने के लिए जो उपमान चुने गए हैं वह परंपरा से अलग नए और टटके हैं।

 

तो साथियो, 

 

अब तो होइए मुखातिब अपनी तरफ! कम से कम तय कीजिए कि आपके हाथ में कैसा शब्द और कैसा हथियार होना चाहिए, क्योंकि यह तय करने का वक्त अब आ गया है और यह उस लायक मौसम भी है। 

 

फिर भी , इस कवि का मानना यह भी है कि

 

"धरती के गर्भ में भरा होता है नेह

कोमल और मुलायम जीने की लालसा जगाता हुआ 

दौड़ने का दम भरता हुआ 

कि थकी हुई पलकों पर उंगलियां फेरता हुआ" 

 

उनका मानना है कि

 

धरती कभी बांझ नहीं होती !

 

यह एक आश्वस्ति बीज है । यह तमाम चीजों को अपने भीतर भाष्य बना लेने की जद्दोजहद में सूक्त वाक्य है । जो कवि गांठ रहा है अभी ।

 

इंद्र कुमार राठौर

संपर्क- 90986 49505

 

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13 अगस्त को शब्द प्रसंग के तहत दस कवि करेंगे कविता पाठ

रायपुर. जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई द्वारा 13 अगस्त को शब्द प्रसंग के तहत एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया है. इसमें छत्तीसगढ़ के दस उर्वर कवि स्थानीय वृंदावन हॉल सिविल लाइन में शाम साढ़े पांच बजे से अपनी कविताओं का पाठ करेंगे. जिन कवियों को जसम ने ससम्मान आमंत्रित किया है उनमें जया जादवानी, विनोद वर्मा, आलोक वर्मा, कमलेश्वर साहू, जिया हैदरी, आभा दुबे, सुमेधा अग्रश्री, बुद्धिलाल पाल, वसु गंधर्व और विनोद शर्मा शामिल हैं. कार्यक्रम का संचालन लेखिका कल्पना मिश्रा करेंगी जबकि कविता पाठ के उपरांत समीक्षक इंद्र कुमार राठौर प्रत्येक कवि की कविताओं पर सारगर्भित वक्तव्य देंगे. इस मौके पर देश के चर्चित आलोचक प्रोफेसर सियाराम शर्मा, भुवाल सिंह, अंबरीश त्रिपाठी, अभिषेक पटेल, अशोक तिवारी, बृजेंद तिवारी, घनश्याम त्रिपाठी, पापा राव, वासुकि प्रसाद उन्मत, सुरेश वाहने, सुलेमान खान, नरोत्तम शर्मा, अमित चौहान, सृष्टि आलोक, आरती उपाध्याय, अखिलेश एडगर, डाक्टर दीक्षित, ऋषि गजपाल, किशन लाल और पत्रकार राजकुमार सोनी विशेष रुप से मौजूद रहेंगे. जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई के अध्यक्ष आनंद बहादुर और सचिव मोहित जायसवाल ने इस अवसर पर सभी सुधि श्रोताओं, दर्शकों और साहित्यिकजनों से उपस्थित रहने की अपील की है.
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नवजागरण की महान परम्परा का हिस्सा थे प्रेमचंद-जय प्रकाश

लेखकों ने प्रेमचंद के अवदान को शिद्दत से किया याद

रायपुर. जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई द्वारा 31 जुलाई को स्थानीय वृंदावन हॉल में प्रेमचंद जयंती मनाई गई. इस अवसर में उपस्थित लेखकों ने प्रेमचंद के अवदान को बड़ी शिद्दत से याद किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे देश के सुप्रसिद्ध समीक्षक जय प्रकाश ने कहा कि प्रेमचंद यथार्थवादी लेखक थे, लेकिन उन्हें केवल यथार्थवादी लेखन की परम्परा का स्रोत समझना भ्रामक है. वस्तुतः प्रेमचंद भारतीय नवजागरण की महान परंपरा का हिस्सा थे जो भारतेंदु युग में प्रारंभ हुई थी और भारतीय साहित्य में जिसकी अभिव्यक्ति सबसे पहले उड़िया लेखक फ़क़ीरमोहन सेनापति के उपन्यास में दिखाई देती है. प्रेमचंद को इस रूप में देखने पर ही प्रेमचंद  को सही संदर्भों में समझा जा सकता है. इस मौके पर कथाकार हरि भटनागर ने अपनी कहानी सेवड़ी रोटियां और जले आलू तथा जया जादवानी ने बर्फ के फूल का वाचन किया.

कथाकार हरि भटनागर की कहानी पर टिप्पणी करते हुए समीक्षक जय प्रकाश ने कहा कि इसमें श्रमजीवी वर्ग का अपने द्वारा उत्पादित वस्तु से ही नहीं, समाज और स्वयं से विलगाव भी मार्मिक ढंग से चित्रित हुआ है. यह कहानी चेखोव जैसे कथाकार की ऊँचाई को छूती है. हरि भटनागर ने इसमें विडम्बना की कथा युक्ति का सृजनात्मक उपयोग किया है. जबकि जया जादवानी की कहानी 'बर्फ़ के फूल' प्रेम और नैतिकता से जुड़े सवालों को उठाते हुए स्त्री-पुरुष संबंध के एक अनछुए आयाम को उद्घाटित करती है. ढर्रे में चलते जीवन में प्रेम का अधूरापन और उसकी विडंबना यहाँ प्रकट हुई है. कहानी बताती है कि पितृसत्ता स्त्री को मुक्त नहीं कर सकती. पुरुष होने के नाते इस कहानी के नायक शाश्वत का प्रिविलेज वस्तुतः पितृसत्ता  का प्रिविलेज है.

समीक्षक सियाराम शर्मा ने हरि भटनागर की कहानी सेवड़ी रोटियां और जले आलू को मनुष्य के अमानवीयकरण कर दिए जाने की कहानी बताया.उन्होंने कहा कि पूंजीवादी सभ्यता ने जिस बुरे ढंग से मानवीय सारतत्व को निचोड़कर एक यंत्र में तब्दील कर दिया है, कहानी उस यांत्रिकता को खोलकर रख देती है. उन्होंने जया जादवानी की कहानी को सूक्ष्म और संवेदनशील मन की बेजोड़ कहानी बताया. उनकी कहानी प्रेम की आकांक्षा की कहानी है जो कभी भी...किसी भी उम्र में जन्म लेकर विकसित हो सकती है. जया जादवानी की कहानियां मनुष्य को और ज्यादा बेहतर मनुष्य बन जाने के लिए प्रेरित करती है.

जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई के अध्यक्ष आनंद बहादुर ने कहा कि समूचे देश में प्रेमचंद की जयंती अगर सघनता और उत्साह के साथ और मनाई गई तो यह अनायास नहीं है. गांधी, टैगोर और मुक्तिबोध की तरह ही प्रेमचंद भी आज फासिज्म तथा सामंतवाद के प्रतिरोध के मजबूत आधार के रूप में देखे जा रहे हैं. प्रेमचंद ने अपने समय में ही सामंतवाद और फासिज्म के उन अवशेषों को देख लिया था जो आजादी के बाद भी बचे रह गए थे.

उन्होंने कहा कि हरि भटनागर की कहानी 'सेवड़ी रोटियां और जले आलू' प्रेमचंद की कहानी कफन की याद तो दिलाती है लेकिन उससे बिल्कुल भिन्न प्रकृति की कहानी है. कफन जहां एक और मानव के दानव हो जाने की कहानी है, वहीं दूसरी ओर हरि भटनागर की कहानी मनुष्य की मानवीय संवेदना के खो जाने की कहानी है. किस प्रकार सिस्टम मनुष्य को यांत्रिक कर उसे संवेदनाविहीन कर देता है,  उससे उसके रंग, स्वाद, सुंदरता आदि के एहसास को छीन लेता है यह इस कहानी का मुख्य कथ्य है. यह कहानी चेखव के 'डेथ ऑफ ए क्लर्क' से बहुत कुछ मिलती जुलती रचना है जहां एक क्लर्क व्यवस्था की चक्की में पिसते पिसते इतना यांत्रिक हो जाता है यह आदमी की अस्मिता को खो बैठता है. हरि भटनागर प्रेमचंद की परिपाटी के लेखक न लग कर चेखव की परिपाटी के लेखक लगते हैं.

आनंद बहादुर ने जया जादवानी की कहानी को मानवीय संबंधों, खासकर स्त्री-पुरुष संबंधों की गहरी पड़ताल करने वाली कहानी बताया. उन्होंने कहा कि वे ऐसे अछूते विषयों पर कलम चलाती हैं जिनके बारे में आम आदमी सोचने का दुस्साहस तक नहीं करता है. विवाहेतर प्रेम और खासकर अधेड़ उम्र के प्रेम को उन्होंने अपने कहानियों के दायरे में लाया है एक तरह से कहा जाए तो वे बहुत अधिक खतरा उठा कर लिखने वाली लेखिका हैं. स्त्री-पुरुष के संबंधों को वे बाह्य रूप में नहीं बरततीं की बल्कि बहुत ही गहरी आंतरिक स्तर पर जाकर उनकी विडंबनाओं की पड़ताल करती हैं. खास कर स्त्री मन के हजारों छुपे हुए अवगुनों को खोलती हैं और उन्हें खोलने का उनका जो तरीका है वह भी उनका नितांत व्यक्तिगत है. वे खुद अपने मन में गहरे डूब कर स्त्री के मन की गहराई को तलाशती हैं और वहां से अपने कथानकों को उठाती हैं, इसीलिए वे इतनी सहज और सरल और उनकी भाषा और उनका नैरेटिव टेक्निक प्रभावकारी होता है। बर्फ के फूल कहानी इस बात को मिसाल के तौर पर सामने रखती है कि जया जादवानी क्यों हमारे समय की सबसे महत्वपूर्ण लेखिकाओं में शुमार की जाती हैं. 

युवा समीक्षक भुवाल सिंह ने प्रेमचंद: कल आज और कल विषय पर महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया. उन्होंने कहा कि प्रेमचंद जिस दौर में लिख रहे थे वह दौर गुलामी का था, लेकिन वे अपनी अंतरात्मा की आवाज पर न्याय का साथ देते थे. अब देश आजाद है. अब संविधान भी है और सुप्रीम कोर्ट भी... लेकिन क्या हम पंच-परमेश्वर जैसी कहानी में उपस्थित रहने वाली न्याय व्यवस्था को देख पा रहे हैं? कार्यक्रम का कुशल संचालन अमित चौहान ने एवं आभार प्रदर्शन जन संस्कृति मंच के सचिव मोहित जायसवाल ने किया. इस मौके पर बड़ी संख्या में साहित्यिकजन मौजूद थे.

 

 

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जन संस्कृति मंच का आयोजन : 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती पर कहानी पाठ और विमर्श

रायपुर. जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई द्वारा 31 जुलाई को कथा और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर कहानी पाठ और विमर्श का आयोजन किया गया है. स्थानीय वृंदावन हॉल में शाम साढ़े पांच बजे लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार जया जादवानी और हरि भटनागर अपनी कहानियों का पाठ करेंगे.कार्यक्रम की अध्यक्षता देश के सुप्रसिद्ध आलोचक जय प्रकाश करेंगे जबकि कहानियों पर टिप्पणी जसम रायपुर के अध्यक्ष और कथाकार आनंद बहादुर की होगी. प्रेमचंद का देश : कल आज और कल विषय पर युवा आलोचक भुवाल सिंह का व्याख्यान होगा. कार्यक्रम का संचालन अमित चौहान करेंगे.

इस मौके पर जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय ईकाई से संबंद्ध प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर सियाराम शर्मा, लेखिका कल्पना मिश्रा, जसम रायपुर के सचिव मोहित जायसवाल, युवा आलोचक इंद्र कुमार राठौर, वसु गंधर्व, अजुल्का, बृजेंद्र तिवारी, नरोत्तम शर्मा, सृष्टि आलोक, कमलेश्वर साहू, उपन्यासकार किशन लाल, अखिलेश एडगर, डाक्टर दीक्षित, संस्कृतिकर्मी सुलेमान खान, अप्पला स्वामी, शंकर राव, उमेश बाबू, संतोष बंजारा, राजेंद्र पेठे, अशोक तिवारी, घनश्याम त्रिपाठी और राजकुमार सोनी सहित रायपुर-दुर्ग-भिलाई के अनेक साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी विशेष रुप से मौजूद रहेंगे.

गौरतलब है कि लेखकों और संस्कृतिकर्मियों के सबसे महत्वपूर्ण संगठन जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई का गठन इसी साल 3 मई 2022 को किया गया है. इस ईकाई ने पिछले दिनों चर्चित मार्क्सवादी विचारक रामजी राय  की पुस्तक मुक्तिबोध: स्वदेश की खोज का विमोचन कार्यक्रम आयोजित किया था जो बेहद सफल था. ईकाई द्वारा आगामी 13 अगस्त को एक काव्य गोष्ठी भी रखी गई है. इस आयोजन के बाद ईकाई से जुड़े सभी पदाधिकारी और सदस्य राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारियों में जुट जाएंगे जो 8 और 9 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में होगा. इस दौरान देशभर के तीन सौ से ज्यादा लेखक और संस्कृतिकर्मी फासीवाद के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करेंगे.

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देश के प्रसिद्ध कवि कौशल किशोर को मिला जनकवि केदारनाथ अग्रवाल सम्मान

बांदा / जनवादी लेखक मंच, बांदा और 'मुक्तिचक्र' पत्रिका की ओर से कवि और संस्कृतिकर्मी कौशल किशोर को जनकवि केदारनाथ अग्रवाल सम्मान से सम्मानित किया गया. उन्हें मंच के अध्यक्ष जवाहरलाल जलज और 'मुक्तिचक्र' पत्रिका के संपादक गोपाल गोयल द्वारा सम्मान के तौर पर अंगवस्त्र तथा प्रतीक चिन्ह प्रदान किया गया. कार्यक्रम जैन धर्मशाला, बांदा के सभागार में 22 जून को संपन्न हुआ. इसकी अध्यक्षता पर्यावरणविद और प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह ने की तथा संचालन युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ने किया.

इस मौके पर सम्मानित रचनाकार कौशल किशोर ने कहा कि सम्मानों की भीड़ में इस केदार सम्मान का अपना अलग महत्व है। यह साहित्य की प्रगतिशील-जनवादी परंपरा और संघर्षशील धारा का सम्मान है, किसी व्यक्ति का नहीं है। नागार्जुन और केदार जनकवि हैं। वे साफ-साफ बात करते हैं। केदार जी के पास विश्व दृष्टि है, वहीं अपने जनपद का गहरा यथार्थ बोध है। केन उनके यहां चेतना की नदी है। वे जन आस्था के कवि हैं, प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं, अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध के कवि हैं। उनके सृजन में एक बेहतर दुनिया की संकल्पना है। वे हम जैसों को लगातार प्रेरित करते हैं। यह सम्मान हमें संघर्षशील, संकल्पबद्ध तथा अपने रचना कर्म के प्रति जिम्मेदार बनाता है।

कौशल किशोर ने करीब आधा दर्जन कविताएं सुनाईं। किसान आंदोलन को केंद्र कर लिखी कविता में कृषि कानूनों की वापसी के बाद उनके लौटने को इस प्रकार व्यक्त किया 'उनका लौटना महज लौटना नहीं है/यह भारत की ललाट पर खेतों की मिट्टी का चमकना है'। उन्होंने 'वह हामिद था' शीर्षक से कविता का पाठ किया जिसमें प्रेमचंद की मशहूर कहानी 'ईदगाह' के केंद्रीय पात्र 'हामिद' का पुनर्पाठ है। वर्तमान समय में उसे मॉब लिंचिंग जैसी भयावह स्थिति से गुजरना पड़ रहा है। इसी सच्चाई को कविता व्यक्त करती है 'हामिद मारा गया/ नहीं...नहीं हामिद नहीं मारा गया/मारी गई संवेदनाएं/ हत्या हुई भाव विचार की/जो हमें हामिद से जोड़ती हैं/ जो हमें आपस में जोड़ती हैं/जो हमें इंसान बनाती हैं/जो हमें हिंदुस्तान बनाती हैं'। इसी का विस्तार 'बुलडोजर' कविता में है जो वर्तमान समय में सत्ता संस्कृति का प्रतीक बना है। कविता इसका जन प्रतिरोध रचती है, कुछ यूं 'जो अभी राजा के आदेश पर मचल रहा था/दुलत्ती चला रहा था/औरतों ने उसका हिनहिनाना बंद कर दिया है/उन्होंने कान उमेठ बता दिया है कि/ बुलडोजर हो या हो अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा/उनके आगे कोई भी अजेय नहीं है'। अपने कविता पाठ का समापन 'मेरा सत्तर पार करना' कविता से किया जिसमें वे कहते हैं 'मेरा सत्तर पार करना/बचपन में तैर कर नदी पार करने जैसा है/शरीर कई व्याधियों से घिरा है/पर दिल अब भी जवान है/....अनेक लड़ाइयां जो पिछली सदी में लड़ी गईं/ वे अब भी जारी हैं/मैं एक सिपाही की तरह/ उनमें शामिल रहा हूं'। इस कविता का अन्त कवि शमशेर बहादुर सिंह को उद्धृत करते हुए है कि 'अब जितने दिन भी जीना होना है/उनकी चोटें होनी हैं और अपना सीना होना है '।

उन्नाव से आए कवि और आलोचक दिनेश प्रियमन का इस अवसर पर कहना था कि केदार जी की स्मृति में दिया जाने वाला यह सम्मान बड़े-बड़े सरकारी पुरस्कारों से बड़ा है और अपना अलग महत्व रखता है। कौशल किशोर की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि यह सम्मान उनके रचना कर्म और संस्कृति कर्म के संतुलन का सम्मान है। उन्होंने जीवन कर्म के साथ रचना कर्म तथा काव्य कर्म के साथ संस्कृति कर्म का संतुलन बनाया है। यह उनके गद्य और पद्य की रचनाओं में भी दिखता है। रचना कर्म कलम  घिसने या फुरसतिया काम नहीं है।  कौशल किशोर ने रचना कर्म को सामाजिक कर्म का हिस्सा बनाया है। उनकी कविता में हामिद है और उसके माध्यम से हमारा समय है। वे सत्ता के अत्याचार पर लिखते हैं। इसके साथ जन प्रतिरोध है। जहां भी संघर्ष है, उन पर उनकी अभिव्यक्ति है। वे किसानों के संघर्ष की बात करते हैं। यहां स्त्रियों का संघर्ष है। इनके यहां 'वह औरत नहीं महानद थी' की बात है। इसमें संघर्ष की निरंतरता के साथ उम्मीद और एक बेहतर दुनिया का स्वप्न है।

लखनऊ से आए युवा आलोचक डॉ अजीत प्रियदर्शी का कहना था कौशल किशोर आंदोलनधर्मी रचनाकार हैं। इनकी वैचारिकी की निर्मिती वहीं से होती है। वे जलेस, प्रलेस की निर्माण प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं। जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में हैं। इन्होंने मजदूर आंदोलन में भाग लिया। नुक्कड़ नाटक भी किए। सूत्र रूप में कहा जाए तो कौशल किशोर रचना, विचार, संगठन और आंदोलन के व्यक्ति हैं । इस उम्र में भी वे युवा हैं।  उनकी सक्रियता हम जैसों को प्रेरित करती है। केदार जी की प्रगतिशील परंपरा ऐसे ही रचनाकारों से आगे बढ़ती है।

दूसरा सत्र विमोचन सत्र था। इसमें 'रहूँगा तब तक इसी लोक में' ( कविता संग्रह ) जवाहर लाल जलज, 'पगडंडियों से राजपथ तक' - ( गीत / कविता संग्रह ) रामौतार साहू, जबरापुर ( कहानी संग्रह ) प्रद्युम्न कुमार सिंह तथा 'कोरोना काल  में कविता' (साझा काव्य संकलन) - संपादक प्रमोद दीक्षित मलय का लोकार्पण हुआ। 'कृति ओर' हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिका है। इसके संस्थापक संपादक विजेंद्र रहे हैं। पिछले साल कोरोना संक्रमण की वजह से उनका निधन हुआ। वह पत्रिका युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार के संपादन में बांदा से निकलनी शुरू हुई है। इस मौके पर उसके नये अंक का भी लोकार्पण हुआ जो विजेंद्र जी पर केंद्रित है। इसमें उनके जीवन और रचना कर्म पर केंद्रित रचनात्मक सामग्री है।

दूसरे दिन 23 जून को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित  गाँव जखनी में स्थापित जैविक खेती के माडल 'प्रेम सिंह की बगिया' को देखने-समझने का था। यहां हुई संगोष्ठी में 'जल जंगल जमीन के संकट और निवारण में किसानों की भूमिका' विषय पर प्रेम सिंह ने विस्तार से अपने विचार रखे। इस मौके पर कविता चौपाल का भी आयोजन किया गया। दिनेश प्रियमन की अध्यक्षता में जवाहर लाल जलज, विमल किशोर, नारायण दासगुप्ता, प्रेम नंदन, प्रदुम्न कुमार सिंह, डीडी सोनी, उमाशंकर सिंह परमार, रामअवतार साहू, प्रमोद दीक्षित आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। 'मुक्तिचक्र' पत्रिका के संपादक गोपाल गोयल के धन्यवाद ज्ञापन से दो दिनों के जनकवि केदारनाथ अग्रवाल सम्मान समारोह का समापन हुआ।

 

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भाजपा शासनकाल में हुए छत्तीसगढ़ के खौफनाक बदलाव का आख्यान है किशन लाल का उपन्यास चींटियों की वापसी

रायपुर. 26 जून रविवार को यहां स्थानीय वृंदावन हाल में युवा लेखक किशन लाल के उपन्यास चींटियों की वापसी पर देश के नामचीन लेखकों और आलोचकों ने विमर्श किया. सबने यह माना कि किशन लाल का उपन्यास छत्तीसगढ़ के खौफनाक बदलाव का आख्यान है. उपन्यास के लेखक किशन लाल ने बताया कि उन्होंने यह उपन्यास तब लिखा था तब प्रदेश में भाजपा की सरकार थीं. उन्होंने अपनी खुली आंखों से जमीनों की लूट-खसोट, किसान- मजदूरों पर अत्याचार और उनके विस्थापन के दर्द को देखा था. जो कुछ उन्होंने देखा-भोगा और समझा वहीं सब कुछ उपन्यास का हिस्सा बन गया.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देश के प्रखर आलोचक जय प्रकाश ने कहा कि उपन्यास को सिर्फ रायपुर तक सीमित नहीं रखा जा सकता है. यह समूचे छत्तीसगढ़ की कहानी है. उपन्यास में तीन पीढ़ियों की चींटियां है और उपन्यासकार ने उन्हीं चींटियों के हवाले से दबले-कुचले, शोषित और पीड़ित लोगों की बात कहीं है. किताब में भ्रूण हत्या, संविधान की अवहेलना, छठवीं अनुसूची की अनदेखी, मानव तस्करी, आंख फोड़वा और गर्भाश्य कांड के साथ-साथ झलियामारी में आदिवासी बच्चियों के साथ किए गए दुष्कर्म का दर्द देखने को मिलता है. उपन्यास में जातिगत विद्वेष, आरक्षण में कटौती और वेलेंटाइन डे पर हुंडदंग का उल्लेख भी होता है,लेकिन यह सारा उल्लेख किसी समाचार की तरह नहीं बल्कि एक जरूरी और स्वाभाविक चिन्ता के साथ प्रकट होता है. उन्होंने कहा कि किशन लाल की भाषा में काव्य के तत्व निहित हैं इसलिए वे अपनी पूरी बात को बेहद संवेदनाशीलता के साथ प्रकट करते हैं. उपन्यास छत्तीसगढ़ का समकाल है जिसमें विमर्शों की भरमार है. तार्किकता और विवेकशीलता उपन्यास के मुख्य नायक हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे देश के नामी आलोचक प्रोफेसर सियाराम शर्मा ने किशन लाल को विलक्षण शिल्प का चितेरा बताया. उन्होंने कहा कि लघुता का सौंदर्य ही उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत है. लघुता में विराटता और साधारण में असाधारण को देखने का काम कोई प्रतिभाशाली लेखक ही कर सकता है. श्री शर्मा ने कहा कि ऐसे खौफनाक समय में जबकि आम आदमी की समस्याओं को देखना-सुनना बंद कर दिया गया है तब किशन लाल ने चींटियों के जरिए दबे-कुचले की आवाज को मुखर अभिव्यक्ति दी है.  उन्होंने कहा कि अब चाहे पत्रकारिता हो या दूसरी जगह... सबने दलित-शोषित और पीड़ितों की आवाज को उठाना बंद कर दिया है. वंचित वर्ग को देश में जगह-जगह जो कुछ भुगतना पड़ रहा है उसे इस उपन्यास में सूक्ष्मता के साथ प्रकट किया गया है. उपन्यास में आदिवासी महिला सोनी सोरी का जिक्र भी आता है, कैसे उन्हें भयंकर अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ा था.  उपन्यास में एक पात्र कहता है “तुम कहते हो नक्सली संविधान को नहीं मानते, चलो ठीक है, नहीं मानते! लेकिन ये बताओ जिन्हें संविधान के पालन करने की जिम्मेदारी दी गई थी, जिन्हें संविधान का पालन करना चाहिए था क्या वे संविधान का पालन कर रहे हैं? संविधान को मानते हैं?” आलोचक शर्मा ने ज्ञानेंद्रपति की चींटियां शीर्षक से प्रकाशित एक कविता का खास उल्लेख करते हुए कहा कि इतिहास जिन क्षणों को रौंदकर निकल जाता है, कविता या साहित्य उस पर नया संसार रचने का काम करता है.  

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार और कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता विनोद साव ने किशन लाल को जातिवाद के दंश के खिलाफ बेबाकी के साथ लिखने वाला साहसी लेखक बताया. उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति साम्प्रदायिक होगा वह जातिवादी भी होगा. किशन अपने साहित्य के बूते साम्प्रदायिकता की जड़ें काटने का काम कर रहे हैं. इससे पहले भी उन्होंने अपनी पुस्तक “किधर जाऊं” में नए विमर्शों को जन्म दिया था. श्री साव ने उपन्यास के एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि कैसे सलवा जुडूम के नाम पर महज 1500 रुपए देकर आदिवासियों को आदिवासियों से ही लड़ाया जा रहा था. आदिवासी ही आदिवासी की हत्या कर रहे थे. इन तमाम बातों पर किशन लाल चिंतित हुए और उस पर भी अपनी कलम चलाई. जातिवाद विमर्श में कैसे मुखरित होता है इसे उपन्यास में उपजे विमर्शों के जरिए समझा जा सकता है. राजिम मेले के लिए दो-ढ़ाई सौ करोड़ फंड इकट्ठा हो जाता है लेकिन गिरौधपुरी के लिए महज 8-9 लाख एकत्र हो पाता है. राजिम मेले के लिए मुफ्त में बस चलाई जा सकती है, लेकिन गिरौधपुरी मेले के लिए नहीं. उन्होंने कहा कि किशन का उपन्यास न ट्रैजेटिक है, न कॉमिक है, किशन का उपन्यास पैथेटिक है. इस उपन्यास में छत्तीसगढ़ प्रांत को लेकर बहस है. एक राजधानी की सजावट भर से राज्य का विकास नहीं हो जाता है. 

युवा समीक्षक अजय चंद्रवंशी ने किशन लाल को नई भावभूमि के साथ विलक्षण दृष्टि रखने वाला लेखक निरूपित किया. उन्होंने कहा कि पूरे उपन्यास में चींटियां इस कदर घुल-मिल जाती है कि वह फिर आम इंसानों का प्रतिरूप नजर आने लगती है. चींटियां गांव से उजड़ कर शहर में आती हैं और वहां की स्थिति को देखकर हतभ्रत होती हैं. उनकी शहर से वापसी की सोच यह बतलाती है कि अब शहर रहने लायक नही बचा. उपन्यास का एक पात्र संजय जो पत्रकार है वह जगह-जगह हो रहे भेदभाव और दोहरी मानसिकता को उजागर करने में सफल रहता है. एक पात्र गुरूजी के वक्तव्यों में दलित और आदिवासियों की चिंताए मुखरता के साथ उभरती है. विमर्श के अंत में झारखंड के संस्कृतिकर्मी दिनकर शर्मा ने गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी पक्षी और दीमक पर अपनी एकल प्रस्तुति से सबकी आंखे नम कर दी. कार्यक्रम का सफल संचालन युवा कवि कमलेश्वर साहू ने किया जबकि आभार प्रदर्शन पत्रकार राजकुमार सोनी ने किया.

अपना मोर्चा डॉट कॉम की तरफ से आयोजित की गई इस महत्वपूर्ण चर्चा गोष्ठी में छत्तीसगढ़ साहित्य परिषद के अध्यक्ष ईश्वर सिंह दोस्त, जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई के अध्यक्ष आनंद बहादुर, वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध, कथाकार ऋषि गजपाल, समीक्षक इंद्र कुमार राठौर, स्वदेश टीवी चैनल और आज की जनधारा के प्रमुख संपादक सुभाष मिश्रा, जनवादी लेखक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य मुमताज, प्रगतिशील लेखक संघ से संबंद्ध कवि आलोक वर्मा, नंद कुमार कंसारी, संजय शाम, मांझी अनंत, अरुणकांत शुक्ला,आदिवासी मामलों के जानकार नवल शुक्ल, समीक्षक राजेश गनौदवाले, रंगकर्मी निसार अली, अप्पला स्वामी, संतोष बंजारा, शंकर राव, उमेश, सुलेमान खान, साहित्यकार राजेंद्र ओझा, मृणालिका ओझा, वरिष्ठ छायाकार गोकुल सोनी, जसम के युवा साथी वसु गंधर्व, अमित चौहान, सृष्टि आलोक सहित अनेक साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी मौजूद थे. इस मौके पर वैभव प्रकाशन के संचालक और साहित्यकार सुधीर शर्मा ने लेखक किशन लाल को शॉल और श्रीफल भेंटकर सम्मानित भी किया.

 

 

                   

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भाजपा शासनकाल में हुए छत्तीसगढ़ के खौफनाक बदलाव का आख्यान है किशन लाल का उपन्यास चींटियों की वापसी

रायपुर. 26 जून रविवार को यहां स्थानीय वृंदावन हाल में युवा लेखक किशन लाल के उपन्यास चींटियों की वापसी पर देश के नामचीन लेखकों और आलोचकों ने विमर्श किया. सबने यह माना कि किशन लाल का उपन्यास छत्तीसगढ़ के खौफनाक बदलाव का आख्यान है. उपन्यास के लेखक किशन लाल ने बताया कि उन्होंने यह उपन्यास तब लिखा था तब प्रदेश में भाजपा की सरकार थीं. उन्होंने अपनी खुली आंखों से जमीनों की लूट-खसोट, किसान- मजदूरों पर अत्याचार और उनके विस्थापन के दर्द को देखा था. जो कुछ उन्होंने देखा-भोगा और समझा वहीं सब कुछ उपन्यास का हिस्सा बन गया.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देश के प्रखर आलोचक जय प्रकाश ने कहा कि उपन्यास को सिर्फ रायपुर तक सीमित नहीं रखा जा सकता है. यह समूचे छत्तीसगढ़ की कहानी है. उपन्यास में तीन पीढ़ियों की चींटियां है और उपन्यासकार ने उन्हीं चींटियों के हवाले से दबले-कुचले, शोषित और पीड़ित लोगों की बात कहीं है. किताब में भ्रूण हत्या, संविधान की अवहेलना, छठवीं अनुसूची की अनदेखी, मानव तस्करी, आंख फोड़वा और गर्भाश्य कांड के साथ-साथ झलियामारी में आदिवासी बच्चियों के साथ किए गए दुष्कर्म का दर्द देखने को मिलता है. उपन्यास में जातिगत विद्वेष, आरक्षण में कटौती और वेलेंटाइन डे पर हुंडदंग का उल्लेख भी होता है,लेकिन यह सारा उल्लेख किसी समाचार की तरह नहीं बल्कि एक जरूरी और स्वाभाविक चिन्ता के साथ प्रकट होता है. उन्होंने कहा कि किशन लाल की भाषा में काव्य के तत्व निहित हैं इसलिए वे अपनी पूरी बात को बेहद संवेदनाशीलता के साथ प्रकट करते हैं. उपन्यास छत्तीसगढ़ का समकाल है जिसमें विमर्शों की भरमार है. तार्किकता और विवेकशीलता उपन्यास के मुख्य नायक हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे देश के नामी आलोचक प्रोफेसर सियाराम शर्मा ने किशन लाल को विलक्षण शिल्प का चितेरा बताया. उन्होंने कहा कि लघुता का सौंदर्य ही उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत है. लघुता में विराटता और साधारण में असाधारण को देखने का काम कोई प्रतिभाशाली लेखक ही कर सकता है. श्री शर्मा ने कहा कि ऐसे खौफनाक समय में जबकि आम आदमी की समस्याओं को देखना-सुनना बंद कर दिया गया है तब किशन लाल ने चींटियों के जरिए दबे-कुचले की आवाज को मुखर अभिव्यक्ति दी है.  उन्होंने कहा कि अब चाहे पत्रकारिता हो या दूसरी जगह... सबने दलित-शोषित और पीड़ितों की आवाज को उठाना बंद कर दिया है. वंचित वर्ग को देश में जगह-जगह जो कुछ भुगतना पड़ रहा है उसे इस उपन्यास में सूक्ष्मता के साथ प्रकट किया गया है. उपन्यास में आदिवासी महिला सोनी सोरी का जिक्र भी आता है, कैसे उन्हें भयंकर अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ा था.  उपन्यास में एक पात्र कहता है “तुम कहते हो नक्सली संविधान को नहीं मानते, चलो ठीक है, नहीं मानते! लेकिन ये बताओ जिन्हें संविधान के पालन करने की जिम्मेदारी दी गई थी, जिन्हें संविधान का पालन करना चाहिए था क्या वे संविधान का पालन कर रहे हैं? संविधान को मानते हैं?” आलोचक शर्मा ने ज्ञानेंद्रपति की चींटियां शीर्षक से प्रकाशित एक कविता का खास उल्लेख करते हुए कहा कि इतिहास जिन क्षणों को रौंदकर निकल जाता है, कविता या साहित्य उस पर नया संसार रचने का काम करता है.  

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार और कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता विनोद साव ने किशन लाल को जातिवाद के दंश के खिलाफ बेबाकी के साथ लिखने वाला साहसी लेखक बताया. उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति साम्प्रदायिक होगा वह जातिवादी भी होगा. किशन अपने साहित्य के बूते साम्प्रदायिकता की जड़ें काटने का काम कर रहे हैं. इससे पहले भी उन्होंने अपनी पुस्तक “किधर जाऊं” में नए विमर्शों को जन्म दिया था. श्री साव ने उपन्यास के एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि कैसे सलवा जुडूम के नाम पर महज 1500 रुपए देकर आदिवासियों को आदिवासियों से ही लड़ाया जा रहा था. आदिवासी ही आदिवासी की हत्या कर रहे थे. इन तमाम बातों पर किशन लाल चिंतित हुए और उस पर भी अपनी कलम चलाई. जातिवाद विमर्श में कैसे मुखरित होता है इसे उपन्यास में उपजे विमर्शों के जरिए समझा जा सकता है. राजिम मेले के लिए दो-ढ़ाई सौ करोड़ फंड इकट्ठा हो जाता है लेकिन गिरौधपुरी के लिए महज 8-9 लाख एकत्र हो पाता है. राजिम मेले के लिए मुफ्त में बस चलाई जा सकती है, लेकिन गिरौधपुरी मेले के लिए नहीं. उन्होंने कहा कि किशन का उपन्यास न ट्रैजेटिक है, न कॉमिक है, किशन का उपन्यास पैथेटिक है. इस उपन्यास में छत्तीसगढ़ प्रांत को लेकर बहस है. एक राजधानी की सजावट भर से राज्य का विकास नहीं हो जाता है. 

युवा समीक्षक अजय चंद्रवंशी ने किशन लाल को नई भावभूमि के साथ विलक्षण दृष्टि रखने वाला लेखक निरूपित किया. उन्होंने कहा कि पूरे उपन्यास में चींटियां इस कदर घुल-मिल जाती है कि वह फिर आम इंसानों का प्रतिरूप नजर आने लगती है. चींटियां गांव से उजड़ कर शहर में आती हैं और वहां की स्थिति को देखकर हतभ्रत होती हैं. उनकी शहर से वापसी की सोच यह बतलाती है कि अब शहर रहने लायक नही बचा. उपन्यास का एक पात्र संजय जो पत्रकार है वह जगह-जगह हो रहे भेदभाव और दोहरी मानसिकता को उजागर करने में सफल रहता है. एक पात्र गुरूजी के वक्तव्यों में दलित और आदिवासियों की चिंताए मुखरता के साथ उभरती है. विमर्श के अंत में झारखंड के संस्कृतिकर्मी दिनकर शर्मा ने गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी पक्षी और दीमक पर अपनी एकल प्रस्तुति से सबकी आंखे नम कर दी. कार्यक्रम का सफल संचालन युवा कवि कमलेश्वर साहू ने किया जबकि आभार प्रदर्शन पत्रकार राजकुमार सोनी ने किया.

अपना मोर्चा डॉट कॉम की तरफ से आयोजित की गई इस महत्वपूर्ण चर्चा गोष्ठी में छत्तीसगढ़ साहित्य परिषद के अध्यक्ष ईश्वर सिंह दोस्त, जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई के अध्यक्ष आनंद बहादुर, वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध, कथाकार ऋषि गजपाल, समीक्षक इंद्र कुमार राठौर, स्वदेश टीवी चैनल और आज की जनधारा के प्रमुख संपादक सुभाष मिश्रा, जनवादी लेखक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य मुमताज, प्रगतिशील लेखक संघ से संबंद्ध कवि आलोक वर्मा, नंद कुमार कंसारी, संजय शाम, मांझी अनंत, अरुणकांत शुक्ला,आदिवासी मामलों के जानकार नवल शुक्ल, समीक्षक राजेश गनौदवाले, रंगकर्मी निसार अली, अप्पला स्वामी, संतोष बंजारा, शंकर राव, उमेश, सुलेमान खान, साहित्यकार राजेंद्र ओझा, मृणालिका ओझा, वरिष्ठ छायाकार गोकुल सोनी, जसम के युवा साथी अमित चौहान, सृष्टि आलोक सहित अनेक साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी मौजूद थे. इस मौके पर वैभव प्रकाशन के संचालक और साहित्यकार सुधीर शर्मा ने लेखक किशन लाल को शॉल और श्रीफल भेंटकर सम्मानित भी किया.

 

 

                   

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26 जून को किशन लाल के चर्चित उपन्यास चींटियों की वापसी पर चर्चा

रायपुर. अपनी विशिष्ट लेखन शैली के चलते बेहद कम समय में अपनी देशव्यापी पहचान स्थापित करने वाले छत्तीसगढ़ के प्रमुख कथाकार-उपन्यासकार किशन लाल के चर्चित उपन्यास चींटियों की वापसी पर 26 जून रविवार को सिविल लाइन स्थित वृंदावन हॉल में शाम पांच बजे अपना मोर्चा डॉट कॉम की तरफ से एक महत्वपूर्ण चर्चा गोष्ठी आयोजित की गई है. इस गोष्ठी के मुख्य अतिथि देश के प्रसिद्ध आलोचक जय प्रकाश होंगे जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता जन संस्कृति मंच से संबंद्ध चर्चित आलोचक प्रोफेसर सियाराम शर्मा करेंगे. कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता व्यंग्यकार विनोद साव होंगे. वहीं विशेष टिप्पणी समीक्षक अजय चंद्रवंशी की होगी. लेखकीय वक्तव्य किशन लाल देंगे. कार्यक्रम का संचालन युवा कवि कमलेश्वर साहू करेंगे.

छत्तीसगढ़ के पास स्थित एक गांव देमार में जन्में किशन लाल अपने कैरियर के प्रारंभिक दिनों में एक शिक्षक थे. उसके बाद उनका रूझान पत्रकारिता की तरफ हुआ. उन्होंने कई छोटे-बड़े संस्थानों में अपनी सेवाएं दी. फिलहाल वे छत्तीसगढ़ संवाद में कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है. संघर्ष की भट्ठी में तपे किशन लाल का पहला उपन्यास किधर जाऊं मोची समाज की विडंबनाओं पर आधारित था जिसकी खासी चर्चा हुई थीं. जबकि दूसरे उपन्यास चींटियों की वापसी में  उन्होंने नई राजधानी की बसाहट में विस्थापित किए गए ग्रामीणों के दर्द को बेहद मार्मिक ढंग से उकेरा हैं.

 

 

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मुक्तिबोध:स्वदेश की खोज...पुस्तक विमोचन के दौरान देश के नामचीन लेखकों को सुनने उमड़े लोग

रायपुर. ऐसा बहुत कम होता है जब साहित्य के किसी आयोजन में लोगों की अच्छी-खासी मौजूदगी देखने को मिलती है. सामान्य तौर पर साहित्यिक आयोजन में वे ही लोग उपस्थित रहते हैं जिनका कार्यक्रम से जुड़ाव रहता है या फिर बतौर वक्ता उन्हें अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होती है. पहली बार इससे उलट था. अभी इसी महीने 4 जून को जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई द्वारा देश के प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक राम जी राय की पुस्तक मुक्तिबोध:स्वदेश की खोज का विमोचन हुआ तो जितने लोग वृंदावन हाल के भीतर थे उतने ही लोग हाल के बाहर इस प्रतीक्षा में थे किसी तरह से एक गंभीर आयोजन का हिस्सा बन सकें. जन समुदाय की यह मौजूदगी सभी वर्ग और क्षेत्रों से थीं. इस मौके पर नवारुण प्रकाशन और जन संस्कृति मंच की तरफ से पुस्तक व पोस्टर प्रदर्शनी भी लगाई गई थीं. हिंदी पट्टी के किसी आयोजन में पुस्तकों की अच्छी-खासी बिक्री भी देखने को मिली.

कार्यक्रम की शुरुआत अजुल्का सक्सेना और वसु गंधर्व के गायन से हुई. दोनों ने मुक्तिबोध की कविता पर अपनी शास्त्रीय प्रस्तुति से सबका मन मोह लिया.

अपने स्वागत वक्तव्य में जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई के अध्यक्ष आनंद बहादुर ने बताया कि जसम देश के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों, और संस्कृतिकर्मियों का संगठन है. पिछली 3 मई को जब रायपुर ईकाई का गठन हुआ तब यह बात बेहद शिद्दत से उठी थीं कि  सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली राजनीति के विषैले-खतरनाक दौर में जब सबसे ज्यादा लेखकों और कलाकारों को मुखर होकर बोलने की आवश्यकता है तब वे खामोश हैं. जन संस्कृति मंच ने तय किया है कि वह जरूरी हस्तक्षेप जारी रखेगा. इस मौके पर मुक्तिबोध के पुत्र रमेश मुक्तिबोध, गिरीश मुक्तिबोध, दिलीप मुक्तिबोध के हाथों रामजी राय की कृति 'मुक्तिबोध स्वदेश की खोज' का विमोचन किया गया.

इस अवसर पर कृति के लेखक रामजी राय ने मुक्तिबोध की कर्मभूमि छत्तीसगढ़ में पुस्तक के विमोचन को एक उपलब्धि बताया. उन्होंने कहा कि यदि समकालीन जनमत की प्रबंध संपादक मीना राय ने सुझाव नहीं दिया होता तो शायद किताब का विमोचन यहां रायपुर में संभव नहीं हो पाता. लेखक राम जी राय अपने वक्तव्य  के दौरान बेहद भावुक भी हो उठे. उन्होंने कहा कि अगर मुक्तिबोध के समूचे लेखन को खोजने का काम रमेश मुक्तिबोध ने नहीं किया होता तो आज उनका समग्र लेखन हमारे सामने नहीं आ पाता. उन्होंने कहा कि फैंटसी भी यथार्थ को जानने का एक टूल होता है. सबकी अपनी-अपनी फैंटसी होती है न कि सिर्फ कलाकारों की. लेनिन ने कहा था... तुमने हथियार साधू से लिया या डाकू से ये महत्व नहीं रखता, इसका इस्तेमाल कहां करोगे ये मायने रखता है. उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध की भाषा पर भी काम होना चाहिए. उन्होंने कहा कि आजादी के समय से ही फासीवाद की झलक दिखने लगी थीं.आज फासीवाद अपने सबसे वीभत्स रुप में हमारे सामने हैं. फासीवाद को लेकर मुक्तिबोध की चिंता और अधिक जटिल यथार्थ की तरफ बढ़ रही है. हम केवल तर्कों से फासीवाद को हरा नहीं पाएंगे. इसे समझना होगा. इसके प्रतिवाद के लिए धरती पर कान लगाकर सुनना होगा.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और देश के प्रसिद्ध कवि बसंत त्रिपाठी ने कहा कि मुक्तिबोध स्वदेश की खोज हमारे समय की जरूरी किताब है. उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध के समूचे लेखन को लेकर अलग-अलग तरह के निष्कर्ष निकाले जाते रहे हैं, लेकिन पहली बार राम जी राय ने अपनी पुस्तक में नई व्याख्या की है जिसमें मुक्तिबोध का प्रस्थान बिंदु, उनकी चिंतन धारा और उनकी सोच शामिल है.

छत्तीसगढ़ साहित्य परिषद के अध्यक्ष ईश्वर सिंह दोस्त ने कहा कि मूल्यांकन के बगैर आलोचना नहीं हो सकती और साहित्य का मूल्यांकन सिद्धांत के बगैर नहीं हो सकता. राम जी राय की यह किताब गहरी सैद्धांतिक बहस का पुर्नवास करती है. किताब मनोविश्लेषण और मार्क्सवाद के ताजा-तरीन सिद्धांतों के मार्फत मुक्तिबोध की फैटेंसी की अभिनव और बहस तलब व्याख्या को सामने लाती है.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रणय कृष्ण ने कहा कि मुक्तिबोध के काम और उनके मूल्यबोध से स्पष्ट आत्मीयता रख पाना बेहद जटिल है, लेकिन राम जी राय ने यह काम कर दिखाया है. उन्होंने किताब के भीतर मौजूद कई लेखों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि नक्सलबाड़ी और खाड़ी देश सहित अन्य लेखों को पढ़कर आज के फासीवाद को समझने की नई दृष्टि विकसित होती है. उन्होंने कहा कि अंतःकरण जो मनोभाव मुक्तिबोध के पास है वह इस किताब में उपस्थित हैं. तत्व विकास, अभिव्यक्ति का संघर्ष. उन्होंने कहा कि अगर हिंदोस्तान में फासीवाद से लड़ना है तो व्यापक जनसंघर्ष की आवश्यकता होगी.

युवा आलोचक प्रेम शंकर ने मुक्तिबोध की रचनाओं के जरिए रामजी राय की पुस्तक की खास बातों को रेखांकित किया तो आलोचना के संपादक आशुतोष ने कहा  कि इस किताब पर आने वाले समय में जबरदस्त चर्चा होगी. यह किताब बताती है कि मुक्तिबोध को कैसे और क्यों पढ़ा जाय. किताब मुक्तिबोध को लेखकों की राजनीति से अलग करती है. उन्होंने कहा कि फासीवाद से लड़ने के लिए संसदीय लोकतंत्र के बाहर जाने की जरूरत क्यों है इसे बेहद शिद्दत से इस किताब में महसूस किया जा सकता है.

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में आलोचक सियाराम शर्मा ने मुक्तिबोध को समय के पहले का कवि निरूपित किया. उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध संकट को पहचानते थे इसलिए अपनी कविताओं में प्रतिरोध भी रच देते थे. उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध की कविता हमेशा एक कार्यकर्ता बने रहने की मांग करती है चूंकि यह किताब भी जनता के लिए हैं इसलिए बेहद खास है. मुक्तिबोध जनता से बहुत प्यार करते थे. हम चाहे कहीं भी चले जाए...अंत में हमको जनता के पास जाना ही होगा. जनता के पास ही सभी समस्याओं का समाधान है. उसमें अग्नि,उष्मा व प्रकाश विद्यमान है.

कार्यक्रम का सफल संचालन युवा आलोचक भुवाल सिंह ने किया जबकि जन संस्कृति मंच के सचिव मोहित जायसवाल ने आभार जताया. इस दौरान बड़ी संख्या में साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी मौजूद थे.

 

 

 

 

 

 

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रामजी राय की पुस्तक मुक्तिबोध:स्वदेश की खोज का लोकार्पण 4 जून को रायपुर में... जुटेंगे देश के नामचीन दिग्गज

रायपुर. देश के नामचीन लेखक और संस्कृतिकर्मी 4 जून को छत्तीसगढ़ की राजधानी में जुट रहे हैं. दरअसल इस दिन शाम पांच बजे रायपुर के वृंदावन हॉल में जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई द्वारा प्रसिद्ध विचारक रामजी राय ( इलाहाबाद ) की पुस्तक-मुक्तिबोध:स्वदेश की खोज़ का लोकार्पण कार्यक्रम आयोजित है. इस कार्यक्रम में लेखक रामजी राय के अलावा हिंदी विभाग इलाहाबाद के अध्यक्ष और आलोचक प्रणय कृष्ण, प्रोफेसर सियाराम शर्मा भिलाई, जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव मनोज सिंह गोरखपुर, छत्तीसगढ़ साहित्य परिषद के अध्यक्ष ईश्वर सिंह दोस्त रायपुर, युवा कवि-आलोचक बसंत त्रिपाठी इलाहाबाद, प्रेमशंकर सिंह आगरा मौजूद रहेंगे. कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य जसम रायपुर ईकाई के अध्यक्ष आनंद बहादुर देंगे. वहीं अजुल्का सक्सेना और वसु गंधर्व द्वारा मुक्तिबोध की कविता का सस्वर पाठ होगा. कार्यक्रम का संचालन युवा लेखक भुवाल सिंह करेंगे जबकि आभार प्रदर्शन जसम के सचिव मोहित जायसवाल करेंगे. कार्यक्रम में विशेष तौर पर समकालीन जनमत की प्रबंध संपादक मीना राय,संस्कृतिकर्मी अनीता त्रिपाठी इलाहाबाद, रुचि बाजपेयी लखनऊ, डीपी सोनी बलिया उत्तर प्रदेश, केके पांडे संपादक जनमत, दीपक सिंह, डॉ.कामिनी अंबिकापुर , संजय जोशी नवारुण प्रकाशन दिल्ली, कैलाश बनवासी दुर्ग, मीता दास भिलाई के अलावा अंचल के अनेक लेखकों और संस्कृतिकर्मियों की मौजूदगी भी रहेगी. कार्यक्रम में नवारुण प्रकाशन और समकालीन जनमत की तरफ से पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी. इस महत्वपूर्ण आयोजन में हिस्सेदारी दर्ज करने के बाद लेखक और संस्कृतिकर्मी 5-6 जून को बस्तर भ्रमण के लिए भी जाएंगे.
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विद्रूपताओं से टकराने वाला मानवता का कवि

देश के सुप्रसिद्ध कवि श्रीकांत वर्मा की पुण्यतिथि के मौके पर श्रीकांत वर्मा शोध पीठ की तरफ से 25 मई को बिलासपुर में उनके साहित्यिक अवदान को लेकर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इस मौके पर श्री कांत वर्मा की पुत्रवधु एन्का वर्मा, नामचीन कवि नरेश सक्सेना, आलोचक जयप्रकाश उनके समकालीन सहचर विनोद भारद्वाज, चर्चित युवा लेखक गीत चतुर्वेदी, कवि शरद कोकाश, विनय साहिब, विश्वासी एक्का, जोशना बैनर्जी आडवानी के अलावा अनेक साहित्यकार और संस्कृतिकर्मियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की. कार्यक्रम में रंगकर्मी राजकमल नायक के निर्देशन में श्रीकांत वर्मा की कविताओं पर शानदार रंग प्रस्तुति दी गई. पीठ के अध्यक्ष रामकुमार तिवारी ने अतिथियों का स्वागत किया.साहित्य परिषद के अध्यक्ष ईश्वर सिंह दोस्त ने स्मृति चिन्ह प्रदान किया. कार्यक्रम का कुशल संचालन महेश वर्मा ने किया.इस मौके पर साहित्यकार एवं बिलासपुर के आयुक्त संजय अलंग ने उन्हें विद्रूपताओं से टकराने वाला कवि बताते हुए महत्वपूर्ण अध्यक्षीय टिप्पणी की. अपना मोर्चा डॉट कॉम के पाठकों के लिए यहां हम उनकी वह टिप्पणी प्रस्तुत कर रहे हैं. 

 

श्रीकांत वर्मा समकालीन कविता, विशेषकर मुक्तिबोध के समय के उपरांत आए कवियों में,  अत्यधिक झकझोरने और उद्वेलित करने वाले माने जाते हैं। उनकी कविताएं अपने समय से सीधे टकराती हैं और अंदर तक तिलमिलाते हुए मन के माध्यम से प्रत्येक मानवता विरोधी ताकतों  और गतिविधियों से सीधे साक्षात्कार करती हैं। रविंद्र नाथ टैगोर के सम्पूर्ण मानवता वाद को सीधे आपके सामने प्रत्यक्ष रूप में खड़ा कर देती हैं। यह सीधे खड़ा करना मात्र टकराना नहीं है, यह विरोध में पश्चाताप के साथ मानवता की पुनःस्थापना की पहल भी है।

अधिकांश कविताएं और कवि जब समय और उसकी विद्रूपताओं से टकराते हैं तो वे मुखर होते हैं, पर हल बताने और समस्या को पछाड़ देने के उपाय करने में वे थोड़े पीछे हो जाते हैं। यहीं पर श्रीकांत वर्मा पूरी  ताकत और शिद्दत के साथ न सिर्फ समस्या से टकराते हैं, वरन उसके हल के साथ सामने नजर आते हैं।  यह उनकी कविताओं की अप्रतिम सफलता है। साथ ही यह सफलता आपको भी उद्वेलित कर सहमत करने में सफल होती है, बावजूद इसके कि, उनकी कविता में नाराजगी, असहमति और विरोध का स्वर अधिक तेज और मुखर है । उनकी कविता हर अमानवीयता, झूठ, फरेब आदि के विरुद्ध न सिर्फ प्रतिरोध का सार्थक वक्तव्य है, बल्कि थोड़ा धीरज विहीन हो कर हिंसक प्रतिशोध भी है। यह हड़बड़ी, उत्तेजना और उद्वेलन हृदय से कविता के रूप में व्यक्त होते हुए भी निर्ममता को दूर ही रखता है तथा मानवता, मानव कल्याण और प्रकृति से समन्वय के साथ आगे बढ़ता रहता है।  

उनकी कविता जनता की आवाज और जनता की कविता है। यह कवि समय से सीधा संवाद करता है। कवि की कविताएं मानव के जर्रे – जर्रे में मानवता को समेटती है। प्रकृति से सीधा जुड़ती है। अपने उद्देश्य और कर्म को सफल बनाती है। गालिब ने .....रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यों.... कह कर इस संवाद को एक अलग तरीके से सामने रखा था, जिसे श्रीकांत वर्मा ने नए आयाम और मुखर आवाज दी। वे, विगत शताब्दी के पचास के दशक में सामने आए नई कविता आंदोलन के प्रमुख कवियों में से एक थे।

श्रीकांत वर्मा की कविता विश्व और भारत के समाज और विशेषकर राजनीति के अंदर स्थित और व्याप्त व्याधि ग्रस्त अमानवीय व्यवहार, कार्यों और प्रवृत्तियों को पूरी ताकत से नंगा कर तीखे स्वर में अभिव्यक्त करती है। उन्होंने कविता में इतिहास से पर्याप्त प्रतीकों और बिम्बों को लिया। इतिहास पुरुषों और इतिहास के स्थलों के माध्यम से, आधुनिक जीवन के तीव्र द्वंद्वों को, निशाना बनाया और सफलता के साथ अभिव्यक्त और सम्प्रेषित किया। वे अंदर की आग और उससे तप्त बहते लावे को अभिव्यक्त करने में सफल रहे। वे सफल साहित्यकार के रूप में स्थापित हुए और जाने गए। 

यहाँ उनकी प्रसिद्ध कविता ‘कलिंग’ याद आती है।

कलिंग

केवल अशोक लौट रहा है

और सब

कलिंग का पता पूछ रहे हैं

केवल अशोक सिर झुकाए हुए है

और सब

विजेता की तरह चल रहे हैं

केवल अशोक के कानों में चीख़

गूँज रही है

और सब

हँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैं

केवल अशोक ने शस्त्र रख दिए हैं

केवल अशोक

लड़ रहा था।

श्रीकांत वर्मा छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र थे। उनका जन्म बिलासपुर में 18 सितम्बर 1931 को हुआ और मृत्यु 25 मई 1986 को।

 वे साहित्य के क्षेत्र में कवि - गीतकार, कथाकार तथा समीक्षक के रूप में ख्यात हुए और राजनीति से भी आए तथा राज्य सभा के सदस्य रहे। बिलासपुर में उनके नाम पर एक प्रमुख मार्ग का नाम है।

1957 में प्रकाशित 'भटका मेघ', 1967 में प्रकाशित 'मायादर्पण' और 'दिनारम्भ', 1973 में प्रकाशित 'जलसाघर' और 1984 में प्रकाशित 'मगध' और तदुपरांत ‘गरुड़ किसने देखा है’  इनकी काव्य-कृतियाँ हैं। वे 'मगध' काव्य संग्रह के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित हुए और यह पुस्तक अत्यधिक लोकप्रिय भी हुई।

दूसरी बार, अश्वत्थ और ब्यूक इनके उपन्यास हैं।

झाड़ी, संवाद, घर, ठंड, बांस तथा  साथ इनके कहानी-संग्रह है।

'अपोलो का रथ' यात्रा वृत्तान्त और आलोचना की पुस्तक ‘जिरह’ है। ‘बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में' साक्षात्कार ग्रंथ है।

श्रीकांत वर्मा को प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले। 1973 में मध्य प्रदेश सरकार का 'तुलसी सम्मान', 1984 में 'आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी पुरस्कार', 1981 में 'शिखर सम्मान', 1984 में कविता और राष्ट्रीय एकता के लिए केरल सरकार का 'कुमारन् आशान' राष्ट्रीय पुरस्कार, 1987 में 'मगध' नामक कविता संग्रह के लिये मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किए गए।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा बिलासपुर तथा रायपुर में हुई। नागपुर विश्विद्यालय  से 1956 में हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की।

इसके बाद वह दिल्ली चले गये और वहाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग एक दशक तक पत्रकार के रूप में कार्य किया। 1966 से 1977 तक दिनमान के विशेष संवाददाता रहे। 

1976 में राज्य सभा के सदस्य बने। कांग्रेस की टिकट पर। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध से अस्सी के दशक के पूर्वार्ध तक इसी पार्टी के प्रवक्ता के रूप में कार्य करते रहे। 1980 में इंदिरा गांधी के राष्ट्रीय चुनाव अभियान के प्रमुख प्रबंधक रहे और 1984 में राजीव गांधी  के परामर्शदाता तथा राजनीतिक विश्लेषक के रूप में कार्य करते रहे। कांग्रेस को अपना "गरीबी हटाओ" का नारा दिया।

1970-71 और 1978 में आयोवा विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित 'अन्तर राष्ट्रीय लेखन कार्यक्रम' में 'विजिटिंग पोएट' के रूप में आमंत्रित हुए।

यहाँ उनकी सर्वकालीन प्रतिनिधि कविता ‘कोसल में विचारों की कमी है

का उल्लेख और समीचीन होगा।

 

कोसल में विचारों की कमी है

महाराज बधाई हो! महाराज की जय हो।

युद्ध नहीं हुआ—  लौट गए शत्रु।

वैसे हमारी तैयारी पूरी थी!

चार अक्षौहिणी थीं सेनाएँ, दस सहस्त्र अश्व,

लगभग इतने ही हाथी।

कोई कसर न थी!

युद्ध होता भी तो, नतीजा यही होता।

न उनके पास अस्त्र थे, न अश्व, न हाथी,

युद्ध हो भी कैसे सकता था?

निहत्थे थे वे।

उनमें से हरेक अकेला था

और हरेक यह कहता था

प्रत्येक अकेला होता है!

जो भी हो, जय यह आपकी है!

बधाई हो!

राजसूय पूरा हुआ, आप चक्रवर्ती हुए—

वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं

जैसे कि यह—

कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता,

कोसल में विचारों की कमी है।

 

 

संपर्क-

डॉ. संजय अलंग ( भाप्रसे ) 

बी – 48 आयुक्त निवास, लिंक रोड, सिविल लाइंस,

बिलासपुर, छत्तीसगढ़, पिनकोड- - 495001

[email protected] , 9425307888

 

 

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अब रायपुर में भी जनसंस्कृति मंच गठित, पहले अध्यक्ष बने आनंद बहादुर,सचिव पद की जिम्मेदारी संभालेंगे मोहित जायसवाल

रायपुर. देश में लेखकों और संस्कृतिकर्मियों के सबसे महत्वपूर्ण संगठन जन संस्कृति मंच जसम  की रायपुर ईकाई का गठन 3 मई मंगलवार को शंकर नगर स्थित अपना मोर्चा कार्यालय में किया गया. रायपुर ईकाई के पहले अध्यक्ष प्रसिद्ध लेखक एवं कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुल सचिव आनंद बहादुर बनाए गए हैं.जबकि सचिव पद की जिम्मेदारी मार्क्सवादी विचारक मोहित जायसवाल को सौंपी गई है. अंचल की प्रसिद्ध लेखिका कल्पना मिश्रा उपाध्यक्ष एवं अजुल्का सक्सेना कोषाध्यक्ष बनाई गई हैं. सुप्रसिद्ध  समीक्षक इंद्रकुमार राठौर सह-सचिव पद की जिम्मेदारी संभालेंगे. कार्यकारिणी में लेखक भुवाल सिंह ठाकुर, अमित चौहान, आलोक कुमार, दीक्षित भीमगढ़े, नरोत्तम शर्मा, वसु गंधर्व, अखिलेश एडगर, वंदना कुमार और तत्पुरुष सोनी को शामिल किया गया है.

ईकाई के गठन अवसर पर जसम की राष्ट्रीय ईकाई के सदस्य और प्रखर आलोचक प्रोफेसर सियाराम शर्मा ने कहा कि जब देश भयावह संकट से नहीं गुजर रहा था तब साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठन जबरदस्त ढंग से सक्रिय थे, लेकिन अब जबकि देश में सांप्रदायिक और पूंजीवादी ताकतों का कब्जा बढ़ता जा रहा है तब लेखकों और सांस्कृतिक मोर्चें पर डटे हुए लोगों की बिरादरी ने एक तरह से खामोशी ओढ़ ली है. एक टूटन और पस्ती दिखाई देती है. कलमकार और संस्कृतिकर्मी इस दुखद अहसास से घिर गए हैं कि अब कुछ नहीं हो सकता. श्री शर्मा ने कहा कि यह कार्पोरेट और फासीवादी राजनीति का भयावह दौर अवश्य है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन ताकतों को परास्त नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि हर रोज लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचला जा रहा है. इस भयावह दौर में चेतना संपन्न लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों का एकजुट होना बेहद जरूरी है. श्री शर्मा ने बताया कि देश के बहुत से हिस्सों में जन संस्कृति मंच से जुड़े लोग अपना प्रतिवाद जाहिर करते रहे हैं. अब रायपुर ईकाई भी मुखर होकर काम करेगी.

जसम की दुर्ग-भिलाई ईकाई के सचिव अंजन कुमार ने संगठन के संविधान और उद्देश्य को विस्तार से बताया तो देश के चर्चित कथाकार कैलाश बनवासी ने कहा कि संगठन केवल समाज ही नहीं स्वयं के वैचारिक और रचनात्मक विकास में भी अहम भूमिका निभाता है.  फिलहाल हमारे सामने विवेकहीन लोगों की भीड़ खड़ी कर दी गई है, लेकिन हमें नागरिक बोध और विश्वबोध के साथ प्रतिरोध जारी रखना है. रायपुर इकाई के अध्यक्ष आनंद बहादुर सिंह ने अध्यक्ष पद का दायित्व सौंपे जाने पर राष्ट्रीय ईकाई के सदस्यों और बैठक में मौजूद लेखक-संस्कृतिकर्मियों के प्रति आभार जताया. उन्होंने कहा कि जन संस्कृति मंच में विचारवान युवा लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों का सदैव स्वागत रहेगा. ईकाई के गठन के दौरान मई महीने के अंतिम सप्ताह में एक साहित्यिक आयोजन किए जाने को लेकर भी चर्चा की गई. जसम के सभी सदस्यों ने तय किया कि देश के प्रसिद्ध लेखक रामजी राय की नई पुस्तक मुक्तिबोध- स्वदेश की खोज पर एक दिवसीय चर्चा गोष्ठी आयोजित की जाएगी. जसम की रायपुर ईकाई के गठन के दौरान अंचल के लेखक, बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी मौजूद थे.

 

 

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देश के शीर्षस्थ लेखक विनोद कुमार शुक्ल की रचना प्रक्रिया के बारे में बता रहे हैं उनके पुत्र शाश्वत गोपाल

देश के शीर्षस्थ रचनाकार विनोद कुमार शुक्ल को भला कौन नहीं जानता. यह छत्तीसगढ़ और हमारा सौभाग्य है कि वे हमारे बीच यहीं रायपुर में रहते हैं. उनके पुत्र शाश्वत गोपाल ने अपनी पिता और उनकी रचना प्रक्रिया को लेकर जो कुछ लिखा है उसे हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं. शाश्वत ने इस लेख का वाचन अपने पिता पर केद्रिंत 'रंग विनोद' नाम के एक कार्यक्रम में किया था. अगर आप किसी लिखे हुए में रविशंकर की सितार का अनुभव करना चाहते हैं तो इसे पढ़ना ठीक होगा. मनुष्य बने रहने के लिए संवेदना बची रहे...यहीं जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है और उपलब्धि भीं.

 

एकांत का बाहर जाना

 

-शाश्वत गोपाल

 

मैं अपने पिता को दादा कहता हूँ। 

मुझे बहुत सी चीजें विरासत में मिली हैं। चित्र, लेखकों की स्मृतियाँ, संबोधन, पेड़-पौधे, पुस्तकें और भी बहुत कुछ। एक ऐसी अमूर्त चीज़ भी विरासत में मिली जो दादा मुझे शायद देना नहीं चाहते थे- वह है 'हिचक'। मंच में और उसके करीब जाने का डर। चूंकि यह विरासत थी इसलिए मिल गई।

दादा मंच से दूर रहे। वे सबसे पीछे बैठना पसंद करते हैं। मुझे लगता है ऐसा कर वे सबके ज्यादा करीब हो पाते हैं। जितनी दूर जब हम होते हैं तब हमारी दृष्टि के क्षितिज का फैलाव उतना ज्यादा बड़ा हो जाता है। सबसे पीछे अंत की दूरी से सबको एक साथ देख पाना, अपने में समेट पाना संभव हो पाता है। और, यह अंत की दूरी एकांत के करीब भी होती है। 

आज मुझे मंच से कहने के लिए कहा गया। मैं मंच में सहज नहीं सा हूँ। इसलिए अपनी बात कह तो नहीं पाऊँगा, लेकिन पढ़ने की कोशिश करूँगा। जो मैं पढ़ने जा रहा हूँ वह बातें कुछ वर्ष पहले लोकमत समाचार पत्र समूह के साहित्य विशेषांक 'दीपभव' में प्रकाशित हो चुकी हैं। इन प्रकाशित स्मृतियों का पहला मुख्य वाक्य था- 'एकांत का बाहर जाना'। आज फिर स्मृतियों पर लौटने की कोशिश करूँगा। स्मृतियाँ कभी पुरानी नहीं पड़तीं। स्मृतियों को याद करना जीवन के दोहराव की तरह भी है, और इसमें हमारे एकांत का बाहर जाना आज पुनः प्रतिध्वनित होगा।

आदरणीय दादा, आदरणीय मंच, सम्मानित उपस्थितजन।

एक बेटे द्वारा पिता पर कुछ कहना या लिखना, पिता द्वारा अपनी ही बात कहने जैसा है। हम अपनी बात क्यों कहें? आत्मकथा लेखन के संबंध में मैं अज्ञेय जी के विचारों से सहमत हूँ कि– “आत्मकथा लेखन अहंकारी उद्यम है। अपने जीवन को कोई इतना अहम क्यों माने कि उसकी दास्तान दूसरों को सुनाने लगे।” 

मुझसे हमेशा कई सवाल दादा पर, उनकी दिनचर्या, लेखनकर्म, लेखन प्रक्रिया आदि पर पूछे जाते हैं। ये बातें उन्हीं प्रश्नों, प्रति-प्रश्नों के आस-पास की हैं। लेकिन उत्तर नहीं हैं, क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि प्रश्न और उनके उत्तर हमें बाँध देते हैं।

एक छोटा सा प्राणी ककून के अंदर रहकर रेशम बुनता है। दादा भी घर में रहना पसंद करते हैं। ये थोड़ी सी बातें और उनके मेरे द्वारा खींचे गये कुछ छायाचित्र, हमारे घर के एकांत का बाहर जाना है। उन पर कुछ कहने के लिए हर बार की तरह बार-बार मैं दुविधा में रहता हूँ। इस बार भी ठिठका हुआ सा, दुविधा और संकोच से घिरा हूँ। 

विरासत में मुझे खूब सी पुस्तकों के साथ बहुत से शब्द और संबोधन भी मिले। संबोधन उनके अपने पारंपरिक शब्दार्थ से कुछ अलग नये अर्थों के साथ। जैसे पिता को मैं दादा कहता हूँ। मेरी बेटी मुझे दादा कहती है। आदि। संस्कृति, परंपरा, प्रकृति, संस्कार, कला और उत्कृष्ट को सहेजने, अगली पीढ़ी को सौंपने पर दादा हमेशा ज़ोर देते हैं। 

दादा को जानने की कोशिश में मैं जब पीछे लौट रहा हूँ तो यह लौटना किसी रचना संसार की ओर आगे बढ़ने जैसा है। बचपन में मैं उनके साथ घूमने जाया करता था। उनका प्रयास होता कि घर से उनका बाहर मेरे साथ हो। हम कभी पैदल निकल जाते। कभी साइकिल से। कभी स्कूटर से। किसी भी दिशा में हम निकल जाते और कोई गाँव मिल जाता था। गाँव में मैं चुप रहता। वे चलते जाते। मैं भी। कभी उनके साथ। कभी पीछे-पीछे कुछ बीनते हुए। लेकिन सुन सकने की दूरी से ज्यादा दूर उनसे मैं कभी नहीं होता। वे पेड़ में बैठे पक्षियों की पहचान कराते। जो पक्षी दिखते नहीं उनकी आवाज़ याद रखने को कहते। खेतों में फसलों से परिचय कराते। बीज के लहलहाती फसल तक पहुँचने के चरणों को याद कराते। भूमि की पहचान कराते। बज रहे या घरों में टंगे-रखे वाद्ययंत्रों के बारे में बताते। लोकगीतों के भावार्थ समझाते। ठेठ गवईं गहनों और उनकी अनूठी परंपरा का महत्व बताते। लेकिन, लौटने पर जब शहर पास आते जाता तो अक्सर दादा मौन हो जाते। तब शायद गाँव के शहर में समा जाने के विध्वंस की आहट वे सुन रहे होते हों! अब तो हमें बहुत दूर कई किलोमीटर तक चले जाने पर भी गाँव नहीं मिलते। भौतिक-आधुनिकता, विकास और बाज़ार ने गाँव के सांस्कृतिक बोध लगभग निगल लिये हैं। शहर की असीमित सीमा इतनी बढ़ गई है कि किसी गाँव तक पहुँचने से पहले ही अब दादा थक जाते हैं। जबकि, लगभग सभी कच्ची सड़कें पक्की हो गईं हैं। 

उन्होंने मुझे और दीदी को केवल अच्छा मनुष्य बनने के लिए कहा। यह कभी नहीं कहा कि तुम ये या वो पढ़कर वो या ये बन जाओ। एक बात हमेशा कही कि कुछ उत्कृष्ट ऐसा रचो कि आने वाली पीढ़ी के काम जरूर आये। दो शब्द ‘संतुष्टि’ और ‘बचत’ के गहरे अर्थों के साथ सुखी जीवन का मंत्र दादा ने दिया। गाँधीवाद को मैंने घर में बचपन से महसूस किया है। कुछ बड़े होने पर मोहनदास करमचंद गाँधी को जाना और पढ़ा। गाँधी के अस्त्रों अहिंसा, स्पष्टता, ईमानदारी, निडरता, संतुष्टि, समय की पाबंदी, बचत, आवश्यकताएं सीमित रखना.... जैसे प्रयोग मैं छुटपन से महसूस करते आ रहा हूँ। शायद, उन्होंने गाँधी के सूत्रों-सिद्धांतों को हमारे आस-पास रखने की कोशिश की।

जन्मदिन पर मुझे पुस्तकें मिलतीं और कुछ खिलौने भी। कहानी पुस्तकों की ज़िद करता तो ‘तारों की जीवन गाथा’ मिलती। कभी ‘जोड़ासांको वाला घर’ की कथा। तो कभी ‘भारत की नदियों की कहानी’। ह्वेनसांग की भारत यात्रा, चीनी यात्री फाहियान, अल-बिरुनी की नज़र में भारत, बर्नियर और इब्नबतूता की भारत यात्राएँ, नेहरू की भारत एक खोज हो या विश्व का सांस्कृतिक इतिहास आदि मिल जाता। इस तरह वे पुस्तकों के माध्यम से हमें ऐसे समय का भी बोध कराते जहाँ-जिसमें लौटकर पहुँचना किसी के लिए भी संभव नहीं होता। 

भारत और दुनिया को दिखाने और समझाने की कोशिश वे हमेशा करते रहते हैं। उन्होंने संस्कृति, इतिहास, दर्शन, विज्ञान को भी हमारे सामने रखने की कोशिश की, उनके पारंपरिक और आधुनिक स्वरूप दोनों के साथ। जीवन के विभिन्न पड़ावों पर तरह-तरह की पुस्तकें मिलती जातीं। जब किशोर था तो मैक्सिम गोर्की का उपन्यास ‘मेरा बचपन’ पढ़ने मिला, महाविद्यालय में पहुँचा तो ‘जीवन की राहों में’ और ‘मेरे विश्वविद्यालय’ को पढ़ा। मार्क्स, विवेकानंद, लोहिया, वॉनगॉग, सावरकर, आंबेडकर, जयप्रकाश नारायण, सलीम अली, एम.एफ.हुसैन, कुमार गंर्धव, मल्लिकार्जुन मंसूर, जनगनश्याम, निर्मल वर्मा आदि इत्यादि के अंतःमन से भी दादा ने मुझे मिलवाया है। ‘अभी भी खरे हैं तालाब’, ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ ‘मेरा ब्रह्माँड’ पता नहीं क्या नहीं उन्होंने मुझे दिया। वे एक पुस्तक पढ़ने के समाप्त होने से पहले मेरे मन में कई और पुस्तकों को पढ़ने की जगह बना देते हैं। मेरी उम्र बढ़ने के साथ-साथ पुस्तकों की संख्या भी बढ़ती चली गई। बल्कि, पुस्तकें तो आयु के कई घनमूलों के गुणक के साथ बढ़ीं हैं। एक तरह से उन्होंने जिज्ञासा और पढ़ते-जानते रहने की ललक का समुद्र मेरे मन में खोद दिया है। मैं पढ़ता चला गया और पढ़ा हुआ उस समुद्र में समाता चला गया। कई बार यह इतना गहरा चला जाता है कि इसे जरूरत और समय पर निकालना भी मेरे लिए दुरूह है।

लेख, पेटिंग, संवाद, साक्षात्कार, कविता, समाचार, घटना, फिल्म, यात्रा-वृतांत, आलोचना, समीक्षा... यहाँ तक कि कोई अच्छा पत्र भी आता तो वे मुझे पढ़ाते। जापानी फिल्मकार आकिरा कुरोसावा ने कैसे छोटी-छोटी फिल्मों के सहारे मानव मन को पर्दे पर उतारा, रूसी फिल्मकार आँद्रेई तारकोवस्की ने किस तरह नई दृश्य-भाषा दी, सत्यजीत राय के चार दशकों में फैले रचनात्मक जीवन में किस तरह उत्कृष्टता केंद्र में रही, श्यामबेनेगल इतिहास और वर्तमान में कैसे एक सेतु बनाते हैं, एक फिल्मकार उतना ही बड़ा विद्वान भी हो तो उनकी (मणिकौल) फिल्मों में दूसरों से क्या अलग और मौलिक है। भारतीय फिल्मों का एक बड़ा बाज़ार है, आधुनिक संसाधन हैं, इसके बावजूद ईरानी फिल्में क्यों उद्वेलित करती हैं। यह सब मैं कब जानता गया पता ही नहीं चला। उत्कृष्टता को दादा ने हमेशा हमारे करीब रखा। मेरी बेटी जब सवा साल की थी तब से वह रवीन्द्रनाथ ठाकुर, गाँधी, अज्ञेय...को तस्वीरों में पहचानने लगी थी। एक तरह से वे हम सब के जीवन के संपादक हैं। उन्होंने हमें सृष्टि और जीवन-सूत्रों के हर पहलू को समझने की दृष्टि दी। यहाँ तक कि बचपन में एक बड़ा टेलीस्कोप देकर सुदूर स्थित मंगल, शनि ग्रहों को भी हमारा पड़ोसी बना दिया है। 

आज उत्कृष्टता केंद्र में नहीं है। अब यह शब्द ही विस्मृत सा लगता है। सब तरफ मीडियॉकर्स हावी हैं और रहा-सहा जितना अच्छा बचा है उसका कबाड़ बना रहे हैं। चालाकी, झूठ, बेईमानी के इस दौर में उससे जूझना मेरे लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि उनके जीवन में ये शब्द ही नहीं हैं। उनका जीवन संघर्ष में बीता। मेरा नहीं। लेकिन दादा ने कोशिश की कि संघर्ष के रास्ते पर मिलने वाले आत्मविश्वास को मैं जरूर पा सकूँ। इस दौर की अबूझ पहेलियों के बीच उलझे समय से कुछ समय निकालने में ही मुझ जैसे युवाओं का समय फिसला जा रहा है। लेकिन, मैं और पत्नी यह देखकर आश्वस्त हैं कि हमारी बेटी अपने बाबा-अजिया की उँगलियाँ कस कर पकड़ी हुई, स्वाभिमान और आत्मविश्वास को पाने के रास्ते पर चलना सीख रही है, और जो अच्छा बिखेरा जा रहा है, जिसे वर्तमान आधुनिक समय नहीं देख पा रहा, उन्हें वो अपने छोटे हाथों से समेट भी रही है। लेकिन अच्छा, बहुत जल्दी कबाड़ बन रहा है और मेरी बेटी की अंजुलियाँ अभी बहुत छोटी हैं।

दादा के साथ मेरा संवाद हर क्षण होता रहता है। तब भी जब हम दोनों मौन हों। हमारी बातचीत के विषय भी विविधता भरे होते हैं। कभी कोई अच्छी कविता तो कभी परमाणु मुद्दा। कभी मीडिया, साहित्य, खेल, पड़ोस, प्रकृति, जीवन शैली, रचना, संघर्ष, रंग, परंपरा, संगीत, लेख, आदिवासियों का संघर्ष, पूँजीवाद, दैनिक दिनचर्या, मेरी बेटी के स्कूल का बीता एक दिन, सूखा पड़ने की आहट, नक्सलवाद से वाद का ही समाप्त हो जाना, हिंसा, कटते जंगल, युवाओं के मन से बचत और संतुष्टि शब्दों की विस्मृति, आतंकवाद से नष्ट होती संस्कृतियाँ, बच्चों के चित्र और उनकी शिक्षा, अच्छा संगीत, कोई अच्छी पुस्तक, युवाओं का संघर्ष, ब्रह्मांड में किसी नये ग्रह का मिलना, सहनशक्ति का बढ़ता अभाव, सेना के जवानों की कठिनाइयां, पौधों में नई पत्तियों का आना, मेरे द्वारा किसी गलत शब्द का उपयोग, दाल में छौंक लगाने के तरीके, अच्छे प्रशासनिक निर्णय, जमीन में पड़े किसी पत्थर की आकृति, तालाब क्यों एक बड़ी बूंद है, इत्यादि। लेकिन संवाद का विषय राजनीति कभी नहीं रहा। शायद इसलिए कि अब की राजनीति गैर-रचनात्मक और विचारहीन है। राजनीति पर उन्होंने इतना जरूर कहा है कि “अब हम सामाजिक समाज में नहीं राजनैतिक समाज में रहते हैं। मीडिया और राजनीति, इन दोनों में से कोई एक ठीक हो जाये तो दोनों ठीक हो जायेंगे। लेकिन मीडिया और राजनीति एक दूसरे के ठीक नहीं होने को बनाये हुए हैं।”

दादा को पुरस्कारों ने कभी आकर्षित नहीं किया। उनके सम्मान और हमें, मेरी बेटी को स्कूलों, खेलों इत्यादि में मिले पुरस्कार, स्मृति चिह्न या तो अटारे में पड़े हैं या पेटियों में बंद। उन्हें केवल ‘रचनात्मकता’ अभिप्रेरित करती है। मैंने उन्हें उनकी रचनाओं से कभी संतुष्ट होते नहीं देखा। कोई चार दशक पुरानी कविता आज उनके सामने कुछ देर तक रखी रह जाये तो उसे पुनः परिवर्धित करने का विचार उनके मन के कोने में बैठने लगेगा। मुझे लगता है उनकी रचनाओं की आलोचना उन्हें ज्यादा संतुष्टि देती है। वे कहते हैं “एक अच्छी कविता की सबसे अच्छी आलोचना दूसरी उससे अच्छी कविता को रच देना है।”

मैं दादा की रचनाओं का पाठक नहीं हूँ। श्रोता हूँ। ‘नौकर की कमीज़’ उपन्यास मेरे जन्म के आस-पास लिखा गया, इसलिए उसका मैं पाठक हूँ। लेकिन उसे पढ़ने में भी मैंने कविता ही सुनी है। उनके उपन्यास, कहानियाँ, साक्षात्कार और कविताएँ मुझे ‘एक’ लंबी कविता लगते हैं। ‘एक’ ऐसी लंबी कविता जिसका उपन्यास, कहानी के रूप में केवल आवरण बदलता है; मूल तो वह जो है, वही है- एक कविता। उस ‘एक’ लंबी कविता को मैं पसंद के आधार पर विभक्त भी नहीं कर पाऊँगा। क्योंकि सर्वश्रेष्ठ का चयन तो बहुत या कुछ के बीच से ही किया जा सकता है। ‘एक’ में यह संभव नहीं। उनकी रचनाओं में बनने वाले ‘दृश्य’ मुझे अच्छे लगते हैं। दृश्य से बने शब्द और शब्दों से बने दृश्य भी तथा अर्थों से बनने वाले अदृश्य बिंब-प्रतिबिंब भी। शायद यह भी एक कारण हो कि फिल्म या नाटक से जुड़े लोगों की नज़र उनकी रचनाओं पर ठहर जाती है। 

हम सब उनके रचना संसार में रहते हैं, उनके साथ। सूर्य के उदय और अस्त होने के साथ-साथ उनके कार्य करने की ऊर्जा जागती और विश्राम करती है। उनके लिखने का समय तय नहीं होता। वे कभी तब लिखते हैं जब हम सब सो रहे होते हैं और कभी तब जब खूब सारे बच्चे उनके आस-पास खेल रहे हों, कुछ उनसे टिके, कुछ उनपर लदे हों। वे वहीं आस-पास बैठकर लिखना पसंद करते हैं, जहाँ हम सब लोग काम कर रहे हों। कई बार उस आस-पास में बैठने की जगह भी नहीं होती तो वे खड़े-खड़े ही लिखते रहते हैं। ऐसे में हम सब के काम की गति बढ़ जाती है ताकि हम वहाँ का काम जल्द ख़त्म कर ऐसी जगह पहुँच जायें जहाँ बैठने की जगह हो। उनका एकांत सब के साथ रहना है। कई बार तो वे सोने चले जाते हैं। सो भी जाते हैं। कुछ घंटे बाद वे आवाज़ देते हैं। लेटे-लेटे कुछ अक्षर या एक-दो छोटे वाक्य हमें लिखने के लिए कहते हैं। और हम उन अक्षरों/वाक्यों को उनकी टेबल पर रख देते हैं। जब हम सुबह उठते हैं तो वे कुछ अक्षर एक पूरी कविता बन गये होते हैं। एक पूर्ण कविता।

वे जब भी कुछ लिखते हैं, हमें जरूर सुनाते हैं। एक कविता के कई ‘ड्राफ्ट’ हम सुनते हैं।  एक कविता रचते हुए उन्हें सुनते हैं। गद्य को गढ़ते हुए सुनते हैं। बल्कि कहूँगा- हम उनकी पूरी रचना प्रक्रिया के श्रोता हैं। फुर्सत में वे कभी नहीं होते। तब भी नहीं जब वे आराम कर रहे होते हैं। करीब सात वर्ष पूर्व जब उन्हें हृदयघात हुआ, उसके अगले दिन से वे अस्पताल के गहन-चिकित्साकक्ष में लिखने लगे। अधलेटे लिखने की वजह से बार-बार उनकी डॉटपेन चलना बंद हो जाती तो उन्होंने पेंसिल माँगकर उससे लिखना शुरू कर दिया। उनकी जिजीविषा और लेखन से उन्हें मिलने वाले गहन सुकून के कारण डॉक्टरों ने भी वहाँ उन्हें रचने की कु्छ छूट दे दी। 

छिटपुट नोट्स को छोड़कर पिछले 20 वर्षों से वे सीधे कंप्यूटर में टाइपकर ही लिखते रहे हैं। उन्होंने टाइपिंग करीब 62 वर्ष की उम्र में सीखी। दो वर्ष पूर्व उनकी आँखों में मोतियाबिंद बढ़ गया था। वे ठीक से लिख और टाइप नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में वे कहते जाते हैं और माँ लिखती जातीं। बाद में मैं उसे टाइप कर देता। फिर माँ उन्हें वो सुना देतीं।

उनका प्रूफ भी हम सुनते। उनका सृजन निरंतर है। घर में टेलीफोन के पड़ोस में कुछ कोरे कागज़ों के टुकड़ों के साथ पेन या पेंसिल रहते हैं। दादा फोन पर बात करते हुए अक्सर कुछ न कुछ उन कागजों पर करते रहते हैं। बात ख़त्म होने पर दादा की उँगलियों के सहारे चलती वह कलम भी वहीं रूक जाती। और कुर्सी से उठने से पहले दादा उस कागज़ को टेबल के नीचे रखे कूड़ेदान में डाल भी देते। यह बात हमें बहुत बाद में पता चली। दादा फोन पर बात करते वक्त भी चित्र बनाते रहते हैं। कागज़ों के ढेर से हम बहुत कम चित्र ढूंढ पाये हैं। मुझे उनका हर क्षण उनकी रचना प्रक्रिया में शामिल लगता है। 

उनसे जुड़े किसी विषय पर कोई गलत आलोचना भी करे तब भी वे मौन रहते हैं। इसलिए नहीं कि उसका कोई उत्तर नहीं है, बल्कि इसलिए कि उसका उत्तर देना रचनात्मक कार्य नहीं है।

मैं यह भूल गया था कि विरासत में मुझे ‘भूलना’ भी मिला है। दादा मुझे भी भूल जाते हैं। कई बार ऐसा हुआ कि वे स्कूटर में मुझे कहीं ले गये। सामान लेने हम दोनों उतरे। लेकिन घर में सामान पहुँच गया और मैं सामान की जगह छूट गया। उम्र के आठवें दशक में दादा का यह भूलना अब प्रतिध्वनित होने लगा है। वे कहीं जाते हमारे साथ हैं। लेकिन अपने काम में स्वयं इतने खो जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि वे आये किसके साथ थे। हम उनसे छू सकने की दूरी से ज्यादा दूर कभी नहीं हुए। उनका यह भूलना बहुत सी बातों में है। मुझे मेरा बचपन उस तरह याद नहीं जिस तरह दूसरों को होता है। दादा को भी अपना बचपन उस तरह याद नहीं। मुझे वो हर चीज उस समय याद नहीं आती जब आनी चाहिए। और उस तरह भी याद नहीं आती जिस तरह उसे आना चाहिए था। हर बार याद का याद आना उसके संपूर्ण के साथ नहीं होता। स्मृतियाँ टूट-टूटकर ही लौटती हैं। फिर उन टुकड़ों को जोड़ने का क्रम भी भूल जाता हूँ। धीरे-धीरे वे भी उसी तरह लौटती हैं। क्षणभर पहले बीता बहुत जल्द स्मृति बन जाता है और स्मृति बहुत कम शेष रह पाती हैं। दादा के साथ के समय को मैं जब-तब ठहराने की कोशिश करते रहता हूँ। कुछ याद रखने की इच्छा और उसे भूल जाने के बीच का क्षण अब मैं तस्वीरों में कैद करने लगा हूँ। लेकिन उस तस्वीर में शब्द कैद होने से छूट जाते हैं। भूलना, दादा की विशिष्टता है, मौलिकता और शायद ‘मैनरिज़्म’ भी। 

दादा एक आम पिता की तरह हैं, जो अपने बच्चों और आस-पड़ोस को सुखी देखना चाहते हैं। इस सुखी शब्द में केवल ज्ञान-रचनात्मकता-उत्कृष्टता की समृद्धि और विकास तथा मनुष्य हैं। इस पूरी बात में एक बात रह गई। मेरे लिखे प्रत्येक ‘दादा’ शब्द में एक अनकहा छूट गया, माँ। दादा के रचनात्मक और मनुष्य जीवन में केवल दादा शब्द अकेले नहीं लिखा जा सकता। दादा शब्द, माँ शब्द के बिना बे-अर्थ है। इन दोनों शब्दों में न कोई उपसर्ग हैं न प्रत्यय। दादा-माँ, एक शब्द है, एक ही जीवन। 

उनका जीवन बहुत सामान्य सा है। किसी अदृश्य से छोटे बिंदु की तरह। शायद रंगों, रेखाओं, कई पट्टियों से घिरे सैयद हैदर रज़ा के चित्रों का वह बिंदु जिसकी व्याख्या अनंत है। दादा का कहीं भी जाना घर से बाहर जाना नहीं होता, यह पृथ्वी उनका केवल एक कमरा है। दादा की इस याद को उनके शब्दों से ही अल्पविराम लगाता हूँ। उन्होंने थोड़े दिन पहले ही लिखा है-

“समय जो समाप्त है वह अपनी शुरुवात से समाप्त है। चाहे कितना भी लंबा समय हो या बस एक मिनट का। बीते से एक क्षण बचता नहीं। यह जो नहीं, वह गुमा नहीं है कि याद करने या ढूंढने से जस का तस मिल जायेगा। हो सकता है याद करना ढूँढने का तरीका हो। बीते के कबाड़ में काम का शायद कुछ भी नहीं। इस समय मेरे लिए खोना बहुत आसान हो गया है और ढूँढना सबसे कठिन। याद करना भूलने के साथ याद रहता है। सब याद कभी नहीं रहता। कभी कुछ याद आया। कुछ कभी। और कुछ, कभी याद नहीं आता, यह भी याद नहीं कि क्या याद नहीं। यद्यपि मेरा बचपन बहुत पीछे चला गया, पर बचपना लगता है बुढ़ापे में भी बचा रहता है। बचपन को याद करना भी जैसे बचपना है। पर मैं सचमुच बचपना करता हूँ बिना बचपने को याद करते हुए।”

दादा सबकी फिक्र करते रहते हैं। ब्रह्मांड की भी। एक दिन उन्होंने मेरी बेटी से कहा था और फिर लिखा भी- “एक दिन पत्थर भी नहीं बचेगा। चाहता हूँ पत्थर का बीज सुरक्षित रहे।” 

उनकी यह कामना हम सबकी सोच में भी बची रहे, यह मैं सोचता हूँ। 

आप सबने मेरे पढ़े हुए को कहते सुना। बहुत आभार।

 

पता-

शाश्वत गोपाल,

द्वारा श्री विनोद कुमार शुक्ल

सी-217, शैलेन्द्र नगर,

रायपुर-492001

छत्तीसगढ़

मो.: 9179518866

ई-मेलः [email protected]

 

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बुलडोजर पर कविताएं

साहित्य, विचार और कलाओं की वेब पत्रिका समालोचन ने अपने ताजा अंक में बुलडोजर के खिलाफ वरिष्ठ कवि विजय कुमार, राजेश जोशी, अरूण कमल, विष्णु नागर, लीलाधर मंडलोई, अनूप सेठी, कृष्ण कल्पित, बोधिसत्व, स्वप्निल श्रीवास्तव, अत्युतानंद मिश्र, विनोद शाही और हूबनाथ की कविताएं छापी है. इस खास अंक का संयोजन विजय कुमार ने ही किया है. इन कविताओं को पढ़कर कहा जा सकता है कि कवि चुप नहीं है. कविता मुठभेड़ के लिए तैयार है. यहां प्रस्तुत सभी कविताएं समालोचन से ली गई है. समालोचन और वरिष्ठ कवि विजय कुमार का आभार.

 

राजेश जोशी

बुलडोजर

तुमने कभी कोई बुलडोजर देखा है
वो बिल्कुल एक सनकी शासक के दिमाग़ की तरह होता है
आगा पीछा कुछ नहीं सोचता,
उसे बस एक हुक़्म की ज़रूरत होती है
और वह तोड़ फोड़ शुरू कर देता है

सनकी शासक कल्पना में कुचलता है
जैसे विरोध में उठ रही आवाज़ को
बुलडोजर भी साबुत नहीं छोड़ता किसी भी चीज़ को
सनकी शासक बताना भूल जाता है
कि बुलडोजर को क्या तोड़ना है
और कब रूक जाना है

सनकी शासक ख़्वाबों की दुनिया से जब बाहर आता है
मुल्क़ मलबे का ठेर बन चुका होता है
सनकी शासक मलबे के ढेर पर खड़े होने की कोशिश करता है
पर उसकी रीढ़ टूट चुकी है
वह ज़ोर ज़ोर से हँसना चाहता है
पर बुलडोजर ने तोड़ डाले है उसके भी सारे दाँत
बुलडोजर किसी को नहीं पहचानता है

बुलडोजर सब कुछ तोड़ कर
बगल में खड़ा है
अगले आदेश के लिये !

 

अरुण कमल

बुलडोजर

अब न तो पहिए चलते हैं न जबड़े
पहियों के चारों तरफ़ दूब उग आयी है और चींटियों के घर
जबड़ों के दाँत टूट चुके हैं और उन पर खेलती हैं गिलहरियाँ
अपने ज़माने में मैंने कितने ही झोंपड़े ढाहे उजाड़ीं बस्तियाँ
दुनिया का सबसे सुस्त चाल वाला सबसे ख़ूँख़ार अस्त्र
एक बार एक बच्चा दब गया था पालने में सोया

मैं अक्सर सोचता कोई मेरे सामने खड़ा क्यों नहीं होता
दस लोग भी आगे आ जाते तो मेरा इस्पात काँच हो जाता
बस एक बार एक वीरांगना खड़ी हो गयी थी निहत्थे
और मुझे रुकना पड़ा था असहाय निर्बल
पीछे मुड़ना मैं नहीं जानता पर मुझे लौटना पड़ा
तोड़ना कितना आसान है बनाना कितना मुश्किल

अब चारों तरफ घनी रिहाइश है इतने इतने लोग
और मैं बच्चों का खेल मैदान हूँ
उसी बस्ती के बीच अटका अजूबा
वो ज़माना बीत गया वो हुक्मरान मर गये अपने ही वज़न से दबकर

काश मैं मिट्टी की गाड़ी होता!

 

विजय कुमार

बुलडोजर

बस्तियां ही अवैध नहीं
उनकी तो सांसें भी अवैध थीं
हंसना और रोना
भूख और प्यास
मिट जाने से पहले
थोड़ी सी छत थोड़ी सी हवा
भोर की उजास और घनी रातें
ईंट की इन मामूली दीवारों के पीछे
यहीं रही होगी आदम और हव्वा की कोई जन्नत
बच्चों की किलकारी
शक्तिहीन बूढ़ों की दुआएं
सब अवैध था सब कुछ

विशाल भुजाओं वाली
राक्षसी मशीनों
के भीमकाय जबड़ों से
अब लटक रहे हैं
उनकी
याचनाओं के कुछ बचे खुचे लत्तर

इस पृथ्वी पर ज़मीन का कौन सा टुकड़ा है
कि अब वहां बचाकर ले जाएं वे अपनी लाज
कौन सा रिक्त स्थान भरें
कोर्ट याचिकाओं में
कोई जगह नहीं मनुष्य चिह्नों के लिए
दर्द सिर्फ शायरी में
और
ग्राउंड ज़ीरो पर केवल एक ‘एक्शन प्लान’
एक उन्माद
कि कुचल कर रख दिया जाएगा सब कुछ

वे अपने बिखरे हुए मलबे में
खोजते हैं अपने कुछ पुराने यकीन
कोई ज़ंग खाई हुई आस
अपना रहवास
इस दुनिया में अपने होने के सबसे सरल रहस्य

घटित के बाद
अब वहां बस एक ख़ालीपन
उसे भर नहीं सकता कोई
कोई चीत्कार
शोक आघात विलाप ख़ामोशी
बचे हैं केवल तमतमाए चेहरे

ताकत के निज़ाम में
सब बिसरा दिया जाएगा
सब लुप्त हो जाएगा
सबकुछ
उजड़ना टूटना बिखरना ध्वस्त होना

पेड़ काट डाले गए
एक बेरहम दुनिया में
चिड़ियाएँ अशांत
वे अपनी स्मृतियाँ संजोए
वे अपनी फ़रियाद लिए
मंडराती रहती हैं
ज़मीन पर गिरे हुए घोंसलों के इर्दगिर्द

कोई भरपाई नहीं
यह हाहाकार भी उनका डूब जाता है
पुलिस वैन के चीखते हुए सायरनों में.

 

 

विष्णु नागर

बुलडोजर एक विचार है

बुलडोजर एक विचार है
जो एक मशीन के रूप में सामने आता है
और आँखों से ओझल रहता है

बुलडोजर एक विचार है
हर विचार सुंदर नहीं होता
लेकिन वह चूंकि मशीन बन आया है तो
इस विचार को भी कुचलता हुआ आया है
कि हर विचार को सुंदर होना चाहिए

बुलडोजर एक विचार है
जो अपने शोर में हर दहशत को निगल लेता है
तमाशबीन इसके करतब देखते हैं
और अपने हर उद्वेलन पर खुद
बुलडोजर चला देते हैं

जब भी देखो मशीन को
इसके पीछे के विचार को देखो

वरना हर मशीन जिसे देखकर बुलडोजर का खयाल तक नहीं आता

बुलडोजर साबित हो सकती है.

 

लीलाधर मंडलोई

रमजान में बुलडोजर

हैरां हूं इन उजड़े घरों को देखकर
ख़ाक़ उठती है घरों से
कुछ नहीं है बाक़ी उठाने को
यह वो शहर तो नहीं

जहां हर क़दम पर ज़िंदगियां रोशन हुआ करती थीं
अब ऐसा बुलडोजर निज़ाम
और मातम-ही-मातम

चौतरफ़ा कम होती सांसों में भागते-थकते लोग
नमाज़ में झुके सर
और दुआओं में उठे खाली हाथ
मांग रहे है सांसें रमजान के मुक़द्दस माह में

अब यहां ईदी में बर्बाद जीवन के अलावा
कुछ भी नहीं,कुछ भी नहीं.

 

बुलडोजर: तुलसी के राम का स्मरण

बचपन में मैंने देखे
हरे-भरे जंगल
उनके बीच बड़ी-बड़ी मशीनों से
धरती के गर्भ को भेदते लौह अस्त्र

कोयले के भंडारों की तलाश में
क्रूर तरीक़ों से जंगलों को
नेस्तनाबूद करने के लोमहर्षक दृश्य

वे कभी स्मृति से ओझल नहीं हुए
जीव-जंतुओं के साथ उजड़ते देखा

आदिवासियों के घरों को

बुलड़ोज़र के भीमकाय उजाड़ू जबड़ों में
लुटती मनुष्यता को देखना बेहद मुश्किल था

बुलड़ोज़र के पार्श्व में थी कोई दैत्य छवि
जिसे सब डरते हुए कोसते-गरियाते
लेकिन तब उजड़ने वालों से पूछने का रिवाज था

उनके साथ कोई भेदभाव न था, न जाति भेद
धर्म कभी विकास के रास्ते हथियारबंद न था

आज बुलडोजर पर सवार जब कोई गुज़रता है
वह ड्राइवर नहीं तानाशाह होता है

वह किसी एक क़ौम को निशाने पर लेता है
वह मद में भूल जाता है

घरों में सोये ज़ईफ़ों, बच्चों यहां तक
गर्भवती महिलाओं को

भयावह त्रासद ख़बरों के बीच
दुख और पश्चाताप में असहाय

मैं करता हूं तुलसी के राम का स्मरण
वह नहीं होता मौक़ा-ए-वारदात पर

वारदात को बेरहम ढंग से अंजाम देने वालों के भीतर
राम की जगह होता है मदांध तानाशाह का बीज

तानाशाह का ईमान और धर्म पूछती जनता
बुलडोजरों के जाने के बाद

एक बार फिर ध्वस्त जगहों पर
मुहब्बत के फूलों के खिलने के लिए

आशियाने बनाना शुरु कर देती है

इस बनाने से यह न समझा जाए
कि जनता बुलडोज़रों के साथ

तानाशाहों के महलों की तरफ़ कूच नहीं कर सकती.

 

अनूप सेठी

बुलडोजर और बुढ़िया संवाद

ओ बुलडोजर ? तू कहां चला?
उन्नने ड्यूटी पर भेजा है

क्या कह कर भेजा है?
दरो दीवार तोड़कर आ?
जो दिख जाएं खोपड़े फोड़ कर आ?

अंधी है क्या?
दिखता नहीं?
ड्यूटी बजा रहा हूं?
लोकतंत्र का घंटा घनघना रहा हूं?
कान खोल कर सुन ले
मेरा पिंडा-जिगरा लोहे का
लौह दरवाजों से निकला
मेरा पुर्जा पुर्जा लोहे का
मेरे मुंह मत लग री बुढ़िया
दो जो चार सांसें बची हैं, ले ले
सवाल किया तो यहीं धूल चटा दूंगा
नामोनिशान मिटा दूंगा.

 

कृष्ण कल्पित

बुलडोजर

ठाकुर साहेब, बहादुर कितने हो?
ऐसा समझो, ग़रीब और कमज़ोर के तो बैरी पड़े हैं !
(एक राजस्थानी कहावत)

 

(२)
घर वही ढहा सकता
जिसका कोई घर नहीं

जैसे युवावस्था में घर से भागा हुआ कोई भिक्षुक !

 

(3)
बुलडोजर तो तुम्हारे घर पर भी चल सकता है
या तुम्हारा घर लोहे का बना हुआ है ?

 

(४)
उन्होंने मन्दिर तोड़ डाले
तुम मस्जिदों को ढहा दो

नफ़रतों और
बुलडोजर का कोई धर्म नहीं होता !

 

(५)
तुम्हारे बुलडोजर से
लाल क़िला नहीं ढह सकता

नहीं ढह सकता ताजमहल
गोरख-धाम नहीं ढह सकता
तुम काशी विश्वनाथ मन्दिर को नहीं ढहा सकते
जामा मस्जिद से टकराकर तुम्हारे बुलडोजर टूट जाएँगे

तुम्हारा बुलडोजर सिर्फ़ ग़रीबों को तबाह कर सकता है !

 

(६)
कबीर के सुन्न-महल को कैसे ढहाओगे

वहाँ तक तो तुम्हारी रसाई तक नहीं है, मूर्खों !

 

(७)
ढहा कर ही तुम सत्ता में आए हो
इसलिए तुम ढहा रहे हो

तुमने उस मस्जिद को ढहा दिया
जिसमें काशी के ब्राह्मणों के आक्रमण से आहत तुलसीदास ने पनाह ली थी
जिसमें रामचरितमानस के कई प्रसंग लिखे गए !

 

(८)
इसमें अब कोई संदेह नहीं कि
तुम सारे लोग एक दिन

कुचलकर मारे जाओगे !

 

(९)
पुण्य ही नहीं
पाप भी फलते हैं

क्या किया जाए
यह भयानक मृत्यु तुमने ख़ुद चुनी है !

 

(१०)
मैं बुलडोजर से कुचलते हुए
तुम्हें देखना चाहता हूँ !

 

(११)
आमीन/तथास्तु !

 

स्वप्निल श्रीवास्तव

बुलडोजर

ये बुलडोजर नहीं
जैसे शत्रु देश के टैंक हो
अपने ही नागरिकों को रौंद
रहे हों
जो नाफरमानी करता है
उसे सबक सिखा देते है

इनके लिए कोई सरहद नहीं
नहीं है कोई बंदिश
इनके मनमानी को कोई चुनौती
नहीं दे सकता है

बुलडोजर अचानक कही भी पहुंच सकते हैं
उन्हें किसी हुक्म की जरूरत
नहीं है
वे हुक्म के परे हैं

मगरमच्छ की तरह रक्ताभ हैं
इनके जबड़े
नुकीले हैं इनके दांत
वे दूर से दिखाई देते हैं

ये नदी या झील में नहीं रहते
जमीन पर कवायद करते
रहते हैं
निरपराध लोगों को बनाते हैं
शिकार

वे बिना सूचना के आते है
किसी अदालत में नहीं होती
इनके खिलाफ कार्यवाही

वे किसी अदालत का आदेश
नहीं मानते
खुद ही फतवा जारी करते हैं

पूरे इलाके में है इनका खौफ
लोग इनके डर से बाहर
नहीं निकलते

बुलडोजर नींद में भी दुःस्वप्न
की तरह आते हैं
और हमारा चैन बर्बाद कर
देते हैं

ये तानाशाहों के सैनिक हैं
इन्हें अभयदान मिला हुआ है
वे कही भी जा सकते हैं
और किसी को भी ढहा
सकते हैं
चाहे वह इमारत हो या कोई
आदमी

थोड़ा रुक कर सोचिये
जो कारीगर इसे बनाते है
वह क्या इसके कुफ्र से बच
पाते होंगे ?

 

बोधिसत्व

बुलडोजर

एक चूड़ी की दुकान में
एक सिंदूर की दुकान में
अजान के समय घुसा वह बुलडोजर की तरह!

उसने कहा मैं चकनाचूर कर दूंगा वह सब कुछ जो मुझसे सहमत नहीं!
जो मेरे रंग का नहीं
उसे मिटा दूंगा!

उसे आंसू नहीं दिखे
उसे रोना नहीं सुनाई दिया
उस तक नहीं पहुंचीं टूटने की आवाजें
उसे बर्तनों के विलाप नहीं छू पाए!

उसे खपरैलों की चीख ने छुआ तक नहीं
कुचलने को वीरता और तोड़ने को शौर्य कह कर
ढहाता रहा टुकड़े टुकड़े जोड़ी
कोठरियों और आंगनों को!

देश की राजधानी में भी हाहाकार की तरह था वह
अपनी नफरत भरी उपस्थिति से समय को विचलित करता एक संवैधानिक व्यभिचार की तरह था!

वह आएगा और सब कुछ उजाड़ जाएगा
यह कह कर डराते थे बुलडोजर के लोग
उनको जो बुलडोजर के स्वर में स्वर मिलाकर नारे नहीं लगाते थे
जो बुलडोजर का भजन नहीं गाते थे
बुलडोजर उनको मिटाने की घोषणा करता
घूम रहा है!

बुलडोजर को किसी की परवाह नहीं
क्योंकि उसे एक गरीब ड्राइवर नहीं
राजधानी में बैठा कोई और चला रहा था
जिसे सब कुछ कुचलना और गिरा देना पसंद था!

जो तोड़ने की आवाज सुन कर ख़ुश होता था
और जब कुछ न टूटे तो
वह बिगड़े बुलडोजर की तरह
सड़क किनारे धूल खाता रोता था!

 

 

अच्युतानंद मिश्र

 ताकतवर लोगों का भय
(प्रिय रवि राय के लिए)

सबसे ताकतवर लोग
सबसे कमजोर लोगों से लड़ रहे हैं
सबसे ताकतवर लोग हंसते हंसते पागल हो रहे हैं

सबसे कमजोर लोग गठरी बांधे
बच्चे को गोद में लिए सड़क पर
घिसट रहे हैं

वे एक के बाद एक
दुख की नदी में पार उतर कर
सूअरों को बचा रहे हैं
वे शहर की सबसे बदबूदार गली में
घास फूस की छतें उठा रहे हैं

वे मनुष्य और मनुष्यता के बारे में नहीं
न्याय अन्याय और असमानता के बारे में नहीं
दुख के बाद सुख
रात के बाद दिन
के बारे में नहीं सोच रहे हैं

वे खालिस पानी में उबल रही
चाय की पत्ती के बारे में
सीलन भरी बिस्तर पर लेटे
बुखार से तपते बच्चे के बारे में
म्युनसिपालिटी द्वारा काट दी गई
बिजली के बारे में
धर्म के बारे में नहीं
आने वाले त्यौहार के बारे में सोच रहे हैं

वे एक अंधकार से दूसरे अंधकार
के बारे में सोच रहे हैं
उस खामोशी के बारे में
उस खामोशी के भीतर दबे आक्रोश के बारे में
उस आक्रोश में छिपी हताशा के बारे में
बहुत कम सोच रहें हैं

ताकतवर लोग
ताकत की दवाई बना रहे हैं,
वे लोहे और फौलाद को पल भर में
मसलने का विज्ञान खोज रहे हैं
मुलायम गलीचे और लजीज खाने
के बारे में सोच रहे हैं

वे बार-बार ऊब रहे हैं
वे हर क्षण कुछ नया, कुछ अधिक आनंददायक
कुछ और सफल
चमत्कृत कर देने वाली
कोई चीज ढूंढ रहे हैं

वे हुक्म दे रहे हैं और नाराज हो रहे हैं
लोगों को संख्या में
और संख्या को शून्य में बदल रहे हैं

सबसे ताकतवर लोग बुलडोजर के बारे में सोच रहे हैं
सबसे कमजोर लोग भी बुलडोजर के बारे में सोच रहे हैं.
सबसे ताकतवर लोग खुशी से नाच रहे हैं
सबसे कमजोर लोगों का दुख समुद्र की तरह बढ़ता जा रहा है

सबसे ताकतवर लोग थोड़े हैं
सबसे ताकतवर लोग इस बात को जानते हैं
सबसे कमजोर लोग  बहुत अधिक हैं
सबसे कमजोर लोग इस बात को नहीं जानते

सबसे ताकतवर लोगों को यह भय
रह रहकर सताता है
एक दिन सबसे कमजोर लोग
दुनिया के सारे बुलडोजरों के सामने खड़े हो जाएंगे.

 

विनोद शाही

पत्थर धर्म

पाषाण काल से
कथा सनातन चली आ रही
अब तक पत्थर
मानव होने की
ज़िद करते हैं

शिला-पुरुष हैं एक ओर
बुलडोज़र के पहियों से
उनके कुछ टुकड़े अलग हुए तो
जन्मे बाकी के पत्थर जन

जैसे आदम की पसली से
हब्बा निकली है

जैसे पैरों से ब्रह्म देव के
शूद्रों का उद्भव होता है

मर्यादा पुरुषोत्तम
शिला-पुरुष ने
अन्य सभी को
स्वयं सेवकों में रखा है

सृष्टि पूर्व से रचित सनातन
पृथ्वी शिला सा
‘पत्थर धर्म’ चलाया है

‘बुलडोज़र स्मृति’ को
संविधान का रूप दिया है

जन जन की पत्थर काया को
तोड़ा उसने रोड़ी में
और आत्मा का चूरा कर
सीमेंट में बदला
शिला-पुरुष का भव्य भवन
यों खड़ा हुआ

अलग धर्म के लोग मगर
‘बुलडोज़र स्मृति’ के
विधि विधान के
जलसों त्योहारों से बचते हैं

हाथों में पत्थर
उनके भी हैं

और अहिंसक हैं थोड़े
गीता अपनी के मंत्र बोलते
“देह हमारी बेशक कुचले बुलडोज़र कोई
नहीं आत्मा उसके हाथों आयेगी”

परवाह नहीं, बस रौंद दिये
परधर्मी घर बुलडोज़ हुए

पत्थर के ढेर बचे पीछे
पहचान नहीं पाता है कोई
कहां पड़े दिखते पत्थर हैं
कहां स्वयं वे पड़े हुए हैं

‘बुलडोज़र स्मृति’ में लिखा मिला है
‘शठे शाठ्यम् समाचरेत’ ही
न्याय धर्म की रीति है
वे आतंकी, अर्बन नक्सल हैं
पाकिस्तानी तक उनमें हैं
बीमार देश है
दवा तिक्त पीनी पड़ती है

जड़ समाज होता जाता है
नहीं बुरा यह लेकिन इतना है
जितना उसका
पत्थर होने की
स्मृति से बंधना है
खो देना इतिहास बोध को
जीते जी पत्थर होने से
राज़ी होना है

पत्थर से मुर्दा
सभी हो रहे
कुछ पत्थर होकर भी
लेकिन थोड़े जीवित हैं

लेकिन बेहद थोड़े हैं

यह संकट की
घड़ी बड़ी है

देव जनों की प्रस्तर प्रतिमाएं
जीवित पत्थर से बनती हैं

जीवित पत्थर पर
छिपे हुए हैं

देव मूर्तियां इसलिये
हो गयीं विहीन
ईश्वर से अपने

यह संकट की
घड़ी बड़ी है

संस्कृति से जीवन
विदा हो गया

युद्ध लिप्सा से भरे हुए
मानव द्रोही काम सभी
बेजान पत्थरों के जिम्मे हैं

जीवित पत्थर से
जीवित जन
पाषाण काल में
लौट रहे हैं

लौट रहे पर
आसान नहीं उनकी यात्रा है

रस्ता
गुहाद्वार से होकर जाता है
उसके मुख पर पड़ी हुई है
एक शिला
जिस पर इतिहास आद्य काल का
भित्ति चित्र सा अंकित है

दिख रहा साफ है
शिला-पुरुष पृथ्वी के सारे
उसकी नकल किया करते हैं

पाखंडी प्रतिनिधि ईश्वर के
इतिहास शिला की
पैरोडी खाली करते हैं

इतिहास शिला से
भू कंपन से स्वर उठते हैं
बोल रही वह
मेरे पीछे छिपे रहस्य हैं
खोलो द्वार
सत्य कथा को
फिर से बाहर आने दो

पाषाण काल की ध्वनियां सारी
उसकी भाषा में अर्थ बनी हैं
पत्थर लिपि में लिखी मिलीं हैं

दुश्मन बेशक बहुत बड़ा हो
और हारना निश्चित हो
रणभूमि को ऐसे में
पीछे छोड़ो, रणछोड़ बनो
धैर्य धरी, दृढ़ बने रहो
इतिहास मदद करने आयेगा

कालयवन में शक्ति दंभ है
जड़ बुद्धि दैत्य है, वैसा ही है
जैसा होता बुलडोजर कोई

अंध गुहा के भीतर तक भी
पीछा करता आयेगा ही
आने दो उसको पीछे पीछे
असुरारि मुचुकुंद
वहां सोया है कब से
काल तुम्हारा
कालयवन
उसका है भोजन

महा शिला से
कालयवन कंकाल बने
पड़े हुए है
काल गुहा में जाने कितने

लौटे वापिस
पाषाण काल से
जीवित पत्थर

चिकने होकर
स्वयं लुढ़कना
आगे बढ़ना सीख रहे हैं
स्वयं-सेव हैं वे ही सच्चे

मुर्दा पत्थर
लेकिन ठहरे हैं
‘शिला छाप’ हैं
भगवां ठप्पे
उनके माथों पर लगे हुए हैं
ट्रेड मार्क बनते हैं जैसे
उपयोगी चीज़ों के

खुसरो बन कर
आये हैं लेकिन वे तो अब
छाप तिलक सब छोड़ रहे हैं

वे कबीर हैं
अष्ट-छापिया
पत्थर धर्मों के पार खड़े हैं

 

हूबनाथ

बुलडोजर

सिर्फ़
एक शब्द ही नहीं
एक मशीन ही नहीं
एक अवधारणा भी नहीं
बल्कि
एक पॉलिसी है
एक नीति
एक कूटनीति है
बुलडोजर

संविधान की पुस्तक में
छिपा एक दीमक है
सत्ता की आत्मा में पैठा
एक डर है
शक्तिहीनता का संबल
पौरुषहीनता की दवाई है
बुलडोजर

झूठ का पहाड़
जब ढहने लगे
क्रूरता के क़िले की दीवार
में सेंध लग जाए
रंगे सियार का
उतरने लगे रंग
तो सबसे बड़ा सहारा है
बुलडोजर

खेतों को रौंदता हुआ
कमज़़ोर घरों को ढहाता
झोंपड़ियाँ उजाड़ता
नंगी भूखी भीड़ पर
रौब जमाता
जब थक जाता है
तब सत्ता की जाँघ तले
सुस्ताता है
बुलडोजर.

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