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क्या छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर कंपनी को दीमक बनकर चाट रहे हैं अफसर ?

क्या छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर कंपनी को दीमक बनकर चाट रहे हैं अफसर ?

रायपुर. कई बार हैंग ओवर नींबू-पानी या महज एक डिसप्रिस की गोली से ठीक हो जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ स्टेट पॉवर कंपनी में ऐसा नहीं है. यहां पुरानी सरकार के दिनों से काबिज अफसरों का बोलबाला है और हैंग ओवर उतरने का नाम नहीं ले रहा है. कंपनी में पदस्थ एक बड़े अफसर का भी मानना है कि कंपनी में ज्यादातर वहीं लोग तैनात हैं जो सुपर सीएम के बेहद निकटतम थे. ( बताना लाजिमी होगा कि भाजपा के शासनकाल में संविदा में पदस्थ एक अफसर ने खुद को देश का सबसे पॉवरफुल नौकरशाह और सुपर सीएम घोषित कर रखा था. बताते हैं कि यह अफसर ट्रांसफार्मर के अलावा बिजली खरीदने- बेचने के खेल में बेहद रुचि लेता था. सूत्र कहते हैं कि अपनी इसी रुचि के चलते इस कथित सुपर सीएम ने छत्तीसगढ़ से बाहर स्वयं का एक बिजली घर स्थापित कर लिया है. )

बहरहाल स्टेट पॉवर कंपनी में रहकर छत्तीसगढ़ के बजाय व्यक्तिगत निष्ठा और पूजा को महत्व देने वाले ऐसे बहुत सारे लोगों के बारे में रेशम जांगड़े नाम के एक शख्स ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से नामजद शिकायत की है. पॉवर कंपनी में पदस्थ एक वरिष्ठ अफसर ( नाम न छापने की शर्त पर ) का कहना है कि वे किसी रेशम जांगड़े को नहीं जानते,लेकिन जो भी शिकायत हुई है उसके कटेंट बहुत हद तक परफेक्ट है. अफसर का यह भी कहना है कि कंपनी को बहुत से लोग दीमक की तरह चाट रहे हैं. अब दीमक पर दवा का छिड़काव जरूरी हो गया है.

कई अफसर निशाने पर

रेशम जांगड़े ने अपनी शिकायत में जिनको निशाना बनाया है उनमें हाल के दिनों में सेवानिवृत हुए अफसर एमएस रत्नम भी शामिल है. जांगड़े का आरोप है कि क्या कभी इस बात की कोई जांच भी करेगा कि बिजली बोर्ड का एक अफसर लगभग 19 सालों तक मंत्रालय पर कैसे काबिज रहा. इस अफसर को मंत्रालय के किस वरिष्ठ अफसर ने संरक्षण दे रखा था. यह अफसर कभी विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी तो कभी विशेष सचिव बनकर कैसे काम करता रहा है. जांगड़े का आरोप है कि कांग्रेस ने अपने उपभोक्ताओं का बिजली बिल आधा करने की घोषणा की थी. जब भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने तब रत्नम ने इस योजना को क्रियान्व्यित करने में जानबूझकर विलंब किया. योजना में कुछ ऐसी आपत्तियां और शर्तें लागू लागू की गई जिससे लोगों के बीच भ्रम फैला. ऊर्जा प्रभार, नियत प्रभार और वीसीए पर छूट का प्रावधान नहीं किए जाने से आम आदमी आक्रोशित हुआ. मार्च-अप्रैल 2019 में लगभग पचास लाख उपभोक्ताओं को लाभ मिलना था, लेकिन महज 20 लाख उपभोक्ता ही लाभान्वित हो पाए. अब जाकर 35 लाख उपभोक्ताओं को लाभ मिल रहा है. जांगड़े का आरोप है कि रत्नम ने छत्तीसगढ़ राज्य बिजली कंपनी की अलग-अलग ईकाईयों में निदेशक जीसी मुखर्जी, ओसी कपिला और हेमराज नरवरे को अवैध ढंग से नियुक्ति दिलवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आरोप है कि ये सभी लोग संविदा में पदस्थ सुपर सीएम के बेहद करीबी है और उन्हीं के इशारों पर काम करते हैं. इधर नरवरे और मुखर्जी ने जांगड़े के इन आरोपों को बेबुनियाद बताया. उन्होंने अपना मोर्चा से बातचीत में कहा कि सारी नियुक्तियां नियम-कानून के दायरे में हुई है. जबकि एक निदेशक ओसी कपिला ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया.

प्रबंध संचालक मूर्ति ने किया उत्पादन को प्रभावित

जांगड़े का आरोप है कि फरवरी से अप्रैल 2019 के बीच कई बार शटडाउन की स्थिति बनी. दरअसल यह सब इसलिए हुआ रख-रखाव का दबाव बनाकर बिजली कटौती करवाई जा सकें. बिजली उत्पादन कंपनी में उत्पादन को प्रभावित करने में प्रबंध संचालक राममूर्ति ने अपनी अहम भूमिका का निर्वहन किया. जांगड़े का कहना है कि राममूर्ति की पदस्थापना भाजपा के शासनकाल में की गई थी. इस पदस्थापना के पीछे भी रत्नम का रोल था. ( इस  आरोप के बारे में राममूर्ति से उनका पक्ष जानने के लिए फोन लगाया गया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया. )

मड़वा प्रोजेक्ट अब 9900 करोड़

शिकायतकर्ता का आरोप है कि रत्नम ने बिजली का निर्माण करने वाले निजी उत्पादकों को जमीन देने, बिजली के करार करने और उनके संयंत्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार को अंजाम दिया है. उन्हीं के समय मड़वा प्रोजेक्ट का ठेका हैदराबाद की वीजीआर नाम की कंपनी को दिया गया. रत्नम अब भी इस कंपनी के अधिकृत एजेंट के रुप में कार्य कर रहे हैं. दोगने दर से प्रोजेक्ट बनाने की वजह से अब मड़वा प्रोजेक्ट की लागत 9900 करोड़ रुपए हो गई है. कभी वीजीआर कंपनी का कन्वयेर बेल्ट जल गया था तो कंपनी के पूर्व प्रबंध संचालक एसबी अग्रवाल ने कंपनी का बचाव किया और पुर्नस्थापना के लिए अतिरिक्त देयक पास करवाया. शिकायत में यह भी उल्लेखित है कि एसबी अग्रवाल हर महीने प्रबंध संचालक उत्पादन की हैसियत से साढ़े पांच लाख रुपए का वेतन आहरित करते थे जबकि कंपनी के एमडी पद पर कार्यपालक निदेशक से अधिक वेतन पर संविदा नियुक्ति का प्रावधान ही नहीं है.

अब तक रुकी है जिंदल से वसूली

शिकायतकर्ता का कहना है कि प्रदेश में सौर ऊर्जा गैर परम्परागत ऊर्जा स्त्रोत योजना का गलत ढंग से प्रभावशील है. जो बिजली कोयले की खपत से उत्पादित होती है उसे गैर परम्परा स्त्रोत से खपत होना बताया जाता है और फिर बिजली खरीदी जाती है. भूसे की आड़ में बड़ा खिलवाड़ किया जाता है. इस खेल में नियायक आयोग की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए. शिकायत में उल्लेखित है कि गत पंद्रह सालों से विधानसभा में गोल-मोल जानकारी प्रस्तुत की जा रही है. जिंदल बिजली खरीद में एपीलेट ट्रिब्युनल द्वारा 156 करोड़ रुपए की वसूली का आदेश दिया गया, लेकिन यह आदेश अब तक रुका है. जो निजी बिजली कंपनी है उनके पारेषण लाइन का परमीशन देने में ही करोड़ों रुपए का वारा-न्यारा हो जाता है. आलम यह है कि सेवानिवृत हुए एक अफसर ने रायपुर, हैदराबाद और बैंगलोर में कई मकान बना लिए हैं और अमलतास बिल्डर्स में पार्टनर बन बैठा है. एक पूर्व अफसर कचना में करोड़ों रुपए का मकान बनवा रहा है जिसके लिए धन की व्यवस्था मुख्य बिजली निरीक्षक और बिजली कंपनी के अधिकारी कर रहे हैं.

 

 

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