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जब जमीन घोटाले में फंसे राजेश टोप्पो को मुकेश गुप्ता ने बचाया

रायपुर. भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर राजेश टोप्पो पर गंभीर आर्थिक गड़बड़ी करने के आरोप में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने शुक्रवार को मामला तो दर्ज कर लिया है, लेकिन इससे पहले भी टोप्पो आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो की जद में आ चुके हैं. वर्ष 2012 में उन पर भिलाई की जीई रोड से लगी तीन हजार वर्ग मीटर से बड़ी बेशकीमती जमीन के लैंडयूज को बदलकर लाखों रुपए की गड़बड़ी करने का आरोप लगा था जो बाद में सही पाया गया. बताते हैं कि इस प्रकरण की पूरी छानबीन तब के एडिशनल डीजी दुर्गेश माधव अवस्थी ने की थी. इस मामले में ईओडब्लू की तरफ से चालान पेश करने की कार्रवाई होने ही वाली थीं कि अचानक सुपर सीएम के नाम से विख्यात अफसर ने हस्तक्षेप कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया. थोड़े ही दिनों बाद अवस्थी को ईओडब्लू से हटा दिया गया. लंबे समय तक यह मामला फाइलों में बंद रहा. इधर सूत्र बताते हैं कि मुकेश गुप्ता के ईओडब्लू प्रमुख बनते ही मामले का खात्मा कर दिया गया. खबर है कि जिस मामले का खात्मा हो चुका है उसकी फाइल भी अब ईओडब्लू से गायब है.

गौरतलब है कि वर्ष 1993 में विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण ( साडा ) ने नर्सिग होम के लिए नेहरूनगर पश्चिम इलाके में रहने वाले हरदीप सिंह राजपाल को 432 रुपए प्रति मीटर की दर से लीज पर 3075 वर्ग मीटर जमीन आवंटित की थी। यह जमीन नर्सिग होम के लिए आरक्षित थी। वर्ष 1997 के इस जमीन का लैंडयूज बदल दिया गया. अफसरों ने अचानक अस्पताल और नर्सिंग होम के लिए आरक्षित जमीन पर व्यावसायिक निर्माण की अनुमति दे दी. जिस जमीन पर अस्पताल बनाया जाना था, वहां आज कमर्शियल कांप्लेक्स खड़ा है। यहां निजी बैंक, मोबाइल शो रूम, फाइनेंस कंपनियां, होटल, ज्वेलरी शॉप यहां चल रही हैं। 432 रुपए वर्ग मीटर की दर से खरीदी गई जमीन की वर्तमान दर करीब 14 हजार रुपए प्रति वर्ग मीटर है। इस मामले में अन्वेषण ब्यूरो ने अपनी जांच में यह पाया था कि साडा और उसके बाद बने नगर पालिका निगम के अधिकारियों ने अपने अधिकारों से परे जाकर जमीन का लैंड यूज बदला और नवीनीकरण की कार्यवाही को अंजाम दिया था. तब राजेश टोप्पो नगर निगम भिलाई के आयुक्त थे और आयुक्त रहने के दौरान ही उन्होंने बिल्डिंग परमिशन को रिन्यू किया था। ब्यूरो ने इस मामले में एचपी किंडो, एसबी सिंह, राजेश सुकुमार टोप्पो, सुधीर किंजवड़ेकर, एसबी शर्मा, यूके अश्वनी चंद्राकर,प्रोसेसर सर्वर और हरदीप सिंह राजपाल सहित कुल आठ लोगों को आरोपी बनाया था. इस मामले में अब तक किसी पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई.अब तो पूरा मामला ही दब गया है. वैसे इस प्रकरण में सबसे ज्यादा हैरत की बात यह है कि जो अफसर एक पड़ताल में दागदार आरोपी था वहीं अफसर उसी प्रकरण में कतिपय रसूखदार लोगों के हस्तक्षेप के चलते पाक-साफ हो गया. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस मामले की फाइल भी फिर से ढूंढी जाएगी और दोषियों के खिलाफ चालान पेश होगा. फिलहाल तो सूत्र यहीं कहते हैं कि फाइल नदारत है.

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क्या सांसद अभिषेक सिंह भी आएंगे जांच के दायरे में

रायपुर.छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता के उपकरण खरीदी मामले में फंसने के बाद सांसद पुत्र अभिषेक सिंह भी लपेटे में आ सकते हैं. सूत्रों का कहना है कि सरकार जल्द ही विदेश में खाता खोले जाने वाले मामले को लेकर जांच प्रारंभ कर सकती है. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सबसे पहले एक टिव्हट के जरिए यह आरोप लगाया था कि सांसद अभिषेक सिंह ने विदेश में खाता खोलकर अच्छा-खासा निवेश किया है. उनके इस आरोप के बाद प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल ( अब मुख्यमंत्री भी ) कई मर्तबा कह चुके हैं कि अभिषेक सिंह ने शेयर कार्प कंपनी के जरिए अपना काला धन स्विस बैंक में जमा करवाया है. अभिषेक सिंह के द्वारा विदेश में खाता खोले जाने का मामला तब प्रकाश में आया था जब खोजी पत्रकारों की एक अंतरराष्ट्रीय संस्था आईसीआईजे ने कुछ दस्तावेज जारी किए थे. इन दस्तावेजों के आधार पर यह पता चला था कि अभिषेक सिंह नाम के एक शख्स ने ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड में क्वेस्ट नाम की एक कंपनी खोली थी. इस कंपनी के खुल जाने के ठीक 27 दिन बाद शार्प ओशन नाम की वह  कंपनी बंद हो गई जिसका नाम हेलिकाफ्टर खरीदी में एक बिचौलिए के तौर पर सामने आया था. अभिषेक ने विदेश में खाता खोलने के दौरान जो पता दिया था उसमें रमन मेडिकल स्टोर वार्ड नंबर 20 विध्यवासिनी कवर्धा उल्लेखित था. इस पते के उजागर होने के बाद अभिषेक सिंह पूरे मामले को राजनीति से प्रेरित बताते रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को कहना पड़ गया था कि रमन सिंह के योग्य पुत्र अभिषेक सिंह का नाम भी पनामा पेपर में शामिल है और सरकार जांच से कतरा रही है.

खबरों पर सेंसर

अब तो हर अखबार और चैनल में रमन सिंह, चमन सिंह, पुनीत गुप्ता, वीणा सिंह और अभिषेक सिंह जैसे नाम छप रहे हैं और चल रहे हैं, लेकिन दिसम्बर 2018 तक छत्तीसगढ़ में स्थिति बेहद खराब थीं. अखबार के दफ्तर में मौजूद पत्रकारों और संपादकों को अभिषेक सिंह के नाम को प्रकाशित न करने के लिए सुपर सीएम फोन करते थे.कई बार जनसंपर्क विभाग के आयुक्त भी विज्ञापन रोक देने की धमकी  देकर खबर को दबा देने में सफल हो जाते थे. इधर सूत्र बताते है कि सांसद बनने से पहले भी अभिषेक सिंह इंटीग्रेटेड सोलर सोल्यूशंस नाम की एक प्राइवेट कंपनी में बतौर निदेशक कार्यरत थे. इस कंपनी ने भी तीन करोड़ साठ लाख की विदेशी मुद्रा कमाई थी, लेकिन बाद में अभिषेक सिंह इस कंपनी से इस्तीफा देकर अलग हो गए और इसका वित्तीय अधिकार हरि प्रकाश और उनकी पत्नी मनीषा प्रकाश को स्थानांतरित कर दिया गया.

 

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पुनीत गुप्ता के फरार होने में थानेदार संजय पुढ़ीर का रोल

रायपुर. क्या छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के गोलबाजार थाने में पदस्थ थानेदार संजय पुढ़ीर ने पूर्व मुख्यमंत्री के दामाद पुनीत गुप्ता को शहर छोड़कर फरार होने में मदद की है. बुधवार को अनिल अग्रवाल, कुणाल शुक्ला, राकेश चौबे, ममता शर्मा, नागेंद्र दुबे सहित अन्य कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने थाने का घेराव कर आरोप लगाया था कि गोलबाजार पुलिस पुनीत गुप्ता को बचाने के खेल में हुई है. सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह भी आरोप था कि पुढ़ीर लंबे समय तक पूर्व मुख्यमंत्री और उनके सांसद पुत्र के करीबी थे, सो उन्होंने पुनीत गुप्ता की धरपकड़ में किसी भी तरह की दिलचस्पी नहीं दिखाई. फिलहाल पुनीत गुप्ता के लोकेशन की जानकारी भी पुलिस को नहीं मिल पाई है.

पार्टी ने पल्ला झाड़ा

इधर पूर्व मुख्यमंत्री के दामाद के मामले में भाजपा ने किनारा कर लिया है. खुद को चौकीदार-चौकीदार लिखकर पार्टी का समर्पित सिपाही बताने वाले लोग भी पुनीत गुप्ता को लेकर खामोश चल रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह को छोड़कर अब तक पार्टी के किसी भी बड़े नेता ने पुनीत गुप्ता के पक्ष में बयान नहीं दिया है. वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल ने तो यह कहकर पार्टी नेताओं को सन्नाटे में डाल दिया है कि कानून अपना काम कर रहा है.

अकेला दामाद ही भारी

पुनीत गुप्ता को लेकर हर रोज नई-नई सनसनी सामने आ रही है. उनके एक से बढ़कर एक कारनामों के चलते राजनीति के धुंरधर भी मानकर चल रहे हैं कि दामाद बाबू चुनाव में भाजपा के लिए मुसीबत का पहाड़ बनकर उभरने वाले हैं.

 

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पुनीत गुप्ता के लिए काम करते थे लोकेश और मोनू

रायपुर. छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता को लेकर हर रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं. फिलहाल जो तथ्य सामने आ  रहे हैं उससे यह साफ होता है कि पूर्व मुख्यमंत्री के जीरो टॉरलेंस का नारा केवल दिखावे के लिए था. पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने सरकारी दामाद को जो छूट दे थीं सो दी थीं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा दामाद बाबू के करीबी लोग भी मलाई छान रहे थे. खबर है कि सप्लायर लोकेश शर्मा और प्रसुन सिंह उर्फ मोनू सिंह दामाद बाबू के बेहद करीबी थे और सारे काम इन्हीं के माध्यम से किए जाते थे.

डीकेएस में पचास करोड़ के उपकरण और टेंडर प्रक्रिया में घोटाले के बाद हर खरीदी सवालों के घेरे में आ खड़ी हुई है. अभी चंद रोज पहले यह खुलासा हुआ कि पुनीत गुप्ता के अधीक्षक रहने के दौरान अस्पताल प्रबंधन ने शिक्षा विभाग में फर्नीचर आदि की सप्लाई के लिए बदनाम रहे ड्रोलिया इंटरप्राइजेस से 21 लाख 64 हजार 420 रुपए का ग्लास डोर और विजिटर बैंच और गोयल इंडस्ट्रियल कार्पोरेशन से 21 लाख 97 हजार 664 रुपए का विभिन्न फर्नीचर और स्टील टेबल खरीदा था. अब जाकर पता चल रहा है कि दोनों फर्में एक ही व्यक्ति के नाम से पंजीकृत है. बहरहाल यह खरीदी भी जांच के दायरे में आ गई है. इधर डीकेएस में पैथालॉजी, एक्सरे, सिटी स्केन डायलिसिस के अलावा अन्य सभी कामों के ठेके में कृषि विभाग के लिए तगड़ी सप्लाई करने वाले दो लोगों की भूमिका सामने आ रही है. बताते हैं कि कृषि विभाग के ठेकेदारों के लिए काम करने वाले एक शख्स लोकेश शर्मा ने पुनीत गुप्ता से जान-पहचान बढ़ाकर करोड़ों का काम हथियाया. इसी तरह मध्य प्रदेश रीवा में शिक्षाकर्मी रहे प्रसुन सिंह उर्फ मोनू सिंह की भूमिका को लेकर भी स्वास्थ्य विभाग में हडकंप मचा हुआ है. जानकार बताते हैं कि पुनीत गुप्ता के कहने पर लोकेश और मोनू ही अफसरों से सीधे संपर्क किया करते थे. पुनीत गुप्ता के सारे मामलों का हिसाब-किताब भी यहीं दो लोग रखा करते थे.  अफसरों के बीच मोनू खुद को रमन सिंह की पत्नी वीणा की कंजिन सिस्टर का रिश्तेदार बताया करता था सो अधिकारी भी खौफ खाते थे. मामले से जुड़े जानकारों का कहना है कि सरकार के दबाव में अफसरों ने मोनू सिंह  को संपूर्ण स्वच्छता अभियान में शौचालय बनाने के लिए कई तरह की सप्लाई का काम भी दिलवाया था. गांव-गांव में गुणवत्ताविहीन शौचालय निर्माण की शिकायतों के बावजूद अफसर मोनू सिंह को कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं रहते थे. इधर डीकेएस प्रकरण में पुलिस दवाईयों के नाम पर तगड़ा खेल करने वाले मोक्षित कार्पोरेशन और सीबी कार्पोरेशन की भूमिका भी खंगालने की तैयारी में हैं. गौरतलब है कि यह कंपनी भी एक ही व्यक्ति के नाम से पंजीकृत है. दोनों कंपनियों को शांतिलाल के पुत्र शशांक संचालित करते हैं.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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विनय कुमार सिंह बने ईओडब्लू के विशेष महानिदेशक

रायपुर. छत्तीसगढ़ सरकार ने देर शाम भारतीय पुलिस सेवा 1987 बैच के अफसर विनय कुमार सिंह को ईओडब्लू और एंटी करप्शन ब्यूरो का विशेष महानिदेशक नियुक्त कर दिया है. इसके साथ ही नगर सेना और जेल के महानिदेशक गिरधारी नायक को नक्सल आपरेशन और एसआईबी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है. गौरतलब है कि लगभग 16 साल तक दिल्ली में रहने के बाद वीके सिंह हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ लौटे थे. दिल्ली में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे वीके सिंह का पूरा कार्यकाल निर्विवाद रहा है. यहां उन्होंने गृह विभाग को ज्वाइनिंग दी थी, लेकिन उन्हें कोई जवाबदारी नहीं सौंपी गई थीं. हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात के बाद उन्होंने कहा भी था कि उन्हें जो जिम्मेदारी दी जाएंगी उसका निर्वहन करेंगे. श्री सिंह वरिष्ठता क्रम में फिलहाल तीसरे क्रम में हैं. डीजीपी दुर्गेश माधव अवस्थी और डीजी गिरधारी नायक के बाद वरिष्ठता क्रम में उनका नंबर आता है. उनके बाद संजय पिल्ले, आरके विज और निलंबित डीजी मुकेश गुप्ता है.

 

 

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मुकेश गुप्ता को केस लड़ने के लिए 10 करोड़ का चंदा

राजकुमार सोनी

रायपुर. कई गंभीर धाराओं में आरोपी बनाए गए पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता को केस लड़ने के लिए लगभग 26 थानों के प्रभारियों ने 10 करोड़ रुपए की बड़ी राशि एकत्र की है. सरकार के पास इस बात की पुख्ता सूचना मिलने के बाद अब सभी थाना के प्रभारियों को हटाने की तैयारी चल रही है. सूत्र कहते हैं कि अब-तब में मुकेश गुप्ता के करीबी थाना प्रभारियों पर गाज गिर सकती है. इसके अलावा गुप्ता की अत्यंत निकटतम रही रेखा नायर पर भी शिकंजा कसा जा सकता है. सूत्रों का दावा है कि देर रात रेखा नायर पर भी मामला दर्ज हो सकता है.

मुकेश गुप्ता इन दिनों दिल्ली में सुपर सीएम अमन सिंह और अधिवक्ताओं के साथ बचने का उपाय ढूंढ रहे हैं, लेकिन एसीबी में अपनी पहुंच के चलते वे अब भी हर गतिविधि पर नजर गड़ाए हुए हैं. सूत्रों का कहना है कि आर्थिक अपराध अन्वेषण और करप्शन ब्यूरो में उनके करीबी लोग पदस्थ हैं जिसके चलते पुलिस उनका पता-ठिकाना भी ढूंढ नहीं पा रही है. माना जा रहा है कि गुप्ता को इनवेस्टिगेशन एवं जांच के सभी बिंदुओं की जानकारी मिल रही है. इस मामले में दीपक नाम के एक अफसर पर भी शक की सुई घूम गई है. बताया जाता है कि इस अधिकारी की नजदीकियां सुपर सीएम के साथ है जिसकी वजह से गुप्ता के खिलाफ होने वाली हर घटनाक्रम की जानकारी लीक हो रही है. संजय नाम के एक निरीक्षक को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. कहा जा रहा है कि इस निरीक्षक के नेतृत्व में ही थाना प्रभारी हेम प्रकाश, प्रेम अवधिया, किरीत, विशाल, संदीप चंद्राकर, अमित बेरिया सहित अन्य कई से अच्छी खासी रकम एकत्रित की गई है. सूत्रों का दावा है कि लगभग 10 करोड़ रुपए एकत्र करने वाले सभी थाना प्रभारी वे हैं जिनकी पोस्टिंग भाजपा के शासनकाल में मुकेश गुप्ता ने करवाई थी. हालांकि न्याय के मंदिर पर कोई जज पैसा लेकर स्टे देता होगा ऐसा उदाहरण आज तक सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि दस करोड़ की बड़ी राशि केस लड़ने और स्टे हासिल करने के नाम पर ही एकत्र की गई है. सरकार के पास इस बात की भी पुख्ता सूचना पहुंची है कि एक उद्योग समूह ने गुप्ता को गोविंद कुंज में बंगला मुहैया करवाया है, जहां फिलहाल 12 से ज्यादा सीए गुप्ता के अस्पताल की बैलेंसशीट को ठीक करने का काम कर रहे हैं. सूत्र कहते हैं कि पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए रेखा नायर भी फिलहाल अंडर ग्राउंड हो गई है. उस पर जल्द ही एफआईआर दर्ज किए जाने की जानकारी मिल रही है.

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आरोपी मुकेश गुप्ता के साथ दिल्ली के खान मार्केट में नजर आए अमन सिंह

रायपुर. सोशल मीडिया में एक तस्वीर बड़ी तेजी से वायरल हो रही है. दावा किया जा रहा है कि भारतीय पुलिस सेवा के अफसर ( अब निलंबित ) मुकेश गुप्ता के साथ सुपर सीएम के नाम से विख्यात अमन सिंह के साथ दिल्ली के खान मार्केट में दो अन्य महत्वपूर्ण लोगों के साथ चर्चा कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि जो दो चर्चा कर रहे हैं उनमें से एक छत्तीसगढ़ का सामाजिक कार्यकर्ता है. हालांकि अभी यह पूरी तरह से साफ नहीं है कि वह सामाजिक कार्यकर्ता कौन है. कुछ लोगों का दावा है कि सामने बैठे हुए शख्स में से एक अधिवक्ता अपूर्व है. कुछ लोगों का कहना है कि जैकेट पहनने वाला शख्स सीबीआई में भी हो सकता है. खान मार्केट के एक कैफे में किस बात पर चर्चा हो रही है यह भी स्पष्ट नहीं है, लेकिन जैसा कि आरोप लगता रहा है कि छत्तीसगढ़ को रमन सिंह से ज्यादा अमन सिंह और मुकेश गुप्ता चलाते रहे हैं तो यह जुगलबंदी कई बातों को पुख्ता करने के लिए पर्याप्त है. इस तस्वीर को देखकर यह सवाल भी उठ रहा है कि एक आरोपी के साथ अमन सिंह क्या कर रहे हैं. यह चर्चा भी है कि एक तरफ तो छत्तीसगढ़ की पुलिस मुकेश गुप्ता को खोज नहीं पा रही है और दूसरी ओर वे दिल्ली के सैर-सपाटे पर है.

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अंतागढ़ उपचुनाव में एक बड़ा खुलासा- जब घड़ी का कांटा उलटा घूमा तब संभव हुई मंतूराम की नाम वापसी

राजकुमार सोनी

रायपुर.अंतागढ़ उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, उनके पुत्र अमित जोगी, डाक्टर रमन सिंह और उनके दामाद पुनीत गुप्ता आरोपों से घिरे हुए हैं, लेकिन इस मामले की स्टिंग आपरेशन करने वाले फिरोज सिद्धकी का दावा है  कि 29 अगस्त 2014 को नाम वापसी की समय सीमा खत्म हो जाने के बाद कांग्रेस प्रत्याशी मंतूराम पवार को मैदान से हटाया गया था. उन्होंने बताया कि मामले की कवरेज के लिए उस रोज मीडिया भी वहां मौजूद था, लेकिन मीडिया को इस बात की भनक नहीं लगने दी गई और पूरे मामले को वैधानिक स्वरूप देने के लिए जिला निर्वाचन कार्यालय की घड़ी का कांटा उलटा घूमा दिया गया. फिरोज ने बताया कि उक्त तिथि में सभी प्रत्याशियों के लिए नाम वापस लेने की समय सीमा शाम चार बजे तक निर्धारित थीं,लेकिन मंतूराम को पैसा देकर मनाने की कार्रवाई में यह समय बीत गया. जब मंतूराम मैदान से हटने को तैयार हो गए तब उसे ( फिरोज को ) और जिला निर्वाचन अधिकारी को पूर्व मुख्यमंत्री के अत्यंत ही करीबी एक अफसर ने फोन किया था. अफसर से मिले निर्देश के बाद ही घड़ी का कांटा उलटा घुमाया गया... यानि शाम चार बजे को तीन बजे किया गया. फिरोज ने कहा कि घड़ी के कांटे को उलटा करने के खेल में तीन से चार लोग ही जुड़े हुए थे जिसमें तात्कालिक जिला कलेक्टर भी शामिल थीं और उन्होंने खुद को बचाने के लिए बकायदा रिकार्डिंग भी करवाई थीं.

 

फिरोज ने अंतागढ़ कांड के कई मसलों पर खास बातचीत साफ तौर पर यह स्वीकारा कि पूरे मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, अमित जोगी और डाक्टर रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता शामिल थे. इसके अलावा भारतीय प्रशासनिक और पुलिस सेवा के अफसर भी लिप्त थे. फिरोज ने बताया कि मामले से जुड़ा एक अफसर तो अवैध ढंग से जमीन की खरीद-फरोख्त के खेल में भी लगा हुआ है. फिरोज ने कहा कि उन्हें अमित जोगी ने मंतूराम पवार को लेकर मंत्री राजेश मूणत के बंगले के सामने खड़े रहने को कहा था, फिर बाद में यह भी कहा कि वे मंतूराम को लेकर मूणत के बंगले चले जाए. ऐसा शायद सुरक्षागत कारणों से कहा गया था. 

चश्मदीद गवाह

 फिरोज ने बताया कि रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र को भैया कहकर संबोधित करते थे. लेन-देन का सारा मामला अमित जोगी की निगरानी में किया गया था. बात सात करोड़ की हुई थी, लेकिन उतनी बड़ी रकम शायद नहीं मिल पाई. इस मामले में एक बिल्डर और एक शराब माफिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका थीं. इसके अलावा भारतीय पुलिस सेवा का एक प्रमुख अफसर भी जी-जान से इस खेल में लगा हुआ था. फिरोज ने अमित जोगी के हवाले से यह जानकारी भी दी कि अफसर ने भी फोन टेप किया था और शायद वह रमन सिंह को भी ब्लैक मेल कर रहा था. क्या उस अफसर का नाम मुकेश गुप्ता था... पूछने पर फिरोज ने कहा- हो सकता है.

फिरोज ने बताया कि अभी वह धारा 164 के तहत अपना बयान दर्ज करवाएगा, लेकिन उसे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि अजीत और अमित जोगी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को नीचा दिखाने के मंतूराम पवार को चुनाव मैदान से हटाने के खेल में लगे थे. फिरोज ने कहा कि वह पूरे मामले का चश्मदीद गवाह है इसलिए उसने सरकार से सुरक्षा भी मांगी है.

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कुख्यात पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता सस्पेंड

रायपुर. विवादों में घिरे पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता निलंबित कर दिए गए हैं. इसके साथ ही नारायणपुर के पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह भी निलंबन की जद में हैं. देर-सबेर उन पर भी कार्रवाई तय है.

पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह और खुद को पावरफुल नौकरशाह के तौर पर प्रचारित करने वाले अमन सिंह के करीबी समझे जाने वाले मुकेश गुप्ता पर कभी मिक्की मेहता की हत्या का आरोप लगता रहा है तो कभी झीरम घाटी के माओवादी हमले में उनकी भूमिका संदिग्ध मानी गई. पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे की मौत के मामले में भी उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठ चुके हैं.

इधर एक दिन पहले ईओडब्लू ने उन पर नागरिक आपूर्ति निगम घोटाले की जांच के दौरान आरोपियों और संबंधित दर्जनों लोगों के फोन टेप करने के मामले में धारा 166, 166 ए ( बी ), 167, 193, 194, 196, 201, 218, 466, 467, 471 और 120 बी के तहत मामला दर्ज किया है. उनके साथ-साथ खुद को रमन सिंह के रिश्तेदार के तौर पर प्रचारित करने वाले रजनेश सिंह भी आरोपी बनाए गए हैं. ईओडब्लू ने जिन गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है उसके बाद दोनों अफसरों का जेल जाना भी तय माना जा रहा है. दोनों पर नागरिक आपूर्ति घोटाले की जांच के दौरान झूठा साक्ष्य गढ़ने, आपराधिक साजिश रचते हुए रसूखदार लोगों को बचाने और अवैध तरीके से फोन टेप करने का आरोप है.

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पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता का रेखा से कनेक्शन

रायपुर. चौकिए मत... यह वह रेखा नहीं है जो फिल्म अभिनेत्री है और जिसका नाम कभी विनोद मेहरा, अभिताभ बच्चन और उद्योगपति मुकेश अग्रवाल से जुड़ा था. छत्तीसगढ़ के पुलिस महकमे में भी एक रेखा पदस्थ रही है जिसका पूरा नाम रेखा नायर है. पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जो शिकायत सौंपी है उसमें रेखा नायर का जिक्र है. ननकीराम का कहना है कि पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता का रेखा नायर से अवैध कनेक्शन रहा है. ननकीराम ने रेखा नायर को मुकेश गुप्ता के खिलाफ की जांच की एक अहम कड़ी बताते हुए उसे सुरक्षा देने की मांग भी की है.

नागरिक आपूर्ति निगम में हुए घोटाले की जांच के दौरान साजिश रचने, रसूखदार लोगों को बचाने के साथ-साथ फोन टेप करवाने का आरोप लगने के बाद ईओडब्लू ने पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह के खिलाफ मामला पंजीबद्ध कर लिया गया है. इस बारे में पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने 9 जनवरी 2019 को मुख्यमंत्री को सौंपे गए पत्र में यह साफ कर दिया था कि कुछ पुलिसकर्मी, शराब व्यवसाय से जुड़े लोग मुकेश गुप्ता से सांठ-गांठकर इंटरसेप्टरों का संचालन कर रहे थे. ननकीराम का आरोप है कि मुकेश गुप्ता ने अवैध क्रिया-कलापों में लिप्त लोगों को विधायकों, सांसदों, न्यायिक अधिकारियों, प्रमुख व्यापारियों, पत्रकारों के फोन टेप करने के काम में झोंक रखा था. ननकीराम की शिकायत में उल्लेखित है कि मुकेश गुप्ता ने रेखा नायर को जबरिया केरल भेज दिया है ताकि किसी भी तरह की जांच होने की सूरत में वह जांच एजेंसी के सम्मुख प्रस्तुत ही न हो. उन्होंने आगे लिखा है- मेरी जानकारी में यह बात भी आई है  कि रेखा नायर ने केरल में भारतीय पुलिस सेवा के अफसर  मुकेश गुप्ता के खिलाफ दैहिक शोषण किए जाने की शिकायत भी की  थी जिसे धमकाकर वापस करवा दिया गया है. ननकी का कहना है कि रेखा को खम्हारडीह स्थित मारुति सालिटेयर जैसी महंगी कालोनी में आलीशान मकान दिलवाया गया था और वहीं से अवैध इंटरसेप्टर का संचालन किया जाता था.

पन्द्रह हजार लोगों का फोन टेप

इधर खबर है कि छत्तीसगढ़ पुलिस ने रेखा के बारे में बड़ी  महत्वपूर्ण जानकारी जुटा ली है. बताते है कि उसने 15 हजार से ज्यादा लोगों का फोन टेप किया था. सूत्रों के मुताबिक महत्वपूर्ण लोगों की फोन टैपिंग के लिए अलग-अलग तीन मशीनें इस्तेमाल की जाती थी. एक मशीन का इस्तेमाल शराब माफिया के निवास पर होता था तो दूसरी मशीन सुपर सीएम के चिप्स को देखने वाले लोग करते थे जबकि तीसरी मशीन का संचालन रेखा के हाथों में था.

 

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रमन के इशारे पर साजिश रच रहे थे मुकेश गुप्ता और रजनेश

रायपुर. कुख्यात पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह पर कई बड़ी धाराओं के तहत मामला दर्ज होने के बाद छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है. प्रशासन और राजनीति के मूर्धन्य भूपेश सरकार की इस तगड़ी कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं. दरअसल पिछले पन्द्रह साल में मुकेश गुप्ता और सुपर सीएम अमन सिंह के बारे में एक आम धारणा बन गई थीं कि दुनिया की कोई भी ताकत इन दोनों का बाल बांका नहीं कर सकती, लेकिन भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री बनने के बाद यह साबित कर दिया कि कानून सबके लिए बराबर है. इधर छत्तीसगढ़ कांग्रेस की नेत्री और अधिवक्ता किरणमयी नायक ने एक बयान जारी कर पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को लपेटे में लिया है. उन्होंने रमन सिंह से यह जानना चाहा है कि बदलापुर-बदलापुर का राग आलापने वाले रमन सिंह को यह तो बताना ही चाहिए कि पन्द्रह सालों तक प्रशासनिक अफसरों, पत्रकारों और अन्य महत्वपूर्ण लोगों का फोन टेप कर उन्हें साजिश के तहत फंसाने वाले मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह के पीछे किसका दिमाग काम कर रहा था. किरणमयी ने कहा कि तमाम तरह के लोकतांत्रिक मूल्यों को दरकिनार कर पूर्व मुख्यमंत्री अपने चहेते अफसर मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह से साजिश के तहत काम करवा रहे थे. दोनों अफसर अवैध रुप से लोगों का फोन टेप कर राजनीति और प्रशासन से जुड़े लोगों को ब्लैकमेल करते थे.

उन्होंने कहा कि पिछले पंद्रह वर्षों में इस राज्य का बच्चा-बच्चा यह जानने लगा था कि छत्तीसगढ़ में मोबाइल फ़ोन पर बात करना सुरक्षित नहीं है. चाहे राजनीतिक दलों के लोग हों या अफसर ,पत्रकार ,सामाजिक कार्यकर्ता या मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से लेकर व्यापारी वर्ग तक इंटरनेट कॉलिंग में यकीन करने लगा था .चर्चा तो ये भी होती थी कि मुकेश गुप्ता या रजनीश सिंह जैसे अफसर अपने आकाओं के इशारे पर सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं और सरकार के मंत्रियों तक के फ़ोन कॉल्स अवैध रूप से सुनते थे .रमन सरकार ने हर स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों का ही हनन नहीं किया बल्कि नागरिकों की निजता के संवैधानिक अधिकारों पर भी हमला किया है.

 

 

 

 

 

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झमेले में फंस गए महंत

रायपुर. पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के हटने के बाद अब कांग्रेस में पहले जैसी सिर-फुटौव्वल वाली स्थिति नहीं है, बावजूद इसके वरिष्ठ नेता चरणदास महंत एक बेमतलब के झमेले में फंस गए हैं. झमेले में फंसने का यह मामला जाज्वल्य देव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक मेले से जुड़ा हुआ है. महंत इस कार्यक्रम में शिरकत करने गए थे कि अचानक वहां मौजूद मीडियाकर्मियों ने नारेबाजी प्रारंभ कर दी. मीडियाकर्मी जांजगीर-चांपा के मुख्यकार्यपालन अधिकारी को हटाने की मांग कर रहे थे. काफी देर तक नारेबाजी के बाद भी जब मामला शांत नहीं हुआ तो महंत ने नारेबाजी का निहितार्थ समझने की कोशिश की. पता चला कि मामला विज्ञापन से जुड़ा हुआ है. पिछले साल जब राज्य में रमन सिंह की सरकार थी तब छोटे-बड़े 42 अखबार और 13 न्यूज चैनल वालों को जाज्वल्य देव लोक महोत्सव का विज्ञापन दिया गया था. इस बार बजट पारित नहीं होने की वजह से मुख्य कार्यपालन अधिकारी केवल 17 अखबार और 9 न्यूज चैनल को विज्ञापन जारी किया. विज्ञापन से वंचित अखबार और चैनल वालों का गुस्सा भड़का तो महंत ने समझाया कि राज्य का बजट पारित होने के बाद वे स्वयं मुख्यमंत्री से आग्रह करेंगे... मामला शांत नहीं हुआ तो महंत को कहना पड़ा- जो महोत्सव में रहना चाहते हैं रहे और जिन्हें नहीं रहना है वे चले जाए... उनके इतना कहते ही मामले ने तूल पकड़ लिया और फिर उन्हें भी पत्रकारों के साथ खराब व्यवहार करने वाले नेताओं की श्रेणी में शामिल कर लिया गया. बुधवार को जब उन्होंने पहली बार विधानसभा का निरीक्षण करने के बाद पत्रकारों को संबोधित किया तो उनके चेहरे पर एक उदासी भी दिखाई दी. पत्रकारों के सारे सवालों का उन्होंने सिलसिलेवार जवाब दिया, लेकिन जाज्वल्य देव महोत्सव का सवाल वे टाल गए. अविभाजित मध्यप्रदेश हो या फिर छत्तीसगढ़... राजनीति में उन्हें देखने-समझने जानते हैं कि महंत बड़े से बड़े सवालों का जवाब बेहद शालीनता से देते रहे हैं. बुधवार को भी जब वे पत्रवार्ता लेने से पहले सभी पत्रकारों से निजी तौर पर मिलने पहुंचे तो पत्रकारों ने भी यह कहते हुए बधाई दी- अब लग रहा है कि हमारे विधानसभा अध्यक्ष सेठ नहीं है.

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मुकेश गुप्ता का जेल जाना तय... अमन सिंह पर भी होगी बड़ी कार्रवाई

रायपुर. भले ही पन्द्रह विधायकों का मुट्ठी भर विपक्ष कांग्रेस पर बदलापुर की राजनीति करने का आरोप लगा रहा है, लेकिन साजिश रचने वालों के खिलाफ लगातार धमाकेदार तरीके से की जा रही कार्रवाई ने भूपेश बघेल को एक दमदार और जानदार मुख्यमंत्री के रुप में स्थापित कर दिया है. हालांकि राजनीति के चंद अखबारी धुंरधरों, पंड़ितों और दलालों को भाजपाइयों-अफसरों पर की जा रही कार्रवाई नागवार गुजर रही है, लेकिन छत्तीसगढ़ को लूटतंत्र में बदलने वालों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई से आम छत्तीसगढ़िया खुश है. सामंती तौर-तरीके से पन्द्रह साल तक राज करने वाली पार्टी के लोग शायद ही कभी यह जान पाएंगे कि देशज का मतलब देशज ही होता है. बहरहाल छत्तीसगढ़ में पुलिसिया आतंक से परेशान होने वाले लोगों के लिए एक खुशखबरी है. खुशखबरी यह है कि आतंक का पर्याय समझे जाने वाले पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता पर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने धारा 166, 166 ए ( बी ), 167, 193, 194, 196, 201, 218, 466, 467, 471 और 120 बी के तहत मामला दर्ज कर लिया है. उनके साथ नारायणपुर के पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह पर भी इन्ही धाराओं के तहत प्रकरण पंजीबद्ध किया गया है. इन अफसरों पर जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है उसके बाद उनका जेल जाना तय माना जा रहा है. इन दोनों अफसरों पर एफआईआर के बाद सुपर सीएम अमन सिंह पर भी बड़ी कार्रवाई तय मानी जा रही है. फिलहाल अफसरों पर आरोप है कि उन्होंने नागरिक आपूर्ति निगम के प्रकरण की जांच के दौरान झूठा साक्ष्य गढ़ा, आपराधिक साजिश रचते हुए मामले में शामिल रसूखदार लोगों को बचाया और अवैध तरीके से फोन की टैपिंग की.

अमन सिंह पर भी होगी एफआईआर

इधर सूत्रो का दावा है कि रमन सिंह के प्रमुख सचिव रहे अमन कुमार सिंह पर भी जल्द ही एफआईआर दर्ज हो सकती है. फिलहाल तो उनके खिलाफ प्रधानमंत्री कार्यालय से राज्य सरकार को जांच के लिए भेजे गए पत्र के आधार पर जांच चल रही है. सरकार ने दिल्ली की निवासी विजया मिश्रा की शिकायत के बाद मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की है. खुद को देश का सबसे ताकतवर नौकरशाह बताने वाले अमन सिंह पर आरोप है कि उन्होंने आईआरएस से वीआरएस यानि स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने के बाद अपनी संविदा नियुक्ति के दौरान इस तथ्य को छिपाया था कि उनके खिलाफ कभी किसी तरह की कोई जांच लंबित नहीं है. विजया मिश्रा ने दावा किया है कि छत्तीसगढ़ में डेपुटेशन से पहले 2001-2002 में जब वे कस्टम एंड सेंट्रल एक्साइज डिपार्टमेंट बैंगलुरू में पदस्थ थे तब भ्रष्टाचार के एक मामले में उनके खिलाफ जांच की गई थी. उन्हें सीबीआई जांच की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था. सूत्रों का कहना है कि विजया मिश्रा की शिकायत के अलावा सरकार को उनके संबंध में कुछ अन्य सनसनीखेज शिकायतें भी हासिल हुई है. फिलहाल सरकार  सभी शिकायतों का परीक्षण करवा रही है.

वीरेंद्र पांड़े की शिकायत पर भी होगी जांच

भाजपा के पूर्व विधायक एवं वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र पांडे ने विवादित पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह के खिलाफ शिकायत दी है. उनकी शिकायत पर भी जांच प्रारंभ हो गई है.पांडे ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री को दस्तावेजों के साथ शिकायत सौंपकर यह जानकारी दी थी कि अगर कोई रिपोर्ट लिखवाना चाहे तो पुलिस  रेगुलेशन एक्ट के पैरा 710 और विधि की धारा 154 के तहत प्रथम सूचना दर्ज की जाती है, लेकिन अफसर मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह छत्तीसगढ़ के अफसरों और जनता को फर्जी मुकदमों का भय दिखाकर मामला दर्ज करते थे. पांडे  ने कई मामलों के उदाहरण देते हुए कहा कि आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने अपराध क्रमांक 53/ 2014 में प्रथम इत्तिला सूचना पृष्ठ क्रमांक 30, 31 एवं 32 तथा 34 में दर्ज की है. इसी तरह अपराध क्रमांग 54/ 2014 की प्रथम इत्तिला सूचना पृष्ठ क्रमांक 34, 35, 36 एवं 37 में दर्ज है. अपराध क्रमांक 55/ 2014 की प्रथम सूचना 38, 39, 40 एवं 41 नंबर के पेज में दर्ज है और अपराध क्रमांग 57/ 2014 की सूचना 42, 43, 44 एवं 45 में उल्लेखित है. महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अपराध क्रमांक 56/ 2014 को प्रथम इत्तिला पुस्तक के पेज नंबर 42, 43, 44, 45 में लेख किया जाना था, लेकिन विजय सिंह ठाकुर, गोविंदराम देवांगन, अबरार बेग, बीडीएस नरबरिया जिनके पास से करोड़ों रुपए की संपत्ति जप्त की गई थीं के खिलाफ प्रथम इत्तिला पुस्तक के बजाय कम्प्यूटर में फर्जी  एफआईआर दर्ज की गई. जब इन लोगों से रिश्वत प्राप्त कर ली गई और कम्प्यूटर के सादे कागज की फर्जी एफआईआर फाड़ दी गई और एक इंजीनियर आलोक अग्रवाल के खिलाफ प्रथम इत्तिला पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 43, 44 एवं 45 में लेख कर दिया गया. पांडे का कहना है कि अपराध क्रमांक 5/ 2015 की जानकारी प्रथम इत्तिला पुस्तक में दर्ज नहीं है. इसे कम्प्यूटर में सादे कागज में लेख किया गया है. इंजीनियर आलोक अग्रवाल से मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह ने रिश्वत की मांग की. जब उसने देने से मना कर दिया तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी गई. अबरार बेग, गोविंद राय, विजय सिंह ठाकुर, गोविंदराम देवांगन, बीड़ीएस नरबरिया जैसे लोग जिनके पास से करोड़ों रुपए बरामद हुए थे उनसे रिश्वत लेकर कम्प्यूटर में लिखी गई शिकायत फाड़ दी गई. पांडे ने मुख्यमंत्री को अपने आरोपों की पुष्टि के लिए और भी कई तरह के प्रकरणों के उदाहरण दिए. पांडे ने कहा कि मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह सांठगांठ कर अफसरों और अन्य लोगों के घरों पर छापामार कार्रवाई करते थे. उनकी हर कार्रवाई कानून सम्मत न होकर कूटरचित होती थीं.

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रिश्वत लेकर एफआईआर फाड़ देते थे मुकेश गुप्ता... वीरेंद्र पांडे ने सौंपी सीएम को शिकायत

रायपुर. पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह कांग्रेस सरकार पर बदलापुर-बदलापुर का राग आलापते हुए बदले की राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन दिनों रमन सरकार के पन्द्रह सालों में हुए घोटालों की जांच की मांग भाजपाई ही कर रहे हैं. पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर, भाजपा के प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास के बाद शुक्रवार को भाजपा के पूर्व विधायक एवं वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र पांडे ने विवादित पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह के खिलाफ शिकायत सौंपी है. अपनी शिकायत में पांडे ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं. पांडे का आरोप है कि मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह कम्प्यूटर पर भी एफआईआर लिखते थे और तगड़ा माल देने वालों की एफआईआर फाड़ दी जाती थीं.

दस्तावेजों के साथ सौंपी शिकायत

पांडे ने मुख्यमंत्री को दस्तावेजों के साथ शिकायत सौंपकर दोनों अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. सिलसिलेवार जानकारी देते हुए पांडे ने कहा कि अगर कोई रिपोर्ट लिखवाना चाहे तो पुलिस  रेगुलेशन एक्ट के पैरा 710 और विधि की धारा 154 के तहत प्रथम सूचना दर्ज की जाती है, लेकिन अफसर मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह छत्तीसगढ़ के अफसरों और जनता को फर्जी मुकदमों का भय दिखाकर मामला दर्ज करते थे. पांडे  ने कई मामलों के उदाहरण देते हुए कहा कि आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने अपराध क्रमांक 53/ 2014 में प्रथम इत्तिला सूचना पृष्ठ क्रमांक 30, 31 एवं 32 तथा 34 में दर्ज की है. इसी तरह अपराध क्रमांग 54/ 2014 की प्रथम इत्तिला सूचना पृष्ठ क्रमांक 34, 35, 36 एवं 37 में दर्ज है. अपराध क्रमांक 55/ 2014 की प्रथम सूचना 38, 39, 40 एवं 41 नंबर के पेज में दर्ज है और अपराध क्रमांग 57/ 2014 की सूचना 42, 43, 44 एवं 45 में उल्लेखित है. महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अपराध क्रमांक 56/ 2014 को प्रथम इत्तिला पुस्तक के पेज नंबर 42, 43, 44, 45 में लेख किया जाना था, लेकिन विजय सिंह ठाकुर, गोविंदराम देवांगन, अबरार बेग, बीडीएस नरबरिया जिनके पास से करोड़ों रुपए की संपत्ति जप्त की गई थीं के खिलाफ प्रथम इत्तिला पुस्तक के बजाय कम्प्यूटर में फर्जी  एफआईआर दर्ज की गई. जब इन लोगों से रिश्वत प्राप्त कर ली गई और कम्प्यूटर के सादे कागज की फर्जी एफआईआर फाड़ दी गई और एक इंजीनियर आलोक अग्रवाल के खिलाफ प्रथम इत्तिला पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 43, 44 एवं 45 में लेख कर दिया गया. पांडे ने कहा कि अपराध क्रमांक 5/ 2015 की जानकारी प्रथम इत्तिला पुस्तक में दर्ज नहीं है. इसे कम्प्यूटर में सादे कागज में लेख किया गया है. इंजीनियर आलोक अग्रवाल से मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह ने रिश्वत की मांग की. जब उसने देने से मना कर दिया तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी गई. अबरार बेग, गोविंद राय, विजय सिंह ठाकुर, गोविंदराम देवांगन, बीड़ीएस नरबरिया जैसे लोग जिनके पास से करोड़ों रुपए बरामद हुए थे उनसे रिश्वत लेकर कम्प्यूटर में लिखी गई शिकायत फाड़ दी गई. पांडे ने मुख्यमंत्री को अपने आरोपों की पुष्टि के लिए और भी कई तरह के प्रकरणों के उदाहरण दिए. पांडे ने कहा कि मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह सांठगांठ कर अफसरों और अन्य लोगों के घरों पर छापामार कार्रवाई करते थे. उनकी हर कार्रवाई कानून सम्मत न होकर कूटरचित होती थीं. पांडे  ने कहा कि अगर उनके आरोपों की एफएसएल से परीक्षण कराया जाएगा तो मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह को जेल जाने से कोई नहीं रोक पाएगा. पांडे के शिकायत के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पुलिस महानिदेशक को जांच करने का निर्देश दिया है.

 

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जिन्हें होना चाहिए जेल में वे घूम रहे हैं निज सचिव बनने के लिए

रायपुर. भाजपा शासनकाल में लोग मंत्रियों का निज सचिव बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया करते थे. कमोबेश यही स्थिति अब भी बरकरार है. हालांकि नई सरकार के मंत्री देख-समझकर निज सचिवों की नियुक्ति कर रहे हैं बावजूद इसके उठापटक बंद नहीं हुई है. खबर है कि समाज कल्याण विभाग के कतिपय अफसर और सेवानिवृत कर्मचारी सबसे ज्यादा जोड़-तोड़ में लगे हुए हैं.

विभाग के एक सेवानिवृत अफसर मिश्रीलाल पर काफी समय पहले आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने छापामार कार्रवाई की थी और लंबी-चौड़ी संपत्ति का पता लगाया था. इस अफसर के खिलाफ अब तक चालान पेश नहीं किया है. यह अफसर इन दिनों एक मंत्री के निवास पर नियमित रुप से देखा जा रहा है. विभाग में अशोक तिवारी नाम का एक ऐसा कर्मचारी भी कार्यरत था जिस पर करोड़ों रुपए के गबन का आरोप लग चुका है. गौरतलब है कि इस शख्स ने दृष्टि- श्रवण एवं अस्थि बाधित शासकीय विद्यालय में अपनी पदस्थापना के दौरान कई तरह की गड़बड़ियों को अंजाम दिया था. एक गंभीर शिकायत के बाद विभाग के अवर सचिव पी श्रीवास्तव ने अशोक तिवारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कठोर कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे, लेकिन इस कर्मचारी की रिपोर्ट लिखवाना तो दूर उल्टे कर्मचारी को पद्दोन्नति देकर सेवानिवृत कर दिया गया.यह कर्मचारी भी एक मंत्री के आगे-पीछे घूम रहा है. विभाग में और भी कई ऐसे अफसर और कर्मचारी है जिन पर दिव्यांगों के पैसों को हड़पने का आरोप लगता रहा है. अफसरों की लूटमारी को संरक्षण देने के लिए विभाग में पदस्थ किए गए हर संचालक पर भी शक की सुई घूमती रही है. फिलहाल विभाग कई कर्मचारी और अफसर बरसों से एक ही जगह पर जमे हुए हैं और आर्थिक गड़बड़ियों को अंजाम देने में लगे हुए हैं.

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सुपर सीएम के चहेते सुनील मिश्रा लगे गोटी बिठाने में

रायपुर. भारतीय वन सेवा 1994 बैच के अफसर सुनील मिश्रा का नाम कभी चूल्हा कांड में आया था. जैसा कि भाजपा की सरकार में वन अफसरों को महत्वपूर्ण और मलाईदार विभागों में पदस्थ करने की परम्परा रही है सो वे भी जल्द ही सीएसआईडीसी के प्रबंध संचालक बना दिए गए. चार साल से अधिक समय तक पदस्थ रहने के दौरान उन्होंने निवेशकों को आकर्षित करने के नाम पर धुंआधार विदेश यात्राएं की, मगर उसका कोई फायदा छत्तीसगढ़ को मिला हो ऐसा नजर नहीं आया.अब सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सामाजिक कार्यकर्ता यह जानने में जुटे हैं कि उन्होंने मंत्रियों और अन्य अफसरों के साथ कहां-कहां की यात्रा की. कुल कितने करोड़ रुपए फूंके और यात्राओं के बाद कौन सी अध्ययन रिपोर्ट तैयार की गई. बहरहाल उनकी चर्चा यहां इसलिए भी हो रही है क्योंकि जब भूपेश बघेल ने वन अफसरों की घर वापसी का अभियान चलाया तो विवादों में घिरे रहने वाले  अनिल राय, अरुण प्रसाद के साथ-साथ वे भी बच निकले. अभी वे एक बार फिर सुर्खियों में हैं. हाल के दिनों में उनके करीबी मनीष कश्यप को दुर्ग का क्षेत्रीय अधिकारी बना दिया गया है. कश्यप की इस पदस्थापना के साथ ही यह भी कहा जाने लगा कि पर्यावरण संरक्षण मंडल में अब भी सुपर सीएम का दिमाग काम कर रहा है.

चंद रोज पहले जब नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई तब सुपर सीएम का सुपर कम्प्यूटर घोटाला उजागर हुआ था. ऊर्जा और पर्यावरण विभाग से सुपर सीएम का अति प्रेम भी किसी से छिपा नहीं है. यहां यह बताना जरूरी है कि जब सुपर सीएम पर्यावरण संरक्षण मंडल का कामकाज देखते थे तब नियमित रुप से छत्तीसगढ़ के भयभीत रहने वाले अखबारों में यह खबर प्रकाशित होती थी उनकी अगुवाई में प्रदूषण का स्तर घट गया है. हकीकत यह थी प्रदूषण कभी घटा ही नहीं था. कल-कारखानों और भारी-भरकम वाहनों का प्रदूषण तो व्याप्त था ही उसके कहीं ज्यादा  प्रदूषण छत्तीसगढ़ की राजनीति में पसर गया था. बहरहाल जिस मनीष कश्यप का जिक्र इस खबर में हुआ है उनके बारे में इतना ही बताना काफी है कि उन्हें सुपर सीएम ने सेवा भर्ती नियमों के प्रावधानों से विपरीत जाकर कार्यपालन अभियंता से अधीक्षण अभियंता बना दिया था. नियमानुसार अधीक्षण अभियंता बनने के लिए पांच साल का अनुभव ( कार्यपालन अभियंता बने रहने का ) चाहिए है, लेकिन कश्यप महज दो साल ही कार्यपालन अभियंता रहे और अधीक्षण अभियंता बनने में कामयाब हो गए. इस बारे मे पर्यावरण संरक्षण मंडल के सदस्य सचिव सुनील मिश्रा से जब सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सारी कार्रवाई मंत्री के स्तर पर हुई है. मंत्री ही चाहते थे तो मैं क्या कर सकता हूं. सीएसआईडीसी में पदस्थापना के दौरान की गई विदेश यात्राओं और उसके निचोड़ को लेकर सुनील मिश्रा ने कहा कि उन्होंने जो कुछ भी श्रेष्ठ किया है उसका लेखा-जोखा सीएसआईडीसी में मौजूद है.

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