बड़ी खबर

वन मंडई, विकास यात्रा और बोनस तिहार के नाम पर फूंक दिए करोड़ों

राजकुमार सोनी

रायपुर. भले ही पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह खिसयानी बिल्ली खंबा नोचे मुहावरे को चरितार्थ करते हुए नई सरकार की हर जांच पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन हकीकत यह भी है गत पन्द्रह सालों में नौकरशाहों ने प्रदेश को लूटतंत्र के एक बड़े ठिकाने में तब्दील कर रखा था. जनता के गाढ़े खून-पसीने की कमाई पर सरकारी और गैर सरकारी डकैती का आलम यह रहा है कि अब हर विभाग से नाना प्रकार की गड़बड़ियां सामने आ रही है. यदि नई सरकार विभाग के हर सेक्शन की हर फाइल की भी जांच करना चाहेगी तो जांच कम पड़ जाएंगी. अफसरों ने छत्तीसगढ़ को जिस बुरी तरह से लूटा-खसोटा और निचोड़ा है कि आंखे फटी रह जाती है. तरह-तरह की लूट-खसोट में  माहिर अफसर अब भी मलाई छानने के काम में लगे हुए हैं. हाल के दिनों में राज्य लघु वनोपज संघ में एक गड़बड़ी पकड़ में आई है. यह गड़बड़ी भी जनसंपर्क विभाग की गड़बड़ी से मिलती-जुलती है. जिस तरह से जनसंपर्क विभाग के आयुक्त राजेश टोप्पो ने निजी फर्मों को रमन सिंह के चेहरे पर फेयर एंड लवली चुपड़ने का ठेका दे रखा था ठीक उसी तर्ज पर राज्य लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक मुदित कुमार सिंह वन विभाग के कई डिवीजन को आदेशित कर रखा था कि साहब ( रमन सिंह की ) सवारी जब भी आएंगी तो जमकर स्वागत-सत्कार होना चाहिए. अब स्वागत-सत्कार के चक्कर में वन समितियों में पदस्थ अफसरों ने तेंदूपत्ते की बिक्री के उस हिस्से फूंक डाला जिसे खर्च करने का उन्हें अधिकार नहीं था.

यह है पूरा मामला

प्रदेश में बड़े पैमाने पर तेंदूपत्ते की नीलामी होती है. तेंदूपत्ते के ठेकेदार जिस ढंग से भी ठेका लेते हैं उसका भुगतान वे क्रमशः चार टर्म में करते हैं. नियमानुसार तेंदूपत्ते की बिक्री के शुद्ध लाभ 80 फीसदी पैसा संग्राहकों को बोनस के तौर पर दिया जाता है. शेष 20 फीसदी राशि में से पांच फीसदी धनराशि उन समितियों पर खर्च की जाती है जो घाटे में चल रही होती है. शेष 15 फीसदी धन अराष्ट्रीयकृत वनोपज के संग्रहण और प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए खर्च किया जाता है. यहां तक ठेकेदार जो चार बार राज्य लघु वनोपज संघ को भुगतान करते हैं उससे मिलने वाला ब्याज भी वनोपज के संग्रहण और प्रसंस्करण को बढ़ावा देने में खर्च होता है. वनोपज संघ के नियमों में यह साफ है कि तेंदूपत्ते के शुद्ध लाभ की राशि का किसी अन्य मद में उपयोग नहीं होगा, लेकिन मुदित कुमार सिंह के आदेश के बाद विभिन्न वन समितियों में पदस्थ अफसरों ने कहीं वन मंडई के नाम पर पैसे फूंके तो कहीं विकास यात्रा के नाम पर तो कहीं बोनस तिहार को लेकर.

नहीं लिया संचालक मंडल से अनुमोदन

तेंदूपत्ते की बिक्री के शुद्ध लाभ में से 15 फीसदी धन के दुरपयोग के मामले का खुलासा तब हुआ जब वनसमितियों के प्रबंध संचालकों ने बकाया भुगतान लेकर राज्य वनोपज संघ को पत्र लिखा. अभी हाल के दिनों में भानुप्रतापपुर ( पूर्व ) के प्रबंध संचालक पत्र लिखकर बकाया राशि मांगी है. पत्र में लिखा गया है कि चार दिसम्बर 2017 को अंतागढ़ में बोनस तिहार मनाया गया था. इस तिहार में वाहन की व्यवस्था में पांच लाख 12 हजार पांच सौ रुपए, पेट्रोल-डीजल में  चार लाख 72 हजार पांच सौ, टेंट-पंडाल, माइक एवं बैठक व्यवस्था में नौ लाख रुपए, चायपानी- भोजन व्यवस्था में सात लाख 36 हजार 250 रुपए, बैनर और फ्लैक्स दो लाख 80 हजार एवं नाच-गाने में 35 हजार रुपए का खर्च किया हुआ है. समिति ने लिखा है कि कुल 29 लाख 36 हजार 250 रुपए का खर्च हुआ है. अब तक 17 लाख 95 हजार 494 रुपए खर्च हो गए हैं,  शेष 11 लाख 40 हजार सात सौ छप्पन रुपए का भुगतान बकाया है. यह तो एक वनमंडल का मामला है. ऐसे कई वन मंडलों से पैसों तकादे के लिए खत आ रहे हैं.  खबर है कि रायपुर वन मंडल का भी दो से ढाई करोड़ का भुगतान बकाया है जो वन मंडई से संबंधित है. सूत्रों का कहना है कि कई वनमंडलों में 15 फीसदी धनराशि से गाड़ियों की खरीदी कर ली गई. कुछ वनमंडलों ने ऐसे हाइब्रिड पौधों की खरीदी जिसकी आवश्यकता नहीं थीं. नियमानुसार सारे खर्चों के लिए राज्य लघु वनोपज संघ के संचालक मंडल से भी अनुमोदन प्राप्त करना था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. वन अफसर मुदित कुमार ने ऐसा क्यों किया... इस बारे में उनका पक्ष जानने के लिए दूरभाष पर संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया. अपर मुख्य सचिव सीके खेतान ने कहा कि वे अभी दिल्ली प्रवास पर है, सो लौटकर ही बता पाएंगे. लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक राकेश चतुर्वेदी ने कहा कि वे पूरे मामले को दिखवा लेंगे. यहां यह बताना लाजिमी है कि मुदित कुमार वे अफसर है जिनका नाम कई तरह के कोल ब्लाक को क्लीरेंस दिलाने के विवाद से जुड़ता रहा है. भू-प्रबंधन मामलों की देख-रेख की वजह से उनका नाम तब भी उछला था जब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल ( अब मुख्यमंत्री )  ने भैंसा कन्हार और आरीडोंगरी में अवैध खनन का मामला उठाया था. इधर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुशील ओझा का आरोप है कि मुदित कुमार पूर्व सीएम और सुपर सीएम के सबसे ज्यादा विश्वासपात्र रहे हैं. वे अपनी पदस्थापना के दौरान राजकीय कोष को नुकसान पहुंचाने का काम ही करते रहे हैं. ओझा का आरोप है कि नई सरकार के गठन के बाद भी मुदित कुमार इधर-उधर चक्कर काटकर अपनी जुगत बिठाने के खेल में जुटे हुए हैं, वे अब भी पूर्व सरकार के सुपर सीएम के संपर्क में हैं. ओझा ने उनके कार्यकाल और संपत्ति की जांच की मांग की है. करोड़ों के इस खेल की सच्चाई जानने में जुटे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारियां भी मांगी है. 

 

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शराब के समुंद्र में गोता लगाने वाले समुंद्र सिंह को गिरफ्तार करने की मांग

रायपुर. रमन सिंह की सरकार में नौ साल तक शराब के समुंद्र में गोता लगाकर ठेकेदारों को अरबपति बनाने और सरकार को चूना लगाने वाले समुंद्र सिंह को गिरफ्तार करने की मांग उठी है. जनता कांग्रेस के प्रवक्ता नितिन भंसाली का आरोप है कि समुंद्र सिंह ने शराब ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए सारे नियम- कानून ताक पर रख दिए थे. शराब की बिक्री पर 50 से 60 तक प्रॉफिट मार्जिन यानि लाभ दिया गया जो कि अन्य राज्यों की तुलना में बेहद ज्यादा था. उल्लेखनीय है कि भाजपा के शासनकाल में शराब के मूल्य निर्धारण का कोई मापदंड नही था. एक दुकान में शराब का रेट अलग था तो दूसरी दुकान में अलग रेट. अलग-अलग दर पर बिक्री का लाभ सीधे तौर पर समुंद्र सिंह को मिलता था. लोकल ब्रांड की शराब बिना मापदंडों के परीक्षण के मनमाने तरीके से इंडियन मेड फारेन लिकर की श्रेणी में रख दी जाती थीं और स्थानीय स्तर पर निर्मित होने वाली शराब की बिक्री महंगे दर पर की जाती थी.

नौकरों को भी दिलवाई शराब दुकानें

भंसाली ने बताया कि वर्ष 2012 से वर्ष 2017 तक शराब दुकानों का आवंटन लॉटरी के माध्यम से होता था जिसका लाभ शराब ठेकेदारों ने उठाया. ठेकेदारों ने रामलाल, श्यामलाल, मांगीलाल जैसे नौकरों को भी दुकानें दिलवाई. इस खेल में समुंद्र सिंह की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थीं. जिन नौकरों ने दुकानें हासिल की उनका टर्न ओवर करोड़ों में बताया गया जिसका एक रुपया भी आयकर विभाग को नहीं चुकाया गया. हकीकत यह थी कि जिन लोगों के नाम पर दुकानें आवंटित थीं खुद उन्हें ही यह नहीं पता था कि वे अरबपति है. भंसाली ने कहा कि फिलहाल समुंद्र सिंह अंडर ग्राउंड हो गए हैं, लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर उनसे कड़ी पूछताछ होनी चाहिए. भंसाली ने कहा कि समुंद्र सिंह को लगभग पांच हजार करोड़ से अधिक का गड़बड़झाला किया है. उनकी धरपकड़ से कई और चेहरे बेनकाब होंगे.

 

 

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सावधान..होशियार... आबकारी महकमा ढूंढ रहा है समुंद्र सिंह को

रायपुर. छत्तीसगढ़ में अब से दो महीने पहले तक चपरासी से लेकर अफसर का सिंह होना अनिवार्य था. कह सकते हैं कि सिंह लॉबी काफी हावी थीं. इस लॉबी में आबकारी महकमे में संविदा में लगभग नौ साल से तैनात विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी समुंद्र सिंह का नाम भी शामिल था. लेकिन जैसी ही सरकार बदली समुंद्र सिंह ने इस्तीफा दे दिया और अब किसी अज्ञात स्थान पर चले गए हैं. इधर  आबकारी महकमा समुंद्र सिंह की तलाश कर रहा है. वजह यह है कि समुंद्र सिंह को नौकरी से इस्तीफा से देने से पहले नोटिस देना था कि वे अब नौकरी नहीं कर सकते. उन्हें एक महीने की तनख्वाह भी जमा करनी थीं. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और अचानक-भयानक ढंग से गायब हो गए. नियमानुसार अब आबकारी महकमा उनके विधायक कालोनी स्थित 36 नंबर के मकान पर नोटिस चस्पा करने के लिए चक्कर काट रहा है. आबकारी विभाग के आयुक्त कमलप्रीत ने बताया कि समुंद्र सिंह के नाम पर नोटिस जारी किया गया है, लेकिन वे मिल नहीं रहे हैं. यहां तक उनका फोन नंबर भी बंद है.

छत्तीसगढ़ में पूर्ववर्ती सरकार ने शराब ठेके की नीलामी को बंद कर सरकारी दुकान को खोलने का जो निर्णय लिया था उसके पीछे समुंद्र सिंह की ही भूमिका मानी जाती है. आबकारी विभाग की सूत्रों की मानें तो शराब दुकानों के सरकारीकरण के बाद समुंद्र सिंह का ओहदा काफी बढ़ गया था. उन पर यह आरोप भी लगता रहा है कि वे एक शराब माफिया के बेहद करीबी थे और उस माफिया के इशारे पर यह तय करते थे कि किस शराब दुकान में कौन सी ब्रांड बेची जाएंगी. पूर्व आबकारी मंत्री अमर अग्रवाल करीबी समझे जाने वाले समुंद्र सिंह पर यह भी आरोप भी लगा कि संविदा में रहने के दौरान उन्होंने कई ऐसे लोगों को लाभ पहुंचाया जो न तो शराब के क्रेता थे और न ही विक्रेता. जब ठेका पद्धति लागू थीं तब रामलाल-श्यामलाल सहित अन्य कई लोग शराब दुकान का ठेका पाने में सफल हो गए थे. इधर जनता कांग्रेस के प्रवक्ता नितिन भंसाली का कहना है कि समुंद्र सिंह भले ही कहीं जाकर छिप गए हों, लेकिन उन्हें खोजकर पूछताछ जरूरी है. भंसाली का आरोप है कि समुंद्र सिंह ने संविदा में पदस्थ रहने के दौरान कम से कम पांच हजार करोड़ का घोटाला किया है. भंसाली ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से समुंद्र सिंह के प्रत्येक कारनामों के जांच की मांग भी की है.

 

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वन खेल में बड़ा खेल... रमन का चहेता श्री निवास राव फिर आरोपों के घेरे में

रायपुर.पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के बेहद करीबी और खास माने जाने वाले भारतीय वन सेवा के अफसर श्री निवास राव एक बार फिर आरोपों से घिर गए हैं. उन पर राष्ट्रीय वन खेलों के लिए ब्रांडेड कंपनियों के नाम पर नकली ट्रेक सूट, टीशर्ट, जूते तथा अन्य खेल सामाग्री खरीदने का आरोप लगा है. सामाजिक कार्यकर्ता कुणाल शुक्ला ने शनिवार को एक आडियो जारी किया है जिसमें एक शख्स उन्हें यह जानकारी दे रहा है कि वन अफसर राव ने एडिडास जैसी नामी के नाम पर नकली ट्रेक सूट खरीद लिया है. बातचीत से यह भी पता चलता है कि खेल के आयोजन के लिए साढ़े तीन सौ इनोवा और साढ़े चार सौ बसें चलाई गई और बगैर टेंडर के ढ़ाई सौ अफसरों के लिए बैलेजर बनवा लिया गया. आडियो में यह जानकारी भी है कि प्रत्येक खिलाड़ी की भोजन की थाली का रेट 12 सौ रुपए निर्धारित किया गया है और इसका ठेका भी अफसर ने अपने किसी खास को दे दिया है.

कुणाल शुक्ला का कहना है कि 13 दिसम्बर को भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं ली थीं और न ही मंत्रिमंडल का गठन हुआ था, लेकिन रमन के कार्यकाल में अवैध तौर-तरीकों से पैसा कमाने वाले अफसर ने इसी तिथि को एक कंपनी को खेल सामानों की सप्लाई का ठेका दे दिया. निविदा में अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के लिए नाइक, रिबॉक, लोट्टो जैसी कंपनियों से रेट भी आमंत्रित करने थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. गौरतलब है कि श्री निवास राव जहां कही भी पदस्थ रहे हैं वहां विवादित रहे हैं. जब वे दुर्ग में पदस्थ थे तब सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल करीम ने उन पर नियम-प्रावधानों से हटकर अनावश्यक बजट खर्च करने का आरोप लगाया था. उनके बारे में यह भी कहा गया था कि वे भ्रष्टाचार में लिप्त रेजरों को मनमाफिक पदस्थापना देते रहे हैं. उनकी बस्तर की पदस्थापना भी कई कारणों से सुर्खियों में रही है. कहा जाता है कि ठीक चुनाव के पहले वन मंत्री महेश गागड़ा उन्हें बस्तर ले गए थे ताकि वे तेंदूपत्ता के सरहदी बिचौलियों को लाभ दिलाकर चुनाव के लिए फंड़ की व्यवस्था कर सकें. उन पर सामाजिक वानिकी जगदलपुर, सुकमा, दंतेवाड़ा व बस्तर वन मंडल में अरबों के कागजी कार्य कराए जाने का आरोप भी लगता रहा है. एक बड़ा आरोप कोंडागांव के विधायक मोहन मरकाम ने भी लगाया था. राव के कार्यकाल में ही वन विभाग ने क्लोनल नीलगिरी की पौधों की खरीदी थीं. सामान्य तौर पर नीलगिरी का एक पौधा आठ रुपए में मिल जाता है, लेकिन विभाग ने उसे 732 रुपए में खरीदा था. पौधों को बेचने का काम नागपुर की फर्म सापरा इंटरनेशनल वेयर हाउस एंड लाजिस्टिक प्राइवेट लिमिटेड ने किया था

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सेक्स सीडी कांड में जिसका नाम उछला वह अफसर घूम रहा है रमन सिंह के साथ

रायपुर. एक मंत्री की कथित सेक्स सीडी मामले में छत्तीसगढ़ में पदस्थ रहे विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी अरुण बिसेन का नाम भी जोरदार ढंग से उछला है, लेकिन इस अफसर को इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ देखा जा रहा है. अभी हाल के दिनों में इस अफसर को विधानसभा परिसर में भी देखा गया.

गौरतलब है कि जब सन स्टार टीवी ने जनसंपर्क आयुक्त राजेश टोप्पो का स्टिंग आपरेशन किया तब वे यह कहते हुए पाए गए थे – अमन सिंह साहब का फोन आया था. वे बोल रहे थे कि बिसेन काम को संभाल नहीं पा रहा है तो तुम संभालो. राजेश टोप्पो के इस कथन के बाद ही पत्रकारों की दूसरी खेप को बैंकाक-पटाया ले जाकर सेक्स सीडी बनाने की योजना बनाई गई थीं.हालांकि पहली खेप में 10-12 पत्रकार बैंकाक-पटाया जा चुके थे जिनके बारे में अब भी यह बात हवा में तैर रही है कि वे स्टिंग आपरेशन के शिकार हो चुके हैं.

इधर हाल के दिनों में सीडी कांड के एक आरोपी कैलाश मुरारका ने कोर्ट में शपथ पत्र देकर कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री को काफी पहले से पता था कि उनकी मंत्रियों की गंदी सीडी बनाने का खेल चल रहा है. मुरारका का कहना है कि सीएम हाउस से मिले निर्देश के बाद वह मुंबई गया था तब उसे रिंकू खनूजा ने एक आडियों दिया था. इस आडियो में उद्योगपति सुरेश गोयल और किसी लवली खनूजा के बीच लेन-देन का जिक्र है. मुरारका के मुताबिक उसने आडियो की बात ओएसडी अरुण बिसेन को भी बताई थीं, लेकिन बिसेन ने विश्वास नहीं किया और 24 अगस्त 2017 को मुंबई के होटल सहारा में एक अन्य सदस्य के साथ उससे मुलाकात की थीं. वैसे सीबीआई ने जो चालान पेश किया है उसमें एक जगह अरुण बिसेन ने यह स्वीकार किया है कि वह मुरारका को जानता है. बिसेन के  पूर्व मुख्यमंत्री के साथ घूमने और साथ दिखने पर कई तरह की बातें इसलिए भी हो रही है क्योंकि कुछ समय पहले ही पूर्व मुख्यमंत्री ने यह सवाल उठाया था कि कांग्रेस शुचिता की बात करती है, लेकिन जिस अफसर की जमानत याचिका खारिज हो गई है वह सीएम हाउस के आसपास घूमता है और उसके आवेदन पर सरकार एसआईटी का गठन कर देती है. राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि शुचिता की राजनीति के लिए प्रतिबद्ध रहने वाले पूर्व मुख्यमंत्री को अपने आसपास ऐसे व्यक्ति को फटकने नहीं देना चाहिए जिन पर गंभीर किस्म के आरोप लग रहे हो. वैसे गौर करने वाली बात यह भी है कि प्रमुख सचिव रहे अमन सिंह पर आदिवासी नेता ननकीराम सहित  कई जिम्मेदार लोगों ने गंभीर आरोप लगाए हैं. भाजपा के एक बड़े नेता ने उन्हें सुपर सीएम की उपाधि से भी नवाजा है. अमन सिंह पर लगे आरोपों के बाद पूर्व मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक जगहों पर उनके साथ अपनी उपस्थिति बंद कर दी है.

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रमन की छलांग ऊंची या...

रायपुर. डाक्टर रमन सिंह जब मुख्यमंत्री थे तब अपने इंटरव्यूह में अक्सर कहा करते थे कि छत्तीसगढ़ ने खुद को गढ़ने के मामले में ऊंची छलांग लगा ली है. इधर 10 जनवरी को पूर्व मुख्यमंत्री को केंद्रीय संगठन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया है. हालांकि विरोधी इसे जिम्मेदारी से पृथक एक बेहद सामान्य सा पद मानते हैं, लेकिन राजनीति के जानकारों का कहना है कि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने का मतलब एक न एक दिन अध्यक्ष अमित शाह के लिए खतरा बन जाना है, इसलिए रमन का उपाध्यक्ष बन जाना भी ऊंची छलांग लगा लेने से कम नहीं है.

 

अब चमत्कार की उम्मीद

रमन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनते ही भाजपा के एक बड़े खेमे में हलचल प्रारंभ हो गई है. एक खेमा उन्हें छत्तीसगढ़ की सियासत से दूर होता देखकर खुश है. रमन विरोधी खेमे का कहना है कि जो शख्य पन्द्रह साल तक मुख्यमंत्री था और तब भी पार्टी पन्द्रह सीटों पर आकर सिमट गई तो उनका प्रदेश से दूर चले जाना ही बेहतर है जबकि एक दूसरे खेमे का कहना है कि छत्तीसगढ़ के मामलों में उनका दखल जरुरत से ज्यादा बढ़ जाएगा. विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण से लेकर नेता प्रतिपक्ष के चयन के दौरान उनकी राय को महत्व दिया गया है सो लोकसभा चुनाव में भी उनकी हर बात मानी जाएगी. हालांकि विरोधी खेमा यह भी कहता है कि इस बार रमन सिंह को राजनांदगांव से, उनके पुत्र और उनकी पुत्री को कहीं न कहीं से लोकसभा का चुनाव अवश्य लड़ना चाहिए तभी केंद्रीय नेतृत्व उनके घटते हुए असली जनाधार से वाकिफ हो सकेगा. अभी तो केंद्रीय नेतृत्व उन्हें बड़ा नाम और बड़ा चेहरा मानता है जबकि हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ का हर वर्ग उन्हें खारिज कर चुका है.

लूप लाइन में रमन

भाजपा के पूर्व विधायक एवं वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र पांडे संगठन में उपाध्यक्ष के पद को पुलिस लाइन में तैनाती जैसा मामला मानते हैं. वे कहते हैं- भाजपा नेत्री सरोज पांडे राष्ट्रीय महासचिव है. जिम्मेदारी के हिसाब से यह पद ज्यादा बड़ा और महत्वपूर्ण है. सरोज के पास कई राज्यों का प्रभार भी है. इसी तरह रामविचार नेताम जो अनुसूचित जनजाति मोर्चा के अध्यक्ष भी है वे ज्यादा पावरफुल है. अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष नंदकुमार साय की तैनाती भी उपयोगी है. वीरेंद्र पांडे आगे कहते हैं- संगठन में महामंत्री के पद का महत्व होता है. केंद्र में संगठन महामंत्री रामलाल पावरफुल है तो छत्तीसगढ़ में सह-संगठन मंत्री सौदान सिंह. इधर खबर है कि छत्तीसगढ़ के कोटे से मूल रुप से रीवा के रहने वाले गौरव तिवारी युवा मोर्चा के मंत्री बनने में सफल हो गए थे. इधर हार के बाद धरम कौशिक को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने बाद भी उथल-पुथल मची हुई है.

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ननकी ने खोला रमन के चहेते अफसरों के खिलाफ मोर्चा

राजकुमार सोनी

रायपुर. बुधवार को जब पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह सदन के भीतर और बाहर सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाए गए प्रावधानों का हवाला देकर पूर्व डीजीपी एएन उपाध्याय को हटाने जाने को लेकर सवाल खड़े कर रहे थे तब उनकी ही पार्टी के विधायक और पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को एक शिकायती पत्र सौंपकर यह बताने में लगे थे कि कैसे रमन के चहेते अफसर मुकेश गुप्ता ने अपनी पत्नी मिक्की मेहता को मौत के घाट उतारा था और डीजी रहे एएन उपाध्याय तथा संविदा में पदस्थ अफसर अमन सिंह ने  मुकेश गुप्ता को संरक्षण प्रदान कर रखा था.

पूर्व गृहमंत्री ने बुधवार को रमन सिंह के तीन चहेते अफसर मुकेश गुप्ता, एएन उपाध्याय और अमन सिंह को जबरदस्त ढंग से लपेटा. कंवर ने मुख्यमंत्री को बताया कि मुकेश गुप्ता ने अपनी पहली पत्नी के रहते हुए  मिक्की मेहता से विवाह कर लिया था, लेकिन सात सितम्बर 2001 को मिक्की मेहता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. मिक्की के परिजनों ने हत्या का अंदेशा जताया तो मुकेश गुप्ता पूरे मामले की लीपा-पोती में लग गए. ननकीराम कंवर ने शिकायती पत्र में उल्लेख किया कि पहले तो मुकेश गुप्ता मिक्की को अपनी पत्नी मानने से ही इंकार करते रहे, लेकिन रायपुर रेंज के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक रामनिवास ने मामले की जांच की तो यह तथ्य सामने आया कि मुकेश गुप्ता ने अपनी पहली पत्नी के स्वस्थ व जीवित रहने के दौरान ही मिक्की मेहता से गंधर्व विवाह रचाया था. ननकी ने लिखा कि मुकेश गुप्ता का यह कृत्य अखिल भारतीय सेवा नियमों के तहत कदाचरण की श्रेणी में आता है. ननकीराम ने लिखा कि पूरा मामला कई बार कई स्तरों पर इधर-उधर जांच के लिए भटकता रहा है, लेकिन मुकेश गुप्ता अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर बचते रहे हैं. ननकी ने कहा कि मिक्की के परिजनों ने मामले में निष्पक्ष जांच के लिए उनसे भी मुलाकात की थी तब उन्होंने 4 मई 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी शिकायत भेजी थी. मामले को गंभीर मानते हुए प्रधानमंत्री ने विस्तृत जांच का निर्देश दिया था, लेकिन तब सारी रिपोर्ट मुकेश गुप्ता के कहे अनुसार ही तैयार की गई और सरकार को प्रेषित की गई. ननकीराम ने लिखा कि मिक्की मेहता के मामले में अब तक की गई सभी जांच कूटरचित थीं. इस मामले में निर्वतमान पुलिस महानिदेशक एएन उपाध्याय की भूमिका भी संदिग्ध रही है. पूर्व गृहमंत्री ने लिखा कि मिक्की के भाई माणिक मेहता के खिलाफ पुलिस ने कई मामले दर्ज कर रखे हैं, लेकिन कुछ समय पहले कूटरचना कर उसे पुनः जेल भेज दिया गया था. इस अपराध को दर्ज करवाने में संविदा में पदस्थ अफसर अमन कुमार सिंह की भूमिका संदेह के कटघरे में हैं. मुख्यमंत्री को सौंपे गए सात पेज के शिकायती पत्र में ननकीराम कंवर ने एमजीएम हास्पीटल में होने वाले कारनामों का भी जिक्र किया है. पत्र में किसी रेखा नाम की महिला का भी जिक्र भी किया गया है. ननकी ने लिखा है कि मुकेश गुप्ता ने इस महिला का भी दैहिक शोषण किया है. उन्होंने इस महिला की बेनामी संपत्ति की जांच की मांग भी की है.

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जब विश्वरंजन का शिकार हुआ तब...

राजकुमार सोनी

रायपुर.भारतीय पुलिस सेवा 1973 बैच के अफसर रहे विश्वरंजन एक कवि और समालोचक है. जब वे केंद्र में  गुप्तचर विभाग को देख रहे थे तब छत्तीसगढ़ के तात्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह उन्हें छत्तीसगढ़ लाने के लिए प्रयासरत थे. खुद विश्वरंजन कहते हैं- मैं रमन सिंह के अनुरोध पर छत्तीसगढ़ आने के लिए तैयार हुआ था. लेकिन 18 जुलाई 2011 को वे अचानक हटा दिए गए और उनसे जूनियर 1978 बैच के अनिल नवानी को राज्य का नया डीजीपी बना दिया गया.

बहुत बाद में इधर-उधर से यह आरोप सामने आया कि रंजन कानून-व्यवस्था पर ध्यान देने के बजाय कविता-कहानी के जरिए मनोरंजन करने में लगे हुए थे. दबी-दबी जबान से यह भी सुना गया कि वे तब के गृहमंत्री ननकीराम कंवर की नहीं सुनते थे. बहराल इस खबर में विश्वरंजन का जिक्र इसलिए हो रहा है क्योंकि बुधवार को पूर्व मुख्यमंत्री ने सदन के भीतर और बाहर एएन उपाध्याय को हटाए जाने को लेकर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि एक डीजीपी को तभी हटाया जा सकता है जब उन पर अनुशासनहीनता का आरोप हो. आपराधिक मामला चल रहा हो या फिर भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप दर्ज हो. उनका कहना था कि नए डीजीपी की नियुक्ति के दौरान सुप्रीम कोर्ट की गाइ़ड लाइन का पालन नहीं किया गया. उनके इस बयान पर राजनीतिक प्रेक्षकों की राय है कि शायद पूर्व मुख्यमंत्री अब भी एएन उपाध्याय को पुलिस महानिदेशक बनाए रखने के पक्ष में हैं. बातों ही बातों में पूर्व मुख्यमंत्री ने नए डीजीपी की तैनाती को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि क्या डीजीपी पटवारी है जिसे चालू प्रभार दे दिया गया है. 

सरकार का अधिकार

छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी विश्वरंजन चर्चा में कहते हैं- मुझे आज तक यह पता नहीं चल पाया कि क्यों हटाया गया था, लेकिन तब के चीफ सेक्रेटरी ने एक अधिकारिक टिप्पणी की थी कि मुझे राज्य में डीपीजी के पद पर काम करते हुए तीन साल से ज्यादा हो गए थे. विश्वरंजन आगे कहते हैं- कोई अफसर किस जगह पर रहेगा और किस जगह पर काम करेगा यह तय करने का अधिकार राज्य सरकार के पास हैं. विश्वरंजन का कहना है कि डीजीपी एएन उपाध्याय भी शायद इसलिए हटा दिए गए हैं क्योंकि वे छत्तीसगढ़ में अपनी तैनाती का एक रिकार्ड बना चुके थे. यह बताना लाजमी होगा कि एएन उपाध्याय एक मार्च 2014 को छत्तीसगढ़ के डीजीपी बनाए गए थे और वे 20 दिसम्बर 2018 तक यानि पूरे पांच साल तक पद पर बने रहे. इतने लंबे समय तक कोई भी डीजीपी नहीं रहा. हालांकि भाजपा नेता उन्हें निर्विवाद डीजीपी बताते रहे, लेकिन राजनीति और प्रशासन की खबरों को कवर करने वाले मानते हैं कि उनके पद में बने रहने के दौरान माओवाद की घटनाओं में जबरदस्त ढंग से इजाफा हुआ और उन पर भाजपाई मानसिकता के हिसाब से काम करने का आरोप भी लगा. नए डीजीपी के पटवारी जैसा होने और उनके चालू प्रभार पर विश्वरंजन कहते हैं- प्रशासनिक तौर पर तो हर प्रभार चालू ही होता हैं. वैसे सुप्रीम कोर्ट का साफ निर्देश है कि कोई भी नई सरकार मुख्य सचिव तो बदल सकती है, लेकिन डीजीपी को बदलने के लिए यूपीएससी को पैनल भेजेगी. विश्वरंजन कहते हैं सरकार अधिकतम पांच नाम भेज सकती है जिसमें से तीन नाम ओके होकर आएंगे. खबर है कि सरकार ने पैनल में डीएम अवस्थी के अलावा, संजय पिल्ले, आरके विज के अलावा एक अन्य अफसर का नाम 19 दिसम्बर को ही यूपीएससी के समक्ष भेज दिया था.

पहली बार नहीं हुआ ऐसा 

छत्तीसगढ़ में डीजी रैंक के अफसरों में 1983 बैच के गिरधारी लाल नायक सबसे वरिष्ठ हैं, लेकिन रमन सरकार ने उनकी वरिष्ठता को किनारे पर रखकर वर्ष 1985 बैच के अफसर उपाध्याय 2014 में डीजीपी बना दिया था. नायक फिलहाल डीजी होमगार्ड व जेल की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। जब उपाध्याय डीजीपी बनाए गए तब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह बात प्रचारित की गई कि वे सत्यवादी राजा हरीशचंद्र की परम्परा के सच्चे संवाहक है. उनके पास बेहद कम कपड़े हैं. वे नारियल की रस्सी से बुनी गई एक छोटी सी खाट में सोते हैं और छोटा सा मोबाइल रखते हैं. धीरे-धीरे पत्रकार ही गृहमंत्री से इस बात की शिकायत करने लगे कि जब भी फोन लगाओ- ओम जय-जगदीश हरे... स्वामी जय-जगदीश हरे... गाना सुनाई देता है. सत्ता परिवर्तन के बाद उपाध्याय साहब रिंग टोन बदलना भूल गए और रुखसत कर दिए गए. बुधवार को पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पत्र सौंपकर पूर्व डीजीपी एएन उपाध्याय की भूमिका को आरोपों के कटघरे में खड़ा कर दिया है.

इधर नए डीजीपी डीएम अवस्थी जिन्हें पटवारी का तमगा दिया गया है उस पटवारी को नई सरकार ने सबसे काबिल अफसर माना है. लंबे समय तक राज्य के खुफिया विभाग की कमान संभाल चुके डीएम अवस्थी के बारे में यह मशहूर है कि संतुलन के साथ काम करना जानते हैं. ईओडब्ल्यू- एसीबी प्रमुख रहे डीएम अवस्थी के साथ एक अच्छी बात भी यह भी है कि एक अस्पताल के लिए लोगों को डरा-धमकाकर लंबा-चौड़ा डोनेशन बटोरने वाले एक पुलिस अफसर के अलावा  दूसरा कोई भी उनका शत्रु नहीं है. कह सकते हैं कि अवस्थी का नाम कभी भी किसी विवाद में नहीं पड़ा। अपनी बेदाग छवि और फेयर पुलिसिंग की वजह से ही वे इस मुकाम पर पहुंचे हैं।

छत्तीसगढ़ के अब तक के डीजीपी 

- श्रीमोहन शुक्ला 1 नवंबर 2000 से 26 मई 2001

-आरएलएस यादव 26 मई 2001 से 31 जनवरी 2002

- वीके दास 01 फरवरी 2002 से 30 सितंबर 2002

- अशोक दरबारी 01 अक्टूबर 2002 से 15 जुलाई 2004

- ओपी राठौर 15 जुलाई 2004 से 21 मई 2007

- विश्वरंजन 20 मई 2009 से 18 जुलाई 2011

- अनिल एम. नवानी 18 जुलाई 2011 से 30 नवंबर 2012

- रामनिवास 30 नवंबर 2012 से 31 जनवरी 2014

- अमरनाथ उपाध्याय 01 मार्च 2014 से 20 दिसंबर 2018

- डीएम अवस्थी- 20 दिसंबर 2018 से निरंतर

 

 

 

 

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सेक्स सीडी कांड में उछला रमन सिंह,अरुण बिसेन और सुरेश गोयल का नाम

रायपुर. छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित सेक्स सीडी कांड में कई रसूखदारों लोगों की संबंद्धता को लेकर अब तक दबी-दबी खबरें आती रही है या कहे कि खबरें दबा दी जाती रही है, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद पहली बार कुछेक वेबसाइटऔर एक-दो अखबारों ने तीरदांजी संघ से जुड़े रहे कैलाश मुरारका के हवाले यह लिखने की हिम्मत दिखाई है कि मामले में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को पूरे मामले की जानकारी थी. उनके विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी अरुण बिसेन उनसे मुबंई के होटल सहारा में मिले थे और उद्योगपति सुरेश गोयल मामले से जुड़े एक शख्स लवली खनूजा के साथ मिलकर रमन सिंह को ब्लेकमेल करके पैसा वसूल कर रहा था.

पाठकों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ का चर्चित सीडी कांड अक्टूबर 2017 में सामने आया था. इस कांड में पुलिस ने देश के नामी पत्रकार विनोद वर्मा को गिरफ्तार किया था. मामले में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल पर भी मामला दर्ज किया गया था. पहले-पहल तो यह लगा कि इस कांड में मुख्य रुप से कांग्रेस और उनसे जुड़े लोग ही दोषी है, लेकिन इस कांड के उजागर होने के महज एक-दो दिनों के बाद ही यह साफ हो गया कि मामले में कतिपय रसूखदार लोग संलिप्त है. पूरे मामले की सर्वाधिक चर्चा तब हुई जब प्रदेश के एक चैनल आईबीसी 24 ने कुछ पक्षों का खुलासा करते हुए सीडी का सच प्रसारित किया. चैनल का दावा था कि उसने कई हजार पोर्न साइटों को खंगालकर वह असली सीडी खोज ली है जिसके आधार पर नकली सीडी बनाई गई थीं. इस घटना के बाद कांग्रेस के भीतर ही उथल-पुथल चलती रही और प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को पीछे धकेलने वाले विघ्नसंतोषी शीर्ष नेतृत्व के समक्ष यह बात प्रचारित करते रहे कि जोगी भी सीडी के खेल में लगे थे और पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. काफी दिनों की मशक्कत के बाद अततः भूपेश शीर्ष नेतृत्व को यह समझाने में सफल रहे कि किसी भी तरह की अश्लील सीडी के निर्माण अथवा उसके वितरण में उनकी कोई भूमिका नहीं है.

रमन को सब पता था

इधर सीडी कांड के मुख्य अभियुक्त कैलाश मुरारका ने शुक्रवार को रायपुर न्यायालय में शपथपूर्वक आवेदन देकर कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री को इस बात की जानकारी बहुत पहले से थी कि उनके मंत्रियों की गंदी सीडी बनाने का खेल चल रहा है. मुरारका ने अपने आवेदन में कहा कि वह पिछले 25 साल से भारतीय जनता पार्टी का सदस्य है और जब से रमन सिंह मुख्यमंत्री बने थे तब से उनके बहुत करीब था और अक्सर सीएम हाउस आया- जाया करता था. उसने बताया कि अगस्त 2017 में सीएम हाउस को पता लगा कि उद्योगपति सुरेश गोयल ने लवली खनूजा को अश्लील सीडी के लिए पांच करोड़ रुपए का आफर दिया है. मुरारका ने कोर्ट में लिखित में दिया कि सीएम हाउस के कहने पर ही वह मुंबई गया था जहां रिंकू खनूजा ( अब मृत )  ने बताया कि उसके पास मंत्रियों की कोई अश्लील सीडी नहीं है, लेकिन सुरेश गोयल कई सालों  से लवली खनूजा के साथ मिलकर रमन सिंह को ब्लेकमेल अवश्य कर रहा है. कैलाश मुरारका ने कहा कि रिंकू खनूजा ने उसे सुरेश गोयल और लवली खनूजा के बीच टेलीफोन वार्तालाप की एक आडियो क्लिप भी दी. मुरारका ने कोर्ट को बताया कि आडियो से संबंधित सभी बातें उसने रमन सिंह के ओएसडी अरुण बिसेन को भी बताई थी, लेकिन अरुण बिसेन ने विश्वास नहीं किया और 24 अगस्त 2017 को मुंबई के सहारा होटल में एक अन्य सदस्य के साथ मुलाकात की. अक्टूबर के महीने में अरुण बिसेन ने उससे दिल्ली में मिलने को कहा. दिल्ली में वह अरुण बिसेन के साथ विजय पंडया नाम के शख्य से मिला जो लगातार यह बात कह रहा था कि उसके पास राजेश मूणत का अश्लील वीडियो है. उन्हें वीडियो दिखाया भी गया. वीडियो को दिखाने के बाद पंडया ने बिसेन से साढ़े चार करोड़ रुपए की मांग की. मुरारका ने बताया कि उसने पैसे देने पर आपत्ति की तब वापस आकर उसने सारी बातें रमन सिंह को बताई परन्तु वे भी कुछ  नहीं बोले.  

शनिकार को मुरारका ने आडियो क्लिप की एक सीडी मीडिया को भी वितरित की. मुरारका ने दावा किया कि आडियो में उद्योगपति सुरेश गोयल और लवली खनूजा सीडी के एवज में लेन-देन की बात कर रहे हैं. आडियो को सुनने पर लेन-देन की बात समझ में आती है. एक शख्स साफ-साफ कहता हुआ सुनाई देता है कि पांच में मामला जम जाएगा. मोटी रकम है इसलिए पैसा धीरे-धीरे आता जाएगा. आडियो में और भी कई बातें है. एक महत्वपूर्ण बात तो यह भी है कि मामला लीक नहीं होगा.

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पैसे लेकर पद बांटने वाले को बना दिया नेता प्रतिपक्ष

राजकुमार सोनी

रायपुर. विधानसभा चुनाव में मिली शर्मनाक हार के बाद छत्तीसगढ़ में भाजपा के सामने एक बार विकट स्थिति आन खड़ी हुई है. केंद्रीय नेतृत्व के दबाव के चलते धरमलाल कौशिक नेता प्रतिपक्ष बना दिए गए हैं, लेकिन महज 15 विधायकों की टूटी-फूटी पार्टी में कोई भी नेता ( रमन सिंह और पुन्नूलाल मोहिले को छोड़कर ) धरम कौशिक के साथ मन से काम करने को तैयार नहीं है. वैसे तो धरमलाल कौशिक को संसदीय मामलों का जानकार माना जाता है, लेकिन अब कोई भी सदस्य उनके ज्ञान का लाभ उठाना चाहता है ऐसा दिखता नहीं है. भाजपा विधायकों का कहना है कि भले ही कौशिक नेता प्रतिपक्ष बना दिए गए हैं लेकिन हकीकत यह है कि उनके नेतृत्व में पार्टी कभी आगे नहीं बढ़ पाई. उन पर कमजोर अध्यक्ष होने का ठप्पा लग चुका है. शुक्रवार को नेता प्रतिपक्ष चयन को लेकर एकात्म परिसर के भाजपा कार्यालय में बैठक के दौरान भी कई विधायकों ने पर्यवेक्षकों के सामने अपना गुस्सा उतारा. विधायकों का कहना था कि जो शख्स पैसे लेकर पद और टिकट बांटता हो उसे नेता प्रतिपक्ष बनाकर पार्टी ने भद्द पिटवा ली है.

रमन का गुलाम

धरम कौशिक के नेता प्रतिपक्ष बनने से भाजपा में अनुशासन का राग अलापने वाले भी खराब प्रतिक्रिया दे रहे हैं. भाजपा के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता और पार्टी के लिए समर्पित देवेंद्र गुप्ता ने तो फेसबुक वॉल पर कौशिक को रमन सिंह का गुलाम तक लिख दिया. देवेंद्र ने लिखा- आदिवासी नेता ननकीराम कंवर, सामान्य वर्ग से बृजमोहन अग्रवाल, पिछड़े वर्ग से नारायण चंदेल और अजय चंद्राकर में से किसी एक का चयन भी अगर नेता प्रतिपक्ष के लिए कर लिया जाता तो बेहतर होता, लेकिन यह सारे लोग इसलिए पीछे रह गए क्योंकि वे धरमलाल कौशिक की तरह रमन सिंह के गुलाम नहीं थे. गुप्ता केवल यहीं पर नहीं रुके. उन्होंने आगे लिखा- जिस प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में पार्टी 15 सीटों पर सिमट गई उसे फिर से नेता प्रतिपक्ष का तोहफा देना समझ से परे हैं. छत्तीसगढ़ में भाजपा डाक्टर रमन सिंह की जागीर बनकर रह गई है.

क्या है मजबूरी

क्या कौशिक एक चम्तकारिक नेता है. या उन पर सुरखाब के पर लगे हैं. या फिर वे नौकरशाहों के भरोसे चलने वाली पार्टी में जान फूंकते रहे हैं. ऐसे और भी कई सवाल है जो राजनीति के गलियारों में तैर रहे हैं. वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र पांडे कहते हैं- रमन सिंह और सह-संगठन मंत्री यह कभी नहीं चाहते हैं कि प्रदेश की कमान बृजमोहन अग्रवाल या ननकीराम कंवर जैसे किसी दमदार नेता को सौंपी जाए. अगर एक बार ऐसा हो गया तो रमन सिंह और सौदान सिंह का राजनीतिक अस्तित्व खत्म हो जाएगा. पांडे कहते हैं- जनतंत्र को जाति तंत्र में बदल दिया गया है. अभी तो कौशिक की नियुक्ति के पीछे केंद्रीय नेतृत्व को यह तर्क दिया गया है कि चूंकि कांग्रेस का मुख्यमंत्री कुर्मी समुदाय से है इसलिए नेता प्रतिपक्ष भी पिछड़े वर्ग से होना चाहिए. अगर कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष आदिवासी समुदाय से होगा तो भाजपा भी आदिवासी समाज से ही अध्यक्ष बना सकती है. इधर राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को विधानसभा चुनाव में मिली करारी पराजय के बाद इस बात का अंदाजा है लोकसभा चुनाव में भी बुरी गत होने वाली है. हर लोकसभा में ( केवल  बिलासपुर को छोड़कर ) पार्टी को डेढ़ से ढ़ाई लाख मतों के अंतर से पराजय मिली है. मोदी का कोई जादू भी भारी-भरकम मतों के अंतर को पाट पाने में कारगार साबित नहीं होगा. इधर नेता प्रतिपक्ष के चयन के बाद भाजपा को मातृसंस्था मानकर काम करने वाले पत्रकार-लेखक और कतिपय अफसर यह माहौल बनाने में लग गए हैं कि अब डाक्टर रमन सिंह को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनकर पूरे प्रदेश का दौरा करना चाहिए. एक-एक कार्यकर्ताओं को रिचार्ज करना चाहिए. उन्हें जनता से सीधा जुड़ना चाहिए. डाक्टर साहब को ठीक वो-वो काम करना चाहिए जो कांग्रेस के भूपेश बघेल करते रहे हैं. इधर भाजपा में पूर्व मुख्यमंत्री और उनके अफसरों की कार्यशैली से नाराज लोगों का मानना है कि डाक्टर रमन सिंह इसलिए भी प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते हैं क्योंकि नान, झीरम, पनामा तथा अन्य घोटालों की जांच और उसमें तेजी के बाद उन्हें भीड़ तंत्र की आवश्यकता होगी.

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संपादकों और पत्रकारों को पैसा बांटने वाली कंसोल इंडिया अब भी संवाद से मोटा माल लेने के फिराक में

रायपुर. छत्तीसगढ़ के मूर्धन्य संपादकों और पत्रकारों को अबुंजा माल स्थित दफ्तर में धन बांटकर उनका वीडियो बनाने वाली कंसोल इंडिया कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड अब भी जनसंपर्क विभाग की सहयोगी संस्था संवाद से मोटा माल हड़पने के फिराक में हैं. इस कंपनी को संवाद ने 15 फरवरी 2017 को प्रदेश के मोबाइल धारकों को बल्क एसएमएस एवं वाइस कॉल की सेवा के लिए अनुबंधित किया था. इसके साथ मुंबई की वीवा कनेक्ट और हैदराबाद की नेट एक्सेल को भी काम दिया गया था. वीवा कनेक्ट और नेट एक्सेल ने भुगतान हासिल कर लिया है. कंसोल इंडिया को कुल पांच करोड़ 85 लाख 23 हजार 906 रुपए का भुगतान दिया जाना था, लेकिन विवाद उठने से पहले यह कंपनी 2 करोड़ 96 लाख 71 हजार 263 रुपए हासिल कर चुकी थीं. इस कंपनी के कर्ताधर्ता अब भी दो करोड़ 88 लाख 52 हजार 643 रुपए के भुगतान की आस लगाए बैठे है. खबर है कि इस कंपनी से जुड़े कुछ लोग पैसा हासिल करने के लिए एक बड़े दलाल मीडियाकर्मी से संपर्क बनाए हुए हैं.

 

इन कंपनियों ने भी हासिल किया अच्छा-खासा भुगतान

पूर्व मुख्यमंत्री के चेहरे को चमकाने के काम में रायपुर की क्यूब्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड भी लगी हुई थीं. यह कंपनी 10 फरवरी 2017 को अनुबंधित की गई थीं. इस कंपनी को कुल 66 लाख 55 हजार 110 रुपए का भुगतान किया जाना था. कंपनी ने अब तक 38 लाख 64 हजार 410 रुपए का भुगतान हासिल कर लिया है. अब इस कंपनी का 27 लाख 90 हजार 700 रुपए बकाया है. डिजीटल मीडिया एडवाइजर की सेवा के लिए संवाद ने रायपुर के हरप्रीत सिंह ढ़ोढ़ी की सेवाएं भी ली थीं. इन्हें अब तक 27 लाख 96 हजार का भुगतान किया जा चुका है. राज्य सरकार की योजनाओं के वीडियो फिल्मांकन के लिए अहमदाबाद की मूविंग फिक्सल ने भी एक करोड़ 18 लाख का भुगतान ले लिया है. इस कंपनी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कुछ काम किया था. इस काम के लिए कंपनी ने 4 करोड़ 94 लाख 32 हजार का बिल प्रस्तुत किया था. कंपनी  को संवाद ने 3 करोड़ 34 लाख, 48 हजार रुपए का भुगतान दे दिया है. अब इस कंपनी के कर्ताधर्ता एक करोड़ 59 लाख 84 हजार हासिल करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं. समाचार चैनलों में सरकार के विज्ञापनों के अवलोकन के लिए एसबी मल्टीमीडिया ने तीन करोड़ 31 लाख 57 हजार 998 रुपए का बिल प्रस्तुत किया था. कंपनी को अब तक  दो करोड़ 58 लाख, 81 हजार रुपए का भुगतान दिया जा चुका है. कंपनी को अब संवाद से 72 लाख 76 हजार 666 रुपए लेना है. संवाद ने इसी कंपनी को सरकारी योजनाओं, शैक्षणिक कार्रक्रमों और युवाओं को मार्गदर्शन देने का काम भी सौंप रखा था. इस काम के लिए कंपनी पांच करोड़ 50 लाख 47 हजार रुपए का भुगतान हासिल कर चुकी है. कंपनी को अब भी एक करोड़ 49 लाख 666 रुपए संवाद से लेना है.

संगीता रसैली को भी भुगतान

संवाद ने 16 मार्च 2017 से सूरजपुर मध्य प्रदेश की श्रीमती संगीता एम रसैली की भी सेवाएं ली थी. संगीता रसैली प्रकाशन एवं साहित्य पर सलाह दिया करती थीं. संवाद ने इन्हें 15 लाख 33 हजार 508 रुपए का भुगतान कर दिया है. भोपाल के सत्येंद्र खरे भी सलाहकार थे. उन्हें अब तक 12 लाख 48 हजार 820 रुपए का भुगतान किया गया है. मुंबई की बैटर कम्युनिकेशन को हर माह 4 लाख 45 हजार रुपए का भुगतान किया जाता था. इस कंपनी ने अब तक 94 लाख 4 हजार रुपए का भुगतान हासिल किया है. विभिन्न विभागों का सोशल मीडिया मैनेंजमेंट देखने के लिए निक्सी को 2 करोड़ पांच लाख 94 हजार 63 रुपए का दिए गए हैं. दिल्ली की यूएनडीपी को एक करोड़ 41 लाख, दस हजार 501 रुपए का भुगतान कर दिया गया है. थ्री डी प्रिटेंड मटेरियल के लिए अनुबंधित मुंबई की मेसर्स टेक्नोविजन प्राइवेट लिमिटेड चार करोड़ 23 लाख 907 रुपए का भुगतान हासिल कर चुकी है. ग्रीन कम्युनिकेशन दिल्ली को 38 लाख 68 हजार, वार रुम स्ट्रेटजी अहमदाबाद को 4 करोड़ 63 लाख 95 हजार 717, एक्सिस माय इंडिया मुंबई को 2 करोड़ 24 लाख पांच हजार 424 रुपए, टच वुड इंटरटेंटमेंट नई दिल्ली 2 करोड़ 13 लाख एक हजार 331 रुपए, व्यापक इंटरप्राइजेस को 6 करोड़ 49 लाख 66 हजार 703 रुपए,  वीडिया वाल मुंबई को एक करोड़ 77 लाख 74 हजार 423, एएस एडवरटाइजर्स को एक करोड़ 80 लाख, 31 हजार 226, विनायक एडवरटाइजर्स एक करोड़ आठ लाख 32 हजार, व्यापक इंटर प्राइजेस ने एक दीगर काम के लिए 23 करोड़ 96 लाख 97 हजार 748 रुपए का भुगतान प्राप्त कर लिया है. संवाद से जुड़े सूत्रों ने बताया कि अभी कुछ अन्य कंपनियों के भुगतान का ब्यौरा आना शेष है.

 

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रमन का चेहरा चमकाने वाली 21 कंपनियां जांच के दायरे में

राजकुमार सोनी

रायपुर / जनसंपर्क विभाग और संवाद में पब्लिक रिलेशन की आड़ लेकर पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के चेहरे को चमकाने के खेल में लगी 21 निजी कंपनियों के खिलाफ जांच बैठ गई है. इसके अलावा जनता के खून-पसीने की कमाई को लुटने में लगे कतिपय सलाहकार अफसरों की भूमिका भी जांच के दायरे में रखी गई है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश के बाद जिन कंपनियों को जांच के दायरे में रखा गया है उनमें मुंबई की बैटर कम्युनिकेशन, एड फैक्टर, टच वुड, 77 इंटरटेनमेंट, एक्सेस माई इंडिया, दिल्ली की वीडियो वॉल, करात इंटरटेनमेंट, ग्रीन कम्युनिकेशन, सिल्वर टच, यूएनडीपी, गुजरात की वॉर रुम, मूविंग फिक्सल, रायपुर की ब्रांड वन, व्यापक इंटरप्राइजेस, क्यूबस मीडिया लिमिटेड, आईबीसी 24, कंसोल इंडिया, भिलाई की कंपनी क्राफ्ट, आसरा, कैकटस शामिल है. इसके अलावा आलोक नाम के एक प्रोफेसर ने भी संवाद में अपनी दुकान खोल रखी थी. जबकि क्यूब मीडिया के सीईओ श्री डोढ़ी का कारोबार भी संवाद से ही संचालित हो रहा था. हैरत की बात यह है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अफसर की पत्नी की जितनी सक्रियता मुख्यमंत्री निवास में बनी हुई थीं उससे कहीं ज्यादा वह संवाद में सक्रिय थीं. अफसर की पत्नी यही से पूर्व मुख्यमंत्री के साथ छत्तीसगढ़ के गरीब बच्चों की तस्वीरों को फेसबुक, वाट्सअप में शेयर करती थी और लिखती थीं- गरीब बच्चों को आशीष दे रहे हैं हमारे बड़े पापा...हम सबके बड़े पापा.

 

भाजपा के प्रचार का अड्डा बन गया था संवाद

शासन की नीतियों का प्रचार-प्रसार तो अमूमन सभी शासकीय विभाग करते हैं,लेकिन छत्तीसगढ़ के संवाद का दफ्तर भाजपा के प्रचार का अड्डा बन गया था. यहां विभिन्न निजी कंपनियों के लिए कार्यरत कर्मचारी सुबह से लेकर शाम तक सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में यही देखा करते थे कि विपक्ष की कौन सा मैटर ट्रोल हो रहा है. पाठकों को याद होगा कि कंसोल इंडिया से जुड़े कर्मचारियों ने ही सोशल मीडिया में किसानों की कर्ज माफी को लेकर झूठी पोस्ट वायरल की थी. इस मामले में कांग्रेस ने बकायदा थाने में लिखित शिकायत भी कर रखी है, मगर पुलिस ने अब तक जांच भी प्रारंभ नहीं की है. खबर है कि इस निजी कंपनी में एक कद्दावर अफसर की पत्नी का भाई कार्यरत था. वैसे तो इस कंपनी के कई जगहों पर कार्यालय थे लेकिन रायपुर के अंबुजा माल स्थित मुख्य दफ्तर में ही इस कंपनी ने प्रदेश के मूर्धन्य संपादकों, इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया के पत्रकारों को धन बांटा था और उनका वीडियो भी बनाया था. फिलहाल इस दफ्तर पर ताला जड़ गया है.

सुपर सीएम का खास दखल

नाम न छापने की शर्त पर जनसंपर्क विभाग के कुछ जिम्मेदार कर्मचारियों ने बताया कि विभाग में सुपर सीएम की जबरदस्त दखलदांजी कायम थीं. वे हर पल यहीं देखते थे कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के चेहरे को कैसे प्रोजेक्ट किया जाए. सीएम को प्रोजक्ट करने के चक्कर में कई बार अन्य मंत्रियों की तस्वीरों को भी हटा दिया जाता था. जनसंपर्क विभाग और संवाद का दफ्तर उनके निर्देशों की पालना में ही लगा रहता था. एक कर्मचारी ने बताया कि जनसंपर्क और संवाद का काम सही आकंड़ों को प्रस्तुत करना है, लेकिन पूरा महकमा जनता के समक्ष झूठ परोसने के काम में ही लगा हुआ था. कर्मचारी के मुताबिक जनसंपर्क आयुक्त राजेश टोप्पो ने नियम-कानून से परे जाकर सैकड़ों ऐसे काम किए हैं जिसकी वजह से उन्हें जेल की हवा खानी पड़ सकती है. कर्मचारी ने बताया कि संवाद ने जिला विकास नाम की जो पुस्तिका प्रकाशित की है उसमें सारे के सारे आकंड़े झूठे हैं. सरकार के कामकाज को बेहद विश्वसनीय और अनोखा बताने के लिए कमजोर आकंड़ों को मजबूत बताने की कवायद की गई है.

 

कुछ ऐसे शुरू हुआ खेल

यह कम हैरत की बात नहीं है कि वर्ष 2003 के बाद से जनसंपर्क विभाग कभी भी जनता से सीधा संपर्क नहीं रख पाया। विभाग और उसकी सहयोगी संस्था संवाद में बट्टमार और उठाईगिर जगह बनाने में इसलिए सफल हो गए हैं क्योंकि निजी कंपनियों के लोग अफसरों और कर्मचारियों को बगैर किसी मध्यस्थता के सीधे घर पर जाकर कमीशन देने लगे थे. विभाग के कतिपय लोग यह भी कहते हैं कि कतिपय अफसर शराब और शबाब के शौकीन थे ( अब भी है ) जिसका फायदा निजी कंपनियों ने जमकर उठाया. इस विभाग में निजी कंपनियों की इंट्री तब सबसे ज्यादा हुई जब वर्ष 2014 में मोदी प्रधानमंत्री बनने में सफल हुए. गुजरात से यह हवा चली कि मोदी को जिताने में सोशल मीडिया की अहम भूमिका है. मोदी ने एक टीम बनाकर काम किया और....

सर्वविदित है कि संवाद का काम केवल पब्लिसिटी मैटर क्रियेट करना है, लेकिन मोदी की जीत के बाद निजी कंपनियों को काम देने के लिए विज्ञापन निकाला गया. सबसे पहले मुंबई की एड फैक्टर ने इंट्री ली. यह कंपनी वर्ष 2015 से लेकर 2017 तक सक्रिय रही और इसे प्रत्येक माह लगभग साढ़े पांच लाख रुपए का भुगतान मिलता रहा. इसी कंपनी में कार्यरत तुषार नाम के एक शख्स ने कुछ ही दिनों में वॉर रुम नाम की एक नई संस्था खोली और जनसंपर्क आयुक्त राजेश टोप्पो के साथ मिलकर लंबा खेल खेला.

( इस खबर के साथ कुछ बिल भी चस्पा है जो संवाद ने जनसंपर्क के संचालक को प्रस्तुत किया है. संचालक ने यह बिल कंपनी को सौंपा था. छत्तीसगढ़ जैसे गरीब प्रदेश में बिल की यह राशि कह सकते हैं लूट की यह राशि हैरतअंगेज करने वाली है. )

 

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रमन की दुकान से चल रहा था... वाह-वाह प्रोडक्शन

राजकुमार सोनी

रायपुर /  अगर आप इस खबर के पाठक है तो आपको ज्ञात होगा कि पनामा पेपर में अभिषाक सिंह के पते-ठिकाने के तौर पर रमन मेडिकल स्टोर का उल्लेख हुआ है. यह वही मेडिकल स्टोर वही जिसे अब भी पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के परिजन कवर्धा में संचालित करते हैं. यह तो एक दुकान की बात हुई. छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री की ऐसी और भी कई दुकानें थी जो घोषित-अघोषित तौर पर संचालित होती थी. मुख्यमंत्री चूंकि जनसंपर्क विभाग के मंत्री भी थे सो उनका यह विभाग भी एक दुकान में तब्दील हो गया था.वैसे तो हर प्रदेश का जनसंपर्क विभाग सरकार की नीतियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने का काम ही करता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इस विभाग ने रमन सिंह की जय-जय और वाह-वाह करने में सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए थे.  देश-दुनिया के ज्यादातर मीडियाकर्मियों के बीच अब भी जनसंपर्क विभाग की पहचान वाह-वाह प्रोडक्शन के रुप में ही बनी हुई है. अब जबकि नई सरकार बन गई है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि विभाग की भ्रष्ट पहचान का खात्मा होगा.

मूवी फिक्सल का कारनामा

काफी अरसा पहले हास्य अभिनेता मेहमूद ने फिल्म प्यार किए जा में आत्मा नाम के किरदार को निभाते हुए वाह-वाह प्रोडक्शन की स्थापना की थी. अपने फिल्म प्रोडक्शन के लिए मेहमूद अपने पिता ओमप्रकाश को ही टोपी पहनाते हुए नजर आए थे. छत्तीसगढ़ में भी चुनाव से पहले कई वाह-वाह प्रोडक्शन खुले और उन्होंने जमकर चूना लगाया. एक प्रोडक्शन का नाम कंसोल इंडिया था तो दूसरे प्रोडक्शन का नाम मूवी फिक्सल. कंसोल इंडिया ने तो इस चुनाव में बकायदा छत्तीसगढ़ के मूर्धन्य संपादकों और पत्रकारों को निमंत्रण दे-देकर  पैसा बांटा और उनका वीडियो भी बनाया. जबकि वाह-वाह प्रोडक्शन श्रेणी की दूसरी बड़ी कंपनी मूवी फिक्सल थी जो गुजरात से आई थी. उसी गुजरात से जहां के नरेंद्र मोदी है. बताते हैं कि इस कंपनी के एक कर्ताधर्ता जिनका नाम मनीष  हैं ने जैसे ही छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया वैसे ही एक स्थानीय निर्माता-निर्देशक को फोन पर धमकी दी कि वह रमन सिंह के सारे फुटेज उसे सौंप दें. जब स्थानीय निर्माता ने फुटेज देने से इंकार किया तो जनसंपर्क विभाग के आयुक्त राजेश टोप्पो  ने स्थानीय निर्माता को यह कहते हुए चमकाया कि गुजरात का मतलब हवालात भी हो सकता है. कहने की जरूरत नहीं कि यह एक पैराशूट कंपनी थी जो जनसंपर्क विभाग के लिए बरसों से काम कर रहे स्थानीय निर्माता-निर्देशकों के कामकाज को चौपट करने आई थी. सरकार ने इस कंपनी को उपकृत करने के लिए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक टेंडर निकाला. टेंडर में ऐसी शर्तें रखी गई कि छत्तीसगढ़ का कोई भी स्थानीय व्यक्ति उसे पूरी नहीं कर सकता था.

कुछ ऐसे चला खेल

जनसंपर्क विभाग के संवाद ने जो टेंडर निकाला उसमें सबसे बड़ी शर्त यही थी कि तीन से चार मिनट की वीडियो फिल्म का निर्माण करने वाली कंपनी के प्रत्येक वर्ष का टर्न ओवर 20 करोड़ से अधिक होना चाहिए. कैमरे का एचडी या 4 के होना अनिवार्य था, लेकिन इसके साथ यह भी जोड़ दिया गया कि कंपनी अपनी पूरी जानकारी केवल अंग्रेजी में देगी. टेंडर में स्टोरी बोर्ड में 10 नंबर, अनुभव के लिए 20 नंबर और प्रस्तुतिकरण के लिए सबसे ज्यादा 70 नंबर रखे गए थे. यहां यह बताना अनिवार्य है कि संवाद में देशभर की ( स्थानीय मिलाकर ) लगभग 30 संस्थाएं इम्पनैल यानि पंजीबद्ध है. इन संस्थाओं में कुछ ए श्रेणी की है तो कुछ बी श्रेणी की. पंजीबद्ध संस्थाओं को अब तक डीएवीपी की दर पर ही काम दिया जाता रहा है. इस निविदा में जिन कैमरों के उपयोग की बात कही गई थीं उसकी शर्त तो हर स्थानीय निर्माता पूरी करता था, लेकिन प्रत्येक साल 20 करोड़ से अधिक के टर्न ओवर पर मामला अटक गया. दूसरी बड़ी बात यह भी थी कि प्रस्तुतिकरण के 70 नंबर संवाद के अधिकारियों ने अपने हाथ में रखे थे. दांव-पेंच में फंसे इस टेंडर से कई लोग बाहर हो गए और गुजरात की कंपनी ने वीडियो और आडियों बनाने का ठेका हासिल कर लिया. जनसंपर्क विभाग के एक अधिकारी कुशराम का कहना है कि यह कंपनी अप्रैल 2018 से काम कर रही थी और इसे हर माह लगभग 70 लाख का भुगतान दिया जाता था. जबकि जनसंपर्क विभाग के एक अन्य अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर जानकारी दी कि एक नए काम का टेंडर सितम्बर 2018 में निकाला गया था जिसका करोड़ो रुपए का भुगतान समय से पहले ही कर दिया गया. अब केवल एक करोड़ 18 लाख रुपए का भुगतान बकाया है. खबर है कि कंपनी को अनधिकृत तौर-तरीकों से करोड़ों रुपए का भुगतान कर दिए जाने से स्थानीय निर्माता-निर्देशकों का भुगतान अटक गया है. पीड़ित निर्माता जल्द ही मुख्यमंत्री से मिलकर गुहार लगाने वाले हैं.

सच तो यह है कि छत्तीसगढ़ में विकास आधारित डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण का गोरखधंधा रमन सिंह के कार्यकाल में जिस गंदे ढंग से पनपा है उस तरीके से कभी नहीं पनपा. जनसंपर्क विभाग मुंबई- दिल्ली की कंपनियों पर मेहरबान रहा तो कभी हरियाणा की कंपनी मिडिटेक पर. अगर आप जनसंपर्क विभाग और संवाद के द्वारा पिछले पन्द्रह सालों में निर्मित फिल्मों सच जानना चाहेंगे तो आश्चर्य होगा कि विभाग ने आम, केला, लीची और पपीते की खेती पर भी फिल्में बनवाई है और करोड़ों रुपए का भुगतान किया है. मीडिया का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इस विभाग ने पिछले पंद्रह सालों में रमन के चेहरा चमकाऊ कार्यक्रम के नाम पर जो भी गड़बड़झाला किया है उसका खुलासा होना चाहिए.

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15 साल से जमे अनिल राय को हटाने की मांग

रायपुर / छत्तीसगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता शेष नारायण शर्मा को फोन पर धमकी देने के बाद विवादों से घिरे रहे भारतीय वन सेवा के अफसर अनिल राय को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से शिकायत की गई है. प्रदेश कांग्रेस कमेटी के संयुक्त सचिव नरेश गड़पाल ने एक लिखित शिकायत में कहा है कि वर्तमान में राय लोक निर्माण विभाग के ओएसडी और छत्तीसगढ़ सड़क विकास प्राधिकरण के प्रबंध संचालक के पद पर पदस्थ है, लेकिन उन्होंने संविदा नियमों के विपरीत जाकर 72 साल के जीएस सोलंकी को अवैध कामों को अंजाम देने के लिए  प्राधिकरण में पदस्थ कर रखा है. गड़पाल  का कहना है कि अनिल राय वैसे तो मूल रुप से वन विभाग के अफसर है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री का करीबी बनकर 15 साल से मंत्रालय में जमे हुए हैं और मलाईदार विभागों में पदस्थापना पाने में सफल रहे हैं. उन पर यह आरोप भी है कि उन्होंने लोक निर्माण की डीपीसी को कभी भी समय पर पूरा नहीं होने दिया. प्रदेश में सड़क निर्माण की धीमी गति और घटिया निर्माण को लेकर विवादों में रहे अनिल राय तब भी चर्चा में आए थे जब एक विधायक ने इंजीनियर को पीट दिया था. तब प्रशासनिक गलियारों में यह खबर आम हुई थी कि राय ने इंजीनियर को मुख्यमंत्री निवास ले जाकर धमकाया था.

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छत्तीसगढ़ में फोन टेप करने वाली रेखा की तलाश ?

राजकुमार सोनी 

रायपुर /  छत्तीसगढ़ में झन्नाटेदार प्रशासनिक फेरबदल के बीच रेखा नाम की एक महिला चर्चा के केंद्र में हैं. हालांकि इस महिला को राजनेता सीधे तौर पर नहीं जानते, लेकिन बताते हैं कि एक कद्दावर पुलिस अफसर के कहने पर रेखा ने कांग्रेस के नेताओं, उद्योगपतियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों के फोन को टैप करने का काम किया था. अब जबकि झीरम घाटी की घटना के लिए एसआईटी गठित हो चुकी है और पूर्व सरकार के लिए एजेंट की तरह काम कर रहे पुलिस महकमे के बड़े अफसर इधर से उधर कर दिए गए हैं तब रेखा की खोजबीन की जा रही है.

पन्द्रह हजार लोगों का फोन टेप

छत्तीसगढ़ में अब कांग्रेस की सरकार है, लेकिन जब कांग्रेस विपक्ष में थी तब यह आरोप लगाती रही है कि उनके नेताओं का फोन टैप होता था. तब कांग्रेस नेता भूपेश बघेल, रविंद्र चौबे सहित अन्य कई बड़े नेताओं का यह आरोप सामने आया था कि रमन सरकार के अफसर फोन टैप कर रहे हैं. इधर अब जाकर यह खुलासा हो रहा है कि एक शराब माफिया और पुलिस अफसर ने सरकार से असहमति रखने वाले लगभग 15 हजार लोगों का फोन टेप किया था. फोन टैपिंग का यह गोरखधंधा शायद अब भी संचालित हो. बताते हैं कि महत्वपूर्ण लोगों की फोन टैपिंग के लिए अलग-अलग तीन मशीनें इस्तेमाल की जाती थी. एक मशीन का इस्तेमाल शराब माफिया के निवास पर होता था तो दूसरी मशीन आईटी सेक्टर में कार्यरत लोग हैंडल करते थे जबकि तीसरी मशीन की निगरानी रेखा करती थी. सूत्रों का कहना है कि रेखा ने झीरम की घटना में संदिग्ध रहे विवादास्पद पुलिस अफसर के खिलाफ केरल में पहले शिकायत और बाद में परिवाद भी दायर किया था, लेकिन अफसर की धमकी-चमकी के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया. बहरहाल रेखा को इसलिए खोजा जा रहा है क्योंकि वह कई महत्वपूर्ण कारनामों की चश्मदीद है और उसके पास सबूतों का जखीरा है.

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रमन में आडवाणी देखना चाहते हैं भाजपाई

राजकुमार सोनी

भले ही पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह मंगलवार को हार की समीक्षा के बहाने राजनांदगांव से यह कहकर लौट आए हैं कि सिर्फ चुनाव हारे हैं, हौसला परास्त नहीं हुआ है, लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा का एक मजबूत धड़ा उन्हें हर तरह की जिम्मेदारी से मुक्त देखना चाहता है. भाजपाइयों का कहना है कि पन्द्रह साल तक मुख्यमंत्री बने के दौरान रमन सिंह ने कभी भी कार्यकर्ताओं की सुध नहीं ली. वे केवल और केवल भ्रष्ट और आततायी अफसरों के संरक्षक बने रहे. अब जबकि प्रदेश से भाजपा का सुपड़ा साफ हो गया है तब प्रदेश का दौरा कर कार्यकर्ताओं को रिचार्ज करने और खुद को पार्टी का सर्वे-सर्वा बताने की कवायद कर रहे हैं.

 

कहीं कोई सुनवाई नहीं

चुनाव में करारी पराजय के बाद राजनीतिक गलियारों में सिर्फ और सिर्फ इसी बात की चर्चा है कि हार पर मंथन कब होगा. भाजपा के एक सक्रिय कार्यकर्ता का कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक और पूर्व मुख्यमंत्री को सबके साथ मिल-बैठकर यह जान लेना चाहिए था कि छत्तीसगढ़ में पराजय की वजह क्या है, लेकिन यह काम अब तक प्रारंभ नहीं हो पाया है. जिस चाउंर वाले बाबा ने पन्द्रह सालों तक राज किया उसकी पार्टी का महज पन्द्रह सीटों पर सिमट जाना शर्मनाक मामला है. नाराज कार्यकर्ताओं का कहना है कि भाजपा में अनुशासन की बात तो खूब की जाती है, लेकिन इस बार के चुनाव में पर्दे के पीछे से अनुशासन तोड़ने वालों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हो गई थी. कार्यकर्ताओं की माने तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबंद्ध होने के बावजूद संगठन मंत्री भी शिकायतों पर ध्यान नहीं देते थे. पवन साय के पहले संगठन मंत्री राम प्रताप सिंह थे, लेकिन जल्द ही वे राज्य वनौषधि बोर्ड के अध्यक्ष हो गए और लालबत्ती में घूमने लगे. राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री सौदान सिंह का डेरा भी छत्तीसगढ़ में जमता रहा मगर असंतुष्ट कार्यकर्ता उन तक भी अपनी पहुंच नहीं बना पाए.प्रदेश भाजपा के एक कद्दावर नेता ननकीराम कंवर ने चुनाव से ठीक तीन महीने पहले प्रदेश के निरकुंश और भ्रष्ट अफसरों की जानकारी राष्ट्रीय स्तर के नेताओं तक भी पहुंचाई थीं, लेकिन दस्तावेजों के साथ शिकायत करने के बाद भी उनकी भी सुनवाई नहीं हो पाई. खबर है कि एक मंत्री ने भी भाजपा के शीर्ष नेताओं को अफसरों की करतूतों के बारे में बताया था तब उनसे कहा गया था- क्या बात करते हो… कौन भ्रष्ट नहीं है. अगर कोई भ्रष्ट है तो उनसे अपने पक्ष में काम लेना सीखिए. मंत्री जी इस उत्तर के बाद खामोश हो गए थे.

 

कौन बनेगा नेता प्रतिपक्ष

राजनीतिक गलियारों में जहां कांग्रेस के मंत्रिमंडल के गठन को लेकर बातें हो रही है तो दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष के संभावित नामों को लेकर भी खबरें छप रही है. फिलहाल विधायकों का नेता कौन होगा इसे लेकर कयास लगाए जा रहे हैं. बहुत से भाजपाई बृजमोहन अग्रवाल को नेता प्रतिपक्ष देखना चाहते हैं। भाजपाइयों का कहना है कि बृजमोहन में सबको साथ लेकर चलने की क्षमता है सो उन्हें हर हाल में नेता प्रतिपक्ष बना देना चाहिए. दूसरी ओर भाजपाई रमन मंडली के हथकंडों को लेकर भी सशंकित है.  बहुत से भाजपाई मानते हैं कि जिस रमन के पन्द्रह साल के कार्यकाल में तमाम आदिवासी लीडर साइड लाइन कर दिए गए. योग्य और क्षमतावान लोगों को पनपने नहीं दिया गया तो जाहिर सी बात है कि बृजमोहन अग्रवाल के नेता प्रतिपक्ष बनने के मार्ग में रोड़े अटकाए जाए. उनका नाम कभी आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. सुपर सीएम के नाम से विख्यात अफसर का गिरोह तो यह भी प्रचारित कर रहा है कि भाजपा को रमन सिंह ने नहीं बल्कि बृजमोहन अग्रवाल ने हरा दिया. इस तर्क के साथ एक वर्ग यह भी कहने को मजबूर हुआ है कि कल तक जो नेता भाजपा के लिए संजीवनी और संकटमोचक था वह अचानक खलनायक बनाया जा रहा है. कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि अगर बृजमोहन की वजह से भाजपा 15 सीटों पर सिमट गई है तो निश्चित रुप से वे रमन सिंह से ज्यादा ताकतवर नेता हैं.किसी भी सूरत में  ऐसे नेता को नेता प्रतिपक्ष की कमान सौंप देनी चाहिए. प्रदेश में पिछड़े और आदिवासी वर्ग से ही नेता प्रतिपक्ष चुनने की परम्परा रही है सो अध्यक्ष पद के लिए सबसे उपयुक्त ननकीराम कंवर को ही माना जा रहा है. भाजपा के बहुत से लोग रमन सिंह में आडवाणी देखने के पक्षधर हैं. ऐसे सभी लोगों का कहना है कि अब रमनसिंह को मार्गदर्शन मंडल में शामिल कर देना चाहिए ताकि सही समय पर सही मार्गदर्शन मिलता रहे. अगर ऐसा नहीं किया गया तो लोकसभा की 11 सीटों पर भी पराजय हो जाएगी. भाजपाई मान रहे हैं कि चाउंर वाले बाबा के नाम से विख्यात रमन सिंह अपनी लोकप्रियता खो चुके हैं. अफसरों की करतूतों ने उनके चेहरे को मलिन कर दिया है.

 

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