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क्या ताली बजाने से गरीबों की थाली में भोजन आ जाएगा ?

क्या ताली बजाने से गरीबों की थाली में भोजन आ जाएगा ?

रायपुर. कोरोना वायरस से निपटने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाने के साथ-साथ घर के बाहर या छत पर ताली और थाली बजाने को कहा है. मोदी की हां में हां मिलाने वाली एक बड़ी आबादी ऐसा करने को तत्पर है. यह आबादी बड़ी बेसब्री से 22 तारीख का इंतजार कर रही है. जैसे ही यह तारीख आएगी...जोर-शोर से ताली-थाली बजाई जाएगी और उसका वीडियो वायरल कर दिया जाएगा. देश को ऐसे वीडियो से समर्थन मिलेगा. कोरोना भी सोच में पड़ जाएगा... यार कमाल के लोग हैं...थाली और ताली बजाकर ही खदेड़ने में सफल हो गए. इस आबादी में कुछ ऐसे लोग भी शामिल हैं जो शंख फूंकने की सलाह दे रहे हैं. ऐसे लोगों का मानना है कि कोरोना के खिलाफ युद्ध लड़ना है तो सुबह-शाम शंख फूंको. युद्ध में शंख ही फूंका जाता है. जबकि फेसबुक पर जीवन का सार उतारने वाले कुछ फेसबुकियों ने लिखा है- जब बजाना ही है तो क्यों न ढ़ोलक-तबला, हारमोनियम और गिटार बजाया जाय. इटली में भी लोग यही कर रहे हैं. उनका अच्छा टाइम पास हो रहा है. बहरहाल जो भी हो. मिले सुर मेरा-तुम्हारा गाने को ही जीवन का सब कुछ मानने वाली आबादी यह मानकर चल रही है कि  मोदी ने जो कुछ कहा है वह ठीक है. उनकी बात मानने में कोई बुराई नहीं है. दूसरी ओर सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में तर्क के साथ बात करने वाले यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या ताली बजाने से गरीबों की थाली में भोजन आ जाएगा ?

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते ने कोरोना से लड़ने के लिए मोदी के राजनीतिक संदेश को दिवालिएपन की निशानी बताया है. उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने जनता को संकल्प और संयम का नारा देकर उनके भरोसे छोड़ दिया है. थाली और ताली पिटवाने का काम पूरी तरह से गैर- वैज्ञानिक है. यह वही सरकार है जिसने स्वास्थ्य बजट में बड़ी कटौती की है जिसमें एम्स के आवंटन में इस वर्ष 100 करोड़ की कटौती भी शामिल है. जब देश में कोरोना की महामारी कम्युनिटी ट्रांसमिशन के तीसरे चरण में पहुंचने जा रही है और पूरी दुनिया इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं में इजाफा और प्रभावित लोगों को आर्थिक पैकेज देने की घोषणा कर रही है तब मोदी जुमलेबाजी कर रहे हैं. संजय पराते का कहना है कि महामारी का सबसे बड़ा हमला आम जनता की रोजी-रोटी पर होने जा रहा है. रोज कमाने-खाने वाले लोगों की आय में कमी आएगी तो भूखमरी बढ़ेगी. केरल ने अपने राज्य में कोरोना से निपटने के लिए जबरदस्त तैयारी की है इसलिए सभी सरकारों को केरल की तर्ज पर ही ज्यादा से ज्यादा पैकेज देने की घोषणा करनी चाहिए ताकि गरीब लोग अपनी प्रतिरोधक क्षमता को कायम रखते हुए कोरोना का मुकाबला कर सकें.

लोग-बाग 22 मार्च को जनता कर्फ्यू  लागू करने को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं. लोगों का कहना है कि इस दिन रविवार है. क्या कोरोना का वायरस भंयकर तरीके से रविवार के दिन ही फैलेगा? बाकी दिन क्या कोरोना आराम करेगा? एक लेखक ने लिखा है- प्रधान जी के भाषण से जनता का खूब मनोरंजन हुआ. कोरोना जैसे गम्भीर मसले पर इतनी हल्की बातों की उम्मीद नहीं थी.  एक दिन के लिए जनता खुद पर कर्फ्यू लगा लेगी तो क्या हो जाएगा ? बाकी दिन? कोई दीर्घकालिक योजना तो सामने आनी थी. शाम को 5 बजे से ताली और थाली बजाकर क्या हासिल हो जाएगा. भाषण में यह तो बताया ही नहीं गया कि जनता को मास्क और सैनिटाइजर देने के लिए सरकार क्या जुगत कर रही है. देश के बाहर लोग मास्क और सैनिटाइजर निर्माण के लिए उद्योगपतियों से मदद ले रहे हैं. भारत में कितने उद्योगपतियों से मास्क और सैनिटाइजर बनाने को कहा गया है.

एक खबर में कहा गया है- मोदी की सारी अपील का निचोड़ एक इवेंट जैसा होकर रह गया है. मोदी ने कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जंग को अपनी नाटकीय शैली में एक आयोजन में तब्दील कर दिया है. भारत में ख़स्ताहाल सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को देखते हुए यह उम्मीद की जा रही थी कि वे अमेरिका, ब्रिटेन और स्पेन की तर्ज पर वे कुछ फंड का ऐलान करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. देश के गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति और भी खराब है. सोचिए... अगर गांवों तक वायरस फैला तब क्या होगा?

इधर केरल में जैसे ही कोरोना वायरस से पीड़ितों की संख्या 25 पहुंची वहां वामदलों की सरकार ने फौरन 20 हज़ार करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान कर दिया है. लोगों के घरों से बाहर नहीं निकलने की वजह से होने वाली किसी भी दिक्कतों को दूर करने के लिए जानदार रोडमैप सामने रखा गया है. इस 20 हज़ार के पैकेज में  दो महीनों के लिए दी जाने वाली पेंशन के अग्रिम भुगतान सहित जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त अनाज देने की योजना भी शामिल की गई है. जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने स्वास्थ्य सुविधाओं का दायरा बढ़ाने और इसके लिए फंड आवंटित करने के बजाय साफ-साफ कहा है- रूटीन चेकअप के लिए अस्पताल जाने की आदत से बचना चाहिए. अगर बहुत ज़रूरी लग रहा हो तो अपने जान-पहचान वाले डॉक्टर, फैमिली डॉक्टर या रिश्तेदारी वाली डॉक्टरों से फोन पर ही सलाह ले लें. अगर आपने ऐसे किसी सर्जरी की डेट ले रखी हो जो तत्काल जरूरी न हो तो इसे भी आगे बढ़वा दें. एक महीने बाद की तारीख़ ले लें.

इधर कुछ लोग  जनता कर्फ्यू को सोशल मीडिया में साइंटिफक भी बता रहे हैं. ऐसे लोगों का मानना है कि इस बार जिसने भी मोदी जी को सलाह दी है वह बेहद जानदार है. ऐसे लोगों का कहना है कि जनता कर्फ्यू रविवार के बजाय शनिवार से लागू हो जाएगा. शनिवार की रात को लोग अपने-अपने घर में पहुंच जाएंगे तो रविवार को छुट्टी के मूड़ में आ जाएंगे. इस तरह लोग सोमवार की सुबह तक छुट्टी के मूड़ में रहेंगे. इस प्रकार 37 घंटे के कर्फ्यू में जो लोग अपने शरीर पर वायरस कैरी कर रहे हैं और संक्रमित नहीं हुए हैं, उनके वायरस की चेन टूट जाएगी. ( अगर कोई वायरस नया शरीर नहीं पाएगा तो वह 24 घंटे में मर जाएगा. ) इस प्रकार करोड़ों लोगों की वह चेन टूट जाएगी जो वायरस को लेकर सड़कों पर घूम रहे थे. इस क्रम से वे लोग बच जाएंगे जो सोमवार को संक्रमित होने जा रहे थे. जनता कर्फ्यू से भले ही सौ फीसदी सुरक्षित नहीं हुआ जा सकता, लेकिन संक्रमण की दर को काफी हद तक कम तो किया ही जा सकता है.


 

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