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वे जो कल तक देशद्रोही थे... अचानक देशभक्त हो गए...भई...कमाल है !

वे जो कल तक देशद्रोही थे... अचानक देशभक्त हो गए...भई...कमाल है !

शाहीन बाग के आंदोलन से जुड़े मुस्लिम समुदाय के कुछ नेता भाजपा और आरएसएस की नजर में सांप्रदायिक और देशद्रोही थे... लेकिन हाल के दिनों में जब उन्होंने भाजपा का दामन थामा तो वे देशभक्त हो गए. ऐसा क्यों और कैसे हुआ... बता रहे हैं देश के प्रसिद्ध लेखक कैलाश बनवासी 

कैलाश बनवासी

शाहीन बाग़ में सौ दिन से भी अधिक चले शांतिपूर्ण,अहिंसात्मक आन्दोलन से जुड़े कई कार्यकर्ताओं ने 16 अगस्त को दिल्ली में भाजपा ज्वाइन कर लिया, जिसमें प्रमुख रूप से शहजाद अली और डॉ.मोहरिन हैं. गत वर्ष नवम्बर से दिल्ली का शाहीन बाग़ आन्दोलन मुख्य रूप से गृहमंत्री द्वारा लाए गए सी.ए.ए. अमेंडमेंट बिल और नागरिकता रजिस्टर कानून के विरोध को लेकर था. इस आन्दोलन की खासियत यह रही जिसने इस दौर में जन-आन्दोलन का एक नया इतिहास ही रच दिया, जिसमें इन कानूनों के विरोध में उस क्षेत्र की मुस्लिम महिलाओं —क्या किशोरियां, क्या बूढ़ी,क्या जवान--सबने शाहीन बाग़ को अपना दूसरा घर बनाकर देश को आंदोलन के एक बिलकुल नए ढंग से परिचित कराया.जिसका फैलाव आज़ादी की लड़ाई की तरह देश के कई भागों में फ़ैल गया था.जिसकी चर्चा देश-विदेशों में होती रही.इस आन्दोलन की एक और खासियत यह रही कि इन्होंने देश के संविधान से मिले धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आज़ादी को केंद्र में रखा.दिल्ली के शाहीन बाग़ के इस अनूठे आन्दोलन की तर्ज़ पर देश के अनेक शहरों में इस आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ लिया था.और यह अपनी लड़ाई में केवल मुस्लिमों का ही नहीं,सभी अमनपसंद धर्मनिरपेक्षता पर विश्वास करने वाले लोगों,संगठनों का आन्दोलन बन गया था.जिसके खिलाफ कथित देशभक्तों की कुख्यात ट्रोल एजेंसियों ने कितने भड़काऊ,विभाजनकारी और कुत्सित प्रचार किए,यह भी देश ने देखा है. इस आन्दोलन को सीधे देशद्रोह से जोड़ा गया. इसके आन्दोलनकारियों,समर्थकों को झारखंड और दिल्ली चुनाव में भाजपा के बड़े नेताओं से लेकर छुटभैये नेताओं ने जैसे ऊल-जलूल,हिंसा भड़काने वाले बयान दिए,वह भी सबके सामने है.आगे चलकर दिल्ली के सुनियोजित दंगों के पीछे भी इसके आन्दोलनकारियों के हाथ होने की बात दिल्ली और यू.पी. पुलिस द्वारा न सिर्फ कही गयी,बल्कि उन्हें,उनके समर्थक सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों,नौजवानों, प्राध्यपकों,पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को निशाने पर लाकर उनके खिलाफ़ सख्त से सख्त धाराएं –जिसमें यू.ए.पी.ए.के अंतर्गत मामले दर्ज किये गए. कईयों को जेल में डाल दिया गया,और आज तक उनकी ज़मानत भी नहीं हो सकी है.

   ऐसे में,इन कठिन परिस्थितियों के बीच जब कुछ इसके आन्दोलनकारी भाजपा ज्वाइन करते हैं तब संदेह कई तरह से गहरा जाते हैं. यह सहसा सूरज के पश्चिम से उदय होने जैसा है. इस बीच,आखिर ऐसा क्या घटित हुआ कि वे अन्दोलनकारी  को—जिन्हें कल तक दिन-रात पाकिस्तानी परस्त देशद्रोही विशेषणों से नवाज़ा जाता रहा,आज अचानक देशभक्त हो गए? इसके मुख्य नेता शहजाद अली का साक्षात्कार मीडिया में आया है,जिसमें वह इस परिवर्तन का कारण बताते हुए कह रहे हैं—“इस मामले में राजनीति ज़्यादा हुई है,जबकि सच्चाई कुछ और थी.मुसलमानों को यह सच्चाई समझने की ज़रुरत है. आज़ादी से लेकर आज तक मुसलमानों के मन में सिर्फ एक ही बात बिठाई गयी है कि आर.एस.एस –भाजपा उनकी दुश्मन है. लेकिन हमारा कहना है कि कोई हमारा डीएसटी हैया दुश्मन,सच्चाई जानने के लिए हमें उनके क़रीब जाना पड़ेगा.मुझे लगता है कि आपको जो भी सवाल करने हैं,वह व्यवस्था के एक अंग बनकर कीजिए.”( अमरउजाला ई पेपर,17 अगस्त,अमित शर्मा की रिपोर्ट)

   सवाल कई हैं.किसी भी व्यक्ति का अपना राजनीतिक विचार या दल चुनना उसका व्यक्तिगत मसला है.वह स्वतंत्र है. लेकिन जो स्थितियां हैं,उसके चलते यह बेहद चौंका देने वाली और एकबारगी अविश्वसनीय खबर है.शाहीन बाग़ आन्दोलन कोई राजनीतिक  महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित आंदलन नहीं था. वह बहुत सुनियोजित ढंग से सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के विरोध  देश के संवैधानिक,लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्षता आधारित मूल्यों को केंद्र में रखकर किया गया आन्दोलन था, जिसका ‘विजन’ किसी भी राजनैतिक दल की सतही लोकप्रियता और चुनावी क्षुद्रता से परे, उन उदार और व्यापक मूल्यों और यहाँ की मिली-जुली संस्कृति को बढ़ावा देने वाला था. यही कारण है कि यह देश भर में हर भाग में,हर प्रगतिशील वर्ग में जगह बना सकी ,और आन्दोलन को क्षेत्रीय कलाकारों,छात्रों,संस्कृतिकर्मियों, ट्रेड यूनियनों से लेकर सिनेमा उद्योग के बड़े-बड़े नामचीन हस्तियों का इसको समर्थन मिला.

   आज वे सभी भौचक होंगे. और बहुत अधिक निराश. क्योंकि इसके राजनीतिक-प्रेरित होने या राजनीतिक लाभ लेने की बात आन्दोलन के चरित्र में उन्होंने नहीं पाया था,अन्यथा इतनी विशाल संख्या में समर्थन नहीं मिला होता. कुछ आन्दोलनकारियों के इस कदम ने इस आन्दोलन की मंशा पर नए सिरे से प्रश्न खड़े कर दिए हैं. उनका यह परिवर्तन पहली नज़र में स्वतःस्फूर्त तो कतई नहीं,बल्कि सायास और अपनी निभाई भूमिका का राजनीतिक लाभ लेनेवाला अधिक लगता है. दूसरे यह उस आन्दोलन के भरोसे को बहुत निष्ठुरता के साथ तोडनेवाला लगता है. इस कदम का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि भविष्य के ऐसे किसी भी जन-आन्दोलन के प्रति यह गहरा यह संदेह पैदा करनेवाला है,जिसके चलते लोगों का ऐसे आंदोलनों पर भरोसा कर पाना मुश्किल होगा. कुछ स्वार्थी लोगों के कारण इतना बड़ा आन्दोलन शर्मसार हुआ है,जो एक बार फिर हमारे नैतिक और आधिकारिक मूल्यों के बड़ी तेज़ी से क्षरण की कहानी कह रहा है, जो राजनीति में आज कोरोना वायरस की ही तरह बहुत तेज़ी से फ़ैल गया है,जिसके उदाहरण पिछले कुछ समय में हम कर्नाटक.महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश और राजस्थान में देख चुके हैं,जहां राजनेताओं की सत्ता,अधिकारों,शक्तियों की अपनी हवस जनता के मतों, ज़रूरतों और आकाक्षाओं रौंदती चली जाती है. 

  इसी के साथ इसके पीछे छुपे हुए कुछ एजेंडों पर भी ध्यान स्वाभाविक रूप से चला जाता है. क्या इसके पीछे कुछ दबाव काम कर रहे हैं? इन ‘दबावों’ से तो आज देश की अनेक संस्थाएं ग्रस्त है जिसके नमूने  चुनाव आयोग, न्यायपालिका,सी,बी.आई.,आर.बी.आई. या एन.आई.ए. की कार्यवाहियों में देश देख रहा है. यही नहीं,जिस ‘आपरेशन लोटस’ की चर्चा की जाती है,उसके मोहपाश से जब बड़े-बड़े दिग्गज और बरसों पुराने कार्यकर्ता नहीं बच सके,तब इन नए लोगों की क्या बिसात? आज की राजनीति किसी भी बड़े राष्ट्रीय,सामाजिक उद्देश्यों, नैतिक मूल्यगत निष्ठाओं को तिलांजली देकर साम दाम दंड भेद  ‘पावर’ हासिल करने का शतरंजी खेल बन गया है; जिसके लिए ठीक ही कहा जाता है कि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है न दुश्मन. यह एक बार फिर हम अपने सामने चरितार्थ होता देख रहे हैं. निश्चित रूप से यह भाजपा की बड़ी जीत है,जो उन्हें अपने खेमे में ले आए जिनके आने की कल्पना कुछ महीने पहले कोई भी नहीं कर सकता था.

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