संस्कृति

भिलाई में आया... पेड़ा नहीं खाया

भिलाई में आया... पेड़ा नहीं खाया

छत्तीसगढ़ के भिलाई में एक पेड़ा बेचने वाला बूढ़ा था. सफेद पैन्ट-सफेद शर्ट, सफेद जूता, सिर पर सफेद टोपी. बिल्कुल राजकपूर वाली. हाथ में छड़ी और कंधे पर टिन का डिब्बा. डिब्बे में लगा सुंदर सा कांच और कांच के भीतर  से झांकते और मन को लालच से भर देने वाले पेड़े.यह बूढ़ा जब भी सड़क से गुजरता तो तुकबंदी करता-

भिलाई में आया... पेड़ा नहीं खाया. भिलाई में कायकू आया... अगर पेड़ा नहीं खाया.

अगर कोई बच्चा पेड़े वाले को छेड़ दे तो फिर जवाब मिलता था- क्यों मां-बाप ने यहीं सिखाया. दुनिया में काय को आया? बच्चे फिर छेड़ते- पेड़े में आटा मिलाया... जवाब मिलता- कौन भौ....... ड़ी वाला चुगली लगाया.

बूढ़ा कौन था? क्या था ? इस बारे में मुझे कुछ भी नहीं मालूम...। जब भी इधर-उधर से कुछ मालूम करने की कवायद करता तो बस इतना पता चलता कि बूढ़ा केम्प वन भिलाई की एक झोपड़ी में रहता है.शायद बाल-बच्चों ने घर से निकाल दिया था. बूढ़े की झकाझक सफेद ड्रेस और वाइट कलर की हेट देखकर कुछ लोग उसे दूसरे देश का जासूस भी बताते थे? भले ही राजन- इकबाल और नन्हा जासूस बबलू दिलो-दिमाग पर हावी थे, लेकिन मुझे नहीं लगता था बूढ़ा कोई जासूस होगा? और भी जासूस पेड़ा क्यों बेचेगा? 

भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उस समय मोदी हमारे मुखिया जी नहीं थे अन्यथा तय था कि गरीब पेड़े वाले को पाकिस्तान का जासूस ठहरा दिया जाता. हर रोज गरीबी और मुफलिसी में मर-मरकर जीने और ड्रेस कोड को मेन्टेन करने वाला बूढ़ा सही में जासूसी के आरोप में जेल की सलाखों के पीछे होता और अपमानित होकर दुनिया से कूच कर गया होता? 

वैसे जो लोग भिलाई के रहने वाले हैं वे एक गूंगे लड़के भी वाकिफ होंगे. दुबला- पतला बिल्कुल रंगकर्मी सुप्रियो सेन जैसा नजर आने वाला यह लड़का हर जगह दिखाई देता था. कहीं कोई घटना घटी... और अगर आप उस जगह से गुजर रहे हैं तो गूंगा आपको ऊं आ... ऊं आ करते हुए मिल जाएगा. बताते हैं कि यह गूंगा पुलिस के लिए मुखबिरी का काम का करता था. हर थाने में उसकी दखल थीं. थानेदार और पुलिस वाले उसे अपने साथ लेकर चलते थे. गूंगे को अभिताभ बच्चन की फिल्मों का शौक था. जब भी अमिताभ की फिल्म लगती वह बिल्कुल अभिताभ स्टाइल वाली बेलबाटम पहनकर टाकीज पहुंच जाया करता था. अच्छी-खासी भीड़ को चीरकर वह सीधे गेटकीपर या मैंनेजर से मिलता और ऊं आ... ऊं आ करके फिल्म देखने बैठ जाता और इंटरवेल में समोसा भी खाता.

यूं तो भिलाई में एक बेर बेचने वाला भी गाना गाते हुए सड़क से गुजरता था- बेर लो...बेर लो...बेर लो... तेरे- मेरे नसीबों का? हम सबके नसीबों का ? छिटकना भई छिटकना... बाबू भैया छिटकना... चले आव-चले आव. 

एक मरियल- खपियल सी साइकिल में दो बड़े से झोले में नड्डा लेकर एक शख्स और नजर आता था. नड्डे को ऊंगली में फंसाकर खाने का मजा ही कुछ और था. वैसे भिलाई में एक बहुत ही शानदार रंगकर्मी का नाम नड्डा है. एक किसी बड़े नेता जी का सरनेम भी नड्डा है, लेकिन मुझे नड्डे का पीला कलर और नेताजी की पार्टी के झंडे का कलर पंसद नहीं हैं इसलिए नड्डा खाना बंद कर दिया है. गांव और कस्बों के बाजारों में नड्डा अब भी मिलता है. अब भी बहुत से प्रगतिशील और जनवादी लोग चखने में नड्डे का उपयोग करते हैं. जो लेखक मित्र दारू के साथ नड्डे का प्रयोग करते हैं, उन्हें देखकर गाने का मन करता है- समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई.

राजकुमार सोनी की फेसबुक वाल से 
 

 

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