देश

मुख्यमंत्री बघेल ने खाद्य मंत्री राम विलास पासवान से साधा संपर्क तब जाकर 24 लाख मीट्रिक चावल खरीदी पर लगी मुहर

रायपुर. धान खरीदी को लेकर चल रहे विवाद के बीच केंद्र छत्तीसगढ़ का चावल खरीदने को तैयार नहीं था, लेकिन इस मामले को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने प्रयासों से बेहद आसान बना दिया. वे लगातार केंद्रीय खाद्य मंत्री राम विलास पासवान के संपर्क में थे. मुख्यमंत्री ने चावल की खरीदी के लिए कई मर्तबा पासवान से फोन पर संपर्क साधा. हर बार उनका यही कहना होता था कि यह छत्तीसगढ़ के किसानों से जुड़ा बेहद गंभीर मामला है. अततः उन्होंने खाद्यमंत्री को 24 लाख मीट्रिक टन चावल खरीदने के लिए केंद्र को तैयार कर लिया. मुख्यमंत्री की कवायद में मुख्य सचिव आरपी मंडल भी अपनी अहम भूमिका निभाई. मुख्य सचिव मंडल गत दो दिनों से एक अहम बैठक के सिलसिले में दिल्ली में ही थे. मुख्यमंत्री से मिले निर्देश के बाद उन्होंने केंद्रीय खाद्य सचिव को चावल की खरीदी के विशेष आग्रह किया. प्रदेश के खाद्य सचिव कमलप्रीत भी उनके साथ थे. आखिरकार गुरुवार को केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ को पत्र लिखकर यह सूचना दी कि भारतीय खाद्य निगम 24 लाख मीट्रिक टन उसना चावल खरीदेगा.

राज्य की मांग है 32 लाख मीट्रिक टन

सेंट्रल  पुल में 24 लाख मीट्रिक टन चावल खरीदी पर सहमति तो बन गई है, लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य की मांग 32 लाख मीट्रिक टन है. खबर है कि इस मांग की पूर्ति के लिए मुख्य सचिव आरपी मंडल खाद्य विभाग के अफसरों को लेकर जल्द ही दिल्ली का रुख करेंगे. वैसे गुरुवार को केंद्रीय मंत्रालय की नरमी के बाद छ्त्तीसगढ़ ने राहत की सांस ली है. 

विशेष टिप्पणी

याद रखिए संपादक जी... क्रांतिकारी कभी बूढ़ा नहीं होता है.... और हां...कभी मरता भी नहीं है.

राजकुमार सोनी

प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और दमन के खिलाफ अनेक जनआंदोलन की अगुवाई करने वाले लाखन सिंह भले ही एक काया के तौर पर इस दुनिया का हिस्सा नहीं है, लेकिन उनकी मौजूदगी हर समय विद्यमान रहने वाली है. कभी वे बिलासपुर के नेहरू चौक में नजर आएंगे तो कभी रायपुर के बूढ़ातालाब के पास... तो कभी बस्तर में आदिवासियों के साथ.निजी तौर पर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि वे इस दुनिया से कूच कर गए हैं. इस देश के तमाम चड्डीधारी लाख कोशिश कर लें, लेकिन न तो वे इतिहास को फांसी पर लटका पाएंगे और न ही उनकी दिली ख्वाहिश से विचारधारा की मौत होने वाली है. दोस्तों... क्रांतिकारियों की मौत कभी नहीं होती. क्रांतिकारी कभी नहीं मरते.

लाखन सिंह...जिन्हें हम सब लाखन भाई कहते थे, उनसे मेरा पहला परिचय कब और किस दिन हुआ यह बताना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन मुझे याद है कि जब तहलका में था तब मैंने एक खबर के सिलसिले में वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल से नंबर लेकर उन्हें फोन किया था. एक खबर के लिए महज एक छोटी सी जानकारी हासिल करने का मामला धीरे-धीरे एक दूसरे तरह के रिश्ते में बदल गया. वे एक पत्रकार की पसन्द बन गए. ( हालांकि वे जनसरोकार से जुड़ी खबरों पर काम करने वाले हर पत्रकार की पहली पसंद थे. ) मुझे किसी भी खबर में कुछ पूछना होता तो उन्हें आवश्यक रुप से याद करता था. सामान्य तौर पर अखबार में काम करने वाले संवाददाताओं को मालिक और उनके द्वारा नियुक्त किए गए चिरकुट संपादक समय-समय पर हिदायत देते रहते हैं- देखिए ज्यादा... रिश्ते मत बनाइए... प्रोफेशनल रहिए... अखबार को जितनी जरूरत है उतनी बात करिए... लेकिन मैं मालिक और चड्डीधारी संपादक की परवाह किए बगैर उनसे बात करता था और लगातार बात करता था.

कथित मुख्यधारा की पत्रकारिता के अंतिम दिनों में संघ की विचारधारा को बीज-खाद और पानी देकर पोषित करने वाले जिस अखबार में फंसा हुआ था वहां एक स्थानीय संपादक को लाखन भाई से खास तरह की चिढ़ थीं. जब भी लाखन भाई का नाम खबर में लेता वे सीधे-सीधे कहते- यार... किस काम का यह वर्शन. अखबार को दो पैसे का फायदा मिले...यह देख-समझकर काम करना चाहिए. इस बूढ़े क्रांतिकारी का पक्ष छापकर क्या मिलेगा. मेरा जवाब होता- बेशक आप उनका पक्ष हटा सकते हैं, लेकिन संपादक जी आपको यह तो पता होना चाहिए कि एक क्रांतिकारी कभी बूढ़ा नहीं होता. आप इस क्रांतिकारी को ठीक से जानते नहीं है. क्या आप एक बार भी पूरे दिन तेज गरमी में तख्ती लेकर किसी चौक में खड़े हो सकते हैं? संपादक कहते- मैं क्यों खड़ा रहूंगा. यह मेरा काम नहीं है. मैं उनसे पूछता- एक अखबार में जनसरोकार से जुड़ी खबरों को पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए... इस सिद्धांत तो आप जानते ही होंगे. अखबार में काम करने वाले संपादक और उसके रिपोर्टर को किसके पक्ष में खड़े रहना है इसकी सामान्य जानकारी भी आपके पास होगी ही, लेकिन क्या आप ऐसा कर पा रहे हैं ? बस... संपादक जी का आखिर वाक्य होता- यार... मुझसे बहस मत करो.

बावजूद इसके लड़-भिंडकर मैं लाखन भाई ( उनके विचारों के लिए ) गुंजाइश निकालता रहा. डाक्टर रमन सिंह के शासनकाल में जब बस्तर एक बड़े हिस्से में निर्दोष आदिवासियों पर अत्याचार बढ़ा तब लाखन भाई शालिनी गेरा, प्रियंका शुक्ला सहित बस्तर की आदिवासी बच्चियों के साथ अक्सर रायपुर आते थे. कभी वे प्रेस कांफ्रेन्स करते तो कभी सीधे मुझसे मिलने अखबार के दफ्तर चले आते. उन्हें देखते ही विचार और कद से ठिगनु स्थानीय संपादक का पारा चढ़ जाता. वे फूं-फां- फूं-फा करने लगते. नाक-भौ सिकुड़ने लगते. ( अब संघ के दफ्तर में तब्दील हो चुके अखबार के दफ्तर में कोई क्रांतिकारी पहुंच जाएगा तो फूं-फां झूं-झा का होना स्वाभाविक ही था. )

धीरे-धीरे लाखन भाई छपना बंद हो गए. मुझे  राजनीति/ प्रशासन/ आदिवासी इलाकों की बीट को देखने से रोक दिया गया. मैं सांस्कृतिक खबरों को कव्हरेज करने लगा था. एक रोज लाखन भाई ने मुझे बताया कि मैं जिस अखबार के लिए काम करता हूं उसके बिलासपुर संस्करण ने भी आंदोलन की खबरों को छापना बंद कर दिया है. मैंने लाखन भाई को बताया वहां का संपादक भी मोदी का परम भक्त है. बात-बात में लघुत्तम-सर्वोत्तम, घटोत्तम-चट्टोत्तम और अतिउत्तम करते रहता है. चिंता करने की कोई बात इसलिए नहीं है क्योंकि ढंग से पढ़ने-लिखने वाला कोई भी शख्स उसे गंभीरता से नहीं लेता है. आप भी मत लीजिए. केवल फिल्मों मेंं ही नहीं पत्रकारिता मेंं भी बहुत से लोग उदय चोपड़ा होते हैं.

ऐसा क्या ? बोलकर लाखन भाई मेरी बात से सहमत हो गए और फिर धीरे से  सीजी बास्केट को लांच करने की योजना बनी. खबरों की इस बास्केट को लांच करने का एक मकसद ही यहीं था कि भाजपा के शासनकाल में जनआंदोलन से जुड़ी खबरों को बुरी तरह से दबाया जा रहा था. अब मेरे द्वारा जो कुछ भी लिखा जाता उसे वे सीजी बास्केट में अवश्य छापते. जब तबादले में कोयम्बटूर भेजा गया तब भी वक्त निकालकर मैं उनके सीजी बास्केट के लिए खबरें लिखता रहा. मेरी खबरों में वे मेरा नाम लिखते थे- विक्रम वरदराजन. विधानसभा चुनाव के रिजल्ट से कुछ पहले मैंने उन्हें खबर भेजी कि भाजपा 15 से 20 सीटों पर सिमट जाएंगी. उन्होंने फोन किया और कारण जानना चाहा. मैंने भी हंसते हुए कहा-क्या लाखन भाई... आज तक विक्रम वरदराजन की कोई रिपोर्ट झूठी निकली है क्या ?

उनसे साथ अपने रिश्तों के सैकड़ों किस्से याद आ रहे हैं. अभी लगभग दो-तीन महीने पहले मैं उनके और जीएसएस के सुबोध भाई के साथ छत्तीसगढ़ी फिल्मों के सामने चुनौतियां विषय पर आयोजित की गई एक गोष्ठी का हिस्सा था. इस गोष्ठी में गरमा-गरम बहस के कुछ दिनों बाद ही वे ही सुबोध जी के साथ मेरे निवास आए. उनके साथ अनुज भी था. हम सब पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म का निर्माण करने वाले मनुनायक जी को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जी से मिलने गए थे. मुख्यमंत्री बघेल एक घरेलू टी-शर्ट पहनकर बैठे थे. उसी टी-शर्ट में उन्होंने फोटो भी खिंचवा ली. उनका ठेठ छत्तीसगढ़ियां अंदाज देखकर वे बहुत खुश हुए और जब लौटे तो आग्रह किया कि कुछ ठेठ अदांज में सीजी बास्केट के लिए मनु नायक जी का एक इंटरव्यूह कर लूं. मैं उनके आदेश और आग्रह को ठुकराने की स्थिति में कभी नहीं रहा. मैंने यह इंटरव्यूह किया. 

बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें देखकर आप खुश हो पाते हैं. जब भी कोई आयोजन हो... आंदोलन हो... लाखन भाई को देखते ही खुश हो जाता था. पतली-दुबली काया... पैरों में मामूली सी चप्पल, सफेद बाल और जानलेवा दमे के बावजूद  हंसता हुआ उनका चेहरा रह-रहकर याद आ रहा है. इस चेहरे के साथ आलोक शुक्ला, प्रियंका, अनुज, रोशनी, ईशा खंडेलवाल, शालिनी गेरा, लता, श्रेया, निकिता सहित उन्हें चाहने वाले हजारों-हजार नौजवानों का साथ भी याद आ रहा है. मुझे नहीं लगता कि उन्हें चाहने वाले उन्हें यूं ही कभी खारिज होने देंगे. नौजवान साथी उन्हें सबसे ज्यादा पसंद करते थे. रात हो बिरात हो... चाय पीनी हो, काफी पीनी हो... कोई बात हो... लाखन भाई... लाखन भाई... लाखन भाई... बस लाखन भाई... । याद रखिए संपादक जी... जो क्रांतिकारी बच्चों और नौजवानों के बीच मौजूद होता है वह कभी बूढ़ा नहीं होता है.... और हां... कभी मरता भी नहीं है. आपके अखबार में जगह नहीं देने से क्या घंटा होता ?

 

 

फिल्म

अब लव के पीछे लट्ठ लेकर पड़ गए हैं छत्तीसगढ़ के फिल्मकार

राजकुमार सोनी

अमीर परिवार से ताल्लुक रखने वाली हीरोइन, गरीब परिवार का हीरो, हीरोइन का तालाब में गिरना, हीरो का उसे बचाना, प्यार का इकरार, फिर दो प्यार करने वालों के बीच छिछोरे किस्म के खलनायक की इंट्री... बेमतलब की बारिश में लपड़-झपड़ और ढिशुंम- ढिशुंम...

हिंदी फिल्मों के ये सारे फार्मूले भले ही मुंबई में बासी पड़ गए हों, लेकिन छत्तीसगढ़ी सिनेमा में अब भी इनकी धूम बरकरार है. छत्तीसगढ़ में हर दूसरे पखवाड़े जेमिनी और एवीएम प्रोडक्शन की मद्रासी तासीर वाली फिल्मों का प्रदर्शन होता है. खेती-खार, आटो-ट्रैक्टर बेचकर और ज्यादा हुआ तो एक-दूसरे को टोपी पहनाकर फिल्म का निर्माण करने वाले फिल्मकार चोरी-चकारी से निर्मित फिल्म को ही अपने जीवन की उपलब्धि मान बैठे हैं और अपनी दुनिया में खुश है. सच तो यह है कि छत्तीसगढ़ का एक भी सुधि दर्शक चोरी-चकारी करने वाले फिल्मकार को गंभीरता से नहीं लेता है. सुधि दर्शक अगर कभी गलती से फिल्म देखने चला गया तो खुद पर हंसता है. खुद को गालियां देता है कि कहां फंस गया. कोसता है. अपने माथे को लहू-लुहान करने के लिए दीवार की तलाश करता है, लेकिन इससे आत्ममुग्ध निर्माता-निर्देशकों को फर्क नहीं पड़ता... उनका अपना संसार है. वे गदगद रहते हैं और निर्बाध गति से मरियल- सड़ियल सी कहानी में सेंध मारने के काम में लगे रहते हैं. अगर गलती से किसी ने उन्हें टोका तो वे लामबंद हो जाते हैं और नारे लगाते हैं-ज्यादा आलोचना करने की खुजली लगी है तो फिल्म बनाकर दिखाओ....?

राज्य निर्माण के बाद यहां लगभग साढ़े तीन-सौ के आसपास फिल्में रिलीज हो चुकी हैं, लेकिन सात-आठ फिल्मों को छोड़कर ज्यादातर फिल्में अपनी लागत तक वसूल नहीं पाई है. किसी निर्माता से पूछो कि भइया... ऐसा क्यों हो रहा है तो वह तुरन्त रटा-रटाया उत्तर देगा- देखिए... छत्तीसगढ़ में सिंगल थियेटर की कमी है. छबिगृह बंद हो रहे हैं. सरकार सब्सिडी नहीं देती, लेकिन कभी नहीं कहेगा कि भाई साहब... हम लोग मौलिक कहानी पर काम नहीं करते.घटिया फिल्में बनाते हैं... हद दर्जें केअलाल है और मेहनत से जी चुराते हैं.

वर्ष 2000 में जब राज्य का निर्माण हो रहा था तब मोर छंइया-भुइंया जैसी एक फिल्म आई थी. एक गांव की पारिवारिक कहानी पर बनी यह फिल्म इसलिए चल निकली क्योंकि जिस दौरान राज्य बना उस समय हर तरफ खुशी का माहौल था. प्रदेश के हर दूसरे व्यक्ति को यह लग रहा था कि अब उसे एक नई पहचान मिलने जा रही है. फिल्म में स्थानीयता की जबरदस्त रंगत और उमंग के वातावरण की वजह से लोग-बाग थियेटर तक खिंचे चले आए. इस फिल्म की सफलता के बाद पंद्रह से बीस लाख लगाकर करोड़ों रुपए कमाने का नुस्खा लोगों को इतना अधिक भा गया कि हर गली-कूचे में आड़े-तेड़े निर्माता-निर्देशकों की फौज दिखाई देने लगी. जिसे देखो वहीं फिल्म बनाने के काम-धंधे में लग गया था.हर निर्माता और निर्देशक अपनी फिल्म के नाम के आगे-पीछे मोर ( मेरा ) शब्द का इस्तेमाल करने लगा- मोर संग मितवा, मोर धरती मैया, मोर संग चलव, मोर गांव- मोर धरम, माटी मोर महतारी, मोर सपना के राजा, मोर गंवई, ए मोर बांटा, अब मोर पारी हे, मोर सैंया, सुंदर मोर छत्तीसगढ़, मोर जोड़ीदार.... ( और भी न जाने कितने मोर ??? )

जब लोग मोर से बोर गए तो प्रेम चंद्राकर फिल्मों में मया ( प्रेम ) की बहार लेकर आए. उनकी फिल्म मया देदे- मया लेले औसत कहानी के बावजूद हिट रही. उसके बाद  परदेसी के मया, मया देदे मयारु, मया ने भी ठीक-ठाक व्यवसाय किया. बस फिर क्या था... मया ब्रांड की फिल्मों की कतार लग गई. मया होगे रे, तोर मया के मारे, मया के बरखा, मया म फूल मया मा कांटे, तोर मया मा जादू हे... और भी न जाने कितनी मया... मगर बाद में किसी भी मया ने टिकट खिड़की पर पानी नहीं मांगा.

अब लव की बारी

वैसे तो छत्तीसगढ़ की हर फिल्मों में एक प्रेम कहानी चलती है, लेकिन पिछले कुछ समय से मया-फया का स्थान अंग्रेजी शब्द लव ने ले लिया है. कुछ समय पहले निर्माता मोहन सुंदरानी ने आईलवयू नाम की फिल्म बनाई थी. इस फिल्म ने टिकट खिड़की पर धमाल मचाया तो उन्होंने आईलवयू टू बना डाली.  बताते हैं कि उनकी दूसरी फिल्म ने पहले जैसा व्यवसाय नहीं किया, बावजूद इसके लागत निकल गई. उनकी इस सफलता के बाद लव ब्रांड फिल्मों का ट्रेंड चल निकला है. अभी छबिगृह में मुंबई के पाव बड़ा और मद्रास के मसाला दोसा का अजीबो-गरीब स्वाद देने वाली फिल्म लव दीवाना चल रही है. इस फिल्म के बाद यह भी प्रचारित हो रहा है कि छत्तीसगढ़ को उनका अपना सलमान खान मिल गया है. ( हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ अपना नायक कुमार गौरव या सलमान खान में नहीं बल्कि गांव के मजदूर और किसान में ही तलाश करता रहा है.)

बहरहाल किसान-मजदूर की समस्याओं से दूर शहर के चौराहें लव-लव से पटे हुए हैं. आने वाले दिनों में भी शायद ऐसा ही हो क्योंकि आ रही है फिल्म- सारी लव यू जान, लव लेटर, लव मैरिज, मोला लव होगें, तोर-मोर लव स्टोरी....... ( और भी न जाने कितने प्रकार के लव )

इतना ज्यादा लव हो गया है कि ट्रैफिक जाम हो गया है.