देश

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की यह तस्वीर हो रही है जमकर वायरल

रायपुर. शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के जन्मदिन के मौके पर प्रदेश के असंख्य लोगों और संगठन से जुड़े लोगों ने मुलाकात की. मुख्यमंत्री निवास पर एक महिला अपने छोटे से बच्चे के साथ बधाई देने पहुंची थीं. बच्चे को देखते ही मुख्यमंत्री के चेहरे पर मुस्कान तैर गई. उसके बाद जो कुछ हुआ वह इस तस्वीर मेंं कैद है. छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध छायाकार गोकुल सोनी की यह तस्वीर सोशल मीडिया मेंं जमकर वायरल हो रही है. तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया में कई तरह की टिप्पणियां लिखी गई है. एक पाठक ने लिखा है- भविष्य सुरक्षित हाथों मेंं. एक पाठक की टिप्पणी है- वर्तमान और भविष्य साथ-साथ.

विशेष टिप्पणी

अरे...रवीश कुमार ने तो रूला दिया

देश के प्रसिद्ध पत्रकार रवीश कुमार ने रेमन मैग्सेसे अवार्ड पाने के बाद अपने दर्शकों/ पाठकों और चाहने वालों के प्रति आभार जताया है. आभार पढ़कर रुलाई छूट जाती है.
आप भी रो लीजिए...कभी-कभी ऐसा रोना भी अच्छा लगता है.

आपका लिखा हुआ मिटाया नहीं जा रहा है। सहेजा भी नहीं जा रहा है। दो दशक से मेरा हिस्सा आपके बीच जाने किस किस रूप में गया होगा, आज वो सारा कुछ इन संदेशों में लौट कर आ गया है। जैसे महीनों यात्रा के बाद कोई बड़ी सी नाव लौट किनारे लौट आई हो। आपके हज़ारों मेसेज में लगता है कि मेरे कई साल लौट आए हैं। हर मेसेज में प्यार,आभार और ख़्याल भरा है। उनमें ख़ुद को धड़कता देख रहा हूं। जहां आपकी जान हो, वहां आप डिलिट का बटन कैसे दबा सकते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है कि किसी का मेसेज डिलिट नहीं हो रहा है। चाहता हूं मगर सभी को जवाब नहीं दे पा रहा हूं। 

व्हाट्स एप में सात हज़ार से अधिक लोगों ने अपना संदेशा भेजा है। सैंकड़ों ईमेल हैं। एस एम एस हैं। फेसबुक और ट्विटर पर कमेंट हैं। ऐसा लगता है कि आप सभी ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया है। कोई छोड़ ही नहीं रहा है और न मैं छुड़ा रहा हूं। रो नहीं रहा लेकिन कुछ बूंदे बाहर आकर कोर में बैठी हैं। नज़ारा देख रही हैं। बाहर नहीं आती हैं मगर भीतर भी नहीं जाती हैं। आप दर्शकों और पाठकों ने मुझे अपने कोर में इन बूंदों की तरह थामा है। 

आप सभी का प्यार भोर की हवा है। कभी-कभी होता है न, रात जा रही होती है, सुबह आ रही होती है। इसी वक्त में रात की गर्मी में नहाई हवा ठंडी होने लगती है। उसके पास आते ही आप उसके क़रीब जाने लगते हैं। पत्तों और फूलों की ख़ुश्बू को महसूस करने का यह सबसे अच्छा लम्हा होता है। भोर का वक्त बहुत छोटा होता है मगर यात्रा पर निकलने का सबसे मुकम्मल होता है। मैं कल से अपने जीवन के इसी लम्हे में हूं। भोर की हवा की तरह ठंडा हो गया हूं। 

मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। आस-पास मेरे जैसे ही लोग हैं। आपके ही जैसा मैं हूं। मेरी ख़ुशी आपकी है। मेरी ख़ुशियों के इतने पहरेदार हैं। निगेहबान हैं। मैं सलामत हूं आपकी स्मृतियों में। आपकी दुआओं में। आपकी प्रार्थनाओं में। आपने मुझे महफ़ूज़ किया है। आपके मेसेज का, आपकी मोहब्बत का शुक्रिया अदा नहीं किया जा सकता है। बस आपका हो जाया जा सकता है। मैं आप सभी को होकर रह गया हूं। बेख़ुद हूं। संभालिएगा मुझे। मैं आप सभी के पास अमानत की तरह हूं। उन्हें ऐसे किसी लम्हें में लौटाते रहिएगा। 

बधाई का शुक्रिया नहीं हो सकता है। आपने बधाई नहीं दी है, मेरा गाल सहलाया है। मेरे बालों में उंगलियां फेरी हैं। मेरी पीठ थपथपाई है।  मेरी कलाई दबाई है। आपने मुझे प्यार दिया है,मैं आपको प्यार देना चाहता हूं। आप सब बेहद प्यारे हैं। मेरे हैं।

( रवीश कुमार )

 

 

 

फिल्म

लेखक अंजन कुमार का कहना है-अगर कला को जिंदा रखना है तो देखी जानी चाहिए मंदराजी

अंजन कुमार पिछले कई वर्षों से छत्तीसगढ़ी सिनेमा संस्कृति के नाम पर बम्बईया छाप फिल्म की नकल ही कर रही है। इन फिल्मों में कुछ नया या मौलिक काम देखने को नहीं मिलता। घोर व्यवसायिक मानसिकता और सस्ती लोकप्रियता की आत्ममुग्धता में लीन यह फिल्में छत्तीसगढ़ी सिनेमा को कोई दिशा या ऊँचाई दे पायेगी फिलहाल ऐसा कुछ दिख नहीं रहा। जबकि छत्तीसगढ़ में अच्छे लेखक, अच्छे कलाकार, अच्छे विषयो और फिल्मों के अच्छे जानकारों की कोई कमी नहीं है। बस कमी है तो उस गंभीरता और बैचेनी की जिससे अच्छी फिल्मों का सृजन होता है और वैश्विक पहचान मिलती है। छत्तीसगढ़ी सिनेमा अपनी इस कूपमंडूकता से बाहर निकलकर कब कोई महत्वपूर्ण फिल्म बना पायेगी और छत्तीसगढ़ को एक पहचान दे पायेगी, फिलहाल इसका इंतजार हैं। लेकिन इसी बीच हाल में ही रिलीज हुई विवेक सारवा द्वारा निर्देशित छत्तीसगढ़ की लोककला नाचा के जनक दाऊ दुलार सिंह मंदराजी पर बनी पहली बायोपिक फिल्म ‘दाऊ मंदराजी’को देखने का अवसर मिला। छत्तीगढ़ के ऐसे फिल्मी माहौल में जब किसी भी सामाजिक सरोकार से परे फिल्म का मतलब कुछ भी परोसकर पैसा कामना हो। ऐसे व्यवसायिक समय में यदि कोई फिल्म निर्देशक बाजारु और चालु टाइप की छत्तीसगढ़ी फिल्म के बरअक्स छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति नाचा के जनक महान कलाकार दाऊ मंदरा जी पर बायोपिक फिल्म बनाने का जोखिम उठाता है तो निश्चित तौर पर यह काबिले तारीफ है। यह अपने आप में एक साहसिक एवं चुनौती पूर्ण कदम है। जिसकी सहराना की जानी चाहिए। और वैसे भी वह कलाकार और फिल्म ही क्या जो जोखिम उठाने का साहस न रखती हो। क्योंकि किसी भी कला को बनने में सदिया लग जाती है, पर उसे खत्म होने में कोई समय नहीं लगता। और कला को सही मायने में बचाने वाले वही लोग होते हैं। जिनका जीवन मंदराजी की तरह कला को रचने, विकसित करने और बचाने के लिए समर्पित होता हैं। कोई सच्चा कलाकार कला के लिए कितना बैचेन और संघर्षरत होता है। उसके भीतर कितनी मानवीय संवेदना होती है। जिसकी चिंता में कला के साथ समाज भी शामिल होता है। वह कला जिसका सीधा संबंध जनता से होता है। और जनता को शिक्षित करना ही कला का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है। इस उद्देश्य को यह फिल्म बहुत अच्छे से दिखाती है। दाऊ मंदरा जी का जीवन संघर्ष वस्तुतः एक सच्चे कलाकार का जीवन संघर्ष है जो कला के लिए सही मायनों में प्रतिबद्ध है। यहाँ जाकर यह कहानी विश्व की उन सभी प्रतिबद्ध कलाकारों के जीवन की कहानी से जुड़ जाती है। जिनके जीवन का अंत कला को जीवित रखने की चिंता और संघर्ष में ऐसी ही विषम व त्रासदपूर्ण स्थितियों में हुआ। यह फिल्म दाऊ मंदराजी के जीवनसंघर्ष के साथ ही छत्तीसगढ़ी नाचा जैसी महत्वपूर्ण लोक कला के संघर्ष और विकास की गाथा को भी दिखाती है। मंदराजी ने रवेली नाचा के माध्यम से नाचा का कैसे विकास किया उसे लोकप्रियता की ऊँचाई तक किस तरह पहुँचाया और उसके बाद कैसे व्यवसायिकता ने लोक कलाकारों को प्रभावित किया और लोककला अपनी सामाजिक भूमिका से कैसे भटक गई। इन सारी स्थितियों-परिस्थितियों के यथार्थ को यह फिल्म बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है। बायोपिक फिल्मों में घटनाओं का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इन्हीं घटनाक्रमों के माध्यम से किसी के चरित्र का निर्माण व विकास दिखाया जाता है। यह फिल्म भी ऐसे ही घटनाक्रम को प्रारंभ से प्रस्तुत करती चलती है। फिल्म के पहले भाग में यह घटनाक्रम कुछ बिखरा-सा जरूर प्रतीत होता है लेकिन दूसरे भाग में घटनाओं का निर्वाह बहुत अच्छे से किया गया है। जिससे दाऊ मंदराजी के सम्पूर्ण व्यकित्व के विकास का पता चलता हैं। नाचा और नाचा के कलाकारों के प्रति उनका जो गहरा लगाव है। उसे इस फिल्म में बहुत ही खूबसूरती और संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है। कला के संबंध में जो उनके संवाद है। वह कहीं-कहीं इतने काव्यात्मक है कि कला का जीवन और जगत के साथ जो गहरा संबंध है, उसे बहुत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त करते है। मंदराजी ने नाचा को केवल मनोरंजन के उद्देश्य तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि कला को उसकी सामाजिकता के साथ जोड़कर देखा और उसका उसी रूप में विकास किया। कोई भी कला अपनी सामाजिकता में ही सार्थक और प्रासंगिक होती है। तथा सामाजिक हित में तथा अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध के रूप में उसका प्रयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए। इसे इस फिल्म में बहुत ही सार्थक ढंग से दिखाया गया हैं। फिल्म का वातावरण समय सापेक्ष दिखाने का प्रयास किया गया हैं। बायोपिक फिल्म की एक बड़ी चुनौती फिल्म के नायक की होती है। जिसे उस व्यक्तित्व को अपने भीतर जीते हुए अपने अभिनय से जीवंत करना होता है। जिस पर पूरी बायोपिक फिल्म केन्द्रित होती हैं। इस दृष्टि से देखा जाये तो फिल्म के नायक करन खान ने निश्चित तौर पर एक चुनौती पूर्ण कार्य किया है और अपने अभिनय की कला से मंदराजी के चरित्र को बहुत अच्छी तरह से जीवंत किया है। उनका अभिनय इस फिल्म में देखने लायक है। फिल्म के अन्य कलाकार अमर सिंह, हेमलाल कौशिक, वेदप्रकाश चंदेल, नरेश यादव आदि बेहतरीन कलाकारों ने काफी अच्छा अभिनय किया है। और फिल्म को बाँधे रखने में सफल रहे हैं। लोक कला का श्रम के साथ गहरा संबंध होता है। क्योंकि यह श्रमजीवी वर्ग के द्वारा ही सृजित और विकसित होता हैं। इस फिल्म में एक लोहार के द्वारा मंदराजी का बचपन से बड़े होने तक तबला बजाने की शिक्षा देना। लोककला और श्रमजीवी वर्ग के इसी संबंध को बहुत खूबसूरती से दिखाता हैं। इस फिल्म में लौहार का किरदार भी दर्शकों को याद रह जाने वाला किरदार है। यह फिल्म अपने अंत तक जाते-जाते मंदराजी के जीवन की उस त्रासदपूर्ण और संवेदनशील स्थितियों को बहुत अच्छे से दिखाता है। जिसमें उनके जीवन का बेहद मार्मिक और दुखद अंत होता है। जहाँ दर्शक का हृदय संवेदना से भर जाता है। जिसे करन खान ने बेहद खूबसूरती से निभाया है। इस फिल्म की एक और बड़ी उपलब्धि इस फिल्म का गीत और संगीत भी है। इसमें लक्ष्मण मस्तुरिया के पाँच गीतों को लिया गया हैं। वे छत्तीसगढ़ के एक ऐसे महान गीतकार है। जिनके गीतों में छत्तीसगढ़ का जीवन अपने सम्पूर्ण यथार्थ की गंभीरता और रचनात्मक सुंदरता के साथ अभिव्यक्त होता हैं। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि खुमान साव और गोंविद साव जैसे गंभीर लोक कलाकारों ने इस फिल्म में संगीत दिया हैं। छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति के महान कलाकारों और रचनाकारों को इस फिल्म में शामिल किया जाना यह बताता है कि इस फिल्म के निर्देशक विवेक सारवा छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के अच्छे कलाकारों के प्रति काफी गंभीर समझ रखते हैं। आज छत्तीसगढ़ी सिनेमा को ऐसे ही समझदार और गंभीर निर्देशकों की जरूरत है। जो इस तरह के विषयों पर फिल्म बनाने का जोखिम उठाये और भविष्य में छत्तीसगढ़ी सिनेमा को अपने सफल निर्देशन में एक दिशा और ऊँचाई दे पाये। क्योंकि किसी भी फिल्म का इतिहास आर्थिक रूप से सफल नहीं, बल्कि सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति में सफल फिल्मों से बनता है। और ऐसे ही फिल्मों को इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज और याद किया जाता हैं। हर फिल्म में कोई न कोई कमी जरूर रह जाती है। इस फिल्म में भी कुछ व्यहारिक तकनीकी कमियां जरूर हैं। बावजूद इसके बम्बईया छाप फिल्मों की बनी-बनाई मानसिकता को थोड़ी देर के लिए छोड़कर इस फिल्म को हर किसी को जरूर देखना चाहिए। क्योकि यह दाऊ मंदराजी के जीवन और नाचा जैसी महत्वपूर्ण लोककला के महत्व और उसके संघर्ष से हमें परिचित कराता है। जिससे छत्तीसगढ़ की वर्तमान पीढ़ी पूरी तरह अछूती है। इस फिल्म का अपना एक सांस्कृतिक महत्व है। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार को भी चाहिए कि इस तरह की फिल्मों को गंभीरता लेते हुए टैक्स फ्री करे ताकि इस तरह की फिल्मों को महत्व मिल सके और इस तरह की अच्छे विषयों पर भविष्य में और भी अच्छी फिल्में बनाने के लिए लोग प्रेरित हों तथा छत्तीसगढ़ी सिनेमा का बेहतर विकास हो पाये। यह प्रयास निरंतर छत्तीसगढ़ सरकार और छत्तीसगढ़ के समस्त गंभीर कलाकारों की तरफ से होते रहना चाहिए। क्योकि यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता का भी प्रश्न है। और कला के प्रति कलाकारों का सच्चा दायित्व भी। जिसे हर हाल बचाये और बनाये रखने की कोशिश बेहद जरूरी हैं। मोबाइल नंबर - 9179385983