देश

वे जो कल तक देशद्रोही थे... अचानक देशभक्त हो गए...भई...कमाल है !

शाहीन बाग के आंदोलन से जुड़े मुस्लिम समुदाय के कुछ नेता भाजपा और आरएसएस की नजर में सांप्रदायिक और देशद्रोही थे... लेकिन हाल के दिनों में जब उन्होंने भाजपा का दामन थामा तो वे देशभक्त हो गए. ऐसा क्यों और कैसे हुआ... बता रहे हैं देश के प्रसिद्ध लेखक कैलाश बनवासी 

कैलाश बनवासी

शाहीन बाग़ में सौ दिन से भी अधिक चले शांतिपूर्ण,अहिंसात्मक आन्दोलन से जुड़े कई कार्यकर्ताओं ने 16 अगस्त को दिल्ली में भाजपा ज्वाइन कर लिया, जिसमें प्रमुख रूप से शहजाद अली और डॉ.मोहरिन हैं. गत वर्ष नवम्बर से दिल्ली का शाहीन बाग़ आन्दोलन मुख्य रूप से गृहमंत्री द्वारा लाए गए सी.ए.ए. अमेंडमेंट बिल और नागरिकता रजिस्टर कानून के विरोध को लेकर था. इस आन्दोलन की खासियत यह रही जिसने इस दौर में जन-आन्दोलन का एक नया इतिहास ही रच दिया, जिसमें इन कानूनों के विरोध में उस क्षेत्र की मुस्लिम महिलाओं —क्या किशोरियां, क्या बूढ़ी,क्या जवान--सबने शाहीन बाग़ को अपना दूसरा घर बनाकर देश को आंदोलन के एक बिलकुल नए ढंग से परिचित कराया.जिसका फैलाव आज़ादी की लड़ाई की तरह देश के कई भागों में फ़ैल गया था.जिसकी चर्चा देश-विदेशों में होती रही.इस आन्दोलन की एक और खासियत यह रही कि इन्होंने देश के संविधान से मिले धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आज़ादी को केंद्र में रखा.दिल्ली के शाहीन बाग़ के इस अनूठे आन्दोलन की तर्ज़ पर देश के अनेक शहरों में इस आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ लिया था.और यह अपनी लड़ाई में केवल मुस्लिमों का ही नहीं,सभी अमनपसंद धर्मनिरपेक्षता पर विश्वास करने वाले लोगों,संगठनों का आन्दोलन बन गया था.जिसके खिलाफ कथित देशभक्तों की कुख्यात ट्रोल एजेंसियों ने कितने भड़काऊ,विभाजनकारी और कुत्सित प्रचार किए,यह भी देश ने देखा है. इस आन्दोलन को सीधे देशद्रोह से जोड़ा गया. इसके आन्दोलनकारियों,समर्थकों को झारखंड और दिल्ली चुनाव में भाजपा के बड़े नेताओं से लेकर छुटभैये नेताओं ने जैसे ऊल-जलूल,हिंसा भड़काने वाले बयान दिए,वह भी सबके सामने है.आगे चलकर दिल्ली के सुनियोजित दंगों के पीछे भी इसके आन्दोलनकारियों के हाथ होने की बात दिल्ली और यू.पी. पुलिस द्वारा न सिर्फ कही गयी,बल्कि उन्हें,उनके समर्थक सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों,नौजवानों, प्राध्यपकों,पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को निशाने पर लाकर उनके खिलाफ़ सख्त से सख्त धाराएं –जिसमें यू.ए.पी.ए.के अंतर्गत मामले दर्ज किये गए. कईयों को जेल में डाल दिया गया,और आज तक उनकी ज़मानत भी नहीं हो सकी है.

   ऐसे में,इन कठिन परिस्थितियों के बीच जब कुछ इसके आन्दोलनकारी भाजपा ज्वाइन करते हैं तब संदेह कई तरह से गहरा जाते हैं. यह सहसा सूरज के पश्चिम से उदय होने जैसा है. इस बीच,आखिर ऐसा क्या घटित हुआ कि वे अन्दोलनकारी  को—जिन्हें कल तक दिन-रात पाकिस्तानी परस्त देशद्रोही विशेषणों से नवाज़ा जाता रहा,आज अचानक देशभक्त हो गए? इसके मुख्य नेता शहजाद अली का साक्षात्कार मीडिया में आया है,जिसमें वह इस परिवर्तन का कारण बताते हुए कह रहे हैं—“इस मामले में राजनीति ज़्यादा हुई है,जबकि सच्चाई कुछ और थी.मुसलमानों को यह सच्चाई समझने की ज़रुरत है. आज़ादी से लेकर आज तक मुसलमानों के मन में सिर्फ एक ही बात बिठाई गयी है कि आर.एस.एस –भाजपा उनकी दुश्मन है. लेकिन हमारा कहना है कि कोई हमारा डीएसटी हैया दुश्मन,सच्चाई जानने के लिए हमें उनके क़रीब जाना पड़ेगा.मुझे लगता है कि आपको जो भी सवाल करने हैं,वह व्यवस्था के एक अंग बनकर कीजिए.”( अमरउजाला ई पेपर,17 अगस्त,अमित शर्मा की रिपोर्ट)

   सवाल कई हैं.किसी भी व्यक्ति का अपना राजनीतिक विचार या दल चुनना उसका व्यक्तिगत मसला है.वह स्वतंत्र है. लेकिन जो स्थितियां हैं,उसके चलते यह बेहद चौंका देने वाली और एकबारगी अविश्वसनीय खबर है.शाहीन बाग़ आन्दोलन कोई राजनीतिक  महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित आंदलन नहीं था. वह बहुत सुनियोजित ढंग से सी.ए.ए. और एन.आर.सी. के विरोध  देश के संवैधानिक,लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्षता आधारित मूल्यों को केंद्र में रखकर किया गया आन्दोलन था, जिसका ‘विजन’ किसी भी राजनैतिक दल की सतही लोकप्रियता और चुनावी क्षुद्रता से परे, उन उदार और व्यापक मूल्यों और यहाँ की मिली-जुली संस्कृति को बढ़ावा देने वाला था. यही कारण है कि यह देश भर में हर भाग में,हर प्रगतिशील वर्ग में जगह बना सकी ,और आन्दोलन को क्षेत्रीय कलाकारों,छात्रों,संस्कृतिकर्मियों, ट्रेड यूनियनों से लेकर सिनेमा उद्योग के बड़े-बड़े नामचीन हस्तियों का इसको समर्थन मिला.

   आज वे सभी भौचक होंगे. और बहुत अधिक निराश. क्योंकि इसके राजनीतिक-प्रेरित होने या राजनीतिक लाभ लेने की बात आन्दोलन के चरित्र में उन्होंने नहीं पाया था,अन्यथा इतनी विशाल संख्या में समर्थन नहीं मिला होता. कुछ आन्दोलनकारियों के इस कदम ने इस आन्दोलन की मंशा पर नए सिरे से प्रश्न खड़े कर दिए हैं. उनका यह परिवर्तन पहली नज़र में स्वतःस्फूर्त तो कतई नहीं,बल्कि सायास और अपनी निभाई भूमिका का राजनीतिक लाभ लेनेवाला अधिक लगता है. दूसरे यह उस आन्दोलन के भरोसे को बहुत निष्ठुरता के साथ तोडनेवाला लगता है. इस कदम का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि भविष्य के ऐसे किसी भी जन-आन्दोलन के प्रति यह गहरा यह संदेह पैदा करनेवाला है,जिसके चलते लोगों का ऐसे आंदोलनों पर भरोसा कर पाना मुश्किल होगा. कुछ स्वार्थी लोगों के कारण इतना बड़ा आन्दोलन शर्मसार हुआ है,जो एक बार फिर हमारे नैतिक और आधिकारिक मूल्यों के बड़ी तेज़ी से क्षरण की कहानी कह रहा है, जो राजनीति में आज कोरोना वायरस की ही तरह बहुत तेज़ी से फ़ैल गया है,जिसके उदाहरण पिछले कुछ समय में हम कर्नाटक.महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश और राजस्थान में देख चुके हैं,जहां राजनेताओं की सत्ता,अधिकारों,शक्तियों की अपनी हवस जनता के मतों, ज़रूरतों और आकाक्षाओं रौंदती चली जाती है. 

  इसी के साथ इसके पीछे छुपे हुए कुछ एजेंडों पर भी ध्यान स्वाभाविक रूप से चला जाता है. क्या इसके पीछे कुछ दबाव काम कर रहे हैं? इन ‘दबावों’ से तो आज देश की अनेक संस्थाएं ग्रस्त है जिसके नमूने  चुनाव आयोग, न्यायपालिका,सी,बी.आई.,आर.बी.आई. या एन.आई.ए. की कार्यवाहियों में देश देख रहा है. यही नहीं,जिस ‘आपरेशन लोटस’ की चर्चा की जाती है,उसके मोहपाश से जब बड़े-बड़े दिग्गज और बरसों पुराने कार्यकर्ता नहीं बच सके,तब इन नए लोगों की क्या बिसात? आज की राजनीति किसी भी बड़े राष्ट्रीय,सामाजिक उद्देश्यों, नैतिक मूल्यगत निष्ठाओं को तिलांजली देकर साम दाम दंड भेद  ‘पावर’ हासिल करने का शतरंजी खेल बन गया है; जिसके लिए ठीक ही कहा जाता है कि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है न दुश्मन. यह एक बार फिर हम अपने सामने चरितार्थ होता देख रहे हैं. निश्चित रूप से यह भाजपा की बड़ी जीत है,जो उन्हें अपने खेमे में ले आए जिनके आने की कल्पना कुछ महीने पहले कोई भी नहीं कर सकता था.

41, मुखर्जी नगर,सिकोलाभाठा,दुर्ग छत्तीसगढ़

दूरभाष- 9827993920  इमेल : kailashbanwasi@ gmail.com

 

विशेष टिप्पणी

ऐ जाते हुए लम्हों.... जरा ठहरो... जरा ठहरो

रवीश कुमार

मैं आज क्यों लिख रहा हूं, अर्णब की गिरफ्तारी के तुरंत बाद क्यों नहीं लिखा?

आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला संगीन है लेकिन सिर्फ नाम भर आ जाना काफी नहीं होता है। नाम आया है तो उसकी जांच होनी चाहिए और तय प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। एक पुराने केस में इस तरह से गिरफ्तारी संदेह पैदा करती है। महाराष्ट्र पुलिस को कोर्ट में या पब्लिक में स्पष्ट करना चाहिए कि क्या प्रमाण होने के बाद भी इस केस को बंद किया गया था? क्या राजनीतिक दबाव था? तब हम जान सकेंगे कि इस बार राजनीतिक दबाव में ही सही, किसी के साथ इंसाफ़ हो रहा है। अदालतों के कई आदेश हैं। आत्महत्या के लिए उकसाने के ऐसे मामलों में इस तरह से गिरफ्तारी नहीं होती है। कानून के जानकारों ने भी यह बात कही है। इसलिए महाराष्ट्र पुलिस पर संदेह के कई ठोस कारण बनते हैं। जिस कारण से पुलिस की कार्रवाई को महज़ न्याय दिलाने की कार्रवाई नहीं मानी जा सकती।

भारत की पुलिस पर आंख बंद कर भरोसा करना अपने गले में फांसी का फंदा डालने जैसा है। झूठे मामले में फंसाने से लेकर लॉक अप में किसी को मार मार कर मार देने, किसी ग़रीब दुकानदार से हफ्ता वसूल लेने और बिना किसी प्रक्रिया के तहत किसी को उठा कर बंद कर देने का इसका गौरवशाली इतिहास रहा है। पेशेवर जांच और काम में इसका नाम कम ही आता है। इसलिए किसी भी राज्य की पुलिस हो उसकी हर करतूत को संंदेह के साथ देखा जाना चाहिए। ताकि भारत की पुलिस ऐसे दुर्गुणों से मुक्त हो सके और वह राजनीतिक दबाव या बगैर राजनीतिक दबाव के भी अन्य लालच के दबाव में किसी निर्दोष को आतंकवाद से लेकर दंगों के आरोप में न फंसाए। 

अर्णब गोस्वामी के केस में कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र की पुलिस बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। दिल्ली पलिस और यूपी की पुलिस क्या बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करती है? अर्णब गोस्वामी ने कभी अपने जीवन में ऐसा पोज़िशन नहीं लिया है। बीजेपी सरकार में अगर पुलिस किसी को दंगों के झूठे आरोप में फंसा दे तो अर्णब गोस्वामी पहला पत्रकार होगा जो कहेगा कि बिल्कुल ठीक है। पुलिस पर संदेह करने वाले ग़लत हैं। इसलिए एक नागरिक के तौर पर इस केस में पुलिस के व्यवहार की सख़्त परीक्षण कीजिए। ताकि सिस्टम दबाव मुक्त और दोष मुक्त बन सके। इसी में सबका भला है।

 

आपको याद होगा कि डॉ कफ़ील ख़ान पर अवैध रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा कर छह महीने बंद करने की घटना साफ है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि अवैध रूप से रासुका लगा दी गई है। उक्त अधिकारी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। अर्णब गोस्वामी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह से लेकर तमाम मंत्री और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक ने इस नाइंसाफी पर कुछ नहीं कहा। भारत में किनके राज में प्रेस की स्वतंत्रता अभी खत्म होकर मिट्टी में मिल चुकी है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। आपको एक लाख बार बता चुका हूं। प्रेस की स्वतंत्रता की बात करने वाले मंत्रियों के प्रधानमंत्री ने आज तक एक प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है। 

 

बिल्कुल अन्वय नाइक और कुमुद नाइक की आत्महत्या के मामले में इंसाफ मिलना चाहिए। अन्वय नाइक की बेटी की कहानी बेहद मार्मिक है। इस बात की जांच आराम से हो सकती है कि अर्णब गोस्वामी ने अन्वय नाइक से स्टुडियो बनाकर पैसे क्यों नहीं दिए? 80 लाख से ऊपर का काम है तो कुछ न कुछ रसीदी सबूत भी होंगे। अन्वय नाइक की बेटी का कहना सही है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए लेकिन कानून को भी मर्यादा से ऊपर नहीं होना चाहिए। जांच की निष्पक्षता की मर्यादा अहम है। तभी लगेगा कि पारदर्शिता के साथ न्याय हो रहा है। राजनीतिक दबाव में केस का खुलना और केस का बंद होना ठीक नहीं है। 

गौरी लंकेश की हत्या से लेकर उत्तर प्रदेश से लेकर देश के तमाम हिस्सों में पत्रकारों की गिरफ्तारी को लेकर अर्णब गोस्वामी ने कभी नहीं बोला। उत्तर प्रदेश में कितने ही पत्रकार गिरफ्तार हुए, उनके खिलाफ एफ आई आर की गई उस पर भी अर्णब गोस्वामी ने नहीं बोले। जब एनडीटीवी पर छापे पड़ रहे थे और एक चैनल को डराया जा रहा था तब अर्णब का कैमरा बाहर लगा था और लिंचमैन की तरह कवर किया जा रहा था। उनके कवरेज में एक लाइन प्रेस की स्वतंत्रता पर नहीं थी। एन डी टी वी की सोनिया वर्मा सिंह ने ट्विट कर अर्णब की गिरफ्तारी की निंदा की है। ये फर्क है। आप उनके कार्यक्रम का रिकार्ड निकाल कर देखें कि कब उन्होंने पत्रकारों की गिरफ्तारी के खिलाफ योगी आदित्यनाथ पर सवाल उठाए हैं? मोदी सरकार और एक विचारधारा के लोग उनके समर्थन में आ गए हैं। जब 2016 में एन डी टी वी इंडिया को बैन किया जा रहा था तब प्रेस क्लब में पत्रकार जुटे थे। आप पूछ सकते हैं कि अर्णब और उनके बचाव में उतरे लोग क्या कर रहे थे।  जब विपक्ष के नेताओं पर छापे की आड़ में हमले होते हैं अर्णब हमेशा जांच एजेंसियों की साइड लेते हैं। 

अर्णब ने मोदी सरकार पर क्या सवाल उठाए हैं,बेरोज़गारी से लेकर किसानों के मुद्दे कितने दिखाए गए हैं यह भी पता है। उल्टा अर्णब गोस्वामी सरकार पर उठाने वालों को नक्सल से लेकर राष्ट्रविरोधी कहते हैं। भीड़ को उकसाते हैं। झूठी और अनर्गल बाते करते हैं। वे कहीं से पत्रकार नहीं हैं। उनका बचाव पत्रकारिता के संदर्भ में करना उनकी तमाम हिंसक और भ्रष्ट हरकतों को सही ठहराना हो जाएगा। अर्णब की पत्रकारिता रेडियो रवांडा का उदाहरण है जिसके उद्घोषक ने भीड़ को उकसा दिया और लाखों लोग मारे गए थे। अर्णब ने कभी भीड़ की हिंसा में मारे गए लोगों का पक्ष नहीं लिया। पिछले चार महीने से अपने न्यूज़ चैनल में जो वो कर रहे हैं उस पर अदालतों की कई टिप्पणियां आ चुकी हैं। तब किसी मंत्री ने क्यों नहीं कहा कि कोर्ट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला कर रहा है? जबकि मोदी राज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को जिनती बार उभारा गया है उतना किसी सरकार के कार्यकाल में नहीं हुआ। हर बात में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा बताई और दिखाई जाती है। 

एक बार अर्णब हाथरस केस में योगी की पुलिस को ललकार कर देख लेते, मुख्यमंत्री योगी को ललकार कर देख लेते जिस तरह से वे मुख्यमंत्री उद्धव को ललकारते हैं आपको अंतर पता चल जाता। कौन सी सरकार संविधान का पालन कर रही है। उद्धव ठाकरे ने प्रचुर संयम का परिचय दिया है और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओ  ने भी जिनकी एक छवि मारपीट की भी रही है। कई हफ्तों से अर्णब बेलगाम पत्रकारिता की हत्या करते हुए हर संवैधानिक मर्यादा की धज्जियां उड़ा रहे थे। पत्रकार रोहिणी सिंह ने ट्विट किया है कि यूपी में पत्रकारों के खिलाफ 50 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं। क्या अर्णब में साहस है कि वे अब भी योगी सरकार को ललकार दें इस मसले पर। जो आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं वो सीमा की बात करने लगेंगे और अर्णब पर रासुका लगा दी जाएगा डॉ कफील ख़ान की तरह। 

द वायर के संस्थापक हैं सिद्धार्थ वरदराजन। अर्णब गोस्वामी सिद्धार्थ वरदराजन के बारे में क्या क्या कहते रहे हैं आप रिकार्ड निकाल कर देख सकते हैं मगर सिद्धार्थ वरदराजन ने उनकी गिरफ्तारी में पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं। निंदा की है। उसी तरह से कई ऐसे लोगों ने की है। अर्णब के पक्ष में उतरे बीजेपी की मंत्रियों और समर्थकों की लाचारी देखिए। वे सुना रहे हैं कि कहां गए संविधान की बात करने वाले। पत्रकार रोहिणी सिंह ने एक जवाब दिया है राकेश सिन्हा को। संविधान की बात करने वालों को आपने जेल भेज दिया है। कुछ को दंगों के आरोप में फंसा दिया है। इनकी समस्या ये है कि जिन्हें नक्सल कहते हैं, देशद्रोही कहते हैं उन्हीं को ऐसे वक्त में खोजते हैं। इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि कई लोगों ने एक नागरिक के तौर पर अर्णब की गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने यह फर्क साफ रखा है कि अर्णब पत्रकार नहीं है और न ही यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है। 

न्यूज़ ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन ने भी निंदा की है जबकि अर्णब इसके सदस्य तक नहीं है। अर्णब ने हमेशा इस संस्था का मज़ाक उड़ाया है। क्या न्यूज़ ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन किसी ऐसे छोटे चैनल के पत्रकार की गिरफ्तारी पर बोलेगा जो उसका सदस्य नहीं है?  ज़ाहिर है केंद्र सरकार अर्णब के साथ खड़ी है। अर्णब केंद्र सरकार के हिस्सा हो चुके हैं। अर्णब पत्रकार नहीं हैं। इसे लेकर किसी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता के हर पैमाने को ध्वस्त किया है। जिस तरह से पुलिस कमिश्नर को ललकार रहे थे वो पत्रकारिता नहीं थी। 

मैंने कल इस मामले पर कुछ नहीं लिखा क्योंकि प्राइम टाइम के अलावा कई काम करने पड़ते हैं। मैं लंबा लिखता हूं इसलिए भी टाइम चाहिए होता है। दो लाइन लिखना मेरी फितरत में कम है। जब गिरफ्तारी की ख़बर आई तो मैं व्हाट्स एप पर था। फिर तुरंत कपड़े धोने चला गया। नील डालने के बाद भी बनियान में सफेदी नहीं आ रही थी। उससे जूझ रहा था तभी किसी का फोन आया कि चैनल खोलिए अर्णब गिरफ्तार हुए हैं। मैंने कहा कि उन्हीं की वजह से न्यूज़ चैनल देखना बंद कर दिया और जनता से आज भी अपील करता हूं कि अगर वे अपने भारत को प्यार करते हैं तो न्यूज़ चैनल न देखें, आप कह रहे हैं कि अर्णब के लिए चैनल देखूं। ख़ैर जब बनियान धोने के बाद पंखे की सफाई के लिए ड्राईंग रूम में आया तो चैनल खोल दिया। पंखे पर जमा धूल आंखों में गिर रही थी और मीडिया पर जमी धूल चैनल पर दिखने लगी। मैं यह इसलिए लिख रहा हूं कि हम लोग काम करते हैं। इतनी जल्दी झट से किसी चीज़ पर प्रतिक्रिया नहीं लिख सकते। वैेसे कुछ दिन पहले फेसबुक पर रिपब्लिक चैनल के मामले में एडिटर्स गिल्ड की प्रतिक्रिया पोस्ट की थी कि किसी एक पर आरोप है तो आप पूरे गांव पर मुकदमा नहीं कर सकते। मेरे उस बयान को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। ध्यान नहीं दिया। अच्छा है लोग मुझे मेरा एकांत लौटा रहे हैं।

लेकिन मैं अर्णब का घर देखकर हैरान रह गया। रोज़ 6000 शब्द टाइप करके मैं गाज़ियाबाद के उस फ्लैट में रहता हूं जिसमें कुर्सी लगाने भर के लिए बालकनी तक नहीं है। अर्णब का घर कितना शानदार है। ईर्ष्या से नहीं कह रहा। मुझे किसी का भी अच्छा घर अच्छा लगता है। ख़ासकर तब से जब किसी अमीर प्रशंसक ने घर आने ज़िद कर दी और आते ही कह दिया कि यही आपका घर है। एक मोहतरमा तो रोने लगीं। कोरोना के कारण जब घर से एंकरिंग करने लगा तो मेरे घर में झांकने लगे। उन्हें लगा कि रवीश कुमार शाहरूख़ ख़ान है। जल्दी उन्हें निरशा हो गई मेरे घर की दीवारों से। वैसे मुझे अपना घर बहुत अच्छा लगता है। ईश्वर ने सब कुछ दिया है। लोगों ने इतना प्यार दे दिया कि सौ फ्लैट कम पड़ जाएं उसे रखने के लिए। मैं अर्णब के शानदार घर के विजुअल के सामने असंगठित क्षेत्र के एक मज़दूर की तरह सहमा खड़ा रह गया। मैं अर्णब के घर की ख़ूबसूरती में समा गया। कल्पनाओं में खो गया। ड्राईंग रूम से नीला समंदर कितना सुंदर दिख रहा था। अरब सागर से आती हवाओं के लिए शीशे लगाए गए होंगे फिर भी अर्णब को अरब से इतनी नफ़रत है। कम से कम अरब सागर की हवाओं का शुक्रगुज़ार होना चाहिए।  

मुंबई जैसे सस्ते शहर में अर्णब के सुंदर और विशाल घर को देखकर लगा कि चैनल पर भले ही नफ़रत फैलाते हों मगर कहां और कैसे रहना चाहिए उसका टेस्ट तो शानदार है। बिल्कुल किसी नफ़ीस रईस की तरह जो अपने टी पॉट की टिकोजी भी मिर्ज़ापुर के कारीगरों से बनवाता हो। मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि अर्णब के अंदर सुंदरता की संभवानाएं बची हुई हैं क्योंकि अर्णब के रहने टेस्ट वाकई बहुत अच्छा है। वे अमीर होने की योग्यता को ठीक से निभा रहे हैं। लेकिन सोचिए इस सुंदर स्वाद का क्या फायदा। रोज़ समंदर के विशाल ह्रदय का दर्शन करने वाले एंकर का ह्रदय कितना संकुचित और नफ़रतों से भरा है। अनैतिकता से ढंका हुआ है। अर्णब का घर ऐसा है कि कोई अपराधी वहां दस दिन रहकर इंसान बन जाए। 

अर्णब गोस्वामी जब भी जेल से आएं, अव्वल तो पुलिस उन्हें तुरंत रिहा करे, मैं यही कहूंगा कि कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपने इस सुंदर घर को निहारा करें। इस सुंदर घर का लुत्फ उठाएं। सातों दिन कई कई घंटे एंकरिंग करना श्रम की हर अवधारणा का अश्लील उदाहरण है। अगर इस घर का लुत्फ नहीं उठा  सकते तो मुझे मेहमान के रूप में आमंत्रित करें। मैं कुछ दिन वहां रहूंगा। सुबह उनके घर की कॉफी पीऊंगा। वैसे अपने घर में चाय पीता हूं लेकिन जब आप अमीर के घर जाएं तो अपना टेस्ट बदल लें। कुछ दिन कॉफी पर शिफ्ट हो जाएं। और हां एक चीज़ और करना चाहता हूं। हिन्दी फिल्मों के गाने सुनना चाहूंगा। बार्डर फिल्म का। अर्णब की बालकनी में बैठा हुआ गाना बज रहा होगा, ऐ जाते हुए लम्हों, ज़रा ठहरो, ज़रा ठहरो….मैं भी चलता हूं... ज़रा उनसे मिलता हूं... जो इक बात दिल में है उनसे कहूं तो चलूं तो चलूं….और हां पुलिस की हर नाइंसाफी के खिलाफ हूं। चाहें लिखू या न लिखूं।

फिल्म

चमन बहार: एक भयावह यथार्थ से परिचय

हेमलता महिश्वर 

‘चमन बहार’ छत्तीसगढ़ के एक छोटे से कस्बेनुमा नगर की एक कहानी है जो जिला बन गया है। यहॉं का सारा समाज ग्रामीण परिवेश से शहरी परिवेश की ओर जाने को अग्रसर है। पर यह सोपान मूलत: भौतिक है। इसमें भावात्मकता तो है, भौतिक विकास की चाहत भी है पर वैचारिकता सिरे से नदारत है। 

यहॉं का युवा वर्ग इसी सपने में जी रहा है। वह सपने तो देख रहा है पर सपनों को पूरा करने के लिए उसके पास कोई दिशा-निर्देश नहीं है। ऐसी स्थिति में वह स्वत: जितना कुछ समझ पाता है, उतना ही करने के लिए न केवल प्रयासरत है बल्कि सन्नद्ध भी है। 

विवेच्य फ़िल्म के अनुसार छत्तीसगढ़ में यह युवा चार तरह का है -पहला तो वह जो निपट स्थानीय है, दूसरा वह जो बाहर से आया है और प्रभुत्व हासिल कर चुका है, तीसरा वह जो स्थानीय नेतागीरी में दाख़िला ले रहा है और चौथा वह जो इन दोनों के बीच तालमेल बिठाते हुए अपने पौ बारह करना चाहता है। सारी फ़िल्म इसी कथानक के इर्द-गिर्द बुनी गई है। 

फ़िल्म का नायक जो पहली तरह का युवा ‘बिल्लू’ है जो वन विभाग के चौकीदार पिता की तरह जीवन नहीं जीना चाहता। वह स्वप्नदर्शी है। वह सरकारी नौकरी करते हुए जीवन बीताना नहीं, जीवन जीना चाहता है इसलिए जंगल का सुरक्षाकर्मी बनने के बजाय अपनी दुकान खोलना चाहता है। चूँकि मुँगेली को शहर में तब्दील करने की योजना है, सो वह संभावित हाइवे पर एक पान की दुकान खोलता है। यह जगह उसे अचानक ही सस्ते में मिल जाती है। पर इस जगह की बहार उजाड़ में बदल जाती है और ग्राहक न मिलने के कारण वह मक्खी मारता, उंघता हुआ ट्रांजिस्टर सुनता है। जगह ऐसी बियाबान है कि ट्रांजिस्टर की फ़्रीक्वेंसी तक मैच नहीं करती। इस समय चौथी तरह के दो युवक उसके पास आते हैं और उसे सूचना देते हैं कि तुम्हें यह जगह सस्ते में बेचकर जानेवाला अपना मुनाफ़ा कमा गया। अब यहॉं हाइवे नहीं बनेगा और तुम्हारी दुकान पर कोई ग्राहक नहीं आएगा। इतनी सूचना देकर वे बिल्लू की दुकान से बिना पैसे दिए गुटका आदि ले लेते हैं और बिल्लू के पैसे माँगने पर उसे उल्टे धमका भी देते हैं। अब बिल्लू की चिंता शुरू होती है। एकाएक वह समझ नहीं पाता कि उसे करना क्या चाहिए। अगले दिन से वह फिर से दुकान में जाकर के बैठ जाता है। घूरे के दिन फिरते हैं - बिल्लू के दिन भी फिरने का अवसर आया। सड़क के दूसरी तरफ़ एकमात्र खड़े डुप्लेक्स मकान का रंग-रोगन होना आरंभ होता है। एक दिन वह देखता है कि एक परिवार उसकी दुकान के ठीक सामने सड़क पार बने इसी एकमात्र भवन में आकर उसे गुलज़ार करता है। 

अचानक बारिश होती है जो इस बात का संकेत है कि उजाड़-बियाबान हरियाली में परिवर्तित होनेवाला है। सामानवाले ट्रक के पीछे एक कार आती है जिसमें से उस परिवार के सदस्य उतरते हैं। अचानक बारिश अच्छी तेज होती है और उस तेज बारिश में ही एक लड़की अपने कुत्ते के साथ उतरती है और दौड़कर मकान के भीतर चली जाती है। तेज बारिश के साथ लड़की का देखना एक फैंटेसी क्रिएट करता है, एक संकेत देता है। निर्देशक यहॉं पर पौराणिक कथा का आधार लेने से बिलकुल नहीं चूकता। ठीक इस समय यही बिल्लू अपनी दुकान में लक्ष्मी का फ़ोटो टाँगने के लिए कील ठोंकता भी है और सामने की तरफ़ देखता भी है जिससे हथौड़ी से उसे चोट लग जाती है। इसी समय चौथे नंबर के दो युवक है उससे कहते हैं कि लक्ष्मी आ गई है, लड़की आ गई है, अब दुकान चलेगी। इस तरह से निर्देशक जनता में निर्मित भाववाद को हरियाने में सफल हो जाता है। ये दोनों लड़के शहर के दूसरे और तीसरी श्रेणी के युवकों को बिल्लू की दुकान तक लाने के तरह-तरह के जतन करते हैं। बिल्लू की दुकान चल पड़ती है। 

निर्देशक युवकों में लहलहाती पितृसत्तात्मक मानसिकता की उपस्थिति दर्ज़ करने लगता है।  लड़की जो स्कूल गोइंग है, वह सारे शहर के युवा वर्ग का आई-टॉनिक बन जाती है। स्कूल गोइंग  लड़के हों या शहर के युवा नेता या शहर का युवा व्यवसायी कोई भी। कोई भी लड़का उस लड़की की झलक पाने के लिए, उसको अपना बताने के लिए इस पान की दुकान तक आता है और उस लड़की को अपना बताने का प्रयास करता है। ये लड़के साइकिल, पैदल, जीप या मोटरसाइकिल आदि जो हर तरह के वर्ग के संबंधित हैं, पान की दुकान पर अड्डेबाज़ी करने लगते हैं। यह युवा वर्ग इस बात की चिंता ही नहीं करता कि लड़की क्या चाहती है। लड़की और लड़की का परिवार बहुत ही पॉलिश्ड है और अड्डेबाज़ी करते युवकों के समूह में लड़की और लड़की के परिवार से मैच करता कुछ भी नहीं है। न रहन-सहन, न बोली-भाषा, न मानसिकता, पान चबाते, सिगरेट-शराब पीते, मॉं-बहन एक करते हर तरह के लड़के उस लड़की को पाने का ख़्वाब लिए पान की दुकान पर मंडराने लगे। चौथी श्रेणी के दो युवकों ने पूरे शहर के प्रभावशाली युवकों को बिल्लू की दुकान की ओर भेज दिया। इन दोनों लड़कों की लफुटई को इससे स्थायित्व प्राप्त हो रहा था। एक नेता और एक व्यवसायी को आपस में भिड़ाकर इनका उल्लू सीधा होने लगा था। ऐसा नहीं है कि यह बिल्लू नहीं समझ रहा था। बिल्लू की दुकान अच्छी चलने लगी। चौथी श्रेणी के युवकों ने दुकान के बाजू में कैरम बोर्ड भी रखवा दिया। सिगरेट, गुटका, कोल्डड्रिंक के अलावा प्रभावशाली लड़के शराब लेकर वहॉं जम जाते। बिल्लू को यह पसंद नहीं आ रहा था। एक बार लड़की उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुराई थी क्योंकि एक आवारा कुत्ते से बिल्लू ने लड़की के कुत्ते को बचाया था। बिल्लू ने  लड़की के एक सहज मानवीय शिष्टाचार का ग़लत मतलब निकाला जो पुरुष मानसिकता ‘लड़की हँसी तो फँसी’ का द्योतक है। 

लड़की की इच्छा हो या न हो, इसे जाने बग़ैर लड़के उसके आस-पास मंडराने लगते हैं। यह जिला मुंगेली की ही नहीं, पूरे भारत की ही दशा है। लड़की का यह परिवार मिडिल क्लास परिवार है। इस परिवार की यह लड़की स्कूल जाती है, स्कूटी चलाती है और अपने कुत्ते को लेकर घुमाने जाती है। कुल मिलाकर यह लड़की अपने घर से तीन बार ही निकलती है। बिल्लू यह नोटिस लेता है कि लड़की अपनी स्कूटी से पहले अपने छोटे भाई को स्कूल छोड़ने जाती है। दूसरी बार वो निकलती है तो स्कूटी से अपने स्कूल जाती है और तीसरी बार शाम को वो अपने कुत्ते को बाहर पैदल घुमाने ले जाती है। इस ताज़ा-ताज़ा जिला बने शहर में किसी लड़की का स्कूटी चलाना एक बड़ा आश्चर्य है, दूसरे लड़की का लंबे खुले सीधे बाल रखना बहुत बड़ा आश्चर्य है, तीसरा जो क़हर बरपाता हुआ आश्चर्य हैं कि लड़की शॉर्ट्स पहनती है और कुत्ते को घुमाने ले जाती है, फिर चौथी परेशानी यह है कि लड़की किसी की तरफ़ देखती तक नहीं। वह सिर्फ़ अपने काम से काम रखती है। अपना काम करती है और घर वापस चली जाती है। जिस जीवन स्तर को वो लड़की अपने परिवार के साथ जी रही है, समान जीवन स्तर तो दूर, इनके आस-पास एक भी घर भी नहीं है ताकि वह इधर-उधर कहीं जा सके। आज भी लड़कियों की कंडीशनिंग ऐसे ही होती है कि वह चुपचाप अपने घर से निकलकर चुपचाप अपना काम करके वापस आ जाए। उसका इधर-उधर देखने का मतलब चरित्र ढीला है। यह लड़की भी किसी की तरफ़ देखती तक नहीं है। लड़की की भूमिका सिर्फ़ इतनी है कि वह घर से निकलती है स्कूटी से और घर वापस आती है स्कूटी से। वह स्कूटी से ही स्कूल से भी निकलती दिखाई देती है। वहॉं भी उसके कोई दोस्त या सहेलियां नहीं हैं। निर्देशक इस मामले में ये बताने की कोशिश कर रहा है कि लड़की वाला पात्र उसके चित्रण का हिस्सा नहीं है, वो केवल और केवल युवकों की मानसिकता पर केंद्रित हो रहा है।

शहरी आबादी से दूर अकेला परिवार निपट अकेले मकान में है और सड़क के इस तरफ़ बिल्लू की दुकान जहॉं शहर के तमाम लड़के जमा होना शुरू हो जाते हैं। लड़के बिल्लू से यह पता करने का प्रयास करते हैं कि लड़की किस-किस समय घर से बाहर निकलती है पर बिल्लू अंजान बना रहता है। एक बार पूरे हुजूम के डटे रहने पर बिल्लू देखता है कि लड़की अपने कुत्ते को घुमाने बाहर लेजा रही है, वह लड़कों का पूरा ध्यान कैरम पर केंद्रित करवाता है। 

बिल्लू न तो ताक़तवर है न ही प्रभावशाली। सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट की तर्ज़ पर वह तरह- तरह के षडयंत्र रचता हुआ युवा नेता और युवा व्यवसायी को भिड़ाकर अपने लिए सुरक्षित स्थान बनाना चाहता है। वह अपने एकतरफ़ा प्यार में इतना सघन है कि वह यह चुनौती भी ले लेता है कि अपने ही पिता के बॉस को फ़ोन करता है और उससे कहता है कि अपने बेटे को सिगरेट पीने से मना करो। बॉस का यह बेटा भी लड़की के चक्कर में उसकी दुकान पर सिगरेट फूँकता बैठा रहता था। 

 वह आम लड़कों की तरह अपनी साक्षरता बस इतना सा लाभ ले पाता है कि जगह-जगह दिल का तीर लगा निशान अपने और रिंकू के नाम के साथ उकेर देता है। वह ‘आर’ अक्षर अपने हाथ में गुदवा लेता है। वह पिता द्वारा पसंद की गई लड़की से शादी नहीं करना चाहता। यहॉं पिता एक सूत्र वाक्य कहता है-“औरत है तो समाज है।” स्त्री की ऐसी ही महत्ता बुद्ध भी स्थापित करते हैं। 

बिल्लू अपना प्यार जताने के लिए लड़की को एक लव-कार्ड देना चाहता है। लड़की को वह कार्ड नहीं दे पाता तो उसकी बालकनी की तरफ़ उछाल देता है। निर्देशक ने यहॉं लड़के की मनोदशा को बड़ी ही ख़ूबसूरती से चित्रित किया है। पर यह कॉर्ड लड़की के पिता के हाथ लगता है। पिता के द्वारा पूछे जाने पर कि कार्ड किसने डाला, बिल्लू साफ़ नट लेता है और अपनी अनभिज्ञता ज़ाहिर करता है। 

अब पुलिस आती है और बिल्लू की खूब पिटाई करती है और अन्य लड़कों की भी पिटाई करती है। इसके बाद जब एक दिन लड़की रस्सी पर सूख रहे कपड़े भितराने के लिए टैरेस पर आती है तो बिल्लू को अपनी ओर देखता पाकर तुरंत वापस चली जाती है। बिल्लू का एक तरफ़ा प्यार इस उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह दुकान नहीं खोलता, उधारी सामान देनेवाले तगादा करते हैं। पर वह तो अब लड़की से बदला लेने को आतुर है। वह लड़की का पीछा करता है और कुछ करने के पहले ही नाकाम हो जाता है। वह ‘सोनम गुप्ता बेवफ़ा है’ की तर्ज़ पर ‘रिंकू नोनारिया बेवफ़ा है’ नोटों पर लिखता है, तगादा करनेवालों को वही नोट देकर लड़की को बदनाम करता है। पुलिस को इस हरकत का पता चलते ही वह उसे न केवल पकड़कर ले जाती है अपितु उसकी दुकान भी तोड़ देती है। अब तो शहर की पितृसत्ता जाग जाती है और ख़ुद को बचाए रखने के लिए मानवाधिकार के छद्म में अपनी आवाज़ बुलंद करती है। बिल्लू की दुकान का न होना मतलब नैन सुख का अवसर न होना। सारे दुष्ट मर्द इकट्ठे होकर पुलिस थाने में अपनी मॉंग दर्ज करते हैं कि बिल्लू निर्दोष है, कमज़ोर पर पुलिस रौब झाड़ती है। स्थानीय न्यूज़ चैनल इसे हॉट टॉपिक बनाते हैं। अंतत: लड़की का पिता ही उसकी बेल कराता है। इससे यह ज़ाहिर होता है कि यह परिवार किसी का बुरा नहीं चाहता। ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटे को उत्पात’ की तर्ज़ पर या बुद्ध दर्शन की करूणा पर संचालित होता हुआ यह परिवार बिल्लू को सुधार का अवसर देना चाहता है। बिल्लू के जेल से रिहा होने पर उसे हीरो बनाकर युवा राजनेता द्वारा अपनी राजनीति चमकाने का प्रयास किया जाता है। इसमें युवा राजनेता की मॉं भी शामिल है। पितृसत्ता उन महिलाओं को खुलकर सामने आने देती है जो पितृसत्ता की जड़ें मज़बूत करने में सक्रिय सहयोग देती हैं। 

पर बिल्लू लड़की के पिता की सह्रदयता से प्रभावित है। वह लड़की के घर जाता है। लड़की की मॉं बग़ैर किसी द्वेष के बिल्लू को ससम्मान भीतर बुलाती है। बिल्लू अपने जूते उतारने लगता है, वह उसे जूतों सहित अंदर बुलाती है। सोफ़े पर लड़की के पिता के सामने उसे बैठने को कहती है। बिल्लू के लिए यह एक नई दुनिया है। वह पूरे कमरे को झिझकती नज़र से देखता है। लड़की के माता-पिता का सामने बैठना, लड़के का सामने टेबल पर पढ़ाई करना, दीवार पर पूरे परिवार की तस्वीर का अलग-अलग अंदाज़ में होना, परिवार के सदस्यों का पोर्ट्रेट होना, लड़की का पोर्ट्रेट होना यह सब देखता हुआ वह पर्दे के पीछे खड़ी लड़की को देखते रह जाता है। यहॉं निर्देशक ने क़माल किया कि कोई सीन क्रियेट नहीं किया। मॉं यह भाँपकर अपनी बेटी से कहती है-“बेटा, चाय लाना तो।” और निर्देशक ने दिखाया कि बिल्लू जैसे ज़मीन में गड़ गया। उसकी नज़रें उठती ही नहीं जबकि लड़की चाय देकर भी चली जाती है। परिवार बिल्लू को सूचना देता है कि यह शहर उनके लायक़ नहीं है। वे अपना परिवार वापस बिलासपुर शिफ़्ट कर देंगे। बिल्लू वापस होता है और पश्चाताप करता है। वह अपनी ही चप्पल से अपने ही सिर को मारता है। स्थिर होकर पुनः उसी जगह पर अपनी वही दुकान खोलता है और वैसे ही मक्खी मारता ट्रॉंजिस्टर सुनता है। एक दिन मकान में वह एक गुलाबी काग़ज़ फड़फड़ाते हुए देखता है। वह उस काग़ज़ को ले आता है और देखता है कि काग़ज़ के एक तरफ़ कोई डायग्राम बना है और दूसरी तरफ़ उसी की तस्वीर है जिसमें वह अपनी विशिष्ट मुद्रा में अपनी दुकान के सामने खड़ा रहता था। इससे यह ज़ाहिर होता है कि जिसने भी लाइव पेंटिंग की थी, उसने बिल्लू को अपना सब्जेक्ट बनाया था। निर्देशक ने बड़े चातुर्य के साथ इसे संशय की तरह उपस्थित करने का प्रयास किया है। जैसी पात्रता होगी, वही ग्रहण किया जा सकेगा। मेरे नज़रिए से इस निर्जन स्थान में यही एक जीवन था जिसे लाइव पेंटिंग में दर्ज किया गया। अपनी दुकान में मक्खी मारता बिल्लू एक दिन देखता है कि सामनेवाले मकान में फिर कोई सामान से लदा ट्रक आकर खड़ा हुआ है, स्कूटी उतारी जा रही है और बिल्लू पुन: उसी पेंटिंग वाली मुद्रा में खड़ा है। 

यह फ़िल्म छत्तीसगढ़ के युवकों की स्थिति पर सोचने के लिए बाध्य करती है। छत्तीसगढ़ भारत का वह राज्य है जहाँ आज भी स्त्री और पुरुष जनसंख्या का अनुपात लगभग बराबर है और ग्रामीण क्षेत्र में तो और भी समानुपातिक जनसंख्या है। इसका मतलब है कि वहॉं लड़की का पैदा होना सामाजिक शर्म का कारण नहीं है। छत्तीसगढ़ की औरतें दाम्पत्य जीवन का निर्वाह करने में अभी भी काफ़ी स्वतंत्र हैं। यदि पति से पटरी नहीं बैठ रही है तो उसे यह सामाजिक अधिकार प्राप्त है कि वह पति का घर छोड़ सकती है। साथ ही, उसे यह अधिकार भी प्राप्त है कि वह दूसरा विवाह रचा सकती है। उत्तर भारत की औरतें यह सोच भी नहीं सकतीं। उनकी संस्कृति तो पति के घर में जाने के बाद अर्थी उठने की ही है। पितृसत्ता का जैसा शिकंजा और जकड़न उनके भीतर कसा हुआ है यह छत्तीसगढ़ की औरतों के साथ नहीं है। छत्तीसगढ़ में तमाम पितृसत्ताक व्यवस्था के बावजूद स्त्री सहमति/असहमति मायने रखती है। 

इस फ़िल्म को देखने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि उत्तर भारतीय जनता जो छत्तीसगढ़ में निवासरत है, अपनी कुसंस्कृति की जड़ें जमा रही है। 

कितने ही समझदार माता-पिता क्यों ना यदि लड़की के लिए इतना प्रोटेक्टिव होना पड़ेगा तो ऑनर किलिंग की नौबत आते देर न लगेगी। छत्तीसगढ़ के लड़के स्त्री को इस तरह से वस्तु में बदल देंगे? 

छत्तीसगढ़ में बेरोज़गारी और शिक्षा का दर और स्तर क्या है कि युवकों की इतनी बड़ी संख्या एक लड़की के पीछे पड़ जाएगी? 

इस फ़िल्म का कथानक भयावह है। फ़िल्म के निर्देशक ने एक भयावह सचाई सामने रखी है। हमें छत्तीसगढ़ की सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, आर्थिक, राजनीतिक पड़ताल वर्तमान संदर्भ में करने की अनिवार्य आवश्यकता है। इन सारे मुद्दों पर चिंतन करने के लिए बाध्य करना ‘चमन बहार’ के निर्देशक की सफलता है। फ़िल्म यथास्थिति से परिचय कराती है। 

बाक़ी कलाकारों का अभिनय उम्दा है, कहीं भी नकलीपन ज़ाहिर नहीं होता। गीत-संगीत, संवाद यथावसर उचित हैं। 

 

परिचय- 
प्रोफ़ेसर एवं पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली 
जन्म तिथि - नवम्बर 5, 1966
जन्म स्थान- बालाघाट, मध्य प्रदेश
शिक्षा- एम.ए., बी.एड., एम.फिल., पीएच.डी.
माता - प्रेमलता मेश्राम 
पिता - रामप्रसाद मेश्राम 
 
संस्थापक सदस्य -अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच 
 
प्रकाशित ग्रंथ
1. स्त्री लेखन और समय के सरोकार, चिंतन, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली
2. नील, नीले रंग के- कविता संग्रह, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली 
सह लेखन
 
धम्म परित्तं - सम्यक् प्रकाशन 
 
संपादित ग्रंथ
1. समय की शिला पर, मुकुटधर पाण्डेय पर केन्द्रित, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर 
2. उनकी जिजीविषा, उनका संघर्ष - शिल्पायन प्रकाशन, नई दिल्ली 
3. रजनी तिलक : एक अधूरा सफ़र 
 
पत्रिका
संपादन 
1. उड़ान 
संपादक सदस्य 
1. हाशिए उलाँघती स्त्री- युद्धरत आम आदमी का विशेषांक 
 
इनके अतिरिक्त विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र- पत्रिकाओं जैसे आलोचना, कथादेश, हंस, वर्तमान साहित्य, अनभैं साँचा, युद्धरत आम आदमी, दलित अस्मिता, स्त्री काल  आदि में आलोचनात्मक लेख, कविता, कहानी प्रकाशित 
 
कुछ कहानी, कविताओं और लेखों का मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी में अनुवाद। 
कहानी जैन विश्वविद्यालय, बैंगलोर और इटली के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही हैं। 
 
 
 
संपर्क 
9560454760 
H-18, Jasola Hight, Pocket 9 A, Jasola Vihar, New Delhi 110025