देश

प्रार्थना का साम्प्रदायीकरण और जवाबी छात्र-सत्याग्रह

कैलाश बनवासी   

देश के क्या स्कूलों में अब सब कुछ वही होगा जो फिरकापरस्त संगठन चाहेंगे?प्रार्थना से लेकर सिलेबस तक क्या सब कुछ उन्हीं के मन-मुताबिक़ ही होगा?साम्प्रदायिक ताकतें अब किस कदर लोगों के दिल-दिमाग को हिंदुत्व-रक्षा के नाम पर जड़ बनाने पर तुला हुआ है उसका यह सीधा  और ज्वलंत उदाहरण है.इसे एक छोटी घटना के रूप में देखना हमारी नासमझी होगी.

उत्तर प्रदेश से लगातार दलितों,अल्पसंख्यकों और आदिवासियों पर हमले –हत्याओं की खबरें इधर आती रही हैं.फिर इधर जागरूक पत्रकारों को भी सच कहने /दिखाने के इलज़ाम में जेल भेजा गया है. और अब एक प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर को सस्पेंड करने की खबर है. पीलीभीत जिले के बिसालपुर ब्लॉक के घयास्पुर के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में प्रार्थना के तौर पर बच्चों से प्रसिद्ध शायर अल्लामा इकबाल के प्रसिद्ध गीत—‘लब पे आती है दुआ’ को गवाने पर एक स्थानीय विश्व हिन्दू परिषद् सदस्य की शिकायत पर वहाँ के हेड मास्टर  फुरकान अली को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया.यह बात जितनी हास्यास्पद है उससे कहीं अधिक शर्मनाक और चिंतनीय है. विडम्बना यह है कि हिन्दू राष्ट्रवाद के चल रहे अंधे जूनून में अब केवल धर्म के कथित ठेकेदार ही नहीं, वरन प्रशासन भी शामिल हो गया हैं. यह अजब-गजबऔर भयावह चीजें अब हमारे रोजमर्रा की बात हो जा रही है.

लब पे आती है दुआ’ यह प्रार्थना,जिसे 1902 में अल्लामा इकबाल ने बच्चों के दुआ के रूप में लिखा था.यह बरसों से विभिन्न स्कूलों या मदरसों में गवाया  जाता रहा है. इसमें शायर ने बच्चों के हवाले से  कहा  है--

    लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

    ज़िंदगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी

    हो मेरे दम से यूँ हीं मेरे वतन की ज़ीनत

    जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

    ज़िंदगी हो मेरी परवान की सूरत या रब

    इल्म की शम्मा से हो मुझको मुहब्बत या रब

    हो मेरा काम गरीबों की हिमायत करना

    दर्दमंदों से ज़इफों से मुहब्बत करना

    मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको

    नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझको

इस प्रार्थना में भला ऐसी कौन-सी आपत्तिजनक बात है कि शिक्षा विभाग ने शिक्षक को सस्पेंड कर दिया? क्या सिर्फ इसलिए कि यह ‘उनकी’ भाषा उर्दू में लिखी गई है और इसे ‘वही’ लोग गाते हैं? इस प्रार्थना को मैंने पहली बार ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह द्वारा संगीतबद्ध एलबम ‘क्राइ फॉर क्राइ’ में सुना था. इस एलबम की सारी रायल्टी अनाथ बच्चों की मददगार संस्थाओं को समर्पित थी. एक बालिका की ही आवाज़ में रिकॉर्ड यह प्रार्थना मेरा विश्वास है,अपने हर सुननेवाले को शिक्षा के बेहद गहरे और ज़रूरी मानवीय सरोकारों से जोड़ता है,जिसमें बच्चों को ज्ञान की रोशनी से अपना जीवन रौशन करने की बात कही गई है,जिसमें अपने बदौलत इस देश की शोभा उसी तरह बढ़ाने की बात कही गई है जैसे बगीचे में फूलों से शोभा होती है, पीड़ितों से मुहब्बत और गरीबों की हिमायत करने की बात कही गई है. जिसमें बच्चों को नेक राह पर चलने की प्रेरणा दी गई है. अब ऐसे साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत उत्कृष्ट और संवेदनशील तथा भलाई और परोपकार  की प्रेरणा  देने वाली प्रार्थना क्या महज इसीलिए नहीं गाई जानी चाहिए कि वह उर्दू में लिखी गई है,और जिसे मदरसों में गवाया जाता है? शिक्षक को ‘तय शुदा प्रार्थना से हटकर’ प्रार्थना कराने के कारण सस्पेंड कर दिया गया . विद्वेषपूर्ण और वर्चस्वकारी धार्मिक-भाषाई राजनीति के चलते इसे ‘हिन्दू बच्चों पर अपनी धर्म और संस्कृति थोपने’ का इलज़ाम लगा कर बंद कराया गया है. जबकि हेड मास्टर बता रहे हैं कि स्कूल में इसके अलावा ‘वह शक्ति हमें दो दयानिधे’ भी गवाया जाता है और राष्ट्रगान तो गवाया ही जाता है, नारे भी लगवाये जाते हैं.

   प्रश्न यह है कि स्कूल में क्या किसी अन्य भाषा के श्रेष्ठ प्रार्थना करना/कराना प्रतिबंधित है?  जबकि यह उन्हीं अल्लामा इकबाल का गीत है जिन्होंने कभी लिखा था-

    सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,

    हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसितां हमारा

    मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

    हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा

यह बहुत ही दुखद बात है की जिले के शिक्षा अधिकारी की अनुसंशा पर डी.एम.(कलेक्टर) ने इसे तय शुदा प्रार्थना से हटकर प्रार्थना कराने,इससे छात्रों और अभिभावकों में डर का माहौल बनाने,  अपनी मनमानी और हठधर्मी करना मानते हुए जाँच के आदेश के साथ सस्पेंड कर दिया. वहीं,इसी वीडियो में राज्य के बेसिक शिक्षामंत्री अपनी बाईट में इसे किसी तंत्र-मन्त्र की बात बता रहे हैं.सब कुछ इतने पर ही नहीं रुक जा रहा .पीलीभीत के विधायक रामशरण वर्मा संविधान में अनुच्छेद 29,30 और 31--जो विभिन्न समुदायों को अपनी भाषा,लिपि और संस्कृति को सुरक्षित और विकसित करने का अधिकार देता है--,उसे ही संविधान से हटाये जाने की मांग कर रहे हैं.(स्रोत: एनडीटीवी पर 17 अक्टूबर  को ‘प्राइम टाइम’ में प्रसारित)

इस कवरेज से देशभक्ति और हिंदुत्व के नाम पर किये जा रहे अज्ञानता,संकीर्णता  और धर्मान्धता की पोल खुल जाती है. इससे भी बढ़कर चिंतनीय है इस देश की जो साझा संस्कृति और विरासत रही है,उसे तोड़ने का काम लगातार किया जा रहा है.धर्मान्धता और अंध राष्ट्रवाद को साजिशन पूरे उफान पर ले आया गया है. क्या अब स्कूलों में कोई भी अच्छी  बात भी किसी दूसरी भाषा की स्वीकार नहीं की जाएगी? यह गैर कानूनी होगा? यह शिक्षा और  भाषा के प्रति निहायत साम्प्रदायिक दृष्टिकोण है. इस प्रार्थना के गाए जाने की विश्व हिन्दू परिषद् के स्थानीय कार्यकर्ताओं की शिकायत इतनी बड़ी और भारी हो गई कि  प्रशासन नीचे से ऊपर तक तुरंत ऐसे मुस्तैद हो गया जैसे यह कोई हिंसा,घृणा फैलाने वाली देशद्रोही प्रार्थना हो! या बच्चों के साथ बड़ा भारी अन्याय हो गया हो! यह हद दर्जे की घृणित और साम्प्रदायिक सोच है कि बच्चों को अपने देश की बहुभाषी,बहुरंगी संस्कृति के ज्ञान से वंचित कर उन्हें महज एक ही तरह से बोलना–पढ़ना सिखाया जाय. भाषा जन गण की संपदा होती है.जबकि एक रूसी लोकोक्ति  है: “जितनी भाषाएं मैं जानता हूँ, उतनी ही बार मैं  मनुष्य हूँ”. स्कूल की अवधारणा सदैव विचारों की एक ऐसी खुली जगह की रही है,जिसमें बच्चे नई भाषा,नया ज्ञान,नई तकनीक सीखते हैं.इसीलिए भारत सरकार की एक प्रतिष्ठित संस्था ‘सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र’(CCRT) पिछले कई बरसों से इस देश की बहुरंगी संस्कृति,कलाओं,धरोहरों,भाषाओं से स्कूली बच्चों को जोड़ने और इनका महत्व समझाने के लिए काम कर रही है,जिसमें देश के हर भाग के शिक्षकों को इन्हें सुरक्षित-संरक्षित रखने की ट्रेनिंग दी जाती है. मैं भी एक स्कूली शिक्षक हूँ,जिसने यहाँ ट्रेनिंग पाई है. यहाँ अपने विद्यालयों में बच्चों को गवाने-सिखाने देश की लगभग सभी भाषाओं के गीत भी सिखाए जाते हैं.जिसमें नीरज का लिखा एक बहुत लोकप्रिय गीत भी शामिल है -- हिन्द देश के निवासी सभी जन एक हैं,रंग-रूप वेश भाषा चाहे अनेक हैं.’

ऐसी संकीर्णता और जड़ता उस भारत के उस भविष्य के ख़िलाफ़ है जिसका सपना यहाँ के महापुरुषों ने देखा था. स्कूल या शिक्षा में ऐसी संकीर्णताओं की जगह नहीं होनी चाहिए. यह कोई राष्ट्र-विरोधी काम नहीं था कि आनन-फानन में सस्पेंड कर दिया जाए. स्कूल में सबकुछ बिलकुल तयशुदा और अंतिम तो नहीं होता. मान लीजिये, इस पर आपत्ति ही थी तो इसकी पूरी जाँच-पड़ताल के बाद कार्यवाही होनी चाहिए थी. दरअसल जिस तरह से इधर धर्म आधारित उग्र नफरत की अंधी और हिंसक राजनीति की जा रही है,अच्छे और ऊंचे आदर्शों व जीवनमूल्यों को छोड़ा जा रहा है, उसके चलते उस हमारे उस समृद्ध साझे विरासत और संस्कृति को कुछ साल के बाद मानो एक बीती हुई बात हो जानी है.तब सबकुछ वही और वैसा ही होगा जो ये चाहते हैं. 

ऊपर उल्लेखित प्रार्थना इतनी अच्छी है कि मैंने अपने स्कूल में बच्चों को  इसे सिखाया और गवाया है. क्या इसे सीखकर बच्चे एक और भाषा में थोड़ा ही सही, जानकार नहीं हुए होंगे.क्या यह कोई नुकसानदायक चीज़ है? ज्ञान के क्षेत्र असीमित हैं. यह तो ऐसा महासागर है जिसमें दुनिया की तमाम अच्छी बातें समाहित हैं-चाहे वह किसी भी देश या भाषा की हो. शिक्षा को ऐसा व्यापक और उदार होना ही चाहिए. तभी बच्चों में उस सहृदयता,उदारता, सहनशीलता और परस्पर सहयोग जैसे आदर्श मानवीय मूल्य स्थापित हो सकेंगे जो शिक्षा का एक बेहद महत्वपूर्ण आयाम है. अपना पूरा जीवन प्राथमिक शाला के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगाने वाले रूस के प्रसिद्द शिक्षक वसीली सुखोम्लिन्स्की मानते हैं: “शिक्षा बच्चों के लिए रोचक और मनपसंद काम तभी हो सकती है जब वह विचारों,भावनाओं,सृजन,सौन्दर्य और खेलों की उज्जवल किरणों से आलोकित हो ”.

इस मामले में अच्छी बात यह हुई कि उस स्कूल के छात्र अपने उस शिक्षक के सस्पेंशन के विरोध में,उनकी बहाली की मांग को लेकर स्कूल से बाहर आ गए. वे मान रहे हैं कि उनके शिक्षक के साथ गलत और अन्याय हुआ है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में 19 अक्टूबर 2019 को प्रकाशित असद रहमान की रिपोर्ट के अनुसार, विरोध करनेवाले ग्रुप के कक्षा 5 के एक छात्र का कहना है, “जब हमने इसे अपनी उर्दू पुस्तक में पढ़ा,हमने इसे पसंद किया तब हेड मास्टर से इसे गाने की अनुमति मांगी. दोनों धर्म के--हिन्दू और मुस्लिम छात्रों-- ने ही मांग की. और हेड मास्टर ने इसे हर एक दिन छोड़कर गाने की अनुमति दे दी ”.वहीं  उस स्कूल के चौथी कक्षा के एक छात्र का बयान बहुत तार्किक है: “यदि उन्हें इस कविता को हमारे गाने के कारण सस्पेंड किया गया है तो यह  सरकार की  गलती है जो इसे हमारे पाठ्यक्रम में रखा है. तो क्या इसका मतलब इस सरकार को सस्पेंड कर देना चाहिए?”     

अब प्रदेश के बेसिक शिक्षा मंत्री भी डी.एम. द्वारा जल्दबाजी में  किए गए उनके सस्पेंशन को जल्द ही हटाने की बात कर रहे हैं

लेखक का संपर्क पता- 41,मुखर्जी नगर,सिकोलाभाठा ,दुर्ग छतीसगढ़ पिन-49100 फोन नंबर- 9827993920

 

विशेष टिप्पणी

याद रखिए संपादक जी... क्रांतिकारी कभी बूढ़ा नहीं होता है.... और हां...कभी मरता भी नहीं है.

राजकुमार सोनी

प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और दमन के खिलाफ अनेक जनआंदोलन की अगुवाई करने वाले लाखन सिंह भले ही एक काया के तौर पर इस दुनिया का हिस्सा नहीं है, लेकिन उनकी मौजूदगी हर समय विद्यमान रहने वाली है. कभी वे बिलासपुर के नेहरू चौक में नजर आएंगे तो कभी रायपुर के बूढ़ातालाब के पास... तो कभी बस्तर में आदिवासियों के साथ.निजी तौर पर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि वे इस दुनिया से कूच कर गए हैं. इस देश के तमाम चड्डीधारी लाख कोशिश कर लें, लेकिन न तो वे इतिहास को फांसी पर लटका पाएंगे और न ही उनकी दिली ख्वाहिश से विचारधारा की मौत होने वाली है. दोस्तों... क्रांतिकारियों की मौत कभी नहीं होती. क्रांतिकारी कभी नहीं मरते.

लाखन सिंह...जिन्हें हम सब लाखन भाई कहते थे, उनसे मेरा पहला परिचय कब और किस दिन हुआ यह बताना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन मुझे याद है कि जब तहलका में था तब मैंने एक खबर के सिलसिले में वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल से नंबर लेकर उन्हें फोन किया था. एक खबर के लिए महज एक छोटी सी जानकारी हासिल करने का मामला धीरे-धीरे एक दूसरे तरह के रिश्ते में बदल गया. वे एक पत्रकार की पसन्द बन गए. ( हालांकि वे जनसरोकार से जुड़ी खबरों पर काम करने वाले हर पत्रकार की पहली पसंद थे. ) मुझे किसी भी खबर में कुछ पूछना होता तो उन्हें आवश्यक रुप से याद करता था. सामान्य तौर पर अखबार में काम करने वाले संवाददाताओं को मालिक और उनके द्वारा नियुक्त किए गए चिरकुट संपादक समय-समय पर हिदायत देते रहते हैं- देखिए ज्यादा... रिश्ते मत बनाइए... प्रोफेशनल रहिए... अखबार को जितनी जरूरत है उतनी बात करिए... लेकिन मैं मालिक और चड्डीधारी संपादक की परवाह किए बगैर उनसे बात करता था और लगातार बात करता था.

कथित मुख्यधारा की पत्रकारिता के अंतिम दिनों में संघ की विचारधारा को बीज-खाद और पानी देकर पोषित करने वाले जिस अखबार में फंसा हुआ था वहां एक स्थानीय संपादक को लाखन भाई से खास तरह की चिढ़ थीं. जब भी लाखन भाई का नाम खबर में लेता वे सीधे-सीधे कहते- यार... किस काम का यह वर्शन. अखबार को दो पैसे का फायदा मिले...यह देख-समझकर काम करना चाहिए. इस बूढ़े क्रांतिकारी का पक्ष छापकर क्या मिलेगा. मेरा जवाब होता- बेशक आप उनका पक्ष हटा सकते हैं, लेकिन संपादक जी आपको यह तो पता होना चाहिए कि एक क्रांतिकारी कभी बूढ़ा नहीं होता. आप इस क्रांतिकारी को ठीक से जानते नहीं है. क्या आप एक बार भी पूरे दिन तेज गरमी में तख्ती लेकर किसी चौक में खड़े हो सकते हैं? संपादक कहते- मैं क्यों खड़ा रहूंगा. यह मेरा काम नहीं है. मैं उनसे पूछता- एक अखबार में जनसरोकार से जुड़ी खबरों को पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए... इस सिद्धांत तो आप जानते ही होंगे. अखबार में काम करने वाले संपादक और उसके रिपोर्टर को किसके पक्ष में खड़े रहना है इसकी सामान्य जानकारी भी आपके पास होगी ही, लेकिन क्या आप ऐसा कर पा रहे हैं ? बस... संपादक जी का आखिर वाक्य होता- यार... मुझसे बहस मत करो.

बावजूद इसके लड़-भिंडकर मैं लाखन भाई ( उनके विचारों के लिए ) गुंजाइश निकालता रहा. डाक्टर रमन सिंह के शासनकाल में जब बस्तर एक बड़े हिस्से में निर्दोष आदिवासियों पर अत्याचार बढ़ा तब लाखन भाई शालिनी गेरा, प्रियंका शुक्ला सहित बस्तर की आदिवासी बच्चियों के साथ अक्सर रायपुर आते थे. कभी वे प्रेस कांफ्रेन्स करते तो कभी सीधे मुझसे मिलने अखबार के दफ्तर चले आते. उन्हें देखते ही विचार और कद से ठिगनु स्थानीय संपादक का पारा चढ़ जाता. वे फूं-फां- फूं-फा करने लगते. नाक-भौ सिकुड़ने लगते. ( अब संघ के दफ्तर में तब्दील हो चुके अखबार के दफ्तर में कोई क्रांतिकारी पहुंच जाएगा तो फूं-फां झूं-झा का होना स्वाभाविक ही था. )

धीरे-धीरे लाखन भाई छपना बंद हो गए. मुझे  राजनीति/ प्रशासन/ आदिवासी इलाकों की बीट को देखने से रोक दिया गया. मैं सांस्कृतिक खबरों को कव्हरेज करने लगा था. एक रोज लाखन भाई ने मुझे बताया कि मैं जिस अखबार के लिए काम करता हूं उसके बिलासपुर संस्करण ने भी आंदोलन की खबरों को छापना बंद कर दिया है. मैंने लाखन भाई को बताया वहां का संपादक भी मोदी का परम भक्त है. बात-बात में लघुत्तम-सर्वोत्तम, घटोत्तम-चट्टोत्तम और अतिउत्तम करते रहता है. चिंता करने की कोई बात इसलिए नहीं है क्योंकि ढंग से पढ़ने-लिखने वाला कोई भी शख्स उसे गंभीरता से नहीं लेता है. आप भी मत लीजिए. केवल फिल्मों मेंं ही नहीं पत्रकारिता मेंं भी बहुत से लोग उदय चोपड़ा होते हैं.

ऐसा क्या ? बोलकर लाखन भाई मेरी बात से सहमत हो गए और फिर धीरे से  सीजी बास्केट को लांच करने की योजना बनी. खबरों की इस बास्केट को लांच करने का एक मकसद ही यहीं था कि भाजपा के शासनकाल में जनआंदोलन से जुड़ी खबरों को बुरी तरह से दबाया जा रहा था. अब मेरे द्वारा जो कुछ भी लिखा जाता उसे वे सीजी बास्केट में अवश्य छापते. जब तबादले में कोयम्बटूर भेजा गया तब भी वक्त निकालकर मैं उनके सीजी बास्केट के लिए खबरें लिखता रहा. मेरी खबरों में वे मेरा नाम लिखते थे- विक्रम वरदराजन. विधानसभा चुनाव के रिजल्ट से कुछ पहले मैंने उन्हें खबर भेजी कि भाजपा 15 से 20 सीटों पर सिमट जाएंगी. उन्होंने फोन किया और कारण जानना चाहा. मैंने भी हंसते हुए कहा-क्या लाखन भाई... आज तक विक्रम वरदराजन की कोई रिपोर्ट झूठी निकली है क्या ?

उनसे साथ अपने रिश्तों के सैकड़ों किस्से याद आ रहे हैं. अभी लगभग दो-तीन महीने पहले मैं उनके और जीएसएस के सुबोध भाई के साथ छत्तीसगढ़ी फिल्मों के सामने चुनौतियां विषय पर आयोजित की गई एक गोष्ठी का हिस्सा था. इस गोष्ठी में गरमा-गरम बहस के कुछ दिनों बाद ही वे ही सुबोध जी के साथ मेरे निवास आए. उनके साथ अनुज भी था. हम सब पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म का निर्माण करने वाले मनुनायक जी को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जी से मिलने गए थे. मुख्यमंत्री बघेल एक घरेलू टी-शर्ट पहनकर बैठे थे. उसी टी-शर्ट में उन्होंने फोटो भी खिंचवा ली. उनका ठेठ छत्तीसगढ़ियां अंदाज देखकर वे बहुत खुश हुए और जब लौटे तो आग्रह किया कि कुछ ठेठ अदांज में सीजी बास्केट के लिए मनु नायक जी का एक इंटरव्यूह कर लूं. मैं उनके आदेश और आग्रह को ठुकराने की स्थिति में कभी नहीं रहा. मैंने यह इंटरव्यूह किया. 

बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें देखकर आप खुश हो पाते हैं. जब भी कोई आयोजन हो... आंदोलन हो... लाखन भाई को देखते ही खुश हो जाता था. पतली-दुबली काया... पैरों में मामूली सी चप्पल, सफेद बाल और जानलेवा दमे के बावजूद  हंसता हुआ उनका चेहरा रह-रहकर याद आ रहा है. इस चेहरे के साथ आलोक शुक्ला, प्रियंका, अनुज, रोशनी, ईशा खंडेलवाल, शालिनी गेरा, लता, श्रेया, निकिता सहित उन्हें चाहने वाले हजारों-हजार नौजवानों का साथ भी याद आ रहा है. मुझे नहीं लगता कि उन्हें चाहने वाले उन्हें यूं ही कभी खारिज होने देंगे. नौजवान साथी उन्हें सबसे ज्यादा पसंद करते थे. रात हो बिरात हो... चाय पीनी हो, काफी पीनी हो... कोई बात हो... लाखन भाई... लाखन भाई... लाखन भाई... बस लाखन भाई... । याद रखिए संपादक जी... जो क्रांतिकारी बच्चों और नौजवानों के बीच मौजूद होता है वह कभी बूढ़ा नहीं होता है.... और हां... कभी मरता भी नहीं है. आपके अखबार में जगह नहीं देने से क्या घंटा होता ?

 

 

फिल्म

अब लव के पीछे लट्ठ लेकर पड़ गए हैं छत्तीसगढ़ के फिल्मकार

राजकुमार सोनी

अमीर परिवार से ताल्लुक रखने वाली हीरोइन, गरीब परिवार का हीरो, हीरोइन का तालाब में गिरना, हीरो का उसे बचाना, प्यार का इकरार, फिर दो प्यार करने वालों के बीच छिछोरे किस्म के खलनायक की इंट्री... बेमतलब की बारिश में लपड़-झपड़ और ढिशुंम- ढिशुंम...

हिंदी फिल्मों के ये सारे फार्मूले भले ही मुंबई में बासी पड़ गए हों, लेकिन छत्तीसगढ़ी सिनेमा में अब भी इनकी धूम बरकरार है. छत्तीसगढ़ में हर दूसरे पखवाड़े जेमिनी और एवीएम प्रोडक्शन की मद्रासी तासीर वाली फिल्मों का प्रदर्शन होता है. खेती-खार, आटो-ट्रैक्टर बेचकर और ज्यादा हुआ तो एक-दूसरे को टोपी पहनाकर फिल्म का निर्माण करने वाले फिल्मकार चोरी-चकारी से निर्मित फिल्म को ही अपने जीवन की उपलब्धि मान बैठे हैं और अपनी दुनिया में खुश है. सच तो यह है कि छत्तीसगढ़ का एक भी सुधि दर्शक चोरी-चकारी करने वाले फिल्मकार को गंभीरता से नहीं लेता है. सुधि दर्शक अगर कभी गलती से फिल्म देखने चला गया तो खुद पर हंसता है. खुद को गालियां देता है कि कहां फंस गया. कोसता है. अपने माथे को लहू-लुहान करने के लिए दीवार की तलाश करता है, लेकिन इससे आत्ममुग्ध निर्माता-निर्देशकों को फर्क नहीं पड़ता... उनका अपना संसार है. वे गदगद रहते हैं और निर्बाध गति से मरियल- सड़ियल सी कहानी में सेंध मारने के काम में लगे रहते हैं. अगर गलती से किसी ने उन्हें टोका तो वे लामबंद हो जाते हैं और नारे लगाते हैं-ज्यादा आलोचना करने की खुजली लगी है तो फिल्म बनाकर दिखाओ....?

राज्य निर्माण के बाद यहां लगभग साढ़े तीन-सौ के आसपास फिल्में रिलीज हो चुकी हैं, लेकिन सात-आठ फिल्मों को छोड़कर ज्यादातर फिल्में अपनी लागत तक वसूल नहीं पाई है. किसी निर्माता से पूछो कि भइया... ऐसा क्यों हो रहा है तो वह तुरन्त रटा-रटाया उत्तर देगा- देखिए... छत्तीसगढ़ में सिंगल थियेटर की कमी है. छबिगृह बंद हो रहे हैं. सरकार सब्सिडी नहीं देती, लेकिन कभी नहीं कहेगा कि भाई साहब... हम लोग मौलिक कहानी पर काम नहीं करते.घटिया फिल्में बनाते हैं... हद दर्जें केअलाल है और मेहनत से जी चुराते हैं.

वर्ष 2000 में जब राज्य का निर्माण हो रहा था तब मोर छंइया-भुइंया जैसी एक फिल्म आई थी. एक गांव की पारिवारिक कहानी पर बनी यह फिल्म इसलिए चल निकली क्योंकि जिस दौरान राज्य बना उस समय हर तरफ खुशी का माहौल था. प्रदेश के हर दूसरे व्यक्ति को यह लग रहा था कि अब उसे एक नई पहचान मिलने जा रही है. फिल्म में स्थानीयता की जबरदस्त रंगत और उमंग के वातावरण की वजह से लोग-बाग थियेटर तक खिंचे चले आए. इस फिल्म की सफलता के बाद पंद्रह से बीस लाख लगाकर करोड़ों रुपए कमाने का नुस्खा लोगों को इतना अधिक भा गया कि हर गली-कूचे में आड़े-तेड़े निर्माता-निर्देशकों की फौज दिखाई देने लगी. जिसे देखो वहीं फिल्म बनाने के काम-धंधे में लग गया था.हर निर्माता और निर्देशक अपनी फिल्म के नाम के आगे-पीछे मोर ( मेरा ) शब्द का इस्तेमाल करने लगा- मोर संग मितवा, मोर धरती मैया, मोर संग चलव, मोर गांव- मोर धरम, माटी मोर महतारी, मोर सपना के राजा, मोर गंवई, ए मोर बांटा, अब मोर पारी हे, मोर सैंया, सुंदर मोर छत्तीसगढ़, मोर जोड़ीदार.... ( और भी न जाने कितने मोर ??? )

जब लोग मोर से बोर गए तो प्रेम चंद्राकर फिल्मों में मया ( प्रेम ) की बहार लेकर आए. उनकी फिल्म मया देदे- मया लेले औसत कहानी के बावजूद हिट रही. उसके बाद  परदेसी के मया, मया देदे मयारु, मया ने भी ठीक-ठाक व्यवसाय किया. बस फिर क्या था... मया ब्रांड की फिल्मों की कतार लग गई. मया होगे रे, तोर मया के मारे, मया के बरखा, मया म फूल मया मा कांटे, तोर मया मा जादू हे... और भी न जाने कितनी मया... मगर बाद में किसी भी मया ने टिकट खिड़की पर पानी नहीं मांगा.

अब लव की बारी

वैसे तो छत्तीसगढ़ की हर फिल्मों में एक प्रेम कहानी चलती है, लेकिन पिछले कुछ समय से मया-फया का स्थान अंग्रेजी शब्द लव ने ले लिया है. कुछ समय पहले निर्माता मोहन सुंदरानी ने आईलवयू नाम की फिल्म बनाई थी. इस फिल्म ने टिकट खिड़की पर धमाल मचाया तो उन्होंने आईलवयू टू बना डाली.  बताते हैं कि उनकी दूसरी फिल्म ने पहले जैसा व्यवसाय नहीं किया, बावजूद इसके लागत निकल गई. उनकी इस सफलता के बाद लव ब्रांड फिल्मों का ट्रेंड चल निकला है. अभी छबिगृह में मुंबई के पाव बड़ा और मद्रास के मसाला दोसा का अजीबो-गरीब स्वाद देने वाली फिल्म लव दीवाना चल रही है. इस फिल्म के बाद यह भी प्रचारित हो रहा है कि छत्तीसगढ़ को उनका अपना सलमान खान मिल गया है. ( हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ अपना नायक कुमार गौरव या सलमान खान में नहीं बल्कि गांव के मजदूर और किसान में ही तलाश करता रहा है.)

बहरहाल किसान-मजदूर की समस्याओं से दूर शहर के चौराहें लव-लव से पटे हुए हैं. आने वाले दिनों में भी शायद ऐसा ही हो क्योंकि आ रही है फिल्म- सारी लव यू जान, लव लेटर, लव मैरिज, मोला लव होगें, तोर-मोर लव स्टोरी....... ( और भी न जाने कितने प्रकार के लव )

इतना ज्यादा लव हो गया है कि ट्रैफिक जाम हो गया है.