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कश्मीर फाइल्स और अंधभक्तों का उत्पात

कश्मीर फाइल्स और अंधभक्तों का उत्पात

राजकुमार सोनी

9826895207

कश्मीर फाइल्स के प्रदर्शन के दौरान कथित राष्ट्रवादियों अर्थात अंधभक्तों ने जबरदस्त उत्पात मचाया था. हालांकि उनका उत्पात अब भी कम नहीं हुआ है, लेकिन फिल्म की रिलीज के समय हर चिलमची को यह लगने लगा था कि सांस्कृतिक तौर पर वह बहुत बड़ी जंग जीत गया है. धीरे-धीरे जब फिल्म की कलई खुली तो चिलमची बगले झांकने को मजबूर हुए. चूंकि चिलमचियों की गिनती बेशर्म प्रजाति के तौर पर होती है इसलिए वे अब भी मानते हैं कि कश्मीर फाइल्स एक ऐसी महान ऐतिहासिक फिल्म है जो फिर दोबारा कभी नहीं बनेगी. एको अहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति.

हकीकत यह है कि कश्मीर फाइल्स निहायत ही गंदे मकसद से बनाई गई एक कचरा फिल्म हैं. यह फिल्म उन लोगों को ही अच्छी लगी जो अपने भगवान मोदी को आगे रखते रहे हैं और देश को पीछे.

यह फिल्म युद्ध के उदघोष की तरह जय-जय श्रीराम का नारा लगाकर रोजी-रोटी चलाने वाले लपंट समुदाय की भावनाओं को भुनाने और निकट चुनाव में उनकी दोयम दर्जे की ऊर्जा का उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करती है. कश्मीर में कश्मीरी पंड़ितों के साथ जो कुछ घटित हुआ वह पूरी तरह से शर्मनाक है. उस पर किसी भी तरह का किंतु-परन्तु नहीं हो सकता है, लेकिन फिल्म का भीतरी और खुला स्वर यहीं है कि मुसलमान कौम पूरी तरह से हत्यारी है और हर मुसलमान गद्दार है.

फिल्म के प्रारंभ में जब फिल्म को प्रोजेक्ट करने वाली कंपनियों के विज्ञापन छपते हैं तब छोटे अक्षरों में यह भी छपता हैं कि यह फिल्म विश्व के समस्त पीड़ित समुदाय को समर्पित हैं, लेकिन फिल्म को देखकर कहीं से भी यह नहीं लगता है कि यह फिल्म पीड़ित मानवता की बात करती हैं. फिल्म को देखकर यह साफ-साफ झलकता है कि मुसलमानों और आजादी-आजादी का गीत गाने वाले नौजवानों के खिलाफ नफरत को कैसे जिंदा रखना है ? फिल्म यह तय करने लगती हैं कि देश में राजनीतिक तौर पर जो कुछ भी घट रहा है वह ठीक है और जब तक केंद्र की वर्तमान सरकार है तब तक ही हिन्दुओं की रक्षा हो सकती हैं ? अगर मुसलमानों को ठीक करना है तो हिन्दुओं को एकजुट होना होगा. यह फिल्म कश्मीर की महिमा और देश को विश्वगुरू बनाने के नाम पर ऋषि-मुनियों के सानिध्य में गुफाओं-कंदराओं में लौटकर खुद को गौरान्वित करने की जोरदार ढंग से वकालत भी करती हैं. पूरी फिल्म में जिसे देखो वहीं लेक्चर झाड़ते मिलता हैं.

आईटीसेल के लिए काम करने वाले घोषित और अघोषित लंपट समुदाय ने इस फिल्म पर चिल्ल-पौ मचाकर इसे हिट बना दिया है. जिस फिल्म का प्रमोशन स्वयं प्रधानमंत्री ने ( हालांकि वे सबके प्रधानमंत्री होते तो शायद ऐसा नहीं करते ) कर दिया हो उसे तो आस्कर के लिए भी भेजा जा सकता है. कश्मीर फाइल्स का निर्माण करने वाली राष्ट्रवादियों की फौज ने देश के गृहमंत्री अमित शाह के दर्शन का लाभ भी प्राप्त कर लिया है. विवेक अग्निहोत्री की धुंआधार पैंतरेबाजी को देखकर तो यह भी लगता है कि यह बंदा जल्द ही पद्मश्री और पद्मभूषण भी हासिल कर ही लेगा.

 

मेरी नज़र में यह फिल्म दो कौड़ी से अधिक की नहीं है. एक अच्छी और मील का पत्थर साबित होने वाली कोई भी फिल्म अगर घटनाओं को जस का तस रखती भी हैं तो एक कदम आगे बढ़कर मार्ग भी सुझाती है. दिशा दिखाती है. एक अच्छी फिल्म हमारे भीतर नफरत का पहाड़ खड़ा नहीं करती. वह मनुष्य को और अधिक संवेदनशील बनाने का काम करती है. कश्मीर फाइल्स के भीतर ऐसा कोई भी तत्व मौजूद नहीं है जिसे देखकर कुछ बेहतर करने की भीतरी उष्मा प्राप्त हो. यहीं एक वजह है कि फिल्म की बंपर कमाई के बावजूद अंधभक्त केंद्र की मोदी सरकार से यह सवाल करने की स्थिति में कभी नहीं दिखे कि धारा 370 खत्म होने के बावजूद भी कश्मीरी पंड़ितों के पुर्नवास और बेहतरी के लिए अब तक क्या प्रयास हुआ ? यह सब तब होता जब यह फिल्म संघियों का टूल बनने के बजाय शाश्वत सृजन होती ? सब जानते हैं कि कश्मीरी पंड़ितों के साथ जो कुछ भी घट रहा था तब केंद्र की वीपी सिंह की सरकार को भाजपा का समर्थन हासिल था. तब भी भाजपा की सरकार ने कश्मीरी पंड़ितों के लिए कुछ नहीं किया. अब जबकि मोदी सरकार हैं तब भी कश्मीरी पंड़ितों के पुनर्वास के लिए कुछ बेहतर होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है.

फिल्म का एक पात्र ( मिथुन चक्रवर्ती ) जो जम्मू-कश्मीर में पदस्थ एक अफसर हैं… वह बार-बार इस बात को कहता है कि कश्मीरी पंड़ित मर रहे हैं. शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं. कीड़े- मकोड़ों सा जीवन जी रहे हैं. मगर सरकार कुछ नहीं कर रही हैं. आखिरकार वह कौन सी सरकार हैं ? सरकार कश्मीरी पंड़ितों की रक्षा क्यों नहीं कर पा रही हैं ? सरकार क्यों फेल हुई ? यह सारे सवाल फिल्म से नदारद हैं. बस…फिल्म का पात्र सरकार को कोसते रहता है. वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि तब केंद्र की सरकार भाजपा के समर्थन से चल रही थीं. अगर फिल्म में यह तथ्य प्रमुखता से उभर जाता तो वे राजनीतिज्ञ बेनकाब हो जाते जो इसके लिए दोषी थे.

फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती तीन-चार तरह की फाइल रखता है. सभी फाइलों में अखबारों की कटिंग चस्पा है. फिल्म के इस पात्र को अखबार की कतरनों पर तो भरोसा भी है, लेकिन मीडिया को रखैल बताते हुए एक पात्र यह भी कहता है कि कोई भी मीडिया कश्मीर का सच नहीं बता रहा है ? खैर…फिल्मकार के लाख बचाव के बावजूद परत-दर-परत पोल खुलती चलती हैं. फिल्म में हिंसा के इतने भयावह दृश्य हैं कि सेंसर बोर्ड की पोल खुल जाती हैं. छविगृह में बैठा दर्शक खुद से सवाल करने लगता है कि यार….फिल्म के क्रूरतम से क्रूरतम दृश्यों पर कैची क्यों नहीं चलाई गई ? सेंसर बोर्ड किसके दबाव में था ? दर्शक को खुद के भीतर से यह जवाब भी मिलता है कि जब आयकर विभाग, सीबीआई, ईडी और चुनाव आयोग सहित देश की कई संवैधानिक संस्थाओं की हैसियत दो कौड़ी की कर दी गई हैं तो फिर सेंसरबोर्ड की क्या औकात ?

फिल्म में आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का उल्लेख कर फिल्मकार यह भी बता देता है कि वह किस खेमे का है ? और उसका इरादा क्या है ? वह क्या चाहता है ? वैसे भी ब्राह्मणों के लिए एक अलग देश की मांग करने वाले विवेक अग्निहोत्री का दक्षिणपंथी झुकाव किसी से छिपा हुआ नहीं है. एक बूढ़ी काया पर गोली चलाने वाले गोड़से और माफी वीर सावरकर की गैंग का कोई सदस्य जब कभी भी फिल्म बनाएगा तो क्या वह फिल्म के साथ न्याय करेगा ? यह फिल्म देश को दो भागों में बांटने का काम करती है. एक भाग में नफरती चिन्टूओं की जमात हैं तो हिस्से में भाई-चारे और मोहब्बत पर यकीन करने वाले लोग हैं. मुझे इस फिल्म को देखने की सिफारिश करने वालों में ज्यादातर लोग सवर्ण समाज से थे. जब फिल्म देखी तो लगा कि फिल्मकार ने उन्हें सहानुभूति का पात्र बनाकर देश के अन्य समुदायों के बीच कहीं घृणा का पात्र बना दिया है. यहीं एक वजह है कि फिल्म को देखने के बाद यह आवाज भी उठी कि क्या देश में सिर्फ पंड़ित ही रहते हैं? क्या देश में शोषित-पीड़ित दलित और आदिवासियों का कोई वजूद नहीं है ?

सुधि व समझदार दर्शकों को इस फिल्म का एजेंडा साफ-साफ समझ में आया. जब कभी भी इस फिल्म को लेकर शेखी बघारे तब बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जन सरोकार से जुड़े संस्कृतिकर्मियों को इस फिल्म और इसके फिल्मकार के खौफनाक इरादों की पोल खोलनी ही चाहिए. अगर हमने अभी प्रतिरोध दर्ज नहीं किया तो अभी एक फाइल बनी हैं….आगे और कई ऐसी संघी फाइलें सामने आएगी. हर फाइल से नफरत बाहर निकलेगी. यह देश वैसे भी अंधभक्ति और अंधभक्तों से परेशान चल रहा है. कश्मीर फाइल्स अंधभक्तों की नई खेप पैदा करने वाली फैक्ट्री के तौर पर खुद को स्थापित करने का घिनौना प्रयास करती है.

अब आप पूछ सकते हैं कि फिल्म की कहानी क्या है ? फिल्म में किसका अभिनय अच्छा है ? सच तो यह है कि फिल्म की कोई कहानी नहीं है. फिल्म में सिर्फ घटिया और खतरनाक इरादा है. फिल्म में किसी भी अभिनेता की भूमिका जानदार नहीं है. फिल्म में बिट्टा कराटे ( खलनायक )  की भूमिका निभाने वाले मराठी अभिनेता चिन्मय दीपक मंडेलकर की आंखों का सूरमा, उसका पलक झपकाना और संवाद बोलने का अंदाज एक कौम विशेष के हर चेहरे पर जाकर चस्पा हो जाता है और यहीं दुर्भाग्यजनक है.

अब फिल्म को हिट करने के लिए राष्ट्रवादियों के तौर-तरीकों पर भी थोड़ी चर्चा कर ली जाय.

फिल्म देखने के कुछ दिनों बाद एक शख्स ने मुझे जयश्री राम कहते हुए सूचित किया कि वह कश्मीर फाइल्स देखने लिए टिकट का प्रबंध कर सकता है. जब मैंने उसे बताया कि फिल्म को लेकर मचे हुए शोर-शराबे के बीच किसी तरह मन को मारकर फिल्म देख चुका हूं तो उसने कहा- कोई बात नहीं आप अपने बच्चों को टिकट दे सकते हैं. मैंने कहा- मेरे बच्चे नफरत से वाकिफ नहीं होना चाहते तो सामने वाले ने थोड़ा नाराजगी प्रकट करते हुए कहा- ऐसा मत बोलिए भाई साहब…बच्चों को तो यह जानना बेहद जरुरी है कि दाढ़ीवालों ने हम पर कैसे- कैसे अत्याचार किए हैं ? कैसे हमारी मां-बहनों की इज्जत को लूटा हैं ? अगर हम यह सब अपने बच्चों को नहीं बता पाएंगे कि तो फिर हमारे होने और नहीं होने का कोई मतलब नहीं है. हमें यह तो बताना ही होगा कि हमारा असली दुश्मन कौन हैं ? अगर हमें अपनी पीढ़ी को बचाना है तो हमें हर घर से कम से कम दो-तीन बच्चे को राष्ट्रवादी बनाना ही होगा.

जब मैंने प्रतिवाद किया कि मेरे बच्चे राष्ट्रवाद का चूरन चाटने को तैयार नहीं हैं तो बहस लंबी चलने लगी…और अंत में इस बात पर जाकर खत्म हुई कि मैं देशद्रोही हूं.जेहादियों का समर्थक हूं.जब हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा तब मैं कलपता फिरूंगा कि मैंने ये क्या कर डाला ?मैंने हिन्दू राष्ट्र बनने में अपना सहयोग क्यों नहीं दिया ? वगैरह- वगैरह…

हो सकता है जो मेरे साथ घटित हुआ है वह आपके साथ भी हुआ हो. आपको भी किसी ने फोन करके कहा हो कि अगर आप देशभक्त हैं तो पहली फुरसत में जाकर कश्मीर फाइल्स देख आओ.

यह सत्य है कि कुछ लोग थोक भाव में फिल्म की टिकट खरीद रहे थे और उसे फ्री में बांट रहे थे. हॉल पर हॉल बुक कर रहे थे और लोगों को घेर-घारकर फिल्म दिखवा रहे थे. जो कोई भी मना करता था उसे कह दिया जाता था कि टिकट रिश्तेदार या पड़ोसी को दे दीजिए.

ऐसे भी लोग थे जो झुंड बना कर उत्तेजक और भड़काऊ नारे लगाते हुए सनीमा देखने जा रहे थे. फिल्म के पोस्टर और टॉकीज के सामने भगवा गमछा ओढ़कर सेल्फी ले रहे थे उनकी शिनाख्त आसानी से की जा सकती थीं. हॉल के भीतर संघ की प्रार्थना-नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे गाई जा रही थीं. वीडियो बनाकर यू् ट्यूब- फेसबुक पर अपलोड किया जा रहा था. फेसबुक पर खुलेआम लिखा जा रहा था- जेहादियों… फलांने भैय्या की वजह से पूरी टॉकीज बुक हुई हैं.दाढ़ी वालों अब तुम्हारी खैर…नहीं…। ये फिल्म नहीं ताबूत हैं… आदि-आदि.

इस बीच फेसबुक पर दो मजेदार पोस्टर भी देखने को मिले. एक पोस्टर में लिखा था-गर आप शादी करने जा रहे हैं तो आपको मिल सकता हैं डिस्काउंट, बस...आपको दिखानी होगी कश्मीर फाइल्स की टिकट

पोस्टर में छूट देने वाले का फोन नंबर भी दिया हुआ था. मुझे लगा कि दिए गए नंबर पर बातचीत कर लेनी चाहिए क्योंकि कई बार पोस्टर में झूठ भी चस्पा होता है. मैंने फोन लगाया तो पंड़ित रवींद्र कुमार शास्त्री ने फोन उठाया. उन्होंने बताया कि पोस्टर में जो कुछ लिखा हुआ है वह पूरी तरह से सच है. यह छूट उन लोगों को ही दी जा रही है जो कश्मीर फाइल्स देख चुके हैं. उन्हें छूट हासिल करने के लिए फिल्म की टिकट दिखानी पड़ेगी. मैंने कहा- क्या राजा मौली की फिल्म आरआरआर की टिकट दिखाने से काम नहीं चलेगा ? पंड़ित जी ने कहा- आरआरआर भी अच्छी फिल्म है, लेकिन अभी हमारे लिए कश्मीरी फाइल्स जरूरी है. हमें नहीं मालूम था कि पंड़ितों के साथ कितना अत्याचार हुआ है. जब फिल्म देखी तब पता चला कि बहुत बुरा हुआ है. हमने तय किया है कि फिल्म के प्रमोशन के लिए हम शादी-ब्याह के अलावा हवन, जन्मकुंडली बनाने और गाड़ी पूजन में 50 प्रतिशत की छूट प्रदान करेंगे. शादी में पूजन के लिए हम 11 हजार रुपए लेते हैं लेकिन जो भी कश्मीर फाइल्स देखकर शादी करेगा उन जोड़ों की शादी मात्र 5 हजार पांच सौ रुपए में कर दी जाएगी.

 

एक पोस्टर राष्ट्रभक्त अनिल शर्मा का भी था. उस पोस्टर में लिखा था कि जो कोई भी कश्मीर फाइल्स की टिकट दिखाएगा उसे गाय के दूध में डिस्काउंट दिया जाएगा. पोस्टर में उल्लेखित था कि जो दूध 44 रुपए लीटर में बेचा जाता है उसे 35 रुपए लीटर में बेचा जाएगा.

 

कश्मीर फाइल्स की फजीहत के बीच उसके निर्देशक विवेक अग्निहोत्री का दो- एक मजेदार इंटरव्यू भी देखने को मिला. एक पत्रकार ने उससे पूछा कि आपकी फिल्म ने करोड़ों कमा लिए… क्या आप कश्मीरी पंड़ितों के पुर्नवास के लिए कुछ करेंगे ? विवेक अग्निहोत्री ने आंखें चुराते हुए उत्तर दिया हैं-आपको गलतफहमी हैं कि फिल्म कमा रही हैं. जब कमाएगी तब देखेंगे. किसी एक राज्य में कोई भक्त फ्री में कश्मीर फाइल्स फिल्म दिखवा रहा था तो अग्निहोत्री को कहना पड़ा- खुले में फिल्म दिखवाना अपराध है. लोग पैसे देकर फिल्म देखें. भाजपा शासित राज्यों ने फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया था. टैक्स फ्री-टैक्स फ्री की चिल्लो-पौ के बीच किसी ने सोशल मीडिया में यह सुझाव भी दिया है कि अगर विवेक अग्निहोत्री सही मायनों में देशभक्त हैं तो उन्हें अपनी फिल्म यू ट्यूब में डाल देना चाहिए. अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए जब विवेक अग्निहोत्री और उनकी पत्नी पल्लवी जोशी बैंकाक-पटाया गए तब उन्हें एक वीडियो में हंसते-मुस्कुराते देखकर लोगों ने लिखा-देश जल रहा है...और वो बैंकाक में हंस रहा है. राधेश्वर शर्मा नाम के एक यूजर ने लिखा है- बैंकाक की मौज तो जनेऊधारी ब्राम्हण के अलावा और कोई दूसरा ब्राम्हण ले ही नहीं सकता है. यदुवंश नाम के एक यूजर की टिप्पणी थीं-ये लोग भारत में आग लगाकर बैंकाक में मौज-मस्ती कर रहे हैं. इस बीच विवेक अग्निहोत्री का एक पुराना वीडियो वायरल हो गया है. इस वीडियो में वे साफ-साफ कहते हुए देखे जा रहे हैं कि बढ़िया बीफ कहां मिलता है. मैं तब भी इसे खाता था और अब भी खाता हूं. मेरी जिंदगी में तो कुछ भी नहीं बदला है. अब चिलमची भक्त परेशान हैं कि करें तो क्या करें ?

 

 

 

विशेष टिप्पणी

अंबेडकर जयंती पर मिला छत्तीसगढ़ के बच्चों को शानदार तोहफा

रायपुर. छत्तीसगढ़ में जगह-जगह स्थापित स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल अब हर बड़े महंगी फीस वाले स्वनामधारी प्राइवेट स्कूलों को टक्कर दे रहे हैं.इन स्कूलों में प्रवेश के लिए होड़ मच रही हैं. इधर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक अच्छा काम यह किया है कि पालकों की मांग पर स्कूल की कक्षाओं में विद्यार्थियों की क्षमता बढ़ा दी हैं.पहले किसी भी कक्षा में 40 बच्चों को प्रवेश मिलता था.अब 50 बच्चों को प्रवेश मिलेगा. वैसे तो आज सरकारी अवकाश था लेकिन छत्तीसगढ़ की सरकार ने अपने इस निर्णय को अंबेडकर जयंती यानी 14 अप्रैल के दिन ही लागू किया है. सार्वजनिक अवकाश होने के बावजूद आज यह आदेश जारी कर दिया गया है. बाबा साहेब अंबेडकर जीवन में शिक्षा और समानता को बहुत महत्वपूर्ण मानते थे. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की सरकार अगर शिक्षा पर जोर दे रही हैं तो यह अच्छी बात है. शिक्षा और ज्ञान के विस्तार से समाज का चहुंमुखी विकास होता है. जो नेतृत्वकर्ता अपने राज्य और देश के नौनिहालों के भविष्य की चिंता करता है उसका काम इतिहास में दर्ज होता है. राज्य के गरीब-आदिवासी और अन्य समाज के बच्चों के शैक्षणिक विकास के लिए छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार का यह काम प्रशंसनीय है. छत्तीसगढ़ में इसके पहले भाजपा की सरकार थीं.यह सरकार कभी नक्सलियों पर आरोप लगाकर स्कूल बंद कर देती थीं तो कभी संसाधनों का रोना रोकर. शायद इस सरकार की सोच में शामिल था कि अनपढ़-गंवार लोग अच्छे किस्म के भक्त और वोटबैंक होते हैं.

फिल्म

भूलन द मेज... अपनी शिकायत फाड़कर फेंकता हूं मैं

राजकुमार सोनी

संभावनाओं से भरे युवा फिल्मकार मनोज वर्मा की फिल्म भूलन द मेज अगर आपने नहीं देखी है तो पहली फुरसत में इसे देख लीजिए. यह फिल्म छत्तीसगढ़ में निर्मित होने वाली सुंदरानी और जैन मार्का फिल्मों से बेहद अलग और जानदार है. फिल्म में थोड़ी-बहुत खामियां भी है बावजूद इसके यह फिल्म अंत तक बांधकर रखती है और अपनी बात कहने में सफल रहती हैं.

यहां मैं बताना चाहूंगा कि मनोज वर्मा के फिल्मी कामकाज को लेकर मेरी धारणा अच्छी नहीं रही हैं. दरअसल उनकी पुरानी फिल्मों का नाम ही महूं दीवाना... तहूं दीवानी, मिस्टर टेटकूराम और लफाडू-फफाडू टाइप का रहा है तो मेरी क्या गलती है ? उन्हें लेकर जो कुछ भी फिल्मी प्रचार रहा है वह यहीं रहा है कि उनके भीतर  सतीश जैन का भूत सवार हैं और वे उनके नक्शे-कदम पर चलकर अपनी अच्छी-खासी सृजनात्मकता का गला घोंट रहे हैं.

लेकिन भूलन द मेज ने मेरी इस धारणा को ध्वस्त कर दिया है. कई बार धारणाओं का धवस्त हो जाना अच्छा भी होता है. 

मंगलवार को छत्तीसगढ़ के कला और संस्कृति प्रेमी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सौजन्य से मेरी धारणा टूट गई. वे भूलन द मेज देखने गए तो मीडिया के अन्य साथियों के साथ मेरा भी जाना हो गया. हालांकि निर्देशक मनोज वर्मा शायद जानते थे कि मैं उनकी पुरानी फिल्मों को लेकर अच्छी राय नहीं रखता हूं इसलिए उन्होंने मुझसे एक मर्तबा पूरी विनम्रता से कह भी रखा था कि आप भूलन द मेज को अवश्य देखिए...शायद आपकी शिकायत दूर हो जाए.

यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं है कि भूलन द मेज को देखकर मेरी धारणा चकनाचूर हो गई हैं. मेरी शिकायत दूर हो गई हैं. मैं अपनी शिकायत को अपने जेब में वापस रखता हूं.

जेब में भी क्यों ? शिकायत को सीधे-सीधे फाड़कर फेंकता हूं.

मनोज वर्मा ने अंचल के बेहतरीन लेखक संजीव बख्शी की लिखी हुई शानदार सी कहानी पर शानदार और जानदार फिल्म बनाई है. यहां कहानी का जिक्र करना ठीक नहीं होगा क्योंकि इस बारे में सोशल मीडिया व प्रचार के अन्य माध्यमों पर काफी कुछ लिखा जा चुका है. बस...इतना बताना चाहूंगा कि यह फिल्म हमारी प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था पर जबरदस्त चोट करती है. फिल्म को देखते हुए आप हंसते हैं. रोते हैं और मन ही मन अपने अराध्य या ईश्वर से यह प्रार्थना करने लग जाते हैं कि ' हे...ईश्वर...किसी भी भोले-भाले... सीधे-सादे इंसान को कोर्ट-कचहरी के दिन देखने के लिए मजबूर मत करना. हे परमपिता... परमेश्वर...आप जहां कहीं भी हो...आप यह सब देखो कि इस धरती के गांवों में...छोटे कस्बों में अपनी छोटी-छोटी खुशियों के साथ जीने वाले लोग भी रहते हैं. कौन हैं वे लोग जो उनकी खुशियों में खलल डालते हैं. कानून किसके लिए बनता है ? अगर बनता भी है तो उसकी शुद्धता को खत्म करने वाले लोग कौन हैं ? कानून थोपा क्यों जाता है ?

फिल्म का एक पात्र भकला और उसकी पत्नी प्रेमिन बाई अपने गांव के एक साथी को जेल से छुड़ाने के लिए शहर आते हैं. बाबुओं की वजह से काम नहीं बनता तो उन्हें फुटपाथ पर रात गुजारनी पड़ती हैं. दोनों आकाश की तरफ देखते हैं. आधा-अधूरा चांद तो नज़र आता है मगर तारा नहीं आता. दोनों के बीच संवाद में एक बात सामने आती हैं- शायद शहर में आने के बाद तारा नज़र नहीं आता है. यह संवाद भीतर तक हिला देता है. सच तो यह है कि शहर में इधर-उधर भटकते हुए लोग तो दिखते हैं लेकिन मददगार नज़र नहीं आते.फिल्म में जब गांव के सारे लोग जेल की सज़ा भुगतने को तैयार हो जाते हैं तो आंखें नम हो जाती हैं. अपने साथी को बचाने के लिए जब सारे गांव वाले जज को पैसा देने के लिए अपनी मेहनत की कमाई को एक गमछे में एक इकट्ठा करते हैं तो आंसू बह निकलते हैं. मैंने मुंबइया फिल्मों में कोर्ट के भीतर और बाहर गुंडे- माफियाओं के द्वारा गोली चलाने के सैकड़ों दृश्य देखें हैं, लेकिन कोर्ट के भीतर न्यायाधीश की कुर्सी के आसपास ग्रामीणों का सामूहिकता के साथ नाचना-गाना पहली बार देखा है. गाने के पहले एक बच्चा न्याय की मूर्ति की आंखों में बंधी हुई पट्टी उतारता है तो कई सवाल और जवाब खुद से टकराने लगते हैं. कोर्ट परिसर में गांव वालों के द्वारा भोजन पकाने और वहीं परिसर में ही ठहरकर जज का फैसला सुनने के लिए ग्रामीणों की बेचैनी को देखना आंखों को खारे पानी के समन्दर में बदल डालता है.

मनोज वर्मा ने फिल्म के एक-एक फ्रेम पर खूबसूरत काम किया है. फिल्म का एक-एक गीत और उसका संगीत जानदार है. बैकग्राउंड म्यूजिक देने वाले मोंटी शर्मा से भी उन्होंने ग्रामीण पृष्ठभूमि के मद्देनजर शानदार काम लिया है. नंदा जाही रे... जैसा गीत सैकड़ों बार सुना गया है, लेकिन मनोज और प्रवीण की आवाज में इसे फिल्म में सुनना अलग तरह के अनुभव से गुजरने के लिए बाध्य कर देता है.

वर्ष 2000 में जब से छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ है तब से अपसंस्कृति फैलाने वालों की बाढ़ आई हुई है. सतीश जैन की फिल्म मोर छइंया-भुइंया के संयोगवश हिट हो जाने के बाद से जिसे देखो वहीं डेविड धवन बनकर कचरा परोसने के खेल में लग गया था. हालांकि यह सिलसिला अभी भी थमा नहीं है. यह सब कुछ कब जाकर खत्म होगा और कहां जाकर खत्म होगा कहना मुश्किल है.

मनोज वर्मा अपनी इस फिल्म के जरिए धारा को मोड़ते हुए दिखते हैं. वे हमें यह आश्वस्त करते हैं कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है.वे सभी दर्शक जो सुंदरानी और जैन मार्का फिल्मों में कला-संस्कृति के नाम पर नकली पहनावा, नकली नाक-नक्श, नकली गांव-घर, नकली बोली-बानी और लोक धुनों में मिलावट को देख और सुनकर परेशान हो चुके हैं उन्हें असली मेला मंडई, स्थानीयता की रंगत, लोक के रंग, सुआ, नाचा गीत और शोक में बजने वाले बांस की धुन को शिद्दत से महसूस करने के लिए भूलन द मेज देख लेनी चाहिए. महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया को भारतीय सिनेमा की आत्मा कहा जाता है. भूलन द मेज भी हमारी उस आत्मा से मुलाकात करवाती है जिसे हमने बिसरा दिया है.

मनोज वर्मा को लेकर मेरी उम्मीद और अधिक  बढ़ गई हैं. मैं उनसे सिर्फ़ इतना ही कहना चाहता हूं कि छत्तीसगढ़ के गांव-देहात और जंगलों में सैकड़ों-हजारों कहानियां बिखरी हुई हैं. जरूरत है उन कहानियों में से कुछ चुनिंदा कहानियों को समेटने की. जब सत्यजीत रे यहां छत्तीसगढ़ आकर प्रेमचंद की कहानी पर सदगति जैसे फिल्म बना सकते हैं. जब राजकुमार राव की फिल्म न्यूटन की शूटिंग छत्तीसगढ़ में हो सकती हैं और आस्कर में जा सकती हैं तो फिर यहां के निर्माता निर्देशक चल हट कोनो देख लिही और हंस झन पगली फंस जाबे से ऊपर क्यों नहीं उठ सकते हैं ?

यह सही है कि व्यवसायिकता भी फिल्म का एक जरूरी पार्ट है, लेकिन क्या सिनेमा के इतिहास में किसी भी तरह का कोई रेखांकन सिर्फ पैसे और पैसों के दम पर ही किया जाना ठीक होगा ? या किया जा सकता है ?

स्मरण रहे कि आपकी अपनी मौलिकता ही आपको स्थापित करती है और पहचान दिलाती है. भूलन द मेज में काम करने वाले मास्टर जी यानि अशोक मिश्र को कौन नहीं जानता. उन्होंने भी एक से बढ़कर एक फिल्में लिखी है. वे स्थापित हैं और लोग उन्हें अलग तरह की लकीर खींचकर काम करने वाला लेखक मानते हैं. लोग अगर आज राजमौली की फिल्मों के दीवाने हैं तो उसके पीछे भी भेड़चाल नहीं है.

मनोज वर्मा को मैं निकट भविष्य में भेड़चाल से बचने की सलाह दूंगा. ( यह आवश्यक नहीं है कि मेरी सलाह मानी जाय )

एक बात और मनोज वर्मा चुस्त-दुरुस्त कहानी और पटकथा के बावजूद कुछ कलाकारों से ही बेहतर काम ले पाए है. पूरी फिल्म में ओंकार दास मानिकपुरी, अशोक मिश्र, राजेन्द्र गुप्ता, मुकेश तिवारी, आशीष शेंद्रे, भकला की पत्नी प्रेमिन बाई यानी अणिमा पगारे, कोटवार बने संजय महानंद, मुखिया की पत्नी गौंटनिन अनुराधा दुबे और सुरेश गोंडाले का अभिनय ही याद रह जाता है. फिल्म में कुछ कलाकार ऐसे भी हैं जिन्हें देखकर लगा कि मनोज वर्मा ने संबंधों के चलते उनके लिए गुंजाइश निकाली है. जब कोई काम बड़ा हो और लगे कि पूरी ताकत झोंकने से ही असर पैदा होगा तो गुंजाइश निकालने और गुंजाइश निकालने के लिए मजबूर कर देने वाले लोगों से बचा जाना चाहिए.

यार...उसको बुरा लग जाएगा... यार... वो क्या सोचेगा...यार उसको रख लेने से अपना काम बन जाएगा जैसी स्थिति फिल्म में ब्रेकर का काम करती है.

सच कह रहा हूं मैं

ह...हह...हव....हव

एकदम सच..... हव....हव....हहहहव