देश

ईसाई समाज ने दिया भूपेश को धन्यवाद

रायपुर. अभी हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ईसाई समाज को लाभांडी में क्रबिस्तान के लिए जगह आवंटित की है. ईसाई समाज की यह मांग काफी पुरानी थीं जिस पर भाजपा की सरकार कोई फैसला नहीं ले पाई थीं. ऐसा नहीं है कि प्रदेश में ईसाई समुदाय के अंतिम क्रिया-कलाप ( बरियल ) के लिए क्रबिस्तान नहीं है, लेकिन फिर भी इस समुदाय का नया कब्रिस्तान आवंटित नहीं हो पाया था. इस समुदाय को अपने अंतिम क्रिया-कलापों के लिए काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. पन्द्रह साल पुरानी सरकार में कई बार धर्म की रक्षा करने के नाम पर ईसाई समाज के लोगों को बरियल करने से भी रोका गया. यहां तक जमीन से ताबूत को उखाड़कर बाहर फेंकने की घटनाएं भी हुई. मुंगेली और बस्तर इलाके में ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी है. इधर सरकार की ओर से कब्रिस्तान के लिए जमीन आवंटित करने पर छत्तीसगढ़ क्रिश्यन फोरम के अनेक सदस्यों ने ग्रास मेमोरियल सेंटर में एक कार्यक्रम आयोजित कर कृतज्ञता जाहिर की है.

छत्तीसगढ़ क्रिश्यन फोरम के महासचिव रेव्ह अंकुश बरियेकर ने बताया कि बैठक में कब्रिस्तान के सुचारू ढंग से संचालन के लिए एक तदर्थ समिति बनाई गई है. इस समिति में आशीष गारडिया, पीके बाघ, सतीश गगराडे,किशोर सेनापति, तथा श्री   फ्रांसिस डेविड, जेम फ्रांसिस, अमनदास आनन्द एव अशोक कुमार  को शामिल किया गया है. जो कहा सो किया कार्यक्रम में सरकार के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के साथ-साथ छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम की सदस्यता समिति के गठन का प्रस्ताव भी पारित किया गया. बैठक में निर्णय लिया गया कि समस्त चर्चों की सूची सात अक्टूबर तक अनिवार्य रुप से फोरम के पास जमा हो जाय.

 

  

 

 

 

विशेष टिप्पणी

याद रखिए संपादक जी... क्रांतिकारी कभी बूढ़ा नहीं होता है.... और हां...कभी मरता भी नहीं है.

राजकुमार सोनी

प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और दमन के खिलाफ अनेक जनआंदोलन की अगुवाई करने वाले लाखन सिंह भले ही एक काया के तौर पर इस दुनिया का हिस्सा नहीं है, लेकिन उनकी मौजूदगी हर समय विद्यमान रहने वाली है. कभी वे बिलासपुर के नेहरू चौक में नजर आएंगे तो कभी रायपुर के बूढ़ातालाब के पास... तो कभी बस्तर में आदिवासियों के साथ.निजी तौर पर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि वे इस दुनिया से कूच कर गए हैं. इस देश के तमाम चड्डीधारी लाख कोशिश कर लें, लेकिन न तो वे इतिहास को फांसी पर लटका पाएंगे और न ही उनकी दिली ख्वाहिश से विचारधारा की मौत होने वाली है. दोस्तों... क्रांतिकारियों की मौत कभी नहीं होती. क्रांतिकारी कभी नहीं मरते.

लाखन सिंह...जिन्हें हम सब लाखन भाई कहते थे, उनसे मेरा पहला परिचय कब और किस दिन हुआ यह बताना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन मुझे याद है कि जब तहलका में था तब मैंने एक खबर के सिलसिले में वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल से नंबर लेकर उन्हें फोन किया था. एक खबर के लिए महज एक छोटी सी जानकारी हासिल करने का मामला धीरे-धीरे एक दूसरे तरह के रिश्ते में बदल गया. वे एक पत्रकार की पसन्द बन गए. ( हालांकि वे जनसरोकार से जुड़ी खबरों पर काम करने वाले हर पत्रकार की पहली पसंद थे. ) मुझे किसी भी खबर में कुछ पूछना होता तो उन्हें आवश्यक रुप से याद करता था. सामान्य तौर पर अखबार में काम करने वाले संवाददाताओं को मालिक और उनके द्वारा नियुक्त किए गए चिरकुट संपादक समय-समय पर हिदायत देते रहते हैं- देखिए ज्यादा... रिश्ते मत बनाइए... प्रोफेशनल रहिए... अखबार को जितनी जरूरत है उतनी बात करिए... लेकिन मैं मालिक और चड्डीधारी संपादक की परवाह किए बगैर उनसे बात करता था और लगातार बात करता था.

कथित मुख्यधारा की पत्रकारिता के अंतिम दिनों में संघ की विचारधारा को बीज-खाद और पानी देकर पोषित करने वाले जिस अखबार में फंसा हुआ था वहां एक स्थानीय संपादक को लाखन भाई से खास तरह की चिढ़ थीं. जब भी लाखन भाई का नाम खबर में लेता वे सीधे-सीधे कहते- यार... किस काम का यह वर्शन. अखबार को दो पैसे का फायदा मिले...यह देख-समझकर काम करना चाहिए. इस बूढ़े क्रांतिकारी का पक्ष छापकर क्या मिलेगा. मेरा जवाब होता- बेशक आप उनका पक्ष हटा सकते हैं, लेकिन संपादक जी आपको यह तो पता होना चाहिए कि एक क्रांतिकारी कभी बूढ़ा नहीं होता. आप इस क्रांतिकारी को ठीक से जानते नहीं है. क्या आप एक बार भी पूरे दिन तेज गरमी में तख्ती लेकर किसी चौक में खड़े हो सकते हैं? संपादक कहते- मैं क्यों खड़ा रहूंगा. यह मेरा काम नहीं है. मैं उनसे पूछता- एक अखबार में जनसरोकार से जुड़ी खबरों को पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए... इस सिद्धांत तो आप जानते ही होंगे. अखबार में काम करने वाले संपादक और उसके रिपोर्टर को किसके पक्ष में खड़े रहना है इसकी सामान्य जानकारी भी आपके पास होगी ही, लेकिन क्या आप ऐसा कर पा रहे हैं ? बस... संपादक जी का आखिर वाक्य होता- यार... मुझसे बहस मत करो.

बावजूद इसके लड़-भिंडकर मैं लाखन भाई ( उनके विचारों के लिए ) गुंजाइश निकालता रहा. डाक्टर रमन सिंह के शासनकाल में जब बस्तर एक बड़े हिस्से में निर्दोष आदिवासियों पर अत्याचार बढ़ा तब लाखन भाई शालिनी गेरा, प्रियंका शुक्ला सहित बस्तर की आदिवासी बच्चियों के साथ अक्सर रायपुर आते थे. कभी वे प्रेस कांफ्रेन्स करते तो कभी सीधे मुझसे मिलने अखबार के दफ्तर चले आते. उन्हें देखते ही विचार और कद से ठिगनु स्थानीय संपादक का पारा चढ़ जाता. वे फूं-फां- फूं-फा करने लगते. नाक-भौ सिकुड़ने लगते. ( अब संघ के दफ्तर में तब्दील हो चुके अखबार के दफ्तर में कोई क्रांतिकारी पहुंच जाएगा तो फूं-फां झूं-झा का होना स्वाभाविक ही था. )

धीरे-धीरे लाखन भाई छपना बंद हो गए. मुझे  राजनीति/ प्रशासन/ आदिवासी इलाकों की बीट को देखने से रोक दिया गया. मैं सांस्कृतिक खबरों को कव्हरेज करने लगा था. एक रोज लाखन भाई ने मुझे बताया कि मैं जिस अखबार के लिए काम करता हूं उसके बिलासपुर संस्करण ने भी आंदोलन की खबरों को छापना बंद कर दिया है. मैंने लाखन भाई को बताया वहां का संपादक भी मोदी का परम भक्त है. बात-बात में लघुत्तम-सर्वोत्तम, घटोत्तम-चट्टोत्तम और अतिउत्तम करते रहता है. चिंता करने की कोई बात इसलिए नहीं है क्योंकि ढंग से पढ़ने-लिखने वाला कोई भी शख्स उसे गंभीरता से नहीं लेता है. आप भी मत लीजिए. केवल फिल्मों मेंं ही नहीं पत्रकारिता मेंं भी बहुत से लोग उदय चोपड़ा होते हैं.

ऐसा क्या ? बोलकर लाखन भाई मेरी बात से सहमत हो गए और फिर धीरे से  सीजी बास्केट को लांच करने की योजना बनी. खबरों की इस बास्केट को लांच करने का एक मकसद ही यहीं था कि भाजपा के शासनकाल में जनआंदोलन से जुड़ी खबरों को बुरी तरह से दबाया जा रहा था. अब मेरे द्वारा जो कुछ भी लिखा जाता उसे वे सीजी बास्केट में अवश्य छापते. जब तबादले में कोयम्बटूर भेजा गया तब भी वक्त निकालकर मैं उनके सीजी बास्केट के लिए खबरें लिखता रहा. मेरी खबरों में वे मेरा नाम लिखते थे- विक्रम वरदराजन. विधानसभा चुनाव के रिजल्ट से कुछ पहले मैंने उन्हें खबर भेजी कि भाजपा 15 से 20 सीटों पर सिमट जाएंगी. उन्होंने फोन किया और कारण जानना चाहा. मैंने भी हंसते हुए कहा-क्या लाखन भाई... आज तक विक्रम वरदराजन की कोई रिपोर्ट झूठी निकली है क्या ?

उनसे साथ अपने रिश्तों के सैकड़ों किस्से याद आ रहे हैं. अभी लगभग दो-तीन महीने पहले मैं उनके और जीएसएस के सुबोध भाई के साथ छत्तीसगढ़ी फिल्मों के सामने चुनौतियां विषय पर आयोजित की गई एक गोष्ठी का हिस्सा था. इस गोष्ठी में गरमा-गरम बहस के कुछ दिनों बाद ही वे ही सुबोध जी के साथ मेरे निवास आए. उनके साथ अनुज भी था. हम सब पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म का निर्माण करने वाले मनुनायक जी को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जी से मिलने गए थे. मुख्यमंत्री बघेल एक घरेलू टी-शर्ट पहनकर बैठे थे. उसी टी-शर्ट में उन्होंने फोटो भी खिंचवा ली. उनका ठेठ छत्तीसगढ़ियां अंदाज देखकर वे बहुत खुश हुए और जब लौटे तो आग्रह किया कि कुछ ठेठ अदांज में सीजी बास्केट के लिए मनु नायक जी का एक इंटरव्यूह कर लूं. मैं उनके आदेश और आग्रह को ठुकराने की स्थिति में कभी नहीं रहा. मैंने यह इंटरव्यूह किया. 

बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें देखकर आप खुश हो पाते हैं. जब भी कोई आयोजन हो... आंदोलन हो... लाखन भाई को देखते ही खुश हो जाता था. पतली-दुबली काया... पैरों में मामूली सी चप्पल, सफेद बाल और जानलेवा दमे के बावजूद  हंसता हुआ उनका चेहरा रह-रहकर याद आ रहा है. इस चेहरे के साथ आलोक शुक्ला, प्रियंका, अनुज, रोशनी, ईशा खंडेलवाल, शालिनी गेरा, लता, श्रेया, निकिता सहित उन्हें चाहने वाले हजारों-हजार नौजवानों का साथ भी याद आ रहा है. मुझे नहीं लगता कि उन्हें चाहने वाले उन्हें यूं ही कभी खारिज होने देंगे. नौजवान साथी उन्हें सबसे ज्यादा पसंद करते थे. रात हो बिरात हो... चाय पीनी हो, काफी पीनी हो... कोई बात हो... लाखन भाई... लाखन भाई... लाखन भाई... बस लाखन भाई... । याद रखिए संपादक जी... जो क्रांतिकारी बच्चों और नौजवानों के बीच मौजूद होता है वह कभी बूढ़ा नहीं होता है.... और हां... कभी मरता भी नहीं है. आपके अखबार में जगह नहीं देने से क्या घंटा होता ?

 

 

फिल्म

रंगोबती को देखते हुए कुमार गौरव और उनकी फ्लाप फिल्मों की याद हो जाती है ताजा

राजकुमार सोनी

एक निर्माता है अशोक तिवारी. सुना है कि उन्होंने तीन फिल्में बना ली है. पहली फिल्म का तो पता नहीं, लेकिन दूसरी फिल्म रंगरसिया के बारे में यह खबर अवश्य मिली थीं कि उसने बाक्स आफीस पर थोड़ा-बहुत धमाल मचाया था.अब आई है उनकी तीसरी फिल्म-रंगोबती.

रंगोबती ओ रंगोबती... यह ओड़िशा के संबलपुर इलाके के लोक गायक  हरिपाल का बेहद प्रसिद्ध गाना है. यह गाना आज भी इतना ज्यादा पापुलर है कि झुग्गी बस्तियों में होने वाली शादी-ब्याह में अक्सर सुनने को मिल जाता हैं. अब तो इस गाने को पूरे तामझाम के साथ नामचीन कलाकार भी गाते हैं. ( रामसंपत के निर्देशन में इस गाने को सोना महापात्रा की आवाज में यू ट्यूब में सुन सकते हैं. ) ...

...तो फिल्म में इस गाने के नाम ( रंगोबती ) की लोकप्रियता को भुनाने की असफल कोशिश की गई है. लोकगायक हरिपाल की गाने की जो नायिका है वह लाजे.. मोहे लाजे.. लाजे... कहकर शर्माती है. मगर फिल्म वाली रंगोबती... लात-घूंसा चलाती है.

फिल्म के निर्देशक पुष्पेंद्र सिंह रंगमंच से जुड़े हुए एक जानदार अभिनेता है. रंगमंच के अलावा छत्तीसगढ़ की फिल्मों में उनका अभिनय सर चढ़कर बोलता है, मगर एक बासी कहानी और थके हुए कलाकारों के साथ बनाई गई यह फिल्म उनके काम पर सवाल खड़ा करती है. सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या एक अच्छे अभिनेता को सड़ियल और मरियल सी कहानी पर अभिनय के नाम पर खानापूर्ति करने वाले कलाकारों के साथ फिल्म बनाने के बारे में विचार करना चाहिए था ? फिल्म को देखते हुए आपको कमाल हसन की चाची 420, गोविंदा की आंटी नंबर वन और हिंदी की वे सब फिल्में याद आ जाती है जिनमें हीरो ने महिला किरदार निभाया है. अगर यह फिल्म हिंदी की कुछ बेहतरीन फिल्मों का ठीक-ठाक मिश्रण होती तो भी कोई बात बन सकती थीं, लेकिन फिल्म  का हर फ्रेम जाना-पहचाना और बासी है जिसकी वजह से उब होने लगती है. (  मैं इस फिल्म को इंटरवेल के बाद छोड़कर चला गया. )

कल रविवार को जब मैं यह फिल्म देखने गया तब बालकनी में थोड़े-बहुत दर्शक थे. नीचे की अधिकांश सीटें खाली थी. जैसे-तैसे केवल इंटरवेल तक झेल पाया. हाल के बाहर निकला तो निर्देशक पुष्पेंद्र मिल गए. मैंने उन्हें भी बताया कि झेलना थोड़ा कठिन हो रहा है. ( वे मुस्कुराते रहे और फिर उन्होंने कहा- अगर फिल्म खराब है तो खराब लिखिएगा...मैं सुधार करूंगा ताकि अगली बार दर्शकों को निराशा का सामना न करना पड़े. मैं उनकी साफगोई का कायल हूं और इस साफगोई के लिए उन्हें बधाई देता हूं. छत्तीसगढ़ में फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशकों, कलाकारों को केवल चमचागिरी पसन्द है, लेकिन पुष्पेंद्र इससे अलग है. वे अपनी आलोचना को भी सीखने का उपक्रम मानते हैं. )

 

फिल्म में इंटरवेल के बाद की क्या कहानी है इसकी जानकारी मेरे पास उपलब्ध नहीं है. ( फिल्म में इंटरवेल के पहले की भी जो कहानी है वह भी ऐसी नहीं है कि उसे स्मृति का हिस्सा बनाकर रखा जाए. )

फिल्म में कुमार गौरव और उनकी फ्लाप फिल्मों की याद दिलाने वाला एक अभिनेता अनुज है जो शहर से गांव आता है. गांव में वह अपनी पुरानी प्रेमिका जो एक अमीर आदमी ( प्रदीप शर्मा ) की बेटी हैं से मिलता है. दोनों के प्रेम में बाधा उत्पन्न होती है तो कुमार गौरव मतलब अनुज शर्मा लड़की का भेष धारण कर अमीर आदमी के घर भोजन पकाने का काम करने लगता है. रंगोबती पर अमीर आदमी का दिल आ जाता है और उसके मुनीम का भी. फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए एक बंगाली और एक ओड़िशा की महिला पात्र के साथ तीन पुरूष किरदार और है. फिल्म की मरी और लचर कहानी को ये पांच पात्र अपने अभिनय से खींचने का प्रयास करते हैं. हालांकि फिल्म में उनके हास्य प्रधान दृश्यों का कहानी से कोई सीधा रिश्ता नहीं बनता, लेकिन यह भी सच है कि अगर ये पांच पात्र नहीं होते तो मैं पंद्रह मिनट के बाद हॉल छोड़कर चला जाता.

फिल्म में अनुज शर्मा का अभिनय बेहद कमजोर है. महिला के किरदार को जीने के लिए जो मेहनत करनी चाहिए थीं वह  दिखाई नहीं देती. यहां तक आवाज पर भी काम नहीं किया गया. फिल्म के सारे पात्र इंटरवेल तक चीख-चीखकर और खींच-खींचकर संवाद बोलते हैं. अभिनय के नाम पर प्रदीप शर्मा जैसे अभिनेता इन दिनों केवल अपने मुंह को आड़ा-तेड़ा कर रहे हैं. उनकी आड़ी-तेड़ी भाव भंगिमाओं को देखने से बेहतर है कि आप बगल में बैठे हुए दर्शक को देखिए कि वह अंधेरे में क्या कर रहा है. ( दुर्भाग्य से कल कोई आजू-बाजू में भी नहीं था. ) मुनीम बने निशांत उपाध्याय के बारे में यह विख्यात है कि वह छत्तीसगढ़ी फिल्मों का सबसे बेहतरीन कोरियोग्राफर है. लेकिन रंगोबती में न तो ठीक-ठाक कोरियाग्राफी दिखाई दी और न ही मुनीम के रुप में उनका अभिनय. फिल्म की अभिनेत्री को न तो ढंग से हंसने का मौका मिला और न ही ढंग से रोने का.

( नोट- फिल्म पर यह राय केवल इंटरवेल तक है. हो सकता है इंटरवेल के बाद फिल्म अच्छी हो और दर्शकों के लायक हो,लेकिन मेरे लिए यह फिल्म किसी लायक नहीं है. कल इस फिल्म को देखकर मैंने अपना वक्त बरबाद किया. आज लिखकर कर रहा हूं. मुझसे गलती हुई... मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. )