देश

किस हालात में हैं आदिवासी... तीन दिवसीय गोष्ठी में होगा मंथन

रायपुर. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 28 से 30 अक्टूबर तक आदिवासी समाज की दशा और दिशा पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है. राजभाषा आयोग और “गोंडवाना स्वदेश” नाम की एक मासिक पत्रिका के बैनर तले इस विचार गोष्ठी का आयोजन शहीद स्मारक भवन में होगा.कार्यक्रम के मुख्य संयोजक रमेश ठाकुर ने बताया कि इस तरह की संगोष्ठी वर्ष 2019 में भी आयोजित की गई थीं. तब देश भर से बुद्धिजीवियों ने आदिवासी समाज के विभिन्न पहलुओं जैसे: सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, कला, साहित्य और उनकी चुनौतियों पर मंथन किया था.

गोल्डी एम.जार्ज ने बताया कि इस गोष्ठी से आदिवासियों के समस्त अधिकारों व उसके क्रियान्वयन पर सकारात्मक प्रभाव पडे़गा साथ ही सांस्कृतिक विविधता के बाद एकजुटता भी कायम होगी. संगोष्ठी के संयोजक डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि संगोष्ठी में देश भर के बुद्धिजीवियों के अलावा समुदाय के मुखिया भाग लेंगे. गोष्ठी में देश मूल निवासी समाज की समस्याओं को लेकर मंथन किया जाएगा. कार्यक्रम में शिक्षाविद, शोधार्थी, नामी लेखक, पत्रकार, नीति-निर्माता,बुद्दिजीवी तथा सामाजिक कार्यकर्ता आदि बड़ी संख्या में जुटेंगे. कार्यक्रम के प्रमुख अतिथियों में प्रो .वर्जिनियस खाखा (पूर्व अध्यक्ष, खाखा कमेटी नयी दिल्ली),सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका ,झारखंड से कुलपति प्रो.सोनाझारिया मिंज.,प्रो सूर्या बाली (फैमिली मेडिसिन, एम्स ,भोपाल ),प्रो.बिपिन जोजो (डीन स्कूल आफ सोसल वर्क),प्रणव डैले,सदस्य संयुक्त राष्ट्र आदिवासी मंच,जेरोम जेराल्ड कुजूर,मानव अधिकार कार्यकर्ता झारखंड, गोपीनाथ मांझी ,उडी़सा के जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता,मुकेश बरुआ,मानव अधिकार कार्यकर्ता, हेमंत दलपति (डिपार्टमेंट ऑफ टीचर एजुकेशन, उडी़सा),एड्वोकेट रजनी सोरेन, सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया, डॉ जितेन्द्र प्रेमी,सुश्री दयामणि बारला,प्नो.निस्तार कुजूर,प्रो. एल.एस.निगम ,कुलपति शंकराचार्य यूनिवर्सिटी और छत्तीसगढ़ के  आदिवासी क्षेत्र की जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी शामिल है. आदिवासी समाज की दशा और दिशा पर कई शोध पत्र भी पढ़े जाएंगे. कार्यकम के संरक्षक मंडल में डॉ. गोल्डी एम. जॉर्ज, डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’, डॉ. निस्तर कुजूर, डॉ. जयलक्ष्मी ठाकुर, डॉ. उदयभान सिंह चौहान हैं. संगोष्ठी के सह संयोजक डॉ. रामचंद साहू,  आयोजन समिति में डॉ. अनीश कुमार, अश्विनी कांगे, मोहित राम चेलक, पूनम साहू, अंजलि यादव, गणेश कुमार कोशले, अंकिता अंधारे,दीपिका यादव, अग्निश, पंचशील श्यामकर, बृजेश प्रसाद, रजनीश कुमार अम्बेडकर, डॉ. ललित कुमार, विवेक सकपाल को शामिल किया गया है. यह जानकारी संगोष्ठी की मीडिया प्रभारी पूनम साहू ने दी है.

                     

 

 

विशेष टिप्पणी

चालबाज मोदी पर यकीन नहीं किसानों को

उलटा पड़ता दिख रहा है बिल वापसी का दांव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब तीन कृषि बिल वापसी की बात सोची होगी, तो कल्पना की होगी कि वे जैसे ही टीवी पर आकर बिल वापसी का ऐलान और किसानों से वापस लौट जाने की अपील करेंगे किसान उनकी जय-जयकार करते हुए वापस लौटने लगेंगे। आनन-फानन में दिल्ली के चारों तरफ की सड़कें खाली हो जाएंगी। उनका गुणगान होगा वगैरह-वगैरह...। मगर जो कल्पना की थी, वैसा कुछ नहीं हुआ बल्कि उल्टा हुआ जिसके बारे में सोचा तक नहीं था। जब किसानों से पूछा गया कि अब तो खुश हैं, वापस जाएंगे या नहीं, तो किसानों ने प्रधानमंत्री मोदी पर अविश्वास जताते हुए कहा कि उनकी टीवी पर कही बातों पर हम यकीन नहीं करते। बताइये पंद्रह लाख रुपये मिले किसीको? धन्यवाद देना और जयकारे लगाना तो दूर किसानों ने उन्हें ही झूठा और वादाफरामोश साबित कर दिया। तीनों कृषि बिल वापसी के ऐलान के बाद भी किसानों का आंदोलन में डटे रहना मोदी की साख के लिए इतना ज्यादा घातक है कि सोचा भी नहीं जा सकता। लोग सवाल उठाएंगे कि अब तो कृषि बिल वापसी का ऐलान हो गया, अब किसान वापस क्यों नहीं जा रहे। जवाब मिलेगा कि इन्हें प्रधानमंत्री की ज़ुबान पर भरोसा नहीं है, जब तक संसद में बिल वापस नहीं हो जाता तब तक हम नहीं हिलेंगे। यानी किसानों को डर है कि ये शख्स बिल वापसी का ऐलान करके हमें घर भेज सकता है, हमारा आंदोलन खत्म करा सकता है और फिर बिल वापस भी नहीं लेगा। प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता पर इससे बड़ा सवाल कोई हो ही नहीं सकता कि वे खुद आए, खुद ऐलान किया, तब भी किसान कह रहे हैं कि नहीं पहले संसद में वापस लो, तुम्हारा क्या भरोसा। और उनके पास दलील यह है कि पहले के वादे कौनसे पूरे हुए? भाजपा और संघ के लिए यह चिंता का सबसे बड़ा विषय होना चाहिए कि उनके सबसे बड़े पोस्टर बॉय की इमेज पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। उसे जनता फरेबी और झूठा समझने लगी है। उसकी किसी बात पर किसी को भी विश्वास नहीं है। तो सबसे पहली बात यह कि बिल वापसी के ऐलान का वैसा स्वागत नहीं हुआ जैसे स्वागत की अपेक्षा थी। देश की जनता यही अनुमान लगा रही है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में हार का खतरा टालने के लिए यह दांव चला गया है। दूसरा सवाल यह कि क्या बिल वापसी के ऐलान के बाद यूपी, पंजाब, उत्तराखंड और हरियाणा में भाजपा नेताओं का विरोध कम हो जाएगा? फिलहाल कई जगहों पर भाजपा नेताओं की हालत अछूत की सी है। उन्हें शादियों तक में नहीं बुलाया जा रहा। कोई भी समारोह हो, विरोध करने किसान पहुंच जाते हैं। लखीमपुर में और क्या हुआ था? कृषि बिल वापसी के बाद क्या भाजपा के नेता जनता के बीच जा पाएंगे? इसका जवाब आने वाले कुछ दिनों में हमें मिलने वाला है। बिल वापसी का दांव उल्टा इसलिए भी पड़ा क्योंकि किसानों की मांग केवल बिल वापसी ही नहीं थी। अगर घोषणा करने आए थे तो कहना था कि सभी मांगे मान रहे हैं। एमएसपी वाली मांग, बिजली अधिनियम में बदलाव की मांग समेत सभी मांगे मानते हुए उन्हें यह ऐलान भी करना था कि किसानों पर लगाए गए सभी केस वापस लिये जाएंगे। उन्होंने होमवर्क नहीं किया। किसानों के मन को नहीं समझा। कम से कम इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले किसानों को भरोसे में लेते, चर्चा करते। मगर वो सब तो जैसे आता ही नहीं है। किसान जानते हैं कि इतना बड़ा और ऐसा एतिहासिक आंदोलन बार बार खड़ा नहीं होता। सरकार एक बार झुकी है तो सारी मांगे मनवानी ही होंगी। इस समय सरकार को जितना दबाया जा सकता है, उतना और कभी नहीं। इस दांव को इसलिए भी हम उल्टा पड़ना कह सकते हैं क्योंकि वो कैडर नाराज है, जो मोदी को भगवान से भी दो उंगल ऊपर समझता है। उस मासूम कैडर को यही समझाया गया था कि ये किसान नहीं गुंडे हैं और उसकी तकलीफ है कि आप गुंडों के समक्ष क्यों झुके? वो निराशा में बागी हो रहा है और उसे संभालना मुश्किल पड़ रहा है। मोदी के पिछले तमाम फैसलों की तरह यह फैसला भी ब्लंडर ही है। फायदा कम और नुकसान ज्यादा। ना किसान खुश, ना कैडर। किसान झूठा कह रहा है और कैडर कायर। छवि धूमिल हुई सो अलग। फर्क यह है कि अब तक उनके गलत निर्णयों से देश को नुकसान होता रहा है। यह पहली बार है जब सीधे भाजपा और खुद उन्हें नुकसान हो रहा है।

फिल्म

मनु भंडारी की रजनीगंधा

पहले रजनीगंधा फिल्म देखी थी, बाद में बीए हिंदी के पाठ्यक्रम में यही सच है नाम की कहानी पढ़ी. मेरे लिए दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व है.खुले आसमान के नीचे बहती हवा सी हैं ये दोनों कृतियां. निःसंदेह इसके पीछे कहीं मन्नू भंडारी हैं.सत्तर के दशक में जब सिनेमा पर एंग्री यंग मैन का राज था, एक ऐसी फिल्म देखना जो पूरी कहानी को एक स्त्री की निगाह से कहती है, जिसे आज हम कहते द गेज़ ऑफ अ वुमन बिल्कुल अलग अनुभव रहा होगा. सिर्फ इतना ही नहीं उस स्त्री के चित्रण में जो ईमानदारी है, वह तो आज भी दुर्लभ है. उसकी दुविधा, उसका भय और उस स्त्री का अनुराग... सब कुछ कितना तटस्थ और सहज है फिल्म में.

नायिका दीपा (विद्या सिन्हा) के अवचेतन में छुपे एक डर से यह फिल्म आरंभ होती है, एक स्वप्न से... अकेले रह जाने, कहीं छूट जाने का भय. कहानी में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है. मगर जब फिल्म स्वप्न से शुरू होती है तो दर्शक की यात्रा भी भीतर से बाहर की ओर होती है.नायिका की निगाह अहम हो जाती है.उसी निगाह से हम उसके जीवन में आए पुरुषों को भी देखते हैं. हिंदी सिनेमा की बहुत बोल्ड या रैडिकल फेमिनिस्ट फिल्मों में भी स्त्री को इतना सहज और स्पष्ट नहीं दिखाया गया है.संगम जैसी फिल्म में दो नायक यह तय करना चाहते हैं कि नायिका किससे प्रेम करे, रजनीगंधा में यह फैसला नायिका पर छोड़ दिया गया है.उसके सामने दोनों ही राहें खुली हुई हैं. अभी उसके जीवन में शामिल संजय (अमोल पालेकर) लापरवाह है. उसकी छोटी-छोटी चीजों की परवाह वैसे नहीं करता जैसे कि कभी नवीन (दिनेश ठाकुर) करता था. जब कलकत्ता जाने पर दीपा की दोबारा नवीन (मूल कथा में यह नाम निशीथ है) से मुलाकात होती है तो पुरानी स्मृतियां उसे घेरने लगती हैं. इस दौरान बड़े खूबसूरत से प्रसंग हैं. खास तौर पर यह गीत दोबारा मिलने के इस प्रसंग को विस्तार देता है- कई बार यूँ ही देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है. दिनेश ठाकुर इस रोल में खूब जंचे हैं. लंबे बाल, आंखों में काला चश्मा, होठों में दबी सिगरेट.एक छोटे से फासले के बीच तैरती विद्या सिन्हा की निगाहें बहुत कुछ कह जाती हैं. हर बार उनके देखने में कुछ ऐसा है जैसे कि वह पुराने नीशीथ को तलाश रही हों.

यही सच है में दो शहरों का बार-बार जिक्र आता है, जैसे वह नायिका के बंटे हए मन को परिभाषित कर रहा हो, तो वहीं बासु चटर्जी ने रजनीगंधा में समय, शारीरिक दूरियों और शहर के बीच दूरियों के फासलों से कविता रच दी है. कहानी में मन्नू कलकत्ता में निशीथ से मुलाकातों के प्रसंग को कुछ इस तरह लिखती हैं, विचित्र स्थिति मेरी हो रही थी. उसके इस अपनत्व-भरे व्यवहार को मैं स्वीकार भी नहीं कर पाती थी, नकार भी नहीं पाती थी. सारा दिन मैं उसके साथ घूमती रही; पर काम की बात के अतिरिक्त उसने एक भी बात नहीं की. मैंने कई बार चाहा कि संजय की बात बता दूं, पर बता नहीं सकी. दीपा के मन में सचमुच यह दुविधा है कि वह किसे प्रेम करती है? उसको अपने जीवन में किसे चुनना चाहिए? मन्नू लिखती हैं- ढलते सूरज की धूप निशीथ के बाएं गाल पर पड़ रही थी और सामने बैठा निशीथ इतने दिन बाद एक बार फिर मुझे बड़ा प्यारा-सा लगा. कलकत्ता से वापसी का कहानी में कुछ इस तरह जिक्र है, गाड़ी के गति पकड़ते ही वह हाथ को ज़रा-सा दबाकर छोड़ देता है। मेरी छलछलाई आंखें मुंद जाती हैं. मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, बाक़ी सब झूठ है; अपने को भूलने का, भरमाने का, छलने का असफल प्रयास है. दीपा कलकत्ता से जब कानपुर लौटती है तो अकेली नहीं, अपने साथ थोड़ा सा कलकत्ता भी साथ लेकर आती है. दुविधा, दो फांक में बंटा हुआ मन. संजय से मुलाकात नहीं होती है क्योंकि वह कहीं बाहर गया हुआ है. एक दिन तार आता है कि उसकी नियुक्ति कलकत्ता में हो गई. निशीथ का एक छोटा सा खत भी आता है. लेकिन जब संजय लौटता है तो... मन्नू ने इसे बयान किया है- बस, मेरी बांहों की जकड़ कसती जाती है, कसती जाती है.रजनीगंधा की महक धीरे-धीरे मेरे तन-मन पर छा जाती है. तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती हूँ, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था...

फिल्म देखते वक्त शब्दों की यही अनुभूति एक गुनगुनाती हुई धुन में बदल जाती है. रजनीगंधा फूल तुम्हारे, महके यूँ ही जीवन में...यूँ ही महके प्रीत पिया की, मेरे अनुरागी मन में. सत्तर के दशक में विद्या सिन्हा ने जिस तरह का किरदार निभाया था, वह अपने-आप में अनूठा था.एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर स्त्री. उसके परिचय के लिए किसी पुरुष की दरकार नहीं थी. न हम उसके घर-परिवार के बारे में जानते हैं, न कोई अन्य रिश्ता. बस, वह शहर में एक किराए के मकान में रहती है. उसमें अपने करियर और जीवन के प्रति एक आश्वस्ति है. उसके अपने भय हैं, अपनी दुविधाएं हैं, उसका अपना अधूरापन है.वह परफेक्ट होने के बोझ से नहीं दबी है. फिल्म देखते समय, जीवन में आए दो पुरुषों के बीच आवाजाही करते उसके मन के प्रति हम जजमेंटल नहीं होते. उसे तो खुद नहीं पता है कि कौन सही है कौन गलत? मन्नू ने उसके मन पर नैतिकता का कोई बोझ नहीं रखा है. अंततः उसको ही अपना पुरुष चुनना है. मन्नू भंडारी ने इस कहानी के माध्यम से जो स्त्री रची है, वह इतनी ज्यादा सच है, इतनी साधारण है कि असाधारण बन गई है. राजेंद्र यादव ने स्त्री विमर्श में देह से मुक्ति की खूब बातें कीं, मगर कितनी रचनाओं में मन से मुक्त ऐसी स्त्रियां दिखती हैं? वापस फिल्म की तरफ लौटता हूँ तो योगेश का लिखा वह गीत याद आ जाता है, जो यही सच है कहानी की खुशबू को हम तक किसी हवा के झोंके की तरह पहुँचा जाता है. कई बार यूँ भी देखा है ये जो मन की सीमा रेखा है मन तोड़ने लगता है अनजानी प्यास के पीछे अनजानी आस के पीछे मन दौड़ने लगता है.

दिनेश श्रीनेत का लेख