देश

आखिर...मोदी की किसी भी बात पर यकीन क्यों नहीं होता ?

मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री है जिनकी हर बात को शंका-आशंका के तराजू के पर तौला जाता है. देश का पढ़ा-लिखा और समझदार वर्ग उनकी किसी भी बात पर यकीन नहीं करता है. ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि वे जो कुछ भी करते हैं उसके पीछे इवेंट काम करता है. जब वे दाढ़ी बढ़ाते हैं तो लोग-बाग तुरन्त समझ जाते हैं कि रवींद्रनाथ टेगौर के लुक का क्या अर्थ है और इस लुक का वे क्या उपयोग करने वाले हैं. इधर पंजाब के एक पुल में लगभग 20 मिनट तक जाम में फंसे रहने के बाद कई तरह के मीम बनाए जा रहे हैं. पंजाब सहित देश का मीडिया उस अफसर को खोज रहा है जिसके सामने मोदी ने कहा था- अपने सीएम को कहना कि जिंदा बचकर जा लौट रहा हूं. बहरहाल सोशल मीडिया तरह-तरह की बातों से अट गया है. यहां हम अपने पाठकों के लिए कुछ महत्वपूर्ण पोस्ट का प्रकाशन कर रहे हैं.

प्रख्यात पत्रकार रवीश कुमार ने लिखा है- क्या आपको याद है जब 2017 के गुजरात चुनाव में प्रधानमंत्री अपनी सुरक्षा दांव पर लगाकर सी-प्लेन से उड़े थे? जबकि SPG की गाइडलाइन है कि जिन्हें यह सुरक्षा मिलती है वे सिंगल इंजन वाले विमान में नहीं उड़ सकते हैं.लेकिन तब वोटर में थ्रिल पैदा करना था. समर्थकों में इस स्टंट से जोश पैदा करना था. उस घटना को आप भूल गए होंगे लेकिन सवाल आज भी है कि एसपीजी ने अपनी ब्लू बुक से अलग जाकर प्रधानमंत्री को सिंगल इंजन वाले विमान में कैसे उड़ने दिया. क्या उस घटना को देखते हुए पंजाब की घटना के पीछे भाषणों से उदासीन हो रहे समर्थकों और मतदाता में जोश पैदा करने के लिए किया जा रहा है ?

पुलवामा में हमले के दो घंटे बाद प्रधानमंत्री फ़ोन से रैली को संबोधित कर रहे थे. रुद्रपुर की रैली उन्होंने फ़ोन से संबोधित की थी. तब सवाल उठा था कि जवान शहीद हुए हैं. देश पर हमला हुआ है और प्रधानमंत्री रैली की चिन्ता कर रहे हैं. 2016 में मौसम ख़राब होने के कारण बहराइच की सभा को उन्होंने फ़ोन से संबोधित किया था क्योंकि मौसम ख़राब होने के कारण उनका हेलिकाप्टर नहीं उतर सकता था. पंजाब के समय भी यही किया जा सकता था.पंजाब की यह पूरी घटना पंजाब की जनता का सामना करने से बचने के लिए के लिए ड्रामा लगता है. इस घटना के बहाने यूपी के चुनावी भाषणों में जोश पैदा किया जाएगा. इंतज़ार कीजिए अगले भाषण का. कैसे सब कुछ मैं मोदी मैं मोदी पर जा टिकेगा.  

देश के शीर्षस्थ साहित्यकार विष्णु नागर ने अपने फेसबुक पेज पर बगैर नाम लिए लिखा है- इस पद पर पहले बैठे सभी भूतपूर्व कोई आदर्श नेता नहीं थे मगर एक न्यूनतम गरिमा से संपन्न थे. कम से कम छिछोरे नहीं थे.आलोचना उन पर देर-सबेर असर दिखाती थी. मगर ये तो हद है. इसे न पद की गरिमा से कोई मतलब है,न व्यक्तित्व में गहराई की कोई सतह है. छिछोरापन, घटिया प्रचार की सतत चाह है. फैशनपरस्ती है. प्रदर्शन प्रियता है. इस आदमी की किसी बात का कोई मतलब नहीं.ये गाँधी, अंबेडकर, सरदार पटेल का गाना जरूर गाहे-बगाहे गाता रहता है मगर इसे इनमें से किसी से कोई लेना-देना नहीं. इसका कोई आदर्श नहीं. अपना आदर्श यह स्वयं है. इसे देश,धर्म, किसान, गरीब किसीसे कोई लेनादेना नहीं. यह किसी का नेता नहीं. यह भ्रम है कि यह देश का नेता है. इमेज है कि यह देश का नेता है. यह क्रूरतम है. नीरो है. हिटलर है. ये सब अपने लिए थे. ये भी केवल अपने लिए है.ये किसी को भी लात कभी भी मार सकता है. कायर आदमी सबसे क्रूर होता है.

व्यक्ति, देश,धर्म,मनुष्यता, सब इसके इस्तेमाल की चीजें हैं-व्यक्तिगत उपयोग की.  इसके लिए ये साबुन, तेल,तौलिया, कपड़े हैं. काम निबटा और फेंका. इसके फर्जी प्रोफाइल, पब्लिसिटी पर फिदा लोग इस देश के सबसे बदकिस्मत लोग हैं. बदकिस्मत हम भी हैं मगर हमसे ज्यादा वो हैं,जो इसे अपना समझते हैं. जो इसे देश का रखवाला समझते हैं. मैं ईश्वर में विश्वास करनेवाला होता तो उससे इनके लिए प्रार्थना करता. गाँधी होता तो अपना दूसरा गाल इनकी ओर इनका थप्पड़ खाने के लिए कर देता.

जिंदा बचकर आ गया हूं... कहने के बाद विचारक आयुष कुमार मिश्र ने लिखा है- BJP और MODI को अपना "स्क्रिप्ट राइटर" बदल लेना चाहिए क्योंकि बेहद घटिया और D ग्रेड स्टोरी लिखी है.उन्होंने सिलसिलेवार उन्होंने कुछ तथ्यात्मक बातें रखी हैं- 

1. PM की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की नही बल्कि एसपीजी की होती और SPG सुरक्षा प्राप्त हर व्यक्ति का रूट चार्ट SPG के निगरानी में होता है और पूरे रास्ते मे SPG के लोग अपने हिसाब से सुरक्षा घेरा बनवाते हैं. तो क्या SPG ने ऐसा नही किया ? और यदि नही किया तो क्यों नही किया और नही करने के कारण SPG के प्रमुख और गृहमंत्री से इस्तीफा कब लिया जाएगा.

2. फिरोजपुर में जहां किसानों ने रास्ता रोका वह क्षेत्र राज्य सरकार के पुलिस के अंतर्गत आता ही नही क्योंकि मोदी सरकार के "दखलदांजी नीति" के कारण हाल ही में बॉर्डर क्षेत्र के 50 किमी क्षेत्र को BSF के निगरानी में दे दिया गया है और वो रास्ता बॉर्डर के 10 किमी दूरी पर है तो क्या केंद्र सरकार मानती है कि BSF ने PM के सुरक्षा क्षेत्र की निगरानी नही की और यदि ऐसा है तो BSF के मुखिया होने के नाते गृहमंत्री इस्तीफा   देंगे ?

3. प्रधानमंत्री को हैलीकॉप्टर से 112 किलोमीटर की दूरी तय करनी थी मगर उन्होंने अचानक से कार में जाने का फैसला आखिर किसके सलाह पर लिया और क्या 112 किमी सड़क को बिना पूर्व सूचना के सुरक्षाकर्मियों द्वारा घेर पाना सम्भव है क्योंकि केंद्र सरकार भी जानती है कि पंजाब में किसान मोदी के विरोध में सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं ?

4. IB की इंटेलिजेंस कहाँ थी. क्या वो PM के सुरक्षा में होने वाले चूक को पहले नही भांप पाई और यदि IB को पूरे घटना की जानकारी नही हो सकी तो क्या IB के मुखिया के रूप में गृहमंत्री इस्तीफा देंगे ?

5. BJP के साथी उर मंत्री जो सवाल पंजाब के चन्नी सरकार से कर रही है वो असल मे उन्हें गृहमंत्री से करना चाहिए क्योंकि PM के सुरक्षा में अगर चूक हुआ है तो उसके लिए SPG, BSF और IB जिम्मेदार है और ये तीनो गृहमंत्री के अंतर्गत आता है।

 

संयुक्त किसान मोर्चा ने भी एक प्रेस नोट के जरिए बहुत सी बातें साफ की है-

1. प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा 5 जनवरी को प्रस्तावित पंजाब के दौरे की खबर मिलने पर संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े 10 किसान संगठनों ने अजय मिश्र टेनी की गिरफ्तारी और अन्य बकाया मांगो को लेकर उनका प्रतीकात्मक विरोध करने का ऐलान किया था. इस उद्देश्य से 2 जनवरी को पूरे पंजाब में गांव स्तर पर और 5 जनवरी को जिला और तहसील मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन और पुतला दहन के कार्यक्रम घोषित किए गए थे. प्रधानमंत्री की यात्रा रोकने या उनके कार्यक्रम में अड़चन डालने का कोई कार्यक्रम नहीं था।

2. पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 5 जनवरी को पंजाब के हर जिले और तहसील मुख्यालय पर शांतिपूर्ण विरोध किया गया. जब पुलिस प्रशासन द्वारा कुछ किसानों को फिरोजपुर जिला मुख्यालय जाने से रोका गया तो उन्होंने कई जगह सड़क पर बैठ कर इसका विरोध किया. इनमें से प्यारेयाणा का वह फ्लाईओवर वह भी था जहां प्रधानमंत्री का काफिला आया, रुका और वापस चला गया. वहां के प्रदर्शनकारी किसानों को इसकी कोई पुख्ता सूचना नहीं थी कि प्रधानमंत्री का काफिला वहां से गुजरने वाला है. उन्हें तो प्रधानमंत्री के वापिस जाने के बाद मीडिया से यह सूचना मिली.

3. मौके की वीडियो से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रदर्शनकारी किसानों ने प्रधानमंत्री के काफिले की तरफ जाने की कोई कोशिश तक नहीं की. बीजेपी का झंडा उठाए "नरेंद्र मोदी जिंदाबाद" बोलने वाला एक समूह ही उस काफिले के नजदीक पहुंचा था. इसलिए प्रधानमंत्री की जान को खतरा होने की बात बिल्कुल मनगढ़ंत लगती है.

4. यह बहुत अफसोस की बात है कि अपनी रैली की विफलता को ढकने के लिए प्रधानमंत्री ने "किसी तरह जान बची" का बहाना लगाकर पंजाब प्रदेश और किसान आंदोलन दोनों को बदनाम करने की कोशिश की है. सारा देश जानता है कि अगर जान को खतरा है तो वह किसानों को अजय मिश्र टेनी जैसे अपराधियों के मंत्री बनकर छुट्टा घूमने से है. संयुक्त किसान मोर्चा देश के प्रधानमंत्री से यह उम्मीद करता है कि वह अपने पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए ऐसे गैर जिम्मेदार बयान नहीं देंगे.

 

विशेष टिप्पणी

क्या मोदी सरकार माफी मांगेगी ?

न्यूयॉर्क टाइम्स कह रहा है कि मोदी सरकार ने पांच साल पहले 2017 मे 15 हजार करोड़ रुपये का जो रक्षा सौदा इस्राइल से किया था, उसमें पेगासस स्पाईवेयर की खरीद भी शामिल थी.अखबार ने अपनी सालभर लंबी चली जांच के बाद यह खुलासा किया है. ऐसे खुलासे के बाद एक देश के रूप में हमारा सिर शर्म से झुक जाता है. दूसरी तरफ बेशर्म मोदी सरकार को अपनी घटिया हरकतों पर गर्व होता दिखाई देता हैं. पेगासस एक ऐसा स्पायवेयर है, जो इसे संचालित करने वालों को दूर से ही किसी स्मार्टफोन को हैक करने के साथ ही उसके माइक्रोफोन और कैमरा सहित, इसके कंटेंट और इस्तेमाल तक पहुंच देता है. इस तरह के सॉफ्टवेयर आतंकवाद का मुकाबला करने के एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं लेकिन भारत में मोदी सरकार ने इससे विपक्ष के नेताओ, पत्रकारो, मानव अधिकार कार्यकर्ताओ, आएएस अफसरों, जजों, और भाजपा में मोदी के सहयोगियों की जासूसी करवा रही थीं. 1972 में अमेरिका में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के कार्यालयों पर जासूसी कराने की कोशिश की थी, जिसे वॉटरगेट स्कैंडल के नाम से जाना जाता है. इसके कारण बाद में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. आज तो हम इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि मोदी सरकार इस इस्तीफा देना तो दूर रहा इस कृत्य पर माफी भी मांगेंगी. Girish Malviya की पोस्ट

फिल्म

पुष्पा का नायक अपनी दाढ़ी से तिनके निकाल-निकालकर अलाव सुलगा रहा है ?

हमें गणतंत्र से आग नहीं, पुष्प की आशा रही है, लेकिन एक प्रति-नायक खलनायक इधर खूब चर्चित हुआ है, जिसका तकिया कलाम है कि ‘पुष्पा बोले तो फ्लावर समझे क्या, आग है मैं, झुकेगा नहीं।’ घर में बंद रहे हम लोगों को दिनों बाद एक नया फंटूश तस्कर मिला है, तो हम लट्टू हुए जा रहे हैं। वैसे हमारी स्मृतियों में तो वह पुष्पा है, पचास साल पहले आई फिल्म ‘अमर प्रेम’ वाली और वह राजेश खन्ना का संवाद, ‘पुष्पा, आइ हेट टीयर्स।’ आखिर नया क्या है, नई वाली पुष्पा में? यह पुराने कलेवर वाली नए तेवर (स्टाइल) से लैस फिल्म है। क्या यह पहला प्रति-नायक है, बीच गाने में जिसकी चप्पल खुल जाती है? क्या यह पहला नायक है, जिसकी घनी दाढ़ी में इस तंत्र और समाज ने खूब सारे तिनके फंसा रखे हैं? क्या यह पहला प्रति-नायक है, जो अपनी दाढ़ी से तिनके निकाल-निकाल कर अलाव सुलगा रहा है? बेशक, फिल्म रसदार-मिक्स मसाला है और मनमोहन देसाई की सफल कट-पेस्ट फिल्में याद आने लगती हैं, जिनमें तथ्य-तर्क का भी बड़ा लोचा रहता था। देसाई की फिल्में तंत्र के दायरे में ही बहती हैं, लेकिन ‘पुष्पा : द राइज’ मुठभेड़ के मुहाने पर पहुंचने का आभास देती है। माफिया तस्कर बंदूक के साये में भ्रष्ट एसपी के कपड़े उतरवा देता है और खुद भी कपड़े उतारकर कहता है, तू नंगा है, तो तुझे कुत्ता भी नहीं पहचानेगा, लेकिन मैं नंगा ऐसे ही जाऊंगा, तब भी लोग मुझे पहचानेंगे, मेरा ब्रांड वर्दी या कपड़े का मोहताज नहीं है। वाकई ऐसा ही होता है, माफिया सीधे शादी के मंडप में पहुंचता है, जहां माफिया संरक्षक एक मंत्री जी भी उसका इंतजार कर रहे हैं और एसपी जब अपने बंगले पर पैदल पहुंचता है, तो उसका कुत्ता भी भौंकने लगता है, जाहिर है, एसपी के गुस्से की गोली भी खाता है। एक और उल्लेखनीय दृश्य है, जिसमें एसपी ‘कुछ कम है.. कुछ कम है’ की रट लगाए हुए है। मतलब, बुरी तरह से भ्रष्ट तंत्र के एक सेनापति को पैसे से भरे बैग के साथ-साथ पूरा सम्मान भी चाहिए। लेकिन कपड़े खुलने के बाद आहत एसपी घर आए पैसे को भी आग देता है, मतलब, तंत्र के सेनापति के लिए धन नहीं, सम्मान प्राथमिक है। सवाल है कि पुष्पा ने संविधान को चुनौती दी है या उसके एक सेनापति को या पूरे तंत्र को? स्याह धन का एक बैग जलाने से क्या होगा? क्या लाल चंदन के साथ देश के बिकने का सिलसिला थम जाएगा? अंतत: यह पुष्पा भी आम आदमी के बीच से निकला चतुर चोरों का एक प्रतिनिधि है, जो हमारे उस गणतंत्र को आईना दिखा रहा है, जिसके अनेक कारिंदे चोरों के मौसेरे भाई बनने को लपलपा रहे हैं। याद कीजिए, आज से तीस साल पहले देश के एक बड़े सेनापति एन एन वोहरा ने देश में बढ़ते अपराधीकरण का अध्ययन किया था, उनकी रिपोर्ट काट-छांटकर संसद में पेश हुई थी। जाहिर है, उस खास रिपोर्ट के कटे-छंटे हिस्से ही आज भी गणतंत्र को चुनौती दे रहे हैं। अब पुष्पा : द रियल का इंतजार कीजिए और देखिए तो सही कि आप कहां हैं? किसी सिंडिकेट में तो नहीं हैं? क्या कर रहे हैं? जय जय भारत.. प्रसिद्ध पत्रकार ज्ञानेश उपाध्याय की फेसबुक वॉल से साभार