साहित्य

यहां पढ़िए वे पांच कविताएं जो खूब होती हैं वायरल

यहां पढ़िए वे पांच कविताएं जो खूब होती हैं वायरल

हिंदी साहित्य को आदिकाल, भक्ति काल, रीति काल,आधुनिक काल और नव्योत्तर काल में बांटा गया है. फिलहाल कौन सा काल चल रहा है इसकी जानकारी ठीक-ठाक ढंग से किसी के पास नहीं है.ज्यादातर लोग मानते हैं कि सारे कालों का एक ही काल है और वह हैं अन्याय को बढ़ावा देने वालों का काल.इस काल में बहुत से साहित्यकारों ने पाला बदलकर चापलूसी से भरी हुई कविताएं और कहानियां लिखी है, लेकिन बहुत से साहित्यकार ऐसे हैं जो अन्याय के आगे जमकर डटे हुए हैं और अपना प्रतिरोध दर्ज कर रहे हैं. यहां हम अपने पाठकों के लिए ऐसी पांच कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर दूसरे-तीसरे दिन वायरल होती हैं और सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा पढ़ी जाती है.

 

एक- योगा कर

भूख लगी है? योगा कर!

काम चाहिए ? योगा कर!

क़र्ज़ बहुत है? योगा कर!

रोता क्यों है? योगा कर!

 

अनब्याही बेटी बैठी है?

घर में दरिद्रता पैठी है?

तेल नहीं है? नमक नहीं है?

दाल नहीं है? योगा कर!

 

दुर्दिन के बादल छाये हैं?

पन्द्रह लाख नहीं आये हैं?

जुमलों की बत्ती बनवाले

डाल कान में! योगा कर!

 

किरकिट का बदला लेना है?

चीन-पाक को धो देना है?

गोमाता-भारतमाता का

जैकारा ले! योगा कर!

 

हर हर मोदी घर घर मोदी?

बैठा है अम्बानी गोदी?

बेच रहा है देश धड़ल्ले?

तेरा क्या बे? योगा कर!

- राजेश चन्द्र

 

 दो- कौन जात हो

कौन जात हो भाई?

“दलित हैं साब!”
नहीं मतलब किसमें आते हो?
आपकी गाली में आते हैं
गन्दी नाली में आते हैं
और अलग की हुई थाली में आते हैं साब!
मुझे लगा हिन्दू में आते हो!
आता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।

क्या खाते हो भाई?
“जो एक दलित खाता है साब!”
नहीं मतलब क्या-क्या खाते हो?
आपसे मार खाता हूँ
कर्ज़ का भार खाता हूँ
और तंगी में नून तो कभी अचार खाता हूँ साब!
नहीं मुझे लगा कि मुर्गा खाते हो!
खाता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।

क्या पीते हो भाई?
“जो एक दलित पीता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या पीते हो?
छुआ-छूत का गम
टूटे अरमानों का दम
और नंगी आँखों से देखा गया सारा भरम साब!
मुझे लगा शराब पीते हो!
पीता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में।

क्या मिला है भाई
“जो दलितों को मिलता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या मिला है?
ज़िल्लत भरी जिंदगी
आपकी छोड़ी हुई गंदगी
और तिस पर भी आप जैसे परजीवियों की बंदगी साब!
मुझे लगा वादे मिले हैं!
मिलते हैं न साब! पर आपके चुनाव में।

क्या किया है भाई?
“जो दलित करता है साब!
नहीं मतलब क्या-क्या किया है?
सौ दिन तालाब में काम किया
पसीने से तर सुबह को शाम किया
और आते जाते ठाकुरों को सलाम किया साब!
मुझे लगा कोई बड़ा काम किया!
किया है न साब! आपके चुनाव का प्रचार..।

- बच्चा लाल उन्मेष

 

 

तीन- साहेब तुम्हारे रामराज में

 

एक साथ सब मुर्दे बोले ‘सब कुछ चंगा-चंगा’

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

ख़त्म हुए शमशान तुम्हारे, ख़त्म काष्ठ की बोरी

थके हमारे कंधे सारे, आँखें रह गई कोरी

दर-दर जाकर यमदूत खेले

मौत का नाच बेढंगा

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

नित लगातार जलती चिताएँ

राहत माँगे पलभर

नित लगातार टूटे चूड़ियाँ

कुटती छाति घर घर

देख लपटों को फ़िडल बजाते वाह रे ‘बिल्ला-रंगा’

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

साहेब तुम्हारे दिव्य वस्त्र, दैदीप्य तुम्हारी ज्योति

काश असलियत लोग समझते, हो तुम पत्थर, ना मोती

हो हिम्मत तो आके बोलो

‘मेरा साहेब नंगा’

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

- पारूल खक्कड़

 

 

चार- मैं बहुत सेंसिटिव हूं

बार-बार मत दिखाओ

सैकड़ों तपे हुए मील के पत्थरों

और उन झुलसे हुए लोगों को

मत दिखाओ उनके बाल-बच्चों को

उनके छालों भरे पांवों को

देखा नहीं जाता यह सब...

मैं बहुत सेंसिटिव हूं!

 

मैं अर्थात्,

महज़ मैं ही नहीं...

हम सब देशवासी...

वे, जो कल्चर्ड हैं

जिनके पास घर है

दरवाज़ा है

दरवाज़े पर बंदनवार है

रंगोली है

खिड़की में थाली, चम्मच

तालियां हैं

दीए में तेल है

देह में योग है

प्राणायाम है

छंद है

गंध है

मद्धिम संगीत है

मेडिटेशन है

धुर आनंद है,

इस तरह

आप की तरह

मैं भी बहुत सेंसिटिव हूं!

 

इसीलिए कहा पत्नी से

बाई नहीं है,

मैं मांज देता हूं बर्तन

झाडू-पोंछा कर देता हूं

उससे कहीं बेहतर... 

तुम देखना !

स्त्री -मुक्ति !

और साथ-साथ व्यायाम भी...

सुनते ही पत्नी भी

घर में मटर की गुजिया

बनाने के लिए

खुशी-खुशी तैयार हो गई

कितना मोहक और कुरकुरा रिश्ता है हमारे बीच!

बहुत सेंसिटिव हूं मैं !

 

फिर भी बेकार में वे लोग

बार-बार

नज़र के सामने आ ही जाते हैं...

अरे, कोई न कोई इंतज़ाम

हो ही जाएगा उनका

सरकार उन्हें खिचड़ी दे तो रही है न

 

तो और क्या चाहिए उन्हें?

बैठे रहना चाहिए न चुपचाप

जहां कहा जाए...

जल्द से जल्द उन्हें

नज़रों से ओझल हो जाना चाहिए

देखा नहीं जाता

पीड़ा होती है

बहुत सेंसिटिव हूं जी मैं !

 

सच कहूं तो उनके बगैर शहर

सुंदर साफ-सुथरे और शांत लगने लगे हैं

और हां, सामाजिक अंतर या दूरियां

तो ज़रूरी ही है न?

अरे, यह सब तो सनातन है

हमारी पुरानी चिर-परिचित संस्कृति में

पहले से ही

यह विद्यमान है,

इस सच को छिपाया नहीं जा सकता.

आजकल के प्रगतिशील,

लिबरल्स, वामपंथी, शहरी नक्सल, टुकड़े टुकड़े गैंग वाले...

कहते हैं, नासा ने अब इन शब्दों को

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में शामिल कर लिया है...

और वो...

क्या कहते हैं उसे...  

ओह, याद नहीं आ रहा...

क्या है!

हां, मानवाधिकार वाले...

इनमें से कोई भी नकार नहीं सकता

इस सच को !

 

अमेरिका में बसा हुआ मेरा भांजा बताता है

वहां इस तरह के लोग नहीं मिलते

घरेलू काम, बागवानी मैं ही करता हूं

घर में रंगरोगन पत्नी-बच्चे करते हैं

मामा, घर भी हमने खुद ही बनाया है

अरे, सब की किट्स मिलती हैं ऑनलाइन...

डॉग को भी हम ही ले जाते हैं बाहर घुमाने                                        

उसकी टट्टी-पेशाब ‘सक’ करने की मशीन लेकर.

सभी काम मशीन से ही होते हैं यहां...

हम भी काम करते हैं मशीन की तरह ही

समय बेहतर गुज़रता है !

भाग्यशाली है मेरा भांजा...

भारत भी बहुत जल्द हो जाए सुपर पॉवर

साथ ही विश्वगुरू भी

इस मामले में मैं ज़्यादा सेंसिटिव हूं...

 

अरे ओ बीवी !

ज़रा रिमोट तो देना...

क्यों दिखाते हैं ये फालतू बातें बिकाऊ मीडियावाले

दुनिया में भारत को बदनाम करते हैं...

बंद करो !

 

इन पैदल चलने वालों

और उनके छालेभरे पैरों को दिखाना...

क्या ज़रूरत है?

 

एक बात बहुत अच्छी है

कि

यह रिमोट मेरे जैसा ही सेंसिटिव है.

- मोहन देस

मराठी से अनुवाद: उषा वैरागकर आठले

 

पांच- मोदी 

मोदी के घर में उसके कई सेवक हैं

उसका वहाँ कोई भाई, कोई बहन नहीं
उसके आँगन में खेलता कोई बच्चा नहीं
उसके अनुयायी लाखों में है
उसका कहने को भी कोई मित्र नहीं
वह जब आधी रात को चीख़ पड़ता है भय से काँप कर

उसे हिलाकर, जगाकर
‘क्या हुआ’, यह पूछने वाला कोई नहीं
‘कुछ नहीं हुआ’ यह उत्तर सुनने वाला कोई नहीं
ऐसा भी कोई नहीं जिसकी चिन्ता में
वह रात-रात भर जागे
ऐसा कोई नहीं
जिसकी मौत उसे दहला सके

किसी दिन उसे उलटी आ जाए
तो उसकी पीठ सहलाने वाला कोई नहीं
आधी-आधी रात जागकर
उसके दुख सुन सके, उसके सुख साझा कर सके
ऐसा कोई नहीं
कोई नहीं जो कह सके आज तो तुम्हें
कोई फ़िल्मी गाना सुनाना ही पड़ेगा
उसकी एक माँ ज़रूर हैं
जो उसे आशीर्वाद देते हुए फ़ोटो खिंचवाने के काम
जब तब आती रहती हैं

यूँ तो पूरा गुजरात उसका है
मगर उसके घर पर उसका इन्तज़ार करने वाला कोई नहीं
उसे प्रधानमन्त्री बनाने वाले तो बहुत हैं
उसको इनसान बना सके, ऐसा कोई नहीं।

- विष्णु नागर

 

 

 

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