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कांकेर में पत्रकार कमल शुक्ला के ऊपर किए गए हमले का असली सच आया सामने

कांकेर में पत्रकार कमल शुक्ला के ऊपर किए गए हमले का असली सच आया सामने

जांच समिति ने सौंपी रिपोर्ट

रायपुर. कांकेर के पत्रकार कमल शुक्ला के ऊपर किए गए हमले का सच सामने आ गया है. मामले की जांच के लिए गठित समिति के सदस्य राजेश जोशी, सुरेश महापात्र, रुपेश गुप्ता, अनिल द्विवेदी और शगुफ्ता शरीन ने शनिवार को अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी. समिति ने हमले की घटना के लिए कई कारणों को जिम्मेदार मानकर कांकेर थाने के समूचे स्टाफ और पुलिस अधीक्षक पर कार्रवाई की अनुशंसा की है. समिति ने माना है कि इस तरह की घटना को रोकने के लिए किसी भी सूरत में पत्रकार सुरक्षा कानून का लागू होना बेहद अनिवार्य है. समिति ने मामले में कई गंभीर धाराओं को जोड़ने की सिफारिश भी की है, लेकिन कई बिन्दुओं में पत्रकार कमल शुक्ला और उनके साथ जुड़े लोगों के आचार-व्यवहार पर भी सवाल उठाए हैं. समिति ने घटना की पृष्ठभूमि, सभी पक्षों की संलिप्तता, भूमिका, पुलिस प्रशासन की भूमिका, पब्लिक डोमन में उपलब्ध आरोपों की पड़ताल जैसे बिन्दुओं पर अपनी जांच केंद्रित रखी थीं. मुख्यमंत्री को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में 16 पेज का मूल प्रतिवेदन और 450 पेज के अन्य दस्तावेज शामिल है.

घटना के पीछे कई कारण सामने आए हैं. एक महत्वपूर्ण कारण पांच हजार रुपए का विज्ञापन भी है. बताया जाता है कि कमल शुक्ला ने विधायक शिशुपाल सोरी का एक विज्ञापन प्रकाशित किया था जिसके भुगतान में विलंब हो गया था. जब सोरी के प्रतिनिधि ने विज्ञापन की राशि भेजी तो कमल शुक्ला ने पैसे लेने से इंकार किया. समिति के सदस्यों ने कई लोगों से मुलाकात के बाद वाट्सअप चैट की स्क्रीन शाट एकत्रित की है. एक जगह कमल शुक्ला लिखते हैं- आज से आदर मत करना भाई. मुझे सब पता है आप लोग क्या कर रहे हो. मैं यहां की राजनीति छोड़कर रायपुर चला गया पर कल से अपना काम कांकेर में शुरू कर दिया हूं. अब कांकेर के विकास में आप लोगों की भूमिका को मेहनत से पूरे देश में पहुंचाने की कोशिश करूंगा. आज आपने जिस तरह से मुझको सहयोग किया ऐसा ही सहयोग सुमित्रा मारकोले ने भी किया था. ऐसा ही सहयोग शंकर  ध्रुवा ने भी किया था.

मारपीट की घटना की पृष्ठभूमि में एक विवाद नजूल की जमीन पर कब्जे को लेकर भी जुड़ा है. समिति ने अपनी रिपोर्ट में इसका भी जिक्र किया है. समिति ने लिखा है- प्रदेश सरकार ने नजूल की जमीन पर कब्जा शुल्क लेकर कब्जेदार को पट्टा देने की बड़ी योजना लागू की है. कांकेर में सड़क चौड़ीकरण और कुछ विकास कामों के लिए कोशिश चल रही है. कई पत्रकारों ने नजूल की भूमि पर कब्जा कर रखा है. प्रशासन ने कुछ को नोटिस भेजा तो विवाद और टकराव बढ़ गया. कांकेर के पत्रकार कमल शुक्ला और सतीश यादव को भी यह नोटिस भेजा गया तो नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष जितेंद्र सिंह ठाकुर को लेकर सतीश यादव ने अपने फेसबुक पर व्यक्तिगत टिप्पणियां लिखी. रिपोर्ट में और भी कई सारे तथ्य ऐसे हैं जो यह बताने के लिए काफी है कि मामला पूरी तरह से एकतरफा नहीं है. यह घटना दुर्भाग्यजनक और शर्मनाक तो है ही, लेकिन मौजूद तथ्य यह बताने के लिए भी काफी है कि पत्रकार और पत्रकारिता क्यों बदनाम है? यह रिपोर्ट पत्रकारिता की आड़ में गोरखधंधा करने वालों का पर्दापाश तो करती है वहीं राजनीति और प्रशासन की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है. समिति ने मीडिया के भीतर विमर्श पर भी जोर दिया है. समिति के सदस्यों का कहना है कि एक पत्रकार के रुप में लक्ष्मण रेखा कहां तक होनी चाहिए यह मीडिया को सोचना है. उसका अपना दायरा क्या है. कांकेर में जो कुछ घटित हुआ उसमें कमल शुक्ला और सतीश यादव ने पत्रकारिता से बेपटरी होकर अपनी निजी नाराजगी को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रस्तुत किया जिसके चलते दोनों के साथ गंभीर घटना घटित हुई. पूरे घटनाक्रम में अहं का टकराव साफ-साफ दिखाई देता है. यह स्थिति संवादहीनता से पैदा होती है. समिति ने माना है कि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृति नहीं होनी चाहिए. ऐसी किसी भी घटना को रोका जाना चाहिए. इधर समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक को जांच रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.

 

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